नलोपाख्यान : अचानक आए सङ्कटों और अपनों के वियोग में धैर्य कैसे बनाए रखें?
सङ्कट में आत्मिक धैर्य
महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
महाभारत — खण्ड २ · वनपर्व · अध्याय 52–79 · पृष्ठ 376–557
16,688 शब्द · 84 मिनटका पाठ · 44 श्लोक
वैशम्पायन ने जनमेजय से कहा
पाण्डवों के वनवास और युधिष्ठिर की चिन्ता के सन्दर्भ में
जनमेजय ने पूछा— "ब्रह्मन्! अस्त्रविद्या की प्राप्ति के लिये महात्मा अर्जुन के इन्द्रलोक चले जाने पर युधिष्ठिर आदि पाण्डवों ने क्या किया?"
ऊचुः प्राञ्जलयः सर्वे सामात्यप्रमुखा जनाः ।
अद्य स्म निर्वृता राजन् पुरे जनपदेऽपि च ।
उपासितुं पुनः प्राप्ता देवा इव शतक्रतुम् ॥
मन्त्री आदि सब लोगोंने हाथ जोड़कर कहा -' महाराज! आज हम नगर और जनपदके निवासी संतोषसे साँस ले सके हैं । जैसे देवता देवराज इन्द्रकी सेवामें उपस्थित होते हैं, उसी प्रकार अब हमें पुनः आपकी उपासना करने — आपके पास बैठनेका शुभ अवसर प्राप्त हुआ है '
वैशम्पायनजी बोले— "राजन्! अस्त्रविद्या के लिये महात्मा अर्जुन के इन्द्रलोक जाने पर भरतकुलभूषण पाण्डव द्रौपदी के साथ काम्यकवन में निवास करने लगे। तदनन्तर एक दिन, एक एकान्त एवं पवित्र स्थान में, जहाँ छोटी-छोटी हरी दूर्वा आदि घास उगी हुई थी, वहाँ भरतवंश के वे श्रेष्ठ पुरुष दुःख से पीड़ित होकर द्रौपदी के साथ बैठे थे। अर्जुन के वियोग से पीड़ित उन समस्त पाण्डवों को शोकसागर ने अपनी लहरों में डुबो दिया था; वे अत्यन्त दुःख में भरे अश्रुगद्गद कण्ठ से उन्हीं की बातें करने लगे।"
उस समय महाबाहु भीम ने युधिष्ठिर से कहा— "महाराज! आपकी आज्ञा से भरतवंश का रत्न अर्जुन तपस्या के लिये चला गया है। हम सब पाण्डवों के प्राण उसी में बसते हैं। यदि कहीं अर्जुन का नाश हुआ तो पुत्रों सहित पाञ्चाल, हम पाण्डव, सात्यकि और वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण— ये सब नष्ट हो जाएँगे। जिस महापराक्रमी अर्जुन के बाहुबल का आश्रय लेकर हम सङ्ग्राम में शत्रुओं को पराजित कर इस पृथ्वी को अपने अधिकार में लाए थे, वह आज क्लेशों का चिन्तन करते हुए तपस्या के लिए गया है; इससे बढ़कर दुःख और क्या होगा?
यस्य बाहू समाश्रित्य वयं सर्वे महात्मनः ।
मन्यामहे जितानाजौ परान् प्राप्तां च मेदिनीम् ॥
‘जिस महापराक्रमी अर्जुनके बाहुबलका आश्रय लेकर हम संग्राममें शत्रुओंको पराजित और इस पृथ्वीको अपने अधिकारमें आयी हुई समझते हैं ।
जिस वीर के प्रभाव से मैंने सभा में शकुनि सहित समस्त धृतराष्ट्रपुत्रों को तुरन्त यमलोक नहीं भेज दिया, हम सब लोग बाहुबल से सम्पन्न हैं और भगवान वासुदेव हमारे रक्षक हैं, तो भी हम आपके कारण अपने उठे हुए क्रोध को चुपचाप सह लेते हैं। भगवान श्रीकृष्ण के साथ हम लोग कर्ण आदि शत्रुओं को मारकर सम्पूर्ण पृथ्वी का शासन कर सकते हैं। आपके जूए के दोष से हम पुरुषार्थयुक्त होकर भी दीन बन गये हैं और वे मूर्ख दुर्योधन आदि हमारे धन से सम्पन्न इस समय अधिक बलशाली हो गये हैं।
आगतायां तु वैदर्भ्यां सपुत्रायां नलो नृपः ।
वर्तयामास मुदितो देवराडिव नन्दने ॥
तथा प्रकाशतां यातो जम्बुद्वीपे स राजसु ।
पुनः शशास तद् राज्यं प्रत्याहृत्य महायशाः ॥
पुत्र और पुत्रीसहित दमयन्तीके आ जानेपर राजा नल सब बर्ताव- व्यवहार बड़े आनन्दसे सम्पन्न करने लगे । जैसे नन्दनवनमें देवराज इन्द्र शोभा पाते हैं, उसी प्रकार वे जम्बूद्वीपके समस्त राजाओंमें प्रकाशमान हो रहे थे । वे महायशस्वी नरेश अपने राज्यको पुनः वापस लेकर उसका न्यायपूर्वक शासन करने लगे ।
महाराज! आप क्षत्रियधर्म की ओर तो देखिये। वन में रहना कदापि क्षत्रियों का धर्म नहीं है; विद्वानों ने राज्य को ही सर्वोत्तम धर्म माना है। आप क्षत्रियधर्म के ज्ञाता नरेश हैं, धर्म के मार्ग से विचलित न होइये। हम बारह वर्ष बीतने के पहले ही अर्जुन को वन से लौटाकर और भगवान श्रीकृष्ण को बुलाकर धृतराष्ट्र के पुत्रों का संहार कर सकते हैं। महामते! धृतराष्ट्र के पुत्र कितनी ही सेनाओं की मोर्चाबन्दी क्यों न कर लें, हम उन्हें शीघ्र यमलोक का पथिक बनाकर ही छोड़ेंगे। मैं स्वयं ही शकुनि सहित समस्त धृतराष्ट्रपुत्रों को मार डालूँगा; दुर्योधन, कर्ण अथवा दूसरा जो कोई योद्धा मेरा सामना करेगा, उसे भी अवश्य मारूँगा। मेरे द्वारा शत्रुओं का संहार हो जाने पर आप फिर तेरह वर्ष के बाद वन से चले आइयेगा। प्रजानाथ! ऐसा करने पर आपको दोष नहीं लगेगा।
ईजे च विविधैर्यज्ञैर्विधिवच्चाप्तदक्षिणैः ।
तथा त्वमपि राजेन्द्र ससुहृद् यक्ष्यसेऽचिरात् ॥
उन्होंने पर्याप्त दक्षिणासे युक्त विविध प्रकारके यज्ञोंद्वारा विधिपूर्वक भगवान्का यजन किया । राजेन्द्र! इसी प्रकार तुम भी पुनः अपना राज्य पाकर सुहृदोंसहित शीघ्र ही यज्ञका अनुष्ठान करोगे ।
तात! शत्रुदमन! महाराज! हम नाना प्रकार के यज्ञों का अनुष्ठान करके अपने किये हुए पाप को धो-बहाकर उत्तम स्वर्गलोक में चलेंगे। यदि ऐसा हो तो आप हमारे धर्मपरायण राजा अविवेकी और दीर्घसूत्री नहीं समझे जाएँगे। शठता करने या जानने वाले शत्रुओं को शठता के द्वारा ही मारना चाहिए; जो स्वयं दूसरों पर छल-कपट प्रयोग करता है, उसे छल से भी मार डालने में पाप नहीं बताया गया है। भरतवंशी महाराज! धर्मशास्त्र में इसी प्रकार धर्मपरायण पुरुषों द्वारा एक दिन-रात को एक संवत्सर के समान देखा जाता है।
त्वं पुनर्भ्रातृसहितः कृष्णया चैव पाण्डव ।
रमसेऽस्मिन् महारण्ये धर्ममेवानुचिन्तयन् ॥
पाण्डुनन्दन! तुम तो अपने सभी भाइयों और महारानी द्रौपदीके साथ इस महान् वनमें भ्रमण करते हो और निरन्तर धर्मके ही चिन्तनमें लगे रहते हो ।
प्रभो! महाराज! यह वैदिक वचन सदा सुना जाता है कि कृच्छ्रव्रत के अनुष्ठान से एक वर्ष की पूर्ति हो जाती है। अच्युत! यदि आप वेद को प्रमाण मानते हैं, तो तेरहवें दिन बाद ही तेरह वर्षों का समय बीत गया, ऐसा समझ लीजिये। शत्रुदमन! यह दुर्योधन को उसके सगे-सम्बन्धियों सहित मार डालने का अवसर है; वह सारी पृथ्वी को जब तक एक सूत्र में बाँध ले, उससे पहले ही यह कार्य कर लेना चाहिए। राजेन्द्र! जूए के खेल में आसक्त होकर आपने ऐसा अनर्थ कर डाला कि हम सबको अज्ञातवास के सङ्कट में लाकर पटक दिया। मैं ऐसा कोई देश नहीं देखता जहाँ दुष्टचित्त दुरात्मा दुर्योधन अपने गुप्तचरों द्वारा हमारा पता न लगा ले; वह हमें पुनः वनवास में डाल देगा। यदि वह यह समझ ले कि हम अज्ञातवास की अवधि पार कर गये हैं, तो वह आपको पुनः जूआ खेलने के लिये बुलायेगा। महाराज! आप एक बार सङ्कट से बचकर पुनः द्यूत क्रीड़ा में प्रवृत्त हो गये थे, अतः मैं समझता हूँ कि यदि पुनः आवाहन हो तो आप पीछे न हटेंगे। वह विवेकशून्य शकुनि जूआ फेंकने की कला में कितना कुशल है, यह आप जानते हैं; उसमें हारकर आप पुनः वनवास ही भोगेंगे।
प्रार्थयेद् यदि मां कश्चिद् दण्ड्यस्ते स पुमान् भवेत् ।
वध्यश्च तेऽसकृन्मन्द इति मे व्रतमाहितम् ॥
‘ यदि कोई पुरुष मुझे प्राप्त करना चाहे तो वह आपके द्वारा दण्डनीय हो और बार - बार ऐसे अपराध करनेवाले मूढको आप प्राणदण्ड भी दें, यही मेरा निश्चित व्रत है ।
महाराज! यदि आप हमें दीन और कृपण ही बनाना चाहते हैं, तो सम्पूर्ण वेदोक्त धर्मों के पालन पर ही दृष्टि रखिये। अपना निश्चय तो यही है कि कपटी को कपट से ही मारना चाहिये। यदि आपकी आज्ञा हो, तो जैसे तृण की राशि में डाली हुई आग हवा का सहारा पाकर उसे भस्म कर डालती है, वैसे ही मैं जाकर उस मूढ़ दुर्योधन का वध कर डालूँ; अतः आप मुझे आज्ञा दीजिये।"
निकृत्या निकृतिप्रज्ञो हन्तव्य इति निश्चयः ।
अनुज्ञातस्त्वया गत्वा यावच्छक्ति सुयोधनम् ॥
यथैव कक्षमुत्सृष्टो दहेदनिलसारथिः ।
हनिष्यामि तथा मन्दमनुजानातु मे भवान् ॥
' अपना निश्चय तो यही है कि कपटीको कपटसे ही मारना चाहिये । यदि आपकी आज्ञा हो तो जैसे तृणकी राशिमें डाली हुई आग हवाका सहारा पाकर उसे भस्म कर डालती है, वैसे ही मैं जाकर अपनी शक्तिके अनुसार उस मूढ़ दुर्योधनका वध कर डालूँ, अतः आप मुझे आज्ञा दीजिये ।
वैशम्पायनजी कहते हैं— "जनमेजय! धर्मराज राजा युधिष्ठिर ने उपर्युक्त बातें कहने वाले पाण्डुनन्दन भीमसेन का मस्तक सूँघकर उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा— 'महाबाहो! इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है कि तुम तेरहवें वर्ष के बाद गाण्डीवधारी अर्जुन के साथ जाकर सुयोधन को मार डालोगे। किन्तु शक्तिशाली वीर कुन्तीकुमार! तुम जो यह कहते हो कि सुस्थ सुयोधन के वध का अवसर आ गया है, वह ठीक नहीं है; मैं झूठ नहीं बोल सकता। कुन्तीनन्दन! तुम दुर्धर्ष वीर हो, छल-कपट का आश्रय लिये बिना भी पापपूर्ण विचार रखने वाले सुयोधन को सगे-सम्बन्धियों सहित नष्ट कर सकते हो'।"
धर्मराज युधिष्ठिर जब भीमसेन से ऐसी बातें कह रहे थे, उसी समय महाभाग महर्षि बृहदश्व वहाँ आ पहुँचे। धर्मराज ने उन महात्मा का शास्त्रीय विधिके अनुसार मधुपर्क द्वारा पूजन किया। जब वे आसन पर बैठकर विश्राम कर चुके, तब महाबाहु युधिष्ठिर उनके पास ही बैठकर अत्यन्त दीनतापूर्ण वचन बोले—
"भगवन्! पासे फेंककर खेले जाने वाले जूए के लिये मुझे बुलाकर, छल-कपट में कुशल जुआरियों ने मेरे सारे धन और राज्य का अपहरण कर लिया है। मैं जूए का मर्मज्ञ नहीं हूँ; फिर भी उन दुष्टों द्वारा मेरी प्राणों से भी अधिक गौरवशालिनी पत्नी द्रौपदी को केश पकड़कर भरी सभा में लाया गया। एक बार सङ्कट से बच जाने पर पुनः द्यूत का आयोजन करके उन्होंने मुझे जीत लिया और मृगचर्म पहनाकर वनवास के दारुण कष्ट हेतु इस महान वन में निर्वासित कर दिया। मैं अत्यन्त दुःखी हूँ; जहाँ जूआ खेला गया, वहाँ प्रतिपक्षी पुरुषों के मुख से मुझे कठोर बातें सुननी पड़ीं। मेरे सुहृदों ने जो सन्तापसूचक बातें कही हैं, वे सब मेरे हृदय में स्थित हैं। इधर जिस गाण्डीव धनुषधारी अर्जुन में हम सबके प्राण बसते हैं, वह भी हमसे अलग है। मैं सदा यही सोचता हूँ कि श्रेष्ठ और प्रियवादी अर्जुन कब अस्त्रविद्या सीखकर यहाँ आएगा और मैं उसे भर आँख देखूँगा? क्या मेरे जैसा भाग्यहीन राजा इस पृथ्वी पर दूसरा कोई है? मेरा विश्वास है कि मुझसे बढ़कर दुःखी मनुष्य दूसरा कोई नहीं है।"
बृहदश्व बोले— "महाराज पाण्डुनन्दन! तुम जो यह कह रहे हो कि तुमसे बढ़कर भाग्यहीन कोई पुरुष नहीं है, उसके विषय में मैं तुम्हें एक प्राचीन इतिहास सुनाऊँगा। अनघ! पृथ्वीपते! यदि तुम सुनना चाहो तो मैं उस व्यक्ति का परिचय दूँगा जो इस पृथ्वी पर तुमसे भी अधिक दुःखी राजा था।"
युधिष्ठिर ने कहा— "भगवन्! अवश्य कहिये। मैं उस राजा का चरित्र सुनना चाहता हूँ जो मेरी जैसी सङ्कटपूर्ण स्थिति में पहुँचा हुआ हो।"
बृहदश्व ने कहा— "राजन्! अपने धर्म से कभी च्युत न होने वाले भूपाल! तुम भाइयों सहित सावधान होकर सुनो। इस पृथ्वी पर जो तुमसे भी अधिक दुःखी राजा था, उसका परिचय देता हूँ। निषध देश में वीरसेन नाम के प्रसिद्ध भूपाल थे, जिनके पुत्र का नाम नल था। वे धर्म और अर्थ के तत्त्वज्ञ थे। हमने सुना है कि राजा नल को उनके भाई पुष्कर ने छल से जूए द्वारा जीत लिया था और वे अत्यन्त दुःख से अपनी पत्नी के साथ वनवास भोगने लगे थे। उनके पास न सेवक थे, न रथ, न भाई और न बान्धव।"
न तस्य दासा न रथो न भ्राता न च बान्धवाः ।
वने निवसतो राजञ्छिष्यन्ते स्म कदाचन ॥
राजन्! उनके साथ न सेवक थे न रथ, न भाई थे न बान्धव । वनमें रहते समय उनके पास ये वस्तुएँ कदापि शेष नहीं थीं ।
युधिष्ठिर बोले— "वक्ताओं में श्रेष्ठ मुने! मैं राजा नल का चरित्र विस्तार से सुनना चाहता हूँ। कृपया मुझे बतायें।"
बृहदश्व ने कहा— "धर्मराज! निषध देश के राजा नल बलवान, उत्तम गुणों से सम्पन्न, रूपवान और अश्व-सञ्चालन में कुशल थे। जैसे देवराज इन्द्र देवताओं के शिरोमणि हैं, वैसे ही राजा नल समस्त राजाओं के ऊपर थे। वे ब्राह्मणभक्त, वेदवेत्ता, शूरवीर, द्यूत-क्रीड़ा प्रेमी, सत्यवादी और एक अक्षौहिणी सेना के स्वामी थे। वे श्रेष्ठ स्त्रियों को प्रिय, उदार और प्रजा के रक्षक थे; साक्षात् मनु के समान थे।
अतिष्ठन्मनुजेन्द्राणां मूर्ध्नि देवपतिर्यथा ।
उपर्युपरि सर्वेषामादित्य इव तेजसा ॥
ब्रह्मण्यो वेदविच्छूरो निषधेषु महीपतिः ।
अक्षप्रियः सत्यवादी महान क्षौहिणीपतिः ॥
जैसे देवराज इन्द्र सम्पूर्ण देवताओंके शिरमौर हैं, उसी प्रकार राजा नलका स्थान समस्त राजाओंके ऊपर था । वे तेजमें भगवान् सूर्यके समान सर्वोपरि थे । निषधदेशके महाराज नल बड़े ब्राह्मणभक्त, वेदवेत्ता, शूरवीर, द्यूत -क्रीड़ाके प्रेमी, सत्यवादी, महान् और एक अक्षौहिणी सेनाके स्वामी थे ।
उसी समय विदर्भ देश में भयानक पराक्रमी राजा भीम राज्य करते थे। वे शूरवीर और सद्गुण सम्पन्न थे, किन्तु उन्हें कोई सन्तान नहीं थी। अतः सन्तान प्राप्ति की कामना उनके हृदय में सदा बनी रहती थी। उन्होंने अत्यन्त एकाग्रचित्त होकर महान प्रयत्न किया। उन्हीं दिनों वहाँ दमन नामक ब्रह्मर्षि पधारे। राजा भीम ने अपनी रानी सहित उन महातेजस्वी मुनि का पूर्ण सत्कार किया। प्रसन्न होकर दमन मुनि ने राजा को एक कन्या और तीन उदार पुत्र प्रदान किए। कन्या का नाम दमयन्ती और पुत्रों के नाम दम, दान्त तथा दमन थे। ये तीनों बड़े तेजस्वी थे।
सुन्दर कटिप्रदेश वाली दमयन्ती रूप, तेज, यश और सौभाग्य से तीनों लोकों में विख्यात हुई। जब उसने युवावस्था में प्रवेश किया, तब सौ दासियाँ और सखियाँ उसके सेवा में रहती थीं; मानो देवाङ्गनाएँ शची की उपासना करती हों। वह लक्ष्मी के समान अत्यन्त सुन्दर थी; उसके नेत्र विशाल थे। देवताओं और यक्षों में भी वैसी सुन्दरी कहीं नहीं देखी गई थी। मनुष्यों में भी ऐसी सुन्दरी न कभी देखी गयी, न सुनी गयी। उसे देखते ही चित्त प्रसन्न हो जाता था।
अतीव रूपसम्पन्ना श्रीरिवायतलोचना ।
न देवेषु न यक्षेषु तादृग् रूपवती क्वचित् ॥
वह लक्ष्मीके समान अत्यन्त सुन्दर रूपसे सुशोभित थी । उसके नेत्र विशाल थे । देवताओं और यक्षोंमें भी वैसी सुन्दरी कन्या कहीं देखने में नहीं आती थी ।
नरश्रेष्ठ नल भी इस भूतल के मनुष्यों में अनुपम सुन्दर थे; उनका रूप देखकर जान पड़ता था मानो स्वयं कामदेव मूर्तिमान होकर उत्पन्न हुए हों। लोग कौतूहलवश दमयन्ती के समीप नल की प्रशंसा करते थे और बार-बार दमयन्ती के सौन्दर्य की सराहना करते थे। कुन्तीनन्दन! इस प्रकार निरन्तर एक-दूसरे के गुणों को सुनते-सुनते उन दोनों में बिना देखे ही अनुराग उत्पन्न हो गया। जब राजा नल उस काम-वेदना को हृदय में छिपाने में असमर्थ हुए, तब वे उपवन में एकान्त में बैठ गये।
तभी उनकी दृष्टि सुवर्णमय पङ्खों वाले हंसों पर पड़ी जो उपवन में विचर रहे थे। राजा ने उनमें से एक हंस को पकड़ लिया। तब आकाशचारी हंस ने कहा— 'राजन्! मुझे न मारें। मैं आपका प्रिय कार्य करूँगा। मैं दमयन्ती के निकट आपकी ऐसी प्रशंसा करूँगा जिससे वह आपके सिवा दूसरे किसी पुरुष को मन में स्थान न देगी।'
हंस के कहने पर नल ने उसे छोड़ दिया। फिर वे हंस उड़कर विदर्भ देश पहुँचे। वहाँ वे सभी हंस दमयन्ती के निकट उतरे। सखियों से घिरी राजकुमारी दमयन्ती उन अद्भुत पक्षियों को देखकर प्रसन्न हुई और उन्हें पकड़ने की चेष्टा करने लगी। जब वह एक हंस के पीछे दौड़ रही थी, तब उस हंस ने मानवी वाणी में कहा—
'राजकुमारी दमयन्ती! सुनो, निषध देश में नल नाम के प्रसिद्ध राजा हैं जो अश्विनीकुमारों के समान सुन्दर हैं। मनुष्यों में तो उनके समान कोई है ही नहीं। हे सुमध्यमे! यदि तुम उनकी पत्नी हो जाओ तो तुम्हारा जन्म सफल हो जाएगा। हमने देवता, गन्धर्व, मनुष्य, नाग और राक्षस देखे हैं, परन्तु हमारी दृष्टि में अब तक उनके जैसा पुरुष नहीं आया। तुम रमणियों में रत्नस्वरूपा हो और नल पुरुषों के मुकुटमणि हैं। यदि किसी विशिष्ट नारी का विशिष्ट पुरुष के साथ संयोग हो, तो वह विशेष गुणकारी होता है'।"
कन्दर्प इव रूपेण मूर्तिमानभवत् स्वयम् ।
तस्य वै यदि भार्या त्वं भवेथा वरवर्णिनि ॥
सफलं ते भवेज्जन्म रूपं चेदं सुमध्यमे ।
वयं हि देवगन्धर्वमनुष्योरगराक्षसान् ॥
दृष्टवन्तो न चास्माभिर्दृष्टपूर्वस्तथाविधः ।
त्वं चापि रत्नं नारीणां नरेषु च नलो वरः ॥
विशिष्टया विशिष्टेन संगमो गुणवान् भवेत् । ‘ सुन्दरि! रूपकी दृष्टिसे तो वे मानो स्वयं मूर्तिमान् कामदेव- से ही प्रतीत होते हैं । सुमध्यमे! यदि तुम उनकी पत्नी हो जाओ तो तुम्हारा जन्म और यह मनोहर रूप सफल हो जाय । हमलोगोंने देवता, गन्धर्व, मनुष्य, नाग तथा राक्षसोंको भी देखा है; परंतु हमारी दृष्टिमें अबतक उनके - जैसा कोई भी पुरुष पहले कभी नहीं आया है । तुम रमणियोंमें रत्नस्वरूपा हो और नल पुरुषोंके मुकुटमणि हैं । यदि किसी विशिष्ट नारीका विशिष्ट पुरुषके साथ संयोग हो तो वह विशेष गुणकारी होता है '
इन्द्र! अब शीघ्र ही दमयन्ती का स्वयंवर होने वाला है। बल और वृत्रासुर के नाशक इन्द्र! दमयन्ती सम्पूर्ण जगत् का एक अद्भुत रत्न है, इसलिए समस्त राजा उसे पाने की विशेष अभिलाषा रखते हैं। यह बात चल ही रही थी कि देवश्रेष्ठ लोकपालगण अग्निसहित देवराज के समीप आए। नारद जी की इन विशिष्ट बातों को सुनकर वे सब हर्षोल्लास से भर गए और बोले— 'हम लोग भी उस स्वयंवर में चलें!'
