श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 631–640
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 631–640
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पञ्चाशीतितमोऽध्यायः गंगासागर, अयोध्या, चित्रकूट, प्रयाग आदि विभिन्न तीर्थोंकी महिमाका वर्णन और गंगाका माहात्म्य पुलस्त्य उवाच
अथ संध्यां समासाद्य संवेद्यं तीर्थमुत्तमम् ।
उपस्पृश्य नरो विद्यां लभते नात्र संशयः ॥ १ ॥
पुलस्त्यजी कहते हैं- भीष्म! तदनन्तर प्रातः -संध्याके समय उत्तम संवेद्यतीर्थमें जाकर स्नान करनेसे मनुष्य विद्यालाभ करता है; इसमें संशय नहीं है ॥ १ ॥
रामस्य च प्रभावेण तीर्थं राजन् कृतं पुरा ।
तल्लौहित्यं समासाद्य विन्द्याद् बहु सुवर्णकम् ॥ २ ॥
राजन्! पूर्वकालमें श्रीरामके प्रभावसे जो तीर्थ प्रकट हुआ उसका नाम लौहित्यतीर्थ है । उसमें जाकर स्नान करनेसे मनुष्यको बहुत - सी सुवर्णराशि प्राप्त होती है ॥ २ ॥
करतोयां समासाद्य त्रिरात्रोपोषितो नरः ।
अश्वमेधमवाप्नोति प्रजापतिकृतो विधिः ॥ ३ ॥
करतोयामें जाकर स्नान करके तीन रात उपवास करनेवाला मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल पाता है । यह ब्रह्माजीद्वारा की हुई व्यवस्था है ॥ ३ ॥
गङ्गायास्तत्र राजेन्द्र सागरस्य च संगमे ।
अश्वमेधं दशगुणं प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ ४ ॥
राजेन्द्र! वहाँ गंगासागरसंगममें स्नान करनेसे दस अश्वमेधयज्ञोंके फलकी प्राप्ति होती है, ऐसा मनीषी पुरुष कहते हैं ॥ ४ ॥
गङ्गायास्त्वपरं पारं प्राप्य यः स्नाति मानवः ।
त्रिरात्रमुषितो राजन् सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ५ ॥
राजन्! जो मानव गंगासागरसंगममें गंगाके दूसरे पार पहुँचकर स्नान करता है और तीन रात वहाँ निवास करता है, वह सब पापोंसे छूट जाता है ॥ ५ ॥
ततो वैतरणीं गच्छेत् सर्वपापप्रमोचनीम् ।
विरजं तीर्थमासाद्य विराजति यथा शशी ॥ ६ ॥
तदनन्तर सब पापोंसे छुड़ानेवाली वैतरणीकी यात्रा करे । वहाँ विरजतीर्थमें जाकर स्नान करनेसे मनुष्य चन्द्रमाके समान प्रकाशित होता है ॥ ६ ॥
प्रतरेच्च कुलं पुण्यं सर्वपापं व्यपोहति ।
गोसहस्रफलं लब्ध्वा पुनाति स्वकुलं नरः ॥ ७ ॥
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उसका पुण्यमय कुल संसारसागरसे तर जाता है । वह अपने सब पापोंका नाश कर देता है और सहस्र गोदानका फल प्राप्त करके अपने कुलको पवित्र कर देता है ॥ ७ ॥
शोणस्य ज्योतिरथ्यायाः संगमे नियतः शुचिः ।
तर्पयित्वा पितॄन् देवानग्निष्टोमफलं लभेत् ॥ ८ ॥
शोण और ज्योतिरथ्याके संगममें स्नान करके जितेन्द्रिय एवं पवित्र पुरुष यदि देवताओं और पितरोंका तर्पण करे तो वह अग्निष्टोमयज्ञका फल पाता है ॥ ८ ॥
शोणस्य नर्मदायाश्च प्रभवे कुरुनन्दन ।
वंशगुल्म उपस्पृश्य वाजिमेधफलं लभेत् ॥ ९ ॥
