श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 2131–2140
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2131–2140
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इसने पाँच वर्षोंतक देवराज इन्द्रके भवनमें रहकर ऐसे दिव्यास्त्र प्राप्त किये हैं, जिनका मनुष्योंमें होना एक अद्भुत- सी बात है । अपने देवोपम स्वरूपसे प्रकाशित होनेवाले अर्जुनने अनेक दिव्यास्त्र पाये हैं ॥ २० ॥
यं मन्ये द्वादशं रुद्रमादित्यानां त्रयोदशम् ।
वसूनां नवमं मन्ये ग्रहाणां दशमं तथा ॥ २१ ॥
जिस अर्जुनको मैं बारहवाँ रुद्र और तेरहवाँ आदित्य मानता हूँ, नवम वसु तथा दसवाँ ग्रह स्वीकार करता हूँ ॥ २१ ॥
यस्य बाहू समौ दीर्घौ ज्याघातकठिनत्वचौ ।
दक्षिणे चैव सव्ये च गवामिव वहः कृतः ॥ २२ ॥
जिसकी दोनों भुजाएँ एक- सी विशाल हैं; प्रत्यंचाके आघातसे उनकी त्वचा कठोर हो गयी है । जैसे बैलोंके कंधोंपर जुआठेकी रगड़से चिह्न बन जाता है, उसी प्रकार जिसकी दाहिनी और बायीं भुजाओंपर प्रत्यंचाकी रगड़से चिह्न बन गये हैं ॥ २२ ॥
हिमवानिव शैलानां समुद्रः सरितामिव ।
त्रिदशानां यथा शक्रो वसूनामिव हव्यवाट् ॥ २३ ॥
मृगाणामिव शार्दूलो गरुडः पततामिव ।
वरः संनह्यमानानां सोऽर्जुनः किं करिष्यति ॥ २४ ॥
जैसे पर्वतोंमें हिमालय, सरिताओंमें समुद्र, देवताओंमें इन्द्र, वसुओंमें हव्यवाहक अग्नि, मृगोंमें सिंह तथा पक्षियोंमें गरुड़ श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार कवचधारी वीरोंमें जिसका स्थान सबसे ऊँचा है, वह अर्जुन विराटनगरमें जाकर क्या काम करेगा? ॥ २३-२४ ॥ अर्जुनउवाच
प्रतिज्ञां षण्ढकोऽस्मीति करिष्यामि महीपते ।
ज्याघातौ हि महान्तौ मे संवर्तुं नृप दुष्करौ ॥। २५ ॥
वलयैश्छादयिष्यामि बाहू किणकृताविमौ । अर्जुनने कहा – महाराज! मैं राजाकी सभामें यह दृढ़तापूर्वक कहूँगा कि मैं षण्ढक (नपुंसक ) हूँ। राजन्! यद्यपि मेरी दायीं बायीं भुजाओंमें धनुषकी डोरीकी रगड़से जो महान् चिह्न बन गये हैं, उन्हें छिपाना बहुत कठिन है तथापि कंगन आदि आभूषणोंसे मैं इन ज्याघातचिह्नित भुजाओंको ढक लूँगा ॥ २५६ ॥
कर्णयोः प्रतिमुच्याहं कुण्डले ज्वलनप्रभे ॥ २६ ॥
पिनद्धकम्बुः पाणिभ्यां तृतीयां प्रकृतिं गतः ।
वेणीकृतशिरा राजन् नाम्ना चैव बृहन्नला ॥ २७ ॥
मैं दोनों कानोंमें अग्निके समान कान्तिमान् कुण्डल पहनकर हाथोंमें शंखकी चूड़ियाँ धारण कर लूँगा । इस प्रकार तीसरी प्रकृति ( नपुंसकभाव) - को अपनाकर सिरपर चोटी गूँथ
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लूँगा और अपनेको बृहन्नला नामसे घोषित करूँगा ॥ २६-२७ ॥
