श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 2031–2040
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2031–2040
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मैं मृत्युसे भी उतना नहीं डरता जितना झूठसे डरता हूँ । विशेषतः सदा समस्त सज्जन ब्राह्मणोंको उनके माँगनेपर अपने प्राण देनेमें भी मुझे कोई सोच - विचार नहीं हो सकता ॥ ६३ ॥
यच्च मामात्थ देव त्वं पाण्डवं फाल्गुनं प्रति ॥ ७ ॥
व्येतु संतापजं दुःखं तव भास्कर मानसम् ।
अर्जुनप्रतिमं चैव विजेष्यामि रणेऽर्जुनम् ॥ ८ ॥
देव! आपने पाण्डुनन्दन अर्जुनसे जो मेरे लिये डरकी बात बतायी है, उसके लिये आपके मनमें कोई दुःख और संताप नहीं होना चाहिये । भास्कर! मैं कार्तवीर्य अर्जुनके समान पराक्रमी अर्जुनको युद्धमें अवश्य जीत लूँगा ॥ ७-८ ॥
तवापि विदितं देव ममाप्यस्त्रबलं महत् ।
जामदग्न्यादुपात्तं यत्र तथा द्रोणान्महात्मनः ॥ ९ ॥
देव! मेरे पास भी अस्त्रोंका जो महान् बल है। इसे आप भी जानते हैं । मैंने जमदग्निनन्दन परशुराम तथा महात्मा द्रोणाचार्यसे अस्त्रविद्या सीखी है ॥ ९ ॥
इदं त्वमनुजानीहि सुरश्रेष्ठ व्रतं मम भिक्षते वज्रिणे दद्यामपि जीवितमात्मनः ॥ १० ॥
सुरश्रेष्ठ! यह जो मेरा दान देनेका व्रत है, उसके लिये आप भी मुझे आज्ञा दीजिये, जिससे मैं याचक बनकर आये हुए इन्द्रको अपने प्राणतक दे सकूँ ॥ १० ॥
सूर्यउवाच
यदि तात ददास्येते वज्रिणे कुण्डले शुभे ।
त्वमप्येनमथो ब्रूया विजयार्थं महाबलम् ॥ ११ ॥
नियमेन प्रदद्यां ते कुण्डले वै शतक्रतो । सूर्य बोले - तात! यदि तुम इन्द्रको ये दोनों सुन्दर कुण्डल दे रहे हो तो तुम भी उन महाबली इन्द्रसे अपनी विजयके लिये कोई अस्त्र माँग लेना और उनसे स्पष्ट कह देना कि देवराज! मैं एक शर्तके साथ ये दोनों कुण्डल आपको दे सकता हूँ ॥ ११ ॥
अवध्यो ह्यसि भूतानां कुण्डलाभ्यां समन्वितः ॥ १२ ॥
अर्जुनेन विनाशं हि तव दानवसूदनः ।
प्रार्थयानो रणे वत्स कुण्डले ते जिहीर्षति ॥ १३ ॥
कर्ण! इन दोनों कुण्डलोंसे युक्त रहनेपर तुम सभी प्राणियोंके लिये अवध्य बने रहोगे । वत्स! दानवसूदन इन्द्र युद्धमें अर्जुनके द्वारा तुम्हारा विनाश चाहते हैं । इसीलिये वे तुम्हारे दोनों कुण्डलोंको हर लेनेकी इच्छा करते हैं ॥ १२-१३ ॥
स त्वमप्येनमाराध्य सूनृताभिः पुनः पुनः ।
अभ्यर्थयेथा देवेशममोघार्थं पुरन्दरम् ॥ १४ ॥
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अतः तुम भी उनकी आराधना करके बारंबार मीठे वचन बोलकर देवेश्वर इन्द्रसे किसी अमोघ अस्त्रके लिये प्रार्थना करना ॥ १४ ॥
