श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 381–390

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 381–390

पृष्ठ 381

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‘ मैं ऐसा कोई देश या स्थान नहीं देखता, जहाँ अत्यन्त दुष्टचित्त, दुरात्मा दुर्योधन अपने गुप्तचरोंद्वारा हमलोगोंका पता न लगा ले । वह नीच नराधम हम सब लोगोंका गुप्त निवास जान लेनेपर पुनः अपनी कपटपूर्ण नीतिद्वारा हमें इस वनवासमें ही डाल देगा ॥ २८-२९ ॥

यद्यस्मानभिगच्छेत पापः स हि कथंचन ।

अज्ञातचर्यामुत्तीर्णान् दृष्ट्वा च पुनराह्वयेत् ॥ ३० ॥

' यदि वह पापी किसी प्रकार यह समझ ले कि हम अज्ञातवासकी अवधि पार कर गये हैं, तो वह उस दशामें हमें देखकर पुनः आपको ही जूआ खेलनेके लिये बुलायेगा ॥ ३० ॥

द्यूतेन ते महाराज पुनर्द्यूतमवर्तत ।

भवांश्च पुनराहूतो द्यूते नैवापनेष्यति ॥ ३१ ॥

‘ महाराज! आप एक बार जूएके संकटसे बचकर दुबारा द्यूतक्रीडामें प्रवृत्त हो गये थे, अतः मैं समझता हूँ, यदि पुनः आपका द्यूतके लिये आवाहन हो तो आप उससे पीछे न हटेंगे ॥ ३१ ॥

स तथाक्षेषु कुशलो निश्चितो गतचेतनः ।

चरिष्यसि महाराज वनेषु वसतीः पुनः ॥ ३२ ॥

‘नरेश्वर! वह विवेकशून्य शकुनि जूआ फेंकनेकी कलामें कितना कुशल है, यह आप अच्छी तरह जानते हैं, फिर तो उसमें हारकर आप पुनः वनवास ही भोगेंगे ॥

यद्यस्मान् सुमहाराज कृपणान् कर्तुमर्हसि ।

यावज्जीवमवेक्षस्व वेदधर्मांश्च कृत्स्नशः ॥ ३३ ॥

‘ महाराज! यदि आप हमें दीन, हीन, कृपण ही बनाना चाहते हैं तो जबतक जीवन है, तबतक सम्पूर्ण वेदोक्त धर्मोंके पालनपर ही दृष्टि रखिये ॥ ३३ ॥

निकृत्या निकृतिप्रज्ञो हन्तव्य इति निश्चयः ।

अनुज्ञातस्त्वया गत्वा यावच्छक्ति सुयोधनम् ॥ ३४ ॥

यथैव कक्षमुत्सृष्टो दहेदनिलसारथिः ।

हनिष्यामि तथा मन्दमनुजानातु मे भवान् ॥ ३५ ॥

' अपना निश्चय तो यही है कि कपटीको कपटसे ही मारना चाहिये । यदि आपकी आज्ञा हो तो जैसे तृणकी राशिमें डाली हुई आग हवाका सहारा पाकर उसे भस्म कर डालती है, वैसे ही मैं जाकर अपनी शक्तिके अनुसार उस मूढ़ दुर्योधनका वध कर डालूँ, अतः आप मुझे आज्ञा दीजिये ॥ ३४-३५ ॥ वैशम्पायन उवाच

एवं ब्रुवाणं भीमं तु धर्मराजो युधिष्ठिरः ।

उवाच सान्त्वयन् राजा मूर्क्युपाघ्राय पाण्डवम् ॥ ३६ ॥

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वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! धर्मराज राजा युधिष्ठिरने उपर्युक्त बातें कहनेवाले पाण्डुनन्दन भीमसेनका मस्तक सूँघकर उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा ॥ ३६ ॥

असंशयं महाबाहो हनिष्यसि सुयोधनम् ।

वर्षात् त्रयोदशादूर्ध्वं सह गाण्डीवधन्वना ॥ ३७ ॥

‘ महाबाहो! इसमें तनिक भी संदेह नहीं है कि तुम तेरहवें वर्षके बाद गाण्डीवधारी अर्जुनके साथ जाकर युद्धमें सुयोधनको मार डालोगे ॥ ३७ ॥