कुरुनन्दन! शोण और नर्मदाके उत्पत्तिस्थान वंशगुल्मतीर्थमें स्नान करके तीर्थयात्री अश्वमेधयज्ञका फल पाता है ॥ ९ ॥
ऋषभं तीर्थमासाद्य कोसलायां नराधिप ।
वाजपेयमवाप्नोति त्रिरात्रोपोषितो नरः ॥ १० ॥
गोसहस्रफलं विन्द्यात् कुलं चैव समुद्धरेत् । नरेश्वर! कोसला ( अयोध्या ) - में ऋषभतीर्थमें जाकर स्नानपूर्वक तीन रात उपवास करनेवाला मानव वाजपेययज्ञका फल पाता है । इतना ही नहीं, वह सहस्र गोदानका फल पाता और अपने कुलका भी उद्धार कर देता है ॥ १०३ ॥
कोसलां तु समासाद्य कालतीर्थमुपस्पृशेत् ॥ ११ ॥
वृषभैकादशफलं लभते नात्र संशयः ।
पुष्पवत्यामुपस्पृश्य त्रिरात्रोपोषितो नरः ॥ १२ ॥
गोसहस्रफलं लब्ध्वा पुनाति स्वकुलं नृप । कोसला नगरी ( अयोध्या ) - में जाकर कालतीर्थमें स्नान करे । ऐसा करनेसे ग्यारह वृषभ-दानका फल मिलता है, इसमें संशय नहीं है । पुष्पवतीमें स्नान करके तीन रात उपवास करनेवाला मनुष्य सहस्र गोदानका फल पाता और अपने कुलको पवित्र कर देता है ॥ ११-१२ ॥ ततो बदरिकातीर्थं स्नात्वा भरतसत्तम ॥ १३ ॥
दीर्घमायुरवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति । भरतकुलभूषण! तदनन्तर बदरिकातीर्थमें स्नान करके मनुष्य दीर्घायु पाता और स्वर्गलोकमें जाता है ॥ अथ चम्पां समासाद्य भागीरथ्यां कृतोदकः ॥ १४ ॥
दण्डाख्यमभिगम्यैव गोसहस्रफलं लभेत् । तत्पश्चात् चम्पामें जाकर भागीरथीमें तर्पण करे और दण्ड नामक तीर्थमें जाकर सहस्र गोदानका फल प्राप्त करे ॥ १४ ॥
लपेटिकां ततो गच्छेत् पुण्यां पुण्योपशोभिताम् ॥ १५ ॥
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वाजपेयमवाप्नोति देवैः सर्वैश्च पूज्यते । तदनन्तर पुण्यशोभिता पुण्यमयी लपेटिकामें जाकर स्नान करे । ऐसा करनेसे तीर्थयात्री वाजपेययज्ञका फल पाता और सम्पूर्ण देवताओंद्वारा पूजित होता है ॥ १५३ ॥
ततो महेन्द्रमासाद्य जामदग्न्यनिषेवितम् ॥ १६ ॥
रामतीर्थे नरः स्नात्वा अश्वमेधफलं लभेत् । इसके बाद परशुरामसेवित महेन्द्रपर्वतपर जाकर वहाँके रामतीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्यको अश्वमेधयज्ञका फल मिलता है ॥ १६३ ॥
मतङ्गस्य तु केदारस्तत्रैव कुरुनन्दन ॥ १७ ॥
तत्र स्नात्वा कुरुश्रेष्ठ गोसहस्रफलं लभेत् । कुरुश्रेष्ठ कुरुनन्दन! वहीं मतंगका केदार है, उसमें स्नान करनेसे मनुष्यको सहस्र गोदानका फल मिलता है ॥ १७३ ॥
श्रीपर्वतं समासाद्य नदीतीरमुपस्पृशेत् ॥ १८ ॥
अश्वमेधमवाप्नोति पूजयित्वा वृषध्वजम् । श्रीपर्वतपर जाकर वहाँकी नदीके तटपर स्नान करे । वहाँ भगवान् शंकरकी पूजा करके मनुष्यको अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है ॥ १८३ ॥
श्रीपर्वते महादेवो देव्या सह महाद्युतिः ॥ १९ ॥
न्यवसत् परमप्रीतो ब्रह्मा च त्रिदशैः सह ।
तत्र देवहदे स्नात्वा शुचिः प्रयतमानसः ॥ २० ॥
अश्वमेधमवाप्नोति परां सिद्धिं च गच्छति ।
