श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 571–580

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 571–580

पृष्ठ 571

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सिद्धिं समभिसम्प्राप्ताः पुण्येन महतान्विताः ॥ २६ ॥

महाभाग! पुष्करमें पहले देवता तथा ऋषि महान् पुण्यसे सम्पन्न हो सिद्धि प्राप्त कर चुके हैं ॥ २६ ॥

तत्राभिषेकं यः कुर्यात् पितृदेवार्चने रतः ।

अश्वमेधाद्दशगुणं फलं प्राहुर्मनीषिणः ॥ २७ ॥

जो वहाँ स्नान करता तथा देवताओं और पितरोंकी पूजामें संलग्न रहता है, उस पुरुषको अश्वमेधसे दस गुना फल प्राप्त होता है; ऐसा मनीषीगण कहते हैं ॥

अप्येकं भोजयेद् विप्रं पुष्करारण्यमाश्रितः ।

तेनासौ कर्मणा भीष्म प्रेत्य चेह च मोदते ॥ २८ ॥

भीष्म! पुष्करमें जाकर कम-से- कम एक ब्राह्मणको अवश्य भोजन कराये । उस पुण्यकर्मसे मनुष्य इहलोक और परलोकमें भी आनन्दका भागी होता है ॥ २८ ॥

शाकैर्मूलैः फलैर्वापि येन वर्तयते स्वयम् ।

तद् वै दद्याद् ब्राह्मणाय श्रद्धावाननसूयकः ॥ २ ९ ॥

मनुष्य साग, फल तथा मूल जिसके द्वारा स्वयं प्राणयात्राका निर्वाह करता है, वही श्रद्धाभावसे दूसरोंके दोष न देखते हुए ब्राह्मणको दान करे ॥ २ ९ ॥

तेनैव प्राप्नुयात् प्राज्ञो हयमेधफलं नरः ।

ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा वा राजसत्तम ॥ ३० ॥

न वै योनौ प्रजायते स्नातास्तीर्थे महात्मनः । उसीसे विद्वान् पुरुष अश्वमेधयज्ञका फल पाता है । नृपश्रेष्ठ! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र जो कोई भी महात्मा ब्रह्माजीके तीर्थमें स्नान कर लेते हैं, वे फिर किसी योनिमें जन्म नहीं लेते हैं ॥ ३० ॥

कार्तिकीं तु विशेषण योऽभिगच्छति पुष्करम् ॥ ३१ ॥

प्राप्नुयात् स नरो लोकान् ब्रह्मणः सदनेऽक्षयान् । विशेषतः कार्तिकमासकी पूर्णिमाको जो पुष्करतीर्थमें स्नानके लिये जाता है, वह मनुष्य ब्रह्मधाममें अक्षय लोकोंको प्राप्त होता है ॥ ३१३ ॥

सायं प्रातः स्मरेद् यस्तु पुष्कराणि कृताञ्जलिः ॥ ३२ ॥

उपस्पृष्टं भवेत् तेन सर्वतीर्थेषु भारत । भारत! जो सायंकाल और प्रातःकाल हाथ जोड़कर तीनों पुष्करोंका स्मरण करता है, उसने मानो सब तीर्थोंमें स्नान एवं आचमन कर लिया ॥ ३२३ ॥

जन्मप्रभृति यत् पापं स्त्रिया वा पुरुषेण वा ॥ ३३ ॥

पुष्करे स्नातमात्रस्य सर्वमेव प्रणश्यति । स्त्री अथवा पुरुषने जन्मसे लेकर वर्तमान अवस्थातक जितने भी पाप किये हैं, पुष्करतीर्थमें स्नान करनेमात्रसे वे सब पाप नष्ट हो जाते हैं ॥ ३३३ ॥

पृष्ठ 572

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यथा सुराणां सर्वेषामादिस्तु मधुसूदनः ॥ ३४ ॥

तथैव पुष्करं राजंस्तीर्थानामादिरुच्यते । राजन्! जैसे भगवान् मधुसूदन ( विष्णु ) सब देवताओंके आदि हैं, वैसे ही पुष्कर सब तीर्थोंका आदि कहा जाता है ॥ ३४३ ॥

उष्ट्वा द्वादश वर्षाणि पुष्करे नियतः शुचिः ॥ ३५ ॥

क्रतून् सर्वानवाप्नोति ब्रह्मलोकं स गच्छति । पुष्करमें पवित्रतापूर्वक संयम-नियमके साथ बारह वर्षोंतक निवास करके मानव सम्पूर्ण यज्ञोंका फल पाता और ब्रह्मलोकको जाता है ॥ ३५३ ॥

