श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 2071–2080
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2071–2080
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कर्णको इन्द्रका शक्ति - दान Grmil युधिष्ठिर और बगुलारूपधारी यक्ष
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कर्णउवाच
संशयं परमं प्राप्य विमोक्ष्ये वासवीमिमाम् ।
यथा मामात्थ शक्र त्वं सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ३४ ॥
कर्ण बोला— देवेन्द्र! आप जैसा मुझसे कह रहे हैं, उसके अनुसार प्राणसंकटकी अवस्थामें पड़कर ही मैं आपकी दी हुई इस शक्तिका उपयोग करूँगा, यह मैं आपसे सच्ची बात कहता हूँ ॥ ३४ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततः शक्तिं प्रज्वलितां प्रतिगृह्य विशाम्पते ।
शस्त्रं गृहीत्वा निशितं सर्वगात्राण्यकृन्तत ॥ ३५ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर इन्द्रकी प्रज्वलित शक्ति लेकर कर्णने तीखी तलवार उठायी और कवच उधेड़नेके लिये अपने सब अंगोंको काटना आरम्भ किया ॥ ३५ ॥
ततो देवा मानवा दानवाश्च
निकृन्तन्तं कर्णमात्मानमेवम् ।
दृष्ट्वा सर्वे सिंहनादान् प्रणेदु- र्न ह्यस्यासीन्मुखजो वै विकारः ॥ ३६ ॥
उस समय देवता, मनुष्य और दानव सब लोग इस प्रकार अपना शरीर काटते हुए कर्णको देखकर सिंहनाद करने लगे; परंतु कर्णके मुखपर तनिक भी विकार नहीं आया ॥ ३६ ॥
ततो दिव्या दुन्दुभयः प्रणेदुः पपातोच्चैः पुष्पवर्षं च दिव्यम् । दृष्ट्वा कर्णं शस्त्रसंकृत्तगात्रं मुहुश्चापि स्मयमानं नृवीरम् ॥ ३७ ॥
कर्णके सारे अंग शस्त्रोंके आघातसे कट गये थे, फिर भी वह नरवीर बारंबार मुसकरा रहा था । यह देखकर दिव्य दुन्दुभियाँ बज उठीं एवं आकाशसे दिव्य फूलोंकी वर्षा होने लगी ॥ ३७ ॥
ततश्छित्त्वा कवचं दिव्यमङ्गात् तथैवार्द्रं प्रददौ वासवाय । तथोत्कृत्य प्रददौ कुण्डले ते कर्णात् तस्मात् कर्मणा तेन कर्णः ॥ ३८ ॥
तदनन्तर अपने शरीरसे दिव्य कवचको उधेड़कर कर्णने इन्द्रके हाथमें दे दिया; वह कवच उस समय रक्तसे भीगा हुआ ही था । इसी प्रकार उसने कानोंके वे कुण्डल भी
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काटकर दे दिये । अतः इस कर्णन ( कर्तन ) रूपी कर्मसे उसका नाम ' कर्ण' हुआ ॥ ३८ ॥
ततः शक्रः प्रहसन् वञ्चयित्वा कर्णं लोके यशसा योजयित्वा । कृतं कार्यं पाण्डवानां हि मेने ततः पश्चाद् दिवमेवोत्पपात ॥ ३ ९ ॥ इस प्रकार कर्णको ( कवच और कुण्डलसे ) वंचित करके एवं संसारमें उसका सुयश फैलाकर देवराज इन्द्र हँसते हुए स्वर्गलोकको चले गये । उन्हें मन- ही-मन यह विश्वास हो गया कि ‘ मैंने पाण्डवोंका कार्य पूरा कर दिया' ॥ ३ ९ ॥ श्रुत्वा कर्णं मुषितं धार्तराष्ट्रा दीनाः सर्वे भग्नदर्पा इवासन् । तां चावस्थां गमितं सूतपुत्रं श्रुत्वा पार्था जहृषुः काननस्थाः ॥ ४० ॥
धृतराष्ट्रके पुत्रोंने जब यह सुना कि कर्णको ( कवच और कुण्डलोंसे ) वंचित कर दिया गया तो वे सब अत्यन्त दीन - से हो गये; उनका घमंड चूर - चूर- सा हो गया । वनमें रहनेवाले कुन्तीपुत्रोंने जब सुना कि सूतपुत्र इस दशामें पहुँच गया है तब उन्हें बड़ा हर्ष हुआ ॥ ४० ॥
