श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 2221–2230

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2221–2230

पृष्ठ 2221

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वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! बहिनके वचनसे इस प्रकार आश्वासन मिलनेपर कीचक उस समय वहाँसे चला गया और घर जाकर उसने यथासमय चतुर रसोइयोंके द्वारा राजाओंके उपयोगमें आने योग्य उत्तम एवं परिष्कृत मदिरा मँगवायी और भाँति- भाँतिके अनेक विशिष्ट और साधारण भक्ष्य पदार्थ एवं परम उत्तम अन्न- पानकी तैयारी करायी ॥ ७-८ ॥

तस्मिन् कृते तदा देवी कीचकेनोपमन्त्रिता ।

उसकी व्यवस्था हो जानेपर कीचकने सुदेष्णाको भोजनके लिये आमन्त्रित किया ॥ ८

¾ ॥

( त्वरावान् कालपाशेन कण्ठे बद्धः पशुर्यथा ।

नावबुध्यत मूढात्मा मरणं समुपस्थितम् ॥

मूढात्मा कीचक कण्ठमें कालपाशसे बँधे हुए पशुकी भाँति अपने निकट आयी हुई मृत्युको नहीं जान पाता था । वह द्रौपदीको पानेके लिये उतावला हो रहा था । कीचक उवाच

मधु मद्यं बहुविधं भक्ष्याश्च विविधाः कृताः ।

सुदेष्णे ब्रूहि सैरन्ध्रीं यथा सा मे गृहं व्रजेत् ॥

कीचक बोला — सुदेष्णे! मैंने नाना प्रकारकी मीठी मदिरा मँगा ली है और विविध प्रकारकी रसोई भी तैयार कर ली है । अब तुम सैरन्ध्रीसे कह दो, जिससे वह मेरे घरमें

पधारे ।

केनचित् त्वद्य कार्येण त्वर शीघ्रं मम प्रियम् ॥

अहं हि शरणं देवं प्रपद्ये वृषभध्वजम् ।

समागमं मे सैरन्ध्या मरणं वा दिशेति वै ॥

किसी कामके बहाने उसे जल्दी मेरे यहाँ भेजो । मेरा प्रिय कार्य सिद्ध करनेमें शीघ्रता करो । मैं भगवान् शंकरकी शरण लेकर यह प्रार्थना करता हूँ कि प्रभो! मुझे सैरन्ध्रीसे मिला दो अथवा मृत्यु प्रदान करो । वैशम्पायन उवाच

सा तमाह विनिःश्वस्य प्रतिगच्छ स्वकं गृहम् ।

एषाहमपि सैरन्ध्रीं सुरार्थे तूर्णमादिशे ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! तब सुदेष्णा लंबी साँस खींचकर उससे बोली -' तुम अपने घर लौट जाओ । मैं सैरन्ध्रीको शीघ्र ही वहाँसे मदिरा ले आनेके लिये आज्ञा देती हूँ' । एवमुक्तस्तु पापात्मा कीचकस्त्वरितः पुनः । स्वगृहं प्राविशत् तूर्णं सैरन्ध्रीगतमानसः ॥ )

पृष्ठ 2222

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उसके ऐसा कहनेपर सैरन्ध्रीका चिन्तन करता हुआ पापात्मा कीचक फिर तुरंत ही

अपने घरको लौट गया ।

सुदेष्णा प्रेषयामास सैरन्ध्रीं कीचकालयम् ॥ ९ ॥

तब सुदेष्णाने सैरन्ध्रीको कीचकके घर जानेके लिये कहा ॥ ९ ॥

सुदेष्णोवाच

उत्तिष्ठ गच्छ सैरन्ध्रि कीचकस्य निवेशनम् ।

पानमानय कल्याणि पिपासा मां प्रबाधते ॥ १० ॥

सुदेष्णा बोली – सैरन्ध्री! उठो और कीचकके घर जाओ । कल्याणी! मुझे प्यास विशेष कष्ट दे रही है; अतः वहाँसे मेरे पीने योग्य रस ले आओ ॥ १० ॥