यस्तु वर्षशतं पूर्णमग्निहोत्रमुपासते ॥ ३६ ॥

कार्तिकीं वा वसेदेकां पुष्करे सममेव तत् ॥ ३७ ॥

जो पूरे सौ वर्षोंतक अग्निहोत्र करता है और जो कार्तिककी एक ही पूर्णिमाको पुष्करमें वास करता है, दोनोंका फल बराबर है ॥ ३६-३७ ॥

त्रीणि शृङ्गाणि शुभ्राणि त्रीणि प्रस्रवणानि च ।

पुष्कराण्यादिसिद्धानि न विद्मस्तत्र कारणम् ॥ ३८ ॥

तीन शुभ्र पर्वतशिखर, तीन सोते और तीन पुष्कर- ये आदिसिद्ध तीर्थ हैं । ये कब किस कारणसे तीर्थ माने गये? इसका हमें पता नहीं है ॥ ३८ ॥

दुष्करं पुष्करे गन्तुं दुष्करं पुष्करे तपः ।

दुष्करं पुष्करे दानं वस्तुं चैव सुदुष्करम् ॥ ३ ९ ॥

पुष्करमें जाना अत्यन्त दुर्लभ है, पुष्करमें तप अत्यन्त दुर्लभ है, पुष्करमें दान देनेका सुयोग तो और भी दुर्लभ है और उसमें निवासका सौभाग्य तो अत्यन्त ही दुष्कर है ॥ ३ ९ ॥

उष्य द्वादशरात्रं तु नियतो नियताशनः ।

प्रदक्षिणमुपावृत्य जम्बूमार्गं समाविशेत् ॥ ४० ॥

वहाँ इन्द्रियसंयम और नियमित आहार करते हुए बारह रात रहकर तीर्थकी परिक्रमा करनेके पश्चात् जम्बूमार्गको जाय ॥ ४० ॥

जम्बूमार्ग समाविश्य देवर्षिपितृसेवितम् ।

अश्वमेधमवाप्नोति सर्वकामसमन्वितः ॥ ४१ ॥

जम्बूमार्ग देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंसे सेवित तीर्थ है । उसमें जाकर मनुष्य समस्त मनोवांछित भोगोंसे सम्पन्न हो अश्वमेधयज्ञका फल पाता है ॥ ४१ ॥

तत्रोष्य रजनीः पञ्च पूतात्मा जायते नरः ।

न दुर्गतिमवाप्नोति सिद्धिं प्राप्नोति चोत्तमाम् ॥ ४२ ॥

वहाँ पाँच रात निवास करनेसे मनुष्यका अन्तःकरण पवित्र हो जाता है । उसे कभी दुर्गति नहीं प्राप्त होती, वह उत्तम सिद्धि पा लेता है ॥ ४२ ॥

पृष्ठ 573

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जम्बूमार्गादुपावृत्य गच्छेत् तन्दुलिकाश्रमम् ।

न दुर्गतिमवाप्नोति ब्रह्मलोकं च गच्छति ॥ ४३ ॥

जम्बूमार्गसे लौटकर मनुष्य तन्दुलिकाश्रमको जाय । इससे वह दुर्गतिमें नहीं पड़ता और अन्तमें ब्रह्मलोकको चला जाता है ॥ ४३ ॥

आगस्त्यं सर आसाद्य पितृदेवार्चने रतः ।

त्रिरात्रोपोषितो राजन्नग्निष्टोमफलं लभेत् ॥ ४४ ॥

राजन्! जो अगस्त्यसरोवर जाकर देवताओं और पितरोंके पूजनमें तत्पर हो तीन रात उपवास करता है, वह अग्निष्टोमयज्ञका फल पाता है ॥ ४४ ॥

शाकवृत्तिः फलैर्वापि कौमारं विन्दते परम् ।

कण्वाश्रमं ततो गच्छेच्छ्रीजुष्टं लोकपूजितम् ॥ ४५ ॥

जो शाकाहार या फलाहार करके वहाँ रहता है, वह परम उत्तम कुमारलोक ( कार्तिकेयके लोक ) -में जाता है । वहाँसे लोकपूजित कण्वके आश्रममें जाय, जो भगवती लक्ष्मीके द्वारा सेवित है ॥ ४५ ॥

धर्मारण्यं हि तत् पुण्यमाद्यं च भरतर्षभ ।

यत्र प्रविष्टमात्रो वै सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ४६ ॥

