श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 641–650
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 641–650
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भरतनन्दन! यह देवताओंकी संस्कार की हुई यज्ञभूमि है। यहाँ दिया हुआ थोड़ा- सा भी दान महान् होता है ॥ ८२ ॥
न वेदवचनात् तात न लोकवचनादपि ।
मतिरुत्क्रमणीया ते प्रयागमरणं प्रति ॥ ८३ ॥
तात! तुम्हें किसी वैदिक वचनसे या लौकिक वचनसे भी प्रयागमें मरनेका विचार नहीं त्यागना चाहिये ॥ ८३ ॥
दश तीर्थसहस्राणि षष्टिः कोट्यस्तथापराः ।
येषां सांनिध्यमत्रैव कीर्तितं कुरुनन्दन ॥ ८४ ॥
चतुर्विद्ये च यत् पुण्यं सत्यवादिषु चैव यत् ।
स्नात एव तदाप्नोति गङ्गायमुनसंगमे ॥ ८५ ॥
कुरुनन्दन! साठ करोड़ दस हजार तीर्थोंका निवास केवल इस प्रयागमें ही बताया गया है । चारों विद्याओंके ज्ञानसे जो पुण्य होता है तथा सत्य बोलनेवाले व्यक्तियोंको जिस पुण्यकी प्राप्ति होती है वह सब गंगा- यमुनाके संगममें स्नान करनेमात्रसे प्राप्त हो जाता है ॥ ८४-८५ ॥
तत्र भोगवती नाम वासुकेस्तीर्थमुत्तमम् ।
तत्राभिषेकं यः कुर्यात् सोऽश्वमेधफलं लभेत् ॥ ८६ ॥
प्रयागमें भोगवती नामसे प्रसिद्ध वासुकि नागका उत्तम तीर्थ है । जो वहाँ स्नान करता है, उसे अश्वमेधयज्ञका फल मिलता है ॥ ८६ ॥
तत्र हंसप्रपतनं तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् ।
दशाश्वमेधिकं चैव गङ्गायां कुरुनन्दन ॥ ८७ ॥
कुरुनन्दन! वहीं त्रिलोकविख्यात हंसप्रपतन नामक तीर्थ है और गंगाके तटपर दशाश्वमेधिक तीर्थ है ॥ ८७ ॥
कुरुक्षेत्रसमा गङ्गा यत्र तत्रावगाहिता ।
विशेषो वै कनखले प्रयागे परमं महत् ॥ ८८ ॥
गंगामें जहाँ कहीं भी स्नान किया जाय वह कुरुक्षेत्रके समान पुण्यदायिनी है । कनखलमें गंगाका स्नान विशेष माहात्म्य रखता है और प्रयागमें गंगा स्नानका माहात्म्य सबकी अपेक्षा बहुत अधिक है ॥ ८८ ॥
यद्यकार्यशतं कृत्वा कृतं गङ्गाभिषेचनम् ।
सर्वं तत् तस्य गङ्गाम्भो दहत्यग्निरिवेन्धनम् ॥ ८ ९ ॥
सर्वं कृतयुगे पुण्यं त्रेतायां पुष्करं स्मृतम् ।
द्वापरेऽपि कुरुक्षेत्रं गङ्गा कलियुगे स्मृता ॥ ९ ० ॥
पुष्करे तु तपस्तप्येद् दानं दद्यान्महालये ।
मलये त्वग्निमारोहेद् भृगुतुङ्गे त्वनाशनम् ॥ ९ १ ॥
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जैसे अग्नि ईंधनको जला देती है, उसी प्रकार सैकड़ों निषिद्ध कर्म करके भी यदि गंगास्नान किया जाय तो उसका जल उन सब पापोंको भस्म कर देता है । सत्ययुगमें सभी तीर्थ पुण्यदायक होते हैं । त्रेतामें पुष्करका महत्त्व है । द्वापरमें कुरुक्षेत्र विशेष पुण्यदायक है और कलियुगमें गंगाकी अधिक महिमा बतायी गयी है । पुष्करमें तप करे, महालयमें दान दे, मलय पर्वतमें अग्निपर आरूढ हो और भृगुतुंगमें उपवास करे ॥ ८ ९ – ९ १ ॥
