श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 2081–2090

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2081–2090

पृष्ठ 2081

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अनादृत्य तु तद् वाक्यं नकुलः सुपिपासितः ।

अपिबच्छीतलं तोयं पीत्वा च निपपात ह ॥ १३ ॥

नकुलकी प्यास बहुत बढ़ गयी थी । उन्होंने यक्षके कथनकी अवहेलना करके वहाँका शीतल जल पी लिया । पीते ही वे अचेत होकर गिर पड़े ॥ १३ ॥

चिरायमाणे नकुले कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।

अब्रवीद् भ्रातरं वीरं सहदेवमरिंदमम् ॥ १४ ॥

नकुलके लौटनेमें जब अधिक विलम्ब हो गया, तब कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने अपने शत्रुहन्ता वीर भ्राता सहदेवसे कहा— ॥ १४ ॥

भ्राता हि चिरयातो नः सहदेव तवाग्रजः ।

तथैवानय सोदर्यं पानीयं च त्वमानय ॥ १५ ॥

' सहदेव! हमारे अनुज और तुम्हारे अग्रज भ्राता नकुलको यहाँसे गये बहुत देर हो गयी । तुम जाकर अपने सहोदर भाईको बुला लाओ और पानी भी ले आओ ' ॥ १५ ॥

सहदेवस्तथेत्यक्त्वा तां दिशं प्रत्यपद्यत ।

ददर्श च हतं भूमौ भ्रातरं नकुलं तदा ॥ १६ ॥

तब सहदेव ‘ बहुत अच्छा' कहकर उसी दिशाकी ओर चल दिये । वहाँ पहुँचकर उन्होंने देखा, भाई नकुल पृथ्वीपर मरे पड़े हैं ॥ १६ ॥

भ्रातृशोकाभिसंतप्तस्तृषया च प्रपीडितः ।

अभिदुद्राव पानीयं ततो वागभ्यभाषत ॥ १७ ॥

भाईके शोकसे उनका हृदय संतप्त हो उठा । साथ ही प्याससे भी वे बहुत कष्ट पा रहे

थे; अतः पानीकी ओर दौड़े । उसी समय आकाशवाणी बोल उठी- ॥

मा तात साहसं कार्षीर्मम पूर्वपरिग्रहः ।

प्रश्नानुक्त्वा यथाकामं पिबस्व च हरस्व च ॥ १८ ॥

' तात! पानी पीनेका साहस न करो । यहाँ पहलेसे ही मेरा अधिकार हो चुका है । तुम पहले मेरे प्रश्नोंका उत्तर दे दो, फिर इच्छानुसार जल पीओ और साथ ले भी जाओ ' ॥ १८ ॥

अनादृत्य तु तद् वाक्यं सहदेवः पिपासितः ।

अपिबच्छीतलं तोयं पीत्वा च निपपात ह ॥ १ ९ ॥

प्यासे सहदेव उस वचनकी अवहेलना करके वहाँका ठंडा जल पीने लगे एवं पीते ही अचेत होकर गिर पड़े ॥ १ ९ ॥

अथाब्रवीत् स विजयं कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।

भ्रातरौ ते चिरगतौ बीभत्सो शत्रुकर्शन ॥ २० ॥

तदनन्तर कुन्तीकुमार युधिष्ठिरने अर्जुनसे कहा – ' शत्रुनाशन बीभत्सो! तुम्हारे दोनों भाइयोंको गये बहुत देर हो गयी ॥ २० ॥

पृष्ठ 2082

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तौ चैवानय भद्रं ते पानीयं च त्वमानय ।

त्वं हि नस्तात सर्वेषां दुःखितानामपाश्रयः ॥ २१ ॥

' तुम्हारा कल्याण हो । तुम उन दोनोंको बुला लाओ और साथ ही पानी भी ले आओ ।

तात! तुम्हीं हम सब दुःखी बन्धुओंके सहारे हो' ॥ २१ ॥

एवमुक्तो गुडाकेशः प्रगृह्य सशरं धनुः ।

आमुक्तखड्गो मेधावी तत् सरः प्रत्यपद्यत ॥ २२ ॥

युधिष्ठिरके ऐसा कहने पर निद्राविजयी बुद्धिमान् अर्जुन धनुष- बाण और खड्ग लिये उस सरोवरके तटपर गये ॥ २२ ॥