भरतश्रेष्ठ! वह धर्मारण्य कहलाता है, उसे परम पवित्र एवं आदितीर्थ माना गया है ।

उसमें प्रवेश करनेमात्रसे मनुष्य सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है ॥

अर्चयित्वा पितॄन् देवान् नियतो नियताशनः ।

सर्वकामसमृद्धस्य यज्ञस्य फलमश्नुते ॥ ४७ ॥

जो वहाँ नियमपूर्वक मिताहारी होकर देवता और पितरोंकी पूजा करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंसे सम्पन्न यज्ञका फल पाता है ॥ ४७ ॥

प्रदक्षिणं ततः कृत्वा ययातिपतनं व्रजेत् ।

हयमेधस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति तत्र वै ॥ ४८ ॥

तदनन्तर उस तीर्थकी परिक्रमा करके वहाँसे ययातिपतन नामक तीर्थमें जाय । वहाँ जानेसे यात्रीको अवश्य ही अश्वमेधयज्ञका फल मिलता है ॥ ४८ ॥

महाकालं ततो गच्छेन्नियतो नियताशनः ।

कोटितीर्थमुपस्पृश्य हयमेधफलं लभेत् ॥ ४ ९ ॥

वहाँसे महाकालतीर्थको जाय । वहाँ नियम- पूर्वक रहकर नियमित भोजन करे । वहाँ कोटितीर्थमें आचमन ( एवं स्नान) करनेसे अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है ॥ ४ ९ ॥

ततो गच्छेत धर्मज्ञः स्थाणोस्तीर्थमुमापतेः ।

नाम्ना भद्रवटं नाम त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ॥ ५० ॥

वहाँसे धर्मज्ञ पुरुष उमावल्लभ भगवान् स्थाणु ( शिव ) के उस तीर्थमें जाय, जो तीनों लोकोंमें ' भद्रवट ' के नामसे प्रसिद्ध है ॥ ५० ॥

पृष्ठ 574

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तत्राभिगम्य चेशानं गोसहस्रफलं लभेत् ।

महादेवप्रसादाच्च गाणपत्यं च विन्दति ॥ ५१ ॥

समृद्धमसपत्नं च श्रिया युक्तं नरोत्तमः । वहाँ भगवान् शिवका निकटसे दर्शन करके नरश्रेष्ठ यात्री एक हजार गोदानका फल पाता है और महादेवजीके प्रसादसे वह गणोंका आधिपत्य प्राप्त कर लेता है, जो आधिपत्य भारी समृद्धि और लक्ष्मीसे सम्पन्न तथा शत्रुजनित बाधासे रहित होता है ॥ ५१३ ॥

नर्मदां तु समासाद्य नदीं त्रैलोक्यविश्रुताम् ॥ ५२ ॥

तर्पयित्वा पितॄन् देवानग्निष्टोमफलं लभेत् । वहाँसे त्रिभुवनविख्यात नर्मदा नदीके तटपर जाकर देवताओं और पितरोंका तर्पण करनेसे अग्निष्टोम- यज्ञका फल प्राप्त होता है ॥ ५२३ ॥

दक्षिणं सिन्धुमासाद्य ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः ॥ ५३ ॥

अग्निष्टोममवाप्नोति विमानं चाधिरोहति । इन्द्रियोंको काबूमें रखकर ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए दक्षिण समुद्रकी यात्रा करनेसे मनुष्य अग्निष्टोमयज्ञका फल और विमानपर बैठनेका सौभाग्य पाता है ॥ ५३३ ॥

चर्मण्वतीं समासाद्य नियतो नियताशनः ।

रन्तिदेवाभ्यनुज्ञातमग्निष्टोमफलं लभेत् ॥ ५४ ॥

इन्द्रियसंयम या शौच - संतोष आदिके पालनपूर्वक नियमित आहारका सेवन करते हुए चर्मण्वती ( चंबल ) नदीमें स्नान आदि करनेसे राजा रन्तिदेवद्वारा अनुमोदित अग्निष्टोमयज्ञका फल प्राप्त होता है ॥ ५४ ॥

ततो गच्छेत धर्मज्ञ हिमवत्सुतमर्बुदम् ।

पृथिव्यां यत्र वै छिद्रं पूर्वमासीद् युधिष्ठिर ॥ ५५ ॥

धर्मज्ञ युधिष्ठिर! वहाँसे आगे हिमालयपुत्र अर्बुद ( आबू) - की यात्रा करे, जहाँ पहले पृथ्वीमें विवर था ॥ ५५ ॥