ऋषभं पर्वतं गत्वा पाण्ड्ये दैवतपूजितम् ।
वाजपेयमवाप्नोति नाकपृष्ठे च मोदते ॥ २१ ॥
श्रीपर्वतपर देवी पार्वतीके साथ महातेजस्वी महादेवजी बड़ी प्रसन्नताके साथ निवास करते हैं । देवताओंके साथ ब्रह्माजी भी वहाँ रहते हैं । वहाँ देवकुण्डमें स्नान करके पवित्र हो जितात्मा पुरुष अश्वमेधयज्ञका फल पाता और परम सिद्धि लाभ करता है । पाड्यदेशमें देवपूजित ऋषभ पर्वतपर जाकर तीर्थयात्री वाजपेययज्ञका फल पाता और स्वर्गलोकमें आनन्दित होता है ॥ १ ९ –२१ ॥
ततो गच्छेत कावेरीं वृतामप्सरसां गणैः ।
तत्र स्नात्वा नरो राजन् गोसहस्रफलं लभेत् ॥ २२ ॥
राजन्! तदनन्तर अप्सराओंसे आवृत कावेरी नदीकी यात्रा करे । वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य सहस्र गोदानका फल पाता है ॥ २२ ॥
ततस्तीरे समुद्रस्य कन्यातीर्थमुपस्पृशेत् ।
तत्रोपस्पृश्य राजेन्द्र सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ २३ ॥
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राजेन्द्र! तत्पश्चात् समुद्रके तटपर विद्यमान कन्यातीर्थ ( कन्याकुमारी ) - में जाकर स्नान करे । उस तीर्थमें स्नान करते ही मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ २३ ॥
अथ गोकर्णमासाद्य त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ।
समुद्रमध्ये राजेन्द्र सर्वलोकनमस्कृतम् ॥ २४ ॥
यत्र ब्रह्मादयो देवा ऋषयश्च तपोधनाः ।
भूतयक्षपिशाचाश्च किंनराः समहोरगाः ॥ २५ ॥
सिद्धचारणगन्धर्वमानुषाः पन्नगास्तथा ।
सरितः सागराः शैला उपासन्त उमापतिम् ॥ २६ ॥
महाराज! इसके बाद समुद्रके मध्यमें विद्यमान त्रिभुवनविख्यात अखिल लोकवन्दित गोकर्णतीर्थमें जाकर स्नान करे । जहाँ ब्रह्मा आदि देवता, तपोधन महर्षि, भूत, यक्ष, पिशाच, किन्नर, महानाग, सिद्ध, चारण, गन्धर्व, मनुष्य, सर्प, नदी, समुद्र और पर्वत — ये सभी उमावल्लभ भगवान् शंकरकी उपासना करते हैं ॥ २४–२६ ॥
तत्रेशानं समभ्यर्च्य त्रिरात्रोपोषितो नरः ।
अश्वमेधमवाप्नोति गाणपत्यं च विन्दति ॥। २७ ॥
वहाँ भगवान् शिवकी पूजा करके तीन रात उपवास करनेवाला मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल पाता और गणपतिपद प्राप्त कर लेता है ॥ २७ ॥
उष्य द्वादशरात्रं तु पूतात्मा च भवेन्नरः ।
तत एव च गायत्र्याः स्थानं त्रैलोक्यपूजितम् ॥ २८ ॥
वहाँ बारह रात निवास करनेसे मनुष्यका अन्तःकरण पवित्र हो जाता है । वहीं गायत्रीका त्रिलोक - पूजित स्थान है ॥ २८ ॥
त्रिरात्रमुषितस्तत्र गोसहस्रफलं लभेत् ।
निदर्शनं च प्रत्यक्षं ब्राह्मणानां नराधिप ॥ २ ९ ॥
वहाँ तीन रात निवास करनेवाला पुरुष सहस्र गोदानका फल प्राप्त करता है । नरेश्वर! ब्राह्मणोंकी पहचानके लिये वहाँ प्रत्यक्ष उदाहरण है ॥ २ ९ ॥
गायत्रीं पठते यस्तु योनिसंकरजस्तथा ।
गाथा च गाथिका चापि तस्य सम्पद्यते नृप ॥ ३० ॥