तदनन्तर वे सभी देवता अपने सेवकगणों और वाहनों के साथ विदर्भ देश की ओर चल दिए, जहाँ समस्त भूपाल एकत्र हो रहे थे। कुन्तीनन्दन! उदार हृदय राजा नल भी विदर्भ नगर में राजाओं का यह समागम सुनकर और दमयन्ती के प्रति अपने अनुराग के कारण वहाँ पहुँचे। उस समय देवताओं ने पृथ्वी पर मार्ग में खड़े राजा नल को देखा। रूप-सम्पत्ति की दृष्टि से वे साक्षात् मूर्तिमान कामदेव के समान जान पड़ते थे। सूर्य के समान प्रकाशित होने वाले महाराज नल को देखकर वे लोकपाल उनके रूप-वैभव से इतने चकित हुए कि दमयन्ती को पाने का अपना सङ्कल्प ही छोड़ बैठे।
उन देवताओं ने अपने विमानों को आकाश में रोक दिया और वहाँ से नीचे उतरकर निषध नरेश से कहा— 'निषध देश के महाराज नरश्रेष्ठ नल! आप सत्य व्रती हैं, हमारी सहायता कीजिए। हमारे दूत बन जाइए।'
बृहदश्व मुनि कहते हैं— भारत! देवताओं से उनकी सहायता की प्रतिज्ञा करके राजा नल ने हाथ जोड़कर पास जाकर पूछा— 'आप लोग कौन हैं? और वह कौन व्यक्ति है, जिसके पास जाने के लिए आपने मुझे दूत बनाने की इच्छा की है? तथा आप लोगों का वह कौन सा कार्य है, जो मेरे द्वारा सम्पन्न होने योग्य है, यह ठीक-ठीक बताइये।'
जब निषधराज नल ने इस प्रकार पूछा, तब इन्द्र ने कहा— 'भूपाल! तुम हमें देवता समझो, हम दमयन्ती को प्राप्त करने के लिए यहाँ आए हैं। मैं इन्द्र हूँ, ये अग्निदेव हैं, ये जल के स्वामी वरुण हैं और ये प्राणियों के शरीर का नाश करने वाले साक्षात् यमराज हैं। आप दमयन्ती के पास जाकर उसे हमारे आगमन की सूचना दे दीजिए और कहिए— महेन्द्र आदि लोकपाल तुम्हें देखने के लिए आ रहे हैं। इन्द्र, अग्नि, वरुण और यम— ये देवता तुम्हें प्राप्त करना चाहते हैं। तुम उनमें से किसी एक देवता को पति रूप में चुन लो।'
प्राप्तुमिच्छन्ति देवास्त्वां शक्रोऽग्निर्वरुणो यमः ।
तेषामन्यतमं देवं पतित्वे वरयस्व ह ॥
‘ इन्द्र, अग्नि, वरुण और यम - ये देवतालोग तुम्हें प्राप्त करना चाहते हैं । तुम उनमेंसे किसी एक देवताको पतिरूपमें चुन लो '
इन्द्र के ऐसा कहने पर नल ने हाथ जोड़कर कहा— 'देवेश्वरो! मेरा भी एकमात्र यही प्रयोजन है, जो आप लोगों का है; अतः एक ही प्रयोजन के लिए आए हुए मुझे दूत बनाकर न भेजिये। जिसके मन में किसी स्त्री को प्राप्त करने का सङ्कल्प हो गया है, वह पुरुष उसी स्त्री को दूसरे के लिए कैसे छोड़ सकता है? अतः आप लोग ऐसी बात कहने के लिए मुझे क्षमा करें।'
देवताओं ने कहा— 'निषध नरेश! तुम पहले हम लोगों से हमारा कार्य सिद्ध करने की प्रतिज्ञा कर चुके हो, फिर तुम उस प्रतिज्ञा का पालन कैसे नहीं करोगे? इसलिए शीघ्र जाओ; देर न करो।'
उन देवताओं के कहने पर नल ने पुनः पूछा— 'विदर्भराज के सभी भवन पहरेदारों से सुरक्षित हैं। मैं उनमें कैसे प्रवेश कर सकता हूँ?' तब इन्द्र ने उत्तर दिया— 'तुम वहाँ प्रवेश कर सकोगे।' इसके पश्चात राजा नल ने 'तथास्तु' कहकर दमयन्ती के महल में प्रवेश किया।
वहाँ उन्होंने देखा कि सखियों से घिरी हुई परम सुन्दरी विदर्भ राजकुमारी दमयन्ती अपने सुन्दर शरीर और दिव्य कान्ति से अत्यन्त उद्भासित हो रही है। उसके अङ्ग परम सुकुमार हैं, कटिके ऊपर का भाग अत्यन्त पतला है और नेत्र बड़े सुन्दर हैं; वह अपने तेज से चन्द्रमा की प्रभा को भी तिरस्कृत कर रही है। उस मनोहर मुस्कान वाली राजकुमारी को देखते ही नल के हृदय में कामाग्नि प्रज्वलित हो उठी; तथापि अपनी प्रतिज्ञा को सत्य करने की इच्छा से उन्होंने उस कामवेदना को मन में ही रोक लिया।
निषधराज को वहाँ आते देख अन्तःपुर की सारी सुन्दरी स्त्रियाँ चकित हो गईं और उनके तेज से प्रभावित होकर अपने आसनों से उठकर खड़ी हो गईं। वे अत्यन्त प्रसन्न और आश्चर्यचकित होकर राजा नल के सौन्दर्य की प्रशंसा करने लगीं। उन्होंने वार्तालाप तो नहीं किया, परन्तु मन ही मन उनका बड़ा आदर किया। वे सोचने लगीं— 'अहो! इनका रूप अद्भुत है, कान्ति बड़ी मनोहर है तथा इन महात्मा का धैर्य भी अनूठा है। न जाने ये कौन हैं? सम्भव है देवता, यक्ष अथवा गन्धर्व हों।' नल के तेज से प्रभावित वे लजीली सुन्दरीयाँ उनसे कुछ बोल भी न सकीं।
तब मुसकराकर बातचीत करने वाली दमयन्ती ने विस्मित होकर वीर नल से पूछा— 'आप कौन हैं? आपके सम्पूर्ण अङ्ग निर्दोष एवं परम सुन्दर हैं। आप मेरे हृदय की कामाग्नि को बढ़ा रहे हैं। निष्पाप वीर! आप देवताओं के समान यहाँ कैसे आ पहुँचे? मुझे आपका परिचय जानना है। आपका इस रनिवास में आना कैसे सम्भव हुआ? आपको किसी ने देखा कैसे नहीं? मेरा यह महल अत्यन्त सुरक्षित है और यहाँ के राजा का शासन बड़ा कठोर है— वे अपराधियों को बड़ा कठोर दण्ड देते हैं।'
राजकुमारी के पूछने पर नल ने कहा— 'कल्याणि! तुम मुझे नल समझो। मैं देवताओं का दूत बनकर यहाँ आया हूँ। इन्द्र, अग्नि, वरुण और यम देवता तुम्हें प्राप्त करना चाहते हैं। शोभने! तुम उनमें से किसी एक को अपना पति चुन लो। उन्हीं देवताओं के प्रभाव से मैं इस महल के भीतर आया हूँ और मुझे कोई देख न सका है। भीतर प्रवेश करते समय न तो किसी ने मुझे देखा है और न रोका ही है। भद्रे! इसीलिए श्रेष्ठ देवताओं ने मुझे यहाँ भेजा है। शुभे! इसे सुनकर तुम्हारी जैसी इच्छा हो, वैसा निश्चय करो।'
राजाओं के जाने के बाद दमयन्ती ने अपनी श्रद्धा के अनुसार देवताओं को नमस्कार किया और हँसकर नल से कहा— 'महाराज! आप ही मेरा पाणिग्रहण कीजिये और बताइये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ? हे नरेश्वर! मैं तथा मेरा जो कुछ दूसरा धन है, वह सब आपका है। आप पूर्ण विश्वस्त होकर मेरे साथ विवाह कीजिये। वीर! आपके चरणों में भक्ति रखने वाली मुझ दासी को यदि आप स्वीकार नहीं करेंगे, तो मैं आपके ही कारण विष, अग्नि, जल अथवा फाँसी को निमित्त बनाकर अपना प्राण त्याग दूँगी।'
दमयन्ती के ऐसे कहने पर राजा नल ने पूछा— 'लोकपालों के होते हुए तुम एक साधारण मनुष्य को कैसे पति बनाना चाहती हो? जिन लोकस्रष्टा महामना ईश्वरों के चरणों की धूल के समान भी मैं नहीं हूँ, उन्हीं की ओर तुम्हें मन लगाना चाहिए। निर्दोष अङ्गों वाली सुन्दरी! देवताओं के विरुद्ध चेष्टा करने वाला मानव मृत्यु को प्राप्त हो जाता है; अतः तुम मुझे बचाओ और उन श्रेष्ठ देवताओं का ही वरण करो। जो इस सारी पृथ्वी को सङ्क्षिप्त करके पुनः अपना ग्रास बना लेते हैं, उन देवेश्वर अग्निको कौन नारी अपना पति न चुनेगी? जिनके दण्ड के भय से संसार में समस्त प्राणी धर्म का पालन करते हैं, उन यमराज को कौन अपना पति नहीं वरेगा? यदि तुम ठीक समझती हो तो प्रसिद्ध वरुण को निःशङ्क होकर अपना पति बनाओ।'
क्रियतामविशङ्केन मनसा यदि मन्यसे ।
वरुणं लोकपालानां सुहृद्वाक्यमिदं शृणु ॥
' यदि तुम ठीक समझती हो तो लोकपालोंमें प्रसिद्ध वरुणको निःशंक होकर अपना पति बनाओ । यह एक हितैषी सुहृद्वा वचन है, इसे सुनो '
तब निषधराज के कहने पर दमयन्ती शोकाश्रुओं से भरे नेत्रों के साथ बोली— 'पृथ्वीपते! मैं सम्पूर्ण देवताओं को नमस्कार करके आप ही को अपना पति चुनती हूँ। यह मैंने आपसे सच्ची बात कही है।' ऐसा कहकर दमयन्ती ने दोनों हाथ जोड़े और वह थर-थर काँपने लगी।
यावच्च मे धरिष्यन्ति प्राणा देहे शुचिस्मिते ।
तावत् त्वयि भविष्यामि सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥
‘ पवित्र मुसकानवाली देवि! मेरे इस शरीरमें जबतक प्राण रहेंगे, तबतक तुममें मेरा अनन्य अनुराग बना रहेगा, यह मैं तुमसे सच्ची प्रतिज्ञा करके कहता हूँ '
राजा नल ने कहा— 'कल्याणि! मैं इस समय दूत का कार्य करने आया हूँ; अतः वही करो जो मेरे स्वरूप के अनुरूप हो। मैं देवताओं के सामने प्रतिज्ञा करके अब यहाँ स्वार्थ-साधन के लिये कैसे उत्साहित हो सकता हूँ? यदि यह धर्म सुरक्षित रहे तो उससे मेरे स्वार्थ की भी सिद्धि हो सकती है। भद्रे! तुम ऐसा प्रयत्न करो जिससे मैं इस प्रकार धर्मयुक्त स्वार्थ की सिद्धि कर सकूँ।'
अपां पतिरपां भावं यत्र वाञ्छति नैषधः ।
स्रजश्चोत्तमगन्धाढ्याः सर्वे च मिथुनं ददुः ॥
जलके स्वामी वरुणने नलकी इच्छाके अनुसार जल प्रकट होनेका वर दिया और यह भी कहा कि ' तुम्हारी पुष्पमालाएँ सदा उत्तम गन्धसे सम्पन्न होंगी । ' इस प्रकार सब देवताओंने दो -दो वर दिये ।
यह सुनकर दमयन्ती धीरे-धीरे अश्रुगद्गद वाणी में बोली— 'नरेश्वर! मैंने एक निर्दोष उपाय ढूँढ़ निकाला है। आप और इन्द्र आदि सब देवता एक ही साथ उस रङ्गमण्डप में पधारें, जहाँ मेरा स्वयंवर होने वाला है। तदनन्तर मैं उन लोकपालों के समीप ही आपका वरण कर लूँगी। ऐसा करने से आपको कोई दोष नहीं लगेगा।'
युधिष्ठिर! विदर्भ राजकुमारी के कहने पर राजा नल पुनः वहीं लौट आए, जहाँ देवताओं से उनकी भेंट हुई थी। शक्तिशाली लोकपालों ने उन्हें लौटते देखा और सारा वृत्तान्त पूछा— 'राजन्! क्या तुमने दमयन्ती को देखा है? वह हमें क्या सन्देश दे रही है?'
नल ने कहा— 'देवताओ! आपकी आज्ञा पाकर मैं महल में गया था। वहाँ दमयन्ती की सखियों ने मुझे देखा और वे आश्चर्यचकित हो गईं। जब मैं आप लोगों के प्रभाव का वर्णन करने लगा, तब सुमुखी दमयन्ती ने मन ही मन मेरा वरण किया। उसने कहा है कि— 'हे नर-व्याघ्र! सब देवता आपके साथ उस स्थान पर पधारें जहाँ मेरा स्वयंवर होने वाला है। मैं उन देवताओं के समीप ही आपका वरण कर लूँगी। इससे आपको कोई दोष नहीं लगेगा।' हे देवगण! दमयन्ती का यही वृत्तान्त है। अब आप ही इस बात के साक्षी हैं।'
सा समीक्ष्य तु तान् देवान् पुण्यश्लोकं च भारत ।
नैषधं वरयामास भैमी धर्मेण पाण्डव ॥
भरतकुलभूषण पाण्डुनन्दन! राजकुमारी दमयन्तीने उन देवताओं तथा पुण्यश्लोक नलकी ओर पुनः दृष्टिपात करके धर्मके अनुसार निषधराज नलका ही वरण किया ।
देवताओं ने राजा नल को वरदान देकर स्वर्गलोक की ओर प्रस्थान किया। स्वयंवर में आए हुए अन्य राजा भी, जो दमयन्ती और नल के विवाहोत्सव का अनुभव कर विस्मयविमुग्ध थे, प्रसन्नतापूर्वक अपने नगरों को लौट गए। उधर, विदर्भराज भीम्ञातो होकर अपने नगर चले गए। मनुष्यों में श्रेष्ठ निषध नरेश नल अपनी इच्छा के अनुसार कुछ दिनों तक ससुराल में रहे। फिर उन्होंने दमयन्ती के साथ विदर्भ नरेश भीम की आज्ञा ली और अपनी राजधानी की ओर चल दिए। राजा नल उस रमणीरत्न (दमयन्ती) को पाकर उसी प्रकार विहार करते थे, जैसे इन्द्र शची के साथ करते हैं। वे सूर्य के समान प्रकाशित थे और अत्यन्त प्रसन्न रहकर अपनी प्रजा का धर्मपूर्वक पालन करते थे। उन बुद्धिमान नरेश ने नहुषनन्दन ययातिकी की भाँति अश्वमेध तथा पर्याप्त दक्षिणा वाले अनेक यज्ञों का अनुष्ठान भी किया। तदनन्तर, देवतुल्य राजा नल ने दमयन्ती के साथ रमणीय वनों और उपवनों में विहार किया। इस सुखद जीवन के बीच महामना नल के घर इन्द्रसेन नामक पुत्र और इन्द्रसेना नाम की कन्या का जन्म हुआ। इस प्रकार यज्ञों का अनुष्ठान करते हुए और सुखपूर्वक विहार करते हुए महाराज नल ने धन-धान्य से सम्पन्न वसुन्धरा का पालन किया।
एवं स यजमानश्च विहरंश्च नराधिपः ।
ररक्ष वसुसम्पूर्णां वसुधां वसुधाधिपः ॥
इस प्रकार यज्ञोंका अनुष्ठान तथा सुखपूर्वक विहार करते हुए महाराज नलने धन-धान्यसे सम्पन्न वसुन्धराका पालन किया ।
बृहदश्व मुनि कहते हैं— हे राजन्! जब भीमकुमारी दमयन्ती द्वारा निषध नरेश नल का वरण कर लिया गया और महातेजस्वी लोकपालगण स्वर्गलोक को जा रहे थे, तब मार्ग में उन्होंने देखा कि कलियुग के साथ द्वापर आ रहा है। कलियुग को देखकर बल और वृत्रासुर का नाश करने वाले इन्द्र ने पूछा— 'कले! बताओ तो सही, तुम द्वापर के साथ कहाँ जा रहे हो?'