तत्राश्रमो वसिष्ठस्य त्रिषु लोकेषु विश्रुतः ।

तत्रोष्य रजनीमेकां गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ५६ ॥

वहाँ महर्षि वसिष्ठका त्रिलोकविख्यात आश्रम है, जिसमें एक रात रहनेसे सहस्र गोदानका फल मिलता है ॥ ५६ ॥

पिङ्गतीर्थमुपस्पृश्य ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः ।

कपिलानां नरश्रेष्ठ शतस्य फलमश्नुते ॥ ५७ ॥

नरश्रेष्ठ! पिंगतीर्थमें स्नान एवं आचमन करके ब्रह्मचारी एवं जितेन्द्रिय मनुष्य सौ कपिलाओंके -दानका फल प्राप्त कर लेता है ॥ ५७ ॥

ततो गच्छेत राजेन्द्र प्रभासं तीर्थमुत्तमम् ।

पृष्ठ 575

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तत्र संनिहितों नित्यं स्वयमेव हुताशनः ॥ ५८ ॥

देवतानां मुखं वीर ज्वलनोऽनिलसारथिः । राजेन्द्र! तदनन्तर उत्तम प्रभासतीर्थमें जाय । वीर! उस तीर्थमें देवताओंके मुखस्वरूप भगवान् अग्निदेव, जिनके सारथि वायु हैं, सदा निवास करते हैं ॥ ५८३ ॥

तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा शुचिः प्रयतमानसः ॥ ५ ९ ॥ अग्निष्टोमातिरात्राभ्यां फलं प्राप्नोति मानवः । उस तीर्थमें स्नान करके शुद्ध एवं संयत चित्त हो मानव अतिरात्र और अग्निष्टोम यज्ञोंका फल पाता है ॥ ५ ९ ॥ ततो गत्वा सरस्वत्याः सागरस्य च संगमे ॥ ६० ॥

गोसहस्रफलं तस्य स्वर्गलोकं च विन्दति ।

प्रभया दीप्यते नित्यमग्निवद् भरतर्षभ ॥ ६१ ॥

तदनन्तर सरस्वती और समुद्रके संगममें जाकर स्नान करनेसे मनुष्य सहस्र गोदानका फल और स्वर्गलोक पाता है । भरतश्रेष्ठ! वह पुण्यात्मा पुरुष अपने तेजसे सदा अग्निकी भाँति प्रकाशित होता है ॥ ६०-६१ ॥

तीर्थे सलिलराजस्य स्नात्वा प्रयतमानसः ।

त्रिरात्रमुषितः स्नातस्तर्पयेत् पितृदेवताः ॥ ६२ ॥

मनुष्य शुद्धचित्त हो जलोंके स्वामी वरुणके तीर्थ ( समुद्र ) में स्नान करके वहाँ तीन रात रहे और प्रतिदिन नहाकर देवताओं तथा पितरोंका तर्पण करे ॥ ६२ ॥

प्रभासते यथा सोमः सोऽश्वमेधं च विन्दति ।

वरदानं ततो गच्छेत् तीर्थं भरतसत्तम ॥ ६३ ॥

ऐसा करनेवाला यात्री चन्द्रमाके समान प्रकाशित होता है । साथ ही उसे अश्वमेधयज्ञका फल मिलता है । भरतश्रेष्ठ! वहाँसे वरदानतीर्थमें जाय ॥ ६३ ॥

विष्णोर्दुर्वाससा यत्र वरो दत्तो युधिष्ठिर ।

वरदाने नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ६४ ॥

युधिष्ठिर! यह वह स्थान है, जहाँ मुनिवर दुर्वासाने श्रीकृष्णको वरदान दिया था ।

वरदानतीर्थमें स्नान करनेसे मानव सहस्र गोदानका फल पाता है ॥

ततो द्वारवतीं गच्छेन्नियतो नियताशनः ।

पिण्डारके नरः स्नात्वा लभेद् बहु सुवर्णकम् ॥ ६५ ॥

वहाँसे तीर्थयात्रीको द्वारका जाना चाहिये । वह नियमसे रहे और नियमित भोजन करे ।

पिण्डारकतीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्यको अधिकाधिक सुवर्णकी प्राप्ति होती है ॥ ६५ ॥

तस्मिंस्तीर्थे महाभाग पद्मलक्षणलक्षिताः ।

अद्यापि मुद्रा दृश्यन्ते तदद्भुतमरिंदम ॥ ६६ ॥

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महाभाग! उस तीर्थमें आज भी कमलके चिह्नोंसे चिह्नित सुवर्णमुद्राएँ देखी जाती हैं ।