सैरन्ध्र्युवाच

न गच्छेयमहं तस्य राजपुत्रि निवेशनम् ।

त्वमेव राज्ञि जानासि यथा स निरपत्रपः ॥ ११ ॥

सैरन्ध्रीने कहा- राजकुमारी! मैं उसके घर नहीं जा सकती। महारानी! आप तो जानती ही हैं कि वह कैसा निर्लज्ज है ॥ ११ ॥

न चाहमनवद्याङ्गि तव वेश्मनि भामिनि ।

कामवृत्ता भविष्यामि पतीनां व्यभिचारिणी ॥ १२ ॥

निर्दोष अंगोंवाली देवि! मैं आपके महलमें अपने पतियोंकी दृष्टिमें व्यभिचारिणी और स्वेच्छाचारिणी होकर नहीं रहूँगी ॥ १२ ॥

त्वं चैव देवि जानासि यथा स समयः कृतः ।

प्रविशन्त्या मया पूर्वं तव वेश्मनि भामिनि ॥ १३ ॥

भामिनि! देवि! पहले आपके इस राजभवनमें प्रवेश करते समय मैंने जो प्रतिज्ञा की थी, उसे भी आप जानती ही हैं ॥ १३ ॥

कीचकस्तु सुकेशान्ते मूढो मदनदर्पितः ।

सोऽवमंस्यति मां दृष्ट्वा न यास्ये तत्र शोभने ॥। १४ ॥

कमनीय केशोंवाली सुन्दरी! मूर्ख कीचक तो काम- मदसे उन्मत्त हो रहा है । वह मुझे

देखते ही अपमानित कर बैठेगा । इसलिये मैं वहाँ नहीं जाऊँगी ॥ १४ ॥

सन्ति बह्वयस्तव प्रेष्या राजपुत्रि वशानुगाः ।

अन्यां प्रेषय भद्रं ते स हि मामवमंस्यते ॥ १५ ॥

राजपुत्री! आपके अधीन तो और भी बहुत- सी दासियाँ हैं; उन्हींमेंसे किसी दूसरीको

भेज दीजिये । आपका कल्याण हो । मेरे जानेसे कीचक मेरा अपमान करेगा ॥

सुदेष्णोवाच

पृष्ठ 2223

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नैव त्वां जातु हिंस्यात् स इतः सम्प्रेषितां मया ।

इत्युक्त्वा प्रददौ पात्रं सपिधानं हिरण्मयम् ॥ १६ ॥

सुदेष्णा बोली- शुभे! मैंने तुम्हें यहाँसे भेजा है, अतः वह कभी तुम्हें कष्ट नहीं देगा । यह कहकर सुदेष्णाने द्रौपदीके हाथमें ढक्कनसहित एक सुवर्णमय पात्र दे दिया ॥ १६ ॥

सा शङ्कमाना रुदती दैवं शरणमीयुषी ।

प्रातिष्ठत सुराहारी कीचकस्य निवेशनम् ॥ १७ ॥

द्रौपदी मदिरा लानेके लिये उस पात्रको लेकर शंकित हो रोती हुई कीचकके घरकी ओर चली और अपने सतीत्वकी रक्षाके लिये मन-ही- मन भगवान् सूर्यकी शरणमें गयी ॥ १७ ॥

सैरन्ध्युवाच

यथाहमन्यं भर्तृभ्यो नाभिजानामि कंचन ।

तेन सत्येन मां प्राप्तां मा कुर्यात् कीचको वशे ॥ १८ ॥

सैरन्ध्रीने कहा — भगवन्! यदि मैं अपने पतियोंके सिवा दूसरे किसी पुरुषको मनमें नहीं लाती, तो इस सत्यके प्रभावसे कीचक अपने घरमें आयी हुई मुझ अबलाको अपने वशमें न कर सके ॥ १८ ॥