अमोधां देहि मे शक्तिममित्रविनिबर्हिणीम् ।
दास्यामि ते सहस्राक्ष कुण्डले वर्म चोत्तमम् ॥ १५ ॥
तुम उनसे कहना- ' सहस्राक्ष! मैं आपको अपने शरीरका उत्तम कवच और दोनों कुण्डल दे दूँगा, परंतु आप भी मुझे अपनी वह अमोघ शक्ति प्रदान कीजिये, जो शत्रुओंका संहार करनेवाली है ' ॥ १५ ॥
इत्येव नियमेन त्वं दद्याः शक्राय कुण्डले ।
तया त्वं कर्ण संग्रामे हनिष्यसि रणे रिपून् ॥ १६ ॥
इसी शर्तके साथ तुम इन्द्रको अपने कुण्डल देना । कर्ण! उस शक्तिके द्वारा तुम युद्धमें अपने शत्रुओंको मार डालोगे ॥ १६ ॥
नाहत्वा हि महाबाहो शत्रूनेति करं पुनः ।
सा शक्तिर्देवराजस्य शतशोऽथ सहस्रशः ॥ १७ ॥
महाबाहो! देवराज इन्द्रकी वह शक्ति युद्धमें सैकड़ों-हजारों शत्रुओंका वध किये बिना पुनः हाथमें लौटकर नहीं आती ॥ १७ ॥
वैशम्पायन उवाच एवमुक्त्वा सहस्रांशुः सहसान्तरधीयत । वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! ऐसा कहकर सूर्यदेव सहसा वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ १७ ॥
( कर्णस्तु बुबुधे राजन् स्वप्नान्ते प्रवदन्निव ।
प्रतिबुद्धस्तु राधेयः स्वप्नं संचिन्त्य भारत ॥
चकार निश्चयं राजन् शक्त्यर्थं वदतां वरः ।
यदि मामिन्द्र आयाति कुण्डलार्थं परंतपः ॥
शक्त्या तस्मै प्रदास्यामि कुण्डले वर्म चैव ह ।
स कृत्वा प्रातरुत्थाय कार्याणि भरतर्षभ ॥
ब्राह्मणान् वाचयित्वाथ यथाकार्यमुपाक्रमत् । विधिना राजशार्दूल मुहूर्तमजपत् ततः ॥ ) राजन्! स्वप्नके अन्तमें कुछ बोलता हुआ-सा कर्ण जाग उठा । भारत! जगनेपर वक्ताओंमें श्रेष्ठ राधानन्दन कर्णने स्वप्नका चिन्तन करके शक्तिके लिये इस प्रकार निश्चय किया, ‘ यदि शत्रुओंको संताप देनेवाले इन्द्र कुण्डलके लिये मेरे पास आ रहे हैं तो मैं शक्ति लेकर ही उन्हें कुण्डल और कवच दूँगा। ' भरतश्रेष्ठ! ऐसा निश्चय करके कर्ण प्रातःकाल उठा
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और आवश्यक कार्य करके ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर यथासमय संध्योपासन आदि कार्य करने लगा । नृपश्रेष्ठ! फिर उसने विधिपूर्वक दो घड़ीतक जप किया ॥ ततः सूर्याय जप्यान्ते कर्णः स्वप्नं न्यवेदयत् ॥ १८ ॥
यथादृष्टं यथातत्त्वं यथोक्तमुभयोर्निशि ।
तत् सर्वमानुपूर्व्येण शशंसास्मै वृषस्तदा ॥ १ ९ ॥
तदनन्तर जपके अन्तमें कर्णने भगवान् सूर्यसे स्वप्नका वृत्तान्त निवेदन किया । उसने जो कुछ देखा था तथा रातमें उन दोनोंमें जैसी बातें हुई थीं, उन सबको कर्णने क्रमशः उनसे ठीक - ठीक कह सुनाया ॥ १८-१९ ॥
