श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 2201–2210

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2201–2210

पृष्ठ 2201

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कभी वे प्रतिपक्षीको गोदमें घसीट लाते, कभी खेलमें ही उसे सामने खींच लेते, कभी आगे - पीछे, दायें - बायें पैंतरे बदलते और कभी सहसा पीछे ढकेलकर पटक देते थे । इस तरह दोनों दोनोंको अपनी ओर खींचते और घुटनोंसे एक-दूसरेपर प्रहार करते थे । उस सामूहिक उत्सवमें पहलवानों और जनसमुदायके निकट उन दोनोंमें केवल बाहुबल, शारीरिक बल तथा प्राणबलसे किसी अस्त्र-शस्त्रके बिना बड़ा भयंकर युद्ध हुआ । राजन्! इन्द्र और वृत्रासुरके समान भीम और जीमूतके उस मल्लयुद्धमें सब लोगोंका बड़ा मनोरंजन हुआ । सभी दर्शक जीतनेवालेका उत्साह बढ़ानेके लिये जोर-जोरसे हर्षनाद कर उठते थे ॥ ३०– ३२ ॥ ततः शब्देन महता भर्त्सयन्तौ परस्परम् ।

व्यूढोरस्कौ दीर्घभुजी नियुद्धकुशलावुभौ ।

बाहुभिः समसज्जेतामायसैः परिघैरिव ॥ ३३ ॥

चकर्ष दोर्भ्यामुत्पात्य भीमो मल्लममित्रहा ।

निनदन्तमभिक्रोशन् शार्दूल इव वारणम् ॥ ३४ ॥

समुद्यम्य महाबाहुर्भ्रामयामास वीर्यवान् ।

ततो मल्लाश्च मत्स्याश्च विस्मयं चक्रिरे परम् ॥ ३५ ॥

तदनन्तर चौड़ी छाती और लंबी भुजावाले, कुश्तीके दाँव- पेचमें कुशल वे दोनों वीर गम्भीर गर्जनाके साथ एक- दूसरेको डाँट बताते हुए लोहेके परिघ ( मोटे डंडे ) -जैसी बाँहोंसे बाँहें मिलाकर परस्पर भिड़ गये। फिर विपुलपराक्रमी शत्रुहन्ता महाबाहु भीमसेनने गर्जना करते हुए, जैसे सिंह हाथीपर झपटे, उसी प्रकार झपटकर जीमूतको दोनों हाथोंसे पकड़कर खींचा और ऊपर उठाकर उसे घुमाना आरम्भ किया । यह देख वहाँ आये हुए पहलवानों तथा मत्स्यदेशकी प्रजाको बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ ३३–३५ ॥

पृष्ठ 2202

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भ्रामयित्वा शतगुणं गतसत्त्वमचेतनम् ।

प्रत्यपिंषन्महाबाहुर्मल्लं भुवि वृकोदरः ॥ ३६ ॥

सौ बार घुमानेपर जब वह धैर्य, साहस और चेतनासे भी हाथ धो बैठा, तब बड़ी- बड़ी बाहुओंवाले वृकोदरने उसे पृथ्वीपर गिराकर मसल डाला ॥ ३६ ॥

तस्मिन् विनिहते वीरे जीमूते लोकविश्रुते ।

विराटः परमं हर्षमगच्छद् बान्धवैः सह ॥ ३७ ॥

इस प्रकार उस लोकविख्यात वीर जीमूतके मारे जानेपर राजा विराटको अपने बन्धु - बान्धवोंके साथ बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ३७ ॥

प्रहर्षात् प्रददौ वित्तं बहु राजा महामनाः ।

बल्लवाय महारङ्गे यथा वैश्रवणस्तथा ॥ ३८ ॥

उस समय कुबेरके समान महामनस्वी राजा विराटने अत्यन्त हर्षमें भरकर बल्लवको उस विशाल रंगभूमिमें ही बहुत धन दिया ॥ ३८ ॥

एवं स सुबहून् मल्लान् पुरुषांश्च महाबलान् ।

विनिघ्नन् मत्स्यराजस्य प्रीतिमाहरदुत्तमाम् ॥ ३ ९ ॥

इसी तरह बहुत - से पहलवानों और महाबली पुरुषोंको मारकर भीमसेनने मत्स्यनरेश विराटका उत्तम प्रेम प्राप्त किया ॥ ३ ९ ॥