वैशम्पायन उवाच

उपातिष्ठत सा सूर्यं मुहूर्तमबला ततः ।

स तस्यास्तनुमध्यायाः सर्वं सूर्योऽवबुद्धवान् ॥ १ ९ ॥

अन्तर्हितं ततस्तस्या रक्षो रक्षार्थमादिशत् ।

तच्चैनां नाजहात् तत्र सर्वावस्थास्वनिन्दिताम् ॥ २० ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! सब प्रकारके बलसे रहित द्रौपदी दो घड़ीतक भगवान् सूर्यकी उपासना करती रही। तदनन्तर श्रीसूर्यदेवने पतले कटिभागवाली द्रुपदकुमारीकी सारी परिस्थिति समझ ली और उसकी रक्षाके लिये अदृश्यरूपसे एक राक्षसको नियुक्त कर दिया । वह राक्षस किसी भी अवस्थामें सती- साध्वी द्रौपदीको वहाँ असहाय नहीं छोड़ता था ॥ १ ९ -२० ॥

तां मृगीमिव संत्रस्तां दृष्ट्वा कृष्णां समीपगाम् ।

उदतिष्ठन्मुदा सूतो नावं लब्ध्वेव पारगः ॥ २१ ॥

डरी हुई हरिणीकी भाँति भयभीत द्रौपदीको समीप आयी देख सूत कीचक आनन्दमें भरकर खड़ा हो गया; मानो नदीके पार जानेवाला पथिक नौका पाकर प्रसन्न हो गया हो ॥ २१ ॥

पृष्ठ 2224

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श्रीमहाभारते विराटपर्वणि कीचकवधपर्वणि द्रौपदीसुराहरणे पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत कीचकवधपर्वमें द्रौपदीके द्वारा मदिरानयनसम्बन्धी पंद्रहवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १५ ॥

( दाक्षिणात्य अधिक पाठके २५ श्लोक मिलाकर कुल ४६ श्लोक हैं । )

पृष्ठ 2225

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षोडशोऽध्यायः कीचकद्वारा द्रौपदीका अपमान कीचक उवाच

स्वागतं ते सुकेशान्ते सुव्युष्टा रजनी मम ।

स्वामिनी त्वमनुप्राप्ता प्रकुरुष्व मम प्रियम् ॥ १ ॥

कीचकने कहा – सुन्दर अलकोंवाली सैरन्ध्री! तुम्हारा स्वागत है । आजकी रातका प्रभात मेरे लिये बड़ा मंगलमय है । अब तुम मेरी स्वामिनी होकर मेरा प्रिय कार्य करो ॥ १ ॥

सुवर्णमालाः कम्बूश्च कुण्डले परिहाटके ।

नानापत्तनजे शुभ्रे मणिरत्नं च शोभनम् ॥ २ ॥

आहरन्तु च वस्त्राणि कौशिकान्यजिनानि च । मैं दासियोंको आज्ञा देता हूँ; वे तुम्हारे लिये सोनेके हार, शंखकी चूड़ियाँ, विभिन्न नगरोंमें बने हुए शुभ्र सुवर्णमय कर्णफूलके जोड़े, सुन्दर मणि रत्नमय आभूषण, रेशमी साड़ियाँ तथा मृगचर्म आदि ले आवें ॥

अस्ति मे शयनं दिव्यं त्वदर्थमुपकल्पितम् ।

एहि तत्र मया सार्धं पिबस्व मधुमाधवीम् ॥ ३ ॥

मैंने तुम्हारे लिये पहलेसे ही यह दिव्य शय्या बिछा रखी है । आओ, यहाँ मेरे साथ बैठकर मधुर माध्वीरसका पान करो ॥ ३ ॥

द्रौपद्युवाच

( नाहं शक्या त्वया स्प्रष्टुं निषादेनेव ब्राह्मणी ।

मा गमिष्यसि दुर्बुद्धे गतिं दुर्गान्तरान्तराम् ॥

द्रौपदी बोली– दुर्बुद्धे! जैसे निषाद ब्राह्मणीका स्पर्श नहीं कर सकता, उसी प्रकार तुम भी मुझे छू नहीं सकते । तुम मेरा तिरस्कार करके भारी - से - भारी दुर्गतिमें न पड़ो । यत्र गच्छन्ति बहवः परदाराभिमर्शकाः । नराः सम्भिन्नमर्यादाः कीटवच्च गुहाशयाः ॥ ) उस दुरवस्थामें न जाओ, जहाँ धर्ममर्यादाका छेदन करनेवाले बहुत-से परस्त्रीगामी मनुष्य बिलमें सोनेवाले कीड़ोंकी भाँति जाया करते हैं ।