पठन्नाख्यायिकाश्चैव स्त्रीभावेन पुनः पुनः ।
रमयिष्ये महीपालमन्यांश्चान्तःपुरे जनान् ॥ २८ ॥
स्त्रीभावसे अपने स्वरूपको छिपाकर बारंबार पूर्ववर्ती राजाओंके चरित्रोंका गान करके महाराज विराट तथा अन्तःपुरकी अन्यान्य स्त्रियोंका मनोरंजन करूँगा ॥
गीतं नृत्यं विचित्रं च वादित्रं विविधं तथा ।
शिक्षयिष्याम्यहं राजन् विराटस्य पुरस्त्रियः ॥ २ ९ ॥
राजन्! मैं विराटनगरकी स्त्रियोंको गीत गाने, विचित्र ढंगसे नृत्य करने तथा भाँति-भाँतिके बाजे बजानेकी शिक्षा दूँगा ॥ २ ९ ॥
प्रजानां समुदाचारं बहु कर्म कृतं वदन् ।
छादयिष्यामि कौन्तेय माययाऽऽत्मानमात्मना ॥ ३० ॥
कुन्तीनन्दन! प्रजाजनोंके उत्तम आचार-विचार और उनके किये हुए अनेक प्रकारके सत्कर्मोंका वर्णन करता हुआ मैं मायामय नपुंसकवेशसे बुद्धिद्वारा अपने यथार्थ स्वरूपको छिपाये रखूँगा ॥ ३० ॥
युधिष्ठिरस्य गेहे वै द्रौपद्याः परिचारिका ।
उषितास्मीति वक्ष्यामि पृष्टो राज्ञा च पाण्डव ॥ ३१ ॥
पाण्डुनन्दन! यदि राजा विराटने मेरा परिचय पूछा, तो मैं कह दूँगा कि मैं महाराज युधिष्ठिरके घरमें महारानी द्रौपदीकी परिचारिका रह चुकी हूँ ॥ ३१ ॥
एतेन विधिना छन्नः कृतकेन यथानलः ।
विहरिष्यामि राजेन्द्र विराटभवने सुखम् ॥ ३२ ॥
राजेन्द्र! इस प्रकार कृत्रिम वेशभूषासे राखमें छिपी हुई अग्निके समान अपनेको छिपाकर मैं विराटके महलमें सुखपूर्वक निवास करूँगा ॥ ३२ ॥
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि पाण्डवप्रवेशपर्वणि युधिष्ठिरादिमन्त्रणे द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत पाण्डवप्रवेशपर्वमें युधिष्ठिर आदिकी मन्त्रणाविषयक दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ३३ श्लोक हैं । ) १. पुरोगु कहते हैं वायुको, उसके पुत्र होनेसे भीमसेनका ' पौरोगव ' नाम सत्य एवं सार्थक है । २. बल्लवका अर्थ है सूपकर्ता अर्थात् रसोइया । रसोईके काममें निपुण होनेसे उनका यह नाम यथार्थ ही है ।
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तृतीयोऽध्यायः नकुल, सहदेव तथा द्रौपदीद्वारा अपने - अपने भावी कर्तव्योंका दिग्दर्शन वैशम्पायन उवाच इत्येवमुक्त्वा पुरुषप्रवीर- स्तथार्जुनो धर्मभृतां वरिष्ठः । वाक्यं तथासौ विरराम भूयो नृपोऽपरं भ्रातरमाबभाषे ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ तथा पुरुषोंमें महान् वीर
अर्जुन इस प्रकार कहकर चुप हो गये । तब राजा युधिष्ठिर पुनः दूसरे भाईसे बोले ॥
युधिष्ठिर उवाच किं त्वं नकुल कुर्वाणस्तत्र तात चरिष्यसि ।