यदास्य तुल्यः पुरुषो न कश्चित् तत्र विद्यते ।

ततो व्याघ्रैश्च सिंहैश्च द्विरदैश्चाप्ययोधयत् ॥ ४० ॥

पृष्ठ 2203

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जब वहाँ उनकी जोड़का कोई पहलवान नहीं रह गया, तब विराट उन्हें व्याघ्रों, सिंहों और हाथियोंसे लड़ाने लगे ॥ ४० ॥

पुनरन्तःपुरगतः स्त्रीणां मध्ये वृकोदरः ।

योध्यते स विराटेन सिंहैर्मत्तैर्महाबलैः ॥ ४१ ॥

कभी - कभी विराटकी प्रेरणासे स्त्रियोंके अन्तःपुरमें जाकर भीमसेन उन्हें दिखानेके लिये महान् बलवान् और मतवाले सिंहोंके साथ लड़ा करते थे ॥ ४१ ॥

बीभत्सुरपि गीतेन स्वनृत्येन च पाण्डवः ।

विराटं तोषयामास सर्वाश्चान्तःपुरस्त्रियः ॥ ४२ ॥

पाण्डुनन्दन अर्जुनने भी अपने गीत और नृत्यसे राजा विराट तथा अन्तःपुरकी सम्पूर्ण स्त्रियोंको संतुष्ट कर लिया था ॥ ४२ ॥

अश्वैर्विनीतैर्जवनैस्तत्र तत्र समागतैः ।

तोषयामास राजानं नकुलो नृपसत्तमम् ॥ ४३ ॥

तस्मै प्रदेयं प्रायच्छत् प्रीतो राजा धनं बहु ।

विनीतान् वृषभान् दृष्ट्वा सहदेवस्य चाभितः ।

धनं ददौ बहुविधं विराटः पुरुषर्षभः ॥ ४४ ॥

इसी प्रकार नकुलने जहाँ- तहाँसे आये हुए वेगवान् घोड़ोंको सुशिक्षित करके नृपश्रेष्ठ विराटको प्रसन्न किया था । प्रसन्न होकर राजाने पुरस्काररूपमें उन्हें बहुत धन दिया था । इसी तरह सहदेवके द्वारा शिक्षित एवं विनीत किये हुए बैलोंको देखकर नरश्रेष्ठ विराटने उन्हें भी इनाममें बहुत धन दिया ॥ ४३-४४ ॥

द्रौपदी प्रेक्ष्य तान् सर्वान् क्लिश्यमानान् महारथान् ।

नातिप्रीतमना राजन् निःश्वासपरमाभवत् ॥ ४५ ॥

राजन्! अपने सम्पूर्ण महारथी पतियोंको इस प्रकार क्लेश उठाते देख द्रौपदीके मनमें खेद होता था और वह लंबी साँसें भरती रहती थी ॥ ४५ ॥

एवं ते न्यवसंस्तत्र प्रच्छन्नाः पुरुषर्षभाः ।

कर्माणि तस्य कुर्वाणा विराटनृपतेस्तदा ॥ ४६ ॥

इस प्रकार वे पुरुषशिरोमणि पाण्डव उस समय राजा विराटके भिन्न -भिन्न कार्य सँभालते हुए वहाँ छिपकर रहते थे ॥ ४६ ॥

इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि समयपालनपर्वणि जीमूतवधे त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत समयपालनपर्वमें जीमूतवधसम्बन्धी तेरहवाँअध्याय पूराहुआ ॥ १३ ॥

पृष्ठ 2204

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3- प्रमाथ तथा उन्मथन आदि मल्लयुद्धके दाँव - पेचोंके नाम हैं । इनकी व्याख्या नीलकण्ठी 3 टीकाओंमें मल्लशास्त्रके अनुसार इस प्रकार दी गयी है—

