श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 2121–2130

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2121–2130

पृष्ठ 2121

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॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ महाभारत- सार

मातापितृसहस्राणि पुत्रदारशतानि च ।

संसारेष्वनुभूतानि यान्ति यास्यन्ति चापरे ॥

'मनुष्य इस जगत् में हजारों माता -पिताओं तथा सैकड़ों स्त्री- पुत्रोंके संयोग - वियोगका अनुभव कर चुके हैं, करते हैं और करते रहेंगे । '

हर्षस्थानसहस्राणि भयस्थानशतानि च ।

दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम् ॥

‘ अज्ञानी पुरुषको प्रतिदिन हर्षके हजारों और भयके सैकड़ों अवसर प्राप्त होते रहते हैं; किन्तु विद्वान् पुरुषके मनपर उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता है । '

ऊर्ध्वबाहुर्विरौम्येष न च कश्चिच्छृणोति मे ।

धर्मादर्थश्च कामश्च स किमर्थं न सेव्यते ॥

' मैं दोनों हाथ ऊपर उठाकर पुकार- पुकारकर कह रहा हूँ, पर मेरी बात कोई नहीं सुनता । धर्मसे मोक्ष तो सिद्ध होता ही है; अर्थ और काम भी सिद्ध होते हैं तो भी लोग उसका सेवन क्यों नहीं करते! ' न जातु कामान्न भयान्न लोभाद् धर्मं त्यजेज्जीवितस्यापि हेतोः । नित्यो धर्मः सुखदुःखे त्वनित्ये जीवो नित्यो हेतुरस्य त्वनित्यः ॥ ‘ कामनासे, भयसे, लोभसे अथवा प्राण बचानेके लिये भी धर्मका त्याग न करे । धर्म नित्य है और सुख -दुःख अनित्य । इसी प्रकार जीवात्मा नित्य है और उसके बन्धनका हेतु अनित्य । '

इमां भारतसावित्रीं प्रातरुत्थाय यः पठेत् ।

स भारतफलं प्राप्य परं ब्रह्माधिगच्छति ॥

‘ यह महाभारतका सारभूत उपदेश ' भारत- सावित्री ' के नामसे प्रसिद्ध है । जो प्रतिदिन सबेरे उठकर इसका पाठ करता है, वह सम्पूर्ण महाभारतके अध्ययनका फल पाकर परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है । ' -महाभारत, स्वर्गारोहण० ५/६० - ६४

पृष्ठ 2122

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॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ श्रीमहाभारतम् विराटपर्व पाण्डवप्रवेशपर्व प्रथमोऽध्यायः विराटनगरमें अज्ञातवास करनेके लिये पाण्डवोंकी गुप्त मन्त्रणा तथा युधिष्ठिरके द्वारा अपने भावी कार्यक्रमका दिग्दर्शन

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।

देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥१ ॥

अन्तर्यामी नारायण भगवान् श्रीकृष्ण, ( उनके नित्यसखा) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, (उनकी लीला प्रकट करनेवाली ) भगवती सरस्वती और (उनकी लीलाओंका संकलन करनेवाले ) महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय ( महाभारत) -का पाठ करना चाहिये ॥ १ ॥

जनमेजय उवाच

कथं विराटनगरे मम पूर्वपितामहाः ।

अज्ञातवासमुषिता दुर्योधनभयार्दिताः ॥ २ ॥

पतिव्रता महाभागा सततं ब्रह्मवादिनी ।

द्रौपदी च कथं ब्रह्मन्नज्ञाता दुःखितावसत् ॥ ३ ॥

जनमेजयने पूछा — ब्रह्मन्! मेरे प्रपितामह पाण्डवोंने दुर्योधनके भयसे कष्ट उठाते हुए विराटनगरमें अपने अज्ञातवासका समय किस प्रकार व्यतीत किया तथा दुःखमें पड़ी हुई सदा ब्रह्मस्वरूप श्रीकृष्णका नामकीर्तन करनेवाली परम सौभाग्यवती पतिव्रता द्रौपदी वहाँ अपनेको अज्ञात रखकर कैसे निवास कर सकी? ॥ २-३ ॥ वैशम्पायन उवाच

