श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 501–510
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 501–510
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सप्ततितमोऽध्यायः पर्णादका दमयन्तीसे बाहुकरूपधारी नलका समाचार बताना और दमयन्तीका ऋतुपर्णके यहाँ सुदेव नामक ब्राह्मणको स्वयंवरका संदेश देकर भेजना बृहदश्वउवाच
अथ दीर्घस्य कालस्य पर्णादो नाम वै द्विजः ।
प्रत्येत्य नगरं भैमीमिदं वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥
बृहदश्व मुनि कहते हैं - राजन्! तदनन्तर दीर्घ कालके पश्चात् पर्णाद नामक ब्राह्मण विदर्भदेशकी राजधानीमें लौटकर आये और दमयन्तीसे इस प्रकार बोले- ॥ १ ॥
नैषधं मृगयानेन दमयन्ति मया नलम् ।
अयोध्यां नगरीं गत्वा भाङ्गासुरिमुपस्थितः ॥ २ ॥
‘ दमयन्ती! मैं निषधनरेश नलको ढूँढ़ता हुआ अयोध्या नगरीमें गया और वहाँ राजा ऋतुपर्णके दरबारमें उपस्थित हुआ ॥ २ ॥
श्रावितश्च मया वाक्यं त्वदीयं स महाजने ।
ऋतुपर्णो महाभागो यथोक्तं वरवर्णिनि ॥ ३ ॥
तच्छ्रुत्वा नाब्रवीत् किंचिदृतुपर्णो नराधिपः ।
न च पारिषदः कश्चिद् भाष्यमाणो मयासकृत् ॥ ४ ॥
'वहाँ बहुत लोगोंकी भीड़में मैंने तुम्हारा वाक्य महाभाग ऋतुपर्णको सुनाया । वरवर्णिनि! उस बातको सुनकर राजा ऋतुपर्ण कुछ न बोले । मेरे बार- बार कहनेपर भी उनका कोई सभासद् भी इसका उत्तर न दे सका ॥ ३-४ ॥
अनुज्ञातं तु मां राज्ञा विजने कश्चिदब्रवीत् ।
ऋतुपर्णस्य पुरुषो बाहुको नाम नामतः ॥ ५ ॥
' परंतु ऋतुपर्णके यहाँ बाहुक नामधारी एक पुरुष है, उसने जब मैं राजासे विदा लेकर लौटने लगा, तब मुझसे एकान्तमें आकर तुम्हारी बातोंका उत्तर दिया ॥ ५ ॥
सूतस्तस्य नरेन्द्रस्य विरूपो ह्रस्वबाहुकः ।
शीघ्रयानेषु कुशलो मृष्टकर्ता च भोजने ॥ ६ ॥
‘वह महाराज ऋतुपर्णका सारथि है । उसकी भुजाएँ छोटी हैं तथा वह देखनेमें कुरूप भी है । वह घोड़ोंको शीघ्र हाँकनेमें कुशल है और अपने बनाये हुए भोजनमें बड़ा मिठास उत्पन्न कर देता है ॥ ६ ॥
स विनिःश्वस्य बहुशो रुदित्वा च पुनः पुनः ।
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कुशलं चैव मां पृष्ट्वा पश्चादिदमभाषत ॥ ७ ॥
'बाहुकने बार-बार लंबी साँसें खींचकर अनेक बार रोदन किया और मुझसे कुशल-समाचार पूछकर फिर वह इस प्रकार कहने लगा- ॥ ७ ॥
वैषम्यमपि सम्प्राप्ता गोपायन्ति कुलस्त्रियः ।
आत्मानमात्मना सत्यो जितः स्वर्गो न संशयः ॥ ८ ॥
' उत्तम कुलकी स्त्रियाँ बड़े भारी संकटमें पड़कर भी स्वयं अपनी रक्षा करती हैं । ऐसा करके वे सत्य और स्वर्ग दोनोंपर विजय पा लेती हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ ८ ॥