तब कलि ने इन्द्र से कहा— 'देवराज! मैं दमयन्ती के स्वयंवर में जाकर उसका वरण करूँगा; क्योंकि मेरा मन उसके प्रति आसक्त हो गया है।'
इन्द्र ने हँसकर उत्तर दिया— 'वह स्वयंवर तो सम्पन्न हो चुका है। हमारे समीप ही दमयन्ती ने राजा नल को अपना पति चुन लिया है।'
इन्द्र की बात सुनकर कलियुग को क्रोध आ गया। उसने देवताओं को सम्बोधित करते हुए कहा— 'दमयन्ती ने देवताओं के बीच में मनुष्य का पति रूप में वरण किया है, अतः उसे बड़ा भारी दण्ड देना उचित प्रतीत होता है।'
देवताओं ने उत्तर दिया— 'दमयन्ती ने हमारी आज्ञा लेकर ही नल का वरण किया है। वह सर्वगुण सम्पन्न है और उसने चारों वेदों तथा पञ्चम वेद समस्त इतिहास-पुराण का अध्ययन किया है। उसके घर पर पाञ्च यज्ञों के माध्यम से देवता नित्य तृप्त होते हैं। वह अहिंसा-परायण, सत्यवादी और दृढ़ व्रत का पालन करने वाली है। नल जैसे तेजस्वी राजा में दक्षता, धैर्य, ज्ञान, तप, शौच, शम और दम जैसे गुण निवास करते हैं। हे कले! जो ऐसे राजा को शाप देने की इच्छा रखता है, वह मानो अपने आप को ही शाप देता है और अपना विनाश स्वयं करता है। ऐसे सद्गुण सम्पन्न महाराज नल को जो शाप देने की कामना करेगा, वह कष्ट से भरे अगाध नरक-कुण्ड में निमग्न होगा।' ऐसा कहकर देवता स्वर्ग चले गए।
योऽधीते चतुरो वेदान् सर्वानाख्यानपञ्चमान् ।
नित्यं तृप्ता गृहे यस्य देवा यज्ञेषु धर्मतः ।
अहिंसानिरतो यश्च सत्यवादी दृढव्रतः ॥
यस्मिन् दाक्ष्यं धृतिर्ज्ञानं तपः शौचं दमः शमः ।
ध्रुवाणि पुरुषव्याघ्रे लोकपालसमे नृपे ॥
एवंरूपं नलं यो वै कामयेच्छपितुं कले ।
आत्मानं स शपेन्मूढो हन्यादात्मानमात्मना ॥
ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करके चारों वेदों तथा पंचम वेद समस्त इतिहास - पुराणका भी अध्ययन किया है, जो सब धर्मोंको जानते हैं, जिनके घरपर पंचयज्ञोंमें धर्मके अनुसार सम्पूर्ण देवता नित्य तृप्त होते हैं, जो अहिंसा -परायण, सत्यवादी तथा दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करनेवाले हैं, जिन नरश्रेष्ठ लोकपाल-सदृश तेजस्वी नलमें दक्षता, धैर्य, ज्ञान, तप, शौच, शम और दम आदि गुण नित्य निवास करते हैं । कले! ऐसे राजा नलको जो मूढ़ शाप देनेकी इच्छा रखता है, वह मानो अपनेको ही शाप देता है । अपने द्वारा अपना ही विनाश करता है ।
देवताओं के जाने के बाद कलियुग ने द्वापर से कहा— 'द्र्वापर! मैं अपने क्रोध का उपसंहार नहीं कर सकता। मैं नल के भीतर निवास करूँगा और उन्हें राज्य से वञ्चित कर दूँगा ताकि वे दमयन्ती के साथ रमण न कर सकें। तुम्हें भी जुए के पासों में प्रवेश करके मेरी सहायता करनी चाहिए।' इस प्रकार सङ्केत देकर कलियग निषध देश पहुँचा, जहाँ राजा नल रहते थे। वह प्रतिदिन राजा नल की कमियों को देखता हुआ वहाँ दीर्घकाल तक टिका रहा। बारह वर्षों के पश्चात एक दिन उसे एक छिद्र दिखाई दिया।
उस दिन राजा नल लघुशङ्का करने के उपरान्त हाथ-मुँह धोकर आचमन कर सन्ध्योपासना के लिए बैठे थे, किन्तु उन्होंने अपने पैर नहीं धोए थे। इसी छिद्र को देखकर कलियुग उनके भीतर प्रविष्ट हो गया। नल में आविष्ट होकर कलियुग ने दूसरा रूप धारण किया और पुष्कर के पास जाकर कहा— 'चलो, राजा नल के साथ जुआ खेलो! मेरे साथ रहकर तुम जूए में अवश्य राजा नल को जीत लोगे और इस प्रकार उन्हें उनके राज्य सहित जीतकर निषध देश को अपने अधिकार में कर लोगे।'
कलियुग के ऐसा कहने पर पुष्कर राजा नल के पास गया। कलि भी एक साँड का रूप धारण कर पुष्कर के साथ हो लिया। शत्रुवीरों का संहार करने वाले पुष्कर ने वीरवर नल के पास जाकर बार-बार कहा— 'हम दोनों धर्मपूर्वक जुआ खेलें।' पुष्कर, राजा नल का भाई लगता था।
महामना राजा नल द्यूत के लिए पुष्कर के इस आह्वान को टाल न सके। विदर्भ राजकुमारी दमयन्ती को देखते-देखते ही उन्होंने इसे जुआ खेलने का उपयुक्त अवसर समझ लिया। कलियुग से आविष्ट होकर राजा नल हिरण्य, सुवर्ण, रथ और बहुमूल्य वस्त्र दाँव पर लगाने लगे और हारने लगे। उनके आसपास ऐसा कोई सुहृद नहीं था जो इस द्यूतक्रीड़ा के मद में डूबे हुए नल को रोक सके।
तदनन्तर समस्त पुरवासी मन्त्रियों सहित आए ताकि वे उस आतुर नरेश को जुए से रोक सकें। इसी समय सारथि ने महल में जाकर महारानी दमयन्ती से निवेदन किया— 'देवि! ये पुरवासी लोग कार्यवश राजद्वार पर खड़े हैं। आप महाराज से निवेदन कर दें। धर्म-अर्थ का तत्व जानने वाले महाराज के भावी सङ्कट को देखकर मन्त्रियों सहित सारी प्रजा द्वार पर खड़ी है।'
यह सुनकर शोक से दुर्बल हुई दमयन्ती ने आँसू बहाते हुए गद्गद वाणी में राजा नल से कहा। दमयन्ती ने देखा कि पुण्यश्लोक महाराज नल उन्मत्त की भाँति द्यूतक्रीड़ा में आसक्त हैं। उनकी यह अवस्था देखकर वह भय और शोक से व्याकुल हो गई और उनके हित के लिए किसी महत्त्वपूर्ण कार्य का चिन्तन करने लगी। उसके मन में आशङ्का हुई कि राजा पर बहुत बड़ा सङ्कट आने वाला है। उसने सोचा कि महाराज का सर्वस्व अपहरण हो रहा है, अतः उसने अपनी धाय बृहत्सेना को बुलाया।
दमयन्ती ततो दृष्ट्वा पुण्यश्लोकं नराधिपम् ।
उन्मत्तवदनुन्मत्ता देवने गतचेतसम् ॥
भयशोकसमाविष्टा राजन् भीमसुता ततः ।
चिन्तयामास तत् कार्यं सुमहत् पार्थिवं प्रति ॥
बृहदश्व मुनि कहते हैं - राजन्! तदनन्तर दमयन्तीने देखा कि पुण्यश्लोक महाराज नल उन्मत्तकी भाँति द्यूतक्रीडामें आसक्त हैं। वह स्वयं सावधान थी । उनकी वैसी अवस्था देख भीमकुमारी भय और शोकसे व्याकुल हो गयी और महाराजके हितके लिये किसी महत्त्वपूर्ण कार्यका चिन्तन करने लगी ।
दमयन्ती ने कहा— 'बृहत्सेने! तुम मन्त्रियों के पास जाओ और राजा की आज्ञा से उन्हें बुला लाओ। उन्हें बताओ कि अमुक-अमुक द्रव्य हार दिया गया है और इतना धन अभी शेष है।'
मन्त्रियों ने आकर सूचना दी, पर जब दमयन्ती ने देखा कि पति अपनी बात का उत्तर प्रसन्नतापूर्वक नहीं दे रहे हैं, तो वह लज्जित होकर महल के भीतर चली गई। वहाँ उसने सुना कि पासे लगातार राजा के विपरीत पड़ रहे हैं। उसने पुनः धाय से कहा— 'बृहत्सेने! जाओ और वार्ष्णेय सूत को बुला लाओ। एक बहुत बड़ा कार्य उपस्थित हुआ है।'
दमयन्ती ने वार्ष्णेय को सान्त्वना देते हुए कहा— 'सूत! तुम जानते हो कि महाराज तुम्हारे प्रति कैसे अच्छे थे, आज वे विषम सङ्कट में हैं। जैसे-जैसे वे पुष्कर से हार रहे हैं, उनकी आसक्ति बढ़ती जा रही है। वे सुहृदों के वचन नहीं सुन रहे। मैं तुम्हारी शरण में हूँ, मेरे मन में अशुभ विचार आ रहे हैं कि राजा का राज्य छिन सकता है। तुम महाराज के प्रिय अश्वों को रथ में जोड़कर इन दोनों बच्चों को लेकर कुण्डिनपुर चले जाओ। वहाँ इन बालकों, इस रथ और घोड़ों को मेरे भाई-बन्धुओं की देख-रेख में सौंप देना।'
जानीषे त्वं यथा राजा सम्यग् वृत्तः सदा त्वयि ।
तस्य त्वं विषमस्थस्य साहाय्यं कर्तुमर्हसि ॥
' सूत! तुम जानते हो कि महाराज तुम्हारे प्रति कैसा अच्छा बर्ताव करते थे । आज वे विषम संकटमें पड़ गये हैं, अतः तुम्हें भी उनकी सहायता करनी चाहिये ।
सारथि वार्ष्णेय ने मन्त्रियों से विचार करके दोनों बालकों को रथ पर बैठाया और विदर्भ देश के लिए प्रस्थान किया। वहाँ पहुँचकर उसने बच्चों, रथ और घोड़ों को रख दिया और स्वयं राजा दमयन्ती के भाई राजा भीम से मिलकर दुखी मन से अयोध्या चला गया। वह अत्यन्त दुःखी होकर राजा ऋतुपर्ण की सेवा में उपस्थित हुआ और उनका सारथि बन गया।
इस प्रकार, जूआ खेलने वाले महाराज नल का सारा राज्य और धन पुष्कर ने जीत लिया। राज्य हार जाने पर पुष्कर हँसते हुए बोला— 'क्या फिर जुआ आरम्भ करें? अब तुम्हारे पास दाँव पर लगाने के लिए केवल दमयन्ती शेष रह गई है। यदि तुम्हारी इच्छा हो, तो उसे दाँव पर रखकर एक बार फिर खेला जाए।'
पुष्कर की बात सुनकर राजा नल का हृदय शोक से विदीर्ण हो गया, पर उन्होंने कुछ कहा नहीं। तदनन्तर उन्होंने दुःख के साथ अपने आभूषण उतार दिए और केवल एक अधोवस्त्र धारण कर, बिना चादर ओढ़े अपनी सम्पत्ति त्यागकर राजभवन से निकल पड़े। दमयन्ती के शरीर पर भी एक ही वस्त्र था; वह जाते हुए राजा नल के पीछे हो ली। वे दोनों नगर से बाहर तीन रात तक रहे।
पुष्कर ने नगर में घोषणा करा दी थी कि जो भी नल के साथ अच्छा व्यवहार करेगा, वह उसका वध्य होगा। इस द्वेष के कारण पुरवासियों ने राजा का सत्कार नहीं किया। वे तीन रात तक केवल जल पीकर रहे। भूख से पीड़ित होकर जब वे फल-मूल जुटाने लगे, तब उन्होंने कुछ ऐसे पक्षी देखे जिनकी पाँखें सोने की थीं। उन्हें देखकर नल के मन में आया कि ये पक्षी आज मेरा भक्ष्य होंगे और इनकी पाँखें मेरे लिए धन बन जाएँगी।
उन्होंने अपने अधोवस्त्र से उन पक्षियों को ढँक दिया, किन्तु वे पक्षी उनका वस्त्र लेकर आकाश में उड़ गए। उन पक्षियों ने नीचे नग्न खड़े नल को देखकर कहा— 'ओ खोटी बुद्धि वाले नरेश! हम पक्षी नहीं, पासे हैं। तुम्हारा वस्त्र छीनकर हमें प्रसन्नता नहीं हुई।'
उन पासों को देख और स्वयं को नग्नावस्था में पाकर नल ने दमयन्ती से कहा— 'सती रानी! जिनके क्रोध से मेरा ऐश्वर्य छिन गया और जिनकी वजह से प्रजा ने मेरा सत्कार नहीं किया, वे ही ये पासे हैं जो मेरा वस्त्र ले जा रहे हैं। मैं बड़ी विषम परिस्थिति में हूँ। दुःख के कारण मेरी चेतना लुप्त हो रही है। मैं तुम्हारा पति हूँ, इसलिए तुम्हारे हित की बात बता रहा हूँ— सुनो, ये मार्ग दक्षिण दिशा की ओर जाते हैं। यह मार्ग पर्वत लाँघकर अवन्ती देश जाता है। यह विन्ध्य पर्वत और पयोष्णी नदी है। यहाँ महर्षियों के आश्रम हैं जहाँ फल-मूल मिल सकते हैं। यह विदर्भ का मार्ग है और वह कोसल का।'
वैषम्यं परमं प्राप्तो दुःखितो गतचेतनः ।
भर्ता तेऽहं निबोधेदं वचनं हितमात्मनः ॥
‘ मैं बड़ी विषम परिस्थितिमें पड़ गया हूँ । दुःखके मारे मेरी चेतना लुप्त सी हो रही है । मैं तुम्हारा पति हूँ, अतः तुम्हारे हितकी बात बता रहा हूँ, इसे सुनो- ।
दमयन्ती ने आँसू बहाते हुए कहा— 'महाराज! जब मैं आपके सङ्कट पर विचार करती हूँ, तो मेरा हृदय उद्विग्न हो उठता है। आपका राज्य, धन और वस्त्र सब छिन गया है। आप भूख और परिश्रम से कष्ट पा रहे हैं। ऐसे में इस निर्जन वन में आपको असहाय छोड़कर मैं कैसे जा सकती हूँ? जब आप भयङ्कर वन में थके-माँदे और भूखे होकर पूर्व सुख का चिन्तन करेंगे, तब मैं सान्त्वना देकर आपके सन्ताप को दूर करूँगी।'
"प्रिये! इसमें सन्देह नहीं कि विदर्भराज्य जैसे तुम्हारे पिता का है, वैसे मेरा भी है, तथापि आपत्ति में पड़ा हुआ मैं किसी तरह वहाँ नहीं जाऊँगा। एक दिन मैं भी समृद्धिशाली राजा था। उस अवस्थामें वहाँ जाकर मैंने तुम्हारे हर्ष को बढ़ाया था और आज उस राज्य से वञ्चित होकर केवल तुम्हारे शोक की वृद्धि कर रहा हूँ, ऐसी दशा में वहाँ कैसे जाऊँगा?"
बृहदश्व मुनि कहते हैं—राजन्! आधे वस्त्र से ढकी हुई कल्याणमयी दमयन्ती से बार-बार ऐसा कहकर राजा नल ने उसे सान्त्वना दी; क्योंकि वे दोनों एक ही वस्त्र से अपने अङ्गों को ढककर इधर-उधर घूम रहे थे। भूख और प्यास से थके-माँदे वे दोनों दम्पति किसी सभाभवन—धर्मशाला में जा पहुँचे। वहाँ पहुँचकर निषधन नरेश राजा नल वैदर्भी के साथ भूतल पर बैठ गए। वे वस्त्रहीन, चटाई आदि से रहित, मलिन एवं धूलि-धूसरित हो रहे थे। दमयन्ती के साथ थककर वे भूमि पर ही सो गये। सुकुमारी तपस्विनी कल्याणमयी दमयन्ती भी सहसा दुःख में पड़ गयी थी; वहाँ आने पर उसे भी निद्रा ने घेर लिया।
राजन्! राजा नल का चित्त शोक से मथा जा रहा था। वे दमयन्ती के सो जाने पर भी स्वयं पहले की भाँति सो न सके। राज्य का अपहरण, सुहृदों का त्याग और वन में प्राप्त होने वाले नाना प्रकार के क्लेश पर विचार करते हुए वे चिन्ता को प्राप्त हो गये। वे सोचने लगे—'ऐसा करने से मेरा क्या होगा और यह कार्य न करने से भी क्या होगा? मेरा मर जाना अच्छा है कि अपनी आत्मीया दमयन्ती को त्याग देना।'
'यह मुझसे इस प्रकार अनुरक्त होकर मेरे ही लिये दुःख उठा रही है। यदि मुझसे अलग हो जाय तो यह कदाचित् अपने स्वजनों के पास जा सकती है। मेरे पास रहकर तो यह पतिव्रता नारी निश्चय ही केवल दुःख भोगेगी। यद्यपि इसे त्याग देने पर एक संशय बना रहेगा, तो भी यह सम्भव है कि इसे कभी सुख मिल जाय।'
राजन्! नल अनेक प्रकार से बार-बार विचार करके एक निश्चय पर पहुँच गये और दमयन्ती का परित्याग कर देने में ही उसकी भलाई मानने लगे। 'यह महाभागा यशस्विनी दमयन्ती मेरी भक्त और पतिव्रता है। पातिव्रत-तेज के कारण मार्ग में कोई इसका सतीत्व नष्ट नहीं कर सकता।' ऐसा सोचकर उनकी बुद्धि दमयन्ती को अपने साथ रखने के विचार से निवृत्त हो गयी। बल्कि दुष्ट स्वभाव वाले कलियुग से प्रभावित होने के कारण दमयन्ती को त्याग देने में ही उनकी बुद्धि प्रवृत्त हुई।
एवं तस्य तदा बुद्धिर्दमयन्त्यां न्यवर्तत ।
कलिना दुष्टभावेन दमयन्त्या विसर्जने ॥
ऐसा सोचकर उनकी बुद्धि दमयन्तीको अपने साथ रखनेके विचारसे निवृत्त हो गयी । बल्कि दुष्ट स्वभाववाले कलियुगसे प्रभावित होनेके कारण दमयन्तीको त्याग देनेमें ही उनकी बुद्धि प्रवृत्त हुई ।
तदनन्तर राजा ने अपनी वस्त्रहीनता और दमयन्ती की एक-वस्त्रता का विचार करके उसके आधे वस्त्र को फाड़ लेना ही उचित समझा। फिर यह सोचकर कि 'मैं कैसे वस्त्र को काहूँ, जिससे मेरी प्रिया की नींद न टूटे', राजा नल धर्मशाला में नङ्गे ही इधर-उधर घूमने लगे। उधर दौड़-धूप करने पर राजा नल को उस सभाभवन में एक अच्छी-सी नङ्गी तलवार मिल गयी। उसी से दमयन्ती का आधा वस्त्र काटकर परन्तप नल ने अपने शरीर को ढँक लिया और अचेत सोती हुई विदर्भ राजकुमारी दमयन्ती को वहीं छोड़कर वे शीघ्रता से चले गये।
कुछ दूर जाने पर उनके हृदय का विचार पलट गया और वे पुनः उसी सभाभवन में लौट आये। वहाँ उस समय दमयन्ती को देखकर निषधन नरेश नल फूट-फूटकर रोने लगे। वे विलाप करते हुए कहने लगे—"पहले जिस मेरी प्रियतमा दमयन्ती को वायु तथा सूर्य देवता भी नहीं देख पाते थे, वही आज इस धर्मशाला में भूमि पर अनाथ की भाँति सो रही है। यह मनोहर हास्य वाली सुन्दरी वस्त्र के आधे टुकड़े से लिपटी हुई सो रही है। जब इसकी नींद खुलेगी, तो पगली-सी होकर न जाने यह कैसी दशा को पहुँचा जाएगी? यह भयङ्कर वन हिंसक पशुओं और सर्पों से भरा है। मुझसे बिछड़कर शुभलक्षणा सती दमयन्ती अकेली इस वन में कैसे विचरण करेगी? महाभागे! तुम धर्म से आवृत हो; आदित्य, वसु, रुद्र, अश्विनीकुमार और मरुद्गण—ये सब देवता तुम्हारी रक्षा करें।"
इस भूतल पर रूप-सौन्दर्य में जिसकी समानता करने वाली दूसरी कोई स्त्री नहीं थी, उसी अपनी प्यारी पत्नी दमयन्ती के प्रति इस प्रकार कहकर राजा नल वहाँ से उठे और चल दिये। उस समय कलि ने इनकी विवेकशक्ति हर ली थी। राजा नल को एक ओर कलियुग खींच रहा था और दूसरी ओर दमयन्ती का सौहार्द। अतः वे बार-बार जाकर फिर उसी धर्मशाला में लौट आते थे। उस समय दुःखी राजा नल का हृदय मानो दुविधा में पड़ गया था; जैसे झूला बार-बार नीचे-ऊपर आता-जाता रहता है, उसी प्रकार उनका हृदय कभी बाहर जाता, कभी सभाभवन में लौट आता था। अन्त में कलियुग ने प्रबल आकर्षण किया, जिससे मोहित होकर राजा नल बहुत देर तक करुण विलाप करके अपनी सोती हुई पत्नी को छोड़कर शीघ्रता से चले गये। कलियुग के स्पर्श से उनकी बुद्धि भ्रष्ट हो गयी थी; अतः वे अत्यन्त दुःखी होकर विभिन्न बातों का विचार करते हुए उस सूने वन में अपनी पत्नी को अकेली छोड़कर चल दिये।
बृहदश्व मुनि कहते हैं—राजन्! नल के चले जाने पर जब दमयन्ती की थकावट दूर हो गयी, तब उसकी आँख खुली। उस निर्जन वन में अपने स्वामी को न देखकर सुन्दरी दमयन्ती भयातुर और दुःख-शोक से व्याकुल हो गयी। उसने भयभीत होकर निषधन नरेश नल को 'महाराज! आप कहाँ हैं?' कहकर बड़े जोर से पुकारा।
"हा नाथ! हा महाराज! हा स्वामिन्! आप मुझे क्यों त्याग रहे हैं? हाय! मैं मारी गयी, नष्ट हो गयी, इस जनशून्य वन में मुझे बड़ा भय लग रहा है। महाराज! आप तो धर्मज्ञ और सत्यवादी हैं; फिर वैसी सच्ची प्रतिज्ञा करके आज आप इस जङ्गल में मुझे सोती छोड़कर कैसे चले गये? मैं आपकी सेवा में कुशल और अनुरक्त भार्या हूँ। विशेषतः मेरे द्वारा आपका कोई अपराध भी नहीं हुआ है। यदि कोई अपराध हुआ है, तो वह दूसरे के ही द्वारा है, मुझसे नहीं; तो भी आप मुझे त्यागकर क्यों चले जा रहे हैं? नरेश्वर! आपने पहले स्वयंवर सभा में उन लोकपालों के निकट जो बातें कहीं थीं, क्या आप उन्हें आज मेरे प्रति सत्य सिद्ध कर सकेंगे? पुरुष शिरोमणे! मनुष्यों की मृत्यु असमय में नहीं होती, तभी तो आपकी यह प्रियतमा आपसे परित्यक्त होकर दो घड़ी भी जी रही है। पुरुष श्रेष्ठ! यहाँ इतना ही परिहास बहुत है। अत्यन्त दुर्धर्ष वीर! मैं बहुत डर गयी हूँ। प्राणेश्वर! अब मुझे अपना दर्शन दीजिये। राजन्! निषधन नरेश! आप दीख रहे हैं, दीख रहे हैं; यह दिखाई दिये! लताओं द्वारा अपने को छिपाकर आप मुझसे बात क्यों नहीं कर रहे हैं? राजेन्द्र! मैं इस प्रकार भय और चिन्ता में पड़कर यहाँ विलाप कर रही हूँ और आप आकर आश्वासन भी नहीं देते! भूपाल! यह तो आपकी बड़ी निर्दयता है। नरेश्वर! मैं अपने लिये शोक नहीं करती। मुझे दूसरी किसी बात का भी शोक नहीं है। मैं केवल आपके लिये शोक कर रही हूँ कि आप अकेले कैसी शोचनीय दशा में पड़ जायेंगे? राजन्! आप भूखे-प्यासे और परिश्रम से थके-माँदे होकर जब सायङ्काल किसी वृक्ष के नीचे आकर विश्राम करेंगे, उस समय मुझे अपने पास न देखकर आपकी कैसी दशा हो जाएगी?"