पुष्करे तु कुरुक्षेत्रे गङ्गायां मध्यमेषु च ।
स्नात्वा तारयते जन्तुः सप्तसप्तावरांस्तथा ॥ ९ २ ॥
पुष्कर, कुरुक्षेत्र, गंगा तथा प्रयाग आदि मध्यवर्ती तीर्थोंमें स्नान करके मनुष्य अपने आगे - पीछेकी सात - सात पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है ॥ ९ २ ॥
पुनाति कीर्तिता पापं दृष्टा भद्रं प्रयच्छति ।
अवगाढा च पीता च पुनात्यासप्तमं कुलम् ॥ ९ ३ ॥
गंगाजीका नाम लिया जाय तो वह सारे पापोंको धो - बहाकर पवित्र कर देती है । दर्शन करनेपर कल्याण प्रदान करती है तथा स्नान और जलपान करनेपर वह मनुष्यकी सात पीढ़ियोंको पावन बना देती है ॥ ९ ३ ॥
यावदस्थि मनुष्यस्य गङ्गायाः स्पृशते जलम् ।
तावत् स पुरुषो राजन् स्वर्गलोके महीयते ॥ ९ ४ ॥
राजन्! मनुष्यकी हड्डी जबतक गंगाजलका स्पर्श करती है, तबतक वह पुरुष स्वर्गलोकमें पूजित होता है ॥ ९ ४ ॥
यथा पुण्यानि तीर्थानि पुण्यान्यायतनानि च ।
उपास्य पुण्यं लब्ध्वा च भवत्यमरलोकभाक् ॥ ९ ५ ॥
जितने पुण्य तीर्थ हैं और जितने पुण्य मन्दिर हैं, उन सबकी उपासना ( सेवन ) -से पुण्यलाभ करके मनुष्य देवलोकका भागी होता है ॥ ९ ५ ॥
न गङ्गासदृशं तीर्थं न देवः केशवात् परः ।
ब्राह्मणेभ्यः परं नास्ति एवमाह पितामहः ॥ ९ ६ ॥
गंगाके समान कोई तीर्थ नहीं, भगवान् विष्णुसे बढ़कर कोई देवता नहीं और ब्राह्मणोंसे उत्तम कोई वर्ण नहीं है; ऐसा ब्रह्माजीका कथन है ॥ ९ ६ ॥
यत्र गङ्गा महाराज स देशस्तत् तपोवनम् ।
सिद्धिक्षेत्रं च तज्ज्ञेयं गङ्गातीरसमाश्रितम् ॥ ९ ७ ॥
महाराज! जहाँ गंगा बहती हैं वही उत्तम देश है; और वही तपोवन है । गंगाके तटवर्ती स्थानको सिद्धिक्षेत्र समझना चाहिये ॥ ९ ७ ॥
इदं सत्यं द्विजातीनां साधूनामात्मजस्य च ।
सुहृदां च जपेत् कर्णे शिष्यस्यानुगतस्य च ॥ ९ ८ ॥
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इस सत्य सिद्धान्तको ब्राह्मण आदि द्विजों, साधु पुरुषों, पुत्र, सुहृदों, शिष्यवर्ग तथा अपने अनुगत मनुष्योंके कानमें कहना चाहिये ॥ ९ ८ ॥
इदं धन्यमिदं मेध्यमिदं स्वर्ग्यमनुत्तमम् ।
इदं पुण्यमिदं रम्यं पावनं धर्म्यमुत्तमम् ॥ ९९ ॥
यह गंगा- माहात्म्य धन्य, पवित्र, स्वर्गप्रद और परम उत्तम है । यह पुण्यदायक, रमणीय, पावन, उत्तम, धर्मसंगत और श्रेष्ठ है ॥ ९९ ॥
महर्षीणामिदं गुह्यं सर्वपापप्रमोचनम् ।
अधीत्य द्विजमध्ये च निर्मलः स्वर्गमाप्नुयात् ॥ १०० ॥
यह महर्षियोंका गोपनीय रहस्य है। सब पापोंका नाश करनेवाला है । द्विजमण्डलीमें इस गंगा- माहात्म्यका पाठ करके मनुष्य निर्मल हो स्वर्गलोकमें पहुँच जाता है ॥ १०० ॥