जनमेजय उवाच क्वस्था वीराः पाण्डवास्ते बभूवुः कुतश्चैते श्रुतवन्तः प्रियं तत् । किं वाकार्षुर्द्वादशेऽब्दे व्यतीते तन्मे सर्वं भगवान् व्याकरोतु ॥ ४१ ॥
जनमेजयने पूछा — भगवन्! वे वीर पाण्डव उन दिनों कहाँ थे? उन्होंने वह प्रिय समाचार कैसे सुना और बारहवाँ वर्ष व्यतीत हो जानेपर क्या किया? ये सब बातें आप मुझे स्पष्टरूपसे बतायें ॥ ४१ ॥
वैशम्पायन उवाच लब्ध्वा कृष्णां सैन्धवं द्रावयित्वा विप्रैः सार्धं काम्यकादाश्रमात् ते । मार्कण्डेयाच्छ्रुतवन्तः पुराणं देवर्षीणां चरितं विस्तरेण ॥ ४२ ॥
वैशम्पायनजीने कहा- राजन्! द्रौपदीको पाकर तथा जयद्रथको काम्यक वनसे भगाकर ब्राह्मणोंसहित समस्त पाण्डवोंने मार्कण्डेयजीके मुखसे पुराणकथा और देवताओं तथा ऋषियोंके विस्तृत चरित्र सुनते हुए इसे भी सुना था ॥ ४२ ॥
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( प्रत्याजग्मुः सरथाः सानुयात्राः सर्वैः सार्धं सूतपौरोगवैस्ते । ततो युयुर्द्वैतवने नृवीरा निस्तीर्यैवं वनवासं समग्रम् II ) इस प्रकार वनवासकी पूरी अवधि बिताकर वे नरवीर पाण्डव अपने रथ, अनुचर, सूत तथा रसोइयोंके साथ पुनः द्वैतवनमें लौट आये ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि कुण्डलाहरणपर्वणि कवचकुण्डलदाने दशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३१० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत कुण्डलाहरणपर्वमें कवच-कुण्डलदानविषयक तीन सौ दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१० ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठके १३ श्लोक मिलाकर कुल ४३३ श्लोक हैं )
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(आरणेयपर्व) एकादशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ब्राह्मणकी अरणि एवं मन्थन -काष्ठका पता लगानेके लिये पाण्डवोंका मृगके पीछे दौड़ना और दुःखी होना जनमेजय उवाच
एवं हृतायां भार्यायां प्राप्य क्लेशमनुत्तमम् ।
प्रतिपद्य ततः कृष्णां किमकुर्वत पाण्डवाः ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा- ब्रह्मन्! इस प्रकार अपनी पत्नी द्रौपदीका अपहरण होनेपर अत्यन्त क्लेश उठाकर पाण्डवोंने जब उन्हें पुनः प्राप्त कर लिया, उसके बाद उन्होंने क्या किया? ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं हृतायां कृष्णायां प्राप्य क्लेशमनुत्तमम् ।
विहाय काम्यकं राजा सह भ्रातृभिरच्युतः ॥ २ ॥
पुनर्द्वैतवनं रम्यमाजगाम युधिष्ठिरः ।
स्वादुमूलफलं रम्यं विचित्रबहुपादपम् ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— राजन्! पूर्वोक्त प्रकारसे द्रौपदीका हरण होनेपर भारी क्लेश उठानेके बाद जब पाण्डवोंने उन्हें पा लिया, तब धर्मसे कभी च्युत न होनेवाले राजा युधिष्ठिर अपने भाइयोंके साथ काम्यकवन छोड़कर पुनः रमणीय द्वैतवनमें ही चले आये । वहाँ स्वादिष्ट फल - मूलोंकी बहुतायत थी तथा बहुत- से विचित्र वृक्ष उस वनकी शोभा बढ़ाते थे ॥ २-३ ॥
अनुभुक्तफलाहाराः सर्व एव मिताशनाः ।
न्यवसन् पाण्डवास्तत्र कृष्णया सह भार्यया ॥ ४ ॥
वहाँ सब पाण्डव अपनी पत्नी द्रौपदीके साथ केवल फलाहार करके परिमित भोजनपर जीवन - निर्वाह करते हुए रहते थे ॥ ४ ॥