निपात्य पेषणं भूमौ प्रमाथ इति कथ्यते । यत् तूत्थायाङ्गथनं तदुन्मथनमुच्यते ॥

१- क्षेपणं कथ्यते यत् तु स्थानात् प्रच्यावनं हठात् ॥

२- उभयोर्भुजयोर्मुष्टिरुरोमध्ये निपात्यते । मुष्टिरित्युच्यते तज्ज्ञैर्मल्लविद्याविशारदैः ॥ ३- अवाङ्मुखं स्कन्धगतं भ्रामयित्वा तदैव यः । क्षिप्तस्य शब्दः स भवेद् वराहोद्धूतनिःस्वनः ॥ ४- तर्जन्यङ्गुष्ठमध्येन प्रसारितकरो हि यः । सम्प्रहारतलाख्यस्तु संग्राहो वज्रमिष्यते ॥ ५- अङ्गुल्यः प्रसृता यास्तु ताः प्रसृष्टा उदीरिताः ॥ ६- आकृष्य क्रोडीकरणं प्रकर्षणमुदाहृतम् । आकर्षणं लीलयैव सम्मुखीकरणं स्मृतम् ॥ पुरः पश्चात् पार्श्वयोश्चाभ्याकर्षो भ्रमणं तथा । पश्चात् प्रपातनं वेगाद् विकर्षणमुदाहृतम् ॥

पृष्ठ 2205

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(कीचकवधपर्व) चतुर्दशोऽध्यायः कीचकका द्रौपदीपर आसक्त हो उससे प्रणययाचना करना और द्रौपदीका उसे फटकारना वैशम्पायन उवाच

वसमानेषु पार्थेषु मत्स्यस्य नगरे तदा ।

महारथेषु छन्नेषु मासा दश समाययुः ॥ १ ॥

याज्ञसेनी सुदेष्णां तु शुश्रूषन्ती विशाम्पते ।

आवसत् परिचारार्हा सुदुःखं जनमेजय ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! उस समय कुन्तीके उन महारथी पुत्रोंको मत्स्यराजके नगरमें छिपकर रहते हुए धीरे - धीरे दस महीने बीत गये । राजन्! यज्ञसेनकुमारी द्रौपदी, जो स्वयं स्वामिनीकी भाँति सेवाके योग्य थी, रानी सुदेष्णाकी शुश्रूषा करती हुई बड़े कष्टसे वहाँ रहती थी ॥ १-२ ॥

तथा चरन्ती पाञ्चाली सुदेष्णाया निवेशने ।

तां देवीं तोषयामास तथा चान्तःपुरस्त्रियः ॥ ३ ॥

सुदेष्णाके महलमें पूर्वोक्तरूपसे सेवा करती हुई पांचालीने महारानी तथा अन्तःपुरकी अन्य स्त्रियोंको पूर्ण प्रसन्न कर लिया ॥ ३ ॥

तस्मिन् वर्षे गतप्राये कीचकस्तु महाबलः ।

सेनापतिर्विराटस्य ददर्श द्रुपदात्मजाम् ॥ ४ ॥

जब वह वर्ष पूरा होनेमें कुछ ही समय बाकी रह गया, तबकी बात है; एक दिन राजा विराटके सेनापति महाबली कीचकने द्रुपदकुमारीको देखा ॥ ४ ॥

तां दृष्ट्वा देवगर्भाभां चरन्तीं देवतामिव ।

कीचकः कामयामास कामबाणप्रपीडितः ॥ ५ ॥

राजमहलमें देवांगनाकी भाँति विचरती हुई देवकन्याके समान कान्तिवाली द्रौपदीको देखकर कीचक कामबाणसे अत्यन्त पीड़ित हो उसे चाहने लगा ॥ ५ ॥

स तु कामाग्निसंतप्तः सुदेष्णामभिगम्य वै ।

प्रहसन्निव सेनानीरिदं वचनमब्रवीत् ॥ ६ ॥

पृष्ठ 2206

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कामवासनाकी आगमें जलता हुआ सेनापति कीचक अपनी बहिन रानी सुदेष्णाके पास गया और हँसता हुआ- सा उससे इस प्रकार बोला— ॥ ६ ॥

नेयं मया जातु पुरेह दृष्टा राज्ञो विराटस्य निवेशने शुभा । रूपेण चोन्मादयतीव मां भृशं गन्धेन जाता मदिरेव भामिनी ॥ ७ ॥