ततः पुरुषशार्दूलौ पानीयहरणे गतौ ।

तौ ददर्श हतौ तत्र भ्रातरौश्वेतवाहनः ॥ २३ ॥

श्वेतवाहन अर्जुनने जल लानेके लिये गये हुए उन दोनों पुरुषसिंह भाइयोंको वहाँ मरे हुए देखा ॥ २३ ॥

प्रसुप्ताविव तौ दृष्ट्वा नरसिंहः सुदुःखितः ।

धनुरुद्यम्य कौन्तेयो व्यलोकयत तद् वनम् ॥ २४ ॥

दोनोंको प्रगाढ़ निद्रामें सोये हुएकी भाँति देखकर मनुष्योंमें सिंहके समान पराक्रमी अर्जुनको बहुत दुःख हुआ । उन्होंने धनुष उठाकर उस वनका अच्छी तरह निरीक्षण किया ॥ २४ ॥

नापश्यत् तत्र किञ्चित् स भूतमस्मिन् महावने ।

सव्यसाची ततः श्रान्तः पानीयं सोऽभ्यधावत ॥ २५ ।

जब उस विशाल वनमें उन्हें कोई भी हिंसक प्राणी नहीं दिखायी दिया, तब सव्यसाची अर्जुन थककर पानीकी ओर दौड़े ॥ २५ ॥

अभिधावस्ततो वाक्यमन्तरिक्षात् स शुश्रुवे ।

किमासीदसि पानीयं नैतच्छक्यं बलात् त्वया ॥ २६ ॥

कौन्तेय यदि प्रश्नांस्तान् मयोक्तान् प्रतिपत्स्यसे ।

ततः पास्यसि पानीयं हरिष्यसि च भारत ॥ २७ ॥

दौड़ते समय उन्हें आकाशकी ओरसे आती हुई वाणी सुनायी दी- ' कुन्तीनन्दन! क्यों पानीके निकट जा रहे हो? तुम जबरदस्ती यह जल नहीं पी सकते । भारत! यदि मेरे उन प्रश्नोंका उत्तर दे सको, तो यहाँका पानी पीओ और साथ ले भी जाओ ' ॥ २६-२७ ॥

वारितस्त्वब्रवीत् पार्थो दृश्यमानो निवारय ।

यावद् बाणैर्विनिर्भिन्नः पुनर्नैवं वदिष्यसि ॥ २८ ॥

इस प्रकार रोके जानेपर अर्जुनने कहा- ' जरा सामने आकर रोको । सामने आते ही बाणोंसे टुकड़े - टुकड़े हो जानेपर फिर तुम इस प्रकार नहीं बोल पाओगे ' ॥ २८ ॥

एवमुक्त्वा ततः पार्थः शरैरस्त्रानुमन्त्रितैः ।

पृष्ठ 2083

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प्रववर्ष दिशः कृत्स्नाः शब्दवेधं च दर्शयन् ॥ २ ९ ॥ ऐसा कहकर अर्जुनने अपनी शब्दवेध-कलाका परिचय देते हुए दिव्यास्त्रोंसे अभिमन्त्रित बाणोंकी सब ओर झड़ी लगा दी ॥ २ ९ ॥

कर्णिनालीकनाराचानुत्सृजन् भरतर्षभ ।

स त्वमोघानिषून् मुक्त्वा तृष्णयाभिप्रपीडितः ॥ ३० ॥

अनेकैरिषुसङ्घातैरन्तरिक्षे ववर्ष ह । भरतश्रेष्ठ जनमेजय! अर्जुन उस समय कर्णि, नालीक तथा नाराच आदि बाणोंकी वर्षा कर रहे थे । प्याससे पीड़ित हुए अर्जुनने कितने ही अमोघ बाणोंका प्रयोग करके आकाशमें भी कई बार बाण- समूहकी वर्षा की ॥ ३० ॥