यत् त्वमाभाषसे पार्थ प्राप्तः काल इति प्रभो ।

अनृतं नोत्सहे वक्तुं न ह्येतन्मम विद्यते ॥ ३८ ॥

‘ किंतु शक्तिशाली वीर कुन्तीकुमार! तुम जो यह कहते हो कि सुयोधनके वधका अवसर आ गया है, वह ठीक नहीं है । मैं झूठ नहीं बोल सकता, मुझमें यह आदत नहीं है ॥ ३८ ॥

अन्तरेणापि कौन्तेय निकृतिं पापनिश्चयम् ।

हन्ता त्वमसि दुर्धर्ष सानुबन्धं सुयोधनम् ॥ ३ ९ ॥

' कुन्तीनन्दन! तुम दुर्धर्ष वीर हो, छल- कपटका आश्रय लिये बिना भी पापपूर्ण विचार रखनेवाले सुयोधनको सगे - सम्बन्धियोंसहित नष्ट कर सकते हो ' ॥ ३ ९ ॥

एवं ब्रुवति भीमं तु धर्मराजे युधिष्ठिरे ।

आजगाम महाभागो बृहदश्वो महानृषिः ॥ ४० ॥

धर्मराज युधिष्ठिर जब भीमसेनसे ऐसी बातें कह रहे थे, उसी समय महाभाग महर्षि बृहदश्व वहाँ आ पहुँचे ॥ ४० ॥

तमभिप्रेक्ष्य धर्मात्मा सम्प्राप्तं धर्मचारिणम् ।

शास्त्रवन्मधुपर्केण पूजयामास धर्मराट् ॥ ४१ ॥

धर्मात्मा धर्मराज युधिष्ठिरने धर्मानुष्ठान करनेवाले उन महात्माको आया देख शास्त्रीय विधिके अनुसार मधुपर्कद्वारा उनका पूजन किया ॥ ४१ ॥

आश्वस्तं चैनमासीनमुपासीनो युधिष्ठिरः ।

अभिप्रेक्ष्य महाबाहुः कृपणं बह्वभाषत ॥ ४२ ॥

जब वे आसनपर बैठकर थकावटसे निवृत्त हो चुके अर्थात् विश्राम कर चुके, तब महाबाहु युधिष्ठिर उनके पास ही बैठकर उन्हींकी ओर देखते हुए अत्यन्त दीनतापूर्ण वचन बोले— ॥ ४२ ॥

अक्षद्यूते च भगवन् धनं राज्यं च मे हृतम् ।

आहूय निकृतिप्रज्ञैः कितवैरक्षकोविदैः ॥ ४३ ॥

‘ भगवन्! पासे फेंककर खेले जानेवाले जूएके लिये मुझे बुलाकर छल- कपटमें कुशल तथा पासा डालनेकी कलामें निपुण धूर्त जुआरियोंने मेरे सारे धन तथा राज्यका अपहरण

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कर लिया है ॥ ४३ ॥

अनक्षज्ञस्य हि सतो निकृत्या पापनिश्चयैः ।

भार्या च मे सभां नीता प्राणेभ्योऽपि गरीयसी ॥ ४४ ॥

' मैं जूएका मर्मज्ञ नहीं हूँ। फिर भी पापपूर्ण विचार रखनेवाले उन दुष्टोंके द्वारा मेरी प्राणोंसे भी अधिक गौरवशालिनी पत्नी द्रौपदी केश पकड़कर भरी सभामें लायी गयी ॥ ४४ ॥

पुनर्धूतेन मां जित्वा वनवासं सुदारुणम् ।

प्राव्राजयन् महारण्यमजिनैः परिवारितम् ॥ ४५ ॥

‘ एक बार जूएके संकटसे बच जानेपर पुनः द्यूतका आयोजन करके उन्होंने मुझे जीत लिया और मृगचर्म पहनाकर वनवासका अत्यन्त दारुण कष्ट भोगनेके लिये इस महान् वनमें निर्वासित कर दिया ॥ ४५ ॥

