श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 371–380

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 371–380

पृष्ठ 371

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 371 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

स्थास्येते सिंहविक्रान्तावश्विनाविव दुःसहौ ॥ ७ ॥

न शेषमिह पश्यामि मम सैन्यस्य संजय ।

तौ प्रतिरथो युद्धे देवपुत्रौ महारथौ ॥ ८ ॥

‘जिस समय भीमसेन और अर्जुनको आगे रखकर वे दोनों सिंहके समान पराक्रमी और अश्विनीकुमारोंके समान दुःसह वीर युद्धके मुहाने पर खड़े होंगे, उस समय मुझे अपनी सेनाका कोई वीर शेष रहता नहीं दिखायी देता है । संजय! देवपुत्र महारथी नकुल- सहदेव

युद्धमें अनुपम हैं । कोई भी रथी उनका सामना नहीं कर सकता ॥ ७-८ ॥

द्रौपद्यास्तं परिक्लेशं न क्षंस्येते त्वमर्षिणौ ।

वृष्णयोऽथ महेष्वासाः पञ्चाला वा महौजसः ॥ ९ ॥

युधि सत्याभिसंधेन वासुदेवेन रक्षिताः ।

प्रधक्ष्यन्ति रणे पार्थाः पुत्राणां मम वाहिनीम् ॥ १० ॥

' अमर्षमें भरे हुए माद्रीकुमार द्रौपदीको दिये गये उस कष्टको कभी क्षमा नहीं करेंगे । महान् धनुर्धर वृष्णिवंशी, महातेजस्वी पांचाल योद्धा और युद्धमें सत्यप्रतिज्ञ वासुदेव श्रीकृष्णसे सुरक्षित कुन्तीपुत्र निश्चय ही मेरे पुत्रोंकी सेनाको भस्म कर डालेंगे ॥ ९ -१० ॥

रामकृष्णप्रणीतानां वृष्णीनां सूतनन्दन ।

न शक्यः सहितुं वेगः सर्वैस्तैरपि संयुगे ॥ ११ ॥

‘सूतनन्दन! बलराम और श्रीकृष्णसे प्रेरित वृष्णि- वंशी योद्धाओंके वेगको युद्धमें समस्त कौरव मिलकर भी नहीं सह सकते ॥ ११ ॥

तेषां मध्ये महेष्वासो भीमो भीमपराक्रमः ।

शैक्यया वीरघातिन्या गदया विचरिष्यति ॥ १२ ॥

तथा गाण्डीवनिर्घोषं विस्फूर्जितमिवाशनेः ।

गदावेगं च भीमस्य नालं सोढुं नराधिपाः ॥ १३ ॥

' उनके बीचमें जब भयानक पराक्रमी महान् धनुर्धर भीमसेन बड़े - बड़े वीरोंका संहार करनेवाली आकाशमें ऊपर उठी हुई गदा लिये विचरेंगे तब उन भीमकी गदाके वेगको तथा वज्रगर्जनके समान गाण्डीव धनुषकी टंकारको भी कोई नरेश नहीं सह सकता ॥ १२-१३ ॥

ततोऽहं सुहृदां वाचो दुर्योधनवशानुगः ।

स्मरणीयाः स्मरिष्यामि मया या न कृताः पुरा ॥ १४ ॥

' उस समय मैं दुर्योधनके वशमें होनेके कारण अपने हितैषी सुहृदोंकी उन याद रखनेयोग्य बातोंको याद करूँगा, जिनका पालन मैंने पहले नहीं किया' ॥ १४ ॥

संजय उवाच व्यतिक्रमोऽयं सुमहांस्त्वया राजन्नुपेक्षितः ।

पृष्ठ 372

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 372 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

समर्थेनापि यन्मोहात् पुत्रस्ते न निवारितः ॥ १५ ॥

संजयने कहा — राजन्! आपके द्वारा यह बहुत बड़ा अन्याय हुआ है, जिसकी आपने जान -बूझकर उपेक्षा की है ( उसे रोकनेकी चेष्टा नहीं की है ); वह यह है कि आपने समर्थ होते हुए भी मोहवश अपने पुत्रको कभी रोका नहीं ॥ १५ ॥