यक्ष उवाच किं विघातेन ते पार्थ प्रश्नानुक्त्वा ततः पिब ॥ ३१ ॥

अनुक्त्वा च पिबन् प्रश्नान् पीत्वैव न भविष्यसि । यक्ष बोला - पार्थ! इस प्रकार प्राणियोंपर आघात करनेसे क्या लाभ? पहले मेरे प्रश्नोंका उत्तर दो, फिर जल पीओ । यदि तुम प्रश्नोंका उत्तर दिये बिना ही यहाँका जल पीओगे, तो पीते ही मर जाओगे ॥ ३१३ ॥

एवमुक्तस्ततः पार्थः सव्यसाची धनंजयः ॥ ३२ ॥

अवज्ञायैव तां वाचं पीत्वैव निपपात ह । उसके ऐसा कहनेपर कुन्तीपुत्र सव्यसाची धनंजय उसके वचनोंकी अवहेलना करके जल पीने लगे और पीते ही अचेत होकर गिर पड़े ॥ ३२ ॥

अथाब्रवीद् भीमसेनं कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ ३३ ॥

नकुलः सहदेवश्च बीभत्सुश्च परंतप ।

चिरं गतास्तोयहेतोर्न चागच्छन्ति भारत ॥ ३४ ॥

तांश्चैवानय भद्रं ते पानीयं च त्वमानय । - तब कुन्तीकुमार युधिष्ठिरने भीमसेनसे कहा – ' परंतप! भरतनन्दन! नकुल, सहदेव और अर्जुनको पानीके लिये गये बहुत देर हो गयी । वे अभीतक नहीं आ रहे हैं । तुम्हारा कल्याण हो । तुम जाकर उन्हें बुला लाओ और पानी भी ले आओ ' ॥ ३३-३४३ ॥ भीमसेनस्तथेत्युक्त्वा तं देशं प्रत्यपद्यत ॥ ३५ ॥

यत्र ते पुरुषव्याघ्रा भ्रातरोऽस्य निपातिताः ।

तान् दृष्ट्वा दुःखितो भीमस्तृषया च प्रपीडितः ॥ ३६ ॥

तब भीमसेन ‘ बहुत अच्छा' कहकर उस स्थान पर गये, जहाँ वे पुरुषसिंह तीनों भाई पृथ्वीपर पड़े थे । उन्हें उस अवस्थामें देखकर भीमसेनको बड़ा दुःख हुआ । इधर प्यास भी उन्हें बहुत कष्ट दे रही थी ॥

पृष्ठ 2084

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अमन्यत महाबाहुः कर्म तद् यक्षरक्षसाम् ।

स चिन्तयामास तदा योद्धव्यं ध्रुवमद्य वै ॥ ३७ ॥

पास्यामि तावत् पानीयमिति पार्थो वृकोदरः ।

ततोऽभ्यधावत् पानीयं पिपासुः पुरुषर्षभः ॥ ३८ ॥

महाबाहु भीमसेनने मन- ही- मन यह निश्चय किया कि ' यह यक्षों तथा राक्षसोंका काम है । ’ फिर उन्होंने सोचा; ' आज निश्चय ही मुझे शत्रुके साथ युद्ध करना पड़ेगा, अतः पहले जल तो पी लूँ । ' ऐसा निश्चय करके प्यासे नरश्रेष्ठ कुन्तीकुमार भीमसेन जलकी ओर दौड़े ॥ यक्ष उवाच

मा तात साहसं कार्षीर्मम पूर्वपरिग्रहः ।

प्रश्नानुक्त्वा तु कौन्तेय ततः पिब हरस्व च ॥ ३ ९ ॥

यक्ष बोला — तात! पानी पीनेका साहस न करना । इस जलपर पहलेसे ही मेरा अधिकार स्थापित हो चुका है । कुन्तीकुमार! पहले मेरे प्रश्नोंका उत्तर दे दो, फिर पानी पीओ और ले भी जाओ ॥ ३ ९ ॥