राजन्! जो वर्णसंकर योनिमें उत्पन्न हुआ है, वह यदि गायत्रीमन्त्रका पाठ करता है तो उसके मुखसे वह गाथा या गीतकी तरह स्वर और वर्णोंके नियमसे रहित होकर निकलती है; अर्थात् वह गायत्रीका उच्चारण ठीक नहीं कर सकता ॥ ३० ॥
अब्राह्मणस्य सावित्रीं पठतस्तु प्रणश्यति । जो सर्वथा ब्राह्मण नहीं है, ऐसा मनुष्य यदि वहाँ गायत्रीमन्त्रका पाठ करे तो वहाँ वह मन्त्र लुप्त हो जाता है; अर्थात् उसे भूल जाता है ॥ ३० ॥
संवर्तस्य तु विप्रर्षेर्वापीमासाद्य दुर्लभाम् ॥ ३१ ॥
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रूपस्य भागी भवति सुभगश्च प्रजापते । राजन्! वहाँ ब्रह्मर्षि संवर्तकी दुर्लभ बावली है । उसमें स्नान करके मनुष्य सुन्दररूपका भागी और सौभाग्यशाली होता है ॥ ३१ ॥
ततो वेणां समासाद्य त्रिरात्रोपोषितो नरः ॥ ३२ ॥
मयूरहंससंयुक्तं विमानं लभते नरः । तदनन्तर वेणा नदीके तटपर जाकर तीन रात उपवास करनेवाला मनुष्य ( मृत्युके पश्चात्) मोर और हंसोंसे जुता हुआ विमानको प्राप्त करता है ॥ ३२ ॥
ततो गोदावरीं प्राप्य नित्यं सिद्धनिषेविताम् ॥ ३३ ॥
गवां मेधमवाप्नोति वासुकेर्लोकमुत्तमम् ।
वेणायाः संगमे स्नात्वा वाजिमेधफलं लभेत् ॥ ३४ ॥
तत्पश्चात् सदा सिद्ध पुरुषोंसे सेवित गोदावरीके तटपर जाकर स्नान करनेसे तीर्थयात्री गोमेधयज्ञका फल पाता और वासुकिके लोकमें जाता है । वेणासंगममें स्नान करके मनुष्य अश्वमेधयज्ञके फलका भागी होता है ॥
वरदासंगमे स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ।
ब्रह्मस्थानं समासाद्य त्रिरात्रोपोषितो नरः ॥ ३५ ॥
गोसहस्रफलं विन्द्यात् स्वर्गलोकं च गच्छति । वरदासंगमतीर्थमें स्नान करनेसे सहस्र गोदानका फल मिलता है । ब्रह्मस्थानमें जाकर तीन रात उपवास करनेवाला मनुष्य सहस्र गोदानका फल पाता और स्वर्गलोकमें जाता है ॥ ३५३ ॥
कुशप्लवनमासाद्य ब्रह्मचारी समाहितः ॥ ३६ ॥
त्रिरात्रमुषितः स्नात्वा अश्वमेधफलं लभेत् । कुशप्लवनतीर्थमें जाकर स्नान करके ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक एकाग्रचित्त हो तीन रात निवास करनेवाला पुरुष अश्वमेधयज्ञका फल पाता है ॥ ३६३ ॥
ततो देवह्रदेऽरण्ये कृष्णवेणाजलोद्भवे ॥ ३७ ॥
जातिस्मरह्रदे स्नात्वा भवेज्जातिस्मरो नरः । तदनन्तर कृष्णवेणाके जलसे उत्पन्न हुए रमणीय देवकुण्डमें, जिसे जातिस्मर ह्रद कहते हैं, स्नान करे । वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य जातिस्मर ( पूर्वजन्मकी बातोंको स्मरण करनेकी शक्तिवाला ) होता है ॥ ३७३ ॥
यत्र क्रतुशतैरिष्ट्वा देवराजो दिवं गतः ॥ ३८ ॥
अग्निष्टोमफलं विन्द्याद् गमनादेव भारत ।
सर्वदेवहदे स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ३ ९ ॥