श्रुत्वा हि निर्जितान् द्यूते पाण्डवान् मधुसूदनः ।

त्वरितः काम्यके पार्थान् समभावयदच्युतः ॥ १६ ॥

भगवान् मधुसूदनने ज्यों ही सुना कि पाण्डव द्यूतमें पराजित हो गये, त्यों ही वे काम्यकवनमें पहुँचकर कुन्तीपुत्रोंसे मिले और उन्हें आश्वासन दिया ॥ १६ ॥

द्रुपदस्य तथा पुत्रा धृष्टद्युम्नपुरोगमाः ।

विराटो धृष्टकेतुश्च केकयाश्च महारथाः ॥ १७ ॥

इसी प्रकार द्रुपदके धृष्टद्युम्न आदि पुत्र, विराट, धृष्टकेतु और महारथी कैकय – इन सबने पाण्डवोंसे भेंट की ॥ १७ ॥

तैश्च यत् कथितं राजन् दृष्ट्वा पार्थान् पराजितान् ।

चारेण विदितं सर्वं तन्मयाऽऽवेदितं च ते ॥ १८ ॥

राजन्! पाण्डवोंको जूएमें पराजित देखकर उन सबने जो बातें कहीं, उन्हें गुप्तचरोंद्वारा जानकर मैंने आपकी सेवामें निवेदन कर दिया था ॥ १८ ॥

समागम्य वृतस्तत्र पाण्डवैर्मधुसूदनः ।

सारथ्ये फाल्गुनस्याजौ तथेत्याह च तान् हरिः ॥ १ ९ ॥

पाण्डवोंने मिलकर मधुसूदन श्रीकृष्णको युद्धमें अर्जुनका सारथि होनेके लिये वरण किया और श्रीहरिने ' तथास्तु ' कहकर उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया ॥ १ ९ ॥

अमर्षितो हि कृष्णोऽपि दृष्ट्वा पार्थांस्तथा गतान् ।

कृष्णाजिनोत्तरासंगानब्रवीच्च युधिष्ठिरम् ॥ २० ॥

भगवान् श्रीकृष्ण भी कुन्तीपुत्रोंको उस अवस्थामें काला मृगचर्म ओढ़कर आये हुए देख उस समय अमर्षमें भर गये और युधिष्ठिरसे इस प्रकार बोले- ॥ २० ॥

या सा समृद्धिः पार्थानामिन्द्रप्रस्थे बभूव ह ।

राजसूये मया दृष्टा नृपैरन्यैः सुदुर्लभा ॥ २१ ॥

‘ इन्द्रप्रस्थमें कुन्तीकुमारोंके पास जो समृद्धि थी तथा राजसूययज्ञके समय जिसे मैंने अपनी आँखों देखा था, वह अन्य नरेशोंके लिये अत्यन्त दुर्लभ थी ॥ २१ ॥

यत्र सर्वान् महीपालाञ्छस्त्रतेजोभयार्दितान् ।

सवङ्गाङ्गान् सपौण्ड्रोड्रान् सचोलद्राविडान्ध्रकान् ॥ २२ ॥

सागरानूपकांश्चैव ये च प्रान्ताभिवासिनः ।

सिंहलान् बर्बरान् म्लेच्छान् ये च लङ्कानिवासिनः ॥ २३ ॥

पश्चिमानि च राष्ट्राणि शतशः सागरान्तिकान् ।

पृष्ठ 373

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 373 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पह्लवान् दरदान् सर्वान् किरातान् यवनाञ्छकान् ॥ २४ ॥