कर्म तत् त्वं समाचक्ष्व राज्ये तस्य महीपतेः ।
सुकुमारश्च शूरश्च दर्शनीयः सुखोचितः ॥ २ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— नकुल! तुम राजा विराटके राज्यमें कौन- सा कार्य करते हुए निवास करोगे? वह कार्य बताओ । तात! तुम तो शूरवीर होनेके साथ ही अत्यन्त सुकुमार, परम दर्शनीय और सर्वथा सुख भोगनेके ही योग्य हो ॥ २ ॥
नकुलउवाच
अश्वबन्धो भविष्यामि विराटनृपतेरहम् ।
सर्वथा ज्ञानसम्पन्नः कुशलः परिरक्षणे ॥ ३ ॥
नकुल बोले- राजन्! मैं राजा विराटके यहाँ अश्वबन्ध (घोड़ोंको वशमें करनेवाला सवार) होकर रहूँगा । मैं अश्वविज्ञानसे सम्पन्न और घोड़ोंकी रक्षाके कार्यमें कुशल हूँ ॥ ३ ॥
ग्रन्थिको नाम नाम्नाहं कर्मैतत् सुप्रियं मम ।
कुशलोऽस्म्यश्वशिक्षायां तथैवाश्वचिकित्सने ।
प्रियाश्च सततं मेऽश्वाः कुरुराज यथा तव ॥ ४ ॥
मैं राजसभामें ग्रन्थिक नामसे अपना परिचय दूँगा । घोड़ोंकी देखभालका काम मुझे अत्यन्त प्रिय है । उन्हें भाँति- भाँतिकी चालें सिखाने और उनकी चिकित्सा करनेमें भी मैं निपुण हूँ । कुरुराज! आपकी ही भाँति मुझे भी घोड़े सदैव प्रिय रहे हैं * ॥ ४ ॥
ये मामामन्त्रयिष्यन्ति विराटनगरे जनाः ।
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तेभ्य एवं प्रवक्ष्यामि विहरिष्याम्यहं यथा ॥ ५ ॥
पाण्डवेन पुरा तात अश्वेष्वधिकृतः पुरा ।
विराटनगरे छन्नश्चरिष्यामि महीपते ॥ ६ ॥
विराटनगरमें जो लोग मुझसे पूछेंगे, उन्हें मैं इस प्रकार उत्तर दूँगा-' तात! पहले पाण्डुनन्दन राजा युधिष्ठिरने मुझे अश्वोंका अध्यक्ष बनाकर रख रखा था । ' महीपते! मैं जिस प्रकार वहाँ विहार करूँगा, वह सब मैंने आपको बता दिया । राजा विराटके नगरमें अपनेको छिपाये रखकर ही मैं सर्वत्र विचरूँगा ॥ ५-६ ॥ युधिष्ठिर उवाच
सहदेव कथं तस्य समीपे विहरिष्यसि ।
किं वा त्वं कर्म कुर्वाणः प्रच्छन्नो विहरिष्यसि ॥ ७ ॥
युधिष्ठिरने सहदेवसे पूछा- भैया सहदेव! तुम राजा विराटके समीप कैसे जाओगे उनके यहाँ क्या काम करते हुए गुप्तरूपसे निवास करोगे? ॥ ७ ॥
सहदेव उवाच
गोसंख्याता भविष्यामि विराटस्य महीपतेः ।
प्रतिषेद्धा च दोग्धा च संख्याने कुशलो गवाम् ॥ ८ ॥
सहदेवने कहा — महाराज! मैं राजा विराटके यहाँ गौओंकी गिनती- जाँच- पड़ताल करनेवाला गो - शालाध्यक्ष होकर रहूँगा । मैं गौओंको नियन्त्रणमें रखने और दुहनेका काम अच्छी तरह जानता हूँ । उन्हें गिनने और उनकी परख-पहचानके काममें भी कुशल हूँ ॥ ८ ॥
तन्तिपाल इति ख्यातो नाम्नाहं विदितस्त्वथ ।
निपुणं च चरिष्यामि व्येतु ते मानसो ज्वरः ॥ ९ ॥