एवमुक्तस्तदा भीमो यक्षेणामिततेजसा ।

अनुक्त्वैव तु तान् प्रश्नान् पीत्वैव निपपात ह ॥ ४० ॥

अमिततेजस्वी यक्षके ऐसा कहनेपर भी भीमसेन उन प्रश्नोंका उत्तर दिये बिना ही जल पीने लगे और पीते ही मूर्च्छित होकर गिर पड़े ॥ ४० ॥

ततः कुन्तीसुतो राजा प्रचिन्त्य पुरुषर्षभः ।

समुत्थाय महाबाहुर्दह्यमानेन चेतसा ॥ ४१ ॥

व्यपेतजननिर्घोषं प्रविवेश महावनम् ।

रुरुभिश्च वराहैश्च पक्षिभिश्च निषेवितम् ॥ ४२ ॥

तदनन्तर कुन्तीपुत्र पुरुषरत्न महाबाहु राजा युधिष्ठिर बहुत देरतक सोच-विचार करके उठे और जलते हुए हृदयसे उन्होंने उस विशाल वनमें प्रवेश किया, जहाँ मनुष्योंकी आवाजतक नहीं सुनायी देती थी । वहाँ रुरु मृग, वराह तथा पक्षियोंके समुदाय ही निवास करते थे ॥ ४१-४२ ॥

नीलभास्वरवर्णैश्च पादपैरुपशोभितम् ।

भ्रमरैरुपगीतं च पक्षिभिश्च महायशाः ॥ ४३ ॥

नीले रंगके चमकीले वृक्ष उस वनकी शोभा बढ़ा रहे थे । भ्रमरोंके गुंजन और विहंगोंके कलरवसे वह वनप्रान्त शब्दायमान हो रहा था ॥ ४३ ॥

स गच्छन् कानने तस्मिन् हेमजालपरिष्कृतम् ।

ददर्श तत् सरः श्रीमान् विश्वकर्मकृतं यथा ॥ ४४ ॥

पृष्ठ 2085

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महायशस्वी श्रीमान् युधिष्ठिरने उस वनमें विचरण करते हुए उस सरोवरको देखा, जो सुनहरे रंगके कुसुमकेसरोंसे विभूषित था। जान पड़ता था; साक्षात् विश्वकर्माने ही उसका निर्माण किया है ॥ ४४ ॥

उपेतं नलिनीजालैः सिन्धुवारैः सवेतसैः । केतकैः करवीरैश्च पिप्पलैश्चैव संवृतम् । ( ततो धर्मसुतः श्रीमान् भ्रातृदर्शनलालसः । ) श्रमार्तस्तदुपागम्य सरो दृष्ट्वाथ विस्मितः ॥ ४५ ॥

उस सरोवरका जल कमलकी बेलोंसे आच्छादित हो रहा था और उसके चारों किनारोंपर सिंदुवार, बेंत, केवड़े, करवीर तथा पीपलके वृक्ष उसे घेरे हुए थे । उस समय भाइयोंसे मिलनेके लिये उत्सुक श्रीमान् धर्मनन्दन युधिष्ठिर थकावटसे पीड़ित हो उस सरोवरपर आये और वहाँकी अवस्था देखकर बड़े विस्मित हुए ॥ ४५ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि आरणेयपर्वणि नकुलादिपतने द्वादशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३१२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत आरणेयपर्वमें नकुल आदि चारों भाइयोंके मूर्च्छित होकर गिरनेसे सम्बन्ध रखनेवाला तीन सौ बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१२ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका श्लोक मिलाकर कुल ४५३ श्लोक हैं । )

पृष्ठ 2086

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त्रयोदशाधिकत्रिशततमोऽध्यायः यक्ष और युधिष्ठिरका प्रश्नोत्तर तथा युधिष्ठिरके उत्तरसे संतुष्ट हुए यक्षका चारों भाइयोंके जीवित होनेका वरदान देना वैशम्पायन उवाच

स ददर्श हतान् भ्रातृल्लोकपालानिव च्युतान् ।

चुगान्ते समनुप्राप्ते शक्रप्रतिमगौरवान् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! युधिष्ठिरने इन्द्रके समान गौरवशाली अपने भाइयोंको सरोवरके तटपर निर्जीवकी भाँति पड़े हुए देखा; मानो प्रलय - कालमें सम्पूर्ण लोकपाल अपने लोकोंसे भ्रष्ट होकर गिर गये हों ॥ १ ॥