रहिता भर्तृभिश्चैव न कुप्यन्ति कदाचन ।
प्राणांश्चारित्रकवचान् धारयन्ति वरस्त्रियः ॥ ९ ॥
' श्रेष्ठ नारियाँ अपने पतियोंसे परित्यक्त होनेपर भी कभी क्रोध नहीं करतीं । वे सदाचाररूपी कवचसे आवृत प्राणोंको धारण करती हैं ॥ ९ ॥
विषमस्थेन मूढेन परिभ्रष्टसुखेन च ।
यत् सा तेन परित्यक्ता तत्र न क्रोद्धुमर्हति ॥ १० ॥
' वह पुरुष बड़े संकटमें था, सुखके साधनोंसे वंचित होकर किंकर्तव्यविमूढ हो गया था । ऐसी दशामें यदि उसने अपनी पत्नीका परित्याग किया है तो इसके लिये पत्नीको उसपर क्रोध नहीं करना चाहिये ॥ १० ॥
प्राणयात्रां परिप्रेप्सोः शकुनैर्हृतवाससः ।
आधिभिर्दह्यमानस्य श्यामा न क्रोद्धुमर्हति ॥ ११ ॥
' जीविका पानेके लिये चेष्टा करते समय पक्षियोंने जिसके वस्त्रका अपहरण कर लिया था और जो अनेक प्रकारकी मानसिक चिन्ताओंसे दग्ध हो रहा था, उस पुरुषपर श्यामाको क्रोध नहीं करना चाहिये ॥ ११ ॥
सत्कृतासत्कृता वापि पतिं दृष्ट्वा तथागतम् ।
भ्रष्टराज्यं श्रिया हीनं क्षुधितं व्यसनाप्लुतम् ॥ १२ ॥
' पतिने उसका सत्कार किया हो या असत्कार- उसे चाहिये कि पतिको वैसे संकटमें पड़ा देखकर उसे क्षमा कर दे; क्योंकि वह राज्य और लक्ष्मीसे वंचित हो भूखसे पीड़ित एवं विपत्तिके अथाह सागरमें डूबा हुआ था ' ॥ १२ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा त्वरितोऽहमिहागतः ।
श्रुत्वा प्रमाणं भवती राज्ञश्चैव निवेदय ॥ १३ ॥
' बाहुककी वह बात सुनकर मैं तुरंत यहाँ चला आया । यह सब सुनकर अब कर्तव्याकर्तव्यके निर्णयमें तुम्हीं प्रमाण हो । ( तुम्हारी इच्छा हो तो ) महाराजको भी ये बातें सूचित कर दो ' ॥ १३ ॥
एतच्छ्रुत्वाश्रुपूर्णाक्षी पर्णादस्य विशाम्पते ।
दमयन्ती रहोऽभ्येत्य मातरं प्रत्यभाषत ॥ १४ ॥
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युधिष्ठिर! पर्णादका यह कथन सुनकर दमयन्तीके नेत्रोंमें आँसू भर आया । उसने एकान्तमें जाकर अपनी मातासे कहा- ॥ १४ ॥
अयमर्थो न संवेद्यो भीमे मातः कदाचन ।
त्वत्संनिधौ नियोक्ष्येऽहं सुदेवं द्विजसत्तमम् ॥ १५ ॥
यथा न नृपतिर्भीमः प्रतिपद्येत मे मतम् ।
तथा त्वया प्रकर्तव्यं मम चेत् प्रियमिच्छसि ॥ १६ ॥
' माँ! पिताजीको यह बात कदापि मालूम न होनी चाहिये । मैं तुम्हारे ही सामने विप्रवर सुदेवको इस कार्यमें लगाऊँगी । तुम ऐसी चेष्टा करो, जिससे पिताजीको मेरा विचार ज्ञात न हो । यदि तुम मेरा प्रिय करना चाहती हो तो तुम्हें इसके लिये सचेष्ट रहना होगा ॥ १५-१६ ॥