हारहूणांश्च चीनांश्च तुषारान् सैन्धवांस्तथा ।

जागुडान् रामठान् मुण्डान् स्त्रीराज्यमथ तङ्गणान् ॥ २५ ॥

केकयान् मालवांश्चैव तथा काश्मीरकानपि ।

अद्राक्षमहमाहूतान् यज्ञे ते परिवेषकान् ॥ २६ ॥

‘ उस समय सब भूमिपाल पाण्डवोंके शस्त्रोंके तेजसे भयभीत थे । अंग, वंग, पुण्ड्र, उड्र, चोल, द्राविड़, आन्ध्र, सागरतटवर्ती द्वीप तथा समुद्रके समीप निवास करनेवाले जो राजा थे, वे सभी राजसूययज्ञमें उपस्थित थे । सिंहल, बर्बर, म्लेच्छ, लंकानिवासी, पश्चिमके राष्ट्र, सागरके निकटवर्ती सैकड़ों प्रदेश, पह्लव, दरद, समस्त किरात, यवन, शक, हारहूण, चीन, तुषार, सैन्धव, जागुड़, रामठ, मुण्ड, स्त्रीराज्य, तंगण, केकय, मालव तथा काश्मीरदेशके नरेश भी राजसूययज्ञमें बुलाये गये थे और मैंने उन सबको आपके यज्ञमें रसोई परोसते देखा था ॥ २२–२६ ॥

सा ते समृद्धिर्यैरात्ता चपला प्रतिसारिणी ।

आदाय जीवितं तेषामाहरिष्यामि तामहम् ॥ २७ ॥

‘ सब ओर फैली हुई आपकी उस चंचल समृद्धिको जिन लोगोंने छलसे छीन लिया है, उनके प्राण लेकर भी मैं उसे पुनः वापस लाऊँगा ॥ २७ ॥

रामेण सह कौरव्य भीमार्जुनयमैस्तथा ।

अक्रूरगदसाम्बैश्च प्रद्युम्नेनाहुकेन च ॥ २८ ॥

धृष्टद्युम्नेन वीरेण शिशुपालात्मजेन च ।

दुर्योधनं रणे हत्वा सद्यः कर्णं च भारत ॥ २ ९ ॥

दुःशासनं सौबलेयं यश्चान्यः प्रतियोत्स्यते ।

ततस्त्वं हास्तिनपुरे भ्रातृभिः सहितो वसन् ॥ ३० ॥

धार्तराष्ट्रीं श्रियं प्राप्य प्रशाधि पृथिवीमिमाम् । ‘ कुरुनन्दन! भरतकुलतिलक! बलराम, भीमसेन, अर्जुन, नकुल सहदेव, अक्रूर, गद, साम्ब, प्रद्युम्न, आहुक, वीर धृष्टद्युम्न और शिशुपालपुत्र धृष्टकेतुके साथ आक्रमण करके युद्धमें दुर्योधन, कर्ण, दुःशासन एवं शकुनिको तथा और जो कोई योद्धा सामना करने आयेगा, उसे भी शीघ्र ही मारकर मैं आपकी सम्पत्ति लौटा लाऊँगा । तदनन्तर आप भाइयोंसहित हस्तिनापुरमें निवास करते हुए धृतराष्ट्रकी राज्यलक्ष्मीको पाकर इस सारी पृथ्वीका शासन कीजिये ' ॥ २८–३०३ ॥ अथैनमब्रवीद् राजा तस्मिन् वीरसमागमे ॥ ३१ ॥

शृण्वत्स्वेतेषु वीरेषु धृष्टद्युम्नमुखेषु च । तब राजा युधिष्ठिरने उस वीरसमुदायमें इन धृष्टद्युम्न आदि शूरवीरोंके सुनते हुए श्रीकृष्णसे कहा ॥ ३१

पृष्ठ 374

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 374 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

युधिष्ठिरउवाच प्रतिगृह्णामि ते वाचमिमां सत्यां जनार्दन ॥ ३२ ॥

युधिष्ठिर बोले — जनार्दन! मैं आपकी सत्य वाणीको शिरोधार्य करता हूँ ॥ ३२ ॥

अमित्रान् मे महाबाहो सानुबन्धान् हनिष्यसि ।

वर्षात् त्रयोदशादूर्ध्वं सत्यं मां कुरु केशव ॥ ३३ ॥

प्रतिज्ञातो वने वासो राजमध्ये मया ह्ययम् । महाबाहो! केशव! तेरहवें वर्षके बाद आप मेरे सम्पूर्ण शत्रुओंको उनके बन्धु-बान्धवोंसहित नष्ट कीजियेगा । ऐसा करके आप मेरे सत्य ( वनवासके लिये की गयी प्रतिज्ञा ) -की रक्षा कीजिये । मैंने राजाओंकी मण्डलीमें वनवासकी प्रतिज्ञा की है ॥ ३३३ ॥

