श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 2331–2340

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2331–2340

पृष्ठ 2331

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‘ जिधरसे आक्रमणका निश्चय हो, उसी ओर हम कौरव सैनिकोंके साथ चलें । महारथी सुशर्मा भी त्रिगर्तोंके साथ निश्चित दिशाकी ओर जायँ और अपने समस्त बल ( सेना) एवं वाहनोंको साथ ले लें ॥ २१ ॥

प्रागेव हि सुसंवीतो मत्स्यस्य विषयं प्रति ।

जघन्यतो वयं तत्र यास्यामो दिवसान्तरे ।

विषयं मत्स्यराजस्य सुसमृद्धं सुसंहताः ॥ २२ ॥

‘ सब साधनोंसे सम्पन्न हो सुशर्मा पहले मत्स्यदेशपर आक्रमण करें। फिर पीछेसे एक दिन बाद हमलोग भी पूर्णतः संगठित हो मत्स्यनरेशके समृद्धिशाली राज्यपर धावा बोल देंगे ॥ २२ ॥

ये यान्तु सहितास्तत्र विराटनगरं प्रति ।

क्षिप्रं गोपान् समासाद्य गृह्णन्तु विपुलं धनम् ॥ २३ ॥

‘ त्रिगर्त - सैनिक एक साथ मिलकर तुरंत विराट - नगरपर चढ़ाई करें और पहले ग्वालोंके पास पहुँचकर वहाँके बढ़े हुए गोधनपर अधिकार कर लें ॥ २३ ॥

गवां शतसहस्राणि श्रीमन्ति गुणवन्ति च ।

वयमप्यनुगृह्णीमो द्विधा कृत्वा वरूथिनीम् ॥ २४ ॥

‘ फिर हमलोग अपनी सेनाको दो टुकड़ोंमें बाँटकर उनकी लाखों सुन्दर तथा गुणवती गौओंका अपहरण करेंगे ' ॥ २४ ॥

वैशम्पायन उवाच

ते स्म गत्वा यथोद्दिष्टां दिशं वह्नेर्महीपते ।

संनद्धा रथिनः सर्वे सपदाता बलोत्कटाः ॥ २५ ॥

प्रति वैरं चिकीर्षन्तो गोषु गृद्धा महाबलाः ।

आदातुं गाः सुशर्माथ कृष्णपक्षस्य सप्तमीम् ॥ २६ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -महाराज! तदनन्तर पूर्व वैरका बदला लेनेकी इच्छावाले त्रिगर्तदेशीय रथी और पैदल सैनिक कवच आदि धारण करके तैयार हो गये । वे सभी महान् बलवान् और प्रचण्ड पराक्रमी थे । सुशर्माने विराटकी गौओंका अपहरण करनेके लिये पूर्वनिश्चित योजनाके अनुसार कृष्णपक्षकी सप्तमीको अग्निकोणकी ओरसे विराटनगरपर चढ़ाई की ॥ २५-२६ ॥

अपरे दिवसे सर्वे राजन् सम्भूय कौरवाः ।

अष्टम्यां ते न्यगृह्णन्त गोकुलानि सहस्रशः ॥ २७ ॥

राजन्! फिर दूसरे दिन अष्टमीको दूसरी ओरसे सब कौरवोंने मिलकर धावा किया और गौओंके सहस्रों झुंडोंपर अधिकार जमा लिया ॥ २७ ॥

पृष्ठ 2332

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इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि दक्षिणगोग्रहे सुशर्माभियाने त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें दक्षिणदिशाकी गौओंको ग्रहण करनेके लिये सुशर्मा आदिकी मत्स्यदेशपर चढ़ाईसे सम्बन्ध रखनेवाला तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३० ॥

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एकत्रिंशोऽध्यायः चारों पाण्डवोंसहित राजा विराटकी सेनाका युद्धके लिये प्रस्थान वैशम्पायन उवाच

ततस्तेषां महाराज तत्रैवामिततेजसाम् ।

छद्मलिङ्गप्रविष्टानां पाण्डवानां महात्मनाम् ॥ १ ॥

व्यतीतः समयः सम्यग् वसतां वै पुरोत्तमे ।

कुर्वतां तस्य कर्माणि विराटस्य महीपतेः ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - महाराज! उन दिनों छद्मवेषमें छिपकर उस श्रेष्ठ नगरमें रहते और महाराज विराटके कार्य सम्पादन करते हुए अतुलित तेजस्वी महात्मा पाण्डवोंका तेरहवाँ वर्ष भलीभाँति बीत चुका था ॥ १-२ ॥