विनिकीर्णधनुर्बाणं दृष्ट्वा निहतमर्जुनम् ।

भीमसेनं यमौ चैव निर्विचेष्टान् गतायुषः ॥ २ ॥

स दीर्घमुष्णं निःश्वस्य शोकबाष्पपरिप्लुतः ।

तान् दृष्ट्वा पतितान् भ्रातॄन् सर्वांश्चिन्तासमन्वितः ॥ ३ ॥

धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम् । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष - बाण इधर - उधर बिखरे थे । भीमसेन और नकुल - सहदेव भी प्राणरहित हो निश्चेष्ट हो गये थे । इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम - गरम लंबी साँसें खींचने लगे । उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे । अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाहु धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे— ॥ २-३३ ॥ ननु त्वया महाबाहो प्रतिज्ञातं वृकोदर ॥ ४ ॥

सुयोधनस्य भेत्स्यामि गदया सक्थिनी रणे ।

व्यर्थं तदद्य मे सर्वं त्वयि वीर निपातिते ॥ ५ ॥

महात्मनि महाबाहो कुरूणां कीर्तिवर्धने । वे बोले – ' महाबाहु वृकोदर! तुमने यह प्रतिज्ञा की थी कि ' मैं युद्धमें अपनी गदासे दुर्योधनकी दोनों जाँघें तोड़ डालूँगा। ' महाबाहो! तुम कुरुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले थे । तुम्हारा हृदय विशाल था । वीर! आज तुम्हारे गिर जानेसे मेरे लिये वह सब कुछ व्यर्थ हो गया ॥ ४-५३ ॥ मनुष्यसम्भवा वाचो विधर्मिण्यः प्रतिश्रुताः ॥ ६ ॥

भवतां दिव्यवाचस्तु ता भवन्तु कथं मृषा ।

पृष्ठ 2087

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' साधारण मनुष्योंकी बातें तथा उनकी प्रतिज्ञाएँ तो झूठी निकल जाती हैं; परंतु तुमलोगोंके सम्बन्धमें जो दिव्य वाणियाँ हुई थीं, वे कैसे मिथ्या हो सकती हैं? ॥ ६३ ॥

देवाश्चापि यदावोचन् सूतके त्वां धनंजय ॥ ७ ॥

सहस्राक्षादनवरः कुन्ति पुत्रस्तवेति वै ।

उत्तरे पारियात्रे च जगुर्भूतानि सर्वशः ॥ ८ ॥

विप्रणष्टां श्रियं चैषामाहर्ता पुनरञ्जसा ।

नास्य जेता रणे कश्चिदजेता नैष कस्यचित् ॥ १ ९ ॥

“ धनंजय! जब तुम्हारा जन्म हुआ था, उस समय देवताओंने भी कहा था कि ' कुन्ती! तुम्हारा यह पुत्र सहस्रनेत्रधारी इन्द्रसे किसी बातमें कम न होगा। ' उत्तर पारियात्र पर्वतपर सब प्राणियोंने तुम्हारे विषयमें यही कहा था कि ' ये अर्जुन शीघ्र ही पाण्डवोंकी खोयी हुई राजलक्ष्मीको पुनः लौटा लायेंगे । युद्धमें कोई भी इनपर विजय पानेवाला न होगा और ये भी किसीको परास्त किये बिना न रहेंगे " ॥ ७ – ९ ॥

सोऽयं मृत्युवशं यातः कथं जिष्णुर्महाबलः ।

अयं ममाशां संहत्य शेते भूमौ धनंजयः ॥ १० ॥

आश्रित्य यं वयं नाथ दुःखान्येतानि सेहिम । ' वे ही महाबली अर्जुन आज मृत्युके अधीन कैसे हो गये? ये वे ही धनंजय मेरी आशालताको छिन्न-भिन्न करके धरतीपर पड़े हैं; जिन्हें अपना रक्षक बनाकर और जिनका ही भारी भरोसा करके हमलोग ये सारे दुःख सहते आये हैं ॥ १०३ ॥