वसन् द्वैतवने राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
भीमसेनोऽर्जुनश्चैव माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ॥ ५ ॥
ब्राह्मणार्थे पराक्रान्ता धर्मात्मानो यतव्रताः ।
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क्लेशमार्च्छन्त विपुलं सुखोदर्कं परंतपाः ॥ ६ ॥
द्वैतवनमें रहते समय कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन तथा माद्रीकुमार नकुल- सहदेव – इन सभी शत्रुसंतापी संयम- नियम- परायण धर्मात्मा पाण्डवोंने एक दिन एक ब्राह्मणके लिये पराक्रम करते हुए महान् क्लेश उठाया, परंतु उसका भावी परिणाम सुखमय ही हुआ ॥ ५-६ ॥
तस्मिन् प्रतिवसन्तस्ते यत् प्रापुः कुरुसत्तमाः ।
वने क्लेशं सुखोदर्कं तत् प्रवक्ष्यामि ते शृणु ॥ ७ ॥
राजन्! उस वनमें रहते हुए उन कुरुश्रेष्ठ पाण्डवोंने जो भविष्यमें सुख देनेवाला क्लेश उठाया, उसका वर्णन करता हूँ, सुनो – ॥ ७ ॥
अरणीसहितं मन्थं ब्राह्मणस्य तपस्विनः ।
मृगस्य घर्षमाणस्य विषाणे समसज्जत ॥ ८ ॥
एक तपस्वी ब्राह्मणका ( रस्सीमें बँधा ) अरणीसहित मन्थनकाष्ठ एक वृक्षमें रंगा था; वहीं एक मृग आकर उस वृक्षसे अपना शरीर रगड़ने लगा । उस समय वे दोनों काष्ठ उस मृगके सींगमें अटक गये ॥ ८ ॥
तदादाय गतो राजंस्त्वरमाणो महामृगः आश्रमान्तरितः शीघ्रं प्लवमानो महाजवः ॥ ९ ॥
राजन्! उन काष्ठोंको लेकर वह महामृग बड़ी उतावलीसे भागा और बड़े वेगसे चौकड़ी भरता हुआ शीघ्र ही आश्रमसे ओझल हो गया ॥ ९ ॥
ह्रियमाणं तु तं दृष्ट्वा स विप्रः कुरुसत्तम ।
त्वरितोऽभ्यागमत् तत्र अग्निहोत्रपरीप्सया ॥ १० ॥
कुरुश्रेष्ठ! उस ब्राह्मणने जब देखा कि मृग मेरी अरणी और मथानीको लेकर तेजीसे भागा जा रहा है, तब वह अग्निहोत्रकी रक्षाके लिये तुरंत वहीं ( पाण्डवोंके आश्रममें) आया ॥ १० ॥
अजातशत्रुमासीनं भ्रातृभिः सहितं वने ।
आगम्य ब्राह्मणस्तूर्णं संतप्तश्चेदमब्रवीत् ॥ ११ ॥
वनमें भाइयोंके साथ बैठे हुए अजातशत्रु युधिष्ठिरके पास तुरंत आकर संतप्त हुए उस ब्राह्मणने इस प्रकार कहा— ॥ ११ ॥
अरणीसहितं मन्थं समासक्तं वनस्पतौ ।
मृगस्य घर्षमाणस्य विषाणे समसज्जत ॥ १२ ॥
तमादाय गतो राजंस्त्वरमाणो महामृगः ।
आश्रमात् त्वरितः शीघ्रं प्लवमानो महाजवः ॥ १३ ॥
‘ राजन्! मैंने अपनी अरणी और मथानी एक वृक्षपर रख दी थी । एक मृग वहाँ आकर उस वृक्षसे शरीर रगड़ने लगा और उसके सींगमें वे दोनों काष्ठ फँस गये । वह महान् मृग उन
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काष्ठोंको लेकर बड़ी उतावलीके साथ भाग गया है और अत्यन्त वेगवान् होनेके कारण चौकड़ी भरता हुआ शीघ्र ही आश्रमसे बहुत दूर निकल गया है ॥ १२-१३ ॥
तस्य गत्वा पदं राजन्नासाद्य च महामृगम् ।
अग्निहोत्रं न लुप्येत तदानयत पाण्डवाः ॥ १४ ॥
‘ महाराज युधिष्ठिर! तथा वीर पाण्डवो । तुम सब लोग उसके पदचिह्नोंको देखते हुए उस महामृगके पास पहुँचो और वे दोनों काष्ठ ले आओ, जिससे मेरा अग्निहोत्रकर्म लुप्त न हो' ॥ १४ ॥
ब्राह्मणस्य वचः श्रुत्वा संतप्तोऽथ युधिष्ठिरः ।
धनुरादाय कौन्तेयः प्राद्रवद् भ्रातृभिः सह ॥ १५ ॥