श्रीमत् स्वर्ग्यं तथा पुण्यं सपत्नशमनं शिवम् ।
मेधाजननमग्रयं वै तीर्थवंशानुकीर्तनम् ॥ १०१ ॥
यह तीर्थसमूहोंकी महिमाका वर्णन परम उत्तम, सम्पत्तिदायक, स्वर्गप्रद, पुण्यकारक, शत्रुओंका निवारण करनेवाला, कल्याणकारक तथा मेधाशक्तिको उत्पन्न करनेवाला है ॥ १०१ ॥
अपुत्रो लभते पुत्रमधनो धनमाप्नुयात् ।
महीं विजयते राजा वैश्यो धनमवाप्नुयात् ॥ १०२ ॥
इस तीर्थ- माहात्म्यका पाठ करनेसे पुत्रहीनको पुत्र प्राप्त होता है, धनहीनको धन मिलता है, राजा इस पृथ्वीपर विजय पाता है और वैश्यको व्यापारमें धन मिलता है ॥ १०२ ॥
शूद्रो यथेप्सितान् कामान् ब्राह्मणः पारगः पठन् ।
यश्चेदं शृणुयान्नित्यं तीर्थपुण्यं नरः शुचिः ॥ १०३ ॥
जातीः स स्मरते बह्वीर्नाकपृष्ठे च मोदते ।
गम्यान्यपि च तीर्थानि कीर्तितान्यगमानि च ॥ १०४ ॥
शूद्र मनोवांछित वस्तुएँ पाता है और ब्राह्मण इसका पाठ करे तो वह समस्त शास्त्रोंका पारंगत विद्वान होता है । जो मनुष्य तीर्थोंके इस पुण्य माहात्म्यको प्रतिदिन सुनता है वह पवित्र हो पहलेके अनेक जन्मोंकी बातें याद कर लेता है और देहत्यागके पश्चात् स्वर्गलोकमें आनन्दका अनुभव करता है । भीष्म! मैंने यहाँ गम्य और अगम्य सभी प्रकारके तीर्थोंका वर्णन किया है ॥
मनसा तानि गच्छेत सर्वतीर्थसमीक्षया ।
एतानि वसुभिः साध्यैरादित्यैर्मरुदश्विभिः ॥ १०५ ॥
ऋषिभिर्देवकल्पैश्च स्नातानि सुकृतैषिभिः ।
एवं त्वमपि कौरव्य विधिनानेन सुव्रत ॥ १०६ ॥
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व्रज तीर्थानि नियतः पुण्यं पुण्येन वर्धयन् ।
भावितैः करणैः पूर्वमास्तिक्याच्छ्रुतिदर्शनात् ॥ १०७ ॥
प्राप्यन्ते तानि तीर्थानि सद्भिः शास्त्रानुदर्शिभिः ।
नाव्रती नाकृतात्मा च नाशुचिर्न च तस्करः ॥ १०८ ॥
स्नाति तीर्थेषु कौरव्य न च वक्रमतिर्नरः ।
त्वया तु सम्यग्वृत्तेन नित्यं धर्मार्थदर्शिना ॥ १० ९ ॥
पिता पितामहश्चैव सर्वे च प्रपितामहाः ।
पितामहपुरोगाश्च देवाः सर्षिगणा नृप ॥ ११० ॥
तव धर्मेण धर्मज्ञ नित्यमेवाभितोषिताः ।
अवाप्स्यसि त्वं लोकान् वै वसूनां वासवोपम ।
कीर्तिं च महतीं भीष्म प्राप्स्यसे भुवि शाश्वतीम् ॥ १११ ॥
सम्पूर्ण तीर्थोंके दर्शनकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये मनुष्य जहाँ जाना सम्भव न हो उन अगम्य तीर्थोंमें मनसे यात्रा करे, अर्थात् मनसे उन तीर्थोंका चिन्तन करे । वसुगण, साध्यगण, आदित्यगण, मरुद्गण, दोनों अश्विनीकुमार तथा देवोपम महर्षियोंने भी पुण्य लाभकी इच्छासे उन तीर्थोंमें स्नान किया है । उत्तम व्रतका पालन करनेवाले कुरुनन्दन! इसी प्रकार तुम भी विधिपूर्वक शौच- संतोषादि नियमोंका पालन करते और पुण्यसे पुण्यको बढ़ाते हुए उन तीर्थोंकी यात्रा करो । आस्तिकता और वेदोंके अनुशीलनसे पहले अपने इन्द्रियोंको पवित्र करके शास्त्रज्ञ साधु पुरुष ही उन तीर्थोंको प्राप्त करते हैं । कुरुनन्दन! जो ब्रह्मचर्य आदि व्रतोंका पालन नहीं करता, जिसने अपने चित्तको वशमें नहीं किया, जो अपवित्र आचार- विचारवाला और चोर है, जिसकी बुद्धि वक्र है, ऐसा मनुष्य श्रद्धा न होनेके कारण तीर्थोंमें स्नान नहीं करता । तुम धर्म और अर्थके ज्ञाता तथा नित्य सदाचारमें तत्पर रहनेवाले हो । धर्मज्ञ! तुमने पिता - पितामह प्रपितामह, ब्रह्मा आदि देवता तथा महर्षिगण इन सबको सदा स्वधर्मपालनसे संतुष्ट किया है, अतः इन्द्रके समान तेजस्वी नरेश! तुम वसुओंके लोकमें जाओगे । भीष्म! तुम्हें इस पृथ्वीपर विशाल एवं अक्षय कीर्ति प्राप्त होगी ॥ १०५-१११ ॥ नारद उवाच
एवमुक्त्वाभ्यनुज्ञाय पुलस्त्यो भगवानृषिः ।
प्रीतः प्रीतेन मनसा तत्रैवान्तरधीयत ॥ ११२ ॥
नारदजी कहते हैं -युधिष्ठिर! ऐसा कहकर भीष्मजीकी अनुमति ले संतुष्ट हुए भगवान् पुलस्त्य मुनि प्रसन्नमनसे वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ ११२ ॥
भीष्मश्च कुरुशार्दूल शास्त्रतत्त्वार्थदर्शिवान् ।
पुलस्त्यवचनाच्चैव पृथिवीं परिचक्रमे ॥ ११३ ॥
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कुरुश्रेष्ठ! शास्त्रके तात्त्विक अर्थको जाननेवाले भीष्मने महर्षि पुलस्त्यके वचनसे ( तीर्थयात्राके लिये ) सारी पृथ्वीकी परिक्रमा की ॥ ११३ ॥
एवमेषा महाभाग प्रतिष्ठाने प्रतिष्ठिता ।
तीर्थयात्रा महापुण्या सर्वपापप्रमोचनी ॥ ११४ ॥
महाभाग! इस प्रकार यह सब पापोंको दूर करनेवाली महापुण्यमयी तीर्थयात्रा प्रतिष्ठानपुर ( प्रयाग ) -में प्रतिष्ठित है ॥ ११४ ॥
अनेन विधिना यस्तु पृथिवीं संचरिष्यति ।
अश्वमेधशतस्याग्रयं फलं प्रेत्य स भोक्ष्यति ॥ ११५ ॥
जो इस विधिसे ( तीर्थयात्राके उद्देश्यसे ) सारी पृथ्वीकी परिक्रमा करेगा, वह सौ अश्वमेधयज्ञोंसे भी उत्तम पुण्यफल पाकर देहत्यागके पश्चात् उसका उपभोग करेगा ॥ ११५ ॥
ततश्चाष्टगुणं पार्थ प्राप्स्यसे धर्ममुत्तमम् ।
भीष्मः कुरूणां प्रवरो यथापूर्वमवाप्तवान् ॥ ११६ ॥
कुन्तीनन्दन! कुरुप्रवर भीष्मने पहले जिस प्रकार तीर्थयात्राजनित पुण्य प्राप्त किया था, उससे भी आठगुने उत्तम धर्मकी उपलब्धि तुम्हें होगी ॥ ११६ ॥
नेता च त्वमृषीन् यस्मात् तेन तेऽष्टगुणं फलम् ।
रक्षोगणविकीर्णानि तीर्थान्येतानि भारत ।
न गतानि मनुष्येन्द्रैस्त्वामृते कुरुनन्दन ॥ ११७ ॥
तुम अपने साथ इन सब ऋषियोंको ले जाओगे, इसीलिये तुम्हें आठगुना पुण्यफल प्राप्त होगा । भरतकुल- भूषण कुरुनन्दन! इन सभी तीर्थोंमें राक्षसोंके समुदाय फैले हुए हैं । तुम्हारे सिवा, दूसरे नरेशोंने वहाँकी यात्रा नहीं की है ॥ ११७ ॥