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वहीं सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करके देवराज इन्द्र स्वर्गके सिंहासनपर आसीन हुए थे । भरतनन्दन! वहाँ जानेमात्रसे यात्री अग्निष्टोमयज्ञका फल पा लेता है । तत्पश्चात् सर्वदेवह्रदमें स्नान करनेसे सहस्र गोदानका फल मिलता है ॥ ३८-३९ ॥
ततो वापीं महापुण्यां पयोष्णीं सरितां वराम् ।
पितृदेवार्चनरतो गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ४० ॥
तदनन्तर परम पुण्यमयी वापी और सरिताओंमें श्रेष्ठ पयोष्णीमें जाकर स्नान करे और देवताओं तथा पितरोंके पूजनमें तत्पर रहे, ऐसा करनेसे तीर्थसेवीको सहस्र गोदानका फल मिलता है ॥ ४० ॥
दण्डकारण्यमासाद्य पुण्यं राजन्नुपस्पृशेत् ।
गोसहस्रफलं तस्य स्नातमात्रस्य भारत ॥ ४१ ॥
राजन्! भरतनन्दन! जो दण्डकारण्यमें जाकर स्नान करता है, उसे स्नान करनेमात्रसे सहस्र गोदानका फल प्राप्त होता है ॥ ४१ ॥
शरभङ्गाश्रमं गत्वा शुकस्य च महात्मनः ।
न दुर्गतिमवाप्नोति पुनाति च कुलं नरः ॥ ४२ ॥
शरभंग मुनि तथा महात्मा शुकके आश्रमपर जानेसे मनुष्य कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता और अपने कुलको पवित्र कर देता है ॥ ४२ ॥
ततः शूर्पारकं गच्छेज्जामदग्न्यनिषेवितम् ।
रामतीर्थे नरः स्नात्वा विन्द्याद् बहुसुवर्णकम् ॥ ४३ ॥
तदनन्तर परशुरामसेवित शूर्पारकतीर्थकी यात्रा करे । वहाँ रामतीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्यको प्रचुर सुवर्णराशिकी प्राप्ति होती है ॥ ४३ ॥
सप्तगोदावरे स्नात्वा नियतो नियताशनः ।
महत् पुण्यमवाप्नोति देवलोकं च गच्छति ॥ ४४ ॥
सप्तगोदावरतीर्थमें स्नान करके नियमपालनपूर्वक नियमित भोजन करनेवाला पुरुष महान् पुण्यलाभ करता और देवलोकमें जाता है ॥ ४४ ॥
ततो देवपथं गत्वा नियतो नियताशनः ।
देवसत्रस्य यत् पुण्यं तदेवाप्नोति मानवः ॥ ४५ ॥
तत्पश्चात् नियमपालनके साथ- साथ नियमित आहार ग्रहण करनेवाला मानव देवपथमें जाकर देवसत्रका जो पुण्य है, उसे पा लेता है ॥ ४५ ॥
तुङ्गकारण्यमासाद्य ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः ।
वेदानध्यापयत् तत्र ऋषिः सारस्वतः पुरा ॥ ४६ ॥
तुंगकारण्यमें जाकर ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए इन्द्रियोंको अपने वशमें रखे ।
प्राचीनकालमें वहाँ सारस्वत ऋषिने अन्य ऋषियोंको वेदोंका अध्ययन कराया था ॥ ४६ ॥
तत्र वेदेषु नष्टेषु मुनेरङ्गिरसः सुतः ।
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ऋषीणामुत्तरीयेषु सूपविष्टो यथासुखम् ॥ ४७ ॥
एक समय उन ऋषियोंको सारा वेद भूल गया । इस प्रकार वेदोंके नष्ट होने ( भूल जाने ) -पर अंगिरा मुनिका पुत्र ऋषियोंके उत्तरीय वस्त्रों ( चादरों ) में छिपकर सुखपूर्वक बैठ गया ( और विधिपूर्वक ॐकारका उच्चारण करने लगा ) ॥ ४७ ॥
ओङ्कारेण यथान्यायं सम्यगुच्चारितेन ह ।
येन यत् पूर्वमभ्यस्तं तत् सर्वं समुपस्थितम् ॥ ४८ ॥