' सुदेष्णे! यह सुन्दरी जो अपने रूपसे मुझे अत्यन्त उन्मत्त-सा किये देती है, पहले कभी राजा विराटके इस महलमें मेरे द्वारा नहीं देखी गयी थी । यह भामिनी अपनी दिव्य गन्धसे मेरे लिये मदिरा- सी मादक हो रही है ॥ ७ ॥

का देवरूपा हृदयङ्गमा शुभे ह्याचक्ष्व मे कस्य कुतोऽत्र शोभने । चित्तं हि निर्मथ्य करोति मां वशे न चान्यदत्रौषधमस्ति मे मतम् ॥ ८ ॥

' शुभे! यह कौन है? इसका रूप देवांगनाके समान है । यह मेरे हृदयमें समा गयी है । शोभने! मुझे बताओ, यह किसकी स्त्री है और कहाँसे आयी है? यह मेरे मनको मथकर मुझे वशमें किये लेती है । मेरे इस रोगकी ओषधि इसकी प्राप्तिके सिवा दूसरी कोई नहीं जान पड़ती ॥ ८ ॥

अहो तवेयं परिचारिका शुभा प्रत्यग्ररूपा प्रतिभाति मामियम् । अयुक्तरूपं हि करोति कर्म ते प्रशास्तु मां यच्च ममास्ति किंचन ॥ ९ ॥

‘ अहो! बड़े आश्चर्यकी बात है कि यह सुन्दरी तुम्हारे यहाँ दासीका काम कर रही है । मुझे ऐसा लगता है, इसका रूप नित्य नवीन है । तुम्हारे यहाँ जो काम यह करती है, वह इसके योग्य कदापि नहीं है । मैं चाहता हूँ, यह मेरी गृहस्वामिनी होकर मुझपर और मेरे पास जो कुछ है, उसपर भी एकच्छत्र शासन करे ॥ ९ ॥

प्रभूतनागाश्वरथं महाजनं समृद्धियुक्तं बहुपानभोजनम् । मनोहरं काञ्चनचित्रभूषणं गृहं महच्छोभयतामियं मम ॥ १० ॥

' मेरे घरमें बहुत - से हाथी, घोड़े और रथ हैं, बहुत - से सेवा करनेवाले परिजन हैं तथा उसमें प्रचुर सम्पत्ति भरी है । भोजन और पेयकी उसमें अधिकता है । देखनेमें भी वह मनोहर है । सुवर्णमय चित्र उसकी शोभा बढ़ा रहे हैं । मेरे उस विशाल भवनमें चलकर यह सुन्दरी उसे सुशोभित करे ' ॥ १० ॥

पृष्ठ 2207

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ततः सुदेष्णामनुमन्त्र्य कीचक- स्ततः समभ्येत्य नराधिपात्मजाम् । उवाच कृष्णामभिसान्त्वयंस्तदा मृगेन्द्रकन्यामिव जम्बुको वने ॥ ११ ॥

तदनन्तर रानी सुदेष्णाकी सम्मति ले कीचक राजकुमारी द्रौपदीके पास आकर उसे सान्त्वना देता हुआ बोला; मानो वनमें कोई सियार किसी सिंहकी कन्याको फुसला रहा हो ॥ ११ ॥

का त्वं कस्यासि कल्याणि कुतो वा त्वं वरानने ।

प्राप्ता विराटनगरं तत् त्वमाचक्ष्व शोभने ॥ १२ ॥

( उसने द्रौपदीसे पूछा— ) ' कल्याणि! तुम कौन हो और किसकी कन्या हो? अथवा सुमुखि! तुम कहाँसे इस विराटनगरमें आयी हो? शोभने! ये सब बातें मुझे सच-सच बताओ ॥ १२ ॥

रूपमग्रयं तथा कान्तिः सौकुमार्यमनुत्तमम् ।

कान्त्या विभाति वक्त्रं ते शशाङ्क इव निर्मलम् ॥ १३ ॥

' तुम्हारा यह श्रेष्ठ और सुन्दर रूप, यह दिव्य कान्ति और यह सुकुमारता संसारमें सबसे उत्तम है और तुम्हारा निर्मल मुख तो अपनी छबिसे निष्कलंक चन्द्रमाकी भाँति शोभा पा रहा है ॥ १३ ॥