तद् धर्मराजवचनं प्रतिश्रुत्य सभासदः ॥ ३४ ॥

धृष्टद्युम्नपुरोगास्ते शमयामासुरञ्जसा ।

केशवं मधुरैर्वाक्यैः कालयुक्तैरमर्षितम् ॥ ३५ ॥

धर्मराजकी वह बात सुनकर धृष्टद्युम्न आदि सभासदोंने समयोचित मधुर वचनोंद्वारा अमर्षमें भरे हुए श्रीकृष्णको शीघ्र ही शान्त किया ॥ ३४-३५ ॥

पाञ्चालीं प्राहुरक्लिष्टां वासुदेवस्य शृण्वतः ।

दुर्योधनस्तव क्रोधाद् देवि त्यक्ष्यति जीवितम् ॥ ३६ ॥

तत्पश्चात् उन्होंने क्लेशरहित हुई द्रौपदीसे भगवान् श्रीकृष्णके सुनते हुए कहा — ‘ देवि! दुर्योधन तुम्हारे क्रोधसे निश्चय ही प्राण त्याग देगा ॥ ३६ ॥

प्रतिजानीमहे सत्यं मा शुचो वरवर्णिनि ।

ये स्म तेऽक्षजितां कृष्णे दृष्ट्वा त्वां प्राहसंस्तदा ।

मांसानि तेषां खादन्तो हरिष्यन्ति वृकद्विजाः ॥ ३७ ॥

‘ वरवर्णिनि! हम यह सच्ची प्रतिज्ञा करते हैं, तुम शोक न करो । कृष्णे! उस समय तुम्हें जूएमें जीती हुई देखकर जिन लोगोंने हँसी उड़ायी है, उनके मांस भेड़िये और गीध खायँगे और नोच- नोचकर ले जायँगे ॥ ३७ ॥

पास्यन्ति रुधिंर तेषां गृध्रा गोमायवस्तथा ।

उत्तमाङ्गानि कर्षन्तो यैः कृष्टासि सभातले ॥ ३८ ॥

' इसी प्रकार जिन्होंने तुम्हें सभाभवनमें घसीटा है, उनके कटे हुए सिरोंको घसीटते हुए गीध और गीदड़ उनके रक्त पीयेंगे ॥ ३८ ॥

तेषां द्रक्ष्यसि पाञ्चालि गात्राणि पृथिवीतले ।

क्रव्यादैः कृष्यमाणानि भक्ष्यमाणानि चासकृत् ॥ ३ ९ ॥

‘ पांचालराजकुमारि! तुम देखोगी कि उन दुष्टोंके शरीर इस पृथ्वीपर मांसाहारी गीदड़-गीध आदि पशु- पक्षियोंद्वारा बार- बार घसीटे और खाये जा रहे हैं ॥ ३ ९ ॥

पृष्ठ 375

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 375 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

परिक्लिष्टासि यैस्तत्र यैश्चासि समुपेक्षिता ।

तेषामुत्कृत्तशिरसां भूमिः पास्यति शोणितम् ॥ ४० ॥

'जिन लोगोंने तुम्हें सभामें क्लेश पहुँचाया और जिन्होंने चुपचाप रहकर उस अन्यायकी उपेक्षा की है, उन सबके कटे हुए मस्तकोंका रक्त यह पृथ्वी पीयेगी ' ॥ ४० ॥

एवं बहुविधा वाचस्त ऊचुर्भरतर्षभ ।

सर्वे तेजस्विनः शूराः सर्वे चाहतलक्षणाः ॥ ४१ ॥

भरतकुलतिलक! इस प्रकार उन वीरोंने अनेक प्रकारकी बातें कही थीं । वे सब - के - सब

तेजस्वी और शूरवीर हैं । उनके शुभ लक्षण अमिट हैं ॥ ४१ ॥

ते धर्मराजेन वृता वर्षादूर्ध्वं त्रयोदशात् ।

पुरस्कृत्योपयास्यन्ति वासुदेवं महारथाः ॥ ४२ ॥

धर्मराजने तेरहवें वर्षके बाद युद्ध करनेके लिये उनका वरण किया है । वे महारथी वीर भगवान् श्रीकृष्णको आगे रखकर आक्रमण करेंगे ॥ ४२ ॥