कीचके तु हते राजा विराटः परवीरहा ।

परां सम्भावनां चक्रे कुन्तीपुत्रे युधिष्ठिरे ॥ ३ ॥

कीचकके मारे जानेपर शत्रुहन्ता राजा विराट कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरके प्रति बड़ी आदरबुद्धि रखने और उनसे बड़ी - बड़ी आशाएँ करने लगे थे ॥ ३ ॥

ततस्त्रयोदशस्यान्ते तस्य वर्षस्य भारत ।

सुशर्मणा गृहीतं तद् गोधनं तरसा बहु ॥ ४ ॥

भारत! तदनन्तर तेरहवें वर्षके अन्तमें सुशर्माने बड़े वेगसे आक्रमण करके विराटकी बहुत- सी गौओंको अपने अधिकारमें कर लिया ॥ ४ ॥

(ततः शब्दो महानासीद् रेणुश्च दिवमस्पृशत् ।

शङ्खदुन्दुभिघोषश्च भेरीणां च महास्वनः ॥

गवाश्वरथनागानां नराणां च पदातिनाम् । इससे उस समय बड़ा भारी कोलाहल मचा । धरतीकी धूल उड़कर ऊँचे आकाशमें व्याप्त हो गयी । शंख, दुन्दुभि तथा नगारोंके महान् शब्द सब ओर गूँज उठे । बैलों, घोड़ों,

रथों, हाथियों तथा पैदल सैनिकोंकी आवाज सब ओर फैल गयी ।

एवं तैस्त्वभिनिर्याय मत्स्यराजस्य गोधने ॥

त्रिगर्तैर्गृह्यमाणे तु गोपालाः प्रत्यषेधयन् । इस प्रकार इन सबके साथ आक्रमण करके जब त्रिगर्तदेशीय योद्धा मत्स्यराजके

गोधनको लेकर जाने लगे, उस समय उन गौओंके रक्षकोंने उन सैनिकोंको रोका ।

अथ त्रिगर्ता बहवः परिगृह्य धनं बहु ॥

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परिक्षिप्य हयैः शीघ्रै रथव्रातैश्च भारत ।

गोपालान् प्रत्ययुध्यन्त रणे कृत्वा जये धृतिम् ॥

ते हन्यमाना बहुभिः प्रासतोमरपाणिभिः ।

गोपाला गोकुले भक्ता वारयामासुरोजसा ।

परश्वधैश्च मुसलैर्भिन्दिपालैश्च मुद्गरैः ॥

गोपालाः कर्षणैश्चित्रैर्जघ्नुरश्वान् समन्ततः । भारत! तब त्रिगर्तोंने बहुत सा धन लेकर उसे अपने अधिकारमें करके शीघ्रगामी अश्वों तथा रथसमूहोंद्वारा युद्धमें विजयका दृढ़ संकल्प लेकर उन गोरक्षकोंका सामना करना आरम्भ किया । त्रिगर्तोंकी संख्या बहुत थी । वे हाथोंमें प्रास और तोमर लेकर विराटके ग्वालोंको मारने लगे; तथापि गोसमुदायके प्रति भक्तिभाव रखनेवाले वे ग्वाले बलपूर्वक उन्हें रोके रहे । उन्होंने फरसे, मूसल, भिन्दिपाल, मुद्गर तथा ' कर्षण ' नामक विचित्र

शस्त्रोंद्वारा सब ओरसे शत्रुओंके अश्वोंको मार भगाया ।

ते हन्यामानाः संक्रुद्धास्त्रिगर्ता रथयोधिनः ॥

विसृज्य शरवर्षाणि गोपिन् व्यद्रावयन् रणे । ) ग्वालोंके आघातसे अत्यन्त कुपित हो रथोंद्वारा युद्ध करनेवाले त्रिगर्तसैनिक बाणोंकी वर्षा करके उन ग्वालोंको रणभूमिसे खदेड़ने लगे ।

