श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 2141–2150
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2141–2150
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झूठ बोलनेवाले मनुष्योंके प्रति राजालोग दोषदृष्टि कर लेते हैं। इसी प्रकार वे मिथ्यावादी मन्त्रीका भी अपमान करते हैं ॥ १७ ॥
नैषां दारेषु कुर्वीत मैत्रीं प्राज्ञः कदाचन ।
अन्तःपुरचरा ये च द्वेष्टि यानहिताश्च ये ॥ १८ ॥
बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह राजाओंकी रानियोंसे मेल- जोल न करे और जो रनिवासमें आते - जाते हों, राजा जिनसे द्वेष रखते हों तथा जो लोग राजाका अहित चाहनेवाले हों, उनसे भी मैत्री स्थापित न करे ॥
विदिते चास्य कुर्वीत कार्याणि सुलघून्यपि ।
एवं विचरतो राज्ञि न क्षतिर्जायते क्वचित् ॥ १ ९ ॥
छोटे - से - छोटे कार्य भी राजाको जनाकर ही करे । राजदरबारमें ऐसा आचरण करनेवाले मनुष्योंको कभी हानि नहीं उठानी पड़ती ॥ १ ९ ॥
गच्छन्नपि परां भूमिमपृष्टो ह्यनियोजितः ।
जात्यन्ध इव मन्येत मर्यादामनुचिन्तयन् ॥ २० ॥
बैठनेके लिये अपनेको ऊँचा आसन प्राप्त होता हो, तो भी जबतक राजा न पूछें— बैठनेका आदेश न दें, तबतक राजदरबारकी मर्यादाका खयाल करके अपनेको जन्मान्ध-सा माने, मानो उस आसनको वह देखता ही न हो । इस भावसे खड़ा रहकर राजाज्ञाकी प्रतीक्षा करता रहे ॥ २० ॥
न हि पुत्रं न नप्तारं न भ्रातरमरिंदमाः ।
समतिक्रान्तमर्यादं पूजयन्ति नराधिपाः ॥ २१ ॥
क्योंकि शत्रुविजयी राजालोग मर्यादाका उल्लंघन करनेवाले अपने पुत्र, नाती - पोते और भाईका भी आदर नहीं करते ॥ २१ ॥
यत्नाच्चोपचरेदेनमग्निवद् देववत् त्विह ।
अनृतेनोपचीर्णो हि हन्यादेव न संशयः ॥ २२ ॥
इस जगत्में राजाको अग्निके समान दाहक मानकर उसके अत्यन्त निकट न रहे और देवताके समान निग्रह तथा अनुग्रहमें समर्थ जानकर उसकी कभी अवहेलना न करे । इस प्रकार यत्नपूर्वक उसकी परिचर्यामें संलग्न रहे । इसमें संदेह नहीं कि जो मिथ्या एवं कपटपूर्ण उपचारके द्वारा राजाकी सेवा करता है, वह एक दिन अवश्य उसके हाथसे मारा जाता है ॥ २२ ॥
यद् यद् भर्तानुयुञ्जीत तत् तदेवानुवर्तयेत् ।
प्रमादमवलेपं च कोपं च परिवर्जयेत् ॥ २३ ॥
राजा जिस - जिस कार्यके लिये आज्ञा दे, उसीका पालन करे । लापरवाही, घमंड और क्रोधको सर्वथा त्याग दे ॥ २३ ॥
समर्थनासु सर्वासु हितं च प्रियमेव च ।
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संवर्णयेत् तदेवास्य प्रियादपि हितं भवेत् ॥ २४ ॥