ब्राह्मणकी बात सुनकर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर बहुत दुःखी हुए और मृगका पता लगानेके लिये वे धनुष लेकर भाइयोंसहित दौड़े ॥ १५ ॥
सन्नद्धा धन्विनः सर्वे प्राद्रवन् नरपुङ्गवाः ।
ब्राह्मणार्थे यतन्तस्ते शीघ्रमन्वगमन् मृगम् ॥ १६ ॥
वे सभी नरश्रेष्ठ कवच बाँध एवं कमर कसकर धनुष लिये आश्रमसे दौड़े और ब्राह्मणकी कार्यसिद्धिके लिये प्रयत्नशील होकर तीव्र गतिसे मृगका पीछा करने लगे ॥
कर्णिनालीकनाराचानुत्सृजन्तो महारथाः ।
नाविध्यन् पाण्डवास्तत्र पश्यन्तो मृगमन्तिकात् ॥ १७ ॥
कुछ दूर जानेपर उन्हें वह मृग अपने पास ही दिखायी दिया । तब वे महारथी पाण्डव कर्णि, नालीक और नाराच नामक बाण उसपर छोड़ने लगे; किंतु वे देखते हुए भी वहाँ उस मृगको बींध न सके ॥ १७ ॥
तेषां प्रयतमानानां नादृश्यत महामृगः ।
अपश्यन्तो मृगं शान्ता दुःखं प्राप्ता मनस्विनः ॥ १८ ॥
घोर प्रयत्न करनेपर भी वह महामृग उनके हाथ न लगा; सहसा अदृश्य हो गया ।
मृगको न देखकर वे मनस्वी वीर हतोत्साह और दुःखी हो गये ॥ १८ ॥
शीतलच्छायमागम्य न्यग्रोधं गहने वने ।
क्षुत्पिपासापरीताङ्गाः पाण्डवाः समुपाविशन् ॥ १ ९ ॥
तत्पश्चात् उस गहन वनमें भूख-प्याससे पीड़ित अंगोंवाले पाण्डव एक शीतल छायावाले बरगदके पास आकर बैठ गये ॥ १ ९ ॥
तेषां समुपविष्टानां नकुलो दुःखितस्तदा ।
अब्रवीद् भ्रातरं श्रेष्ठममर्षात् कुरुनन्दनम् ॥ २० ॥
उनके बैठ जानेपर नकुल अत्यन्त दुःखी हो अमर्षमें आकर बड़े भाई कुरुनन्दन युधिष्ठिरसे इस प्रकार बोले- ॥ २० ॥
नास्मिन् कुले जातु ममज्ज धर्मो
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न चालस्यादर्थलोपो बभूव । अनुत्तराः सर्वभूतेषु भूयः सम्प्राप्ताः स्मः संशयं किंनु राजन् ॥ २१ ॥
‘ राजन्! हमारे कुलमें कभी आलस्यवश धर्मका लोप नहीं हुआ; अर्थका भी कभी नाश नहीं हुआ । हमने किसी भी प्राणीके प्रार्थना करनेपर कभी उसे कोरा जवाब नहीं दिया— निराश नहीं किया । फिर भी हम धर्मसंकटमें कैसे पड़ गये? ' ॥ २१ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि आरणेयपर्वणि मृगान्वेषणे एकादशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३११ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत आरणेयपर्वमें मृगका अनुसंधानविषयक तीन सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३११ ॥
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द्वादशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः पानी लानेके लिये गये हुए नकुल आदि चार भाइयोंका सरोवरके तटपर अचेत होकर गिरना युधिष्ठिर उवाच
नापदामस्ति मर्यादा न निमित्तं न कारणम् ।
धर्मस्तु विभजत्यर्थमुभयोः पुण्यपापयोः ॥ १ ॥
युधिष्ठिर बोले- भैया! आपत्तियोंकी न तो कोई सीमा है, न कोई निमित्त दिखायी देता है और न कोई विशेष कारण ही परिलक्षित होता है । पहलेका किया हुआ पुण्य और पापरूप कर्म ही प्रारब्ध बनकर सुख और दुःखरूप फल बाँटता रहता है ॥ १ ॥
भीम उवाच
प्रातिकाम्यनयत् कृष्णां सभायां प्रेष्यवत् तदा ।
न मया निहतस्तत्र तेन प्राप्ताः स्म संशयम् ॥ २ ॥