मैं वहाँ तन्तिपाल नामसे प्रसिद्ध होऊँगा । इसी नामसे मुझे सब लोग जानेंगे । मैं बड़ी चतुराईसे अपनेको छिपाये रखकर वहाँ सब ओर विचरूँगा; अतः मेरे विषयमें आपकी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिये ॥ ९ ॥
( अरोगा बहुलाः पुष्टाः क्षीरवत्यो बहुप्रजाः ।
निष्पन्नसत्त्वाः सुभृता व्यपेतज्वरकिल्बिषाः ॥
नष्टचोरभया नित्यं व्याधिव्याघ्रविवर्जिताः ।
गावश्च सुसुखा राजन् निरुद्विग्ना निरामयाः ॥
भविष्यन्ति मया गुप्ता विराटपशवो नृप ॥ ) राजन्! मेरे द्वारा रक्षित होकर राजा विराटके पशु तथा गौएँ नीरोग, संख्यामें अधिक, हृष्ट- पुष्ट, अधिक दूध देनेवाली, बहुत संतानोंवाली, सत्त्वयुक्त, अच्छी तरह सम्हाल होनेसे
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रोगरूप पापसे रहित, चोरोंके भयसे मुक्त तथा सदा व्याधि एवं बाघ आदिके भयसे रक्षित होंगी । महाराज! वे उद्वेगरहित, सुखी और निरामय तो होंगी ही ।
अहं हि सततं गोषु भवता प्रहितः पुरा ।
तत्र मे कौशलं सर्वमवबुद्धं विशाम्पते ॥ १० ॥
भूपाल! पहले आपने मुझे सदा गौओंकी देखभालके कार्यमें नियुक्त किया है । इस कार्यमें मैं कितना दक्ष हूँ, यह सब आपको विदित ही है ॥ १० ॥
लक्षणं चरितं चापि गवां यच्चापि मङ्गलम् ।
तत् सर्वं मे सुविदितमन्यच्चापि महीपते ॥ ११ ॥
वृषभानपि जानामि राजन् पूजितलक्षणान् ।
येषां मूत्रमुपाघ्राय अपि वन्ध्या प्रसूयते ॥ १२ ॥
महीपते! गौओंके जो लक्षण और चरित्र मंगल - कारक होते हैं, वे सब मुझे भलीभाँति मालूम हैं। उनके विषयमें और भी बहुत - सी बातें मैं जानता हूँ । राजन्! इसके सिवा मैं ऐसे प्रशंसनीय लक्षणोंवाले साँड़ोंको भी जानता हूँ, जिनके मूत्रको सूँघ लेनेमात्रसे वन्ध्या स्त्री भी गर्भवती हो सकती है ॥ ११-१२ ॥
सोऽहमेवं चरिष्यामि प्रीतिरत्र हि मे सदा ।
न च मां वेत्स्यते कश्चित् तोषयिष्ये च पार्थिवम् ॥ १३ ॥
इस प्रकार मैं गौओंकी सेवा करूँगा । इस कार्यमें मुझे सदासे प्रेम रहा है । वहाँ मुझे कोई पहचान नहीं सकेगा । मैं अपने कार्यसे राजा विराटको संतुष्ट कर लूँगा ॥ १३ ॥
युधिष्ठिर उवाच
इयं हि नः प्रिया भार्या प्राणेभ्योऽपि गरीयसी ।
मातेव परिपाल्या च पूज्या ज्येष्ठेव च स्वसा ॥ १४ ॥
केन स्म द्रौपदी कृष्णा कर्मणा विचरिष्यति ।
न हि किञ्चिद् विजानाति कर्म कर्तुं यथा स्त्रियः ॥ १५ ॥
युधिष्ठिर बोले — यह द्रुपदकुमारी कृष्णा हमलोगोंकी प्यारी भार्या है । इसका गौरव हमारे लिये प्राणोंसे भी बढ़कर है । यह माता ( पृथ्वी ) - की भाँति पालन करनेयोग्य तथा बड़ी बहन ( धेनु ) -के समान आदरणीय है । यह तो दूसरी स्त्रियोंकी भाँति कोई काम- काज भी नहीं जानती; फिर वहाँ किस कर्मका आश्रय लेकर निवास करेगी? ॥ १४-१५ ॥