तच्छ्रुत्वा भगवान् देवो भानुः स्वर्भानुसूदनः ।
उवाच तं तथेत्येव कर्णं सूर्यः स्मयन्निव ॥ २० ॥
राहुका संहार करनेवाले भगवान् सूर्यदेवने यह सब सुनकर कर्णसे मुसकराते हुए- से कहा- 'तुमने जो कुछ देखा है, वह सब ठीक है ' ॥ २० ॥
ततस्तत्त्वमिति ज्ञात्वा राधेयः परवीरहा ।
शक्तिमेवाभिकाङ्क्षन् वै वासवं प्रत्यपालयत् ॥ २१ ॥
तब शत्रुओंका संहार करनेवाला राधानन्दन कर्ण उस स्वप्नकी घटनाको यथार्थ जानकर शक्ति प्राप्त करनेकी ही अभिलाषा ले इन्द्रकी प्रतीक्षा करने लगा ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि कुण्डलाहरणपर्वणि सूर्यकर्णसंवादे द्वयधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३०२ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत कुण्डलाहरणपर्वमें सूर्य-कर्ण-संवादविषयक तीन सौदोवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३०२ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ श्लोक मिलाकर कुल २५ श्लोक हैं )
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त्र्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः कुन्तिभोजके यहाँ ब्रह्मर्षि दुर्वासाका आगमन तथा राजाका उनकी सेवाके लिये पृथाको आवश्यक उपदेश देना जनमेजय उवाच
किं तद् गुह्यं न चाख्यातं कर्णायेहोष्णरश्मिना ।
कीदृशे कुण्डले ते च कवचं चैव कीदृशम् ॥ १ ॥
कुतश्च कवचं तस्य कुण्डले चैव सत्तम ।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं तन्मे ब्रूहि तपोधन ॥ २ ॥
जनमेजयने पूछा — सज्जनशिरोमणे! कौन- सी ऐसी गोपनीय बात थी, जिसे भगवान् सूर्यने कर्णपर प्रकट नहीं किया। उसके वे दोनों कुण्डल और कवच कैसे थे? तपोधन! कर्णको कुण्डल और कवच कहाँसे प्राप्त हुए थे? मैं यह सुनना चाहता हूँ, आप कृपापूर्वक मुझे बताइये ॥ १-२ ॥ वैशम्पायन उवाच
अयं राजन् ब्रवीम्येतत् तस्य गुह्यं विभावसोः ।
यादृशे कुण्डले ते च कवचं चैव यादृशम् ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजीने कहा- राजन्! सूर्यदेवकी दृष्टिमें जो गोपनीय रहस्य था, उसे बताता हूँ । इसके साथ कर्णके कुण्डल और कवच कैसे थे? यह भी बता रहा हूँ ॥ ३ ॥
कुन्तिभोजं पुरा राजन् ब्राह्मणः पर्युपस्थितः ।
तिग्मतेजा महाप्रांशुः श्मश्रुदण्डजटाधरः ॥ ४ ॥
राजन्! प्राचीनकालकी बात है, राजा कुन्तिभोजके दरबारमें अत्यन्त ऊँचे कदके एक प्रचण्ड तेजस्वी ब्राह्मण उपस्थित हुए । उन्होंने दाढ़ी, मूँछ, दण्ड और जटा धारण कर रखी थी ॥ ४ ॥
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दर्शनीयोऽनवद्याङ्गस्तेजसा प्रज्वलन्निव ।
