श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1851–1860
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1851–1860
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केनास्येवं कृताभद्रे मामचिन्त्यावमन्य च ॥ ४८ ॥
अपने मन्त्रियोंको विदा करके उसने एकान्तमें शूर्पणखासे पूछा-' भद्रे! किसने मेरी परवा न करके — मेरी सर्वथा अवहेलना करके तुम्हारी ऐसी दुर्दशा की है? ॥ ४८ ॥
कः शूलं तीक्ष्णमासाद्य सर्वगात्रैर्निषेवते ।
कः शिरस्यग्निमाधाय विश्वस्तः स्वपते सुखम् ॥ ४ ९ ॥
' कौन तीखे शूलके पास जाकर उसे अपने सारे अंगोंमें चुभोना चाहता है? कौन मूर्ख अपने सिरपर आग रखकर बेखटके सुखकी नींद सो रहा है? ॥ ४ ९ ॥
आशीविषं घोरतरं पादेन स्पृशतीह कः ।
सिंहं केसरिणं कश्च दंष्ट्रायां स्पृश्य तिष्ठति ॥ ५० ॥
‘ कौन अत्यन्त भयंकर विषधर सर्पको पैरसे कुचल रहा है? तथा कौन केसरी सिंहकी दाढ़ोंमें हाथ डालकर निश्चिन्त खड़ा है? ' ॥ ५० ॥
इत्येवं ब्रुवतस्तस्य स्रोतोभ्यस्तेजसोऽर्चिषः ।
निश्चेरुर्दह्यतो रात्रौ वृक्षस्येव स्वरन्ध्रतः ॥ ५१ ॥
इस प्रकार बोलते हुए रावणके कान, नाक एवं आँख आदि छिद्रोंसे उसी प्रकार आगकी चिनगारियाँ निकलने लगीं, जिस प्रकार रातको जलते हुए वृक्षके छेदोंसे आगकी लपटें निकलती हैं ॥ ५१ ॥
तस्य तत् सर्वमाचख्यौ भगिनी रामविक्रमम् ।
खरदूषणसंयुक्तं राक्षसानां पराभवम् ॥ ५२ ॥
तब रावणकी बहिन शूर्पणखाने श्रीरामके उस पराक्रम और खर- दूषणसहित समस्त राक्षसोंके संहारका ( सारा) वृत्तान्त कह सुनाया ॥ ५२ ॥
स निश्चित्य ततः कृत्यं स्वसारमुपसान्त्व्य च ।
ऊर्ध्वमाचक्रमे राजा विधाय नगरे विधिम् ॥ ५३ ॥
यह सुनकर रावणने अपने कर्तव्यका निश्चय किया और अपनी बहिनको सान्त्वना देकर नगर आदिकी रक्षाका प्रबन्ध करके वह आकाशमार्गसे उड़ चला ॥ ५३ ॥
त्रिकूटं समतिक्रम्य कालपर्वतमेव च ।
ददर्श मकरावासं गम्भीरोदं महोदधिम् ॥ ५४ ॥
त्रिकूट और कालपर्वतको लाँघकर उसने मगरोंके निवासस्थान गहरे महासागरको देखा ॥ ५४ ॥
तमतीत्याथ गोकर्णमभ्यगच्छद् दशाननः ।
दयितं स्थानमव्यग्रं शूलपाणेर्महात्मनः ॥ ५५ ॥
उसे ऊपर-ही-ऊपर लाँघकर दशमुख रावण गोकर्णतीर्थमें गया, जो परमात्मा शूलपाणि शिवका प्रिय एवं अविचल स्थान है ॥ ५५ ॥
तत्राभ्यगच्छन्मारीचं पूर्वामात्यं दशाननः ।
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पुरा रामभयादेव तापस्यं समुपाश्रितम् ॥ ५६ ॥
वहाँ रावण अपने भूतपूर्व मन्त्री मारीचसे मिला, जो श्रीरामचन्द्रजीके भयसे ही पहलेसे उस स्थानमें आकर तपस्या करता था ॥ ५६ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि रामोपाख्यानपर्वणि रामवनाभिगमने सप्तसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २७७ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत रामोपाख्यानपर्वमें श्रीरामवनगमनविषयक दो सौ सतहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७७ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठका श्लोक मिलाकर कुल ५६३ श्लोक हैं )