तदनन्तर प्रचण्ड शोक से पीड़ित होकर, क्रोधाग्नि से दग्ध होती हुई-सी दमयन्ती अत्यन्त दुःखी होकर रोने और इधर-उधर दौड़ने लगी। दमयन्ती बार-बार उठती और बार-बार विह्वल होकर गिर पड़ती थी। वह कभी भयभीत होकर छिपती और कभी जोर-जोर से रोने-चिल्लाने लगती थी। अत्यन्त शोकसन्तप्त होकर, बार-बार लम्बी साँसें खींचती हुई व्याकुल पतिव्रता दमयन्ती दीर्घ निःश्वास लेकर रोती हुई बोली—"जिसके अभिशाप से निषधन नरेश नल दुःख से पीड़ित होकर क्लेश-पर-क्लेश उठाते जा रहे हैं, उस प्राणी को हमलोगों के दुःख से भी अधिक दुःख प्राप्त हो। जिस पापी ने पुण्यात्मा राजा नल को इस दशा में पहुँचाया है, वह उनसे भी भारी दुःख में पड़कर दुःख की ही जिन्दगी बितावे।"
यस्याभिशापाद् दुःखार्तो दुःखं विन्दति नैषधः ।
तस्य भूतस्य नो दुःखाद् दुःखमप्यधिकं भवेत् ॥
‘ जिसके अभिशापसे निषधनरेश नल दुःखसे पीड़ित हो क्लेश- पर- क्लेश उठाते जा रहे हैं, उस प्राणीको हमलोगोंके दुःखसे भी अधिक दुःख प्राप्त हो ।
इस प्रकार विलाप करती तथा हिंस्र जन्तुओं से भरे हुए वन में अपने पति को ढूँढ़ती हुई महामना राजा नल की पत्नी भीमकुमारी दमयन्ती उन्मत्त होकर रोती-बिलखती और 'हा राजन्! हा महाराज!' ऐसा बार-बार कहती हुई इधर-उधर दौड़ने लगी। वह कुररी पक्षी की भाँति जोर-जोर से करुण क्रन्दन कर रही थी। वहाँसे थोड़ी ही दूर पर एक विशालकाय भूखा अजगर बैठा था। उसने बार-बार चक्कर लगाती सहसा निकट आयी हुई भीमकुमारी दमयन्ती को पैरों की ओर से निगलना आरम्भ कर दिया। शोक में डूबी हुई वैदर्भी को अजगर निगल रहा था, तो भी वह अपने लिये उतना शोक नहीं कर रही थी, जितना शोक उसे निषधन नरेश नल के लिये था।
वह विलाप करती हुई कहने लगी—"हा नाथ! इस निर्जन वन में यह अजगर सर्प मुझे अनाथ की भाँति निगल रहा है। आप मेरी रक्षा के लिये दौड़कर आते क्यों नहीं हैं? निषधन नरेश! यदि मैं मर गयी, तो मुझे बार-बार याद करके आपकी कैसी दशा हो जाएगी? प्रभो! आज मुझे वन में छोड़कर आप क्यों चले गये? निष्पाप निषधन नरेश! इस सङ्कट से मुक्त होने पर जब आपको पुनः शुद्ध बुद्धि, चेतना और धन आदि की प्राप्ति होगी, उस समय मेरे बिना आपकी क्या दशा होगी? नृप प्रवर! जब आप भूख से पीड़ित होकर थके-माँदे एवं अत्यन्त खिन्न होंगे, उस समय आपकी उस थकावट को कौन दूर करेगा?"
इसी समय कोई व्याध उस गहन वन में विचर रहा था। वह दमयन्ती का करुण क्रन्दन सुनकर बड़े वेग से उधर आया। उस विशाल नयनों वाली युवती को अजगर के द्वारा उस प्रकार निगली जाती हुई देख व्याध ने बड़ी उतावली के साथ वेग से दौड़कर तीखे शस्त्र से शीघ्र ही उस अजगर का मुख फाड़ दिया। वह अजगर छटपटाकर चेष्टारहित हो गया। मृगों को मारकर जीविका चलाने वाले उस व्याध ने सर्प के टुकड़े-टुकड़े करके दमयन्ती को छुड़ाया। फिर जल से उसके सर्पग्रस्त शरीर को धोकर उसे आश्वासन दिया और उसके लिये भोजन की व्यवस्था कर दी।
जब वह भोजन कर चुकी, तब व्याध ने उससे पूछा—"मृगलोचने! तुम किसकी स्त्री हो और कैसे वन में चली आयी हो? भामिनि! किस प्रकार तुम्हें यह महान् कष्ट प्राप्त हुआ है?"
स्थूल नितम्ब और स्तनों वाली विदर्भ कुमारी ने आधे वस्त्र से ही अपने अङ्गों को ढँक रखा था। पूर्ण चन्द्रमा के समान मनोहर मुख वाली दमयन्ती का एक-एक अङ्ग सुकुमार एवं निर्दोष था। उसकी आँखें तिरछी बरौनियों से सुशोभित थीं और वह बड़े मधुर स्वर में बोल रही थी। इन सब बातों की ओर लक्ष्य करके वह व्याध काम के अधीन हो गया। वह मधुर एवं कोमल वाणी से उसे अपने अनुकूल बनाने के लिये भाँति-भाँत के आश्वासन देने लगा। वह व्याध उस समय कामवेदना से पीड़ित हो रहा था। सती दमयन्ती ने उसके दूषित मनोभाव को समझ लिया। पतिव्रता दमयन्ती भी उसकी दुष्टता को समझकर तीव्र क्रोध के वशीभूत होकर मानो रोषाग्नि से प्रज्वलित हो उठी। यद्यपि वह नीच पापात्मा व्याध उस पर बलात्कार करने के लिये व्याकुल हो गया था, परन्तु दमयन्ती अग्निशिखा की भाँति उद्दीप्त हो रही थी; अतः उसका स्पर्श करना उसको अत्यन्त दुष्कर प्रतीत हुआ।
पति तथा राज्य दोनों से वञ्चित होने के कारण दमयन्ती अत्यन्त दुःख से आतुर हो रही थी। इधर व्याध की कुचेष्टा वाणी द्वारा रोकने पर रुक सके, ऐसी प्रतीत नहीं होती थी। तब (उस व्याध पर अत्यन्त रुष्ट होकर) उसने उसे शाप दे दिया—"यदि मैं निषधराज नल के सिवा दूसरे किसी पुरुष का मन से भी चिन्तन नहीं करती होऊँ, तो इसके प्रभाव से यह तुच्छ व्याध प्राणशून्य होकर गिर पड़े।" दमयन्ती के इतना कहते ही वह व्याध आग से जले हुए वृक्ष की भाँति प्राणशून्य होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा।
उक्तमात्रे तु वचने तथा स मृगजीवनः ।
व्यसुः पपात मेदिन्यामग्निदग्ध इव द्रुमः ॥
दमयन्तीके इतना कहते ही वह व्याध आगसे जले हुए वृक्षकी भाँति प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ।
बृहदश्व मुनि कहते हैं—राजन्! व्याध का विनाश करके वह कमलनयनी राजकुमारी झिल्लियों की झङ्कार से गूँजते हुए निर्जन एवं भयङ्कर वन में आगे बढ़ी। वह वन सिंह, चीतों, रुरुमृग, व्याघ्र, भैंसों तथा रीछ आदि पशुओं से युक्त और भाँति-भाँत के पक्षी-समुदाय से व्याप्त था। वहाँ म्लेच्छ और तस्करों का निवास था। शाल, वेणु, धव, पीपल, तिन्दुक, इङ्गुद, पलाश, अर्जुन, अरिष्ट, स्यन्दन, सेमल, जामुन, आम, लोध, खैर, साखू, बेंत, पद्मक, आँवला, पाकर, कदम्ब, गूलर, बेर, बेल, बरगद, प्रियाल, ताल, खजूर, हर्रे तथा बहेड़े आदि वृक्षों से वह विशाल वन परिपूर्ण था। दमयन्ती ने वहाँ सैकड़ों धातुओं से संयुक्त नाना प्रकार के पर्वत, पक्षियों के कलरवों से गुञ्जायमान कितने ही निकुञ्ज और अद्भुत कन्दराएँ देखीं। उसने कितनी ही नदियों, सरोवरों, बावलियों तथा नाना प्रकार के मृगों और पक्षियों को देखा। उसने बहुत-से भयानक रूप वाले पिशाच, नाग तथा राक्षस देखे। कितने ही गड्ढों, पोखरों और पर्वत शिखरों का अवलोकन किया। सरिताओं और अद्भुत झरनों को देखा। विदर्भ राजनन्दिनी ने उस वन में झुण्ड के झुण्ड भैंसे, सूअर, रीछ और जङ्गली साँप देखे। तेज, यश, शोभा और परम धैर्य से युक्त विदर्भ कुमारी उस समय अकेली विचरती और नल को ढूँढ़ती थी। वह पतिके विरहरूपी सङ्कट से सन्तप्त थी; अतः राजकुमारी दमयन्ती उस भयङ्कर वन में प्रवेश करके भी किसी जीव-जन्तु से भयभीत नहीं हुई।
राजन्! विदर्भ कुमारी दमयन्ती के अङ्ग-अङ्ग में पति के वियोग का शोक व्याप्त हो गया था, इसलिये वह अत्यन्त दुःखित होकर एक शिला के नीचे भाग में बैठकर बहुत विलाप करने लगी।
दमयन्ती बोली—"चौड़ी छाती वाले महाबाहु निषधन नरेश महाराज! आज इस निर्जन वन में मुझे अकेला छोड़कर आप कहाँ चले गये? नरश्रेष्ठ! वीर शिरोमणे! प्रचुर दक्षिणा वाले अश्वमेध आदि यज्ञों का अनुष्ठान करके भी आप मेरे साथ मिथ्या बर्ताव क्यों कर रहे हैं? महातेजस्वी कल्याणमय राजाओं में उत्तम नरश्रेष्ठ! आपने मेरे सामने जो बात कही थी, उसका स्मरण करना उचित है। नरसिंह! एक ओर अङ्ग और उपाङ्गों सहित विस्तारपूर्वक चारों वेदों का स्वाध्याय हो और दूसरी ओर केवल सत्य भाषण हो, तो वह निश्चय ही इससे बढ़कर है। अतः शत्रु हन्ता नरेश्वर! वीर! आपने पहले मेरे समीप जो बातें कही थीं, उन्हें सत्य करना चाहिये। हे निष्पाप वीर नल! आपकी मैं दमयन्ती इस भयङ्कर वन में नष्ट हो रही हूँ, आप मेरी बात का उत्तर क्यों नहीं देते? यह भयानक आकृति वाला क्रूर सिंह भूख से पीड़ित होकर मुँह बाये खड़ा है और मुझ पर आक्रमण करना चाहता है, क्या आप मेरी रक्षा नहीं कर सकते? कल्याणमय नरेश! आप पहले जो सदा यह कहते थे कि तुम्हारे सिवा दूसरी कोई भी स्त्री मुझे प्रिय नहीं है, अपनी उस बात को सत्य कीजिये। महाराज! मैं आपकी प्रिय पत्नी हूँ और आप मेरे प्रियतम पति हैं; ऐसी दशा में भी मैं यहाँ उन्मत्त होकर विलाप कर रही हूँ, तो भी आप मेरी बात का उत्तर क्यों नहीं देते?"
"पृथ्वीनाथ! मैं दीन, दुर्बल, कान्तिहीन और मलिन होकर आधे वस्त्र से अपने अङ्गों को ढककर अकेली अनाथ-सी विलाप कर रही हूँ। विशाल नेत्रों वाले शत्रुसूदन आर्य! मेरी दशा अपने झुण्ड से बिछड़ी हुई हरिणी की-सी हो रही है। मैं यहाँ अकेली रो रही हूँ। परन्तु आप मेरा मान नहीं रखते हैं। महाराज! इस महान् वन में मैं सती दमयन्ती अकेली आपको पुकार रही हूँ, आप मुझे उत्तर क्यों नहीं देते? नरश्रेष्ठ! आप उत्तम कुल और श्रेष्ठ शील-स्वभाव से सम्पन्न हैं। आप अपने सम्पूर्ण मनोहर अङ्गों से सुशोभित होते हैं। आज इस पर्वत शिखर पर मैं आपको नहीं देख पाती हूँ। निषधन नरेश! इस महाभयङ्कर वन में, जहाँ सिंह-व्याघ्र रहते हैं, आप कहीं सोये हैं, बैठे हैं अथवा खड़े हैं?
मेरे शोक को बढ़ाने वाले नरश्रेष्ठ! आप यहीं हैं या कहीं अन्यत्र चल दिये, यह मैं किससे पूछूँ? आपके लिये शोक से दुर्बल होकर मैं अत्यन्त दुःख से आतुर हो रही हूँ। क्या तुमने इस वन में राजा नल से मिलकर उन्हें देखा है? ऐसा प्रश्न अब मैं इस वन में प्रस्थान करने वाले नल के विषय में किससे करूँ? शत्रुओं के व्यूह का नाश करने वाले जिन परम सुन्दर कमलनयन महात्मा राजा नल को तू खोज रही है, वे यही तो हैं—ऐसी मधुर वाणी आज मैं किसके मुख से सुनूँगी?
वह वन का राजा कान्तिमान् सिंह मेरे सामने चला आ रहा है। इसके चार दाढ़ें और विशाल ठोड़ी है। मैं निःशङ्क होकर इसके सामने जा रही हूँ और कहती हूँ—'आप मृगों के राजा और इस वन के स्वामी हैं। मृगेन्द्र! मैं इस वन में अकेली पति की खोज में भटक रही हूँ तथा शोक से पीड़ित एवं दीन हो रही हूँ। यदि आपने नल को यहाँ कहीं देखा हो तो उनका कुशल-समाचार बताकर मुझे आश्वासन दीजिये।'
अहो! इस घोर वन में मेरा विलाप सुनकर भी यह सिंह मुझे सान्त्वना नहीं देता। यह तो स्वादिष्ट जल से भरी हुई इस समुद्रगामिनी नदी की ओर जा रहा है। अच्छा, इस पवित्र पर्वत से ही पूछती हूँ। यह बहुत से ऊँचे-ऊँचे शोभाशाली बहुरङ्गे एवं मनोरम शिखरों द्वारा सुशोभित है। अनेक प्रकार के धातुओं से व्याप्त और भाँति-भाँति के शिला-खण्डों से विभूषित यह पर्वत इस महान् वन की ऊपर उठी हुई पताका के समान जान पड़ता है। यह सिंह, व्याघ्र, हाथी, सूअर, रीछ और मृगों से परिपूर्ण है। इसके चारों ओर अनेक प्रकार के पक्षी कलरव कर रहे हैं। पलाश, अशोक, बकुल, पुन्नाग, कनेर, धव तथा प्लक्ष आदि सुन्दर फूलों वाले वृक्षों से वह पर्वत सुशोभित हो रहा है। अब मैं इसी गिरिराज से महाराज नल का समाचार पूछती हूँ।
'भगवन्! अचल-प्रवर! दिव्य दृष्टिवाले! विख्यात! सबको शरण देनेवाले परम कल्याणमय महीधर! आपको नमस्कार है। मैं निकट आकर आपके चरणों में प्रणाम करती हूँ। आप मेरा परिचय इस प्रकार जानें—मैं राजा की पुत्री, राजा की पुत्रवधू तथा राजा की ही पत्नी हूँ। मेरा नाम दमयन्ती है। विदर्भ देश के स्वामी महारथी भीम नामक राजा मेरे पिता हैं। वे पृथ्वी के पालक तथा चारों वर्णों के रक्षक हैं। उन्होंने प्रचुर दक्षिणा वाले राजसूय और अश्वमेध यज्ञों का अनुष्ठान किया है। वे भूमिपालों में श्रेष्ठ हैं; उनके नेत्र बड़े, चञ्चल और सुन्दर हैं। वे ब्राह्मण-भक्त, सदाचारी, सत्यवादी, किसी के दोष को न देखने वाले, शीलवान्, पराक्रमी, प्रचुर सम्पत्ति के स्वामी, धर्मज्ञ तथा पवित्र हैं। वे विदर्भ देश की जनता का अच्छी तरह पालन करने वाले हैं; उन्होंने समस्त शत्रुओं को जीत लिया है। भगवन्! मुझे उन्हीं की पुत्री जानिये।
निषध देश के महाराज मेरे श्वशुर थे, जो प्रातः-स्मरणीय वीरसेन के नाम से विख्यात हैं। उन्हीं महाराज वीरसेन के एक वीर पुत्र हैं, जो बड़े ही सुन्दर और सत्य-पराक्रमी हैं। उनका नाम नल है; शत्रुदमन, श्यामसुन्दर राजा नल पुण्यश्लोक कहे जाते हैं। वे ब्राह्मण-भक्त, वेदवेत्ता, वक्ता, पुण्यात्मा, सोमपान करने वाले और अग्निहोत्री हैं। वे एक अच्छे यज्ञकर्ता, उत्तम दाता, शूरवीर योद्धा और श्रेष्ठ शासक हैं। आप मुझे उन्हीं की श्रेष्ठ पत्नी समझ लीजिये। मैं अबला नारी आपके निकट यहाँ उन्हीं की कुशल पूछने के लिये आयी हूँ। गिरिराज! मेरे स्वामी मुझे छोड़कर कहीं चले गये हैं। मैं धन-सम्पत्ति से वञ्चित, पतिदेव से रहित, अनाथ और सङ्कटों की मारी हुई हूँ। क्या आपने इन सैकड़ों गगनचुम्बी शिखरों द्वारा इस भयानक वन में कहीं राजा नल को देखा है?
समुल्लिखद्भिरेतैर्हि त्वया शृङ्गशतैर्नृपः ।
कच्चिद् दृष्टोऽचलश्रेष्ठ वनेऽस्मिन् दारुणे नलः ॥
‘ पर्वतश्रेष्ठ! क्या आपने इन सैकड़ों गगनचुम्बी शिखरोंद्वारा इस भयानक वनमें कहीं राजा नलको देखा है?
मेरे महायशस्वी स्वामी निषधराज नल गजराज की-सी चाल से चलते हैं। वे बड़े बुद्धिमान, महाबाहु, अमर्षशील, पराक्रमी, धैर्यवान् तथा वीर हैं। क्या आपने कहीं उन्हें देखा है? गिरिश्रेष्ठ! मैं आपकी पुत्री के समान हूँ और पतिकी वियोग से बहुत ही दुःखी हूँ। क्या आप व्याकुल होकर अकेली विलाप करती हुई इस अबला को आज अपनी वाणी द्वारा आश्वासन नहीं देंगे? यदि आप इसी वन में हैं, तो राजन्! अपने-आपको प्रकट करके मुझे दर्शन दीजिये। मैं कब निषधराज नल की मेघ-गर्जना के समान गम्भीर और अमृतोपम वह मधुर वाणी सुनूँगी? उन महामना राजा के मुख से 'वैदर्भि!' इस सम्बोधन से युक्त शुभ और स्पष्ट वाणी मुझे कब सुनाई देगी?'