सुकुमारी च बाला च राजपुत्री यशस्विनी ।
पतिव्रता महाभागा कथं नु विचरिष्यति ॥ १६ ॥
इसका शरीर अत्यन्त सुकुमार है । इसकी अवस्था नयी है । यह यशस्विनी राजकुमारी
परम सौभाग्यवती तथा पतिव्रता है । भला, यह विराटनगरमें किस प्रकार रहेगी? ॥ १६ ॥
माल्यगन्धानलङ्कारान् वस्त्राणि विविधानि च ।
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एतान्येवाभिजानाति यतो जाता हि भामिनी ॥ १७ ॥
इस भामिनीने जबसे जन्म लिया है, तबसे अबतक माला, सुगन्धित पदार्थ, भाँति- भाँतिके गहने तथा अनेक प्रकारके वस्त्रोंको ही जाना है । इसने कभी कष्टका अनुभव नहीं किया है ॥ १७ ॥
द्रौपद्युवाच
सैरन्ध्र्यो रक्षिता लोके भुजिष्याः सन्ति भारत ।
नैवमन्याः स्त्रियो यान्ति इति लोकस्य निश्चयः ॥
साहं ब्रुवाणा सैरन्ध्री कुशला केशकर्मणि ॥ १८ ॥
युधिष्ठिरस्य गेहे वै द्रौपद्याः परिचारिका ।
उषितास्मीति वक्ष्यामि पृष्टा राज्ञा च भारत ॥ १ ९ ॥
द्रौपदीने कहा— भारत! इस जगत् में बहुत- सी ऐसी स्त्रियाँ हैं, जिनका दूसरोंके घरोंमें पालन होता है और जो शिल्पकर्मोंद्वारा जीवननिर्वाह करती हैं । वे अपने सदाचारसे स्वतः सुरक्षित होती हैं । ऐसी स्त्रियोंको सैरन्ध्री कहते हैं । लोगोंको अच्छी तरह मालूम है कि सैरन्ध्रीकी भाँति दूसरी स्त्रियाँ बाहरकी यात्रा नहीं करतीं, [ अतः सैरन्ध्रीके वेशमें मुझे कोई पहचान नहीं सकेगा। ] इसलिये मैं सैरन्ध्री कहकर अपना परिचय दूँगी । बालोंको सँवारने और वेणी-र-रचना आदिके कार्योंमें मैं बहुत निपुण हूँ । यदि राजा मुझसे पूछेंगे, तो कह दूँगी कि ' मैं महाराज युधिष्ठिरके महलमें महारानी द्रौपदीकी परिचारिका बनकर रही हूँ' ॥ १८-१९ ॥ आत्मगुप्ता चरिष्यामि यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ २० ॥
सुदेष्णां प्रत्युपस्थास्ये राजभार्यां यशस्विनीम् ।
सा रक्षिष्यति मां प्राप्तां मा भूत् ते दुःखमीदृशम् ॥ २१ ॥
मैं अपनी रक्षा स्वयं कर लूँगी। आप जो मुझसे पूछते हैं कि तुम वहाँ क्या करोगी? कैसे रहोगी? उसके उत्तरमें निवेदन है कि मैं यशस्विनी राजपत्नी सुदेष्णाके पास जाऊँगी । मुझे अपने पास आयी हुई जानकर वे रख लेंगी और सब प्रकारसे मेरी रक्षा करेंगी । अतः आपके मनमें इस बातका दुःख नहीं होना चाहिये कि द्रौपदी कैसे सुरक्षित रह सकेगा ॥ २०-२१ ॥ युधिष्ठिरउवाच
कल्याणं भाषसे कृष्णे कुले जातासि भामिनि ।
न पापमभिजानासि साध्वी साधुव्रते स्थिता ॥ २२ ॥