कर्तव्य और अकर्तव्यके निर्णयके सभी अवसरोंपर हितकारक और प्रिय वचन कहे । यदि दोनों सम्भव न हों, तो प्रिय वचनका त्याग करके भी जो हितकारक हो, वही बात कहे ( हितविरोधी प्रिय वचन कदापि न कहे ) ॥ २४ ॥
अनुकूलो भवेच्चास्य सर्वार्थेषु कथासु च ।
अप्रियं चाहितं यत् स्यात् तदस्मै नानुवर्णयेत् ॥ २५ ॥
सभी विषयों तथा सब बातोंमें राजाके अनुकूल रहे । कथावार्तामें भी राजाके सामने ऐसी बातोंकी बार - बार चर्चा न करे, जो उसे अप्रिय एवं अहितकर प्रतीत होती हों ॥ २५ ॥
नाहमस्य प्रियोऽस्मीति मत्वा सेवेत पण्डितः ।
अप्रमत्तश्च सततं हितं कुर्यात् प्रियं च यत् ॥ २६ ॥
विद्वान् पुरुष ‘ मैं राजाका प्रिय व्यक्ति नहीं हूँ ', ऐसा मानता हुआ सदा सावधान रहकर उसकी सेवा करे । राजाके लिये जो हितकर और प्रिय हो, वही कार्य करे ॥ २६ ॥
नास्यानिष्टानि सेवेत नाहितैः सह संवदेत् ।
स्वस्थानान्न विकम्पेत स राजवसतिं वसेत् ॥ २७ ॥
जो चीज राजाको पसंद न हो, उसका कदापि सेवन न करे । उसके शत्रुओंसे बातचीत न करे और अपने स्थानसे कभी विचलित न हो । ऐसा बर्ताव करनेवाला मनुष्य ही राजाके यहाँ सकुशल रह सकता है ॥ २७ ॥
दक्षिणं वाथ वामं वा पार्श्वमासीत पण्डितः ।
रक्षिणां ह्यात्तशस्त्राणां स्थानं पश्चात् विधीयते ॥ २८ ॥
विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह राजाके दाहिने या बायें भागमें बैठे; क्योंकि राजाके पीछे अस्त्र- शस्त्रधारी अंगरक्षक सैनिकोंका स्थान होता है ॥ २८ ॥
नित्यं हि प्रतिषिद्धं तु पुरस्तादासनं महत् ।
न च संदर्शने किञ्चित् प्रवृत्तमपि संजयेत् ॥ २ ९ ॥
राजाके सामने किसीके लिये भी ऊँचा आसन लगाना सर्वथा निषिद्ध है । उसकी आँखोंके सामने यदि कोई पुरस्कार वितरण या वेतनदान आदिका कार्य हो रहा हो, तो उसमें बिना बुलाये स्वयं पहले लेनेकी चेष्टा नहीं करनी चाहिये ॥ २ ९ ॥
अपि ह्येतद् दरिद्राणां व्यलीकस्थानमुत्तमम् ।
न मृषाभिहितं राज्ञां मनुष्येषु प्रकाशयेत् ॥ ३० ॥
क्योंकि ऐसी ढिठाई तो दरिद्रोंको भी बहुत अप्रिय जान पड़ती है; फिर राजाओंकी तो बात ही क्या है? राजाओंकी किसी झूठी बातको दूसरे मनुष्योंके सामने प्रकाशित न करें ॥ ३० ॥
असूयन्ति हि राजानो नराननृतवादिनः ।
तथैव चावमन्यन्ते नरान् पण्डितमानिनः ॥ ३१ ॥
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क्योंकि झूठ बोलनेवाले मनुष्योंसे राजालोग द्वेष मान लेते हैं । इसी तरह जो लोग अपनेको पण्डित मानते हैं, उनका भी राजा तिरस्कार करते हैं ॥ ३१ ॥
शूरोऽस्मीति न दृप्तः स्याद् बुद्धिमानिति वा पुनः ।