रणे प्रमत्तौ वीरौ च सदा शत्रुनिबर्हणौ ॥ ११ ॥

कथं रिपुवशं यातौ कुन्तीपुत्रौ महाबलौ ।

यौ सर्वास्त्राप्रतिहतौ भीमसेनधनंजयौ ॥ १२ ॥

' कुन्तीके ये दोनों महाबली पुत्र भीमसेन और अर्जुन- जो किसी भी अस्त्रसे प्रतिहत न होनेवाले, समरांगणमें उन्मत्त होकर लड़नेवाले तथा सदैव शत्रुओंका संहार करनेवाले वीर थे, वे आज सहसा शत्रुके अधीन कैसे हो गये? ॥ ११-१२ ॥

अश्मसारमयं नूनं हृदयं मम दुर्हृदः ।

यमौ यदेतौ दृष्ट्वाद्य पतितौ नावदीर्यते ॥ १३ ॥

'मुझ दुष्टका हृदय निश्चय ही पत्थर और लोहेका बना हुआ है, जो कि आज इन दोनों भाई नकुल और सहदेवको धरतीपर पड़ा देख विदीर्ण नहीं हो जाता है ॥ १३ ॥

शास्त्रज्ञा देशकालज्ञास्तपोयुक्ताः क्रियान्विताः ।

अकृत्वा सदृशं कर्म किं शेध्वं पुरुषर्षभाः ॥ १४ ॥

‘ पुरुषसिंह बन्धुओ! तुमलोग शास्त्रोंके विद्वान् देशकालको समझनेवाले, तपस्वी और कर्मठ वीर थे । अपने योग्य पराक्रम किये बिना ही तुमलोग (प्राणहीन हो ) कैसे सो रहे हो? ॥ १४ ॥

पृष्ठ 2088

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अविक्षतशरीराश्चाप्यप्रमृष्टशरासनाः ।

असंज्ञा भुवि संगम्य किं शेध्वमपराजिताः ॥ १५ ॥

' तुम्हारे शरीरोंमें कोई घाव नहीं है, तुमने धनुष- बाणका स्पर्शतक नहीं किया है तथा तुम किसीसे परास्त होनेवाले नहीं हो; ऐसी दशामें इस पृथ्वीपर संज्ञाशून्य होकर क्यों पड़े हो? ' ॥ १५ ॥

सानूनिवाद्रेः संसुप्तान् दृष्ट्वा भ्रातॄन् महामतिः ।

सुखं प्रसुप्तान् प्रस्विन्नः खिन्नः कष्टां दशां गतः ॥ १६ ॥

परम बुद्धिमान् युधिष्ठिर धरतीपर पड़े हुए पर्वत-शिखरोंके समान अपने भाइयोंको इस प्रकार सुखकी नींद सोते देखकर बहुत दुःखी हुए । उनके सारे अंगोंमें पसीना निकल आया और वे अत्यन्त कष्टप्रद अवस्थामें पहुँच गये ॥ १६ ॥

एवमेवेदमित्युक्त्वा धर्मात्मा स नरेश्वरः ।

शोकसागरमध्यस्थो दध्यौ कारणमाकुलः ॥ १७ ॥

' यह ऐसी ही होनहार है ', ऐसा कहकर धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर शोकसागरमें मग्न तथा व्याकुल होकर भाइयोंकी मृत्युके कारणपर विचार करने लगे ॥ १७ ॥

इतिकर्तव्यतां चेति देशकालविभागवित् ।

नाभिपेदे महाबाहुश्चिन्तयानो महामतिः ॥ १८ ॥

वे यह भी सोचने लगे कि ' अब क्या करना चाहिये? ' महाबुद्धिमान् महाबाहु युधिष्ठिर देश और कालके तत्त्वको पृथकृ - पृथक् जाननेवाले थे; तो भी बहुत सोचने - विचारनेपर भी वे किसी निश्चयपर नहीं पहुँच सके ॥ १८ ॥