पृष्ठ 2123

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यथा विराटनगरे तव पूर्वपितामहाः ।

अज्ञातवासमुषितास्तच्छृणुष्व नराधिप ॥ ४ ॥

वैशम्पायनजीने कहा- राजन्! तुम्हारे प्रपितामहोंने विराटनगरमें जिस प्रकार अज्ञातवासके दिन पूरे किये थे, वह बताता हूँ; सुनो ॥ ४ ॥

तथा स तु वराँल्लब्ध्वा धर्मो धर्मभृतां वरः ।

गत्वाऽऽश्रमं ब्राह्मणेभ्य आचख्यौ सर्वमेव तत् ॥ ५ ॥

यक्षरूपधारी धर्मसे इस प्रकार वरदान पानेके अनन्तर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ धर्मपुत्र युधिष्ठिरने आश्रमपर जाकर वह सब समाचार ब्राह्मणोंको बताया ॥ ५ ॥

कथयित्वा तु तत् सर्वं ब्राह्मणेभ्यो युधिष्ठिरः ।

अरणीसहितं तस्मै ब्राह्मणाय न्यवेदयत् ॥ ६ ॥

ततो युधिष्ठिरो राजा धर्मपुत्रो महामनाः ।

संनिवर्त्यानुजान् सर्वानिति होवाच भारत ॥ ७ ॥

भारत! ब्राह्मणोंसे सब कुछ बताकर जब युधिष्ठिरने अरणीसहित मन्थनकाष्ठ पूर्वोक्त ब्राह्मणदेवताको सौंप दिया, तब धर्मपुत्र महामनस्वी उन राजा युधिष्ठिरने अपने सब भाइयोंको एकत्र करके इस प्रकार कहा- ॥

द्वादशेमानि वर्षाणि राज्यविप्रोषिता वयम् ।

त्रयोदशोऽयं सम्प्राप्तः कृच्छ्रात् परमदुर्वसः ॥ ८ ॥

‘ आज बारह वर्ष बीत गये, हमलोग अपने राज्यसे बाहर आकर वनमें रहते हैं । अब यह तेरहवाँ वर्ष आरम्भ हुआ है । इसमें बड़े कष्टसे कठिनाइयोंका सामना करते हुए अत्यन्त गुप्तरूपसे रहना होगा ॥ ८ ॥

स साधु कौन्तेय इतो वासमर्जुन रोचय ।

संवत्सरमिमं यत्र वसेमाविदिताः परैः ॥ ९ ॥

'कुन्तीनन्दन अर्जुन! तुम अपनी रुचिके अनुसार कोई उत्तम निवासस्थान चुनो, जहाँ यहाँसे चलकर हम एक वर्षतक इस प्रकार रहें कि शत्रुओंको हमारा पता न चल सके ' ॥ ९ ॥

अर्जुन उवाच

तस्यैव वरदानेन धर्मस्य मनुजाधिप ।

अज्ञाता विचरिष्यामो नराणां नात्र संशयः ॥ १० ॥

तत्र वासाय राष्ट्राणि कीर्तयिष्यामि कानिचित् ।

रमणीयानि गुप्तानि तेषां किञ्चित् स्म रोचय ॥ ११ ॥

अर्जुन बोले — नरेश्वर! इसमें संदेह नहीं कि उन्हीं भगवान् धर्मके दिये हुए वरके प्रभावसे हमलोग इस पृथ्वीपर विचरते रहेंगे और हमें दूसरे मनुष्य पहचान न सकेंगे तथापि

पृष्ठ 2124

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मैं आपसे निवास करनेयोग्य कुछ रमणीय एवं गुप्त राष्ट्रोंके नाम बतलाऊँगा, उनमेंसे किसीको आप स्वयं ही अपनी रुचिके अनुसार चुन लीजिये ॥ १०-११ ॥