इदं देवर्षिचरितं सर्वतीर्थाभिसंवृतम् ।
यः पठेत् कल्यमुत्थाय सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ११८ ॥
जो मनुष्य सबेरे उठकर देवर्षि पुलस्त्यद्वारा वर्णित सम्पूर्ण तीर्थोंके माहात्म्यसे संयुक्त इस प्रसंगका पाठ करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥
ऋषिमुख्याः सदा यत्र वाल्मीकिस्त्वथ कश्यपः ।
आत्रेयः कुण्डजठरो विश्वामित्रोऽथ गौतमः ॥ ११ ९ ॥
असितो देवलश्चैव मार्कण्डेयोऽथ गालवः ।
भरद्वाजो वसिष्ठश्च मुनिरुद्दालकस्तथा ॥ १२० ॥
शौनकः सह पुत्रेण व्यासश्च तपतां वरः ।
दुर्वासाश्च मुनिश्रेष्ठो जाबालिश्च महातपाः ॥ १२१ ॥
एते ऋषिवराः सर्वे त्वत्प्रतीक्षास्तपोधनाः ।
एभिः सह महाराज तीर्थान्येतान्यनुव्रज ॥ १२२ ॥
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महाराज! ऋषिप्रवर वाल्मीकि, कश्यप, आत्रेय, कुण्डजठर, विश्वामित्र, गौतम, असित, देवल, मार्कण्डेय, गालव, भरद्वाज, वसिष्ठ, उद्दालक मुनि, शौनक तथा पुत्रसहित तपोधनप्रवर व्यास, मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा और महातपस्वी जाबालि – ये सभी महर्षि जो तपस्याके धनी हैं, तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं । इन सबके साथ उक्त तीर्थोंमें जाओ ॥ ११ ९ –१२२ ॥
एष ते लोमशो नाम महर्षिरमितद्युतिः ।
समेष्यति महाराज तेन सार्धमनुव्रज ॥ १२३ ॥
महाराज! ये अमिततेजस्वी महर्षि लोमश तुम्हारे पास आनेवाले हैं, उन्हें साथ लेकर यात्रा करो ॥ १२३ ॥
मयापि सह धर्मज्ञ तीर्थान्येतान्यनुक्रमात् ।
प्राप्स्यसे महतीं कीर्तिं यथा राजा महाभिषः ॥ १२४ ॥
धर्मज्ञ! इस यात्रामें मैं भी तुम्हारा साथ दूँगा । प्राचीन राजा महाभिषके समान तुम भी क्रमशः इन तीर्थोंमें भ्रमण करते हुए महान् यश प्राप्त करोगे ॥ १२४ ॥
यथा ययातिर्धर्मात्मा यथा राजा पुरूरवाः ।
तथा त्वं राजशार्दूल स्वेन धर्मेण शोभसे ॥ १२५ ॥
यथा भगीरथो राजा यथा रामश्च विश्रुतः ।
तथा त्वं सर्वराजभ्यो भ्राजसे रश्मिवानिव ॥ १२६ ॥
नृपश्रेष्ठ! जैसे धर्मात्मा ययाति तथा राजा पुरूरवा थे वैसे ही तुम भी अपने धर्मसे सुशोभित हो रहे हो । जैसे राजा भगीरथ तथा विख्यात महाराज श्रीराम हो गये हैं, उसी प्रकार तुम भी सूर्यकी भाँति सब राजाओंसे अधिक शोभा पा रहे हो ॥ १२५-१२६ ॥
यथा मनुर्यथेक्ष्वाकुर्यथा पूरुर्महायशाः ।
यथा वैन्यो महाराज तथा त्वमपि विश्रुतः ॥ १२७ ॥
यथा च वृत्रहा सर्वान् सपत्नान् निर्दहन् पुरा ।
त्रैलोक्यं पालयामास देवराड् विगतज्वरः ॥ १२८ ॥
तथा शत्रुक्षयं कृत्वा त्वं प्रजाः पालयिष्यसि ।
स्वधर्मविजितामुर्वीं प्राप्य राजीवलोचन ॥ १२ ९ ॥
ख्यातिं यास्यसि धर्मेण कार्तवीर्यार्जुनो यथा ॥ १३० ॥