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अष्टसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः मृगरूपधारी मारीचका वध तथा सीताका अपहरण मार्कण्डेय उवाच
मारीचस्त्वथ सम्भ्रान्तो दृष्ट्वा रावणमागतम् ।
पूजयामास सत्कारैः फलमूलादिभिस्ततः ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - युधिष्ठिर! रावणको आया देख मारीच सहसा उठकर खड़ा हो गया और उसने फल - मूल आदि अतिथिसत्कारकी सामग्रियोंद्वारा उसका विधिवत् पूजन किया ॥ १ ॥
विश्रान्तं चैनमासीनमन्वासीनः स राक्षसः ।
उवाच प्रश्रितं वाक्यं वाक्यज्ञो वाक्यकोविदम् ॥ २ ॥
जब रावण बैठकर विश्राम कर चुका, तब उसके पास बैठकर बातचीत करनेमें कुशल राक्षस मारीचने वाक्यका मर्म समझनेमें निपुण रावणसे विनयपूर्वक कहा— ॥ २ ॥
न ते प्रकृतिमान् वर्णः कच्चित् क्षेमं पुरे तव ।
कच्चित् प्रकृतयः सर्वा भजन्ते त्वां यथा पुरा ॥ ३ ॥
‘ लंकेश्वर! तुम्हारे शरीरका रंग ठीक हालतमें नहीं है । तुम उदास दिखायी देते हो । तुम्हारे नगरमें कुशल तो है न? समस्त प्रजा और मन्त्री आदि पहलेकी भाँति तुम्हारी सेवा करते हैं न? ॥ ३ ॥
किमिहागमने चापि कार्यं ते राक्षसेश्वर ।
कृतमित्येव तद् विद्धि यद्यपि स्यात् सुदुष्करम् ॥ ४ ॥
‘ राक्षसराज! कौन - सा ऐसा कार्य आ गया है, जिसके लिये तुम्हें यहाँतक आना पड़ा? यदि वह मेरेद्वारा साध्य है तो कितना ही कठिन क्यों न हो, उसे किया हुआ ही समझो' ॥ ४ ॥
शशंस रावणस्तस्मै तत् सर्वं रामचेष्टितम् ।
समासेनैव कार्याणि क्रोधामर्षसमन्वितः ॥ ५ ॥
रावण क्रोध और अमर्षमें भरा हुआ था । उसने एक-एक करके रामद्वारा किये हुए सब कार्य संक्षेपसे कह सुनाये ॥ ५ ॥
मारीचस्त्वब्रवीच्छ्रुत्वा समासेनैव रावणम् ।
अलं ते राममासाद्य वीर्यज्ञो ह्यस्मि तस्य वै ॥ ६ ॥
मारीचने सारी बातें सुनकर थोड़ेमें ही रावणको समझाते हुए कहा-‘दशानन! तुम
श्रीरामसे भिड़नेका साहस न करो । मैं उनके पराक्रमको जानता हूँ ॥ ६ ॥
बाणवेगं हि कस्तस्य शक्तः सोढ़ महात्मनः ।
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प्रव्रज्यायां हि मे हेतुः स एव पुरुषर्षभः ॥ ७ ॥
विनाशमुखमेतत् ते केनाख्यातं दुरात्मना । ‘ भला! इस जगत्में कौन ऐसा वीर है, जो परमात्मा श्रीरामके बाणोंका वेग सह सके? मैं जो यहाँ संन्यासी बना बैठा हूँ, इसमें भी वे पुरुषरत्न श्रीराम ही कारण हैं । श्रीरामसे वैर मोल लेना विनाशके मुखमें जाना है, किस दुरात्माने तुम्हें ऐसी सलाह दी है? ' ॥ ७३ ॥
तमुवाचाथ सक्रोधो रावणः परिभर्त्सयन् ॥ ८ ॥