यथा चाहं समानीता सुदेवेनाशु बान्धवान् ।
तेनैव मङ्गलेनाशु सुदेवो यातु मा चिरम् ॥ १७ ॥
समानेतुं नलं मातरयोध्यां नगरीमितः । 'जैसे सुदेवने मुझे यहाँ लाकर बन्धु बान्धवोंसे शीघ्र मिला दिया, उसी मंगलमय उद्देश्यकी सिद्धिके लिये सुदेव ब्राह्मण फिर शीघ्र ही यहाँसे अयोध्या जायँ, देर न करें । माँ! वहाँ जानेका उद्देश्य है, महाराज नलको यहाँ ले आना' ॥ १७३ ॥
विश्रान्तं तु ततः पश्चात् पर्णादं द्विजसत्तमम् ॥ १८ ॥
अर्चयामास वैदर्भी धनेनातीव भाविनी ।
नले चेहागते तत्र भूयो दास्यामि ते वसु ॥ १ ९ ॥
इतनेहीमें विप्रवर पर्णाद जब विश्राम कर चुके, तब विदर्भराजकुमारी दमयन्तीने बहुत धन देकर उनका सत्कार किया और यह भी कहा – ' महाराज नलके यहाँ पधारनेपर मैं आपको और भी धन दूँगी ॥ १८-१९ ॥
त्वया हि मे बहु कृतं यदन्यो न करिष्यति ।
यद् भर्त्राहं समेष्यामि शीघ्रमेव द्विजोत्तम ॥ २० ॥
‘ विप्रवर! आपने मेरा बहुत बड़ा उपकार किया, जो दूसरा नहीं कर सकता; क्योंकि अब मैं अपने स्वामीसे शीघ्र ही मिल सकूँगी ' ॥ २० ॥
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स एवमुक्तोऽथाश्वास्य आशीर्वादैः सुमङ्गलैः ।
गृहानुपययौ चापि कृतार्थः सुमहामनाः ॥ २१ ॥
दमयन्तीके ऐसा कहनेपर अत्यन्त उदार हृदयवाले पर्णाद अपने परम मंगलमय आशीर्वादोंद्वारा उसे आश्वासन दे कृतार्थ हो अपने घर चले गये ॥ २१ ॥
ततः सुदेवमाभाष्य दमयन्ती युधिष्ठिर ।
अब्रवीत् संनिधौ मातुर्दुःखशोकसमन्विता ॥ २२ ॥
युधिष्ठिर! तदनन्तर दमयन्तीने सुदेव ब्राह्मणको बुलाकर अपनी माताके समीप दुःख- शोकसे पीड़ित होकर कहा— ॥ २२ ॥
गत्वा सुदेव नगरीमयोध्यावासिनं नृपम् ।
ऋतुपर्णं वचो ब्रूहि सम्पतन्निव कामगः ॥ २३ ॥
‘ सुदेवजी! आप इच्छानुसार चलनेवाले द्रुतगामी पक्षीकी भाँति शीघ्रतापूर्वक अयोध्या नगरीमें जाकर वहाँके निवासी राजा ऋतुपर्णसे कहिये— ॥ २३ ॥
आस्थास्यति पुनर्भेमी दमयन्ती स्वयंवरम् ।
तत्र गच्छन्ति राजानो राजपुत्राश्च सर्वशः ॥ २४ ॥
' भीमकुमारी दमयन्ती पुनः स्वयंवर करेगी । वहाँ बहुत - से राजा और राजकुमार सब ओरसे जा रहे हैं ॥ २४ ॥
तथा च गणितः कालः श्वोभूते स भविष्यति ।
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यदि सम्भावनीयं ते गच्छ शीघ्रमरिंदम ॥ २५ ॥
‘ उसके लिये समय नियत हो चुका है । कल ही स्वयंवर होगा । शत्रुदमन! यदि आपका वहाँ पहुँचना सम्भव हो तो शीघ्र जाइये ॥ २५ ॥
सूर्योदयेद्वितीयं सा भर्तारं वरयिष्यति ।
न हि स ज्ञायते वीरो नलो जीवति वा न वा ॥ २६ ॥