प्रियमेवाचरन् राज्ञः प्रियो भवति भोगवान् ॥ ३२ ॥
' मैं शूरवीर हूँ अथवा बड़ा बुद्धिमान् हूँ, ऐसा घमंड न करे । जो सदा राजाको प्रिय लगनेवाले कार्य ही करता है, वही उसका प्रेमपात्र तथा ऐश्वर्यभोगसे सम्पन्न होता है ॥ ३२ ॥
ऐश्वर्यं प्राप्य दुष्प्रापं प्रियं प्राप्य च राजतः ।
अप्रमत्तो भवेद् राज्ञः प्रियेषु च हितेषु च ॥ ३३ ॥
राजासे दुर्लभ ऐश्वर्य तथा प्रिय भोग प्राप्त होनेपर मनुष्य सदा सावधान होकर उसके प्रिय एवं हितकर कार्योंमें संलग्न रहे ॥ ३३ ॥
यस्य कोपो महाबाधः प्रसादश्च महाफलः ।
कस्तस्य मनसापीच्छेदनर्थं प्राज्ञसम्मतः ॥ ३४ ॥
जिसका क्रोध बड़ा भारी संकट उपस्थित कर देता है और जिसकी प्रसन्नता महान् फल — ऐश्वर्य- भोग देनेवाली है, उस राजाका कौन बुद्धिमान् पुरुष मनसे भी अनिष्ट साधन करना चाहेगा? ॥ ३४ ॥
न चोष्ठौ न भुजौ जानू न च वाक्यं समाक्षिपेत् ।
सदा वातं च वाचं च ष्ठीवनं चाचरेच्छनैः ॥ ३५ ॥
राजाके समक्ष अपने दोनों हाथ, ओठ और घुटनोंको व्यर्थ न हिलावे; बकवाद न करे । सदा शनैः - शनैः बोले । धीरेसे थूके और दूसरोंको पता न चले, इस प्रकार अधोवायु छोड़े ॥ ३५ ॥
हास्यवस्तुषु चान्यस्य वर्तमानेषु केषुचित् ।
नातिगाढं प्रहृष्येत न चाप्युन्मत्तवद्धसेत् ॥ ३६ ॥
न चातिधैर्येण चरेद् गुरुतां हि व्रजेत् ततः ।
स्मितं तु मृदुपूर्वेण दर्शयेत प्रसादजम् ॥ ३७ ॥
किसी दूसरे व्यक्तिके सम्बन्धमें कोई हास्यजनक वस्तु दिखायी दे, तो अधिक हर्ष न प्रकट करे एवं पागलोंकी तरह अट्टहास न करे तथा अत्यन्त धैर्यके कारण जडवत् निश्चेष्ट होकर भी न रहे । इससे वह गौरव ( सम्मान) को प्राप्त होता है । मनमें प्रसन्नता होनेपर मुखसे मृदुल ( मन्द ) मुसकानका ही प्रदर्शन करे ॥ ३६-३७ ॥
लाभे न हर्षयेद् यस्तु न व्यथेद् योऽवमानितः ।
असम्मूढश्च यो नित्यं स राजवसतिं वसेत् ॥ ३८ ॥
जो अभीष्ट वस्तुकी प्राप्ति होनेपर ( अधिक ) हर्षित नहीं होता अथवा अपमानित होनेपर अधिक व्यथाका अनुभव नहीं करता और सदा मोहशून्य होकर विवेकसे काम लेता
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है, वही राजाके यहाँ सुखपूर्वक रह सकता है ॥ ३८ ॥
राजानं राजपुत्रं वा संवर्णयति यः सदा ।
अमात्यः पण्डितो भूत्वा स चिरं तिष्ठते प्रियः ॥ ३ ९ ॥
जो बुद्धिमान् सचिव सदा राजा अथवा राजकुमारकी प्रशंसा करता रहता है, वही राजाके यहाँ उसका प्रीतिपात्र होकर दीर्घकालतक टिक सकता है ॥ ३ ९ ॥
प्रगृहीतश्च योऽमात्यो निगृहीतस्त्वकारणैः ।
न निर्वदति राजानं लभते सम्पदं पुनः ॥ ४० ॥
प्रत्यक्षं च परोक्षं च गुणवादी विचक्षणः ।