अकुर्वतोऽस्मद्वचनं स्यान्मृत्युरपि ते ध्रुवम् । मारीचकी बात सुनकर रावण और भी कुपित हो उठा और उसे डाँटते हुए बोला -' मारीच! यदि तू मेरी बात नहीं मानेगा तो भी तेरी मृत्यु निश्चित ही है ॥ ८३ ॥
मारीचश्चिन्तयामास विशिष्टान्मरणं वरम् ॥ ९ ॥
अवश्यं मरणे प्राप्ते करिष्याम्यस्य यन्मतम् । मारीचने सोचा, ‘ यदि मृत्यु निश्चित ही है तो श्रेष्ठ पुरुषके हाथसे ही मरना अच्छा होगा; अतः रावणका जो अभीष्ट कार्य है, उसे अवश्य करूँगा' ॥ ९ ३ ॥ ततस्तं प्रत्युवाचाथ मारीचो रक्षसां वरम् ॥ १० ॥
किं ते साह्यं मया कार्यं करिष्याम्यवशोऽपि तत् ।
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तदनन्तर उसने राक्षसराज रावणसे कहा– ' अच्छा; बताओ, मुझे तुम्हारी क्या सहायता करनी होगी? इच्छा, न होनेपर भी मैं विवश होकर उसे करूँगा ' ॥ १०३ ॥
तमब्रवीद् दशग्रीवो गच्छ सीतां प्रलोभय ॥ ११ ॥
रत्नशृङ्गी मृगो भूत्वा रत्नचित्रतनूरुहः ।
ध्रुवं सीता समालक्ष्य त्वां रामं चोदयिष्यति ॥ १२ ॥
तब दशाननने उससे कहा –' तुम एक ऐसे मनोहर मृगका रूप धारण करो जिसके सींग रत्नमय प्रतीत हों और शरीरके रोएँ भी रत्नोंके ही समान चित्र - विचित्र दिखायी दें । फिर रामके आश्रमपर जाओ और सीताको लुभाओ । सीता तुम्हें देख लेनेपर निश्चय ही रामसे यह अनुरोध करेगी कि ' आप इस मृगको पकड़ लाइये ' ॥ ११-१२ ॥
अपक्रान्ते च काकुत्स्थे सीता वश्या भविष्यति ।
तामादायापनेष्यामि ततः स न भविष्यति ॥ १३ ॥
भार्यावियोगाद् दुर्बुद्धिरेतत् साह्यं कुरुष्व मे I। ' तुम्हारे पीछे रामके अपने आश्रमसे दूर निकल जानेपर सीताको वशमें लाना सहज हो जायगा । मैं उसे आश्रमसे हरकर ले जाऊँगा और दुर्बुद्धि राम अपनी प्यारी पत्नीके
वियोगसे व्याकुल होकर प्राण दे देगा । बस, मेरी इतनी ही सहायता कर दो' ॥ १३३ ॥
इत्येवमुक्तो मारीचः कृत्वोदकमथात्मनः ॥ १४ ॥
रावणं पुरतो यान्तमन्वगच्छत् सुदुःखितः । रावणके ऐसा कहनेपर मारीच स्वयं ही अपना श्राद्ध- तर्पण करके अत्यन्त दुःखी होकर आगे जाते हुए रावणके पीछे- पीछे चला ॥ १४३ ॥
ततस्तस्याश्रमं गत्वा रामस्याक्लिष्टकर्मणः ॥ १५ ॥
चक्रतुस्तत् तथा सर्वमुभौ यत् पूर्वमन्त्रितम् । तदनन्तर अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीके आश्रमके समीप जाकर उन दोनोंने पहले जैसी सलाह कर रखी थी, उसके अनुसार सब कार्य किया ॥ १५३ ॥
रावणस्तु यतिर्भूत्वा मुण्डः कुण्डी त्रिदण्डधृक् ॥ १६ ॥
मृगश्च भूत्वा मारीचस्तं देशमुपजग्मतुः ।
दर्शयामास मारीचो वैदेहीं मृगरूपधृक् ॥ १७ ॥
रावण मूँड़ मुड़ाने, भिक्षापात्र हाथमें लिये एवं त्रिदण्डधारी संन्यासीका रूप धारण करके और मारीच मृग बनकर - दोनों उस स्थानपर गये । मारीचने विदेहनन्दिनी सीताके समक्ष अपना मृगरूप प्रकट किया ॥ १६-१७ ॥