रामश्च कृष्णश्च धनंजयश्च प्रद्युम्नसाम्बौ युयुधानभीमौ । माद्रीसुतौ केकयराजपुत्राः पाञ्चालपुत्राः सह मत्स्यराज्ञा ॥ ४३ ॥

एतान् सर्वान् लोकवीरानजेयान् महात्मनः सानुबन्धान् ससैन्यान् । को जीवितार्थी समरेऽभ्युदीयात् क्रुद्धान् सिंहान् केसरिणो यथैव ॥ ४४ ॥

बलराम, श्रीकृष्ण, अर्जुन, प्रद्युम्न, साम्ब, सात्यकि, भीमसेन, नकुल, सहदेव, केकयराजकुमार, द्रुपद और उनके पुत्र तथा मत्स्यनरेश विराट – ये सब - के - सब विश्वविख्यात अजेय वीर हैं । ये महामना जब अपने सगे - सम्बन्धियों और सेनाके साथ धावा करेंगे, उस समय क्रोधमें भरे हुए केसरी सिंहोंके समान उन महावीरोंका समरमें जीवनकी इच्छा रखनेवाला कौन पुरुष सामना करेगा? ॥ ४३-४४ ॥ धृतराष्ट्रउवाच यन्माब्रवीद् विदुरो द्यूतकाले त्वं पाण्डवाञ्जेष्यसि चेन्नरेन्द्र । ध्रुवं कुरूणामयमन्तकालो महाभयो भविता शोणितौघः ॥ ४५ ॥

धृतराष्ट्र बोले- संजय! जब जूआ खेला जा रहा था, उस समय विदुरने मुझसे जो यह बात कही थी कि नरेन्द्र! यदि आप पाण्डवोंको जूएमें जीतेंगे तो निश्चय ही यह कौरवोंके

पृष्ठ 376

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 376 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

लिये खूनकी धारासे भरा हुआ अत्यन्त भयंकर विनाशकाल होगा ॥ ४५ ॥

मन्ये तथा तद् भवितेति सूत यथा क्षत्ता प्राह वचः पुरा माम् । असंशयं भविता युद्धमेतद् गते काले पाण्डवानां यथोक्तम् ॥ ४६ ॥

सूत! विदुरने पहले जो बात कही थी, वह अवश्य ही उसी प्रकार होगी, ऐसा मेरा विश्वास है । वनवासका समय व्यतीत होनेपर पाण्डवोंके कथनानुसार यह घोर युद्ध होकर ही रहेगा, इसमें संशय नहीं ॥ ४६ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि इन्द्रलोकाभिगमनपर्वणि धृतराष्ट्रविलापे एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५१ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत इन्द्रलोकाभिगमनपर्वमें धृतराष्ट्रविलापविषयक इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५१ ॥

पृष्ठ 377

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 377 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

(नलोपाख्यानपर्व) द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः भीमसेन - युधिष्ठिर- संवाद, बृहदश्वका आगमन तथा युधिष्ठिरके पूछनेपर बृहदश्वके द्वारा नलोपाख्यानकी प्रस्तावना जनमेजय उवाच

अस्त्रहेतोर्गते पार्थे शक्रलोकं महात्मनि ।

युधिष्ठिरप्रभृतयः किमकुर्वत पाण्डवाः ॥ १ ॥

जनमेजयने पूछा— ब्रह्मन्! अस्त्रविद्याकी प्राप्तिके लिये महात्मा अर्जुनके इन्द्रलोक चले जानेपर युधिष्ठिर आदि पाण्डवोंने क्या किया? ॥ १ ॥