सन्ति रम्या जनपदा बह्वन्नाः परितः कुरून् ।

पाञ्चालाश्चेदिमत्स्याश्च शूरसेनाः पटच्चराः ॥ १२ ॥

दशार्णा नवराष्ट्राश्च मल्लाः शाल्वा युगन्धराः ।

कुन्तिराष्ट्रं च विपुलं सुराष्ट्रावन्तयस्तथा ॥ ५३ ॥

कुरुदेशके चारों ओर बहुत- से सुरम्य जनपद हैं, जहाँ बहुत अन्न होता है । उनके नाम ये हैं — पांचाल, चेदि, मत्स्य, शूरसेन, पटच्चर, दशार्ण, नवराष्ट्र, मल्ल, शाल्व, युगन्धर, विशाल कुन्तिराष्ट्र, सौराष्ट्र तथा अवन्ती ॥ १२-१३ ॥

एतेषां कतमो राजन् निवासस्तव रोचते ।

यत्र वत्स्यामहे राजन् संवत्सरमिमं वयम् ॥ १४ ॥

राजन्! इनमेंसे कौन - सा राष्ट्र आपको निवास करनेके लिये पसंद है? जिसमें हम सब लोग इस वर्ष निवास करें ॥ १४ ॥

युधिष्ठिरउवाच

श्रुतमेतन्महाबाहो यथा स भगवान् प्रभुः ।

अब्रवीत् सर्वभूतेशस्तत् तथा न तदन्यथा ॥ १५ ॥

युधिष्ठिरने कहा – महाबाहो! तुम्हारी यह बात मैंने ध्यानसे सुनी है । सम्पूर्ण भूतोंके अधीश्वर और प्रभावशाली भगवान् धर्मने हमारे लिये जैसा आदेश दिया है, वह सब वैसा ही होगा । उसके विपरीत कुछ नहीं होगा ॥ १५ ॥

अवश्यं त्वेव वासार्थं रमणीयं शिवं सुखम् ।

सम्मन्त्र्य सहितैः सर्वैर्वस्तव्यमकुतोभयैः ॥ १६ ॥

तथापि हम सब लोगोंको आपसमें सलाह करके अवश्य ही अपने रहनेके लिये कोई परम सुन्दर, कल्याणकारी तथा सुखद स्थान चुन लेना चाहिये, जहाँ हम निर्भय होकर रह सकें ॥ १६ ॥

मत्स्यो विराटो बलवानभिरक्तोऽथ पाण्डवान् ।

धर्मशीलो वदान्यश्च वृद्धश्च सततं प्रियः ॥ १७ ॥

[ तुम्हारे बताये हुए देशोंमेंसे ] मत्स्यदेशके राजा विराट बहुत बलवान् हैं और पाण्डवोंके प्रति उनका अनुराग भी है; साथ ही वे स्वभावतः धर्मात्मा, वृद्ध, उदार तथा हमें सदैव प्रिय हैं ॥ १७ ॥

विराटनगरे तात संवत्सरमिमं वयम् ।

कुर्वन्तस्तस्य कर्माणि विहरिष्याम भारत ॥ १८ ॥

पृष्ठ 2125

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भाई अर्जुन! इसलिये इस वर्ष हमलोग राजा विराटके ही नगरमें रहें और उनका कार्यसाधन करते हुए उनके यहाँ विचरण करें ॥ १८ ॥

यानि यानि च कर्माणि तस्य वक्ष्यामहे वयम् ।

आसाद्य मत्स्यं तत् कर्म प्रब्रूत कुरुनन्दनाः ॥ १ ९ ॥

किंतु कुरुनन्दनो! तुमलोग यह तो बताओ कि हम मत्स्यराजके पास पहुँचकर किन-किन कार्योंका भार सँभाल सकेंगे? ॥ १ ९ ॥ अर्जुनउवाच