' कल सूर्योदय होनेके बाद वह दूसरे पतिका वरण कर लेगी; क्योंकि वीरवर नल जीवित हैं या नहीं, इसका कुछ पता नहीं लगता है ' ॥ २६ ॥
एवं तया यथोक्तो वै गत्वा राजानमब्रवीत् ।
ऋतुपर्णं महाराज सुदेवो ब्राह्मणस्तदा ॥ २७ ॥
महाराज! दमयन्तीके इस प्रकार बतानेपर सुदेव ब्राह्मणने राजा ऋतुपर्णके पास जाकर वही बात कही ॥ २७ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि दमयन्तीपुनःस्वयंवरकथने सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें दमयन्तीके पुनः स्वयंवरकी चर्चासे सम्बन्ध रखनेवाला सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७० ॥
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एकसप्ततितमोऽध्यायः राजा ऋतुपर्णका विदर्भदेशको प्रस्थान, राजा नलके विषयमें वार्ष्णेयका विचार और बाहुककी अद्भुत अश्वसंचालन - कलासे वार्ष्णेय और ऋतुपर्णका प्रभावित होना बृहदश्वउवाच
श्रुत्वा वचः सुदेवस्य ऋतुपर्णो नराधिपः ।
सान्त्ययन् श्लक्ष्णया वाचा बाहुकं प्रत्यभाषत ॥ १ ॥
बृहदश्व मुनि कहते हैं - युधिष्ठिर! सुदेवकी वह बात सुनकर राजा ऋतुपर्णने मधुर वाणीसे सान्त्वना देते हुए बाहुकसे कहा- ॥ १ ॥
विदर्भान् यातुमिच्छामि दमयन्त्याः स्वयंवरम् ।
एकाह्ना हयतत्त्वज्ञ मन्यसे यदि बाहुक ॥ २ ॥
'बाहुक! तुम अश्वविद्याके तत्त्वज्ञ हो, यदि मेरी बात मानो तो मैं दमयन्तीके स्वयंवरमें सम्मिलित होनेके लिये एक ही दिनमें विदर्भदेशकी राजधानीमें पहुँचना चाहता हूँ' ॥ २ ॥
एवमुक्तस्य कौन्तेय तेन राज्ञा नलस्य ह ।
व्यदीर्यत मनो दुःखात् प्रदध्यौ च महामनाः ॥ ३ ॥
कुन्तीनन्दन! राजा ऋतुपर्णके ऐसा कहनेपर राजा नलका मन अत्यन्त दुःखसे विदीर्ण होने लगा । महामना नल बहुत देरतक किसी भारी चिन्तामें निमग्न हो गये ॥ ३ ॥
दमयन्ती वदेदेतत् कुर्याद् दुःखेन मोहिता ।
अस्मदर्थे भवेद् वायमुपायश्चिन्तितो महान् ॥ ४ ॥
वे सोचने लगे — ' क्या दमयन्ती ऐसी बात कह सकती है? अथवा सम्भव है, दुःखसे मोहित होकर वह ऐसा कार्य कर ले । कहीं ऐसा तो नहीं है कि उसने मेरी प्राप्तिके लिये यह महान् उपाय सोच निकाला हो? ॥ ४ ॥
नृशंसं बत वैदर्भी भर्तृकामा तपस्विनी ।
मया क्षुद्रेण निकृता कृपणा पापबुद्धिना ॥ ५ ॥
स्त्रीस्वभावश्चलो लोके मम दोषश्च दारुणः ।
स्यादेवमपि कुर्यात् सा विवासाद् गतसौहृदा ॥ ६ ॥
‘ तपस्विनी एवं दीन विदर्भराजकुमारीको मुझ नीच एवं पापबुद्धि पुरुषने धोखा दिया है, इसीलिये वह ऐसा निष्ठुर कार्य करनेको उद्यत हो गयी । संसारमें स्त्रीका चंचल स्वभाव