वैशम्पायन उवाच

अस्त्रहेतोर्गते पार्थे शक्रलोकं महात्मनि ।

आवसन् कृष्णया सार्धं काम्यके भरतर्षभाः ॥ २ ॥

वैशम्पायनजीने कहा- राजन्! अस्त्रविद्याके लिये महात्मा अर्जुनके इन्द्रलोक जानेपर भरतकुलभूषण पाण्डव द्रौपदीके साथ काम्यकवनमें निवास करने लगे ॥ २ ॥

ततः कदाचिदेकान्ते विविक्त इव शाद्वले ।

दुःखार्ता भरतश्रेष्ठा निषेदुः सह कृष्णया ॥ ३ ॥

धनंजयं शोचमानाः साश्रुकण्ठाः सुदुःखिताः ।

तद्वियोगार्दितान् सर्वाञ्छोकः समभिपुप्लुवे ॥ ४ ॥

तदनन्तर एक दिन एकान्त एवं पवित्र स्थानमें, जहाँ छोटी-छोटी हरी दूर्वा आदि घास उगी हुई थी, वे भरतवंशके श्रेष्ठ पुरुष दुःखसे पीड़ित हो द्रौपदीके साथ बैठे और धनंजय अर्जुनके लिये चिन्ता करते हुए अत्यन्त दुःखमें भरे अश्रुगद्गद कण्ठसे उन्हींकी बातें करने लगे । अर्जुनके वियोगसे पीड़ित उन समस्त पाण्डवोंको शोकसागरने अपनी लहरोंमें डुबो दिया ॥ ३-४ ॥

धनंजयवियोगाच्च राज्यभ्रंशाच्च दुःखिताः ।

अथ भीमो महाबाहुर्युधिष्ठिरमभाषत ॥ ५ ॥

पृष्ठ 378

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 378 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पाण्डव राज्य छिन जानेसे तो दुःखी थे ही । अर्जुनके विरहसे वे और भी क्लेशमें पड़ गये थे । उस समय महाबाहु भीमने युधिष्ठिरसे कहा— ॥ ५ ॥

निदेशात् ते महाराज गतोऽसौ भरतर्षभः ।

अर्जुनः पाण्डुपुत्राणां यस्मिन् प्राणाः प्रतिष्ठिताः ॥ ६ ॥

‘ महाराज! आपकी आज्ञासे भरतवंशका रत्न अर्जुन तपस्याके लिये चला गया । हम सब पाण्डवोंके प्राण उसीमें बसते हैं ॥ ६ ॥

यस्मिन् विनष्टे पाञ्चालाः सह पुत्रैस्तथा वयम् ।

सात्यकिर्वासुदेवश्च विनश्येयुर्न संशयः ॥ ७ ॥

' यदि कहीं अर्जुनका नाश हुआ तो पुत्रोंसहित पांचाल, हम पाण्डव, सात्यकि और वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण - ये सब - के - सब नष्ट हो जायँगे ॥ ७ ॥

योऽसौ गच्छति धर्मात्मा बहून् क्लेशान् विचिन्तयन् ।

भवन्नियोगाद् बीभत्सुस्ततो दुःखतरं नु किम् ॥ ८ ॥

' जो धर्मात्मा अर्जुन अनेक प्रकारके क्लेशोंका चिन्तन करते हुए आपकी आज्ञासे तपस्याके लिये गया, उससे बढ़कर दुःख और क्या होगा? ॥ ८ ॥

यस्य बाहू समाश्रित्य वयं सर्वे महात्मनः ।

मन्यामहे जितानाजौ परान् प्राप्तां च मेदिनीम् ॥ ९ ॥

‘जिस महापराक्रमी अर्जुनके बाहुबलका आश्रय लेकर हम संग्राममें शत्रुओंको पराजित और इस पृथ्वीको अपने अधिकारमें आयी हुई समझते हैं ॥ ९ ॥

यस्य प्रभावान्न मया सभामध्ये धनुष्मतः ।

नीता लोकममुं सर्वे धार्तराष्ट्राः ससौबलाः ॥ १० ॥

‘जिस धनुर्धर वीरके प्रभावसे प्रभावित होकर मैंने सभामें शकुनिसहित समस्त धृतराष्ट्रपुत्रोंको तुरंत ही यमलोक नहीं भेज दिया ॥ १० ॥