नरदेव कथं तस्य राष्ट्रे कर्म करिष्यसि ।

विराटनगरे साधो रंस्यसे केन कर्मणा ॥ २० ॥

अर्जुनने पूछा – नरदेव! आप उनके राष्ट्रमें किस प्रकार कार्य करेंगे? महात्मन्! विराटनगरमें कौन - सा कर्म करनेसे आपको प्रसन्नता होगी? ॥ २० ॥

मृदुर्वदान्यो हीमांश्च धार्मिकः सत्यविक्रमः ।

राजंस्त्वमापदाऽऽकृष्टः किं करिष्यसि पाण्डव ॥ २१ ॥

राजन्! आपका स्वभाव कोमल है । आप उदार, लज्जाशील, धर्मपरायण तथा सत्यपराक्रमी हैं, तथापि विपत्तिमें पड़ गये हैं । पाण्डुनन्दन! आप वहाँ क्या करेंगे? ॥ २१ ॥

न दुःखमुचितं किञ्चिद् राजन् वेद यथा जनः ।

स इमामापदं प्राप्य कथं घोरां तरिष्यसि ॥ २२ ॥

राजन्! साधारण मनुष्योंकी भाँति आपको किसी प्रकारके दुःखका अनुभव हो, यह उचित नहीं है; अतः इस घोर आपत्तिमें पड़कर आप कैसे इसके पार होंगे? ॥ २२ ॥

युधिष्ठिर उवाच

शृणुध्वं यत् करिष्यामि कर्म वै कुरुनन्दनाः ।

विराटमनुसम्प्राप्य राजानं पुरुषर्षभाः ॥ २३ ॥

युधिष्ठिरने कहा — नरश्रेष्ठ कुरुनन्दनो! मैं राजा विराटके यहाँ चलकर जो कार्य करूँगा, वह बताता हूँ; सुनो ॥ २३ ॥

सभास्तारो भविष्यामि तस्य राज्ञो महात्मनः ।

कङ्को नाम द्विजो भूत्वा मताक्षः प्रियदेवनः ॥ २४ ॥

वैदूर्यान् काञ्चनान् दान्तान् फलैर्ज्योतीरसैः सह ।

कृष्णाँल्लोहितवर्णांश्च निर्वत्र्स्यामि मनोरमान् ॥ २५ ॥

मैं पासा खेलनेकी विद्या जानता हूँ और यह खेल मुझे प्रिय भी है, अतः मैं कंक* नामक ब्राह्मण बनकर महामना राजा विराटकी राजसभाका एक सदस्य हो जाऊँगा और वैदूर्यमणिके समान हरी, सुवर्णके समान पीली तथा हाथीदाँतकी बनी हुई काली और लाल

पृष्ठ 2126

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रंगकी मनोहर गोटियोंको चमकीले बिन्दुओंसे युक्त पासोंके अनुसार चलाता रहूँगा ॥ २४-२५ ॥

विराटराजं रमयन् सामात्यं सहबान्धवम् ।

न च मां वेत्स्यते कश्चित् तोषयिष्ये च तं नृपम् ॥ २६ ॥

मैं राजा विराटको उनके मन्त्रियों तथा बन्धु - बान्धवोंसहित पासोंके खेलसे प्रसन्न करता रहूँगा । इस रूपमें मुझे कोई पहचान न सकेगा और मैं उन मत्स्यनरेशको भलीभाँति संतुष्ट रखूँगा ॥ २६ ॥

आसं युधिष्ठिरस्याहं पुरा प्राणसमः सखा ।

इति वक्ष्यामि राजानं यदि मां सोऽनुयोक्ष्यते ॥ २७ ॥

यदि वे राजा मुझसे पूछेंगे कि आप कौन हैं, तो मैं उन्हें बताऊँगा कि मैं पहले महाराज युधिष्ठिरका प्राणोंके समान प्रिय सखा था ॥ २७ ॥