उपजीवी भवेद् राज्ञो विषये योऽपि वा भवेत् ॥ ४१ ॥
यदि कोई मन्त्री पहले राजाका कृपापात्र रहा हो और पीछे अकारण उसे दण्ड भोगना पड़ा हो, उस दशामें भी जो राजाकी निन्दा नहीं करता, वह पुनः अपने पूर्व वैभवको प्राप्त कर लेता है । जो बुद्धिमान् राजाके आश्रित रहकर जीवननिर्वाह अथवा उसके राज्यमें निवास करता है, उसे राजाके सामने अथवा पीठ पीछे भी उसके गुणोंकी ही चर्चा करनी चाहिये ॥ ४०-४१ ॥
अमात्यो हि बलाद् भोक्तुं राजानं प्रार्थयेत यः ।
न स तिष्ठेच्चिरं स्थानं गच्छेच्च प्राणसंशयम् ॥ ४२ ॥
जो मन्त्री राजाको बलपूर्वक अपने अधीन करना चाहता है, वह अधिक समयतक अपने पदपर नहीं टिक सकता । इतना ही नहीं, उसके प्राणोंपर भी संकट आ जाता ॥ ४२ ॥
श्रेयः सदाऽऽत्मनो दृष्ट्वा परं राज्ञा न संवदेत् ।
विशेषयेच्च राजानं योग्य भूमिषु सर्वदा ॥ ४३ ॥
अपनी भलाई अथवा लाभ देखकर दूसरेको सदा राजाके साथ न मिलावे; न बातचीत करावे । उपयुक्त स्थान और अवसर देखकर सदा राजाकी विशेषता प्रकट करे ॥ ४३ ॥
अम्लानोबलवाञ्छूरश्छायेवानुगतः सदा ।
सत्यवादी मृदुर्दान्तः स राजवसतिं वसेत् ॥ ४४ ॥
जो उत्साहसम्पन्न, बुद्धि - बलसे युक्त, शूरवीर, सत्यवादी, कोमलस्वभाव और जितेन्द्रिय होकर सदा छायाकी भाँति राजाका अनुसरण करता है, वही राजदरबारमें टिक सकता है ॥ ४४ ॥
अन्यस्मिन् प्रेष्यमाणे तु पुरस्ताद् यः समुत्पतेत् ।
अहं किं करवाणीति स राजवसतिं वसेत् ॥ ४५ ॥
जब दूसरेको किसी कार्यके लिये भेजा जा रहा हो, उस समय जो स्वयं ही उठकर आगे जाय और पूछे — ‘ मेरे लिये क्या आज्ञा है ', वही राजभवनमें निवास कर सकता है ॥ ४५ ॥
आन्तरे चैव बाह्ये च राज्ञा यश्चाथ सर्वदा ।
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आदिष्टो नैव कम्पेत स राजवसतिं वसेत् ॥ ४६ ॥
जो राजाके द्वारा आन्तरिक ( धन एवं स्त्री आदिकी रक्षा ) और बाह्य ( शत्रुविजय आदि) कार्योंके लिये आदेश मिलनेपर कभी शंकित या भयभीत नहीं होता, वही राजाके यहाँ रह सकता है ॥ ४६ ॥
यो वै गृहेभ्यः प्रवसन् प्रियाणां नानुसंस्मरेत् ।
दुःखेन सुखमन्विच्छेत् स राजवसतिं वसेत् ॥ ४७ ॥
जो घर- बार छोड़कर परदेशमें पड़ा रहनेपर भी प्रियजनों एवं अभीष्ट भोगोंका स्मरण नहीं करता और कष्ट सहकर सुख पानेकी इच्छा करता है, वही राजदरबारमें टिक सकता है ॥ ४७ ॥
समवेषं न कुर्वीत नोच्चैः संनिहितो वसेत् ।
न मन्त्रं बहुधा कुर्यादेवं राज्ञः प्रियो भवेत् ॥ ४८ ॥
राजाके समान वेशभूषा न धारण करे । उसके अत्यन्त निकट न रहे । उसके सामने उच्च