ते वयं बाहुबलिनः क्रोधमुत्थितमात्मनः ।

सहामहे भवन्मूलं वासुदेवेन पालिताः ॥ ११ ॥

' हम सब लोग बाहुबलसे सम्पन्न हैं और भगवान् वासुदेव हमारे रक्षक हैं तो भी हम आपके कारण अपने उठे हुए क्रोधको चुपचाप सह लेते हैं ॥ ११ ॥

वयं हि सह कृष्णेन हत्वा कर्णमुखान् परान् ।

स्वबाहुविजितां कृत्स्नां प्रशासेम वसुन्धराम् ॥ १२ ॥

‘ भगवान् श्रीकृष्णके साथ हमलोग कर्ण आदि शत्रुओंको मारकर अपने बाहुबलसे जीती हुई सम्पूर्ण पृथ्वीका शासन कर सकते हैं ॥ १२ ॥

भवतो द्यूतदोषेण सर्वे वयमुपप्लुताः ।

अहीनपौरुषा बाला बलिभिर्बलवत्तराः ॥ १३ ॥

पृष्ठ 379

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 379 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

' आपके जूएके दोषसे हमलोग पुरुषार्थयुक्त होकर भी दीन बन गये हैं और वे मूर्ख दुर्योधन आदि भेंटमें मिले हुए हमारे धनसे सम्पन्न हो इस समय अधिक बलशाली बन गये हैं ॥ १३ ॥

क्षात्रं धर्मं महाराज त्वमवेक्षितुमर्हसि ।

न हि धर्मो महाराज क्षत्रियस्य वनाश्रयः ॥ १४ ॥

' महाराज! आप क्षत्रियधर्मकी ओर तो देखिये । इस प्रकार वनमें रहना कदापि क्षत्रियोंका धर्म नहीं है ॥ १४ ॥

राज्यमेव परं धर्मं क्षत्रियस्य विदुर्बुधाः ।

स क्षत्रधर्मविद् राजा मा धर्म्यान्नीनशः पथः ॥ १५ ॥

'विद्वानोंने राज्यको ही क्षत्रियका सर्वोत्तम धर्म माना है । आप क्षत्रियधर्मके ज्ञाता नरेश हैं । धर्मके मार्गसे विचलित न होइये ॥ १५ ॥

प्राग् द्वादशसमा राजन् धार्तराष्ट्रान् निहन्महि ।

निवर्त्य च वनात् पार्थमानाय्य च जनार्दनम् ॥ १६ ॥

‘ राजन्! हमलोग बारह वर्ष बीतनेके पहले ही अर्जुनको वनसे लौटाकर और भगवान् श्रीकृष्णको बुलाकर धृतराष्ट्रके पुत्रोंका संहार कर सकते हैं ॥ १६ ॥

व्यूढानीकान् महाराज जवेनैव महामते ।

धार्तराष्ट्रानमुं लोकं गमयामि विशाम्पते ॥ १७ ॥

सर्वानहं हनिष्यामि धार्तराष्ट्रान् ससौबलान् ।

दुर्योधनं च कर्णं च यो वान्यः प्रतियोत्स्यते ॥ १८ ॥

‘ महाराज! महामते! धृतराष्ट्रके पुत्र कितनी ही सेनाओंकी मोर्चाबन्दी क्यों न कर लें, हम उन्हें शीघ्र यमलोकका पथिक बनाकर ही छोड़ेंगे । मैं स्वयं ही शकुनिसहित समस्त धृतराष्ट्रपुत्रोंको मार डालूँगा । दुर्योधन, कर्ण अथवा दूसरा जो कोई योद्धा मेरा सामना करेगा, उसे भी अवश्य मारूँगा ॥ १७-१८ ॥