इस प्रकार उस श्रेष्ठ पर्वत से कहकर वह राजकुमारी दमयन्ती फिर वहाँ से उत्तर दिशा की ओर चल दी। लगातार तीन दिन और तीन रात चलने के पश्चात् उस श्रेष्ठ नारी ने तपस्वियों से युक्त एक वन देखा, जो अनुपम तथा दिव्य था। वह वसिष्ठ, भृगु और अत्रिके समान नियम-परायण, मिताहारी और शम-दम-शौच से सम्पन्न तपस्वियों से शोभायमान हो रहा था। वहाँ कुछ तपस्वी लोग केवल जल पीकर रहते थे और कुछ वायु पीकर; कुछ पत्ते चबाकर। वे जितेन्द्रिय महाभाग स्वर्गलोक के मार्ग का दर्शन करना चाहते थे। वल्कल और मृगचर्म धारण करने वाले उन मुनियों से सेवित एक रमणीय आश्रम-मण्डल दिखाई दिया। उस आश्रम में नाना प्रकार के मृगों और वानरों के समुदाय भी विचरते थे। तपस्वी महात्माओं से भरे हुए उस आश्रम को देखते ही दमयन्ती को बड़ी सान्त्वना मिली।
उसकी भौंहें सुन्दर थीं, केश मनोहर थे, और उसके विशाल कजरारे नेत्र उसे तेजस्विनी बनाते थे। वह रमणीशिरोमणि महाभागा तपस्विनी दमयन्ती आश्रम के भीतर प्रविष्ट हुई। वहाँ तपोवृद्ध महात्माओं को प्रणाम करके वह विनीत भाव से खड़ी हो गई। तब वहाँ के सभी श्रेष्ठ तपस्वीजनों ने कहा—'देवि! तुम्हारा स्वागत है।' तदनन्तर उनका यथोचित आदर-सत्कार करके उन्होंने कहा—'शुभे! बैठो, बताओ, हम तुम्हारा कौन-सा कार्य सिद्ध करें?'
उस समय दमयन्ती ने उनसे कहा—'भगवन्! निष्पाप महाभागगण! यहाँ तप, अग्निहोत्र, धर्म, मृग और पक्षियों के पालन तथा अपने धर्म के आचरण आदि विषयों में आप लोग सकुशल हैं न?' तब उन महात्माओं ने कहा—'भद्रे! यशस्विनि! सर्वत्र कुशल है। सर्वाङ्गसुन्दरी! बताओ, तुम कौन हो और क्या करना चाहती हो? तुम्हारे उत्तम रूप और परम सुन्दर कान्ति को यहाँ देखकर हमें बड़ा विस्मय हो रहा है। धैर्य धारण करो, शोक न करो। तुम इस वन की देवी हो या इस पर्वत की अधिदेवता? अथवा तुम इस नदी की अधिष्ठात्री देवी हो, सच-सच बताओ।'
दमयन्ती ने उन ऋषियों से कहा—'तपस्या के धनी ब्राह्मणों! न तो मैं इस वन की देवी हूँ, न पर्वत की अधिदेवता और न इस नदी की ही देवी हूँ। मैं विस्तारपूर्वक अपना परिचय दे रही हूँ, आप लोग सुनें। विदर्भ देश में भीम नाम से प्रसिद्ध एक भूमिपाल हैं। द्विजवरो! मैं उन्हीं की पुत्री हूँ। निषध देश के स्वामी, सङ्ग्राम-विजयी, वीर, विद्वान्, बुद्धिमान और प्रजापालक राजा नल मेरे पति हैं। वे देवताओं के पूजन में संलग्न रहते हैं और ब्राह्मणों के प्रति उनके हृदय में बड़ा स्नेह है। वे निषधकुल के रक्षक, महातेजस्वी, महाबली, सत्यवादी, धर्मज्ञ, विद्वान्, शत्रु-दमन और सम्पत्ति से युक्त हैं। मेरे स्वामी नृपश्रेष्ठ नल देवराज इन्द्र के समान तेजस्वी हैं। उनका मुख पूर्ण चन्द्रमा के समान सुन्दर है; वे बड़े-बड़े यज्ञों के आयोजक और वेद-वेदाङ्गों के पारङ्गत विद्वान् हैं।
एक दिन कुछ कपटकुशल, अजितेन्द्रिय और द्यूत-निपुण जुआरियों ने उन सत्य-धर्मपरायण महाराज नल को जूए के लिये आवाहन करके उनके सारे राज्य और धन का अपहरण कर लिया। आप दमयन्ती नाम से विख्यात मुझे उन्हीं नृपश्रेष्ठ नल की पत्नी जानें। मैं अपने स्वामी के दर्शन के लिये उत्सुक हो रही हूँ। मेरे पति युद्धकला में कुशल और सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रों के विद्वान् हैं। मैं उन्हीं की खोज करती हुई वन, पर्वत, सरोवर, नदी और जङ्गलों में दुःखी होकर घूम रही हूँ। भगवन्! क्या आपके इस रमणीय तपोवन में राजा नल आये थे? जिनके लिये मैं व्याघ्र और सिंह आदि पशुओं से सेवित इस भयानक वन में आयी हूँ? यदि कुछ ही दिन-रात में मैं उन्हें नहीं देखूँगी, तो इस शरीर का परतिाग करके आत्मा का कल्याण करूँगी। उन पुरुषरत्न नल के बिना जीवन धारण करने से मेरा क्या प्रयोजन है?'
इस प्रकार विलाप करती हुई दमयन्ती से सत्य का दर्शन करने वाले तपस्वियों ने कहा—'कल्याणि! शुभे! हम अपने तपोबल से देख रहे हैं कि तुम्हारा भविष्य परम कल्याणमय होगा। तुम शीघ्र ही निषधराज नल का दर्शन प्राप्त करोगी। तुम अपने पति को सभी प्रकार की चिन्ताओं से रहित देखोगी। वे शत्रुओं के लिये भयदायक और सुहृदों के लिये शोक का नाश करने वाले होंगे।' इस प्रकार कहकर वे सभी तपस्वी अग्निहोत्र और आश्रम सहित अदृश्य हो गये।
वीतशोकभयाबाधं कच्चित् त्वं दृष्टवान् नृपम् ॥
नलं नामारिदमनं दमयन्त्याः प्रियं पतिम् ।
निषधानामधिपतिं दृष्टवानसि मे प्रियम् ॥
( अब उसने अशोकसे कहा- ) ' प्रियदर्शन अशोक! तुम शीघ्र ही मेरा शोक दूर कर दो । क्या तुमने शोक, भय और बाधासे रहित शत्रुदमन राजा नलको देखा है? क्या मेरे प्रियतम, दमयन्तीके प्राणवल्लभ, निषधनरेश नलपर तुम्हारी दृष्टि पड़ी है?
वह महान आश्चर्य की बात देखकर दमयन्ती विस्मय में पड़ गयी। उसने सोचा—'क्या मैंने कोई स्वप्न देखा है? यहाँ यह कैसी अद्भुत घटना हो गयी? वे सब तपस्वी कहाँ चले गये और वह आश्रम-मण्डल कहाँ है? वह रमणीय नदी, जिस पर पक्षी निवास कर रहे थे, कहाँ चली गयी? वे मनोरम वृक्ष कहाँ विलीन हो गये!'
पवित्र मुस्कान वाली दमयन्ती बहुत देर तक इन बातों पर विचार करती रही। तत्पश्चात् वह पतिशोक में डूबी और दीन होकर दूसरे स्थान पर जाकर अश्रु-गद्गद वाणी में विलाप करने लगी। उसने देखा कि कुछ ही दूर पर एक अशोक का वृक्ष है। वह तरुवर फूलों से भरा था और पक्षियों के कलरवों से गुञ्जायमान था। उसे देखकर वह मन ही मन कहने लगी—'अहो! इस वन के भीतर यह अशोक बड़ा ही सुन्दर है। यह गिरिराज की भाँति सुशोभित हो रहा है। प्रियदर्शन अशोक! तुम शीघ्र ही मेरा शोक दूर कर दो। क्या तुमने शत्रुदमन राजा नल को देखा है? वे भारी सङ्कट से पीड़ित होकर इस वन में आये हैं। अशोक वृक्ष! तुम ऐसा करो जिससे मैं यहाँ से शोकरहित होकर जाऊँ। अशोक का अर्थ है—शोक का नाश करने वाला; अतः तुम अपने नाम को सत्य और सार्थक करो।'
इस प्रकार शोकार्त दमयन्ती उस अशोक वृक्ष की परिक्रमा करके अत्यन्त भयङ्कर स्थान की ओर चल दी। उसने पर्वत की कन्दराओं, नदियों और अद्भुत जङ्गलों को देखा। बहुत दूर तक मार्ग तय करने के बाद उसने एक बहुत बड़े सार्थ (व्यापारिक दल) को देखा, जो हाथी, घोड़े तथा रथ से व्याप्त था। वह समूह एक सुन्दर नदी को पार कर रहा था। नदी का जल ठण्डा था और उसके तट पर पक्षी कूज रहे थे। उस बड़े समूह को देखते ही दमयन्ती उनके समीप पहुँच गई। उसका रूप उन्मत्त स्त्री जैसा था; वह शोक से पीड़ित, दुर्बल और मलिन हो रही थी। उसने आधे वस्त्र से अपने शरीर को ढका हुआ था और उसके केशों पर धूल जम गयी थी। वहाँ दमयन्ती को सहसा देखकर कितने ही मनुष्य भय से भाग खड़े हुए; कोई भारी चिन्ता में पड़ गया तो कुछ लोग चीखने-चिल्लाने लगे।"
"दूसरे लोग जो अपने कुटुम्बीजनों और धन के विनाश से दीन हो रहे थे, वे इस प्रकार कहने लगे — आज हमारे विशाल जनसमूह के साथ वह जो उन्मत्त जैसी दिखाई देने वाली नारी आ गयी थी, वह विकराल आकार वाली राक्षसी थी; तो भी अलौकिक सुन्दर रूप धारण करके हमारे दल में घुस गयी। उसीने पहले से ही यह अत्यन्त भयङ्कर माया फैला रखी थी। निश्चय ही वह राक्षसी, यक्षी अथवा भयङ्कर पिशाची थी— इसमें विचार करने की कोई आवश्यकता नहीं कि यह सारा पापपूर्ण कृत्य उसी का किया हुआ है। उसने हमें अनेक प्रकार का दुःख दिया और प्रायः सारे दल का विनाश कर डाला। वह पापिनी समूचे सार्थ के लिये अवश्य ही कृत्या बनकर आयी थी। यदि हम उसे देख लेंगे तो ढेलों से, धूल और तिनकों से, लकड़ियों और मुक्कों से भी अवश्य मार डालेंगे।"
उनका वह अत्यन्त भयङ्कर वचन सुनकर दमयन्ती लज्जा से गड़ गयी और भय से व्याकुल हो उठी। उनके पापपूर्ण सङ्कल्प के सङ्गठित होने की आशङ्का करके वह उसी ओर भाग गयी, जहाँ घना जङ्गल था। वहाँ जाकर अपनी इस परिस्थिति पर विचार करके वह विलाप करने लगी— "अहो! मुझ पर विधाता का अत्यन्त भयानक और महान् कोप है, जिससे मुझे कहीं भी कुशल-क्षेम की प्राप्ति नहीं होती। न जाने, यह हमारे किस कर्म का फल है? मैंने मन, वाणी और क्रिया द्वारा कभी किसी का थोड़ा-सा भी अमङ्गल किया हो, इसकी याद नहीं आती, फिर यह मेरे किस कर्म का फल मिल रहा है? निश्चय ही यह मेरे दूसरे जन्मों के किये हुए पाप का महान् फल प्राप्त हुआ है, जिससे मैं इस अनन्त कष्ट में पड़ गयी हूँ। मेरे स्वामी के राज्य का अपहरण हुआ, उन्हें आत्मीयजन से ही पराजित होना पड़ा, मेरा अपने पतिदेव से वियोग हुआ और अपनी सन्तानों के दर्शन से भी वञ्चित हो गयी हूँ। इतना ही नहीं, असङ्ख्य सर्प आदि जन्तुओं से भरे हुए इस वन में मुझे अनाथ की सी दशा में रहना पड़ता है।"
अहो ममोपरि विधेः संरम्भो दारुणो महान् ।
नानुबध्नाति कुशलं कस्येदं कर्मणः फलम् ॥
‘ अहो! मुझपर विधाताका अत्यन्त भयानक और महान् कोप है, जिससे मुझे कहीं भी कुशल- क्षेमकी प्राप्ति नहीं होती । न जाने, यह हमारे किस कर्मका फल है?
तदनन्तर दूसरा दिन प्रारम्भ होने पर मरने से बचे हुए लोग उस स्थान से निकलकर उस विकट संहार के लिये शोक करने लगे। कोई भाई के लिये दुःखी था, कोई पिता के लिये; किसी को पुत्र का शोक था और किसी को मित्र का। विदर्भ राजकुमारी दमयन्ती भी इसके लिये शोक करने लगी कि मैंने कौन-सा पाप किया है, जिससे इस निर्जन वन में मुझे जो समुद्र के समान जनसमुदाय प्राप्त हो गया था, वह भी मेरे ही दुर्भाग्य से हाथियों के झुण्ड द्वारा मारा गया। निश्चय ही मुझे अभी दीर्घकाल तक दुःख-ही-दुःख भोगना है। जिसकी मृत्यु का समय नहीं आया है, वह इच्छा होते हुए भी मर नहीं सकता; वृद्ध पुरुषों का यह जो उपदेश मैंने सुन रखा है, यह ठीक ही जान पड़ता है, तभी तो आज मैं दुःखित होने पर भी हाथियों के झुण्ड से कुचलकर मर न सकी। मनुष्यों को इस जगत् में कोई भी सुख या दुःख ऐसा नहीं मिलता, जो विधाता का दिया हुआ न हो। मैंने बचपन में भी मन, वाणी अथवा क्रिया द्वारा ऐसा पाप नहीं किया है, जिससे मुझे यह दुःख प्राप्त होता। मैं समझती हूँ, स्वयंवर के लिये जो लोकपाल देवगण पधारे थे, नल के कारण मैंने उनका तिरस्कार कर दिया था। अवश्य उन्हीं देवताओं के प्रभाव से आज मुझे वियोग का कष्ट प्राप्त हुआ है। इस प्रकार दुःख से आतुर हुई सुन्दरी पतिव्रता दमयन्ती ने उस समय अनेक प्रकार से विलाप एवं प्रलाप किया।
नृपश्रेष्ठ! तदनन्तर मरने से बचे हुए वेदों के पारङ्गत विद्वान् ब्राह्मणों के साथ यात्रा करती हुई शरत्काल के चन्द्रमा की कला के समान वह सुन्दरी युवती थोड़े ही समय में सन्ध्या होते-होते सत्यदर्शी चेदिराज सुबाहु की राजधानी में जा पहुँची। शरीर में आधी साड़ी को लपेटे हुए ही उसने उस उत्तम नगर में प्रवेश किया। वह विह्वल, दीन और दुर्बल हो रही थी। उसके सिर के बाल खुले हुए थे और उसने स्नान नहीं किया था। पुरवासियों ने उसे उन्मत्ता की भाँति जाते देखा। चेदि नरेश की राजधानी में उसे प्रवेश करते देख उस समय बहुत से ग्रामीण बालक कौतूहलवश उसके साथ हो लिये थे। उनसे घिरी हुई दमयन्ती राजमहल के समीप गयी।
उस समय राजमाता ने उसे महल से देखा। वह जनसाधारण से घिरी हुई थी। राजमाता ने धाय से कहा— "जाओ, इस युवती को मेरे पास ले आओ। इसे लोग तङ्ग कर रहे हैं। यह दुःखिनी युवती कोई आश्रय चाहती है। मुझे इसका रूप ऐसा दिखाई देता है, जो मेरे घर को प्रकाशित कर देगा। इसका वेष तो उन्मत्त के समान है, परन्तु यह विशाल नेत्रों वाली युवती कल्याणमयी लक्ष्मी के समान जान पड़ती है।" धाय उन सब लोगों को हटाकर उसे उत्तम राजमहल की अट्टालिका पर चढ़ा ले आयी। तत्पश्चात् विस्मित होकर राजमाता ने दमयन्ती से पूछा— "अहो! तुम इस प्रकार दुःख से दबी होने पर भी इतना सुन्दर रूप कैसे धारण करती हो? मेघमाला में प्रकाशित होने वाली बिजली की भाँति तुम इस दुःख में भी कैसी तेजस्विनी दिखाई देती हो। मुझसे बताओ, तुम कौन हो? किसकी स्त्री हो? यद्यपि तुम्हारे शरीर पर कोई आभूषण नहीं है तो भी तुम्हारा यह रूप मानव जगत् का नहीं जान पड़ता। देवता की-सी दिव्य कान्ति धारण करने वाली वत्से! तुम असहाय अवस्था में होकर भी लोगों से डरती क्यों नहीं हो?"