नेत्रे सुविपुले सुभ्रु पद्मपत्रनिभे शुभे ।

वाक्यं ते चारुसर्वाङ्गि परपुष्टरुतोपमम् ॥ १४ ॥

' सुन्दर भौंहोंवाली सर्वांगसुन्दरी! तुम्हारे ये उत्तम और विशाल नेत्र कमलदलके समान सुशोभित हैं । तुम्हारी वाणी क्या है; कोकिलकी कूक है ॥ १४ ॥

एवंरूपा मया नारी काचिदन्या महीतले ।

न दृष्टपूर्वा सुश्रोणि यादृशी त्वमनिन्दिते ॥ १५ ॥

‘ सुश्रोणि! अनिन्दिते! जैसी तुम हो, ऐसे मनोहर रूपवाली कोई दूसरी स्त्री इस पृथ्वीपर मैंने आजसे पहले कभी नहीं देखी थी ॥ १५ ॥

लक्ष्मीः पद्मालया का त्वमथ भूतिः सुमध्यमे ।

ह्रीः श्रीः कीर्तिरथो कान्तिरासां का त्वं वरानने ॥ १६ ॥

‘ सुमध्यमे! तुम कमलोंमें निवास करनेवाली लक्ष्मी हो अथवा साकार विभूति? सुमुखि! लज्जा, श्री, कीर्ति और कान्ति – इन देवियोंमेंसे तुम कौन हो? ॥ १६ ॥

अतीवरूपिणी किं त्वमनङ्गाङ्गविहारिणी ।

अतीव भ्राजसे सुभ्रु प्रभेवेन्दोरनुत्तमा ॥ १७ ॥

‘ क्या तुम कामदेवके अंगोंसे क्रीड़ा करनेवाली अतिशय रूपवती रति हो? सुभ्रु! तुम चन्द्रमाकी परम उत्तम प्रभाके समान अत्यन्त उद्भासित हो रही हो ॥

पृष्ठ 2208

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अपि चेक्षणपक्ष्माणां स्मितं ज्योत्स्नोपमं शुभम् ।

दिव्यांशुरश्मिभिर्वृत्तं दिव्यकान्तिमनोरमम् ॥ १८ ॥

निरीक्ष्य वक्त्रचन्द्रं ते लक्ष्म्यानुपमया युतम् ।

कृत्स्ने जगति को नेह कामस्य वशगो भवेत् ॥ १ ९ ॥

‘तुम्हारा सुन्दर मुखचन्द्र अनुपम लक्ष्मीसे अलंकृत है, तुम्हारे नेत्रोंकी अधखुली पलकें चाँदनीके समान मनको आह्लादित करनेवाली हैं । दिव्य रश्मियोंसे आवृत तुम्हारा यह मुखचन्द्र दिव्य छबिके द्वारा मनको रमा लेनेवाला है। इसे देखकर सम्पूर्ण जगत्में कौन ऐसा पुरुष है, जो कामके अधीन न हो जाय? ॥ १८-१९ ॥

हारालंकारयोग्यौ तु स्तनौ चोभौ सुशोभनौ ।

सुजातौ सहितौ लक्ष्म्या पीनौ वृत्तौ निरन्तरौ ॥ २० ॥

'तुम्हारे दोनों सान हार आदि आभूषणोंके योग्य और परम सुन्दर हैं । ये ऊँचे, श्रीसम्पन्न, स्थूल, गोल- गोल और परस्पर सटे हुए हैं ॥ २० ॥

कुड्मलाम्बुरुहाकारौ तव सुभ्रु पयोधरौ ।

कामप्रतोदाविव मां तुदतश्चारुहासिनि ॥ २१ ॥

' सुन्दर भौंहों तथा मनोरम मुसकानवाली सुन्दरी! कमलकोशके समान आकारवाले तुम्हारे दोनों उरोज कामदेवके चाबुककी भाँति मुझे पीड़ा दे रहे हैं ॥ २१ ॥