युधिष्ठिर बोले – कृष्णे! तुमने भली बात कही, इसमें कल्याण ही भरा है । क्यों न हो, तुम ऊँचे कुलमें उत्पन्न जो हुई हो! भामिनि! तुम्हें पापका रंचमात्र भी ज्ञान नहीं है । तुम साध्वी हो और उत्तम व्रतके पालनमें तत्पर रहती हो ॥ २२ ॥
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यथा न दुर्हृदः पापा भवन्ति सुखिनः पुनः ।
कुर्यास्तत् त्वं हि कल्याणि लक्षयेयुर्न ते तथा ॥ २३ ॥
कल्याणि! वहाँ ऐसा बर्ताव करना, जिससे वे पापी शत्रु फिर सुखी होनेका अवसर न पा सकें; वे तुम्हें किसी तरह पहचान न सकें ॥ २३ ॥
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि पाण्डवप्रवेशपर्वणि युधिष्ठिरादिमन्त्रणे तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत पाण्डवप्रवेशपर्वमें युधिष्ठिर आदिकी परस्पर मन्त्रणाविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल २५३ श्लोक हैं। ) १. इस प्रसंगमें अर्जुनने अपनेको षण्ढक और बृहन्नला कहा है । षण्ढक शब्दका अर्थ है नपुंसक। अर्जुन इस समय उर्वशीके शापसे नपुंसक हो गये थे । बृहन्नलाका मूल शब्द बृहन्नल है । विद्वानोंने ' र' और ' ल ' को एक - सा माना है; अतः बृहन्नलका अर्थ बृहन्नर अर्थात् श्रेष्ठ या महान् मानव है । भगवान् नारायणके सखा होनेके कारण अर्जुन नरश्रेष्ठ हैं ही । २. परिचारिकाका एक अर्थ है सेविका और दूसरा अर्थ है सब ओर विचरण करनेवाली । इस प्रकार अर्जुनने गूढ़ अभिप्राययुक्त परिचारिका शब्दद्वारा अपनेको द्रौपदीका पति सूचित किया है । * नकुलने अपना नाम ग्रन्थिक बताया और अपनेको अश्वोंका अधिकारी कहा है । ग्रन्थिकका अर्थ है आयुर्वेद तथा अध्वर्युविद्यासम्बन्धी ग्रन्थोंको जाननेवाला । श्रुतिमें अश्विनीकुमारोंको देवताओंका वैद्य तथा अध्वर्यु कहा गया है । ‘ अश्विनौ वै देवाना भिषजावश्विनावध्वर्यू' । नकुल अश्विनीकुमारोंके पुत्र हैं; अतः उनका अपनेको ग्रन्थिक कहना उपयुक्त ही है । ‘ नास्ति श्वो येषां ते अश्वाः ' जिनके कलतक जीवित रहनेकी आशा न हो, वे अश्व हैं - इस व्युत्पत्तिके अनुसार जीवनकी आशा छोड़कर युद्धमें डटे रहनेवाले वीरोंको अश्व कहते हैं । नकुल उनके अधिकारी अर्थात् वीरोंमें प्रधान हैं । अतः उनका यह परिचय यथार्थ ही है । * ‘ तस्य वाक्तन्तिर्नामानि दामानि' इस श्रुतिके अनुसार तन्ति शब्द वाणीका वाचक है । तन्तिपाल कहकर सहदेवने गूढ़रूपसे युधिष्ठिरको यह बताया कि मैं आपकी प्रत्येक आज्ञाका पालन करूँगा । साधारण लोगोंकी दृष्टिमें तन्तिपालका अर्थ है, बैलोंको बाँधनेकी रस्सीको सुरक्षित रखनेवाला । अतः सहदेवने भी अपना परिचय यथार्थ ही दिया ।