अप्रैषीद् राजपुत्री मां सुराहारीं तवान्तिकम् ।

पानमाहर मे क्षिप्रं पिपासा मेऽति चाब्रवीत् ॥ ४ ॥

पृष्ठ 2226

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राजकुमारी सुदेष्णाने मुझे मदिरा लानेके लिये तुम्हारे पास भेजा है । उनका कहना है - ' मुझे बड़े जोरकी प्यास लगी है; अतः शीघ्र मेरे लिये पीने योग्य रस ले आओ ' ॥ ४ ॥

कीचक उवाच

अन्या भद्रे नयिष्यन्ति राजपुत्र्याः प्रतिश्रुतम् ।

इत्येतां दक्षिणे पाणौ सूतपुत्रः परामृशत् ॥ ५ ॥

कीचकने कहा — कल्याणी! राजपुत्री सुदेष्णाकी मँगायी हुई वस्तु दूसरी दासियाँ पहुँचा देंगी । ऐसा कहकर सूतपुत्रने द्रौपदीका दाहिना हाथ पकड़ लिया ॥ ५ ॥

द्रौपद्युवाच यथैवाहं नाभिचरे कदाचित् पतीन् मदाद् वै मनसापि जातु । तेनैव सत्येन वशीकृतं त्वां द्रष्टास्मि पापं परिकृष्यमाणम् ॥ ६ ॥

द्रौपदी बोली - ओ पापी! यदि मैंने आजतक कभी मनसे भी अभिमानवश अपने पतियोंके विरुद्ध आचरण न किया हो तो इस सत्यके प्रभावसे मैं देखूँगी कि तू शत्रुके अधीन होकर पृथ्वीपर घसीटा जा रहा है ॥ ६ ॥

वैशम्पायन उवाच स तामभिप्रेक्ष्य विशालनेत्रां जिघृक्षमाणः परिभर्त्सयन्तीम् । जग्राह तामुत्तरवस्त्रदेशे स कीचकस्तां सहसाऽऽक्षिपन्तीम् ॥ ७ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! बड़े - बड़े नेत्रोंवाली द्रौपदीको इस प्रकार फटकारती देख कीचकने उसे पकड़ लेनेकी इच्छा की; किंतु वह सहसा झटका देकर पीछेकी ओर हटने लगी; इतनेमें ही झपटकर कीचकने उसके दुपट्टेका छोर पकड़ लिया ॥ ७ ॥

प्रगृह्यमाणा तु महाजवेन मुहुर्विनिःश्वस्य च राजपुत्री । तया समाक्षिप्ततनुः स पापः पपात शाखीव निकृत्तमूलः ॥ ८ ॥

अब वह बड़े वेगसे उसे काबूमें लानेका प्रयत्न करने लगा । इधर राजकुमारी द्रौपदी बारंबार लंबी साँसें भरती हुई उससे छूटनेका प्रयत्न करने लगी । उसने सँभलकर दोनों हाथोंसे कीचकको बड़े जोरका धक्का दिया; जिससे वह पापी जड़ - मूलसे कटे वृक्षकी भाँति ( धम्मसे ) जमीनपर जा गिरा ॥ ८ ॥

पृष्ठ 2227

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गृहीता विधुन्वाना भूमावाक्षिप्य कीचकम् ।

सभां शरणमागच्छद् यत्र राजा युधिष्ठिरः ॥ ९ ॥

इस प्रकार पकड़में आनेपर कीचकको धरतीपर गिराकर भयसे काँपती हुई द्रौपदीने भागकर उस राज - सभाकी शरण ली, जहाँ राजा युधिष्ठिर विद्यमान थे ॥

तां कीचकः प्रधावन्तीं केशपाशे परामृशत् ।

अथैनां पश्यतो राज्ञः पातयित्वा पदावधीत् ॥ १० ॥

कीचकने भी उठकर भागती हुई द्रौपदीका पीछा किया और उसका केशपाश पकड़ लिया । फिर उसने राजाके देखते -देखते उसे पृथ्वीपर गिराकर लात मारी ॥