मधुपिङ्गो मधुरवाक् तपःस्वाध्यायभूषणः ॥ ५ ॥
उनका स्वरूप देखने ही योग्य था । उनके सभी अंग निर्दोष थे । वे तेजसे प्रज्वलित होते - से जान पड़ते थे । उनके शरीरकी कान्ति मधुके समान पिंगलवर्णकी थी । वे मधुर वचन बोलनेवाले तथा तपस्या और स्वाध्यायरूप सद्गुणोंसे विभूषित थे ॥ ५ ॥
स राजानं कुन्तिभोजमब्रवीत् सुमहातपाः ।
भिक्षामिच्छामि वै भोक्तुं तव गेहे विमत्सर ॥ ६ ॥
उन महातपस्वीने राजा कुन्तिभोजसे कहा – ' किसीसे ईर्ष्या न करनेवाले नरेश! मैं तुम्हारे घरमें भिक्षान्न भोजन करना चाहता हूँ ॥ ६ ॥
न मे व्यलीकं कर्तव्यं त्वया वा तव चानुगैः ।
एवं वत्स्यामि ते गेहे यदि ते रोचतेऽनघ ॥ ७ ॥
‘ परंतु एक शर्त है, तुम या तुम्हारे सेवक कभी मेरे मनके प्रतिकूल आचरण न करें । अनघ! यदि तुम्हें मेरी यह शर्त ठीक जान पड़े तो उस दशामें मैं तुम्हारे घरमें निवास करूँगा ॥ ७ ॥
यथाकामं च गच्छेयमागच्छेयं तथैव च ।
शय्यासने च मे राजन् नापराध्येत कश्चन ॥ ८ ॥
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' मैं अपनी इच्छाके अनुसार जब चाहूँगा चला जाऊँगा और जब जीमें आयेगा चला आऊँगा । राजन्! मेरी शय्या और आसनपर बैठना अपराध होगा । अतः यह अपराध कोई न करे' ॥ ८ ॥
तमब्रवीत् कुन्तिभोजः प्रीतियुक्तमिदं वचः ।
एवमस्तु परं चेति पुनश्चैनमथाब्रवीत् ॥ ९ ॥
तब राजा कुन्तिभोजने बड़ी प्रसन्नताके साथ उत्तर दिया- ' विप्रवर! ' एवमस्तु ’ — जैसा आप चाहते हैं, वैसा ही होगा', इतना कहकर वे फिर बोले- ॥ ९ ॥
मम कन्या महाप्राज्ञ पृथा नाम यशस्विनी ।
शीलवृत्तान्विता साध्वी नियता चैव भाविनी ॥ १० ॥
‘ महाप्राज्ञ! मेरे पृथा नामकी एक यशस्विनी कन्या है, जो शील और सदाचारसे सम्पन्न, साध्वी, संयम - नियमसे रहनेवाली और विचारशील है ॥ १० ॥
उपस्थास्यति सा त्वां वै पूजयानवमन्य च ।
तस्याश्च शीलवृत्तेन तुष्टिं समुपयास्यसि ॥ ११ ॥
‘ वह सदा आपकी सेवा- पूजाके लिये उपस्थित रहेगी । उसके द्वारा आपका अपमान कभी न होगा । मेरा विश्वास है कि उसके शील और सदाचारसे आप संतुष्ट होंगे ' ॥
एवमुक्त्वा तु तं विप्रमभिपूज्य यथाविधि ।
उवाच कन्यामभ्येत्य पृथां पृथुललोचनाम् ॥ १२ ॥
ऐसा कहकर उन ब्राह्मणदेवताकी विधिपूर्वक पूजा करके राजाने अपनी विशाल नेत्रोंवाली कन्या पृथाके पास जाकर कहा— ॥ १२ ॥
अयं वत्से महाभागो ब्राह्मणो वस्तुमिच्छति ।
गेहे मया चास्य तथेत्येवं प्रतिश्रुतम् ॥ १३ ॥
‘ वत्से! ये महाभाग ब्राह्मण मेरे घरमें निवास करना चाहते हैं । मैंने ' तथास्तु' कहकर इन्हें अपने यहाँ ठहरानेकी प्रतिज्ञा कर ली है ॥ १३ ॥