चोदयामास तस्यार्थे सा रामं विधिचोदिता ।
रामस्तस्याः प्रियं कुर्वन् धनुरादाय सत्वरः ॥ १८ ॥
रक्षार्थे लक्ष्मणं न्यस्य प्रययौ मृगलिप्सया ।
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विधिके विधानसे प्रेरित होकर सीताने उस मृगको लानेके लिये श्रीरामचन्द्रजीको भेजा । श्रीरामचन्द्रजी सीताका प्रिय करनेके लिये धनुष हाथमें ले लक्ष्मणको सीताकी रक्षाका भार सौंपकर मृगको लानेकी इच्छासे तुरंत चल दिये ॥ १८३ ॥
स धन्वी बद्धतुणीरः खड्गगोधाङ्गुलित्रवान् ॥ १ ९ ॥ अन्वधावन्मृगं रामो रुद्रस्तारामृगं यथा । वे धनुष -बाण ले, पीठपर तरकस बाँधकर, कटिमें कृपाण लटकाये तथा हाथोंमें दस्ताने पहने उस मृगके पीछे उसी प्रकार दौड़े, जैसे मृगशिरा नक्षत्रके पीछे भगवान् रुद्र दौड़े थे ॥ १ ९ ॥ सोऽन्तर्हितः पुनस्तस्य दर्शनं राक्षसो व्रजन् ॥ २० ॥
चकर्ष महदध्वानं रामस्तं बुबुधे ततः ।
निशाचरं विदित्वा तं राधवः प्रतिभानवान् ॥ २१ ॥
अमोघं शरमादाय जघान मृगरूपिणम् । मायावी राक्षस मारीच कभी छिप जाता और कभी नेत्रोंके समक्ष प्रकट हो जाता था । इस प्रकार वह श्रीरामचन्द्रजीको आश्रमसे बहुत दूर खींच ले गया । तब श्रीरामचन्द्रजी यह ताड़ गये कि यह कोई मायावी राक्षस है । यह बात ध्यानमें आते ही प्रतिभाशाली
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श्रीरघुनाथजीने एक अमोघ बाण लेकर उस मृगरूपधारी निशाचरको मार डाला ॥ २०-२१ ॥ स रामबाणाभिहतः कृत्वा रामस्वरं तदा ॥ २२ ॥
हा सीते लक्ष्मणेत्येवं चुक्रोशार्तस्वरेण ह । श्रीरामचन्द्रजीके बाणसे आहत हो मरते समय मारीचने उनके ही स्वरमें ' हा सीते, हा लक्ष्मण' कहकर आर्तनाद किया ॥ २२ ॥
शुश्राव तस्य वैदेही ततस्तां करुणां गिरम् ॥ २३ ॥
सा प्राद्रवद् यतः शब्दस्तामुवाचाथ लक्ष्मणः ।
अलं ते शङ्कया भीरु को रामं प्रहरिष्यति ॥ २४ ॥
मुहूर्ताद् द्रक्ष्यसे रामं भर्तारं त्वं शुचिस्मिते । विदेहनन्दिनी सीताने भी उसकी वह करुणाभरी पुकार सुनी । उसकी पुकार सुनते ही जिस ओरसे वह आवाज आयी थी, उसी ओर वे दौड़ पड़ीं । तब लक्ष्मणने उनसे कहा -'भीरु! डरनेकी कोई बात नहीं है । भला, कौन ऐसा है, जो भगवान् रामको मार सकेगा? शुचिस्मिते! तुम दो ही घड़ीमें अपने पति भगवान् श्रीरामको यहाँ उपस्थित देखोगी ॥ २३-२४ ॥ इत्युक्ता सा प्ररुदती पर्यशङ्कत लक्ष्मणम् ॥ २५ ॥
हता वै स्त्रीस्वभावेन शुक्लचारित्रभूषणा ।
सा तं परुषमारब्धा वक्तुं साध्वी पतिव्रता ॥ २६ ॥
लक्ष्मणकी यह बात सुनकर रोती हुई सीताने उन्हें संदेहकी दृष्टिसे देखा । यद्यपि शुद्ध सदाचार ही उनका आभूषण था । वे साध्वी और पतिव्रता थीं; तथापि स्त्री स्वभाववश उस समय उनकी बुद्धि मारी गयी । उन्होंने लक्ष्मणको कठोर बातें सुनानी आरम्भ कीं ॥ २५-२६ ॥