शत्रुदमन! यह एक अद्भुत बात है ॥ ६६ ॥

त्रिशूलाङ्कानि पद्मानि दृश्यन्ते कुरुनन्दन ।

महादेवस्य सांनिध्यं तत्र वै पुरुषर्षभ ॥ ६७ ॥

पुरुषरत्न कुरुनन्दन! जहाँ त्रिशूलसे अंकित कमल दृष्टिगोचर होते हैं । वहीं महादेवजीका निवास है ॥ ६७ ॥

सागरस्य च सिन्धोश्च संगमं प्राप्य भारत ।

तीर्थे सलिलराजस्य स्नात्वा प्रयतमानसः ॥ ६८ ॥

तर्पयित्वा पितॄन् देवानृषींश्च भरतर्षभ ।

प्राप्नोति वारुणं लोकं दीप्यमानं स्वतेजसा ॥ ६ ९ ॥

भारत! सतर और सिंधु नदीके संगममें जाकर वरुणतीर्थमें स्नान करके शुद्धचित्त हो देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंका तर्पण करे। भरतकुलतिलक! ऐसा करनेसे मनुष्य दिव्य दीप्तिसे देदीप्यमान वरुणलोकको प्राप्त होता है ॥ ६८-६९ ॥

शङ्कुकर्णेश्वरं देवमर्चयित्वा युधिष्ठिर ।

अश्वमेधाद् दशगुणं प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ ७० ॥

युधिष्ठिर! वहाँ शंकुकर्णेश्वर शिवकी पूजा करनेसे मनीषी पुरुष अश्वमेधसे दस गुने पुण्यफलकी प्राप्ति बताते हैं ॥ ७० ॥

प्रदक्षिणमुपावृत्य गच्छेत भरतर्षभ ।

तीर्थं कुरुवरश्रेष्ठ त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ॥ ७१ ॥

दमीति नाम्ना विख्यातं सर्वपापप्रणाशनम् ।

तत्र ब्रह्मादयो देवा उपासन्ते महेश्वरम् ॥ ७२ ॥

भरतवंशावतंस कुरुश्रेष्ठ! उनकी परिक्रमा करके त्रिभुवन-विख्यात ' दमी ' नामक तीर्थमें जाय, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है । वहाँ ब्रह्मा आदि देवता भगवान् महेश्वरकी उपासना करते हैं ॥ ७१-७२ ॥

तत्र स्नात्वा च पीत्वा च रुद्रं देवगणैर्वृतम् ।

जन्मप्रभृति यत् पापं तत् स्नातस्य प्रणश्यति ॥ ७३ ॥

वहाँ स्नान, जलपान और देवताओंसे घिरे हुए रुद्रदेवका दर्शन- पूजन करनेसे स्नानकर्ता पुरुषके जन्मसे लेकर वर्तमान समयतकके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं ॥

दमी चात्र नरश्रेष्ठ सर्वदेवैरभिष्टुतः ।

तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र हयमेधमवाप्नुयात् ॥ ७४ ॥

नरश्रेष्ठ! भगवान् दमीका सभी देवता स्तवन करते हैं । पुरुषसिंह! वहाँ स्नान करनेसे अश्वमेधयज्ञके फलकी प्राप्ति होती है ॥ ७४ ॥

गत्वा यत्र महाप्राज्ञ विष्णुना प्रभविष्णुना ।

पृष्ठ 577

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पुरा शौचं कृतं राजन् हत्वा दैतेयदानवान् ॥ ७५ ॥

महाप्राज्ञ नरेश! सर्वशक्तिमान् भगवान् विष्णुने पहले दैत्यों - दानवोंका वध करके इसी तीर्थमें जाकर ( लोकसंग्रहके लिये ) शुद्धि की थी ॥ ७५ ॥

ततो गच्छेत धर्मज्ञ वसोर्धारामभिष्टुताम् ।

गमनादेव तस्यां हि हयमेधफलं लभेत् ॥ ७६ ॥

धर्मज्ञ! वहाँसे वसुधारातीर्थमें जाय, जो सबके द्वारा प्रशंसित है । वहाँ जानेमात्रसे अश्वमेधयज्ञका फल मिलता है ॥ ७६ ॥

स्नात्वा कुरुवरश्रेष्ठ प्रयतात्मा समाहितः ।

तर्प्य देवान् पितॄंश्चैव विष्णुलोके महीयते ॥ ७७ ॥

कुरुश्रेष्ठ! वहाँ स्नान करके शुद्ध और समाहितचित्त होकर देवताओं और पितरोंका तर्पण करनेसे मनुष्य विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ ७७ ॥