नियमके अनुसार ॐकारका ठीक- ठीक उच्चारण होनेपर, जिसने पूर्वकालमें जिस वेदका अध्ययन एवं अभ्यास किया था, उसे वह सब स्मरण हो आया ॥ ४८ ॥
ऋषयस्तत्र देवाश्च वरुणोऽग्निः प्रजापतिः ।
हरिर्नारायणस्तत्र महादेवस्तथैव च ॥ ४ ९ ॥
उस समय वहाँ बहुत -से ऋषि, देवता, वरुण, अग्नि, प्रजापति, भगवान् नारायण और महादेवजी भी उपस्थित हुए ॥ ४ ९ ॥
पितामहश्च भगवान् देवैः सह महाद्युतिः ।
भृगुं नियोजयामास याजनार्थे महाद्युतिम् ॥ ५० ॥
महातेजस्वी भगवान् ब्रह्माने देवताओंके साथ जाकर परम कान्तिमान् भृगुको यज्ञ करानेके कामपर नियुक्त किया ॥ ५० ॥
ततः स चक्रे भगवानृषीणां विधिवत् तदा ।
सर्वेषां पुनराधानं विधिदृष्टेन कर्मणा ॥ ५१ ॥
आज्यभागेन तत्राग्निं तर्पयित्वा यथाविधि ।
देवाः स्वभवनं याता ऋषयश्च यथाक्रमम् ॥ ५२ ॥
तदनन्तर भगवान् भृगुने वहाँ सब ऋषियोंके यहाँ शास्त्रीय विधिके अनुसार पुनः भलीभाँति अग्निस्थापन कराया । उस समय आज्यभागके द्वारा विधिपूर्वक अग्निको तृप्त करके सब देवता और ऋषि क्रमशः अपने - अपने स्थानको चले गये ॥ ५१-५२ ॥
तदरण्यं प्रविष्टस्य तुङ्गकं राजसत्तम ।
पापं प्रणश्यत्यखिलं स्त्रियो वा पुरुषस्य वा ॥ ५३ ॥
नृपश्रेष्ठ! उस तुंगकारण्यमें प्रवेश करते ही स्त्री या पुरुष सबके पाप नष्ट हो जाते हैं ॥ ५३ ॥
तत्र मासं वसेद् धीरो नियतो नियताशनः ।
ब्रह्मलोकं व्रजेद् राजन् कुलं चैव समुद्धरेत् ॥ ५४ ॥
धीर पुरुषको चाहिये कि वह नियमपालनपूर्वक नियमित भोजन करते हुए एक मासतक वहाँ रहे । राजन् ऐसा करनेवाला तीर्थयात्री ब्रह्मलोकमें जाता और अपने कुलका उद्धार कर देता है ॥ ५४ ॥
मेधाविकं समासाद्य पितॄन् देवांश्च तर्पयेत् ।
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अग्निष्टोममवाप्नोति स्मृतिं मेधां च विन्दति ॥ ५५ ॥
तत्पश्चात् मेधाविकतीर्थमें जाकर देवताओं और पितरोंका तर्पण करे; ऐसा करनेवाला पुरुष अग्निष्टोमयज्ञका फल पाता और स्मृति एवं बुद्धिको प्राप्त कर लेता है ॥
अत्र कालञ्जरं नाम पर्वतं लोकविश्रुतम् ।
तत्र देवहदे स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ५६ ॥
इस तीर्थमें कालंजर नामक लोकविख्यात पर्वत है, वहाँ देवह्रद नामक तीर्थमें स्नान करनेसे सहस्र गोदानका फल मिलता है ॥ ५६ ॥
योः स्नातः साधयेत् तत्र गिरौ कालञ्जरे नृप ।
स्वर्गलोके महीयेत नरो नास्त्यत्र संशयः ॥ ५७ ॥
राजन्! जो कालंजर पर्वतपर स्नान करके वहाँ साधन करता है, वह मनुष्य स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है; इसमें संशय नहीं है ॥ ५७ ॥
ततो गिरिवरश्रेष्ठे चित्रकूटे विशाम्पते ।
मन्दाकिनीं समासाद्य सर्वपापप्रणाशिनीम् ॥ ५८ ॥
तत्राभिषेकं कुर्वाणः पितृदेवार्चने रतः ।
अश्वमेधमवाप्नोति गतिं च परमां व्रजेत् ॥ ५ ९ ॥