अहं वने दुर्वसतीर्वसन् परमदुःखितः ।

अक्षद्यूताधिकारे च गिरः शृण्वन् सुदारुणाः ॥ ४६ ॥

आर्तानां सुहृदां वाचो द्यूतप्रभृति शंसताम् ।

अहं हृदि श्रिताः स्मृत्वा सर्वरात्रीर्विचिन्तयन् ॥ ४७ ॥

' मैं अत्यन्त दुःखी हो बड़ी कठिनाईसे वनमें निवास करता हूँ। जिस सभामें जूआ खेलनेका आयोजन किया गया था, वहाँ प्रतिपक्षी पुरुषोंके मुखसे मुझे अत्यन्त कठोर बातें सुननी पड़ी हैं । इसके सिवा द्यूत आदि कार्योंका उल्लेख करते हुए मेरे दुःखातुर सुहृदोंने जो संतापसूचक बातें कही हैं, वे सब मेरे हृदयमें स्थित हैं । मैं उन सब बातोंको याद करके सारी रात चिन्तामें निमग्न रहता हूँ ॥ ४६-४७ ॥

यस्मिंश्चैव समस्तानां प्राणा गाण्डीवधन्वनि ।

विना महात्मना तेन गतसत्त्व इवाभवम् ॥ ४८ ॥

‘ इधर जिस गाण्डीव धनुषधारी अर्जुनमें हम सबके प्राण बसते हैं, वह भी हमसे अलग है । महात्मा अर्जुनके बिना मैं निष्प्राण- सा हो गया हूँ ॥ ४८ ॥

कदा द्रक्ष्यामि बीभत्सुं कृतास्त्रं पुनरागतम् ।

प्रियवादिनमक्षुद्रं दयायुक्तमतन्द्रितः ॥ ४ ९ ॥

‘ मैं सदा निरालस्यभावसे यही सोचा करता हूँ कि श्रेष्ठ, दयालु और प्रियवादी अर्जुन कब अस्त्रविद्या सीखकर फिर यहाँ आयेगा और मैं उसे भर आँख देखूँगा ॥ ४ ९ ॥ अस्ति राजा मया कश्चिदल्पभाग्यतरो भुवि ।

भवता दृष्टपूर्वो वा श्रुतपूर्वोऽपि वा क्वचित् ।

न मत्तो दुःखिततरः पुमानस्तीति मे मतिः ॥ ५० ॥

‘ क्या मेरे - जैसा अत्यन्त भाग्यहीन राजा इस पृथ्वीपर कोई दूसरा भी है? अथवा आपने कहीं मेरे- जैसे किसी राजाको पहले कभी देखा या सुना है । मेरा तो यह विश्वास है कि

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मुझसे बढ़कर अत्यन्त दुःखी मनुष्य दूसरा कोई नहीं है ' ॥ ५० ॥

बृहदश्वउवाच

यद् ब्रवीषि महाराज न मत्तो विद्यते क्वचित् ।

अल्पभाग्यतरः कश्चित् युमानस्तीति पाण्डव ॥ ५१ ॥

अत्र ते वर्णयिष्यामि यदि शुश्रूषसेऽनघ ।

यस्त्वत्तो दुःखिततरो राजाऽऽसीत् पृथिवीपते ॥ ५२ ॥

बृहदश्व बोले – महाराज पाण्डुनन्दन! तुम जो यह कह रहे हो कि मुझसे बढ़कर अत्यन्त भाग्यहीन कोई पुरुष कहीं भी नहीं है, उसके विषयमें मैं तुम्हें एक प्राचीन इतिहास सुनाऊँगा । अनघ! पृथ्वीपते! यदि तुम सुनना चाहो तो मैं उस व्यक्तिका परिचय दूँगा, जो इस पृथ्वीपर तुमसे भी अधिक दुःखी राजा था ॥ ५१-५२ ॥ वैशम्पायन उवाच

अथैनमब्रवीद् राजा ब्रवीतु भगवानिति ।

इमामवस्थां सम्प्राप्तं श्रोतुमिच्छामि पार्थिवम् ॥ ५३ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! तब राजा युधिष्ठिरने मुनिसे कहा — ‘ भगवन्! अवश्य कहिये । जो मेरी जैसी संकटपूर्ण स्थितिमें पहुँचा हुआ हो, उस राजाका चरित्र मैं सुनना चाहता हूँ' ॥ ५३ ॥