तस्य योऽसौ तदार्केण राक्षसः संनियोजितः ।

स कीचकमपोवाह वातवेगेन भारत ॥ ११ ॥

भारत! इतनेमें ही भगवान् सूर्यने जिस राक्षसको द्रौपदीकी रक्षाके लिये नियुक्त कर रखा था, उसने कीचकको पकड़कर आँधीके समान वेगसे दूर फेंक दिया ॥ ११ ॥

स पपात तदा भूमौ रक्षोबलसमाहतः ।

विघूर्णमानो निश्चेष्टश्छिन्नमूल इव द्रुमः ॥ १२ ॥

राक्षसद्वारा बलपूर्वक आहत होकर कीचकके सारे शरीरमें चक्कर आ गया और वह जड़से कटे हुए वृक्षकी भाँति निश्चेष्ट होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ १२ ॥

( सभायां पश्यतो राज्ञो विराटस्य महात्मनः ।

ब्राह्मणानां च वृद्धानां क्षत्रियाणां च पश्यताम् ॥

तस्याः पादाभितप्ताया मुखाद् रुधिरमास्रवत् ।

तां दृष्ट्वा तत्र ते सभ्या हाहाभूताः समन्ततः ॥

न युक्तं सूतपुत्रेति कीचकेति च मानवाः । किमियं वध्यते बाला कृपणा चाप्यबान्धवा || ) सभामें महामना राजा विराटके तथा वृद्ध ब्राह्मणों और क्षत्रियोंके देखते -देखते कीचकके पादप्रहारसे पीड़ित हुई द्रौपदीके मुँहसे रक्त बहने लगा। उसे उस अवस्थामें देखकर समस्त सभासद् सब ओरसे हाहाकार कर उठे और सब लोग कहने लगे — ' सूतपुत्र कीचक! तुम्हारा यह कार्य उचित नहीं है । यह बेचारी अबला अपने बन्धु - बान्धवोंसे रहित है । इसे क्यों पीड़ा दे रहे हो? '

तां चासीनौ ददृशतुर्भीमसेनयुधिष्ठिरौ ।

अमृष्यमाणौ कृष्णायाः कीचकेन पराभवम् ॥ १३ ॥

उस समय भीमसेन और युधिष्ठिर भी राजसभामें बैठे हुए थे । उन्होंने कीचकके द्वारा द्रौपदीका यह अपमान अपनी आँखों देखा; जिसे वे सहन न कर सके ॥ १३ ॥

तस्य भीमो वधं प्रेप्सुः कीचकस्य दुरात्मनः ।

दन्तैर्दन्तांस्तदा रोषान्निष्पिपेष महामनाः ॥ १४ ॥

पृष्ठ 2228

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महामना भीमसेनदुरात्माकीचकको मार डालनेकी इच्छासे उस समय रोषवश दाँतोंसे दाँत पीसने लगे ॥ १४ ॥

धूमच्छाया ह्यभजतां नेत्रे चोच्छ्रितपक्ष्मणी ।

सस्वेदा भृकुटी चोग्रा ललाटे समवर्तत ॥ १५ ॥

उनकी आँखोंकी पलकें ऊपरको उठकर तन गयीं । उनमें धूआँ- सा छा गया, ललाटमें पसीना निकल आया और भौंहें टेढ़ी होकर भयंकर प्रतीत होने लगीं ॥

हस्तेन ममृजे चैव ललाटं परवीरहा ।

भूयश्च त्वरितः क्रुद्धः सहसोत्थातुमैच्छत ॥ १६ ॥

शत्रुहन्ता भीम हाथसे माथेका पसीना पोंछने लगे । फिर तुरंत ही प्रचण्ड कोपमें भर गये और सहसा उठनेकी इच्छा करने लगे ॥ १६ ॥

अथावमृद्नादङ्गुष्ठमङ्गुष्ठेन युधिष्ठिरः ।

प्रबोधनभयाद् राजा भीमं तं प्रत्यषेधयत् ॥ १७ ॥

तब राजा युधिष्ठिरने रहस्य प्रकट हो जानेके डरसे अपने अँगूठेसे भीमका अँगूठा दबाया और इस प्रकार उन्हें उत्तेजित होनेसे रोका ॥ १७ ॥