राजन्! तदनन्तर पर्वतश्रेष्ठ चित्रकूटमें सब पापोंका नाश करनेवाली मन्दाकिनीके तटपर पहुँचकर उसमें स्नान करे और देवताओं तथा पितरोंकी पूजामें लग जाय । इससे वह अश्वमेधयज्ञका फल पाता और परम गतिको प्राप्त होता है ॥ ५८-५९ ॥
ततो गच्छेत धर्मज्ञ भर्तृस्थानमनुत्तमम् ।
यत्र नित्यं महासेनो गुहः संनिहितो नृप ॥ ६० ॥
तत्र गत्वा नृपश्रेष्ठ गमनादेव सिध्यति । धर्मज्ञ नरेश! तत्पश्चात् तीर्थयात्री परम उत्तम भर्तृस्थानकी यात्रा करे, जहाँ महासेन कार्तिकेयजी निवास करते हैं । नृपश्रेष्ठ! वहाँ जानेमात्रसे सिद्धि प्राप्त होती है ॥ ६० ॥
कोटितीर्थे नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ६१ ॥
प्रदक्षिणमुपावृत्य ज्येष्ठस्थानं व्रजेन्नरः ।
अभिगम्य महादेवं विराजति यथा शशी ॥ ६२ ॥
कोटितीर्थमें स्नान करके मनुष्य सहस्र गोदानका फल पाता है । उसकी परिक्रमा करके तीर्थयात्री मानव ज्येष्ठस्थानको जाय। वहाँ महादेवजीका दर्शन- पूजन करनेसे वह चन्द्रमाके समान प्रकाशित होता है ॥
तत्र कूपे महाराज विश्रुता भरतर्षभ ।
समुद्रास्तत्र चत्वारो निवसन्ति युधिष्ठिर ॥ ६३ ॥
भरतकुलभूषण महाराज युधिष्ठिर! वहाँ एक कूप है जिसमें चारों समुद्र निवास करते हैं ॥ ६३ ॥
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तत्रोपस्पृश्य राजेन्द्र पितृदेवार्चने रतः ।
नियतात्मा नरः पूतो गच्छेत परमां गतिम् ॥ ६४ ॥
राजेन्द्र! उसमें स्नान करके देवताओं और पितरोंके पूजनमें तत्पर रहनेवाला जितात्मा पुरुष पवित्र हो परमगतिको प्राप्त होता है ॥ ६४ ॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र शृङ्गवेरपुरं महत् ।
यत्र तीर्णो महाराज रामो दाशरथिः पुरा ॥ ६५ ॥
राजेन्द्र! वहाँसे महान् शृङ्गवेरपुरकी यात्रा करे । महाराज! पूर्वकालमें दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजीने वहीं गंगा पार की थी ॥ ६५ ॥
तस्मिंस्तीर्थे महाबाहो स्नात्वा पापैः प्रमुच्यते ।
गङ्गायां तु नरः स्नात्वा ब्रह्मचारी समाहितः ॥ ६६ ॥
विधूतपाप्मा भवति वाजपेयं च विन्दति । महाबाहो! उस तीर्थमें स्नान करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है । ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक एकाग्र हो गंगाजीमें स्नान करके मनुष्य पापरहित होता तथा वाजपेययज्ञका फल पाता है ॥ ६६ ॥
ततो मुञ्जवटं गच्छेत् स्थानं देवस्य धीमतः ॥ ६७ ॥
अभिगम्य महादेवमभिवाद्य च भारत ।
प्रदक्षिणमुपावृत्य गाणपत्यमवाप्नुयात् ॥ ६८ ॥
तस्मिंस्तीर्थे तु जाह्नव्यां स्नात्वा पापैः प्रमुच्यते । तदनन्तर तीर्थयात्री परम बुद्धिमान् महादेवजीके मुंजवट नामक तीर्थको जाय । भरतनन्दन उस तीर्थमें महादेवजीके पास जाकर उन्हें प्रणाम करके परिक्रमा करनेसे मनुष्य गणपतिपद प्राप्त कर लेता है । उक्त तीर्थमें जाकर गंगामें स्नान करनेसे मनुष्य सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है ॥ ६७-६८३ ॥ ततो गच्छेत राजेन्द्र प्रयागमृषिसंस्तुतम् ॥ ६ ९ ॥