बृहदश्वउवाच

शृणु राजन्नवहितः सह भ्रातृभिरच्युत ।

यस्त्वत्तो दुःखिततरो राजाऽऽसीत् पृथिवीपते ॥ ५४ ॥

बृहदश्वने कहा — राजन्! अपने धर्मसे कभी च्युत न होनेवाले भूपाल! तुम भाइयोंसहित सावधान होकर सुनो । इस पृथ्वीपर जो तुमसे भी अधिक दुःखी राजा था, उसका परिचय देता हूँ ॥ ५४ ॥

निषधेषु महीपालो वीरसेन इति श्रुतः ।

तस्य पुत्रोऽभवन्नाम्ना नलो धर्मार्थकोविदः ॥ ५५ ॥

निषधदेशमें वीरसेन नामसे प्रसिद्ध एक भूपाल हो गये हैं । उन्हींके पुत्रका नाम नल था । जो धर्म और अर्थके तत्त्वज्ञ थे ॥ ५५ ॥

स निकृत्या जितो राजा पुष्करेणेति नः श्रुतम् ।

वनवासं सुदुःखार्तो भार्यया न्यवसत् सह ॥ ५६ ॥

हमने सुना है कि राजा नलको उनके भाई पुष्करने छलसे ही जूएके द्वारा जीत लिया था और वे अत्यन्त दुःखसे आतुर हो अपनी पत्नीके साथ वनवासका दुःख भोगने लगे थे ॥ ५६ ॥

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न तस्य दासा न रथो न भ्राता न च बान्धवाः ।

वने निवसतो राजञ्छिष्यन्ते स्म कदाचन ॥ ५७ ॥

राजन्! उनके साथ न सेवक थे न रथ, न भाई थे न बान्धव । वनमें रहते समय उनके पास ये वस्तुएँ कदापि शेष नहीं थीं ॥ ५७ ॥

भवान् हि संवृतो वीरैर्भ्रातृभिर्देवसम्मितैः ।

ब्रह्मकल्पैर्द्विजाग्रयैश्च तस्मान्नार्हसि शोचितुम् ॥ ५८ ॥

तुम तो देवतुल्य पराक्रमी वीर भाइयोंसे घिरे हुए हो । ब्रह्माजीके समान तेजस्वी श्रेष्ठ

ब्राह्मण तुम्हारे चारों ओर बैठे हुए हैं । अतः तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये ॥

युधिष्ठिर उवाच

विस्तरेणाहमिच्छामि नलस्य सुमहात्मनः ।

चरितं वदतां श्रेष्ठ तन्ममाख्यातुमर्हसि ॥ ५ ९ ॥

युधिष्ठिर बोले — वक्ताओंमें श्रेष्ठ मुने! मैं उत्तम महामना राजा नलका चरित्र विस्तारके

साथ सुनना चाहता हूँ । आप मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ ५ ९ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५२ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें बृहदश्वयुधिष्ठिरसंवादविषयक बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५२ ॥

पृष्ठ 386

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त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः नल - दमयन्तीके गुणोंका वर्णन, उनका परस्पर अनुराग और हंसका दमयन्ती और नलको एक- दूसरेके संदेश सुनाना बृहदश्वउवाच

आसीद् राजा नलो नाम वीरसेनसुतो बली ।

उपपन्नो गुणैरिष्टै रूपवानश्वकोविदः ॥ १ ॥

बृहदश्वने कहा — धर्मराज! निषधदेशमें वीरसेनके पुत्र नल नामसे प्रसिद्ध एक बलवान् राजा हो गये हैं । वे उत्तम गुणोंसे सम्पन्न, रूपवान् और अश्वसंचालनकी कलामें कुशल थे ॥ १ ॥

अतिष्ठन्मनुजेन्द्राणां मूर्ध्नि देवपतिर्यथा ।

उपर्युपरि सर्वेषामादित्य इव तेजसा ॥ २ ॥

ब्रह्मण्यो वेदविच्छूरो निषधेषु महीपतिः ।

अक्षप्रियः सत्यवादी महान क्षौहिणीपतिः ॥ ३ ॥

जैसे देवराज इन्द्र सम्पूर्ण देवताओंके शिरमौर हैं, उसी प्रकार राजा नलका स्थान समस्त राजाओंके ऊपर था । वे तेजमें भगवान् सूर्यके समान सर्वोपरि थे । निषधदेशके महाराज नल बड़े ब्राह्मणभक्त, वेदवेत्ता, शूरवीर, द्यूत -क्रीड़ाके प्रेमी, सत्यवादी, महान् और एक अक्षौहिणी सेनाके स्वामी थे ॥ २-३ ॥