ततो जवेन महता गोपः पुरमथाव्रजत् ।

स दृष्ट्वा मत्स्यराजं च रथात् प्रस्कन्द्य कुण्डली ॥ ५ ॥

तब उन गौओंका रक्षक गोप, जिसने कानोंमें कुण्डल पहन रखे थे, रथपर आरूढ़ हो तीव्र गतिसे नगरमें आया और मत्स्यराजको देखकर दूरसे ही रथसे उतर पड़ा ॥ ५ ॥

शूरैः परिवृतं योधैः कुण्डलाङ्गदधारिभिः ।

संवृतं मन्त्रिभिः सार्धं पाण्डवैश्च महात्मभिः ॥ ६ ॥

तं सभायां महाराजमासीनं राष्ट्रवर्धनम् । अपने राष्ट्रकी उन्नति करनेवाले महाराज विराट कुण्डल तथा अंगद ( बाजूबन्द) -धारी शूरवीर योद्धाओंसे घिरकर मन्त्रियों तथा महात्मा पाण्डवोंके साथ राजसभामें बैठे थे ॥ ६ ¾ ॥ सोऽब्रवीदुपसंगम्य विराटं प्रणतस्तदा ॥ ७ ॥

अस्मान् युधि विनिर्जित्य परिभूय सबान्धवान् ।

गवां शतसहस्राणि त्रिगर्ताः कालयन्ति ते ॥ ८ ॥

उस समय उनके पास जाकर गोपने प्रणाम करके कहा - ' महाराज! त्रिगर्तदेशके सैनिक हमें युद्धमें जीतकर और भाई- बन्धुओंसहित हमारा तिरस्कार करके आपकी लाखों गौओंको हाँककर लिये जा रहे हैं ॥ ७-८ ॥ तान् परीप्सस्व राजेन्द्र मा नेशुः पशवस्तव ।

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तच्छ्रुत्वा नृपतिः सेनां मत्स्यानां समयोजयत् ॥ ९ ॥

' राजेन्द्र! उन्हें वापस लेने — छुड़ानेकी चेष्टा कीजिये; जिससे आपके वे पशु नष्ट न हो जायँ— आपके हाथोंसे दूर न निकल जायँ । ' यह सुनकर राजाने मत्स्यदेशकी सेना एकत्र की ॥ ९ ॥

रथनागाश्वकलिलां पत्तिध्वजसमाकुलाम् ।

राजानो राजपुत्राश्च तनुत्राण्यथ भेजिरे ॥ १० ॥

उसमें रथ, हाथी, घोड़े और पैदल - सब प्रकारके सैनिक भरे थे और वह सेना ध्वजा-पताकाओंसे व्याप्त थी। फिर राजा तथा राजकुमारोंने पृथक्- पृथक् कवच धारण किये ॥ १० ॥

भानुमन्ति विचित्राणि शूरसेव्यानि भागशः ।

सवज्रायसगर्भं तु कवचं तत्र काञ्चनम् ॥ ११ ॥

विराटस्य प्रियो भ्राता शतानीकोऽभ्यहारयत् । वे कवच बड़े चमकीले, विचित्र और शूरवीरोंके धारण करने योग्य थे । राजा विराटके प्रिय भाई शतानीकने सुवर्णमय कवच ग्रहण किया, जिसके भीतर हीरे और लोहेकी जालियाँ लगी थीं ॥ ११३ ॥

सर्वपारसवं वर्म कल्याणपटलं दृढम् ॥ १२ ॥

शतानीकादवरजो मदिराक्षोऽभ्यहारयत् । शतानीकसे छोटे भाईका नाम मदिराक्ष था । उन्होंने सुवर्णपत्रसे आच्छादित सुदृढ़ कवच धारण किया, जो सारा का सारा सम्पूर्ण अस्त्र- शस्त्रोंको सहन करनेमें समर्थ फौलादका बना हुआ था ॥ १२ ॥