त्वयि वत्से पराश्वस्य ब्राह्मणस्याभिराधनम् ।
तन्मे वाक्यममिथ्या त्वं कर्तुमर्हसि कर्हिचित् ॥ १४ ॥
' बेटी! तुमपर भरोसा करके ही मैंने इन तेजस्वी ब्राह्मणकी आराधना स्वीकार की है; अतः तुम मेरी बात कभी मिथ्या न होने दोगी, ऐसी आशा है ॥ १४ ॥
अयं तपस्वी भगवान् स्वाध्यायनियतो द्विजः ।
यद् यद् ब्रूयान्महातेजास्तत्तद् देयममत्सरात् ॥ १५ ॥
‘ ये विप्रवर महातेजस्वी, तपस्वी, ऐश्वर्यशाली तथा नियमपूर्वक वेदोंके स्वाध्यायमें संलग्न रहनेवाले हैं । ये जिस -जिस वस्तुके लिये कहें, वह सब इन्हें ईर्ष्यारहित हो श्रद्धाके साथ देना ॥ १५ ॥
ब्राह्मणो हि परं तेजो ब्राह्मणो हि परं तपः ।
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ब्राह्मणानां नमस्कारैः सूर्यो दिवि विराजते ॥ १६ ॥
‘ क्योंकि ब्राह्मण ही उत्कृष्ट तेज है, ब्राह्मण ही परम तप है, ब्राह्मणोंके नमस्कारसे ही सूर्यदेव आकाशमें प्रकाशित हो रहे हैं ॥ १६ ॥
अमानयन् हि मानार्हान् वातापिश्च महासुरः ।
निहतो ब्रह्मदण्डेन तालजङ्घस्तथैव च ॥ १७ ॥
‘ माननीय ब्राह्मणोंका सम्मान न करनेके कारण ही महान् असुर वातापि और उसी प्रकार तालजंघ ब्रह्मदण्डसे मारे गये ॥ १७ ॥
सोऽयं वत्से महाभार आहितस्त्वयि साम्प्रतम् ।
त्वं सदा नियता कुर्या ब्राह्मणस्याभिराधनम् ॥ १८ ॥
‘ अतः बेटी! इस समय सेवाका यह महान् भार मैंने तुम्हारे ऊपर रखा है । तुम सदा नियमपूर्वक इन ब्राह्मणदेवताकी आराधना करती रहो ॥ १८ ॥
जानामि प्रणिधानं ते बाल्यात् प्रभृति नन्दिनी ।
ब्राह्मणेष्विह सर्वेषु गुरुबन्धुषु चैव ह ॥ १ ९ ॥
तथा प्रेष्येषु सर्वेषु मित्रसम्बन्धिमातृषु ।
मयि चैव यथावत् त्वं सर्वमावृत्य वर्तसे ॥ २० ॥
‘ माता- पिताका आनन्द बढ़ानेवाली पुत्री! मैं जानता हूँ, बचपनसे ही तुम्हारा चित्त एकाग्र है। समस्त ब्राह्मणों, गुरुजनों, बन्धु -बान्धवों, सेवकों, मित्रों, सम्बन्धियों तथा माताओंके प्रति और मेरे प्रति भी तुम सदा यथोचित बर्ताव करती आयी हो । तुमने अपने सद्भावसे सबको प्रभावित कर लिया है ॥ १ ९ -२० ॥
न तुष्टो जनोऽस्तीह पुरे चान्तःपुरे च ते ।
सम्यग्वृत्त्यानवद्याङ्गि तव भृत्यजनेष्वपि ॥ २१ ॥
‘ निर्दोष अंगोंवाली पुत्री! नगरमें या अन्तःपुरमें, सेवकोंमें भी कोई ऐसा मनुष्य नहीं है, जो तुम्हारे उत्तम बर्तावसे संतुष्ट न हो ॥ २१ ॥
संदेष्टव्यां तु मन्ये त्वां द्विजातिं कोपनं प्रति ।
पृथे बालेति कृत्वा वै सुता चासि ममेति च ॥ २२ ॥
‘ तथापि पृथे! तुम अभी बालिका और मेरी पुत्री हो, इसलिये इन क्रोधी ब्राह्मणके प्रति बर्ताव करनेके विषयमें तुम्हें कुछ उपदेश देनेकी आवश्यकताका अनुभव मैं करता हूँ ॥ २२ ॥