आसनपर न बैठे । अपने साथ राजाने जो गुप्त सलाह की हो, उसे दूसरोंपर प्रकट न करे ।
ऐसा करने से ही मनुष्य राजाका प्रिय हो सकता है ॥ ४८ ॥
न कर्मणि नियुक्तः सन् धनं किञ्चिदपि स्पृशेत् ।
प्राप्नोति हि हरन् द्रव्यं बन्धनं यदि वा वधम् ॥ ४ ९ ॥
यदि राजाने किसी कामपर नियुक्त किया हो, तो उसमें घूसके रूपमें थोड़ा भी धन न ले; क्योंकि जो इस प्रकार चोरीसे धन लेता है, उसे एक दिन बन्धन अथवा वधका दण्ड भोगना पड़ता है ॥ ४ ९ ॥
यानं वस्त्रमलङ्कारं यच्चान्यत् सम्प्रयच्छति ।
तदेव धारयेन्नित्यमेवं प्रियतरो भवेत् ॥ ५० ॥
राजा प्रसन्न होकर सवारी, वस्त्र, आभूषण तथा और भी जो कोई वस्तु दे, उसीको सदा
धारण करे या उपयोगमें लावे । ऐसा करनेसे वह राजाका अधिक प्रिय होता है ॥ ५० ॥
एवं संयम्य चित्तानि यत्नतः पाण्डुनन्दनाः ।
संवत्सरमिमं तात तथाशीला बुभूषत ।
अथ स्वविषयं प्राप्य यथाकामं करिष्यथ ॥ ५१ ॥
तात युधिष्ठिर एवं पाण्डवो! इस प्रकार प्रयत्न- पूर्वक अपने मनको वशमें रखकर पूर्वोक्त रीतिसे उत्तम बर्ताव करते हुए इस तेरहवें वर्षको व्यतीत करो और इसी रूपमें रहकर ऐश्वर्य पानेकी इच्छा करो । तदनन्तर अपने राज्यमें आकर इच्छानुसार व्यवहार करना ॥ ५१ ॥
युधिष्ठिरउवाच अनुशिष्टाः स्म भद्रं ते नैतद् वक्तास्ति कश्चन ।
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कुन्तीमृते मातरं नो विदुरं वा महामतिम् ॥ ५२ ॥
युधिष्ठिर बोले — ब्रह्मन्! आपका भला हो । आपने हमें बहुत अच्छी शिक्षा दी । हमारी माता कुन्ती तथा महाबुद्धिमान् विदुरजीको छोड़कर दूसरा कोई नहीं है, जो हमें ऐसी बात बतावे ॥ ५२ ॥
यदेवानन्तरं कार्यं तद् भवान् कर्तुमर्हति ।
तारणायास्य दुःखस्य प्रस्थानाय जयाय च ॥ ५३ ॥
अब हमें इस दुःखसागरसे पार होने, यहाँसे प्रस्थान करने और विजय पानेके लिये जो कर्तव्य आवश्यक हो, उसे आप पूर्ण करें ॥ ५३ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्ततो राज्ञा धौम्योऽथ द्विजसत्तमः ।
अकरोद् विधिवत् सर्वं प्रस्थाने यद् विधीयते ॥ ५४ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! राजा युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर विप्रवर धौम्यजीने यात्राके समय जो आवश्यक शास्त्रविहित कर्तव्य है, वह सब विधिपूर्वक सम्पन्न किया ॥ ५४ ॥
तेषां समिध्य तानग्नीन् मन्त्रवच्च जुहाव सः ।
समृद्धिवृद्धिलाभाय पृथिवीविजयाय च ॥ ५५ ॥
पाण्डवोंकी अग्निहोत्रसम्बन्धी अग्निको प्रज्वलित करके उन्होंने उनकी समृद्धि, वृद्धि, राज्यलाभ तथा पृथ्वीपर विजय प्राप्तिके लिये वेदमन्त्र पढ़कर होम किया ॥ ५५ ॥