शतसूर्यं शतावर्तं शतबिन्दु शताक्षिमत् ॥ १३ ॥

अभेद्यकल्पं मत्स्यानां राजा कवचमाहरत् ।

उत्सेधे यस्य पद्मानि शतं सौगन्धिकानि च ॥ १४ ॥

मत्स्यदेशके राजा विराटने अभेद्यकल्प नामक कवच ग्रहण किया, जो किसी भी अस्त्र-शस्त्रसे कट नहीं सकता था । उसमें सूर्यके समान चमकीली सौ फूलियाँ लगी थीं, सौ भँवरें बनी थीं, सौ बिन्दु ( सूक्ष्म चक्र) और सौ नेत्रके समान आकारवाले चक्र बने थे । इसके सिवा उसमें नीचेसे ऊपरतक सौगन्धिक ( कह्लार ) जातिके सौ कमलोंकी आकृतियाँ पंक्तिबद्ध बनी हुई थीं ॥ १३-१४ ॥

सुवर्णपृष्ठं सूर्याभं सूर्यदत्तोऽभ्यहारयत् ।

दृढमायसगर्भं च श्वेतं वर्म शताक्षिमत् ॥ १५ ॥

विराटस्य सुतो ज्येष्ठो वीरः शङ्खोऽभ्यहारयत् । सेनापति सूर्यदत्त ( शतानीक ) ने पृष्ठभागमें सुवर्णजटित एवं सूर्यके समान चमकीला कवच पहन रखा था । विराटके ज्येष्ठ पुत्र वीरवर शंखने श्वेत रंगका एक सुदृढ़ कवच धारण

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किया, जिसके भीतरी भागमें लोहा लगा था और ऊपर नेत्रके समान सौ चिह्न बने हुए थे ॥ शतशश्च तनुत्राणि यथास्वं ते महारथाः ॥ १६ ॥

योत्स्यमाना अनह्यन्त देवरूपाः प्रहारिणः । इसी प्रकार सैकड़ों देवताओंके समान रूपवान् महारथियोंने युद्धके लिये उद्यत हो अपने - अपने वैभवके अनुसार कवच पहन लिये । वे सब- के - सब प्रहार करनेमें कुशल थे ॥ १६ ॥

सूपस्करेषु शुभ्रेषु महत्सु च महारथाः ॥ १७ ॥

पृथक् काञ्चनसंनाहान् रथेष्वश्वानयोजयन् । उन महारथियोंने सुन्दर पहियोंवाले विशाल एवं उज्ज्वल रथोंमें पृथक् - पृथक् सोनेके बख्तर धारण कराये हुए घोड़ोंको जोता ॥ १७३ ॥

सूर्यचन्द्रप्रतीकाशे रथे दिव्ये हिरण्मये ॥ १८ ॥

महानुभावो मत्स्यस्य ध्वज उच्छिश्रिये तदा । मत्स्यराजके सुवर्णमय दिव्य रथमें, जो सूर्य और चन्द्रमाके समान प्रकाशित हो रहा था, उस समय बहुत ऊँची ध्वजा फहराने लगी ॥ १८६३ ॥

अथान्यान् विविधाकारान् ध्वजान् हेमपरिष्कृतान् ॥ १ ९ ॥ यथास्वं क्षत्रियाः शूरा रथेषु समयोजयन् । इसी प्रकार अन्य शूरवीर क्षत्रियोंने अपने - अपने रथोंमें यथाशक्ति सुवर्णमण्डित नाना प्रकारकी ध्वजाएँ फहरायीं ॥

(रथेषु युज्यमानेषु कङ्को राजानमब्रवीत् ।

मयाप्यस्त्रं चतुर्मार्गमवाप्तमृषिसत्तमात् ॥

दंशितो रथमास्थाय पदं निर्याम्यहं गवाम् ।

अयं च बलवाञ्छूरो बल्लवो दृश्यतेऽनघ ॥

गोसंख्यमश्वबन्धं च रथेषु समयोजय । नैते न जातु युध्येयुर्गवार्थमिति मे मतिः ॥ ) अथ मत्स्योऽब्रवीद् राजा शतानीकं जघन्यजम् ॥ २० ॥

जब रथ जोते जा रहे थे, उस समय कंकने राजा विराटसे कहा – ' मैंने भी एक श्रेष्ठ महर्षिसे चार मार्गोंवाले धनुर्वेदकी शिक्षा प्राप्त की है, अतः मैं भी कवच धारण करके रथपर बैठकर गौओंके पदचिह्नोंका अनुसरण करूँगा । निष्पाप नरेश! यह बल्लव नामक रसोइया भी बलवान् एवं शूरवीर दिखायी देता है, इसे गौओंकी गणना करनेवाले गोशालाध्यक्ष तन्तिपाल तथा अश्वोंकी शिक्षाका प्रबन्ध करनेवाले ग्रन्थिकको भी रथोंपर बिठा दीजिये । मेरा विश्वास है कि ये गौओंके लिये युद्ध करनेसे कदापि मुँह नहीं मोड़ सकते । ’ तदनन्तर मत्स्यराजने अपने छोटे भाई शतानीकसे कहा- ॥ २० ॥