भीमसेनने कहा- जब प्रातिकामीकी जगह दूत बनकर गया हुआ दुःशासन द्रौपदीको कौरवोंकी सभामें दासीकी भाँति बलपूर्वक खींच ले आया, उस समय मैंने जो उसका वध नहीं कर डाला; इसीके कारण हमलोग ऐसे धर्मसंकटमें पड़े हैं ॥ २ ॥
अर्जुनउवाच
वाचस्तीक्ष्णास्थिभेदिन्यः सूतपुत्रेण भाषिताः ।
अतितीव्रा मया क्षान्तास्तेन प्राप्ताः स्म संशयम् ॥ ३ ॥
अर्जुन बोले- सूतपुत्र कर्णके कहे हुए कठोर अस्थियोंको भी विदीर्ण कर देनेवाले अत्यन्त कड़वे वचन सुनकर भी जो हमने सहन कर लिये; उसीसे आज हम धर्मसंकटकी अवस्थामें आ पहुँचे हैं ॥ ३ ॥
सहदेव उवाच
शकुनिस्त्वां यदाजैषीदक्षद्यूतेन भारत ।
स मया न हतस्तत्र तेन प्राप्ताः स्म संशयम् ॥ ४ ॥
सहदेवने कहा — भारत! जब शकुनिने आपको जूएमें जीत लिया और उस समय मैंने उसे मार नहीं डाला, उसीका यह फल है कि आज हमलोग धर्मसंकटमें पड़ गये हैं ॥ ४ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततो युधिष्ठिरो राजा नकुलं वाक्यमब्रवीत् ।
आरुह्य वृक्षं माद्रेय निरीक्षस्व दिशो दश ॥ ५ ॥
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पानीयमन्तिके पश्य वृक्षांश्चाप्युदकाश्रितान् ।
एते हि भ्रातरः श्रान्तास्तव तात पिपासिताः ॥ ६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने नकुलसे कहा- 'माद्रीनन्दन! किसी वृक्षपर चढ़कर सब दिशाओंमें दृष्टिपात करो । कहीं आस-पास पानी हो, तो देखो अथवा जलके किनारे होनेवाले वृक्षोंपर भी दृष्टि डालो । तात! तुम्हारे ये भाई थके - माँदे और प्यासे हैं ' ॥ ५-६ ॥
नकुलस्तु तथेत्युक्त्वा शीघ्रमारुह्य पादपम् ।
अब्रवीद् भ्रातरं ज्येष्ठमभिवीक्ष्य समन्ततः ॥ ७ ॥
तब नकुल ‘ बहुत अच्छा ' कहकर शीघ्र ही एक पेड़पर चढ़ गये और चारों ओर दृष्टि डालकर अपने बड़े भाईसे बोले – ॥ ७ ॥
पश्यामि बहुलान् राजन् वृक्षानुदकसंश्रयान् ।
सारसानां च निर्ह्रादमत्रोदकमसंशयम् ॥ ८ ॥
‘ राजन्! मैं ऐसे बहुतेरे वृक्ष देख रहा हूँ, जो जलके किनारे ही होते हैं । सारसोंकी आवाज भी सुनायी देती है; अतः निःसंदेह यहाँ आस - पास ही कोई जलाशय है ' ॥ ८ ॥
ततोऽब्रवीत् सत्यधृतिः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
गच्छ सौम्य ततः शीघ्रं तूणौः पानीयमानय ॥ ९ ॥
तब सत्यका पालन करनेवाले कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने नकुलसे कहा – ' सौम्य! शीघ्र जाओ और तरकसोंमें पानी भर लाओ ' ॥ ९ ॥
नकुलस्तु तथेत्युक्त्वा भ्रातुर्ज्येष्ठस्य शासनात् ।
प्राद्रवद् यत्र पानीयं शीघ्रं चैवान्वपद्यत ॥ १० ॥
नकुल ‘ बहुत अच्छा ' कहकर बड़े भाईकी आज्ञासे शीघ्रतापूर्वक गये और जहाँ जलाशय था, वहाँ तुरंत पहुँच गये ॥ १० ॥
स दृष्ट्वा विमल तोयं सारसैः परिवारितम् ।
पातुकामस्ततो वाचमन्तरिक्षात् स शुश्रुवे ॥ ११ ॥
वहाँ सारसोंसे घिरे हुए जलाशयका स्वच्छ जल देखकर नकुलको उसे पीनेकी इच्छा हुई । इतनेमें ही आकाशसे उनके कानोंमें एक स्पष्ट वाणी सुनायी दी ॥ यक्ष उवाच
मा तात साहसं कार्षीर्मम पूर्वपरिग्रहः ।
प्रश्नानुक्त्वा तु माद्रेय ततः पिब हरस्व च ॥ १२ ॥
यक्ष बोला- तात! तुम इस सरोवरका पानी पीनेका साहस न करो । इसपर पहलेसे ही मेरा अधिकार हो चुका है । माद्रीकुमार! पहले मेरे प्रश्नोंका उत्तर दे दो, फिर पानी पीओ और ले भी जाओ ॥ १२ ॥