ईप्सितो वरनारीणामुदारः संयतेन्द्रियः ।

रक्षिता धन्विनां श्रेष्ठः साक्षादिव मनुः स्वयम् ॥ ४ ॥

वे श्रेष्ठ स्त्रियोंको प्रिय थे और उदार, जितेन्द्रिय, प्रजाजनोंके रक्षक तथा साक्षात् मनुके समान धनुर्धरोंमें उत्तम थे ॥ ४ ॥

तथैवासीद् विदर्भेषु भीमो भीमपराक्रमः ।

शूरः सर्वगुणैर्युक्तः प्रजाकामः स चाप्रजः ॥ ५ ॥

इसी प्रकार उन दिनों विदर्भदेशमें भयानक पराक्रमी भीम नामक राजा राज्य करते थे । वे शूरवीर और सर्व- सद्गुणसम्पन्न थे । उन्हें कोई संतान नहीं थी । अतः संतानप्राप्तिकी कामना उनके हृदयमें सदा बनी रहती थी ॥

स प्रजार्थे परं यत्नमकरोत् सुसमाहितः ।

तमभ्यगच्छद् ब्रह्मर्षिर्दमनो नाम भारत ॥ ६ ॥

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भारत! राजा भीमने अत्यन्त एकाग्रचित्त होकर संतानप्राप्तिके लिये महान् प्रयत्न किया । उन्हीं दिनों उनके यहाँ दमन नामक ब्रह्मर्षि पधारे ॥ ६ ॥

तं स भीमः प्रजाकामस्तोषयामास धर्मवित् ।

महिष्या सह राजेन्द्र सत्कारेण सुवर्चसम् ॥ ७ ॥

तस्मै प्रसन्नो दमनः सभार्याय वरं ददौ ।

कन्यारत्नं कुमारांश्च त्रीनुदारान् महायशाः ॥ ८ ॥

राजेन्द्र! धर्मज्ञ तथा संतानकी इच्छावाले उस भीमने अपनी रानीसहित उन महातेजस्वी मुनिको पूर्ण सत्कार करके संतुष्ट किया । महायशस्वी दमन मुनिने प्रसन्न होकर पत्नीसहित राजा भीमको एक कन्या और तीन उदार पुत्र प्रदान किये ॥ ७-८ ॥

दमयन्तीं दमं दान्तं दमनं च सुवर्चसम् ।

उपपन्नान् गुणैः सर्वैर्भीमान् भीमपराक्रमान् ॥ ९ ॥

कन्याका नाम था दमयन्ती और पुत्रोंके नाम थे - दम, दान्त तथा दमन । ये सभी बड़े तेजस्वी थे । राजाके तीनों पुत्र गुणसम्पन्न, भयंकर वीर और भयानक पराक्रमी थे ॥ ९ ॥

दमयन्ती तु रूपेण तेजसा यशसा श्रिया ।

सौभाग्येन च लोकेषु यशः प्राप सुमध्यमा ॥ १० ॥

सुन्दर कटिप्रदेशवाली दमयन्ती रूप, तेज, यश, श्री और सौभाग्यके द्वारा तीनों लोकोंमें विख्यात यशस्विनी हुई ॥ १० ॥

अथ तां वयसि प्राप्ते दासीनां समलंकृताम् ।

शतं शतं सखीनां च पर्युपासच्छचीमिव ॥ ११ ॥

जब उसने युवावस्थामें प्रवेश किया, उस समय सौ दासियाँ और सौ सखियाँ वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत हो सदा उसकी सेवामें उपस्थित रहती थीं । मानो देवांगनाएँ शचीकी उपासना करती हों ॥ ११ ॥