कङ्कबल्लवगोपाला दामग्रन्थिश्च वीर्यवान् ।

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युद्धयेयुरिति मे बुद्धिर्वर्तते नात्र संशयः ॥ २१ ॥

‘ भैया! मेरे विचारमें यह बात आती है कि ये कंक, बल्लव, तन्तिपाल और ग्रन्थिक भी युद्ध कर सकते हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ २१ ॥

एतेषामपि दीयन्तां रथा ध्वजपताकिनः ।

कवचानि च चित्राणि दृढानि च मृदूनि च ॥ २२ ॥

प्रतिमुञ्चन्तु गात्रेषु दीयन्तामायुधानि च ।

वीराङ्गरूपाः पुरुषा नागराजकरोपमाः ॥ २३ ॥

‘ अतः इनके लिये भी ध्वजा और पताकाओंसे सुशोभित रथ दो । ये भी अपने अंगोंमें ऊपरसे दृढ़, किंतु भीतरसे कोमल और विचित्र कवच धारण कर लें । फिर इन्हें भी सब प्रकारके अस्त्र - शस्त्र अर्पित करो । इनके अंग और स्वरूप वीरोचित जान पड़ते हैं । इन वीर पुरुषोंकी भुजाएँ गजराजकी सूँड़दण्डकी भाँति शोभा पाती हैं ॥ २२-२३ ॥ नेमे जातु न युध्येरन्निति मे धीयते मतिः ।

एतच्छ्रुत्वा तु नृपतेर्वाक्यं त्वरितमानसः ।

शतानीकस्तु पार्थेभ्यो रथान् राजन् समादिशत् ॥ २४ ॥

‘ ये युद्ध न करते हों, यह कदापि सम्भव नहीं अर्थात् ये अवश्य युद्धकुशल हैं । मेरी बुद्धिका तो ऐसा ही निश्चय है । ' जनमेजय! राजाका यह वचन सुनकर शतानीकने उतावले मनसे कुन्तीपुत्रोंके लिये शीघ्रतापूर्वक रथ लानेका आदेश दिया ॥ २४ ॥

सहदेवाय राज्ञे च भीमाय नकुलाय च ।

तान् प्रहृष्टांस्ततः सूता राजभक्तिपुरस्कृताः ॥ २५ ॥

निर्दिष्टा नरदेवेन रथाञ्छीघ्रमयोजयन् । सहदेव, राजा युधिष्ठिर, भीम और नकुल – इन चारोंके लिये रथ लानेकी आज्ञा हुई । इस बातसे पाण्डव बड़े प्रसन्न थे । तब राजभक्त सारथि महाराज विराटके बताये अनुसार रथोंको शीघ्रतापूर्वक जोतकर ले आये ॥ कवचानि विचित्राणि मृदूनि च दृढानि च ॥ २६ ॥

विराटः प्रादिशद् यानि तेषामक्लिष्टकर्मणाम् ।

तान्यामुच्य शरीरेषु दंशितास्ते परंतपाः ॥ २७ ॥

उसके बाद अनायास ही महान् पराक्रम करनेवाले पाण्डुपुत्रोंको राजा विराटने अपने हाथसे विचित्र कवच प्रदान किये, जो ऊपरसे सुदृढ़ और भीतरसे कोमल थे । उन्हें लेकर उन वीरोंने अपने अंगोंमें यथास्थान बाँध लिया ॥ २६-२७ ॥

रथान् हयैः सुसम्पन्नानास्थाय च नरोत्तमाः ।

निर्ययुर्मुदिताः पार्थाः शत्रुसंघावमर्दिनः ॥ २८ ॥

पृष्ठ 2338

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शत्रुसमूहको रौंद डालनेवाले वे नरश्रेष्ठ कुन्तीपुत्र घोड़े जुते हुए रथोंपर बैठकर बड़ी प्रसन्नताके साथ राजभवनसे बाहर निकले ॥ २८ ॥