नैष कामो भवेन्मूढ यं त्वं प्रार्थयसे हृदा ।
अप्यहं शस्त्रमादाय हन्यामात्मानमात्मना ॥ २७ ॥
पतेयं गिरिशृङ्गाद् वा विशेयं वा हुताशनम् ।
रामं भर्तारमुत्सृज्य न त्वहं त्वां कथंचन ॥ २८ ॥
निहीनमुपतिष्ठेयं शार्दूली क्रोष्टुकं यथा । ' ओ मूढ़! तुम मन-ही- मन जिस वस्तुको पाना चाहते हो, तुम्हारा वह मनोरथ कभी पूर्ण न होगा । मैं स्वयं तलवार लेकर अपना गला काट लूँगी, पर्वतके शिखरसे कूद पडूंगी अथवा जलती हुई आगमें समा जाऊँगी; परंतु ' राम- जैसे स्वामीको छोड़कर तुम - जैसे नीच पुरुषका कदापि वरण न करूँगी । जैसे सिंहिनी सियारको नहीं स्वीकार कर सकती, उसी प्रकार मैं तुम्हें नहीं ग्रहण करूंगी' ॥ २७-२८३ ॥ एतादृशं वचः श्रुत्वा लक्ष्मणः प्रियराघवः ॥ २ ९ ॥
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पिधाय कर्णौ सद्वृत्तः प्रस्थितो येन राघवः ।
स रामस्य पदं गृह्य प्रससार धनुर्धरः ॥ ३० ॥
अवीक्षमाणो बिम्बोष्ठीं प्रययौ लक्ष्मणस्तदा । लक्ष्मण सदाचारी तथा श्रीरामचन्द्रजीके प्रेमी थे । उन्होंने सीताके ये कठोर वचन सुनकर अपने दोनों कान बंद कर लिये और उसी मार्गसे चल दिये, जिससे श्रीरामचन्द्रजी गये थे । उस समय लक्ष्मणके हाथमें धनुष था । उन्होंने बिम्बफलके समान अरुण अधरोंवाली सीताकी ओर आँख उठाकर देखातक नहीं । श्रीरामके पदचिह्नोंका अनुसरण करते हुए उन्होंने वहाँसे प्रस्थान कर दिया ॥ २ ९ -३० ॥ एतस्मिन्नन्तरे रक्षो रावणः प्रत्यदृश्यत ॥ ३१ ॥
अभव्यो भव्यरूपेण भस्मच्छन्न इवानलः ।
यतिवेषप्रतिच्छन्नो जिहीर्षुस्तामनिन्दिताम् ॥ ३२ ॥
इसी समय अवसर पाकर राक्षस रावण साध्वी सीताको हर ले जानेकी इच्छासे वहाँ दिखायी दिया । वह भयानक निशाचर सुन्दर रूप धारण करके राखमें छिपी हुई आगके समान संन्यासीके वेषमें अपने यथार्थ रूपको छिपाये हुए था ॥ ३१-३२ ॥
सा तमालक्ष्य सम्प्राप्तं धर्मज्ञा जनकात्मजा ।
निमन्त्रयामास तदा फलमूलाशनादिभिः ॥ ३३ ॥
उस समय यतिको अपने आश्रमपर आया हुआ देख धर्मको जाननेवाली जनकनन्दिनी सीता फल -मूलके भोजन आदिके अतिथिसत्कारके लिये उसे निमन्त्रित किया ॥
अवमन्य ततः सर्वं स्वरूपं प्रत्यपद्यत ।
सान्त्वयामास वैदेहीमिति राक्षसपुङ्गवः ॥ ३४ ॥
राक्षसराज रावण सीताकी दी हुई उन सभी वस्तुओंकी अवहेलना करके अपने असली रूपमें प्रकट हो गया और विदेहराजकुमारीको इस प्रकार सान्त्वना देने लगा— ॥ ३४ ॥
सीते राक्षसराजोऽहं रावणो नाम विश्रुतः ।
मम लङ्कापुरी नाम्ना रम्या पारे महोदधेः ॥ ३५ ॥
‘ सीते! मैं राक्षसोंका राजा हूँ । मेरा ' रावण ' नाम सर्वत्र विख्यात है । समुद्रके पार बसी हुई रमणीय लंकापुरी मेरी राजधानी है ॥ ३५ ॥
तत्र त्वं नरनारीषु शोभिष्यसि मया सह ।
भार्या मे भव सुश्रोणि तापसं त्यज राघवम् ॥ ३६ ॥