तीर्थे चात्र सरः पुण्यं वसूनां भरतर्षभ ।

तत्र स्नात्वा च पीत्वा च वसूनां सम्मतो भवेत् ॥ ७८ ॥

सिन्धूत्तममिति ख्यातं सर्वपापप्रणाशनम् ।

तत्र स्नात्वा नरश्रेष्ठ लभेद् बहु सुवर्णकम् ॥ ७९ ॥

भरतश्रेष्ठ! उस तीर्थमें वसुओंका पवित्र सरोवर है । उसमें स्नान और जलपान करनेसे मनुष्य वसु देवताओंका प्रिय होता है । नरश्रेष्ठ! वहीं सिन्धूत्तम नामसे प्रसिद्ध तीर्थ है, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है । उसमें स्नान करनेसे प्रचुर स्वर्णराशिकी प्राप्ति होती है ॥ ७८-७९ ॥

भद्रतुङ्गं समासाद्य शुचिः शीलसमन्वितः ।

ब्रह्मलोकमवाप्नोति गतिं च परमां व्रजेत् ॥ ८० ॥

भद्रतुंगतीर्थमें जाकर पवित्र एवं सुशील पुरुष ब्रह्मलोकमें जाता और वहाँ उत्तम गति पाता है ॥ ८० ॥

कुमारिकाणां शक्रस्य तीर्थं सिद्धनिषेवितम् ।

तत्र स्नात्वा नरः क्षिप्रं स्वर्गलोकमवाप्नुयात् ॥ ८१ ॥

शक्रकुमारिकातीर्थ सिद्ध पुरुषोंद्वारा सेवित है । वहाँ स्नान करके मनुष्य शीघ्र ही स्वर्गलोक प्राप्त कर लेता है ॥ ८१ ॥

रेणुकायाश्च तत्रैव तीर्थं सिद्धनिषेवितम् ।

तत्र स्नात्वा भवेद् विप्रो निर्मलश्चन्द्रमा यथा ॥ ८२ ॥

वहीं सिद्धसेवित रेणुकातीर्थ है, जिसमें स्नान करके ब्राह्मण चन्द्रमाके समान निर्मल होता है ॥ ८२ ॥

अथ पञ्चनदं गत्वा नियतो नियताशनः ।

पञ्चयज्ञानवाप्नोति क्रमशो येऽनुकीर्तिताः ॥ ८३ ॥

पृष्ठ 578

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 578 का मूल पृष्ठ
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तदनन्तर शौच- संतोष आदि नियमोंका पालन और नियमित भोजन करते हुए पंचनदतीर्थमें जाकर मनुष्य पंचमहायज्ञोंका फल पाता है जो कि शास्त्रोंमें क्रमशः बतलाये गये हैं ॥ ८३ ॥

ततो गच्छेत राजेन्द्र भीमायाः स्थानमुत्तमम् ।

तत्र स्नात्वा तु योन्यां वै नरो भरतसत्तम ॥ ८४ ॥

देव्याः पुत्रो भवेद् राजंस्तप्तकुण्डलविग्रहः ।

गवां शतसहस्रस्य फलं प्राप्नोति मानवः ॥ ८५ ॥

राजेन्द्र! वहाँसे भीमाके उत्तम स्थानकी यात्रा करे! भरतश्रेष्ठ! वहाँ योनितीर्थमें स्नान करके मनुष्य देवीका पुत्र होता है। उसकी अंगकान्ति तपाये हुए सुवर्णकुण्डलके समान होती है । राजन्! उस तीर्थके सेवनसे मनुष्यको सहस्र गोदानका फल मिलता है ॥ ८४-८५ ॥

श्रीकुण्डं तु समासाद्य त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ।

पितामहं नमस्कृत्य गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ८६ ॥

त्रिभुवनविख्यात श्रीकुण्डमें जाकर ब्रह्माजीको नमस्कार करनेसे सहस्र गोदानका फल प्राप्त होता है ॥

ततो गच्छेत धर्मज्ञ विमलं तीर्थमुत्तमम् ।

अद्यापि यत्र दृश्यन्ते मत्स्याः सौवर्णराजताः ॥ ८७ ॥

धर्मज्ञ! वहाँसे परम उत्तम विमलतीर्थकी यात्रा करे, जहाँ आज भी सोने और चाँदीके रंगकी मछलियाँ दिखायी देती हैं ॥ ८७ ॥