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प्रसिद्ध है । मेरा अपराध भी भयंकर है । सम्भव है मेरे प्रवाससे उसका हार्दिक स्नेह कम हो गया हो, अतः वह ऐसा भी कर ले ॥ ५-६ ॥
मम शोकेन संविग्ना नैराश्यात् तनुमध्यमा ।
नैवं सा कर्हिचित् कुर्यात् सापत्या च विशेषतः ॥ ७ ॥
‘ क्योंकि पतली कमरवाली वह युवती मेरे शोकसे अत्यन्त उद्विग्न हो उठी होगी और मेरे मिलनेकी आशा न होनेके कारण उसने ऐसा विचार कर लिया होगा, परंतु मेरा हृदय कहता है कि वह कभी ऐसा नहीं कर सकती । विशेषतः वह संतानवती है । इसलिये भी उससे ऐसी आशा नहीं की जा सकती ॥ ७ ॥
यदत्र सत्यं वासत्यं गत्वा वेत्स्यामि निश्चयम् ।
ऋतुपर्णस्य वै काममात्मार्थं च करोम्यहम् ॥ ८ ॥
‘ इसमें कितना सत्य या असत्य है - इसे मैं वहाँ जाकर ही निश्चितरूपसे जान सकूँगा, अतः मैं अपने लिये ही ऋतुपर्णकी इस कामनाको पूर्ण करूँगा ' ॥ ८ ॥
इति निश्चित्य मनसा बाहुको दीनमानसः ।
कृताञ्जलिरुवाचेदमृतुपर्णं जनाधिपम् ॥ ९ ॥
प्रतिजानामि ते वाक्यं गमिष्यामि नराधिप ।
एकाह्ना पुरुषव्याघ्र विदर्भनगरीं नृप ॥ १० ॥
मन- ही- मन ऐसा निश्चय करके दीनहृदय बाहुकने दोनों हाथ जोड़कर राजा ऋतुपर्णसे इस प्रकार कहा— ‘ नरेश्वर! पुरुषसिंह! मैंने आपकी आज्ञा सुनी है, मैं प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूँ कि मैं एक ही दिनमें विदर्भदेशकी राजधानीमें आपके साथ जा पहुँचूँगा ' ॥ ९-१० ॥
ततः परीक्षामश्वानां चक्रे राजन् स बाहुकः ।
अश्वशालामुपागम्य भाङ्गासुरिनृपाज्ञया ॥ ११ ॥
युधिष्ठिर! तदनन्तर बाहुकने अश्वशालामें जाकर राजा ऋतुपर्णकी आज्ञासे अश्वोंकी परीक्षा की ॥ ११ ॥
स त्वर्यमाणो बहुश ऋतुपर्णेन बाहुकः ।
अश्वाञ्जिज्ञासमानो वै विचार्य च पुनः पुनः ।
अध्यगच्छत् कृशानश्वान् समर्थानध्वनि क्षमान् ॥ १२ ॥
ऋतुपर्ण बाहुकको बार- बार उत्तेजित करने लगे, अतः उसने अच्छी तरह विचार करके अश्वोंकी परीक्षा कर ली और ऐसे अश्वोंको चुना, जो देखनेमें दुबले होनेपर भी मार्ग तय करनेमें शक्तिशाली एवं समर्थ थे ॥ १२ ॥
तेजोबलसमायुक्तान् कुलशीलसमन्वितान् ।
वर्जिताँल्लक्षणैर्हीनैः पृथुप्रोथान् महाहनून् ॥ १३ ॥
वे तेज और बलसे युक्त थे । वे अच्छी जातिके और अच्छे स्वभावके थे । उनमें अशुभ
लक्षणोंका सर्वथा अभाव था । उनकी नाक मोटी और थूथन (ठोड़ी ) चौड़ी थी ॥ १३ ॥
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शूद्धान् दशभिरावर्तैः सिन्धुजान् वातरंहसः ।
दृष्ट्वा तानब्रवीद् राजा किंचित् कोपसमन्वितः ॥ १४ ॥