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चतुर्थोऽध्यायः धौम्यका पाण्डवोंको राजाके यहाँ रहनेका ढंग बताना और सबका अपने -अपने अभीष्ट स्थानोंको जाना युधिष्ठिर उवाच
कर्माण्युक्तानि युष्माभिर्यानि यानि करिष्यथ ।
मम चापि यथा बुद्धिरुचिता विधिनिश्चयात् ॥ १ ॥
युधिष्ठिर बोले – विराटके यहाँ रहकर तुम्हें जो - जो कार्य करने हैं, वे सब तुमने बताये । मुझे भी अपनी बुद्धिके अनुसार जो कार्य उचित प्रतीत हुआ, वह कह चुका । जान पड़ता है, विधाताका यही निश्चय है ॥ १ ॥
पुरोहितोऽयमस्माकमग्निहोत्राणि रक्षतु ।
सूदपौरोगवैः सार्द्धं द्रुपदस्य निवेशने ॥ २ ॥
इन्द्रसेनमुखाश्चेमे रथानादाय केवलान् ।
यान्तु द्वारवतीं शीघ्रमिति मे वर्तते मतिः ॥ ३ ॥
अब मेरी सलाह यह है कि ये पुरोहित धौम्यजी रसोइयों तथा पाकशालाध्यक्षके साथ राजा द्रुपदके घर जाकर रहें और वहाँ हमारे अग्निहोत्रकी अग्नियोंकी रक्षा करें तथा ये इन्द्रसेन आदि सेवकगण केवल रथोंको लेकर शीघ्र यहाँसे द्वारकाको चले जायँ ॥ २-३ ॥
इमाश्च नार्यो द्रौपद्याः सर्वाश्च परिचारिकाः ।
पाञ्जालानेव गच्छन्तु सूदपौरोगवैः सह ॥ ४ ॥
और ये जो द्रौपदीकी सेवा करनेवाली स्त्रियाँ हैं, वे सब रसोइयों और पाकशालाध्यक्ष साथ पांचालदेशको ही चली जायँ ॥ ४ ॥
सर्वैरपि च वक्तव्यं न प्राज्ञायन्त पाण्डवाः ।
गता ह्यस्मानपाहाय सर्वे द्वैतवनादिति ॥ ५ ॥
वहाँ सब लोग यही कहें - ' हमें पाण्डवोंका कुछ भी पता नहीं है । वे सब द्वैतवनसे ही हमें छोड़कर न जाने कहाँ चले गये ' ॥ ५ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं तेऽन्योन्यमामन्त्र्य कर्माण्युक्त्वा पृथक् पृथक् ।
धौम्यमामन्त्रयामासुः स च तान् मन्त्रमब्रवीत् ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! इस प्रकार आपसमें एक- दूसरेकी सलाह लेकर और अपने पृथक् - पृथक् कर्म बतलाकर पाण्डवोंने पुरोहित धौम्यकी भी सम्मति ली । तब पुरोहित धौम्यने उन्हें इस प्रकार सलाह दी ॥ ६ ॥
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धौम्य उवाच
विहितं पाण्डवाः सर्वं ब्राह्मणेषु सुहृत्सु च ।
याने प्रहरणे चैव तथैवाग्निषु भारत ॥ ७ ॥
त्वया रक्षा विधातव्या कृष्णायाः फाल्गुनेन च ।
विदितं वो यथा सर्वं लोकवृत्तमिदं तव ॥ ८ ॥
धौम्यजी बोले – पाण्डवो! ब्राह्मणों, सुहृदों, सवारी या युद्ध यात्रा, आयुध या युद्ध तथा अग्नियोंके प्रति जो शास्त्रविहित कर्तव्य हैं, उन्हें तुम अच्छी तरह जानते हो और तदनुकूल तुमने जो व्यवस्था की है, वह सब ठीक है । भारत! अब मैं तुमसे यह कहना चाहता हूँ कि तुम और अर्जुन सावधान रहकर सदा द्रौपदीकी रक्षा करना । लोकव्यवहारकी सभी बातें अथवा साधारण लोगोंके व्यवहार तुम सब लोगोंको विदित हैं ॥ ७-८ ॥