‘ वहाँ नर- नारियोंके बीच मेरे साथ रहकर तुम बड़ी शोभा पाओगी । अतः सुन्दरी! तुम मेरी पत्नी हो जाओ और इस तपस्वी रामको छोड़ दो ' ॥ ३६ ॥
एवमादीनि वाक्यानि श्रुत्वा तस्याथ जानकी ।
पिधाय कर्णौ सुश्रोणी मैवमित्यब्रवीद् वचः ॥ ३७ ॥
प्रपतेद् द्यौः सनक्षत्रा पृथिवी शकलीभवेत् ।
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शैत्यमग्निरियान्नाहं त्यजेयं रघुनन्दनम् ॥ ३८ ॥
रावणके ऐसे वचन सुनकर सुन्दरी जनककिशोरीने अपने दोनों कान बंद कर लिये और उससे इस प्रकार कहा— ' बस, अब ऐसी बातें मुँहसे न निकाल । नक्षत्रोंसहित आकाश फट पड़े, पृथ्वी टूक- टूक हो जाय और अग्नि अपनी उष्णताका त्याग करके शीतल हो जाय, परंतु मैं रघुकुलनन्दन श्रीरामचन्द्रजीको नहीं छोड़ सकती ॥ ३७-३८ ॥
कथं हि भिन्नकरटं पद्मिनं वनगोचरम् ।
उपस्थाय महानागं करेणुः सूकरं स्पृशेत् ॥ ३ ९ ॥
‘ गण्डस्थलसे मदकी धारा बहानेवाले पद्ममाला - मण्डित वनवासी गजराजकी सेवामें उपस्थित होकर कोई हथिनी किसी शूकरको कैसे छू सकती है? ॥ ३ ९ ॥
कथं हि पीत्वा माध्वीकं पीत्वा च मधुमाधवीम् ।
लोभं सौवीरके कुर्यान्नारी काचिदिति स्मरेत् ॥ ४० ॥
‘जो फूलोंके रससे बने हुए मधुर पेय तथा मधुमक्षिकाओंद्वारा तैयार किया हुआ मधु पी चुकी हो, ऐसी कोई भी नारी काँजीके रसका लोभ कैसे कर सकती है? ' ॥ ४० ॥
इति सा तं समाभाष्य प्रविवेशाश्रमं ततः ।
क्रोधात् प्रस्फुरमाणौष्ठी विधुन्वाना करौ मुहुः ॥ ४१ ॥
रावणसे इस प्रकार कहकर सीता अपने आश्रममें प्रवेश करने लगीं । उस समय क्रोधके मारे उनके ओंठ फड़क रहे थे और वे अपने दोनों हाथोंको बार-बार हिला रही थीं ॥ ४१ ॥
तामभिद्रुत्य सुश्रोणीं रावणः प्रत्यषेधयत् ।
भर्त्सयित्वा तु रूक्षेण स्वरेण गतचेतनाम् ॥ ४२ ॥
इसी समय रावणने दौड़कर उनका मार्ग रोक लिया और कठोर स्वरसे उन्हें डराना, धमकाना आरम्भ किया । इससे वे भयके मारे मूर्च्छित हो गयीं ॥ ४२ ॥
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मूर्धजेषु निजग्राह ऊर्ध्वमाचक्रमे ततः ।
तां ददर्श ततो गृध्रो जटायुर्गिरिगोचरः ।
रुदतीं राम रामेति ह्रियमाणां तपस्विनीम् ॥ ४३ ॥
तब रावणने उनके केश पकड़ लिये और आकाशमार्गसे लंकाकी ओर प्रस्थान किया । उस समय वे तपस्विनी सीता ' हा राम- हा रामकी ' रट लगाती हुई रो रही थीं और वह राक्षस उन्हें हरकर लिये जा रहा था । इसी अवस्थामें एक पर्वतकी गुफामें रहनेवाले गृध्रराज जटायुने उन्हें देखा ॥ ४३ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि रामोपाख्यानपर्वणि मारीचवधे सीताहरणे च अष्टसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २७८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत रामोपाख्यानपर्वमें मारीचवध तथा सीताहरणविषयक दो सौ अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७८ ॥