इत्येतद् वो मयाऽऽख्यातं विहरिष्याम्यहं यथा ।

इस प्रकार मैंने तुमलोगोंको बता दिया कि विराटनगरमें मैं किस प्रकार रहूँगा ॥ २७

|| (वैशम्पायन उवाच एवं निर्दिश्य चात्मानं भीमसेनमुवाच ह ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इस प्रकार अज्ञातवासमें अपने द्वारा किये जानेवाले कार्यको बतलाकर युधिष्ठिर भीमसेनसे बोले । युधिष्ठिर उवाच भीमसेन कथं कर्म मात्स्यराष्ट्रे करिष्यसि ॥ हत्वा क्रोधवशांस्तत्र पर्वते गन्धमादने ।

यक्षान् क्रोधाभिताम्राक्षान् राक्षसांश्चापि पौरुषान् ।

प्रादाः पाञ्चालकन्यायै पद्मानि सुबहून्यपि ॥

युधिष्ठिरने पूछा- भीमसेन! तुम मत्स्यदेशमें किस प्रकार कोई कार्य कर सकोगे? तुमने गन्धमादन पर्वतपर क्रोधसे सदा लाल आँखें किये रहनेवाले क्रोधवश नामक यक्षों और महापराक्रमी राक्षसोंका वध करके पांचालराजकुमारी द्रौपदीको बहुत - से कमल लाकर दिये थे ।

बकं राक्षसराजानं भीषणं पुरुषादकम् ।

जघ्निवानसि कौन्तेय ब्राह्मणार्थमरिंदम ॥

क्षेमा चाभयसंवीता ह्येकचक्रा त्वया कृता ॥

शत्रुहन्ता भीम! ब्राह्मणपरिवारकी रक्षाके लिये तुमने भयानक आकृतिवाले नरभक्षी राक्षसराज बकको भी मार डाला था और इस प्रकार एकचक्रा नगरीको भयरहित एवं

पृष्ठ 2127

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कल्याणयुक्त बनाया था ।

हिडिम्बं च महावीर्यं किर्मीरं चैव राक्षसम् ।

त्वया हत्वा महाबाहो वनं निष्कण्टकं कृतम् ॥

महाबाहो! तुमने महावीर हिडिम्ब और राक्षस किर्मीरको मारकर वनको निष्कण्टक बनाया था ।

आपदं चापि सम्प्राप्ता द्रौपदी चारुहासिनी ।

जटासुरवधं कृत्वा त्वया च परिमोक्षिता ॥

मत्स्यराजान्तिके तात वीर्यपूर्णोऽत्यमर्षणः । ) वृकोदर विराटे त्वं रंस्यसे केन हेतुना ॥ २८ ॥

संकटमें पड़ी हुई मनोहर हास्यवाली द्रौपदीको भी तुमने जटासुरका वध करके छुड़ाया था । तात भीमसेन! तुम अत्यन्त बलवान् एवं अमर्षशाली हो । राजा विराटके यहाँ कौन - सा कार्य करके तुम प्रसन्नतापूर्वक रह सकोगे —यह बतलाओ ॥ २८ ॥

इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि पाण्डवप्रवेशपर्वणि युधिष्ठिरादिमन्त्रणे प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत पाण्डवप्रवेशपर्वमें युधिष्ठिर आदिकी परस्पर मन्त्रणासे सम्बन्ध रखनेवाला पहला अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ६३ श्लोक मिलाकर कुल ३४३ श्लोक हैं । ) * विश्वकोषके अनुसार ‘ कंक' शब्द यमराजका वाचक है। यमराजका ही दूसरा नाम धर्म है और वे ही युधिष्ठिररूपमें अवतीर्ण हुए थे । ‘ आत्मा वै जायते पुत्रः' इस उक्तिके अनुसार भी धर्म एवं धर्मपुत्र युधिष्ठिरमें कोई अन्तर नहीं है । यह समझकर ही अपनी सत्यवादिताकी रक्षा करते हुए युधिष्ठिरने ' कंक ' नामसे अपना परिचय दिया । इसके सिवा उन्होंने जो अपनेको युधिष्ठिरका प्राणोंके समान प्रिय सखा बताया, वह भी असत्य नहीं है । युधिष्ठिर नामक शरीरको ही यहाँ युधिष्ठिर समझना चाहिये । आत्माकी सत्तासे ही शरीरका संचालन होता है । अतः आत्मा उसके साथ रहनेके कारण उसका सखा है । आत्मा सबसे बढ़कर प्रिय है ही; अतः यहाँ युधिष्ठिरका आत्मा युधिष्ठिर- शरीरका प्रिय सखा कहा गया है ।