तत्र स्म राजते भैमी सर्वाभरणभूषिता ।

सखीमध्येऽनवद्याङ्गी विद्युत्सौदामनी यथा ॥ १२ ॥

अनिन्द्द सुन्दर अंगोंवाली भीमकुमारी दमयन्ती सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित हो सखियोंकी मण्डलीमें वैसी ही शोभा पाती थी, जैसे मेघमालाके बीच विद्युत् प्रकाशित हो रही हो ॥ १२ ॥

अतीव रूपसम्पन्ना श्रीरिवायतलोचना ।

न देवेषु न यक्षेषु तादृग् रूपवती क्वचित् ॥ १३ ॥

वह लक्ष्मीके समान अत्यन्त सुन्दर रूपसे सुशोभित थी । उसके नेत्र विशाल थे ।

देवताओं और यक्षोंमें भी वैसी सुन्दरी कन्या कहीं देखने में नहीं आती थी ॥ १३ ॥

मानुषेष्वपि चान्येषु दृष्टपूर्वाथवा श्रुता ।

चित्तप्रसादनी बाला देवानामपि सुन्दरी ॥ १४ ॥

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मनुष्यों तथा अन्य वर्गके लोगोंमें भी वैसी सुन्दरी पहले न तो कभी देखी गयी थी और न सुननेमें ही आयी थी । उस बालाको देखते ही चित्त प्रसन्न हो जाता था । वह देववर्गमें भी श्रेष्ठ सुन्दरी समझी जाती थी ॥ १४ ॥

नलश्च नरशार्दूलो लोकेष्वप्रतिमो भुवि ।

कन्दर्प इव रूपेण मूर्तिमानभवत् स्वयम् ॥ १५ ॥

नरश्रेष्ठ नल भी इस भूतलके मनुष्योंमें अनुपम सुन्दर थे । उनका रूप देखकर ऐसा जान पड़ता था, मानो नलके आकारमें स्वयं मूर्तिमान् कामदेव ही उत्पन्न हुआ हो ॥ १५ ॥

तस्याः समीपे तु नलं प्रशशंसुः कुतूहलात् ।

नैषधस्य समीपे तु दमयन्तीं पुनः पुनः ॥ १६ ॥

लोग कौतूहलवश दमयन्तीके समीप नलकी प्रशंसा करते थे और निषधराज नलके निकट बार- बार दमयन्तीके सौन्दर्यकी सराहना किया करते थे ॥ १६ ॥

तयोरदृष्टः कामोऽभूच्छृण्वतोः सततं गुणान् ।

अन्योन्यं प्रति कौन्तेय स व्यवर्धत हृच्छयः ॥ १७ ॥

कुन्तीनन्दन! इस प्रकार निरन्तर एक- दूसरेके गुणोंको सुनते - सुनते उन दोनोंमें बिना देखे ही परस्पर काम ( अनुराग) उत्पन्न हो गया । उनकी वह कामना दिन - दिन बढ़ती ही चली गयी ॥ १७ ॥

अशक्नुवन् नलः कामं तदा धारयितुं हृदा ।

अन्तःपुरसमीपस्थे वन आस्ते रहोगतः ॥ १८ ॥

जब राजा नल उस कामवेदनाको हृदयके भीतर छिपाये रखनेमें असमर्थ हो गये, तब वे अन्तःपुरके समीपवर्ती उपवनमें जाकर एकान्तमें बैठ गये ॥ १८ ॥

स ददर्श ततो हंसान् जातरूपपरिष्कृतान् ।

वने विचरतां तेषामेकं जग्राह पक्षिणम् ॥ १ ९ ॥

इतनेहीमें उनकी दृष्टि कुछ हंसोंपर पड़ी, जो सुवर्णमय पंखोंसे विभूषित थे । वे उसी

उपवनमें विचर रहे थे । राजाने उनमें से एक हंसको पकड़ लिया ॥ १ ९ ॥

ततोऽन्तरिक्षगो वाचं व्याजहार नलं तदा ।

हन्तव्योऽस्मि न ते राजन् करिष्यामि तव प्रियम् ॥ २० ॥

तब आकाशचारी हंसने उस समय नलसे कहा – ' राजन्! आप मुझे न मारें । मैं आपका प्रिय कार्य करूँगा ॥

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दमयन्तीसकाशे त्वां कथयिष्यामि नैषध ।