वे वायुके समान वेगशाली सिन्धुदेशके घोड़े थे। वे दस आवर्त ( भँवरियों ) के चिह्नोंसे युक्त होनेके कारण निर्दोष थे । उन्हें देखकर राजा ऋतुपर्णने कुछ कुपित होकर कहा ॥ १४ ॥
किमिदं प्रार्थितं कर्तुं प्रलब्धव्या न ते वयम् ।
कथमल्पबलप्राणा वक्ष्यन्तीमे हया मम ।
महदध्वानमपि च गन्तव्यं कथमीदृशैः ॥ १५ ॥
' क्या तुमसे ऐसे ही घोड़े चुननेके लिये कहा था, तुम मुझे धोखा तो नहीं दे रहे हो । ये अल्प बल और शक्तिवाले घोड़े कैसे मेरा इतना बड़ा रास्ता तय कर सकेंगे? ऐसे घोड़ोंसे इतनी दूरतक रथ कैसे ले जाया जायगा? ' ॥ १५ ॥
बाहुक उवाच
को ललाटे द्वौ मूर्ध्नि द्वौ द्वौ पार्श्वोपपार्श्वयोः ।
द्वौ द्वौ वक्षसि विज्ञेयौ प्रयाणे चैक एव तु ॥ १६ ॥
बाहुकने कहा— राजन्! ललाटमें एक, मस्तकमें दो, पार्श्वभागमें दो, उपपार्श्वभागमें भी दो, छातीमें दोनों ओर दो दो और पीठमें एक- इस प्रकार कुल बारह भँवरियोंको पहचानकर घोड़े रथमें जोतने चाहिये ॥ १६ ॥
एते हया गमिष्यन्ति विदर्भान् नात्र संशयः ।
यानन्यान् मन्यसे राजन् ब्रूहि तान् योजयामि ते ॥ १७ ॥
ये मेरे चुने हुए घोड़े अवश्य विदर्भदेशकी राजधानीतक पहुँचेंगे, इसमें संशय नहीं है । महाराज! इन्हें छोड़कर आप जिनको ठीक समझें, उन्हींको मैं रथमें जोत दूँगा ॥ १७ ॥
ऋतुपर्णउवाच
त्वमेव हयतत्त्वज्ञः कुशलो ह्यसि बाहुक ।
यान् मन्यसे समर्थांस्त्वं क्षिप्रं तानेव योजय ॥ १८ ॥
ऋतुपर्ण बोले- बाहुक! तुम अश्वविद्याके तत्त्वज्ञ और कुशल हो, अतः तुम जिन्हें इस कार्यमें समर्थ समझो, उन्हींको शीघ्र जोतो ॥ १८ ॥
ततः सदश्वांश्चतुरः कुलशीलसमन्वितान् ।
योजयामास कुशलो जवयुक्तान् रथे नलः ॥ १ ९ ॥
तब चतुर एवं कुशल राजा नलने अच्छी जाति और उत्तम स्वभावके चार वेगशाली घोड़ोंको रथमें जोता ॥ १ ९ ॥
ततो युक्तं रथं राजा समारोहत् त्वरान्वितः ।
अथ पर्यपतन् भूमौ जानुभिस्ते हयोत्तमाः ॥ २० ॥
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जुते हुए रथपर राजा ऋतुपर्ण बड़ी उतावलीके साथ सवार हुए । इसलिये उनके चढ़ते ही वे उत्तम घोड़े घुटनोंके बल पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ २० ॥
ततो नरवरः श्रीमान् नलो राजा विशाम्पते ।
सान्त्वयामास तानश्वांस्तेजोबलसमन्वितान् ॥ २१ ॥
युधिष्ठिर! तब नरश्रेष्ठ श्रीमान् राजा नलने तेज और बलसे सम्पन्न उन घोड़ोंको पुचकारा ॥ २१ ॥
रश्मिभिश्च समुद्यम्य नलो यातुमियेष सः ।
सूतमारोप्य वार्ष्णेयं जवमास्थाय वै परम् ॥ २२ ॥
ते चोद्यमाना विधिवद् बाहुकेन हयोत्तमाः ।
समुत्पेतुरथाकाशं रथिनं मोहयन्निव ॥ २३ ॥