पृष्ठ 2128

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द्वितीयोऽध्यायः भीमसेन और अर्जुनद्वारा विराटनगरमें किये जानेवाले अपने अनुकूल कार्योंका निर्देश भीमसेन उवाच

पौरोगवो ब्रुवाणोऽहं बल्लवो नाम भारत ।

उपस्थास्यामि राजानं विराटमिति मे मतिः ॥ १ ॥

भीमसेनने कहा - भरतवंशशिरोमणे! मैं पौरोगव- ( पाकशालाका अध्यक्ष ) बनकर और बल्लव नामसे अपना परिचय देकर राजा विराटके दरबारमें उपस्थित होऊँगा । मेरा यही विचार है ॥ १ ॥

सूपानस्य करिष्यामि कुशलोऽस्मि महानसे ।

कृतपूर्वाणि यान्यस्य व्यञ्जनानि सुशिक्षितैः ॥ २ ॥

तान्यप्यभिभविष्यामि प्रीतिं संजनयन्नहम् । मैं रसोई बनानेके काममें चतुर हूँ। अपने ऊपर राजाके मनमें अत्यन्त प्रेम उत्पन्न करनेके उद्देश्यसे उनके लिये सूप (दाल, कढ़ी एवं साग आदि) तैयार करूँगा और पाककलामें भलीभाँति शिक्षा पाये हुए चतुर रसोइयोंने राजाके लिये पहले जो- जो व्यंजन बनाये होंगे, उन्हें भी अपने बनाये हुए व्यंजनोंसे तुच्छ सिद्ध कर दूँगा ॥ २३ ॥

आहरिष्यामि दारूणां निचयान् महतोऽपि च ॥ ३ ॥

यत् प्रेक्ष्य विपुलं कर्म राजा संयोक्ष्यते स माम् ।

अमानुषाणि कुर्वाणस्तानि कर्माणि भारत ॥ ४ ॥

इतना ही नहीं, मैं रसोईके लिये लकड़ियोंके बड़े - से - बड़े गट्ठोंको भी उठा लाऊँगा, जिस महान् कर्मको देखकर राजा विराट मुझे अवश्य रसोइयेके कामपर नियुक्त कर लेंगे । भारत! मैं वहाँ ऐसे - ऐसे अद्भुत कार्य करता रहूँगा, जो साधारण मनुष्योंकी शक्तिके बाहर है ॥ ३-४ ॥

राज्ञस्तस्य परे प्रेष्या मंस्यन्ते मां यथा नृपम् ।

भक्ष्यान्नरसपानानां भविष्यामि तथेश्वरः ॥ ५ ॥

इससे राजा विराटके दूसरे सेवक राजाके ही समान मेरा सम्मान करेंगे और मैं भक्ष्य, भोज्य, रस तथा पेय पदार्थोंका इच्छानुसार उपयोग करनेमें समर्थ होऊँगा ॥ ५ ॥

द्विपा वा बलिनो राजन् वृषभा वा महाबलाः ।

विनिग्राह्या यदि मया निग्रहीष्यामि तानपि ॥ ६ ॥

पृष्ठ 2129

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राजन्! बलवान् हाथी अथवा महाबली बैल भी यदि काबू में करनेके लिये मुझे सौंपे जायँगे तो मैं उन्हें भी बाँधकर अपने वशमें कर लूँगा ॥ ६ ॥