उसकी यह बात सुनकर भीमकुमारी ने कहा— "माताजी! आप मुझे मानव-कन्या ही समझिये। मैं अपने पति के चरणों में अनुराग रखने वाली एक नारी हूँ। मेरी अन्तःपुर में काम करने वाली सैरन्ध्री जाति है। मैं सेविका हूँ और जहाँ इच्छा होती है, वहीं रहती हूँ। मैं अकेली हूँ, फल-मूल खाकर जीवन निर्वाह करती हूँ और जहाँ साँझ होती है, वहीं टिक जाती हूँ। मेरे स्वामी में असङ्ख्य गुण हैं, उनका मेरे प्रति सदा अत्यन्त अनुराग है। जैसे छाया राह चलने वाले पथिक के पीछे-पीछे चलती है, उसी प्रकार मैं भी अपने वीर पतिदेव में भक्तिभाव रखकर सदा उन्हीं का अनुसरण करती हूँ। दुर्भाग्यवश एक दिन मेरे पतिदेव जूआ खेलने में अत्यन्त आसक्त हो गये और उसी में अपना सब कुछ हारकर वे अकेले ही वन की ओर चल दिये। एक वस्त्र धारण कर उन्मत्त और विह्वल हुए अपने वीर स्वामी को सान्त्वना देती हुई मैं भी उनके साथ वन में चली आयी। एक दिन की बात है, मेरे वीर स्वामी किसी कारणवश वन में गये और वस्त्र को भी कहीं वन में ही छोड़ दिया। मेरे शरीर पर भी एक ही वस्त्र था। वे नग्न, उन्मत्त-जैसे और अचेत हो रहे थे। उसी दशा में सदा उनका अनुसरण करती हुई अनेक रात्रियों तक कभी सो न सकी। तदनन्तर बहुत समय के पश्चात् एक दिन जब मैं सो गयी थी, उन्होंने मेरी आधी साड़ी फाड़ ली और मुझ निरपराध पत्नी को वहीं छोड़कर वे कहीं चल दिये। मैं दिन-रात वियोग की अग्नि में जलती हुई निरन्तर उन्हीं पतिदेव को ढूँढ़ती फिरती हूँ। मेरे प्रियतम की कान्ति कमल के भीतरी भाग के समान है। वे देवताओं के समान तेजस्वी, मेरे प्राणों के स्वामी और शक्तिशाली हैं। बहुत खोजने पर भी मैं अपने प्रिय को न तो देख सकी हूँ और न उनका पता ही पा रही हूँ।"
भीमकुमारी दमयन्ती के नेत्रों में आँसू भरे हुए थे एवं वह आर्त स्वर से बहुत विलाप कर रही थी। राजमाता स्वयं भी उसके दुःख से दुःखी होकर बोली— "कल्याणि! तुम मेरे पास रहो। तुम पर मेरा बहुत प्रेम है। भद्रे! मेरे सेवक तुम्हारे पति की खोज करेंगे अथवा यह भी सम्भव है, वे इधर-उधर भटकते हुए स्वयं ही इधर आ निकलें। भद्रे! तुम यहीं रहकर अपने पति को प्राप्त कर लोगी।"
राजमाता की यह बात सुनकर दमयन्ती ने कहा— "वीरमातः! मैं एक नियम के साथ आपके यहाँ रह सकती हूँ। मैं किसी का जूठा नहीं खाऊँगी, किसी के पैर नहीं धोऊँगी और किसी भी दूसरे पुरुष से किसी तरह भी वार्तालाप नहीं करूँगी। यदि कोई पुरुष मुझे प्राप्त करना चाहे तो वह आपके द्वारा दण्डनीय हो और बार-बार ऐसे अपराध करने वाले मूढ़ को आप प्राणदण्ड भी दें, यही मेरा निश्चित व्रत है। मैं अपने पति की खोज के लिये केवल ब्राह्मणों से मिल सकती हूँ। यदि यहाँ ऐसी व्यवस्था हो सके तो निश्चय ही आपके निकट निवास करूँगी। यदि इसके विपरीत कोई बात हो तो कहीं भी रहने का मेरे मन में सङ्कल्प नहीं हो सकता।"
यह सुनकर राजमाता प्रसन्नचित्त होकर उससे बोली— "बेटी! मैं यह सब करूँगी। सौभाग्य की बात है कि तुम्हारा व्रत ऐसा उत्तम है।" राजमाता ने अपनी पुत्री सुनन्दा से कहा— "सुनन्दे! इस सैरन्ध्री को तुम देवी स्वरूपा समझो। यह अवस्थामें तुम्हारे समान है, अतः तुम्हारी सखी होकर रहे। तुम इसके साथ सदा प्रसन्नचित्त एवं आनन्दमग्न रहो।"
तब सखियों से घिरी हुई सुनन्दा अत्यन्त हर्षोल्लास में भरकर दमयन्ती को अपने भवन में ले आयी। सुनन्दा ने दमयन्ती के इच्छानुसार सब प्रकार की व्यवस्था करके उसे बड़े आदर-सत्कार के साथ रखने लगी। इससे दमयन्ती को बड़ी प्रसन्नता हुई और वह वहाँ उद्वेगरहित होकर रहने लगी।
राजा के आदेश पर वे सभी ब्राह्मण बड़े प्रसन्न होकर समस्त दिशाओं में निकल पड़े। उन्होंने नगर-नगर और राष्ट्र-राष्ट्र में निषधनरेश नल तथा भीमकुमारी दमयन्ती की खोज शुरू कर दी, परन्तु उन्हें कहीं भी न तो राजा नल मिले और न ही दमयन्ती। तदनन्तर, सुदेव नामक ब्राह्मण ने पता लगाते हुए रमणीय चेदि नगरी में प्रवेश किया। वहाँ राजमहल में उसने विदर्भकुमारी दमयन्ती को देखा, जो राजा के पुण्याहवाचन के समय सुनन्दा के साथ खड़ी थी। उसका अनुपम रूप मैल से आवृत होने के कारण मन्द-मन्द प्रकाशित हो रहा था, मानो अग्नि की प्रभा किसी धूमसमूह से ढकी हो। विशाल नेत्रों वाली उस राजकुमारी को अधिक मलिन और दुर्बल देखकर सुदेव ने पहचान लिया कि यही भीमकुमारी दमयन्ती है।
सुदेव मन ही मन सोचने लगा— 'मैंने पहले जिस रूप में इस कल्याणमयी राजकन्या को देखा था, आज भी यह वैसी ही है। यह श्यामा युवती पूर्ण चन्द्रमा के समान कान्तिमती है। इसके मनोहर स्तन और बड़े-बड़े नेत्र कमलों की शोभा को लज्जित कर रहे हैं; यह तो मानो कामदेव की रति के समान है। पूर्णिमा के चन्द्रमा की चाँदनी जैसी प्रिय यह राजकुमारी आज विदर्भरूपी सरोवर से निकाली गई उस कमलिनी के समान प्रतीत हो रही है, जिसे प्रारब्ध के दोषों ने कीचड़ में धकेल दिया है। इसका मलिन अङ्ग ऐसा दिखता है मानो चन्द्रमा पर राहु ने ग्रहण लगा रखा हो। पति-शोक से व्याकुल होकर यह किसी सूखे जल-प्रवाह वाली सरिता के समान हो गई है।'
सुदेव की दृष्टि उसकी दशा पर ठहर गई— 'इसकी स्थिति उस पुष्करिणी जैसी है जिसे हाथियों ने अपने सूंडों से मथ डाला हो, जहाँ केवल नष्ट हुए पत्ते ही बचे हों और पक्षी भयभीत होकर उड़ रहे हों। यह सुकुमारी उन महलों के योग्य है जो रत्नों से बने हों, किन्तु दुःख ने इसे ऐसा दुर्बल कर दिया है कि यह सूर्य की किरणों से झुलसाई हुई कमलिनी सी दिख रही है। यह शृङ्गार करने योग्य होते हुए भी शृङ्गारशून्य है, मानो आकाश में मेघों की काली घटाओं ने नूतन चन्द्रकला को ढक लिया हो। अपने बन्धुजनों से बिछड़कर और पति के दर्शन की तीव्र इच्छा लिए यह दयनीय शरीर धारण किए हुए है। वास्तव में पति ही नारी का सबसे श्रेष्ठ आभूषण है; उसके बिना यह शोभामयी होकर भी शोभा नहीं दे रही। यदि निषधनरेश नल इस शोक को सहकर भी अपना शरीर धारण किए हुए हैं, तो वे निश्चय ही अत्यन्त दुष्कर कर्म कर रहे हैं।'
दुष्करं कुरुतेऽत्यन्तं हीनो यदनया नलः ।
धारयत्यात्मनो देहं न शोकेनापि सीदति ॥
इससे विलग होकर राजा नल यदि अपने शरीरको धारण करते हैं और शोकसे शिथिल नहीं हो रहे हैं तो यह समझना चाहिये कि वे अत्यन्त दुष्कर कर्म कर रहे हैं ।
सुदेव के मन में व्यथा उमड़ पड़ी— 'काले केशों और कमल जैसे नेत्रों वाली इस राजकन्या को दुःखित देखकर मेरा हृदय द्रवित हो रहा है। जैसे रोहिणी चन्द्रमा के संयोग से सुखी होती है, वैसे ही यह साध्वी राजकुमारी अपने पति के मिलन से कब इस दुःख के समुद्र से पार होगी? जिस प्रकार एक राजा राज्य से च्युत होने के बाद उसे पुनः प्राप्त कर अत्यन्त प्रसन्न होता है, वैसे ही नल को दमयन्ती के मिल जाने पर बड़ी प्रसन्नता होगी। दमयन्ती और नल दोनों उत्तम कुल और शील के हैं; वे एक-दूसरे के योग्य हैं। राजा नल का धैर्य असीम है, किन्तु उनकी पत्नी पति-दर्शन के लिए लालायित है। मुझे इसे आश्वासन देना चाहिए।' \ितने विचार करते हुए सुदेव ब्राह्मण आगे बढ़े और बोले— 'विदर्भ राजकुमारी! मैं तुम्हारे भाई का प्रिय सखा सुदेव हूँ। महाराज भीम की आज्ञा से तुम्हारी खोज करने यहाँ आया हूँ। तुम्हारे पिता, माता और भाई सब सकुशल हैं और कुण्डिनपुर में तुम्हारे बालक भी कुशल हैं। तुम्हारे बन्धु-बानधव तुम्हारी चिन्ता में मृतक के समान हो रहे हैं और सैकड़ों ब्राह्मण तुम्हें ढूँढ़ रहे हैं।'
सुदेव को पहचानते ही दमयन्ती शोक से व्याकुल होकर फूट-फूटकर रोने लगी। उसे एकान्त में रोता देख सुनन्दा भी व्याकुल हो उठी। उसने अपनी माता से कहा— 'माँ! सैरन्ध्री एक ब्राह्मण से मिलकर बहुत रो रही है, तुम जाकर इसका कारण जानो।' राजमाता तुरन्त अन्तःपुर से बाहर आईं और सुदेव से पूछा— 'विप्रवर! जान पड़ता है तुम इसे जानते हो। बताओ, यह सुन्दरी युवती किसकी पत्नी या पुत्री है? यह सती-साध्वी नारी ऐसी दुरवस्था में क्यों पड़ गई? मैं इसका पूरा वृत्तान्त सुनना चाहती हूँ।'
सुदेव ने धैर्यपूर्वक उत्तर दिया— 'देवी! विदर्भराज भीम अत्यन्त तेजस्वी और धर्मात्मा हैं। यह उन्हीं की पुत्री दमयन्ती है। वीरसेनपुत्र नल निषधदेश के प्रसिद्ध राजा हैं और इन्हीं की कल्याणमयी पत्नी है। एक दिन राजा नल अपने भाई द्वारा जुए में हार गए और सारा राज्य चला गया। तब से वे दमयन्ती के साथ वन में चले गए और तब से अब तक किसी को उनका पता नहीं चला। हम अनेक ब्राह्मण उन्हें ढूँढ़ रहे हैं।' सुदेव ने आगे कहा— 'इस राजकुमारी के ललाट में जन्मजात एक उत्तम तिल का चिह्न है, जो इस समय मैल से ढक गया है। जैसे छिपी हुई आग अपनी गर्मी से पहचानी जाती है, वैसे ही मैंने इस तिल के चिह्न से इसे पहचान लिया।'
सुदेव की बात सुनकर सुनन्दा ने तुरन्त दमयन्ती के ललाट की मैल धो दी। मैल धुलते ही वह चिह्न ऐसे चमक उठा जैसे बादलरहित आकाश में चन्द्रमा प्रकाशित होता हो। उस चिह्न को देखकर सुनन्दा और राजमाता दोनों रोने लगीं और दमयन्ती को हृदय से लगाकर स्तब्ध खड़ी रहीं। राजमाता ने आँसू बहाते हुए कहा— 'बेटी! तुम मेरी बहन की पुत्री हो। मैं और तुम्हारी माता दशार्णदेश की स्वामी राजा सुदामा की पुत्रियाँ हैं। तुम्हारी माँ का विवाह राजा भीम से हुआ और मेरा चेदिराज वीरबाहु से। तुम्हारा जन्म मेरे पिता के घर ही हुआ था। यह ऐश्वर्य जैसे मेरा है, वैसा ही तुम्हारा भी है।' \ितने में दमयन्ती ने प्रसन्न हृदय से अपनी मौसी को प्रणाम किया और कहा— 'माँ! यद्यपि तुम मुझे पहचान नहीं पा रही थीं, फिर भी तुमने मुझे बड़े सुख से रखा। अब यदि मैं यहाँ रहूँ तो सुखदायक होगा, किन्तु मैं बहुत दिनों से प्रवास में भटक रही हूँ। मेरे बच्चे कुण्डिनपुर में हैं; वे पिता के वियोग के बाद मुझसे भी बिछड़ गए हैं, वे कैसे रहते होंगे? यदि तुम मेरा कुछ भला चाहती हो, तो मुझे शीघ्र विदर्भ जाने की अनुमति दें।'
उत्सृज्य बाष्पं शनकै राजमातेदमब्रवीत् ।
भगिन्या दुहिता मेऽसि पिप्लुनानेन सूचिता ॥
तत्पश्चात् राजमाताने आँसू बहाते हुए धीरेसे कहा- ' बेटी! तुम मेरी बहिनकी पुत्री हो । इस चिह्नके कारण मैंने भी तुम्हें पहचान लिया ।
राजमाता ने प्रसन्नतापूर्वक अपने पुत्र की राय ली और दमयन्ती को पालकी में बिठाकर विदा किया। उनके साथ एक बड़ी सेना भेजी गई और आवश्यक सामग्री का प्रबन्ध किया गया। दमयन्ती कुछ ही दिनों में विदर्भ की राजधानी पहुँची, जहाँ बन्धु-बानधवों ने उसका भव्य स्वागत किया। दमयन्ती ने देवताओं और ब्राह्मणों का पूजन किया। राजा भीम अपनी पुत्री को देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने सुदेव को एक हजार गौ, एक गाँव तथा धन देकर सन्तुष्ट किया।
अगली सुबह दमयन्ती ने अपनी माता से कहा— 'माँ! यदि मुझे जीवित देखना चाहती हो, तो सच कहना; मेरे पति नरवीर महाराज नल की खोज का पुनः प्रयत्न करो।' इस बात को सुनकर पूरे अन्तःपुर में हाहाकार मच गया और सब फूट-फूटकर रोने लगे। तब महारानी ने राजा भीम से कहा— 'प्राणनाथ! आपकी पुत्री दमयन्ती अपने पति के लिए निरन्तर शोक में डूबी है। उसने लाज छोड़कर स्वयं नल का नाम लिया है, अतः आप अपने सेवकों को उन्हें ढूँढ़ने भेजें।'
ich्ञा पाकर राजा भीम ने ब्राह्मणों को विभिन्न दिशाओं में भेजा। उन ब्राह्मणों ने दमयन्ती के कहे अनुसार जनसमुदाय में यह सन्देश फैलाया— 'ओ जुआरी प्रियतम! तुम अपनी पत्नी को आधे वस्त्र में छोड़कर कहाँ चले गए? वह आज भी तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही है। हे वीर भूमिपाल! मुझ पर कृपा करो और उत्तर दो। क्या तुम दयालुता का धर्म भूल गए हो?'
ब्राह्मणों ने नगरों, गाँवों और आश्रमों में घूम-घूमकर यह बात सुनाई, परन्तु कहीं से कोई उत्तर नहीं मिला। लम्बे समय के पश्चात पर्णाद नामक ब्राह्मण विदर्भ लौटा और दमयन्ती को बताया— 'मैं निषध नरेश नल को ढूँढ़ते हुए अयोध्या पहुँचा और वहाँ राजा ऋतुपर्ण के दरबार में तुम्हारा सन्देश सुनाया। वहाँ के सभासद चुप रहे, किन्तु ऋतुपर्ण के यहाँ एक बाहुक नाम का सारथि है, जिसने मुझसे एकान्त में तुम्हारी बातों का उत्तर दिया है। वह घोड़ों को चलाने में कुशल है और भोजन में मिठास पैदा कर देता है।'
पर्णाद के उन मङ्गलमय आशीर्वादों को सुनकर दमयन्ती ने सुदेव ब्राह्मण को विदा किया। सुदेव अत्यन्त उदार हृदय वाले थे, उन्होंने दमयन्ती की बात सुनी और उसे एक द्रुतगामी पक्षी की भाँति शीघ्रता से अयोध्या नगरी की ओर प्रस्थान कर गए।
सुदेव ने राजा ऋतुपर्ण से जाकर कहा— "हे राजन! भीमकुमारी दमयन्ती का पुनः स्वयंवर होने जा रहा है। वहाँ चारों ओर से अनेक राजा और राजकुमार आ रहे हैं। उसका समय नियत हो चुका है और कल ही स्वयंवर होगा। हे शत्रुदमन! यदि सम्भव हो तो आप शीघ्र यहाँ पहुँचें, क्योंकि कल सूर्योदय के पश्चात वह दूसरे पति का वरण कर लेगी; क्योंकि वीरवर नल जीवित हैं या नहीं, इसका कुछ पता नहीं चलता।"
सूर्योदयेद्वितीयं सा भर्तारं वरयिष्यति ।
न हि स ज्ञायते वीरो नलो जीवति वा न वा ॥
' कल सूर्योदय होनेके बाद वह दूसरे पतिका वरण कर लेगी; क्योंकि वीरवर नल जीवित हैं या नहीं, इसका कुछ पता नहीं लगता है '
जब राजा ऋतुपर्ण ने सुदेव की यह बात सुनी, तो उन्होंने मधुर वाणी से बाहुक को सान्त्वना दी और कहा— "बाहुक! तुम अश्व-विद्या के सच्चे तत्वज्ञ हो। यदि मेरी बात मानो, तो मैं दमयन्ती के स्वयंवर में सम्मिलित होने के लिए एक ही दिन में विदर्भ देश की राजधानी पहुँचना चाहता हूँ।"
किन्तु राजा नल का मन इस समाचार से अत्यन्त दुःख से विदीर्ण हो उठा। वे महामना बहुत देर तक एक भारी चिन्ता में डूबे रहे। उनके मस्तिष्क में विचारों का द्वन्द्व चल रहा था— 'क्या दमयन्ती ऐसी बात कह सकती है? क्या वह दुःख से मोहित होकर ऐसा कार्य कर लेगी? कहीं ऐसा तो नहीं कि उसने मुझे पाने के लिए यह महान उपाय सोचा हो? तपस्विनी और दीन विदर्भ राजकुमारी को मैंने, एक नीच और पाप-बुद्धि पुरुष ने धोखा दिया है, इसलिए वह इतना निष्ठुर कार्य करने पर उद्यत हो गई है। संसार में स्त्री का चञ्चल स्वभाव तो प्रसिद्ध ही है। मेरा अपराध भी भयङ्कर है; सम्भव है मेरे प्रवास से उसका स्नेह कम हो गया हो।'
वे सोचने लगे कि शायद वह युवती मेरे शोक से उद्विग्न होकर ऐसा विचार कर रही है, किन्तु उनका हृदय कहता था— 'वह कभी ऐसा नहीं कर सकती, क्योंकि वह अब सन्तानवती है।' उन्होंने मन ही मन निश्चय किया कि वे स्वयं वहाँ जाकर ही सत्य और असत्य का निर्णय करेंगे।
दीन-हृदय बाहुक ने दोनों हाथ जोड़कर राजा ऋतुपर्ण से कहा— "हे नरेश्वर! हे पुरुषसिंह! मैंने आपकी आज्ञा सुनी। मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि मैं एक ही दिन में आपके साथ विदर्भ देश की राजधानी पहुँच जाऊँगा।"
ततपश्चात बाहुक ने अश्वशाला में जाकर राजा की आज्ञा से अश्वों की परीक्षा शुरू की। ऋतुपर्ण उन्हें बार-बार उत्तेजित कर रहे थे, अतः बाहुक ने बड़ी सावधानी से घोड़ों को चुना। उन्होंने ऐसे अश्व चुने जो देखने में दुबले लग रहे थे, किन्तु वे मार्ग तय करने में अत्यन्त शक्तिशाली और समर्थ थे। वे तेज और बल से युक्त अच्छे स्वभाव के घोड़े थे, जिनमें अशुभ लक्षणों का लेश मात्र भी नहीं था। उनकी नाक मोटी और ठोड़ी चौड़ी थी। वे वायु के समान वेगशाली सिन्धु देश के घोड़े थे, जिन पर दस भँवरियों के चिह्न थे।
उन्हें देखकर राजा ऋतुपर्ण कुपित होकर बोले— "क्या तुमसे ऐसे ही घोड़े चुनने को कहा था? तुम मुझे धोखा तो नहीं दे रहे? ये अल्प बल वाले घोड़े इतना लम्बा रास्ता कैसे तय कर पाएंगे?"
बाहुक ने धैर्यपूर्वक उत्तर दिया— "राजन! इन घोड़ों के ललाट में एक, मस्तक में दो, पार्श्व भाग में दो, उप-पार्श्व भाग में दो, छाती के दोनों ओर दो-दो और पीठ में एक— इस प्रकार कुल बारह भँवरियों को पहचानकर इन्हें रथ में जोतना चाहिए। ये घोड़े अवश्य विदर्भ तक पहुँचेंगे। महाराज! यदि आप जिन्हें ठीक समझें, उन्हें ही मैं रथ में जोत दूँगा।"
एते हया गमिष्यन्ति विदर्भान् नात्र संशयः ।
यानन्यान् मन्यसे राजन् ब्रूहि तान् योजयामि ते ॥
ये मेरे चुने हुए घोड़े अवश्य विदर्भदेशकी राजधानीतक पहुँचेंगे, इसमें संशय नहीं है । महाराज! इन्हें छोड़कर आप जिनको ठीक समझें, उन्हींको मैं रथमें जोत दूँगा ।
ऋतुपर्ण ने कहा— "बाहुक! तुम अश्व-विद्या के कुशल हो, तुम जिसे समर्थ समझो, उसे ही शीघ्र जोतो।" तब चतुर राजा नल ने उन चार वेगशाली घोड़ों को रथ में जोता। जैसे ही राजा ऋतुपर्ण उतावली होकर रथ पर सवार हुए, घोड़े घुटनों के बल पृथ्वी पर गिर पड़े। तब राजा नल ने उन घोड़ों को पुचकारा और बागडोर हाथ में लेकर उन्हें काबू में किया। उन्होंने वार्ष्णेय सारथि को बैठाकर रथ को ऐसा वेग दिया कि वे मानो आकाश में उड़ रहे हों।
उन तीव्र गति वाले अश्वों को देखकर राजा ऋतुपर्ण विस्मित रह गए। रथ की आवाज और घोड़ों के सञ्चालन को देखकर उनके मन में विचार आया— 'क्या यह देवराज इन्द्र का सारथि मातलि है? इस बाहुक में तो मातलिका जैसे महान लक्षण हैं! अथवा क्या ये आचार्य शालिहोत्र हैं जो मानव शरीर धारण कर आए हैं? या फिर स्वयं राजा नल ही इस रूप में आ गए हैं?'