तत्र स्नात्वा नरः क्षिप्रं वासवं लोकमाप्नुयात् ।

सर्वपापविशुद्धात्मा गच्छेत परमां गतिम् ॥ ८८ ॥

उसमें स्नान करनेसे मनुष्य शीघ्र ही इन्द्रलोकको प्राप्त होता है और सब पापोंसे शुद्ध हो परमगति प्राप्त कर लेता है ॥ ८८ ॥

वितस्तां च समासाद्य संतर्प्य पितृदेवताः ।

नरः फलमवाप्नोति वाजपेयस्य भारत ॥ ८ ९ ॥

भारत! वितस्तातीर्थ ( झेलम ) -में जाकर वहाँ देवताओं और पितरोंका तर्पण करनेसे मनुष्यको वाजपेययज्ञका फल प्राप्त होता है ॥ ८९ ॥

काश्मीरेष्वेव नागस्य भवनं तक्षकस्य च ।

वितस्ताख्यमिति ख्यातं सर्वपापप्रमोचनम् ॥ ९० ॥

काश्मीरमें ही नागराज तक्षकका वितस्ता नामसे प्रसिद्ध भवन है, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है ॥ ९ ० ॥

तत्र स्नात्वा नरो नूनं वाजपेयमवाप्नुयात् ।

सर्वपापविशुद्धात्मा गच्छेच्च परमां गतिम् ॥ ९ १ ॥

पृष्ठ 579

महाभारत — खण्ड २, पृष्ठ 579 का मूल पृष्ठ
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वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य निश्चय ही वाजपेययज्ञका फल प्राप्त करता है और सब पापोंसे शुद्ध हो उत्तम गतिका भागी होता है ॥ ९ १ ॥

ततो गच्छेत वडवां त्रिषु लोकेषु विश्रुताम् ।

पश्चिमायां तु संध्यायामुपस्पृश्य यथाविधि ॥ ९ २ ॥

चरुं सप्तार्चिषे राजन् यथाशक्ति निवेदयेत् ।

पितॄणामक्षयं दानं प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ ९ ३ ॥

वहाँसे त्रिभुवनविख्यात वडवातीर्थको जाय । वहाँ पश्चिम संध्याके समय विधिपूर्वक स्नान और आचमन करके अग्निदेवको यथाशक्ति चरु निवेदन करे । वहाँ पितरोंके लिये दिया हुआ दान अक्षय होता है; ऐसा मनीषी पुरुष कहते हैं ॥ ९ २ - ९ ३ ॥

ऋषयः पितरो देवा गन्धर्वाप्सरसां गणाः ।

गुह्यकाः किन्नरा यक्षाः सिद्धा विद्याधरा नराः ॥ ९ ४ ॥

राक्षसा दितिजा रुद्रा ब्रह्मा च मनुजाधिप ।

नियतः परमां दीक्षामास्थायाब्दसहस्रिकीम् ॥ ९ ५ ॥

विष्णोः प्रसादनं कुर्वंश्चरुं च श्रपयंस्तथा ।

सप्तभिः सप्तभिश्चैव ऋग्भिस्तुष्टाव केशवम् ॥ ९ ६ ॥

राजन्! वहाँ देवता, ऋषि, पितर, गन्धर्व, अप्सरा, गुह्यक, किन्नर, यक्ष, सिद्ध, विद्याधर, मनुष्य, राक्षस, दैत्य, रुद्र और ब्रह्मा- इन सबने नियमपूर्वक सहस्र वर्षोंके लिये उत्तम दीक्षा ग्रहण करके भगवान् विष्णुकी प्रसन्नताके लिये चरु अर्पण किया । ऋग्वेदके सात - सात मन्त्रोंद्वारा सबने चरुकी सात- सात आहुतियाँ दीं और भगवान् केशवको प्रसन्न किया ॥ ९ ४ -९ ६ ॥