ये च केचिन्नियोत्स्यन्ति समाजेषु नियोधकाः ।

तानहं हि नियोत्स्यामि रतिं तस्य विवर्धयन् ॥ ७ ॥

तथा जो कोई भी मल्लयुद्ध करनेवाले पहलवान जनसमाजमें दंगल करना चाहेंगे, राजाका प्रेम बढ़ानेके, लिये मैं उनसे भी भिड़ जाऊँगा ॥ ७ ॥

न त्वेतान् युद्धयमानान् वै हनिष्यामि कथञ्चन ।

तथैतान् पातयिष्यामि यथा यास्यन्ति न क्षयम् ॥ ८ ॥

परंतु कुश्ती करनेवाले इन पहलवानोंको मैं किसी प्रकार जानसे नहीं मारूँगा; अपितु इस प्रकार नीचे गिराऊँगा, जिससे उनकी मृत्यु न हो ॥ ८ ॥

आरालिको गोविकर्ता सूपकर्ता नियोधकः ।

आसं युधिष्ठिरस्याहमिति वक्ष्यामि पृच्छतः ॥ ९ ॥

महाराजके पूछनेपर मैं यह कहूँगा कि मैं राजा युधिष्ठिरके यहाँ आरालिक ( मतवाले हाथियोंको भी काबूमें करनेवाला गजशिक्षक ), गोविकर्ता ( महाबली वृषभोंको भी पछाड़कर उन्हें नाथनेवाला ), सूपकर्ता ( दाल- साग आदि भाँति- भाँतिके व्यंजन बनानेवाला ) तथा नियोधक ( दंगली पहलवान) रहा हूँ ॥ ९ ॥

आत्मानमात्मना रक्षंश्चरिष्यामि विशाम्पते ।

इत्येतत् प्रतिजानामि विहरिष्याम्यहं यथा ॥ १० ॥

राजन्! अपने - आप अपनी रक्षा करते हुए मैं विराटके नगरमें विचरूँगा । मुझे विश्वास है कि इस प्रकार मैं वहाँ सुखपूर्वक रह सकूँगा ॥ १० ॥

युधिष्ठिर उवाच

यमग्निर्ब्राह्मणो भूत्वा समागच्छन्नृणां वरम् ।

दिधक्षुः खाण्डवं दावं दाशार्हसहितं पुरा ॥ ११ ॥

महाबलं महाबाहुमजितं कुरुनन्दनम् ।

सोऽयं किं कर्म कौन्तेयः करिष्यति धनंजयः ॥ १२ ॥

युधिष्ठिर बोले- जो मनुष्योंमें श्रेष्ठ महाबली और महाबाहु है, पहले भगवान् श्रीकृष्णके साथ बैठे हुए जिस अर्जुनके पास खाण्डववनको जलानेकी इच्छासे ब्राह्मणका रूप धारण करके साक्षात् अग्निदेव पधारे थे, जो कुरुकुलको आनन्द देनेवाला तथा किसीसे भी परास्त न होनेवाला है, वह कुन्तीनन्दन धनंजय विराटनगरमें कौन - सा कार्य करेगा? ॥ ११-१२ ॥

योऽयमासाद्य तं दावं तर्पयामास पावकम् ।

विजित्यैकरथेनेन्द्रं हत्वा पन्नगराक्षसान् ॥ १३ ॥

पृष्ठ 2130

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वासुकेः सर्पराजस्य स्वसारं हृतवांश्च यः ।