यथा त्वदन्यं पुरुषं न सा मंस्यति कर्हिचित् ॥ २१ ॥

‘ निषधनरेश! मैं दमयन्तीके निकट आपकी ऐसी प्रशंसा करूँगा, जिससे वह आपके सिवा दूसरे किसी पुरुषको मनमें कभी स्थान न देगी ' ॥ २१ ॥

एवमुक्तस्ततो हंसमुत्ससर्ज महीपतिः ।

ते तु हंसाः समुत्पत्य विदर्भानगमंस्ततः ॥ २२ ॥

हंसके ऐसा कहनेपर राजा नलने उसे छोड़ दिया । फिर वे हंस वहाँसे उड़कर विदर्भदेशमें गये ॥ २२ ॥

विदर्भनगरीं गत्वा दमयन्त्यास्तदान्तिके ।

निपेतुस्ते गरुत्मन्तः सा ददर्श च तान् खगान् ॥ २३ ॥

तब विदर्भनगरीमें जाकर वे सभी हंस दमयन्तीके निकट उतरे । दमयन्तीने भी उन अद्भुत पक्षियोंको देखा ॥ २३ ॥

सा तानद्भुतरूपान् वै दृष्ट्वा सखिगणावृता ।

हृष्टा ग्रहीतुं खगमांस्त्वरमाणोपचक्रमे ॥ २४ ॥

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सखियोंसे घिरी हुई राजकुमारी दमयन्ती उन अपूर्व पक्षियोंको देखकर बहुत प्रसन्न हुई और तुरंत ही उन्हें पकड़नेकी चेष्टा करने लगी ॥ २४ ॥

अथ हंसा विससृपुः सर्वतः प्रमदावने ।

एकैकशस्तदा कन्यास्तान् हंसान् समुपाद्रवन् ॥ २५ ॥

तब हंस उस प्रमदावनमें सब ओर विचरण करने लगे । उस समय सभी राजकन्याओंने एक- एक करके उन सभी हंसोंका पीछा किया ॥ २५ ॥

दमयन्ती तु यं हंसं समुपाधावदन्तिके ।

स मानुषीं गिरं कृत्वा दमयन्तीमथाब्रवीत् ॥ २६ ॥

दमयन्ती जिस हंसके निकट दौड़ रही थी, उसने उससे मानवी वाणीमें कहा ॥ २६ ॥

दमयन्ति नलो नाम निषधेषु महीपतिः ।

अश्विनोः सदृशो रूपे न समास्तस्य मानुषाः ॥ २७ ॥

‘ राजकुमारी दमयन्ती! सुनो, निषधदेशमें नल नामसे प्रसिद्ध एक राजा हैं, जो अश्विनीकुमारोंके समान सुन्दर हैं । मनुष्योंमें तो कोई उनके समान है ही नहीं ॥ २७ ॥

कन्दर्प इव रूपेण मूर्तिमानभवत् स्वयम् ।

तस्य वै यदि भार्या त्वं भवेथा वरवर्णिनि ॥ २८ ॥

सफलं ते भवेज्जन्म रूपं चेदं सुमध्यमे ।

वयं हि देवगन्धर्वमनुष्योरगराक्षसान् ॥ २ ९ ॥

दृष्टवन्तो न चास्माभिर्दृष्टपूर्वस्तथाविधः ।

त्वं चापि रत्नं नारीणां नरेषु च नलो वरः ॥ ३० ॥

विशिष्टया विशिष्टेन संगमो गुणवान् भवेत् । ‘ सुन्दरि! रूपकी दृष्टिसे तो वे मानो स्वयं मूर्तिमान् कामदेव- से ही प्रतीत होते हैं । सुमध्यमे! यदि तुम उनकी पत्नी हो जाओ तो तुम्हारा जन्म और यह मनोहर रूप सफल हो जाय । हमलोगोंने देवता, गन्धर्व, मनुष्य, नाग तथा राक्षसोंको भी देखा है; परंतु हमारी दृष्टिमें अबतक उनके - जैसा कोई भी पुरुष पहले कभी नहीं आया है । तुम रमणियोंमें रत्नस्वरूपा हो और नल पुरुषोंके मुकुटमणि हैं । यदि किसी विशिष्ट नारीका विशिष्ट पुरुषके साथ संयोग हो तो वह विशेष गुणकारी होता है ' ॥ २८–३०३ ॥