वलीविभङ्गचतुरं स्तनभारविनामितम् ।

कराग्रसम्मितं मध्यं तवेदं तनुमध्यमे ॥ २२ ॥

‘ तनुमध्यमे! तुम्हारी कमर इतनी पतली है कि हाथोंके अग्रभागसे ( अँगूठेसे लेकर तर्जनीतकके बित्तेसे) माप ली जा सकती है । वह त्रिवलीकी तीन रेखाओंसे परम सुन्दर दीखती है । तुम्हारे स्तनोंके भारने उसे कुछ झुका दिया है ॥ २२ ॥

दृष्ट्वैव चारु जघनं सरित्पुलिनसंनिभम् ।

कामव्याधिरसाध्यो मामप्याक्रामति भामिनि ॥ २३ ॥

‘ भामिनि! नदीके दो किनारोंके समान तुम्हारे मनोहर जघनको देख लेनेसे ही कामरूपी असाध्य रोग मुझ जैसे वीरपर भी आक्रमण कर रहा है ॥ २३ ॥

जज्वाल चाग्निमदनो दावाग्निरिव निर्दयः ।

त्वत्सङ्गमाभिसंकल्पविवृद्धो मां दहत्ययम् ॥ २४ ॥

‘ निर्दयी कामदेव अग्निस्वरूप होकर दावानलकी भाँति मेरे हृदयरूपी वनमें जल उठा है । तुम्हारे समागमका संकल्प इसमें घीका काम करता है । इससे अत्यन्त प्रज्वलित होकर यह काम मुझे जला रहा है ॥ २४ ॥

आत्मप्रदानवर्षेण संगमाम्भोधरेण च ।

शमयस्व वरारोहे ज्वलन्तं मन्मथानलम् ॥ २५ ॥

पृष्ठ 2209

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‘ वरारोहे!! तुम अपने संगमरूपी मेघसे आत्म- समर्पणरूपी वर्षाद्वारा इस प्रज्वलित मदनाग्निको बुझा दो ॥ मच्चित्तोन्मादनकरा मन्मथस्य शरोत्कराः ।

त्वत्संगमाशानिशितास्तीव्रा शशिनिभानने ।

मह्यं विदार्य हृदयमिदं निर्दयवेगिताः ॥ २६ ॥

प्रविष्टा ह्यसितापाङ्गि प्रचण्डाश्चण्डदारुणाः ।

अत्युन्मादसमारम्भाः प्रीत्युन्मादकरा मम ।

आत्मप्रदानसम्भोगैर्मामुद्धर्तुमिहार्हसि ॥ २७ ॥

' चन्द्रमुखी! मेरे मनको उन्मत्त बना देनेवाले कामदेवके बाणसमूह तुम्हारे समागमकी आशारूपी शानपर चढ़कर अत्यन्त तीखे और तीव्र हो गये हैं । कजरारे नयनप्रान्तोंवाली सुन्दरी! अत्यन्त क्रोधपूर्वक चलाये हुए कामके वे प्रचण्ड एवं भयंकर बाण दयाशून्य हो वेगसे आकर मेरे इस हृदयको विदीर्ण करके भीतर घुस गये हैं और अतिशय उन्माद ( सन्निपातजनित बेहोशी ) पैदा कर रहे हैं । वे मेरे लिये प्रेमोन्मादजनक हो रहे हैं । अब तुम्हीं आत्मदान -जनित सम्भोगरूप औषधके द्वारा यहाँ मेरा उद्धार कर सकती हो ॥ २६-२७ ॥

चित्रमाल्याम्बरधरा सर्वाभरणभूषिता ।

कामं प्रकामं सेव त्वं मया सह विलासिनि ॥ २८ ॥

‘ विलासिनि! विचित्र माला और सुन्दर वस्त्र धारण करके समस्त आभूषणोंसे विभूषित हो मेरे साथ अतिशय कामभोगका सेवन करो ॥ २८ ॥

नार्हसीहासुखं वस्तुं सुखार्हा सुखवर्जिता ।

प्राप्नुह्यनुत्तमं सौख्यं मत्तस्त्वं मत्तगामिनि ॥ २ ९ ॥

‘ यहाँ अनेक प्रकारके कष्ट हैं । अतः तुम ऐसे स्थानमें निवास करने योग्य नहीं हो । तुम सुख भोगनेके योग्य हो, किंतु यहाँ सुखसे वंचित हो । मस्तीभरी चालसे चलनेवाली सैरन्ध्री! तुम मुझसे सर्वोत्तम सुखभोग प्राप्त करो ' ॥ २ ९ ॥