महाराज! जैसे मनु, जैसे इक्ष्वाकु, जैसे महायशस्वी पूरु और जैसे वेननन्दन पृथु हो गये हैं वैसी ही तुम्हारी भी ख्याति है । पूर्वकालमें वृत्रासुरविनाशक देवराज इन्द्रने जैसे सब शत्रुओंका संहार करते हुए निश्चिन्त होकर तीनों लोकोंका पालन किया था, उसी प्रकार तुम भी शत्रुओंका नाश करके प्रजाका पालन करोगे । कमलनयन नरेश! तुम अपने धर्मसे जीती हुई पृथ्वीपर अधिकार प्राप्त करके स्वधर्मपालनद्वारा कार्तवीर्य अर्जुनके समान विख्यात होओगे ॥ १२७–१३० ॥
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वैशम्पायन उवाच
एवमाश्वास्य राजानं नारदो भगवानृषिः ।
अनुज्ञाप्य महाराज तत्रैवान्तरधीयत ॥ १३१ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - महाराज जनमेजय! देवर्षि नारद इस प्रकार राजा युधिष्ठिरको आश्वासन देकर उनकी आज्ञा ले वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ १३१ ॥
युधिष्ठिरोऽपि धर्मात्मा तमेवार्थं विचिन्तयन् ।
तीर्थयात्राश्रितं पुण्यमृषीणां प्रत्यवेदयत् ॥ १३२ ॥
धर्मात्मा युधिष्ठिरने भी इसी विषयका चिन्तन करते हुए अपने पास रहनेवाले महर्षियोंसे तीर्थयात्रासम्बन्धी महान् पुण्यके विषयमें निवेदन किया ॥ १३२ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि पुलस्त्यतीर्थयात्रायां नारदवाक्ये पञ्चाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें महर्षिपुलस्त्यकी तीर्थयात्राके सम्बन्धमें नारदवाक्यविषयक पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८५ ॥
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षडशीतितमोऽध्यायः युधिष्ठिरका धौम्य मुनिसे पुण्य तपोवन, आश्रम एवं नदी आदिके विषयमें पूछना वैशम्पायन उवाच
भ्रातॄणां मतमाज्ञाय नारदस्य च धीमतः ।
पितामहसमं धौम्यं प्राह राजा युधिष्ठिरः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! अपने भाइयों तथा परम बुद्धिमान् देवर्षि नारदकी सम्मति जानकर राजा युधिष्ठिरने पितामहके समान प्रभावशाली पुरोहित धौम्यजीसे कहा – ॥ १ ॥
मया स पुरुषव्याघ्रो जिष्णुः सत्यपराक्रमः ।
अस्त्रहेतोर्महाबाहुरमितात्मा विवासितः ॥ २ ॥
‘ ब्रह्मन्! मैंने अस्त्रप्राप्तिके लिये विजयी सत्य - पराक्रमी, महामना एवं प्रतापी पुरुषसिंह महाबाहु अर्जुनको निर्वासित कर रखा है ॥ २ ॥
स हि वीरोऽनुरक्तश्च समर्थश्च तपोधनः ।
कृती च भृशमप्यस्त्रे वासुदेव इव प्रभुः ॥ ३ ॥
'वह वीर मुझमें अनुराग रखनेवाला, सामर्थ्यशाली, तपस्याका धनी, पुण्यात्मा और अस्त्र--शस्त्रोंके ज्ञानमें भगवान् श्रीकृष्णकी भाँति प्रभावशाली है ॥ ३ ॥
अहं ह्येतावुभौ ब्रह्मन् कृष्णावरिविघातिनी ।
अभिजानामि विक्रान्तौ तथा व्यासः प्रतापवान् ॥ ४ ॥