अग्नीन् प्रदक्षिणीकृत्य ब्राह्मणांश्च तपोधनान् ।
याज्ञसेनीं पुरस्कृत्य षडेवाथ प्रवव्रजुः ॥ ५६ ॥
तत्पश्चात् पाण्डवोंने अग्नि तथा तपस्वी ब्राह्मणोंकी परिक्रमा करके द्रौपदीको आगे रखकर वहाँसे प्रस्थान किया । कुल छः व्यक्ति ही आसन छोड़कर एक साथ चले थे ॥ ५६ ॥
गतेषु तेषु वीरेषु धौम्योऽथ जपतां वरः ।
अग्निहोत्राण्युपादाय पाञ्चालानभ्यगच्छत ॥ ५७ ॥
उन पाण्डव वीरोंके चले जानेपर जपयज्ञ करनेवालोंमें श्रेष्ठ धौम्यजी उस अग्निहोत्रसम्बन्धी अग्निको साथ लेकर पांचालदेशमें चले गये ॥ ५७ ॥
इन्द्रसेनादयश्चैव यथोक्ताः प्राप्य यादवान् ।
रथानश्वांश्च रक्षन्तः सुखमूषुः सुसंवृताः ॥ ५८ ॥
इन्द्रसेन आदि सेवक भी पूर्वोक्त आदेश पाकर यदुवंशियोंकी नगरी द्वारकामें जा पहुँचे और वहाँ स्वयं सुरक्षित हो रथ और घोड़ोंकी रक्षा करते हुए सुखपूर्वक रहने लगे ॥ ५८ ॥
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इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि पाण्डवप्रवेशपर्वणि धौम्योपदेशे चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत पाण्डवप्रवेशपर्वमें धौम्योपदेशसम्बन्धीचौथा अध्याय पूरा हुआ ॥ ४ ॥
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पञ्चमोऽध्यायः पाण्डवोंका विराटनगरके समीप पहुँचकर श्मशानमें एक शमीवृक्षपर अपने अस्त्र - शस्त्र रखना वैशम्पायन उवाच
ते वीरा बद्धनिस्त्रिंशास्तथा बद्धकलापिनः ।
बद्धगोधाङ्गुलित्राणाः कालिन्दीमभितो ययुः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! तदनन्तर वे वीर पाण्डव तलवार बाँधे, पीठपर तूणीर कसे, गोहके चमड़ेसे बने हुए अंगुलित्र ( दस्ताने ) पहने ( पैदल चलते -चलते ) यमुनानदीके समीप जा पहुँचे ॥ १ ॥
ततस्ते दक्षिणं तीरमन्वगच्छन् पदातयः ।
निवृत्तवनवासा हि स्वराष्ट्रं प्रेप्सवस्तदा ।
वसन्तो गिरिदुर्गेषु वनदुर्गेषु धन्विनः ॥ २ ॥
विध्यन्तो मृगजातानि महेष्वासा महाबलाः । इसके बाद वे यमुनाके दक्षिण किनारेपर पैदल ही चलने लगे । उस समय उनके मनमें यह अभिलाषा जाग उठी थी कि अब हम वनवासके कष्टसे मुक्त हो अपना राज्य प्राप्त कर लेंगे । उन सबने धनुष ले रखे थे । वे महान् धनुर्धर और महापराक्रमी वीर पर्वतों और वनोंके दुर्गम प्रदेशोंमें डेरा डालते और हिंसक पशुओंको मारते हुए यात्रा कर रहे थे ॥ २३ ॥
उत्तरेण दशार्णांस्ते पञ्चालान् दक्षिणेन च ॥ ३ ॥
अन्तरेण यकृल्लोमान् शूरसेनांश्च पाण्डवाः ।
लुब्धा ब्रुवाणा मत्स्यस्य विषयं प्राविशन् वनात् ॥ ४ ॥