विदिते चापि वक्तव्यं सुहृद्भिरनुरागतः ।
एष धर्मश्च कामश्च अर्थश्चैव सनातनः ॥ ९ ॥
विदित होनेपर भी हितैषी सुहृदोंका कर्तव्य है कि वे स्नेहवश हितकी बात बतावें । यही सनातन धर्म है और इसीसे काम एवं अर्थकी प्राप्ति होती है ॥ ९ ॥
अतोऽहमपि वक्ष्यामि हेतुमत्र निबोधत ।
हन्तेमां राजवसतिं राजपुत्रा ब्रवीम्यहम् ॥ १० ॥
यथा राजकुलं प्राप्य सर्वान् दोषांस्तरिष्यथ ।
दुर्वसं चैव कौरव्य जानता राजवेश्मनि ॥ ११ ॥
इसलिये मैं भी जो युक्तियुक्त बातें बताऊँगा, उन्हें यहाँ ध्यान देकर सुनो । राजपुत्रो! मैं यह बता रहा हूँ कि राजाके घरमें रहकर कैसा बर्ताव करना चाहिये? उसके अनुसार राजकुलमें रहते हुए भी तुमलोग वहाँके सब दोषोंसे पार हो जाओगे । कुरुनन्दन! विवेकी पुरुषके लिये भी राजमहलमें निवास करना अत्यन्त कठिन है ॥ १०-११ ॥
अमानितैर्मानितैर्वा अज्ञातैः परिवत्सरम् ।
ततश्चतुर्दशे वर्षे चरिष्यथ यथासुखम् ॥ १२ ॥
वहाँ तुम्हारा अपमान हो या सम्मान, सब कुछ सहकर एक वर्षतक अज्ञातभावसे रहना चाहिये । तदनन्तर चौदहवें वर्षमें तुमलोग अपनी इच्छाके अनुसार सुखपूर्वक विचरण कर सकोगे ॥ १२ ॥
दृष्टद्वारो लभेद् द्रष्टुं राजस्वेषु न विश्वसेत् ।
तदेवासनमन्विच्छेद् यत्र नाभिपतेत् परः ॥ १३ ॥
राजासे मिलना हो, तो पहले द्वारपालसे मिलकर राजाको सूचना देनी चाहिये और
मिलनेके लिये उनकी आज्ञा मँगा लेनी चाहिये । इन राजाओंपर पूर्ण विश्वास कभी न करे ।
अपने लिये वही आसन पसंद करे, जिसपर दूसरा कोई बैठनेवाला न हो ॥ १३ ॥
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यो न यानं न पर्यङ्कं न पीठं न गजं रथम् ।
आरोहेत् सम्मतोऽस्मीति स राजवसतिं वसेत् ॥ १४ ॥
जो ' मैं राजाका प्रिय व्यक्ति हूँ', यों मानकर कभी राजाकी सवारी, पलंग, पादुका, हाथी एवं रथ आदिपर नहीं चढ़ता है, वही राजाके घरमें कुशलपूर्वक रह सकता है ॥ १४ ॥
यत्र यत्रैनमासीनं शङ्केरन् दुष्टचारिणः ।
न तत्रोपविशेद् यो वै स राजवसतिं वसेत् ॥ १५ ॥
जिन- जिन स्थानोंपर बैठनेसे दुराचारी मनुष्य संदेह करते हों, वहाँ-वहाँ जो कभी नहीं बैठता, वही राजभवनमें रह सकता है ॥ १५ ॥
न चानुशिष्याद् राजानमपृच्छन्तं कदाचन ।
तूष्णीं त्वेनमुपासीत काले समभिपूजयेत् ॥ १६ ॥
बिना पूछे राजाको कभी कर्तव्यका उपदेश न दे । मौनभावसे ही उसकी सेवा करे और उपयुक्त अवसरपर राजाकी प्रशंसा भी करे ॥ १६ ॥
असूयन्ति हि राजानो जनाननृतवादिनः ।
तथैव चावमन्यन्ते मन्त्रिणं वादिनं मृषा ॥ १७ ॥