तरस्विनश्छन्नरूपाः सर्वे युद्धविशारदाः ।

रथान् हेमपरिच्छन्नानास्थाय च महारथाः ॥ २९ ॥

विराटमन्वयुः पार्थाः सहिताः कुरुपुङ्गवाः ।

चत्वारो भ्रातरः शूराः पाण्डवाः सत्यविक्रमाः ॥ ३० ॥

वे बड़े वेगसे चले । उन्होंने अपने यथार्थ स्वरूपको अभीतक छिपा रखा था । वे सब- के - सब युद्धकी कलामें अत्यन्त निपुण थे । कुरुवंशशिरोमणि वे चारों महारथी कुन्तीकुमार सुवर्णमण्डित रथोंपर आरूढ़ हो एक ही साथ विराटके पीछे - पीछे चले । चारों भाई पाण्डव शूरवीर और सत्यपराक्रमी थे ॥ २ ९ -३० ॥

( दीर्घाणां च दृढानां च धनुषां ते यथाबलम् ।

उत्कृष्य पाशान् मौर्वीणां वीराश्चापेष्वयोजयन् ॥

ततः सुवाससः सर्वे ते वीराश्चन्दनोक्षिताः ।

चोदिता नरदेवेन क्षिप्रमश्वानचोदयन् ॥

ते हया हेमसंच्छन्ना बृहन्तः साधुवाहिनः । चोदिताः प्रत्यदृश्यन्त पक्षिणामिव पङ्क्तयः ॥ ) उन वीरोंने अपने विशाल और सुदृढ़ धनुषोंकी डोरियोंको यथाशक्ति ऊपर खींचकर धनुषके दूसरे सिरेपर चढ़ाया । फिर सुन्दर वस्त्र धारण करके चन्दनसे चर्चित हो उन समस्त वीर पाण्डवोंने नरदेव विराटकी आज्ञासे शीघ्रतापूर्वक अपने घोड़े हाँक दिये । अच्छी तरह रथका भार वहन करनेवाले वे स्वर्णभूषित विशाल अश्व हाँके जानेपर श्रेणीबद्ध होकर उड़ते हुए पक्षियोंके समान दिखायी देने लगे ।

भीमाश्च मत्तमातङ्गाः प्रभिन्नकरटामुखाः ।

क्षरन्तश्चैव नागेन्द्राः सुदन्ताः षष्टिहायनाः ॥ ३१ ॥

स्वारूढा युद्धकुशलैः शिक्षिता हस्तिसादिभिः ।

राजानमन्वयुः पश्चाच्चलन्त इव पर्वताः ॥ ३२ ॥

जिनके गण्डस्थलसे मदकी धारा बहती थी, ऐसे भयंकर मतवाले हाथी तथा सुन्दर दाँतोंवाले साठ वर्षके मदवर्षी गजराज, जिन्हें युद्धकुशल महावतोंने शिक्षा दी थी, सवारोंको अपनी पीठपर चढ़ाये राजा विराटके पीछे - पीछे इस प्रकार जा रहे थे, मानो चलते - फिरते पर्वत हों ॥ ३१-३२ ॥

विशारदानां मुख्यानां हृष्टानां चारुजीविनाम् ।

अष्टौ रथसहस्राणि दश नागशतानि च ॥ ३३ ॥

षष्टिश्चाश्वसहस्राणि मत्स्यानामभिनिर्ययुः ।

तदनीकं विराटस्य शुशुभे भरतर्षभ ॥ ३४ ॥

पृष्ठ 2339

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युद्धकी कलामें कुशल, प्रसन्न रहनेवाले तथा उत्तम जीविकावाले मत्स्यदेशके प्रधान-प्रधान वीरोंकी उस सेनामें आठ हजार रथी, एक हजार हाथीसवार तथा साठ हजार घुड़सवार थे, जो युद्धके लिये तैयार होकर निकले थे । भरतर्षभ! उनसे विराटकी वह विशाल वाहिनी अत्यन्त सुशोभित हो रही थी ॥ ३३-३४ ॥ सम्प्रयातं तदा राजन् निरीक्षन्तं गवां पदम् ।