फिर अपने हाथमें बागडोर ले उन्हें काबूमें करके रथको आगे बढ़ानेकी इच्छा की । वार्ष्णेय सारथिको रथपर बैठाकर अत्यन्त वेगका आश्रय ले उन्होंने रथ हाँक दिया । बाहुकके द्वारा विधिपूर्वक हाँके जाते हुए वे उत्तम अश्व रथीको मोहित - से करते हुए इतने तीव्र वेगसे चले, मानो आकाशमें उड़ रहे हों ॥ २२-२३ ॥ तथा तु दृष्ट्वा तानश्वान् वहतो वातरंहसः ।
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अयोध्याधिपतिः श्रीमान् विस्मयं परमं ययौ ॥ २४ ॥
उस प्रकार वायुके समान वेगसे रथका वहन करनेवाले उन अश्वोंको देखकर श्रीमान् अयोध्यानरेशको बड़ा विस्मय हुआ ॥ २४ ॥
रथघोषं तु तं श्रुत्वा हयसंग्रहणं च तत् ।
वार्ष्णेयश्चिन्तयामास बाहुकस्य हयज्ञताम् ॥ २५ ॥
किं नु स्यान्मातलिरयं देवराजस्य सारथिः ।
तथा तल्लक्षणं वीरे बाहुके दृश्यते महत् ॥ २६ ॥
रथकी आवाज सुनकर और घोड़ोंको काबूमें करनेकी वह कला देखकर वार्ष्णेयने बाहुकके अश्व- विज्ञानपर सोचना आरम्भ किया । ' क्या यह देवराज इन्द्रका सारथि मातलि है? इस वीर बाहुकमें मातलिका- सा ही महान् लक्षण देखा जाता है ॥ २५-२६ ॥
शालिहोत्रोऽथ किं नु स्याद्धयानां कुलतत्त्ववित् ।
मानुषं समनुप्राप्तो वपुः परमशोभनम् ॥ २७ ॥
' अथवा घोड़ोंकी जाति और उनके विषयकी तात्त्विक बातें जाननेवाले ये आचार्य शालिहोत्र तो नहीं हैं, जो परम सुन्दर मानव शरीर धारण करके यहाँ आ पहुँचे हैं ॥ २७ ॥
उताहोस्विद् भवेद् राजा नलः परपुरंजयः ।
सोऽयं नृपतिरायात इत्येवं समचिन्तयत् ॥ २८ ॥
‘ अथवा शत्रुओंकी राजधानीपर विजय पानेवाले साक्षात् राजा नल ही तो इस रूपमें नहीं आ गये हैं? अवश्य वे ही हैं, इस प्रकार वार्ष्णेयने चिन्तन करना प्रारम्भ किया ॥ २८ ॥
अथ चेह नलो विद्यां वेत्ति तामेव बाहुकः ।
तुल्यं हि लक्षये ज्ञानं बाहुकस्य नलस्य च ॥ २९ ॥
‘ राजा नल इस जगत्में जिस विद्याको जानते हैं, उसीको बाहुक भी जानता है । बाहुक और नल दोनोंका ज्ञान मुझे एक-सा दिखायी देता है ॥ २ ९ ॥
अपि चेदं वयस्तुल्यं बाहुकस्य नलस्य च ।
नायं नलो महावीर्यस्तद्विद्यश्च भविष्यति ॥ ३० ॥
'इसी प्रकार बाहुक और नलकी अवस्था भी एक है । यह महापराक्रमी राजा नल नहीं है तो भी उनके ही समान विद्वान् कोई दूसरा महापुरुष होगा ॥ ३० ॥
प्रच्छन्ना हि महात्मानश्चरन्ति पृथिवीमिमाम् ।
दैवेन विधिना युक्ताः शास्त्रोक्तैश्च निरूपणैः ॥ ३१ ॥
'बहुत - से महात्मा प्रच्छन्न रूप धारण करके देवोचित विधि तथा शास्त्रोक्त नियमोंसे युक्त होकर इस पृथ्वीपर विचरते रहते हैं ॥ ३१ ॥
भवेन्न मतभेदो मे गात्रवैरूप्यतां प्रति ।
प्रमाणात् परिहीनस्तु भवेदिति मतिर्मम ॥ ३२ ॥