धन्विनो बद्धनिस्त्रिंशा विवर्णाः श्मश्रुधारिणः ।
ततो जनपदं प्राप्य कृष्णा राजानमब्रवीत् ॥ ५ ॥
आगे जाकर वे दशार्णसे उत्तर और पांचालसे दक्षिण एवं यकृल्लोम तथा शूरसेन देशोंके बीचसे होकर यात्रा करने लगे । उन्होंने हाथोंमें धनुष धारण कर रखे थे । उनकी कमरमें तलवारें बँधी थीं । उनके शरीर मलिन एवं उदास थे । उन सबकी दाढ़ी - मूँछें बढ़ गयी थीं । किसीके पूछनेपर वे अपनेको मत्स्यदेशमें निवास करनेके इच्छुक बताते थे । इस प्रकार उन्होंने वनसे निकलकर मत्स्यराष्ट्रके जनपदमें प्रवेश किया । जनपदमें आनेपर द्रौपदीने राजा युधिष्ठिरसे कहा— ॥ ३–५ ॥ पश्यैकपद्यो दृश्यन्ते क्षेत्राणि विविधानि च । व्यक्तं दूरे विराटस्य राजधानी भविष्यति ।
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वसामेहापरां रात्रिं बलवान् मे परिश्रमः ॥ ६ ॥
‘ महाराज! देखिये, यहाँ अनेक प्रकारके खेत और उनमें पहुँचनेके लिये बहुत - सी पगडंडियाँ दिखायी देती हैं । जान पड़ता है, विराटकी राजधानी अभी दूर होगी । मुझे बड़ी थकावट हो रही है, अतः हम एक रात और यहीं रहें ' ॥ ६ ॥
युधिष्ठिरउवाच
धनंजय समुद्यम्य पाञ्चालीं वह भारत ।
राजधान्यां निवत्स्यामो विमुक्ताश्च वनादितः ॥ ७ ॥
युधिष्ठिर बोले - धनंजय! तुम द्रौपदीको कंधेपर उठाकर ले चलो । भारत! इस वनसे निकलकर अब हमलोग राजधानीमें ही निवास करेंगे ॥ ७ ॥
वैशम्पायन उवाच
तामादायार्जुनस्तूर्णं द्रौपदीं गजराडिव ।
सम्प्राप्य नगराध्याशमवतारयदर्जुनः ॥ ८ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! तब गजराजके समान पराक्रमी अर्जुनने तुरंत ही द्रौपदीको उठा लिया और नगरके निकट पहुँचकर उन्हें कंधेसे उतारा ॥ ८ ॥
स राजधानीं सम्प्राप्य कौन्तेयोऽर्जुनमब्रवीत् ।
क्वायुधानि समासज्ज्य प्रवेक्ष्यामः पुरं वयम् ॥ ९ ॥
राजधानीके समीप पहुँचकर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने अर्जुनसे कहा- ' भैया! हम अपने अस्त्र- शस्त्र कहाँ रखकर नगरमें प्रवेश करें? ॥ ९ ॥
सायुधाश्च प्रवेक्ष्यामो वयं तात पुरं यदि ।
समुद्वेगं जनस्यास्य करिष्यामो न संशयः ॥ १० ॥
‘ तात! यदि अपने आयुधोंके साथ हम नगरमें प्रवेश करेंगे, तो निःसंदेह यहाँके निवासियोंको उद्वेग ( भय ) में डाल देंगे ॥ १० ॥
गाण्डीवं च महद् गाढं लोके च विदितं नृणाम् ।
तच्चेदायुधमादाय गच्छामो नगरं वयम् ।
क्षिप्रमस्मान् विजानीयुर्मनुष्या नात्र संशयः ॥ ११ ॥
'तुम्हारा गाण्डीव धनुष तो बहुत बड़ा और भारी है । संसारके सब लोगोंमें उसकी प्रसिद्धि है । ऐसी दशामें यदि हम अस्त्र - शस्त्र लेकर नगरमें चलेंगे, तो यहाँ सब लोग हमें