तत्र ब्रह्मादयो देवा दिशश्च सदिगीश्वराः ।
लोकपालाश्च साध्याश्च पितरो लोकसम्मताः ॥ ७० ॥
सनत्कुमारप्रमुखास्तथैव परमर्षयः ।
अङ्गिरःप्रमुखाश्चैव तथा ब्रह्मर्षयोऽमलाः ॥ ७१ ॥
तथा नागाः सुपर्णाश्च सिद्धाश्चक्रचरास्तथा ।
सरितः सागराश्चैव गन्धर्वाप्सरसोऽपि च ॥ ७२ ॥
हरिश्च भगवानास्ते प्रजापतिपुरस्कृतः ।
तत्र त्रीण्यग्निकुण्डानि येषां मध्येन जाह्नवी ॥ ७३ ॥
वेगेन समतिक्रान्ता सर्वतीर्थपुरस्कृता ।
तपनस्य सुता देवी त्रिषु लोकेषु विश्रुता ॥ ७४ ॥
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यमुना गङ्गया सार्धं संगता लोकपावनी ।
गङ्गायमुनयोर्मध्यं पृथिव्या जघनं स्मृतम् ॥ ७५ ॥
राजेन्द्र! तत्पश्चात् महर्षियोंद्वारा प्रशंसित प्रयागतीर्थमें जाय । जहाँ ब्रह्मा आदि देवता, दिशा, दिक्पाल, लोकपाल, साध्य, लोकसम्मानित पितर, सनत्कुमार आदि महर्षि, अंगिरा आदि निर्मल ब्रह्मर्षि, नाग, सुपर्ण, सिद्ध, सूर्य, नदी, समुद्र, गन्धर्व, अप्सरा तथा ब्रह्माजीसहित भगवान् विष्णु निवास करते हैं । वहाँ तीन अग्निकुण्ड हैं जिनके बीचसे सब तीर्थोंसे सम्पन्न गंगा वेगपूर्वक बहती हैं। त्रिभुवनविख्यात सूर्यपुत्री लोकपावनी यमुनादेवी वहाँ गंगाजीके साथ मिली हैं । गंगा और यमुनाका मध्यभाग पृथ्वीका जघन माना गया है ॥ ६ ९ –७५ ॥
प्रयागं जघनस्थानमुपस्थमृषयो विदुः ।
प्रयागं सप्रतिष्ठानं कम्बलाश्वतरौ तथा ॥ ७६ ॥
तीर्थं भोगवती चैव वेदिरेषा प्रजापतेः ।
तत्र वेदाश्च यज्ञाश्च मूर्तिमन्तो युधिष्ठिर ॥ ७७ ॥
प्रजापतिमुपासन्ते ऋषयश्च तपोधनाः ।
यजन्ते क्रतुभिर्देवास्तथा चक्रधरा नृपाः ॥ ७८ ॥
ततः पुण्यतमं नाम त्रिषु लोकेषु भारत ।
प्रयागं सर्वतीर्थेभ्यः प्रवदन्त्यधिकं विभो ॥ ७९ ॥
गमनात् तस्य तीर्थस्य नामसंकीर्तनादपि ।
मृत्युकालभयाच्चापि नरः पापात् प्रमुच्यते ॥ ८० ॥
ऋषियोंने प्रयागको जघनस्थानीय उपस्थ बताया है । प्रतिष्ठानपुर (झूसी ) -सहित प्रयाग, कम्बल और अश्वतर नाग तथा भोगवतीतीर्थ यह ब्रह्माजीकी वेदी है । युधिष्ठिर! उस तीर्थमें वेद और यज्ञ मूर्तिमान् होकर रहते हैं और प्रजापतिकी उपासना करते हैं । तपोधन ऋषि, देवता तथा चक्रधर नृपतिगण वहाँ यज्ञोंद्वारा भगवान्का यजन करते हैं । भरतनन्दन! इसीलिये तीनों लोकोंमें प्रयागको सब तीर्थोंकी अपेक्षा श्रेष्ठ एवं पुण्यतम बताते हैं । उस तीर्थमें जानेसे अथवा उसका नाम लेनेमात्रसे भी मनुष्य मृत्युकालके भय और पापसे मुक्त हो जाता है ॥ ७६–८० ॥
तत्राभिषेकं यः कुर्यात् संगमे लोकविश्रुते ।
पुण्यं स फलमाप्नोति राजसूयाश्वमेधयोः ॥ ८१ ॥
वहाँके विश्वविख्यात संगममें जो स्नान करता है वह राजसूय और अश्वमेधयज्ञोंका पुण्यफल प्राप्त कर लेता है ॥ ८१ ॥
एषा यजनभूमिर्हि देवानामभिसंस्कृता ।
तत्र दत्तं सूक्ष्ममपि महद् भवति भारत ॥ ८२ ॥