सारथि वार्ष्णेय भी मन ही मन सोच रहा था— 'राजा नल जिस विद्या को जानते हैं, बाहुक भी उसे जानता है। बाहुक और नल का ज्ञान एक जैसा है। भले ही इसका शरीर थोड़ा दुबला है, पर यह महापराक्रमी राजा नल ही हैं।'
जब रथ तीव्र गति से दौड़ रहा था, तब राजा ऋतुपन् ने देखा कि उनका उत्तरीय वस्त्र नीचे गिर गया है। उन्होंने उतावली में कहा— "महामते! इन घोड़ों को रोक लो, मैं अपना गिरा हुआ वस्त्र लूँगा। जब तक यह वार्ष्णेय उतरकर मेरा वस्त्र ले आए, तब तक रथ रोक कर रखो।"
नल ने उत्तर दिया— "महाराज! आपका वस्त्र बहुत दूर गिर गया है। मैं उस स्थान से चार कोस आगे आ चुका हूँ, अब उसे लाना सम्भव नहीं है।"
राजा चुप हो गए। वे एक बहेड़े के वृक्ष के पास पहुँचे जिसमें बहुत फल लगे थे। राजा ने कहा— "सूत! देखो, मुझमें गणना करने की कितनी अद्भुत शक्ति है। इस वृक्ष में गिरे हुए पत्तों और फलों की सङ्ख्या में, वृक्ष में लगे हुए पत्तों और फलों की सङ्ख्या से सौ दो अधिक का अन्तर है। इसकी शाखाओं में पचास करोड़ पत्ते हैं और दो हजार पञ्चानवे फल लगे हैं।"
तं दृष्ट्वा बाहुकं राजा त्वरमाणोऽभ्यभाषत ।
ममापि सूत पश्य त्वं संख्याने परमं बलम् ॥
उस वृक्षको देखकर राजा ऋतुपर्णने तुरंत ही बाहुकसे कहा - ' सूत! तुम देखो, मुझमें भी गणना करने ( हिसाब लगाने ) की कितनी अद्भुत शक्ति है ।
बाहुक ने कहा— "महाराज! यह सङ्ख्या तो परोक्ष है। मैं इस वृक्ष को काटकर इसके फलों को प्रत्यक्ष गिन लूँगा। यदि वार्ष्णेय दो घड़ी तक लगाम सम्भाले, तो मैं देखते ही देखते गणना कर लूँगा।"
ऋतुपर्ण ने कहा— "विलम्ब मत करो। बाहुक, तुम ही इन घोड़ों को हाँक सकते हो। तुम्हारी शरण में आया हूँ, इस कार्य में विघ्न न डालो। यदि आज तुम मुझे विदर्भ पहुँचा दो, तो तुम जो चाहोगे मैं वह करूँगा।"
बाहुक ने आग्रह किया— "मैं फल गिनकर चलूँगा, आप मेरी बात मान लीजिए।" राजा ने अनिच्छा से कहा— "अच्छा, गिन लो। पर केवल एक ही भाग को गिनना।"
बाहुक ने तुरन्त वृक्ष को काटकर गिरा दिया और फलों की गिनती की। वह विस्मित होकर बोला— "राजन! आपकी गणितीय शक्ति अद्भुत है। मैं यह विद्या आपसे सीखना चाहता हूँ।" राजा उत्सुक थे, उन्होंने कहा— "तुम मुझे द्यूत-विद्या का ज्ञाता समझो।" बाहुक ने कहा— "पुरुषश्रेष्ठ! आप मुझे यह विद्या बताएं और बदले में मुझसे अश्व-विद्या ग्रहण करें।"
जैसे ही राजा ऋतुपर्ण ने अपनी द्यूत-विद्या बाहुक को दी, वैसे ही राजा नल के शरीर से कलियुग बाहर निकल आया। वह कर्कोटक नाग के विष से झुलस रहा था। कलियुग ने भयभीत होकर हाथ जोड़े और कहा— "महाराज! क्रोध न करें। मैं आपकी शरण में हूँ। दमयन्ती ने मुझे शाप दिया था, जिससे मैं बहुत कष्ट पा रहा था। मैं आपके शरीर में अत्यन्त दुखी था। यदि आप मुझे शाप नहीं देंगे, तो मैं संसार में आपकी कीर्ति का गुणगान करूँगा।"
नले तु समतिक्रान्ते कलिरप्यगमद् गृहम् ।
ततो गतज्वरो राजा नलोऽभूत् पृथिवीपतिः ।
विमुक्तः कलिना राजन् रूपमात्रवियोजितः ॥
नलके चले जानेपर कलि अपने घर चले गये । राजन्! कलिसे मुक्त हो भूमिपाल राजा नल सारी चिन्ताओंसे छुटकारा पा गये; किंतु अभीतक उन्हें अपना पहला रूप नहीं प्राप्त हुआ था । उनमें केवल इतनी ही कमी रह गयी थी ।
यह सुनकर राजा नल ने अपना क्रोध रोक लिया। कलियुग तुरन्त एक बहेड़े के वृक्ष में समा गया। इसके अदृश्य होते ही राजा नल सारी चिन्ताओं से मुक्त हो गए। उन्होंने प्रसन्न चित्त होकर पुनः घोड़ों को हाँकना शुरू किया। अब वे उत्तम तेज वाले तेजस्वी रूप में थे और रथ पक्षियों की भाँति उड़ते हुए विदर्भ की ओर बढ़ चला।
राजा ऋतुपर्ण शाम होते-होते विदर्भ पहुँच गए। जब उन्होंने कुण्डिनपुर में प्रवेश किया, तो रथ की घर्घराहट सुनकर नल के घोड़े उतने ही उत्साहित हो उठे जितने पहले हुआ करते थे।
विदर्भनरेश के द्वारा प्रसन्नतापूर्वक आदर-सत्कार पाकर राजा ऋतुपर्ण को बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने स्वयं चैतान् समाश्वास्य रथोपस्थ उपाविशत्। फिर वे राजसेवकों के साथ गये और बताये हुए भवन में विश्राम के लिये प्रवेश किया।
जब वार्ष्णेय सहित राजा ऋतुपर्ण चले गए, तब बाहुक रथ लेकर रथशाला में गया। उसने उन घोड़ों को खोल दिया और अश्वशास्त्र की विधिके अनुसार उनकी परिचर्या करने के बाद, उन्हें पुचकारकर धीरज देने के पश्चात् वह स्वयं भी रथ के पिछले भाग में जा बैठा।
उधर महल में दमयन्ती भी शोक से आतुर थी। वह राजा ऋतुपर्ण, सूतपुत्र वार्ष्णेय तथा बाहुक को देखकर सोचने लगी— 'यह किसके रथ की घर्घराहट सुनाई पड़ती थी? वह गम्भीर घोष तो महाराज नल के रथ जैसा था; परन्तु इन आगन्तुकों में मुझे निषधराज नल दिखाई नहीं देते। वार्ष्णेय ने भी नल के समान ही अश्वविद्या सीख ली हो, निश्चय ही यह सम्भावना की जा सकती है। तभी आज रथ की आवाज बड़े जोर से सुनाई दे रही थी, जैसे नल के रथ हाँकते समय हुआ करती है। कहीं ऐसा तो नहीं है कि राजा ऋतुपर्ण भी वैसे ही अश्वविद्या में निपुण हों, जैसे राजा नल हैं; क्योंकि नल के ही समान इनके रथ का भी गम्भीर घोष लक्षित होता है।'
नलस्येव महानासीन्न च पश्यामि नैषधम् ।
वार्ष्णेयेन भवेन्नूनं विद्या सैवोपशिक्षिता ॥
तेनाद्य रथनिर्घोषो नलस्येव महानभूत् ।
आहोस्विदृतुपर्णोऽपि यथा राजा नलस्तथा ।
यथायं रथनिर्घोषो नैषधस्येव लक्ष्यते ॥
‘वह गम्भीर घोष तो महाराज नलके रथ-जैसा था; परंतु इन आगन्तुकोंमें मुझे निषधराज नल नहीं दिखायी देते । वार्ष्णेयने भी नलके समान ही अश्वविद्या सीख ली हो, निश्चय ही यह सम्भावना की जा सकती है । तभी आज रथकी आवाज बड़े जोरसे सुनायी दे रही थी, जैसे नलके रथ हाँकते समय हुआ करती है । कहीं ऐसा तो नहीं है कि राजा ऋतुपर्ण भी वैसे ही अश्वविद्यामें निपुण हों, जैसे राजा नल हैं; क्योंकि नलके ही समान इनके रथका भी गम्भीर घोष लक्षित होता है '
इस प्रकार विचार करके शुभलक्षणा दमयन्ती ने नल का पता लगाने के लिये अपनी दूती को भेजा। दमयन्ती बोली— "केशिनी! जाओ और पता लगाओ कि यह छोटी-छोटी बाँहों वाला कुरूप रथवाहक, जो रथ के पिछले भाग में बैठा है, कौन है? भद्रे! इसके निकट जाकर सावधानी के साथ मधुर वाणी में कुशल पूछना। अनिन्दिते! इसके विषय में मुझे बड़ी भारी शङ्का है। सम्भव है, इस वेष में राजा नल ही हों। मेरे मन में जैसा सन्तोष है और हृदय में जैसी शान्ति है, इसे मेरी उक्त धारणा पुष्ट हो रही है। सुश्रोणि! तुम बातचीत के सिलसिले में इसके सामने पर्णाद ब्राह्मण वाली बात कहना और यह जो उत्तर दे, उसे अच्छी तरह समझना।"
वह दूती बड़ी सावधानी से वहाँ जाकर बाहुक से वार्तालाप करने लगी और कल्याणी दमयन्ती महल में उसके लौटने की प्रतीक्षा में बैठी रही। दूती ने कहा— "नरेन्द्र! आपका स्वागत है! मैं आपका कुशल समाचार पूछती हूँ। विदर्भराजकुमारी यह सुनना चाहती हैं कि आप लोग अयोध्या से कब चले हैं और किस लिये यहाँ आये हैं? आप न्याय के अनुसार ठीक-ठीक बतायें।"
बाहुक बोला— "महात्मा कोसलराज ने एक ब्राह्मण के मुख से सुना था कि कल दमयन्ती का द्वितीय स्वयंवर होने वाला है। यह सुनकर राजा हवा के समान वेगवाले और सौ योजन तक दौड़ने वाले अच्छे घोड़ों से जुते हुए रथ पर सवार होकर विदर्भ देश के लिये प्रस्थित हो गये। इस यात्रा में मैं ही इनका सारथि था।"
दूती ने फिर पूछा— "आप लोगों में से जो तीसरा व्यक्ति है, वह कहाँ से आया है अथवा किसका सेवक है? ऐसे ही आप कौन हैं, किसके पुत्र हैं और आप पर इस कार्य का भार कैसे आया है?"
बाहुक ने उत्तर दिया— "भद्रे! उस तीसरे व्यक्ति का नाम वार्ष्णेय है। वह पुण्यश्लोक राजा नल का सारथि है। नल के वन में निकल जाने पर वह ऋतुपर्ण की सेवा में चला गया है। मैं भी अश्वविद्या में कुशल हूँ और सारथिके कार्य में भी निपुण हूँ, इसलिये राजा ऋतुपर्ण ने स्वयं ही मुझे वेतन देकर सारथिके पद पर नियुक्त कर लिया।"
दूती ने आगे पूछा— "बाहुक! क्या वार्ष्णेय यह जानता है कि राजा नल कहाँ चले गये? उसने आपसे महाराज के सम्बन्ध में कैसी बात बतायी है?"
बाहुक बोला— "भद्रे! पुण्यकर्मा नल के दोनों बालकों को यहीं रखकर वार्ष्णेय अपनी रुचि के अनुसार अयोध्या चला गया था। यह नल के विषय में कुछ नहीं जानता है। दूसरा कोई पुरुष भी नल को नहीं जानता। राजा नल का पहला रूप अदृश्य हो गया है। वे इस जगत् में गूढभाव से विचरते हैं। परमात्मा ही नल को जानते हैं तथा उसकी जो अन्तरात्मा है, वह उन्हें जानती है; दूसरा कोई नहीं; क्योंकि राजा नल अपने लक्षणों या चिह्नों को कभी दूसरों के सामने नहीं प्रकट करते हैं।"
दूती ने कहा— "पहली बार अयोध्या में जब वे ब्राह्मणदेवता गये थे, तब उन्होंने स्त्रियों की सिखायी हुई ये बातें बार-बार कही थीं— 'ओ जुआरी प्रियतम! तुम अपनी प्यारी पत्नी को छोड़कर तथा मेरे आधे वस्त्र को फाड़कर कहाँ चल दिये? उसे तुमने जिस अवस्थामे देखा था, वह आज भी तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही है। वीर भूमिपाल! सदा तुम्हारे शोक से रोती हुई अपनी उसी प्यारी पत्नी पर पुनः कृपा करो और मेरी बात का उत्तर दो। महामते! इसके उत्तर में आप दमयन्ती को प्रिय लगने वाली कोई बात कहिये।' बाहुक! ब्राह्मण के मुख से ये वचन सुनकर पहले आपने जो उत्तर दिया था, उसे वैदेभी पुनः सुनना चाहती है।"
यह सुनकर राजा नल के हृदय में बड़ी वेदना हुई और उनकी आँखें आँसुओं से भर गयीं। उन्होंने अपने दुःख के वेग को रोककर अश्रुगद्गद वाणी में कहना आरम्भ किया— "उत्तम कुल की स्त्रियाँ बड़े भारी सङ्कट में पड़कर भी स्वयं अपनी रक्षा करती हैं। वे सदा सदाचाररूपी कवच से आवृत प्राणों को धारण करती हैं। वह पुरुष बड़े सङ्कट में था और सुख के साधनों से वञ्चित होकर किङ्कर्तव्यविमूढ़ हो गया था। ऐसी दशा में यदि उसने अपनी पत्नी का परित्याग किया है, तो उसके लिये पत्नी को क्रोध नहीं करना चाहिये। जीविका पाने के लिये चेष्टा करते समय पक्षियों ने जिसके वस्त्र का अपहरण कर लिया था और जो मानसिक चिन्ताओं से दग्ध हो रहा था, उस पुरुष पर श्यामा को क्रोध नहीं करना चाहिये। पतिने उसका सत्कार किया हो या असत्कार; उसे चाहिये कि पतिको सङ्कट में देखकर क्षमा कर दे; क्योंकि वह राज्य और लक्ष्मी से वञ्चित होकर भूख से पीड़ित एवं विपत्तिके अथाह सागर में डूबा हुआ था।"
विषमस्थेन मूढेन परिभ्रष्टसुखेन च ।
यत् सा तेन परित्यक्ता तत्र न क्रोद्धुमर्हति ॥
वह पुरुष बड़े संकटमें था तथा सुखके साधनोंसे वञ्चित होकर किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया था । ऐसी दशामें यदि उसने अपनी पत्नीका परित्याग किया है, तो इसके लिये पत्नीको उसपर क्रोध नहीं करना चाहिये ।
यह कहते हुए नल का मन अत्यन्त उदास हो गया और वे रोने लगे। तदनन्तर केशिनी ने जाकर दमयन्ती को सारी बातें बताईं। यह सुनकर दमयन्ती अत्यन्त शोकमग्न हो गयी और उसे बाहुक के ही नल होने का सन्देह हो गया। वह बोली— "केशिनि! फिर जाओ और बाहुक की परीक्षा करो। अबकी बार तुम कुछ बोलना मत, बस उसके चरित्रों पर दृष्टि रखना। जब वह कोई काम करे तो उसकी प्रत्येक चेष्टा पर लक्ष्य रखना। यदि वह आग्रह करे तो उसे आग न देना और माँगने पर भी पानी मत देना। बाहुक के इन सब चरित्रों की समीक्षा करके मुझे आकर बताना।"
केशिनी पुनः वहाँ गयी और अश्वविद्याविशारद बाहुक के लक्षणों का अवलोकन करके लौट आयी। उसने कहा— "दमयन्ती! उसका प्रत्येक व्यवहार अत्यन्त पवित्र है। किसी छोटे-से-छोटे दरवाजे पर जाकर भी वह झुकता नहीं है; दरवाजा स्वयं ऊँचा हो जाता है। राजा भीम द्वारा भेजे गए फलों के गूदे को धोने के लिये रखे घड़े बाहुक के देखते ही पानी से भर गये। उसने तिनका लेकर सूर्य की किरणों से ही आग प्रज्वलित कर दी। वह अग्नि के स्पर्श से भी नहीं जलता और पात्र में रखा जल उसकी इच्छा से प्रवाहित हो जाता है। वह फूल को हाथों से मसलता है, तो वे विकृत होने के बजाय और सुगन्धित हो जाते हैं।"
दमयन्ती ने इन अद्भुत लक्षणों को सुनकर मन-ही-मन निश्चय कर लिया कि बाहुक ही उसके पति नल हैं। वह रोने लगी और बोली— "सखि! एक बार फिर जाओ और जब बालिसा असावधान हो, तब बाहुक द्वारा विशेष विधि से उबाले गए फलों के गूदे का थोड़ा सा हिस्सा शीघ्र उठा लाओ।"
केशिनी ने वह गरम गूदा दमयन्ती को दे दिया। दमयन्ती ने उस स्वाद को पहचान लिया क्योंकि उसे पहले अनेक बार नल द्वारा उबाले गए गूदे का अनुभव था। व्याकुल होकर उसने अपने बच्चों को बाहुक के पास भेजा। बाहुक ने इन्द्रसेना और इन्द्रसेन को देखते ही पहचान लिया और दौड़कर दोनों को छाती से लगाकर गोद में ले लिया। वह जोर-जोर से रोने लगा और कहने लगा— "भद्रे! ये दोनों बालक मेरे पुत्र और पुत्री के समान हैं, इसलिये इन्हें देखकर मेरे नेत्रों से आँसू बह रहे हैं। तुम महल में चली जाओ।"
जब दमयन्ती ने बाहुक के इन समस्त विकारों को सुना, तो वह दर्शन की अभिलाषा से दुःखातुर हो गयी। उसने अपनी माँ से कहा— "माँ! मैंने बाहुक की परीक्षा करा ली है, सब लक्षण मिल गये हैं। अब केवल नल के रूप का सन्देह रह गया है। आप या तो बाहुक को महल में बुलाओ या मुझे उसके निकट जाने की आज्ञा दो।"
परीक्षितो मे बहुशो बाहुको नलशङ्कया ।
रूपे मे संशयस्त्वेकः स्वयमिच्छामि वेदितुम् ॥
( और यह कहलाया — ) ' माँ! मेरे मनमें बाहुकके ही नलके होनेका संदेह था, जिसकी मैंने बार- बार परीक्षा करा ली है और सब लक्षण तो मिल गये हैं । केवल नलके रूपमें संदेह रह गया है । इस संदेहका निवारण करनेके लिये मैं स्वयं पता लगाना चाहती हूँ ।
महारानी ने राजा भीम को सूचित किया और अनुमति पाकर दमयन्ती स्वयं राजभवन के भीतर जहाँ वह रहती थी, बाहुक को बुलवाकर सामने उपस्थित हुई। दमयन्ती को देखकर राजा नल शोक से व्याप्त हो गये और उनकी आँखों से आँसुओं की धारा बहने लगी।
दमयन्ती ने व्याकुल होकर कहा— "बाहुक! क्या तुमने कभी ऐसे धर्मज्ञ पुरुष को देखा है जो अपनी सोयी हुई पत्नी को वन में अकेला छोड़कर चला गया हो? न जाने मैंने क्या अपराध किया था कि आपने मुझे जङ्गल में छोड़ दिया? स्वयंवर के समय देवताओं को छोड़कर मैंने आपका वरण किया था, फिर आपने कैसे त्याग किया?"