शीघ्र ही पहचान लेंगे । इसमें संशय नहीं है ॥ ११ ॥
ततो द्वादश वर्षाणि प्रवेष्टव्यं वने पुनः ।
एकस्मिन्नपि विज्ञाते प्रतिज्ञातं हि नस्तथा ॥ १२ ॥
‘ यदि हममेंसे एक भी पहचान लिया गया, तो हमें दुबारा बारह वर्षोंके लिये वनमें प्रवेश करना पड़ेगा; क्योंकि हमने ऐसी ही प्रतिज्ञा कर रखी है ' ॥ १२ ॥
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अर्जुनउवाच
इयं कूटे मनुष्येन्द्र गहना महती शमी ।
भीमशाखा दुरारोहा श्मशानस्य समीपतः ॥ १३ ॥
अर्जुनने कहा — राजन्! श्मशानभूमिके समीप एक टीलेपर यह शमीका बहुत बड़ा सघन वृक्ष है । इसकी शाखाएँ बड़ी भयानक हैं, इससे इसपर चढ़ना कठिन है ॥ ५३ ॥
न चापि विद्यते कश्चिन्मनुष्य इति मे मतिः ।
योऽस्मान् निदधतो द्रष्टा भवेच्छस्त्राणि पाण्डवाः ॥ १४ ॥
पाण्डवो! मेरा विश्वास है कि यहाँ कोई ऐसा मनुष्य नहीं है, जो हमें अपने अस्त्र-शस्त्रोंको यहाँ रखते समय देख सके ॥ १४ ॥
उत्पथे हि वने जाता मृगव्यालनिषेविते ।
समीपे च श्मशानस्य गहनस्य विशेषतः ॥ १५ ॥
समाधायायुधं शम्यां गच्छामो नगरं प्रति ।
एवमत्र यथायोगं विहरिष्याम भारत ॥ १६ ॥
यह वृक्ष रास्तेसे बहुत दूर जंगलमें है । इसके आसपास हिंसक जीव और सर्प आदि रहते हैं। विशेषतः यह दुर्गम श्मशानभूमिके निकट है; ( अतः यहाँतक किसीके आने या वृक्षपर चढ़नेकी सम्भावना नहीं है; ) इसलिये इसी शमीवृक्षपर हम अपने अस्त्र- शस्त्र रखकर नगरमें चलें । भारत! ऐसा करके हम यहाँ जैसा सुयोग होगा, उसके अनुसार विचरण करेंगे ॥ १५-१६ ॥ वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा स राजानं धर्मराजं युधिष्ठिरम् ।
प्रचक्रमे निधानाय शस्त्राणां भरतर्षभ ॥ १७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! धर्मराज राजा युधिष्ठिरसे ऐसा कहकर अर्जुन वहाँ अस्त्र - शस्त्रोंको रखनेके प्रयत्नमें लग गये ॥ १७ ॥
येन देवान् मनुष्यांश्च सर्वाश्चैकरथोऽजयत् ।
स्फीताञ्जनपदांश्चान्यानजयत् कुरुपुङ्गवः ॥ १८ ॥
तदुदारं महाघोषं सम्पन्नबलसूदनम् ।
अपज्यमकरोत् पार्थो गाण्डीवं सुभयंकरम् ॥ १ ९ ॥
कुरुश्रेष्ठ अर्जुनने जिस धनुषके द्वारा एकमात्र रथका आश्रय ले सम्पूर्ण देवताओं और मनुष्योंपर विजय पायी थी तथा अन्यान्य अनेक समृद्धिशाली जनपदोंपर विजय - पताका फहरायी थी, जिस धनुषने दिव्य बलसे सम्पन्न असुरों आदिकी सेनाओंका संहार किया था, जिसकी टंकारध्वनि बहुत दूरतक फैलती है, उस उदार तथा अत्यन्त भयंकर गाण्डीव धनुषकी प्रत्यंचा अर्जुनने उतार डाली ॥ १८-१९ ॥