मया प्रशमिते पश्चात् त्वमेष्यसि वनात् पुनः ।

एवं कृते न ते दोषा भविष्यन्ति विशाम्पते ॥ १ ९ ॥

‘ मेरे द्वारा शत्रुओंका संहार हो जानेपर आप फिर तेरह वर्षके बाद वनसे चले आइयेगा ।

प्रजानाथ! ऐसा करनेपर आपको दोष नहीं लगेगा ॥ १ ९ ॥

यज्ञैश्च विविधैस्तात कृतं पापमरिंदम ।

अवधूय महाराज गच्छेम स्वर्गमुत्तमम् ॥ २० ॥

‘ तात! शत्रुदमन! महाराज! हम नाना प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान करके अपने किये हुए पापको धो - बहाकर उत्तम स्वर्गलोकमें चलेंगे ॥ २० ॥

एवमेतद् भवेद् राजन् यदि राजा न बालिशः ।

अस्माकं दीर्घसूत्रः स्याद् भवान् धर्मपरायणः ॥ २१ ॥

पृष्ठ 380

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 380 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

‘ राजन्! यदि ऐसा हो तो आप हमारे धर्मपरायण राजा अविवेकी और दीर्घसूत्री नहीं समझे जायँगे ॥ २१ ॥

निकृत्या निकृतिप्रज्ञा हन्तव्या इति निश्चयः ।

न हि नैकृतिकं हत्वा निकृत्या पापमुच्यते ॥ २२ ॥

‘ शठता करने या जाननेवाले शत्रुओंको शठताके द्वारा ही मारना चाहिये, यह एक सिद्धान्त है । जो स्वयं दूसरोंपर छल- कपटका प्रयोग करता है, उसे छलसे भी मार डालनेमें पाप नहीं बताया गया है ॥ २२ ॥

तथा भारत धर्मेषु धर्मज्ञैरिह दृश्यते ।

अहोरात्रं महाराज तुल्यं संवत्सरेण ह ॥ २३ ॥

‘ भरतवंशी महाराज! धर्मशास्त्रमें इसी प्रकार धर्मपरायण धर्मज्ञ पुरुषोंद्वारा यहाँ एक दिन - रात एक संवत्सरके समान देखा जाता है ॥ २३ ॥

तथैव वेदवचनं श्रूयते नित्यदा विभो ।

संवत्सरो महाराज पूर्णो भवति कृच्छ्रतः ॥ २४ ॥

‘ प्रभो! महाराज! इसी प्रकार सदा यह वैदिक वचन सुना जाता है कि कृच्छ्रव्रतके अनुष्ठानसे एक वर्षकी पूर्ति हो जाती है ॥ २४ ॥

यदि वेदाः प्रमाणास्ते दिवसादूर्ध्वमच्युत ।

त्रयोदश समाः कालो ज्ञायतां परिनिष्ठितः ॥ २५ ॥

' अच्युत! यदि आप वेदको प्रमाण मानते हैं तो तेरहवें दिन बाद ही तेरह वर्षोंका समय बीत गया, ऐसा समझ लीजिये ॥ २५ ॥

कालो दुर्योधनं हन्तुं सानुबन्धमरिंदम ।

एकाग्रां पृथिवीं सर्वां पुरा राजन् करोति सः ॥ २६ ॥

‘ शत्रुदमन! यह दुर्योधनको उसके सगे- सम्बन्धियों सहित मार डालनेका अवसर आया है । राजन्! वह सारी पृथ्वीको जबतक एक सूत्रमें बाँध ले, उसके पहले ही यह कार्य कर लेना चाहिये ॥ २६ ॥

द्यूतप्रियेण राजेन्द्र तथा तद् भवता कृतम् ।

प्रायेणाज्ञातचर्यायां वयं सर्वे निपातिताः ॥ २७ ॥

‘ राजेन्द्र! जूएके खेलमें आसक्त होकर आपने ऐसा अनर्थ कर डाला कि प्रायः हम सब लोगोंको अज्ञातवासके संकटमें लाकर पटक दिया ॥ २७ ॥

न तं देशं प्रपश्यामि यत्र सोऽस्मान् सुदुर्जनः ।

न विज्ञास्यति दुष्टात्मा चारैरिति सुयोधनः ॥ २८ ॥

अधिगम्य च सर्वान् नो वनवासमिमं ततः ।

प्रव्राजयिष्यति पुनर्निकृत्याधमपूरुषः ॥ २ ९ ॥