दमयन्ती की बातें सुनकर नल ने अश्रुधारा बहाते हुए कहा— "सुन्दरी! मेरा राज्य नष्ट होना और तुम्हारा त्याग करना, यह सब कलियुग की करतूत थी। मैं स्वयं कुछ नहीं कर सका। जब तुम वन में दुखी होकर रो रही थी, तब वही कलियुग मेरे भीतर तुम्हारी शाप-अग्नि से दग्ध होता हुआ निवास करता था। पापी कलियुग मुझे छोड़कर चला गया है, इसीलिए मैं यहाँ आया हूँ। क्या कोई स्त्री अपने पति को त्यागकर दूसरे का वरण कर सकती है? विदर्भराज की आज्ञा से तो दूत यह घोषणा कर रहे हैं कि दमयन्ती द्वितीय विवाह करेगी।"
दमयन्ती के ऐसे कहने पर अन्तरिक्षलोक से वायु-देवता प्रकट हुए और बोले— 'नल! मैं तुमसे सत्य कहता हूँ, इस दमयन्ती ने कभी कोई पाप नहीं किया है। राजन्! दमयन्ती ने अपने शील की उज्ज्वल निधियों को सदा सुरक्षित रखा है। हम लोग तीन वर्षों तक निरन्तर इसके रक्षक और साक्षी रहे हैं। तुम्हारी प्राप्ति के लिये दमयन्ती ने यह अनुपम उपाय ढूँढ़ निकाला था; क्योंकि इस जगत् में तुम्हारे सिवा दूसरा कोई पुरुष नहीं है, जो एक दिन में सौ योजन जा सके। राजन्! भीमकुमारी दमयन्ती तुम्हारे योग्य है और तुम दमयन्ती के योग्य हो। तुम्हें इसके चरित्र के विषय में कोई शङ्का नहीं करनी चाहिये। तुम अपनी पत्नी से निःशङ्क होकर मिलो।'
वायुदेव के ये वचन कहते समय आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी, देवताओं की दुन्दुभियाँ बज उठीं और एक मङ्गलमय पवन बहने लगी। युधिष्ठिर! यह अद्भुत दृश्य देखकर शत्रुसूदन राजा नल ने दमयन्ती के विरुद्ध होने वाली अपनी शङ्का का त्याग कर दिया। तदनन्तर उस भूपाल ने नागराज कर्कोटक का स्मरण किया और उनके द्वारा दिए हुए अजीर्ण वस्त्र को ओढ़ लिया; उसे ओढ़ते ही उन्हें अपने पूर्वस्वरूप की प्राप्ति हो गयी।
ततस्तद् वस्त्रमजरं प्रावृणोद् वसुधाधिपः ।
संस्मृत्य नागराजं तं ततो लेभे स्वकं वपुः ॥
तदनन्तर उन भूपालने नागराज कर्कोटकका स्मरण करके उसके दिये हुए अजीर्ण वस्त्रको ओढ़ लिया । उससे उन्हें अपने पूर्वस्वरूपकी प्राप्ति हो गयी ।
अपने वास्तविक रूप में प्रकट हुए अपने पतिदेव पुण्यश्लोक महाराज नल को देखकर सती साध्वी दमयन्ती उनके हृदय से लगकर उच्च स्वर से रोने लगी। राजा नल का रूप पहले की भाँति ही प्रकाशित हो रहा था। उन्होंने भी दमयन्ती को छाती से लगा लिया और अपने दोनों बालकों को प्यार-दुलार करके प्रसन्न किया। तत्पश्चात् सुन्दर मुख और विशाल नेत्रों वाली दमयन्ती, नल के मुख को अपने वक्षःस्थल पर रखकर दुःख से व्याकुल होकर लम्बी साँसें खींचने लगी। इसी प्रकार पवित्र मुस्कान और मैल से भरे हुए अङ्गों वाली दमयन्ती को हृदय से लगाकर पुरुषसिंह नल बहुत देर तक शोकमग्न खड़े रहे।
राजन्! तदनन्तर जब दमयन्ती ने सारी बात मालूम कर ली, तो उसने अपनी माता को राजा भीम के पास जाकर सारा वृत्तान्त सुनाया। उसकी माता ने अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक यह सब राजा भीम को कह सुनाया। तब महाराज भीम ने कहा— 'आज नल को सुखपूर्वक यहीं रहने दो। कल सुबह स्नान आदि से शुद्ध होकर मैं दमयन्ती सहित नल से मिलूँगा।'
राजन्! तत्पश्चात् वे दोनों दम्पति रात भर वन में रहने की पुरानी घटनाओं को एक-दूसरे से कहते हुए प्रसन्नतापूर्वक एक साथ रहे। एक-दूसरे को सुख देने की इच्छा रखने वाले दमयन्ती और नल राजा भीम के महल में प्रसन्नचित्त होकर रहे। जैसे आधी जमी हुई खेती से भरी वसुधा वर्षा का जल पाकर उल्लसित हो उठती है, उसी प्रकार दमयन्ती भी अपने पति को पाकर बहुत सन्तुष्ट हुई। जैसे चन्द्रोदय से रात्रि की शोभा बढ़ जाती है, वैसे ही भीमकुमारी दमयन्ती पति से मिलकर आलस्य का त्याग कर निश्चिन्त और हर्षोल्लसित हृदय से पूर्णकाम होकर अत्यन्त शोभा पाने लगी।
बृहदश्व मुनि कहते हैं— युधिष्ठिर! तदनन्तर वह रात बीतने पर राजा नल वस्त्राभूषणों से अलङ्कृत होकर दमयन्ती के साथ यथासमय राजा भीम से मिले। स्नानादि से पवित्र हुए राजा नल ने विनीत भाव से अपने श्वशुर को प्रणाम किया। तत्पश्चात् शुभलक्षणा दमयन्ती ने भी अपने पिता की वन्दना की। राजा भीम ने बड़ी प्रसन्नता के साथ नल को पुत्र की भाँति अपनाया और नल सहित पतिव्रता दमयन्ती का यथायोग्य आदर-सत्कार करके उन्हें आश्वासन दिया।
राजा नल ने उस पूजा को विधिपूर्वक स्वीकार कर अपनी ओर से भी श्वशुर का सेवा-सत्कार किया। तदनन्तर विदर्भ नगर में राजा नल को इस प्रकार आया देख, हर्षोल्लास में भरी हुई जनता का महान आनन्दजनित कोलाहल होने लगा। विदर्भ नरेश ने ध्वजा और पताकाओं की पङ्क्तियों से कुण्डिनपुर को अद्भुत शोभा से सम्पन्न किया। सड़कों को खूब झाड़-बुहारकर उन पर छिड़काव किया गया और उन्हें फूलों से अच्छी तरह सजाया गया। पुरवासियों के द्वार-द्वार पर सुगन्ध फैलाने के लिये राशि-राशि फूल बिखेरे गये थे।
राजा ऋतुपर्ण ने भी जब यह सुना कि बाहुक के वेष में राजा नल ही थे और अब वे दमयन्ती से मिले हैं, तब उन्हें बड़ा हर्ष हुआ। बुद्धिमान् नल ने भी अनेक युक्तियों द्वारा उनसे क्षमा-याचना की। राजा ऋतुपर्ण ने मुस्कुराते हुए कहा— 'निषध नरेश! यह बड़े सौभाग्य की बात है कि आप अपनी बिछड़ी हुई पत्नी से मिले।' ऐसा कहकर उन्होंने नल का अभिनन्दन किया और पुनः बोले— 'नैषध भूपाल शिरोमणि! आप मेरे घर पर जब अज्ञातवास की अवस्था में रहते थे, उस समय मैंने आपका कोई अपराध तो नहीं किया है? उन दिनों यदि मैंने बिना जाने या जान-बूझकर आपके साथ अनुचित बर्ताव किया हो, तो उन्हें आप क्षमा कर दें।'
यदि वाबुद्धिपूर्वाणि यदि बुद्धयापि कानिचित् ।
मया कृतान्यकार्याणि तानि त्वं क्षन्तुमर्हसि ॥
‘ उन दिनों यदि मैंने बिना जाने या जान- बूझकर आपके साथ अनुचित बर्ताव किये हों तो उन्हें आप क्षमा कर दें '
नल ने उत्तर दिया— 'राजन्! आपने मेरा कभी थोड़ा सा भी अपराध नहीं किया है और यदि किया भी हो तो उसके लिये मेरे हृदय में क्रोध नहीं है। मुझे आपके प्रत्येक बर्ताव को क्षमा ही करना चाहिये। जनेश्वर! आप पहले भी मेरे सखा और सम्बन्धी थे और इसके बाद भी आपको मुझ पर अधिक-से-अधिक प्रेम रखना चाहिये। राजन्! मेरी समस्त कामनाएँ वहाँ अच्छी तरह पूर्ण की गयीं और इसके कारण मैं सदा आपके यहाँ सुखी रहा। महाराज! आपके भवन में मुझे जैसा आराम मिला, वैसा अपने घर में भी नहीं मिला। आपका अश्व-विज्ञान मेरे पास धरोहर के रूप में पड़ा है। राजन्! यदि आप ठीक समझें तो मैं उसे आपको देने की इच्छा रखता हूँ।' ऐसा कहकर निषधराज नल ने ऋतुपर्ण को अश्व-विद्या प्रदान की।
इदं चैव हयज्ञानं त्वदीयं मयि तिष्ठति ।
तदुपाकर्तुमिच्छामि मन्यसे यदि पार्थिव ।
एवमुक्त्वा ददौ विद्यामृतुपर्णाय नैषधः ॥
आपका अश्वविज्ञान मेरे पास धरोहरके रूपमें पड़ा है । राजन्! यदि आप ठीक समझें तो मैं उसे आपको देनेकी इच्छा रखता हूँ। ऐसा कहकर निषधराज नलने ऋतुपर्णको अश्वविद्या प्रदान की ।
युधिष्ठिर! ऋतुपर्ण ने भी शास्त्रीय विधिके अनुसार उनसे अश्व-विद्या ग्रहण की। अश्वों का रहस्य ग्रहण करके और निषध नरेश नल को पुनः द्यूत-विद्या का रहस्य समझाकर, दूसरा सारथि साथ ले राजा ऋतुपर्ण अपने नगर को चले गये। राजन्! ऋतुपर्ण के चले जाने पर राजा नल कुण्डिनपुर में कुछ समय तक रहे, पर वह काल उन्हें थोड़े समय के समान ही प्रतीत हुआ।
बृहदश्व मुनि कहते हैं— युधिष्ठिर! निषध-नरेश एक मासतक कुण्डिनपुर में रहकर राजा भीम की आज्ञा ले थोड़े-से सेवकों सहित वहाँ से निषध देश की ओर प्रस्थित हुए। उनके साथ चारों ओर से सोलह हाथियों द्वारा घिरा हुआ एक सुन्दर रथ, पचास घोड़े और छह सौ पैदल सैनिक थे। महामना राजा नल ने इन सबके द्वारा पृथ्वी को कम्पित करते हुए बड़ी उतावली के साथ रोषावेश में भरे वेगपूर्वक निषध देश की राजधानी में प्रवेश किया।
तदनन्तर वीरसेनपुत्र नल ने पुष्कर के पास जाकर कहा— 'अब हम दोनों फिर से जूआ खेलें। मैंने बहुत धन प्राप्त किया है। दमयन्ती तथा अन्य जो कुछ भी मेरे पास है, यह सब मेरी ओर से दाँव पर लगाया जाएगा और पुष्कर! तुम्हारी ओर से सारा राज्य ही दाँव पर रखा जाएगा। इस एक पण के साथ हम दोनों में फिर जूए का खेल प्रारम्भ हो, यह मेरा निश्चित विचार है। तुम्हारा भला हो, यदि ऐसा न कर सको तो हम दोनों अपने प्राणों की बाजी लगावें।'
'जूए के दाँव में दूसरे का राज्य या धन जीतकर रख लिया जाए तो उसे यदि वह पुनः खेलना चाहे तो प्रतिपण (बदले का दाव) देना चाहिये, यह परम धर्म कहा गया है। यदि तुम पासों से जूआ खेलना न चाहो तो बाणों द्वारा युद्ध का जूआ प्रारम्भ होना चाहिये। राजन्! द्वैरथ-युद्ध के द्वारा तुम्हारी अथवा मेरी शान्ति हो जाय। यह राज्य हमारी वंश-परम्परा के उपभोग में आने वाला है। जिस किसी उपाय से भी, जैसे-तैसे इसका उद्धार करना चाहिये; ऐसा वृद्ध पुरुषों का उपदेश है। पुष्कर! आज तुम दो में से एक में मन लगाओ— छलपूर्वक जूआ खेलो अथवा युद्ध के लिये धनुष पर प्रत्यञ्चा चढ़ाओ।'
निषधराज नल के ऐसा कहने पर पुष्कर ने अपनी विजय को अवश्यम्भावी मानकर हँसते हुए उनसे कहा— 'नैषध! सौभाग्य की बात है कि तुमने दाँव पर लगाने के लिये धन का अर्जन कर लिया है। यह भी आनन्द की बात है कि दमयन्ती के दुष्कर्मों का क्षय हो गया। महाबाहु नरेश! सौभाग्य से तुम पत्नी सहित अभी जीवित हो। इस धन को जीत लेने पर दमयन्ती शृङ्गार करके निश्चय ही मेरी सेवा में उपस्थित होगी, ठीक उसी तरह जैसे स्वर्गलोक की अप्सरा देवराज इन्द्र की सेवा में जाती है। नैषध! मैं प्रतिदिन तुम्हारी याद करता हूँ और तुम्हारी राह भी देखा करता हूँ। शत्रुओं के साथ जूआ खेलने से मुझे कभी तृप्ति ही नहीं होती। आज श्रेष्ठ अङ्गों वाली अनिन्द्य सुन्दरी दमयन्ती को जीतकर मैं कृतार्थ हो जाऊँगा; क्योंकि वह सदा मेरे हृदय-मन्दिर में निवास करती है।'
दिष्ट्या च ध्रियसे राजन् सदारोऽद्य महाभुज ।
धनेनानेन वै भैमी जितेन समलंकृता ॥
मामुपस्थास्यति व्यक्तं दिवि शक्रमिवाप्सराः ।
नित्यशो हि स्मरामि त्वां प्रतीक्षेऽपि च नैषध ॥
'महाबाहु नरेश! सौभाग्यसे तुम पत्नीसहित अभी जीवित हो । इसी धनको जीत लेनेपर दमयन्ती शृंगार करके निश्चय ही मेरी सेवामें उपस्थित होगी, ठीक उसी तरह, जैसे स्वर्गलोककी अप्सरा देवराज इन्द्रकी सेवामें जाती है । नैषध! मैं प्रतिदिन तुम्हारी याद करता हूँ और तुम्हारी राह भी देखा करता हूँ ।
इस प्रकार बहुत से असम्बद्ध प्रलाप करने वाले पुष्कर की ये बातें सुनकर राजा नल को बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने तलवार से उसका सिर काट लेने की इच्छा की। रोष से उनकी आँखें लाल हो गयीं, तो भी राजा नल ने हँसते हुए उससे कहा— 'अब हम दोनों जूआ प्रारम्भ करें, तुम अभी व्यर्थ बकवाद क्यों करते हो? हार जाने पर ऐसी बातें न कर सकोगे।' तदनन्तर पुष्कर तथा राजा नल में एक ही दाँव लगाने की शर्त रखकर जूए का खेल प्रारम्भ हुआ। तब वीर नल ने पुष्कर को हरा दिया; क्योंकि पुष्कर ने रत्न, खजाना तथा प्राणों तक की बाजी लगा दी थी।
पुष्कर को परास्त करके राजा नल ने हँसते हुए उससे कहा— 'नृपाधम! अब यह शान्त और अकण्टक सारा राज्य मेरे अधिकार में आ गया। विदर्भकुमारी दमयन्ती की ओर तू आँख उठाकर देख भी नहीं सकता। मूर्ख! आज से तू परिवार सहित दमयन्ती का दास हो गया। पहले तेरे द्वारा जो मैं पराजित हो गया था, उसमें तेरा कोई पुरुषार्थ नहीं था। मूढ़! वह सब कलियुग की करतूत थी, जिसे तू नहीं जानता है। दूसरे (कलियुग) के किये हुए अपराध को मैं किसी तरह तेरे मत्थे नहीं मढूँगा। तू सुखपूर्वक जीवित रह। तेरा सारा सामान और तेरे हिस्से का धन भी तुझे लौटाये देता हूँ। वीर! तेरे ऊपर मेरा पूर्ववत् प्रेम बना रहेगा, इसमें संशय नहीं है। तेरे प्रति जो मेरा सौहार्द रहा है, वह कभी मेरे हृदय से दूर नहीं होगा। पुष्कर! तू मेरा भाई है, जा, सौ वर्षों तक जीवित रह।'
इस प्रकार सत्य-पराक्रमी राजा नल ने अपने भाई पुष्कर को सान्त्वना देकर, बार-बार हृदय से लगाकर उसकी राजधानी को भेज दिया। राजन्! निषधराज के इस प्रकार सान्त्वना देने पर पुष्करने पुण्यश्लोक नल को हाथ जोड़कर प्रणाम किया और कहा— 'पृथ्वीनाथ! आप जो मुझे प्राण और निवासस्थान भी वापस दे रहे हैं, इससे आपकी अक्षय कीर्ति बनी रहे। आप सौ वर्षों तक जीयें और सुखी रहें।'
नरश्रेष्ठ युधिष्ठिर! राजा नल के द्वारा इस प्रकार सत्कार पाकर पुष्कर एक मासतक वहाँ टिका रहा और फिर आत्मीय जनों के साथ प्रसन्नतापूर्वक अपनी राजधानी को चला गया। उसके साथ विशाल सेना और विनयशील सेवक भी थे। वह शरीर से सूर्य की भाँति प्रकाशित हो रहा था। पुष्कर को धन-वित्त के साथ सकुशल घर भेजकर श्रीमान् राजा नल ने अपने अत्यन्त शोभासम्पन्न नगर में प्रवेश किया।
प्रवेश करके निषध नरेश ने पुरवासियों को सान्त्वना दी। नगर और जनपद के लोग बड़े प्रसन्न हुए; उनके शरीर में रोमाञ्च हो आया। मन्त्री आदि सब लोगों ने हाथ जोड़कर कहा— 'महाराज! आज हम नगर और जनपद के निवासी सन्तोष से साँस ले सके हैं। जैसे देवता देवराज इन्द्र की सेवा में उपस्थित होते हैं, उसी प्रकार अब हमें पुनः आपकी उपासना करने—आपके पास बैठने का शुभ अवसर प्राप्त हुआ है।'
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्व के अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्व में पुष्कर को हराकर राजा नल के अपने नगर में आने से सम्बन्ध रखने वाला अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ।
बृहदश्व मुनि कहते हैं— युधिष्ठिर! जब नगर में शान्ति छा गयी और सब लोग प्रसन्न हो गये, सर्वत्र महान् उत्सव होने लगा, उस समय राजा नल विशाल सेना के साथ जाकर दमयन्ती को विदर्भ देश से बुला लाये। दमयन्ती के पिता भयङ्कर पराक्रमी भीम अप्रमेय आत्मबल से सम्पन्न थे, शत्रुपक्ष के वीरों का हनन करने में समर्थ थे। उन्होंने अपनी पुत्री दमयन्ती को बड़े सत्कार के साथ विदा किया।
पुत्र और पुत्री सहित दमयन्ती के आ जाने पर राजा नल सब बर्ताव-व्यवहार बड़े आनन्द से सम्पन्न करने लगे। जैसे नन्दनवन में देवराज इन्द्र शोभा पाते हैं, उसी प्रकार वे जम्बूद्वीप के समस्त राजाओं में प्रकाशमान हो रहे थे। वे महायशस्वी नरेश अपने राज्य को पुनः वापस लेकर उसका न्यायपूर्वक शासन करने लगे। उन्होंने पर्याप्त दक्षिणा से युक्त विविध प्रकार के यज्ञों द्वारा विधिपूर्वक भगवान का यजन किया।
राजेन्द्र! इसी प्रकार तुम भी पुनः अपना राज्य पाकर सुहृदों सहित शीघ्र ही यज्ञ का अनुष्ठान करोगे। भरतश्रेष्ठ! पुरुषोत्तम! शत्रुओं की राजधानी पर विजय पाने वाले महाराज नल जूआ खेलने के कारण अपनी पत्नी सहित इस प्रकार के महान् सङ्कट में पड़ गये थे। पृथ्वीपते! राजा नल ने अकेले ही यह भयङ्कर और महान् दुःख प्राप्त किया था; उन्हें पुनः अभ्युदय की प्राप्ति हुई।
पाण्डुनन्दन! तुम तो अपने सभी भाइयों और महारानी द्रौपदी के साथ इस महान् वन में भ्रमण करते हो और निरन्तर धर्म के ही चिन्तन में लगे रहते हो। राजन्! महान् भाग्यशाली वेद-वेदाङ्गों के पारङ्गत विद्वान् ब्राह्मण सदा तुम्हारे साथ रहते हैं; फिर तुम्हारे लिये इस परिस्थिति में शोक की क्या बात है? महाराज! तुम्हारे जैसे लोगों को कलियुगनाशक इतिहास सुनकर आश्वासन प्राप्त हो सकता है।
पुरुष को प्राप्त होने वाले सभी विषय सदा अस्थिर एवं विनाशशील हैं। यह सोचकर उनके मिलने या नष्ट होने पर तुम्हें तनिक भी चिन्ता नहीं करनी चाहिये। नरेश! इस इतिहास को सुनकर तुम धैर्य धारण करो, शोक न करो; महाराज! तुम्हें सङ्कट में पड़ने पर विषादग्रस्त नहीं होना चाहिये। जब दैव (प्रारब्ध) प्रतिकूल हो और पुरुषार्थ निष्फल हो जाय, उस समय भी सत्त्वगुण का आश्रय लेनेवाले मनुष्य अपने मन में विषाद नहीं लाते।
अस्थिरत्वं च संचिन्त्य पुरुषार्थस्य नित्यदा ।
तस्योदये व्यये चापि न चिन्तयितुमर्हसि ॥
पुरुषको प्राप्त होनेवाले सभी विषय सदा अस्थिर एवं विनाशशील हैं । यह सोचकर उनके मिलने या नष्ट होनेपर तुम्हें तनिक भी चिन्ता नहीं करनी चाहिये ।
अर्थात् जो राजा नल के इस महान् चरित्र का वर्णन करेंगे अथवा निरन्तर सुनेंगे, उन्हें दरिद्रता नहीं प्राप्त होगी। उनके सभी मनोरथ सिद्ध हो जायेंगे और वे संसार में धन्य हो जायेंगे। इस प्राचीन एवं उत्तम इतिहास का सदा ही श्रवण करके मनुष्य पुत्र, पौत्र, पशु तथा मानवों में श्रेष्ठता प्राप्त कर लेता है; साथ ही वह नीरोग और प्रसन्न होता है, इसमें संशय नहीं है।
|| इतिहासमिमं श्रुत्वा पुराणं शश्वदुत्तमम् ॥
पुत्रान् पौत्रान् पशूंश्चापि लभते नृषु चाग्र्यताम् ।
आरोग्यप्रीतिमांश्चैव भविष्यति न संशयः ॥
इस प्राचीन एवं उत्तम इतिहासका सदा ही श्रवण करके मनुष्य पुत्र, पौत्र, पशु तथा मानवोंमें श्रेष्ठता प्राप्त कर लेता है । साथ ही वह नीरोग और प्रसन्न होता है, इसमें संशय नहीं है ।
राजन्! तुम जो इस भय से डर रहे हो कि कोई द्यूत-विद्या का ज्ञाता मनुष्य पुनः मुझे जूए के लिये बुलायेगा (जिससे तुम्हें पुनः पराजय का कष्ट देखना पड़ेगा), तुम्हारे उस भय को मैं दूर कर दूँगा। सत्य-पराक्रमी कुन्तीनन्दन! मैं द्यूत-विद्या के सम्पूर्ण हृदय (रहस्य) को जानता हूँ, तुम उसे ग्रहण कर लो। मैं प्रसन्न होकर तुम्हें बतलाता हूँ।
वेदाक्षहृदयं कृत्स्नमहं सत्यपराक्रम ।
उपपद्यस्व कौन्तेय प्रसन्नोऽहं ब्रवीमि ते ॥
सत्यपराक्रमी कुन्तीनन्दन! मैं द्यूतविद्याके सम्पूर्ण हृदय ( रहस्य ) को जानता हूँ, तुम उसे ग्रहण कर लो । मैं प्रसन्न होकर तुम्हें बतलाता हूँ ।
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तदनन्तर राजा युधिष्ठिर ने प्रसन्नचित्त होकर बृहदश्व से कहा— 'भगवन्! मैं द्यूत-विद्या के रहस्य को यथार्थ रूप से जानना चाहता हूँ।' तब महातपस्वी मुनि ने महात्मा पाण्डुनन्दन को द्यूत-विद्या का रहस्य बताया और उन्हें अश्व-विद्या का भी उपदेश देकर वे स्नान आदि करने के लिये चले गये।
ततो हृष्टमना राजा बृहदश्वमुवाच ह ।
भगवन्नक्षहृदयं ज्ञातुमिच्छामि तत्त्वतः ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने प्रसन्नचित्त हो बृहदश्वसे कहा– ' भगवन्! मैं द्यूतविद्याके रहस्यको यथार्थरूपसे जानना चाहता हूँ'
In English
The Grief of the Pandavas and the Story of Nala
While Arjuna is away seeking weapons in Indra's realm, Bhima urges Yudhishthira to attack the Kauravas immediately. To comfort a grieving Yudhishthira, the sage Brihadashwa tells him the story of King Nala, who lost his kingdom through gambling and suffered in exile with his wife Damayanti.
This page answers
- Why did bhima want to fight the kauravas while arjuna was away?
- What did yudhishthira tell the sage brihadashwa?
- Who was king nala?
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- Who was damayanti?
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