स्वादून्यमृतकल्पानि पेयानि विविधानि च ।

पिबमाना मनोज्ञानि रममाणा यथासुखम् ॥ ३० ॥

‘ अमृतके समान स्वादिष्ट और मनोहर भाँति- भाँतिके पेय रसोंका पान करती हुई तुम्हें जैसे सुख मिले, उसी प्रकार रमण करो ॥ ३० ॥

भोगोपचारान् विविधान् सौभाग्यं चाप्यनुत्तमम् ।

पानं पिब महाभागे भोगैश्चानुत्तमैः शुभैः ॥ ३१ ॥

इदं हि रूपं प्रथमं तवानघे निरर्थकं केवलमद्य भामिनि । अधार्यमाणा स्रगिवोत्तमा शुभा न शोभसे सुन्दरि शोभना सती ॥ ३२ ॥

पृष्ठ 2210

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 2210 का मूल पृष्ठ
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‘ महाभागे! नाना प्रकारकी भोग- सामग्री तथा सर्वोत्तम सौभाग्य पाकर उत्तमोत्तम शुभ भोगोंके साथ पीने योग्य रसोंका आस्वादन करो । अनघे! तुम्हारा यह सर्वोत्कृष्ट रूप - सौन्दर्य आजकी परिस्थितिमें केवल व्यर्थ जा रहा है । भामिनि! जैसे उत्तम हारको यदि किसीने गलेमें धारण नहीं किया, तो उसकी शोभा नहीं होती, उसी प्रकार सुन्दरि! तुम शुभस्वरूपा और शोभामयी होकर भी किसीके गलेका हार न बन सकनेके कारण सुशोभित नहीं होती हो ॥ ३१-३२ ॥ त्यजामि'दारान् मम ये पुरातना भवन्तु दास्यस्तव चारुहासिनि । अहं च ते सुन्दरि दासवत् स्थितः सदा भविष्ये वशगो वरानने ॥ ३३ ॥

‘चारुहासिनि! यदि तुम चाहो तो मैं पहली स्त्रियोंको त्याग दूँगा अथवा वे सब तुम्हारी दासी बनकर रहेंगी । सुन्दरि! सुमुखि! मैं स्वयं भी दासकी भाँति सदा तुम्हारे अधीन रहूँगा' ॥ ३३ ॥

द्रौपद्युवाच

अप्रार्थनीयामिह मां सुतपुत्राभिमन्यसे ।

निहीनवर्णां सैरन्ध्रीं बीभत्सां केशकारिणीम् ॥ ३४ ॥

द्रौपदीने कहा – सूतपुत्र! तुम मुझे चाहते हो । छिः छिः; मुझसे इस तरहकी याचना करना तुम्हारे लिये कदापि योग्य नहीं है । एक तो मेरी जाति छोटी है, दूसरे मैं सैरन्ध्री ( दासी ) हूँ, बीभत्स वेषवाली स्त्री हूँ तथा केश सँवारनेका काम करनेवाली एक तुच्छ सेविका हूँ ॥ ३४ ॥

(स्वेषु दारेषु मेधावी कुरुते यत्नमुत्तमम् ।

स्वदारनिरतो ह्याशु नरो भद्राणि पश्यति ॥

बुद्धिमान् पुरुष अपनी पत्नीको ही अनुकूल बनाये रखनेके लिये उत्तम यत्न करता है । अपनी स्त्रीमें अनुराग रखनेवाला मनुष्य शीघ्र ही कल्याणका भागी होता है ।

न चाधर्मेण लिप्येत न चाकीर्तिमवाप्नुयात् ।

स्वदारेषु रतिर्धर्मो मृतस्यापि न संशयः ॥

मनुष्यको चाहिये कि वह पापमें लिप्त न हो, अपयशका पात्र न बने, अपनी ही पत्नीके प्रति अनुराग रखना परम धर्म है । वह मृत पुरुषके लिये भी कल्याणकारी होता है, इसमें संशय नहीं है ।

स्वजातिदारा मर्त्यस्य इहलोके परत्र च ।

प्रेतकार्याणि कुर्वन्ति निवापैस्तर्पयन्ति च ॥