' विप्रवर! मैं इन दोनों कृष्णनामधारी वीरोंको शत्रुओंका संहार करनेमें समर्थ और
महापराक्रमी समझता हूँ । महाप्रतापी वेदव्यासजीकी भी यही धारणा है ॥ ४ ॥
त्रियुगौ पुण्डरीकाक्षौ वासुदेवधनंजयौ ।
नारदोऽपि तथा वेद योऽप्यशंसत् सदा मम ॥ ५ ॥
‘ कमलके समान नेत्रोंवाले भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन तीन युगोंसे सदा साथ रहते आये हैं । नारदजी भी इन दोनोंको इसी रूपमें जानते हैं; और सदा मुझसे इस बातकी चर्चा करते रहते हैं ॥ ५ ॥
तथाहमपि जानामि नरनारायणावृषी ।
शक्तोऽयमित्यतो मत्वा मया स प्रेषितोऽर्जुनः ॥ ६ ॥
इन्द्रादनवरः शक्रं सुरसूनुः सुराधिपम् ।
द्रष्टुमस्त्राणि चादातुमिन्द्रादिति विवासितः ॥ ७ ॥
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भीष्मद्रोणावतिरथौ कृपो द्रौणिश्च दुर्जयः ।
धृतराष्ट्रस्य पुत्रेण वृता युधि महारथाः ॥ ८ ॥
' मैं भी ऐसा ही समझता हूँ कि श्रीकृष्ण और अर्जुन सुप्रसिद्ध नर-नारायण ऋषि हैं । अर्जुनको शक्तिशाली समझकर ही मैंने उसे दिव्यास्त्रोंकी प्राप्तिके लिये भेजा है । देवपुत्र अर्जुन इन्द्रसे कम नहीं हैं । यह जानकर ही मैंने उसे देवराज इन्द्रका दर्शन करने और उनसे दिव्यास्त्रोंको प्राप्त करनेके लिये भेजा है । भीष्म और द्रोण अतिरथी वीर हैं । कृपाचार्य तथा अश्वत्थामाको भी जीतना कठिन है । धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनने इन सभी महारथियोंको युद्धके लिये वरण कर लिया है ॥ ६–८ ॥ सर्वे वेदविदः शूराः सर्वास्त्रविदुषस्तथा ।
योद्धुकामाश्च पार्थेन सततं ये महाबलाः ।
स च दिव्यास्त्रवित् कर्णः सूतपुत्रो महारथः ॥ ९ ॥
‘वे सब- के - सब वेदज्ञ, शूरवीर, सम्पूर्ण अस्त्र - शस्त्रोंके ज्ञाता, महाबली और सदा अर्जुनके साथ युद्धकी अभिलाषा रखनेवाले हैं। वह सूतपुत्र महारथी कर्ण भी दिव्यास्त्रोंका ज्ञाता है ॥ ९ ॥
योऽस्त्रवेगानिलबलः शरार्चिस्तलनिःस्वनः ।
रजोधूमोऽस्त्रसम्पातो धार्तराष्ट्रानिलोद्धतः ॥ १० ॥
निसृष्ट इव कालेन युगान्ते ज्वलनो महान् ।
मम सैन्यमयं कक्षं प्रधक्ष्यति न संशयः ॥ ११ ॥
‘ कालने उसे प्रलयकालीन संवर्तक नामक महान् अग्निके समान उत्पन्न किया है । अस्त्रोंका वेग ही उसका वायुतुल्य बल है । बाण ही उसकी ज्वाला हैं । हथेलीसे होनेवाली आवाज ही उस दाहक अग्निका शब्द है । युद्धमें उठनेवाली धूल ही उस कर्णरूपी अग्निका धूम है । अस्त्रोंकी वर्षा ही उसकी लपटोंका लगना है । धृतराष्ट्र- पुत्ररूपी वायुका सहारा पाकर वह और भी उद्धत एवं प्रज्वलित हो उठा है । इसमें संदेह नहीं कि वह मेरी सेनाको सूखे तिनकोंकी राशिके समान भस्म कर डालेगा ॥ १०-११ ॥
तं स कृष्णानिलोद्धूतो दिव्यास्त्रज्वलनो महान् ।