अथ संस्तभ्य धर्मात्मा तदाऽऽत्मानं तपोयुतः ।

एवं विलप्य बहुधा धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ १ ९ ॥

बुद्धया विचिन्तयामास वीराः केन निपातिताः ॥ २० ॥

नैषां शस्त्रप्रहारोऽस्ति पदं नेहास्ति कस्यचित् ।

भूतं महदिदं मन्ये भ्रातरो येन मे हताः ॥ २१ ॥

तत्पश्चात् धर्मात्मा और तपस्वी धर्मपुत्र युधिष्ठिर अपने मनको स्थिर करके बहुत विलाप करनेके पश्चात् अपनी बुद्धिद्वारा यह विचार करने लगे –' इन वीरोंको किसने मार गिराया है? इनके शरीरोंमें अस्त्र - शस्त्रोंके आघातका कोई चिह्न नहीं है और न इस स्थानपर किसी दूसरेके पैरोंका निशान ही है । मैं समझता हूँ, अवश्य वह कोई भारी भूत है, जिसने मेरे भाइयोंको मारा है ॥ १ ९ –२१ ॥

एकाग्रं चिन्तयिष्यामि पीत्वा वेत्स्यामि वा जलम् ।

स्यात् तु दुर्योधनेनेदमुपांशुविहितं कृतम् ॥ २२ ॥

' इस विषयमें मैं चित्तको एकाग्र करके फिर सोचूँगा अथवा पानी पीकर इस रहस्यको समझनेकी चेष्टा करूँगा । सम्भव है, दुर्योधनने चुपके -चुपके कोई षड्यन्त्र किया

पृष्ठ 2089

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हो ॥ २२ ॥

गान्धारराजरचितं सततं जिह्मबुद्धिना ।

यस्य कार्यमकार्यं वा सममेव भवत्युत ॥ २३ ॥

कस्तस्य विश्वसेद् वीरो दुष्कृतेरकृतात्मनः ।

अथवा पुरुषैर्गूढैः प्रयोगोऽयं दुरात्मनः ॥ २४ ॥

‘ अथवा जिसकी बुद्धिमें सदा कुटिलता ही निवास करती है, उस गान्धारराज शकुनिकी भी यह करतूत हो सकती है । जिसके लिये कर्तव्य और अकर्तव्य दोनों बराबर हैं, उस अजितात्मा पापी शकुनिपर कौन वीर पुरुष विश्वास कर सकता है? अथवा गुप्तरूपसे नियुक्त किये हुए पुरुषोंद्वारा दुरात्मा दुर्योधनने ही यह हिंसात्मक प्रयोग किया होगा' ॥ २३-२४ ॥

भवेदिति महाबुद्धिर्बहुधा तदचिन्तयत् ।

तस्यासीन्न विषेणेदमुदकं दूषितं यथा ॥ २५ ॥

इस प्रकार परम बुद्धिमान् युधिष्ठिर भाँति- भाँतिकी चिन्ता करने लगे । ( परीक्षा करनेपर) उन्हें इस बातका निश्चय हो गया था कि इस सरोवरके जलमें जहर नहीं मिलाया गया है ॥ २५ ॥

मृतानामपि चैतेषां विकृतं नैव जायते ।

मुखवर्णाः प्रसन्ना मे भ्रातॄणामित्यचिन्तयत् ॥ २६ ॥

‘ क्योंकि मर जानेपर भी मेरे इन भाइयोंके शरीरमें कोई विकृति नहीं उत्पन्न हुई है । अब भी मेरे भाइयोंके मुखकी कान्ति प्रसन्न है। ' इस तरह वे सोच -विचारमें ही डूबे रहे ॥ २६ ॥

एकैकशश्चोघबलानिमान् पुरुषसत्तमान् ।

कोऽन्यः प्रतिसमासेत कालान्तकयमादृते ॥ २७ ॥

' मेरे इन पुरुषरत्न भाइयोंमेंसे प्रत्येकके शरीरमें बलका अगाध सिन्धु लहराता था । आयु पूर्ण होनेपर सबका अन्त कर देनेवाले यमराजके सिवा दूसरा कौन इनसे भिड़ सकता था? ' ॥ २७ ॥