तं मत्तमिव मातङ्गं वीक्षमाणं वनस्पतिम् ।

स तमावारयामास भीमसेनं युधिष्ठिरः ॥ १८ ॥

भीमसेन मतवाले गजराजकी भाँति एक वृक्षकी ओर देख रहे थे । तब युधिष्ठिरने उन्हें रोकते हुए कहा – ॥

पृष्ठ 2229

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Gammie विराटकी राजसभामें कीचकद्वारा सैरन्ध्रीका अपमान आलोकयसि किं वृक्षं सूद दारुकृतेन वै ।

पृष्ठ 2230

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यदि ते दारुभिः कृत्यं बहिर्वृक्षान्निगृह्यताम् ॥ १ ९ ॥ ‘ बल्लव! क्या तुम ईंधनके लिये वृक्षकी ओर देखते हो? यदि रसोईके लिये सूखी लकड़ी चाहिये, तो बाहर जाकर वृक्षसे ले लो' ॥ १ ९ ॥

( यस्य चार्द्रस्य वृक्षस्य शीतच्छायां समाश्रयेत् ।

न तस्य पर्णं द्रुह्येत पूर्ववृत्तमनुस्मरन् ॥

‘जिस हरे - भरे वृक्षकी शीतल छायाका आश्रय लेकर रहा जाय, उसके किसी एक पत्तेसे भी द्रोह नहीं करना चाहिये । उसके पहलेके उपकारोंको सदा याद रखकर उसकी

रक्षा करनी चाहिये ' ।

इङ्गितज्ञः स तु भ्रातुस्तूष्णीमासीद् वृकोदरः ॥

भीमस्य तु समारम्भं दृष्ट्वा राज्ञश्च चेष्टितम् ।

द्रौपद्यभ्यधिकं क्रुद्धा प्रारुदत् सा पुनः पुनः ॥

कीचकेनानुगमनात् कृष्णा ताम्रायतेक्षणा । ) तब भाईके संकेतको समझनेवाले भीमसेन उस समय चुप हो गये । भीमके उस क्रोधको तथा राजा युधिष्ठिरकी शान्तिपूर्ण चेष्टाको देखकर द्रौपदी अधिक कुद्ध हो उठी । कीचकके पीछा करनेसे कृष्णाकी आँखें रोषसे लाल हो रही थीं । वह खीझके कारण बार-बार रोने लगी ।

सा सभाद्वारमासाद्य रुदती मत्स्यमब्रवीत् ।

अवेक्षमाणा सुश्रोणी पतींस्तान् दीनचेतसः ॥ २० ॥

इधर सुन्दर कटिप्रान्तवाली द्रौपदी राजसभाके द्वारपर आकर अपने दीन हृदयवाले पतियोंकी ओर देखती हुई मत्स्यनरेशसे बोली ॥ २० ॥

आकारमभिरक्षन्ती प्रतिज्ञाधर्मसंहिता ।

दह्यमानेव रौद्रेण चक्षुषा द्रुपदात्मजा ॥ २१ ॥

उस समय वह प्रतिज्ञारूप धर्मसे आबद्ध होनेके कारण अपने स्वरूपको छिपा रही थी; किंतु उसके नेत्र मानो जला रहे हों, इस प्रकार भयंकर हो उठे थे ॥ २१ ॥

(द्रौपद्युवाच

प्रजारक्षणशीलानां राज्ञां ह्यमिततेजसाम् ।

कार्यं हि पालनं नित्यं धर्मे सत्ये च तिष्ठताम् ॥

स्वप्रजायां प्रजायां च विशेषं नाधिगच्छताम् । द्रौपदीने कहा — जों स्वभावसे ही प्रजाजनोंकी रक्षामें लगे हुए हैं, सदा धर्म और सत्यके मार्गमें स्थित हैं तथा प्रजा और अपनी संतानमें कोई अन्तर नहीं समझते, उन

अमिततेजस्वी राजाओंको चाहिये कि वे सदा आश्रितजनोंका पालन एवं संरक्षण करें ।

प्रियेष्वपि च द्वेष्येषु समत्वं ये समाश्रिताः ॥