तद् बलाग्रयं विराटस्य सम्प्रस्थितमशोभत ।

दृढायुधजनाकीर्णं गजाश्वरथसंकुलम् ॥ ३५ ॥

राजन्! उस समय गौओंके पदचिह्न देखती युद्धके लिये प्रस्थित हुई विराटकी वह श्रेष्ठ सेना अपूर्व शोभा पा रही थी । उसमें ऐसे पैदल सैनिक भरे थे, जिनके हाथोंमें मजबूत हथियार थे । साथ ही हाथी, घोड़े तथा रथके सवारोंसे भी वह सेना परिपूर्ण थी ॥ ३५ ॥

इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि दक्षिणगोग्रहे मत्स्यराजरणोद्योगे एकत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें दक्षिणदिशाकी ओरसे गौओंके अपहरणके प्रसंगमें मत्स्यराजविराटके युद्धोद्योगसे सम्बद्ध इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १३ श्लोक मिलाकर कुल ४८ श्लोक हैं । )

पृष्ठ 2340

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द्वात्रिंशोऽध्यायः मत्स्य तथा त्रिगर्तदेशीय सेनाओंका परस्पर युद्ध वैशम्पायन उवाच

निर्याय नगराच्छूरा व्यूढानीकाः प्रहारिणः ।

त्रिगर्तानस्पृशन् मत्स्याः सूर्ये परिणते सति ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -राजन्! नगरसे निकलकर प्रहार करनेमें कुशल वे मत्स्यदेशीय वीर योद्धा अपनी सेनाका व्यूह बनाकर चले और सूर्यके ढलते - ढलते उन्होंने त्रिगर्तोंको पकड़ लिया ॥ १ ॥

ते त्रिगर्ताश्च मत्स्याश्च संरब्धा युद्धदुर्मदाः ।

अन्योन्यमभिगर्जन्तो गोषु गृद्धा महाबलाः ॥ २ ॥

फिर तो क्रोधमें भरकर युद्धके लिये उन्मत्त हुए वे त्रिगर्त और मत्स्यदेशके महाबली वीर गौओंको ले जानेकी इच्छासे एक- दूसरेको लक्ष्य करके गर्जना करने लगे ॥ २ ॥

भीमाश्च मत्तमातङ्गास्तोमराङ्कुशनोदिताः ।

ग्रामणीयैः समारूढाः कुशलैर्हस्तिसादिभिः ॥ ३ ॥

तेषां समागमो घोरस्तुमुलो लोमहर्षणः ।

घ्नतां परस्परं राजन् यमराष्ट्रविवर्धनः ॥ ४ ॥

हाथियोंपर चढ़कर उन्हें चलानेमें कुशल श्रेष्ठ महावतोंद्वारा तोमरों और अंकुशोंकी मारसे आगे बढ़ाये हुए भयंकर और मतवाले गजराज दोनों ओरसे एक- दूसरेपर टूट पड़े । परस्पर शस्त्रोंका प्रहार करनेवाले हाथीसवारोंका वह कोलाहलपूर्ण भयंकर युद्ध रोंगटे खड़े कर देनेवाला एवं महासंहारकारी था ॥ ३-४ ॥

देवासुरसमो राजन्नासीत् सूर्येऽवलम्बति ।

पदातिरथनागेन्द्रहयारोहबलौघवान् ॥ ५ ॥

राजन्! सूर्य पश्चिमकी ओर ढल रहे थे । उस समय पैदल, रथी, हाथीसवार तथा घुड़सवारोंके समूहसे भरा हुआ वह युद्ध देवासुरसंग्रामके समान हो रहा था ॥ ५ ॥

अन्योन्यमभ्यापततां निघ्नतां चेतरेतरम् ।

उदतिष्ठद् रजो भौमं न प्राज्ञायत किंचन ॥ ६ ॥

एक- दूसरेपर धावा बोलकर आपसमें मार- काट मचानेवाले उन सैनिकोंके पदाघातसे इतनी धूल उड़ी कि कुछ भी सूझ- बूझ नहीं पड़ता था ॥ ६ ॥

पक्षिणश्चापतन् भूमौ सैन्येन रजसाऽऽवृताः ।

इषुभिर्व्यतिसर्पद्भिरादित्योऽन्तरधीयत ॥ ७ ॥