श्रेष्ठो यः प्रतियोधानां सोऽर्जुनः किं करिष्यति ॥ १४ ॥

जिसने खाण्डवदाहके समय वहाँ पहुँचकर एकमात्र रथका आश्रय ले इन्द्रको पराजित कर तथा नागों एवं राक्षसोंको मारकर अग्निदेवको तृप्त किया और अपने अप्रतिम सौन्दर्यसे नागराज वासुकिकी बहिन उलूपीका चित्त चुरा लिया एवं जो सम्मुख युद्ध करनेवाले वीरोंमें सबसे श्रेष्ठ है, वह अर्जुन वहाँ क्या काम करेगा? ॥ १३-१४ ॥

सूर्यः प्रतपतां श्रेष्ठो द्विपदां ब्राह्मणो वरः ।

आशीविषश्च सर्पाणामग्निस्तेजस्विनां वरः ॥ १५ ॥

आयुधानां वरं वज्रं ककुद्मी च गवां वरः ।

ह्रदानामुदधिः श्रेष्ठः पर्जन्यो वर्षतां वरः ॥ १६ ॥

धृतराष्ट्रश्च नागानां हस्तिष्वैरावणो वरः ।

पुत्रः प्रियाणामधिको भार्या च सुहृदां वरा ॥ १७ ॥

( गिरीणां प्रवरो मेरुर्देवानां मधुसूदनः । ग्रहाणां प्रवरश्चन्द्रः सरसां मानसं वरम् ॥ )

यथैतानि विशिष्टानि जात्यां जात्यां वृकोदर ।

एवं युवा गुडाकेशः श्रेष्ठः सर्वधनुष्मताम् ॥ १८ ॥

जैसे तपनेवाले तेजस्वी पदार्थोंमें सूर्य श्रेष्ठ हैं, मनुष्योंमें ब्राह्मणका स्थान ऊँचा है, जैसे सर्पोंमें आशीविष जातिवाले सर्प महान् हैं, तेजस्वियोंमें अग्नि श्रेष्ठ हैं, अस्त्र- शस्त्रोंमें वज्रका स्थान ऊँचा है, गौओंमें ऊँचे कंधेवाला साँड़ बड़ा माना गया है, जलाशयोंमें समुद्र सबसे महान् है, वर्षा करनेवाले मेघोंमें पर्जन्य श्रेष्ठ हैं, नागोंमें धृतराष्ट्र तथा हाथियोंमें ऐरावत बड़ा है, जैसे प्रिय सम्बन्धियोंमें पुत्र सबसे अधिक प्रिय है और अकारण हित चाहनेवाले सुहृदोंमें धर्मपत्नी सबसे बढ़कर है, जैसे पर्वतोंमें मेरु श्रेष्ठ है, देवताओंमें मधुसूदन भगवान् विष्णु श्रेष्ठ हैं, ग्रहोंमें चन्द्रमा श्रेष्ठ हैं और सरोवरोंमें मानसरोवर श्रेष्ठ है । भीमसेन! अपनी - अपनी जातिमें जिस प्रकार ये पूर्वोक्त वस्तुएँ विशिष्ट मानी गयी हैं, वैसे ही सम्पूर्ण धनुर्धारियोंमें युवावस्थासे सम्पन्न यह गुडाकेश (निद्राविजयी ) अर्जुन श्रेष्ठ है ॥ १५–१८ ॥

सोऽयमिन्द्रादनवरो वासुदेवान्महाद्युतिः ।

गाण्डीवधन्वा बीभत्सुः श्वेताश्वः किं करिष्यति ॥ १ ९ ॥

यह देवराज इन्द्र और भगवान् श्रीकृष्णसे किसी बातमें कम नहीं है । श्वेत घोड़ोंवाले रथपर चलनेवाला यह महातेजस्वी गाण्डीवधारी बीभत्सु ( अर्जुन ) वहाँ कौन -सा कार्य करेगा? ॥ १ ९ ॥ उषित्वा पञ्ज वर्षाणि सहस्राक्षस्य वेश्मनि ।

अस्त्रयोगं समासाद्य स्ववीर्यान्मानुषाद्भुतम् ।

दिव्यान्यस्त्राणि चाप्तानि देवरूपेण भास्वता ॥ २० ॥