वृष्णीनां च कुले जाता शूरस्य दयिता सुता ।
दत्ता प्रीतिमता मह्यं पित्रा बाला पुरा स्वयम् ॥ २३ ॥
‘ वृष्णिवंशमें तुम्हारा जन्म हुआ है । तुम शूरसेनकी प्यारी पुत्री हो । पूर्वकालमें स्वयं तुम्हारे पिताने बाल्यावस्थामें ही बड़ी प्रसन्नताके साथ तुम्हें मेरे हाथों सौंपा था ॥ २३ ॥
वसुदेवस्य भगिनी सुतानां प्रवरा मम ।
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अग्रयमग्रे प्रतिज्ञाय तेनासि दुहिता मम ॥ २४ ॥
तुम वसुदेवकी बहिन तथा मेरी संतानोंमें सबसे बड़ी हो। पहले उन्होंने यह प्रतिज्ञा कर रखी थी कि मैं अपनी पहली संतान तुम्हें दे दूँगा । उसीके अनुसार उन्होंने तुम्हें मेरी गोदमें अर्पित किया है, इस कारण तुम मेरी दत्तक पुत्री हो ॥ २४ ॥
तादृशे हि कुले जाता कुले चैव विवर्धिता ।
सुखात् सुखमनुप्राप्ता ह्रदाद् ह्रदमिवागता ॥ २५ ॥
' वैसे उत्तम कुलमें तुम्हारा जन्म हुआ तथा मेरे श्रेष्ठ कुलमें तुम पालित और पोषित होकर बड़ी हुई । जैसे जलकी धारा एक सरोवरसे निकलकर दूसरे सरोवरमें गिरती है, उसी प्रकार तुम एक सुखमय स्थानसे दूसरे सुखमय स्थानमें आयी हो ॥ २५ ॥
दौष्कुलेया विशेषेण कथंचित् प्रग्रहं गताः ।
बालभावाद् विकुर्वन्ति प्रायशः प्रमदाः शुभे ॥ २६ ॥
' शुभे! जो दूषित कुलमें उत्पन्न होनेवाली स्त्रियाँ हैं, वे किसी तरह विशेष आग्रहमें पड़कर अपने अविवेकके कारण प्रायः बिगड़ जाती हैं ( परंतु तुमसे ऐसी आशंका नहीं है ) ॥ २६ ॥
पृथे राजकुले जन्म रूपं चापि तवाद्भुतम् ।
तेन तेनासि सम्पन्ना समुपेता च भाविनी ॥ २७ ॥
' पृथे! तुम्हारा जन्म राजकुलमें हुआ है । तुम्हारा रूप भी अद्भुत है । कुल और स्वरूपके अनुसार ही तुम उत्तम शील, सदाचार और सद्गुणोंसे संयुक्त एवं सम्पन्न हो । साथ ही विचारशील भी हो ॥ २७ ॥
सा त्वं दर्पं परित्यज्य दम्भं मानं च भाविनि ।
आराध्य वरदं विप्रं श्रेयसा योक्ष्यसे पृथे ॥ २८ ॥
' सुन्दर भाववाली पृथे! तुम दर्प, दम्भ और मानको त्यागकर यदि इन वरदायक ब्राह्मणकी आराधना करोगी तो परम कल्याणकी भागिनी होओगी ॥ २८ ॥
एवं प्राप्स्यसि कल्याणि कल्याणमनघे ध्रुवम् ।
कोपिते च द्विजश्रेष्ठे कृत्स्नं दह्येत मे कुलम् ॥ २९ ॥