एतेन व्यवसायेन तत् तोयं व्यवगाढवान् ।

गाहमानश्च तत् तोयमन्तरिक्षात् स शुश्रुवे ॥ २८ ॥

इस प्रकार निश्चय करके युधिष्ठिर जलमें उतरे । पानीमें प्रवेश करते ही उनके कानोंमें आकाशवाणी सुनायी दी ॥ २८ ॥

यक्ष उवाच अहं बकः शैवलमत्स्यभक्षो नीता मया प्रेतवशं तवानुजाः । त्वं पञ्चमो भविता राजपुत्र

पृष्ठ 2090

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न चेत् प्रश्नान् पृछतो व्याकरोषि ॥ २ ९ ॥ यक्ष बोला— राजकुमार! मैं सेवार और मछली खानेवाला बगुला हूँ। मैंने ही तुम्हारे छोटे भाइयोंको यमलोक भेजा है; अतः मेरे पूछनेपर यदि तुम मेरे प्रश्नोंका उत्तर न दोगे, तो तुम भी यमलोकके पाँचवें अतिथि होओगे ॥ २ ९ ॥

मा तात साहसं कार्षीर्मम पूर्वपरिग्रहः ।

प्रश्नानुक्त्वा तु कौन्तेय ततः पिब हरस्व च ॥ ३० ॥

तात! जल पीनेका साहस न करना । इसपर मेरा पहलेसे ही अधिकार हो गया है ।

कुन्तीकुमार! मेरे प्रश्नोंका उत्तर दो और तब जल पीओ और ले भी जाओ ॥ ३० ॥

युधिष्ठिर उवाच

रुद्राणां वा वसूनां वा मरुतां वा प्रधानभाक् ।

पृच्छामि को भवान् देवो नैतच्छकुनिना कृतम् ॥ ३१ ॥

युधिष्ठिर बोले- मैं पूछता हूँ, तुम रुद्रों, वसुओं अथवा मरुद्गणोंमेंसे कौन - से प्रधान देवता हो? बताओ । यह काम किसी पक्षीका किया हुआ नहीं हो सकता? ॥ ३१ ॥

हिमवान् पारियात्रश्च विन्ध्यो मलय एव च ।

चत्वारः पर्वताः केन पातिता भूरितेजसः ॥ ३२ ॥

मेरे महातेजस्वी भाई हिमवान्, पारियात्र, विन्ध्य तथा मलय –इन चारों पर्वतोंके समान हैं । इन्हें किसने मार गिराया है? ॥ ३२ ॥

अतीव ते महत् कर्म कृतं च बलिनां वर ।

यान् न देवा न गन्धर्वा नासुराश्च न राक्षसाः ॥ ३३ ॥

विषहेरन् महायुद्धे कृतं ते तन्महाद्भुतम् ।

न ते जानामि यत् कार्यं नाभिजानामि काङ्क्षितम् ॥ ३४ ॥

बलवानोंमें श्रेष्ठ वीर! तुमने यह अत्यन्त महान् कर्म किया है । बड़े - बड़े युद्धोंमें जिन वीरों- ( के प्रभाव ) -को देवता, गन्धर्व, असुर तथा राक्षस भी नहीं सह सकते थे, उन्हें गिराकर तुमने परम अद्भुत पराक्रम किया है । तुम्हारा कार्य क्या है? यह मैं नहीं जानता । तुम क्या चाहते हो? इसका भी मुझे पता नहीं है ॥

कौतूहलं महज्जातं साध्वसं चागतं मम ।

येनास्म्युद्विग्नहृदयः समुत्पन्नशिरोज्वरः ॥ ३५ ॥

पृच्छामि भगवंस्तस्मात् को भवानिह तिष्ठति । तुम्हारे विषयमें मुझे महान् कौतूहल हो गया है । तुमसे मुझे कुछ भय भी लगने लगा है, जिससे मेरा हृदय उद्विग्न हो उठा है और सिरमें संताप होने लगा है । अतः भगवन्! मैं विनयपूर्वक पूछता हूँ, तुम यहाँ कौन विराज रहे हो? ॥ ३५ ॥

यक्षउवाच