ददावष्टगुणैश्वर्यं तेषां तुष्टस्तु केशवः ।

यथाभिलषितानन्यान् कामान् दत्त्वा महीपते ॥ ९ ७ ॥

तत्रैवान्तर्दधे देवो विद्युदध्रेषु वै यथा ।

नाम्ना सप्तचरुं तेन ख्यातं लोकेषु भारत ॥ ९ ८ ॥

गवां शतसहस्रेण राजसूयशतेन च ।

अश्वमेधसहस्रेण श्रेयान् सप्तार्चिषे चरुः ॥ ९९ ॥

ततो निवृत्तो राजेन्द्र रुद्रं पदमथाविशेत् ।

अर्चयित्वा महादेवमश्वमेधफलं लभेत् ॥ १०० ॥

उनपर प्रसन्न होकर भगवान्‌ने उन्हें अष्टगुण- ऐश्वर्य अर्थात् अणिमा आदि आठ सिद्धियाँ प्रदान कीं । महाराज! तत्पश्चात् उनकी इच्छाके अनुसार अन्यान्य वर देकर भगवान् केशव वहाँसे उसी प्रकार अन्तर्धान हो गये, जैसे मेघोंकी घटामें बिजली तिरोहित हो जाती है । भारत! इसीलिये वह तीर्थ तीनों लोकोंमें सप्तचरुके नामसे विख्यात है । वहाँ अग्निके लिये दिया हुआ चरु एक लाख गोदान, सौ` राजसूययज्ञ और सहस्र अश्वमेधयज्ञसे

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भी अधिक कल्याणकारी है । राजेन्द्र! वहाँसे लौटकर रुद्रपद नामक तीर्थमें जाय । वहाँ महादेवजीकी पूजा करके तीर्थयात्री पुरुष अश्वमेधका फल पाता है ॥ ९७–१०० ॥

मणिमन्तं समासाद्य ब्रह्मचारी समाहितः ।

एकरात्रोषितो राजन्नग्निष्टोमफलं लभेत् ॥ १०१ ॥

राजन्! एकाग्रचित्त हो ब्रह्मचर्य पालनपूर्वक मणिमान् तीर्थमें जाय और वहाँ एक रात निवास करे । इससे अग्निष्टोमयज्ञका फल प्राप्त होता है ॥ १०१ ॥

अथ गच्छेत राजेन्द्र देविकां लोकविश्रुताम् ।

प्रसूतिर्यत्र विप्राणां श्रूयते भरतर्षभ ॥ १०२ ॥

भरतवंशशिरोमणे! राजेन्द्र! वहाँसे लोकविख्यात देविकातीर्थकी यात्रा करे, जहाँ ब्राह्मणोंकी उत्पत्ति सुनी जाती है ॥ १०२ ॥

त्रिशूलपाणेः स्थानं च त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ।

देविकायां नरः स्नात्वा समभ्यर्च्य महेश्वरम् ॥ १०३ ॥

यथाशक्ति चरुं तत्र निवेद्य भरतर्षभ ।

सर्वकामसमृद्धस्य यज्ञस्य लभते फलम् ॥ १०४ ॥

वहाँ त्रिशूलपाणि भगवान् शिवका स्थान है, जिसकी तीनों लोकोंमें प्रसिद्धि है । देविकामें स्नान करके भगवान् महेश्वरका पूजन और उन्हें यथाशक्ति चरु निवेदन करके सम्पूर्ण कामनाओंसे समृद्ध यज्ञके फलकी प्राप्ति होती है ॥ १०३-१०४ ॥

कामाख्यं तत्र रुद्रस्य तीर्थं देवनिषेवितम् ।

तत्र स्नात्वा नरः क्षिप्रं सिद्धिं प्राप्नोति भारत ॥ १०५ ॥

वहाँ भगवान् शंकरका देवसेवित कामतीर्थ है । भारत! उसमें स्नान करके मनुष्य शीघ्र मनोवाञ्छित सिद्धि प्राप्त कर लेता है ॥ १०५ ॥

यजनं याजनं चैव तथैव ब्रह्म बालुकाम् ।

पुष्पाम्भश्च उपस्पृश्य न शोचेन्मरणं गतः ॥ १०६ ॥

वहाँ यजन, याजन तथा वेदोंका स्वाध्याय करके अथवा वहाँकी बालू, पुष्प एवं जलका स्पर्श करके मृत्युको प्राप्त हुआ पुरुष शोकसे पार हो जाता है ॥ १०६ ॥

अर्धयोजनविस्तारा पञ्चयोजनमायता ।

एतावती वेदिका तु पुण्या देवर्षिसेविता ॥ १०७ ॥

वहाँ पाँच योजन लंबी और आधा योजन चौड़ी पवित्र वेदिका है, जिसका देवता तथा ऋषि- मुनि भी सेवन करते हैं ॥ १०७ ॥

ततो गच्छेत धर्मज्ञ दीर्घसत्रं यथाक्रमम् ।

तत्र ब्रह्मादयो देवाः सिद्धाश्च परमर्षयः ॥ १०८ ॥

धर्मज्ञ! वहाँसे क्रमशः ‘ दीर्घसत्र' नामक तीर्थमें जाय । वहाँ ब्रह्मा आदि देवता, सिद्ध और महर्षि रहते हैं ॥