‘ कल्याणि! तुम पापरहित हो । यदि इस प्रकार इनकी सेवा करनेमें सफल हो गयी तो तुम्हें निश्चय ही कल्याणकी प्राप्ति होगी, और यदि तुमने अपने अनुचित बर्तावसे इन श्रेष्ठ ब्राह्मणको कुपित कर दिया तो मेरा सम्पूर्ण कुल जलकर भस्म हो जायगा' ॥ २ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि कुण्डलाहरणपर्वणि पृथोपदेशे त्र्यधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३०३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत कुण्डलाहरणपर्वमें पृथाको उपदेशविषयक तीन सौ तीनवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ३०३ ॥
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Fut F2I CL) Kos Fas
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चतुरधिकत्रिशततमोऽध्यायः कुन्तीका पितासे वार्तालाप और ब्राह्मणकी परिचर्या कुन्त्युवाच
ब्राह्मणं यन्त्रिता राजन्नुपस्थास्यामि पूजया ।
यथाप्रतिज्ञं राजेन्द्र न च मिथ्या ब्रवीम्यहम् ॥ १ ॥
कुन्ती बोली- राजन्! मैं नियमोंमें आबद्ध रहकर आपकी प्रतिज्ञाके अनुसार निरन्तर इन तपस्वी ब्राह्मणकी सेवा- पूजाके लिये उपस्थित रहूँगी । राजेन्द्र! मैं झूठ नहीं बोलती हूँ ॥ १ ॥
एष चैव स्वभावो मे पूजयेयं द्विजानिति ।
तव चैव प्रियं कार्यं श्रेयश्च परमं मम ॥ २ ॥
यह मेरा स्वभाव ही है कि मैं ब्राह्मणोंकी सेवा- पूजा करूँ और आपका प्रिय करना तो मेरे लिये परम कल्याणकी बात है ही ॥ २ ॥
यद्येवैष्यति सायाह्ने यदि प्रातरथो निशि ।
यद्यर्धरात्रे भगवान् न मे कोपं करिष्यति ॥ ३ ॥
ये पूजनीय ब्राह्मण यदि सायंकाल आवें, प्रातःकाल पधारें अथवा रात या आधीरातमें भी दर्शन दें, ये कभी भी मेरे मनमें क्रोध उत्पन्न नहीं कर सकेंगे — मैं हर समय इनकी समुचित सेवाके लिये प्रस्तुत रहूँगी ॥ ३ ॥
लाभो ममैष राजेन्द्र यद् वै पूजयती द्विजान् ।
आदेशे तव तिष्ठन्ती हित कुर्यां नरोत्तम ॥ ४ ॥
राजेन्द्र! नरश्रेष्ठ! मेरे लिये महान् लाभकी बात यही है कि मैं आपकी आज्ञाके अधीन रहकर ब्राह्मणोंकी सेवा- पूजा करती हुई सदैव आपका हित- साधन करूँ ॥ ४ ॥
विस्रब्धो भव राजेन्द्र न व्यलीकं द्विजोत्तमः ।
वसन् प्राप्स्यति ते गेहे सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ५ ॥
महाराज! विश्वास कीजिये । आपके भवनमें निवास करते हुए ये द्विजश्रेष्ठ कभी अपने
मनके प्रतिकूल कोई कार्य नहीं देख पायेंगे। यह मैं आपसे सत्य कहती हूँ ॥ ५ ॥
यत् प्रियं च द्विजस्यास्य हितं चैव तवानघ ।
यतिष्यामि तथा राजन् व्येतु ते मानसो ज्वरः ॥ ६ ॥
निष्पाप नरेश! आपकी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिये । मैं वही कार्य करनेका प्रयत्न करूँगी जो इन तपस्वी ब्राह्मणको प्रिय और आपके लिये हितकर हो ॥ ६ ॥
ब्राह्मणा हि महाभागाः पूजिताः पृथिवीपते ।
तारणाय समर्थाः स्युर्विपरीते वधाय च ॥ ७ ॥