श्वेतवाजिबलाकाभृद् गाण्डीवेन्द्रायुधोल्बणः ॥ १२ ॥
संरब्धः शरधाराभिः सुदीप्तं कर्णपावकम् ।
अर्जुनोदीरितो मेघः शमयिष्यति संयुगे ॥ १३ ॥
स साक्षादेव सर्वाणि शक्रात् परपुरंजयः ।
दिव्यान्यस्त्राणि बीभत्सुस्ततश्च प्रतिपत्स्यते ॥ १४ ॥
‘ उस आगको युद्धमें अर्जुन नामक महामेघ ही बुझा सकेगा । श्रीकृष्णरूपी वायुका सहारा पाकर ही वह मेघ उठेगा । दिव्यास्त्रोंका प्रकाश ही उसमें बिजलीकी चमक होगी । रथके श्वेत घोड़े ही उसके निकट उड़नेवाली बकपंक्तियोंकी भाँति सुशोभित होंगे । गाण्डीव
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धनुष ही इन्द्रधनुषके समान दुःसह दृश्य उपस्थित करनेवाला होगा । वह क्रोधमें भरकर बाणरूपी जलकी धारासे कर्णरूपी प्रज्वलित अग्निको निश्चय ही शान्त कर देगा । शत्रुओंकी राजधानीपर विजय पानेवाला अर्जुन साक्षात् इन्द्रसे सारे दिव्यास्त्र प्राप्त करेगा ॥ १२–१४ ॥
अलं स तेषां सर्वेषामिति मे धीयते मतिः ।
नास्ति त्वतिकृतार्थानां रणेऽरीणां प्रतिक्रिया ॥ १५ ॥
' धृतराष्ट्र- पक्षके उक्त सभी महारथियोंको जीतनेके लिये वह अकेला ही पर्याप्त होगा; ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है। अन्यथा अत्यन्त कृतार्थताका अनुभव करनेवाले शत्रुओंको दबानेका और कोई उपाय नहीं है ॥
ते वयं पाण्डवं सर्वे गृहीतास्त्रमरिंदमम् ।
द्रष्टारो न हि बीभत्सुर्भारमुद्यम्य सीदति ॥ १६ ॥
'अतः हम शत्रुहन्ता पाण्डुनन्दन अर्जुनको अवश्य ही सब दिव्यास्त्रोंका ज्ञान प्राप्त करके आया हुआ देखेंगे; क्योंकि वह वीर किसी कार्य- भारको उठाकर उसे पूर्ण किये बिना कभी श्रान्त नहीं होता ॥ १६ ॥
वयं तु तमृते वीरं वनेऽस्मिन् द्विपदां वर ।
अवधानं न गच्छामः काम्यके सह कृष्णया ॥ १७ ॥
‘नरश्रेष्ठ! इस काम्यकवनमें वीर अर्जुनके बिना द्रौपदीसहित हम सब पाण्डवोंका मन बिलकुल नहीं लग रहा है ॥ १७ ॥
भवानन्यद् वनं साधु बह्वन्नं फलवच्छुचि ।
आख्यातु रमणीयं च सेवितं पुण्यकर्मभिः ॥ १८ ॥
‘ इसलिये आप हमें किसी ऐसे रमणीय वनका पता बतायें जो बहुत अच्छा, पवित्र, प्रचुर अन्न और फलसे सम्पन्न तथा पुण्यात्मा पुरुषोंद्वारा सेवित हो ॥ १८ ॥
यत्र कंचिद् वयं कालं वसन्तः सत्यविक्रमम् ।
प्रतीक्षामोऽर्जुनं वीरं वृष्टिकामा इवाम्बुदम् ॥ १ ९ ॥
‘ यहाँ हमलोग कुछ काल रहकर सत्यपराक्रमी वीर अर्जुनके आगमनकी उसी प्रकार प्रतीक्षा करें, जैसे वृष्टिकी इच्छा रखनेवाले किसान बादलोंकी राह देखते हैं ॥ १ ९ ॥
विविधानाश्रमान् कांश्चिद् द्विजातिभ्यः प्रतिश्रुतान् ।
सरांसि सरितश्चैव रमणीयांश्च पर्वतान् ॥ २० ॥
आचक्ष्व न हि मे ब्रह्मन् रोचते तमृतेऽर्जुनम् ।
वनेऽस्मिन् काम्यके वासो गच्छामोऽन्यां दिशं प्रति ॥ २१ ॥
'ब्रह्मन्! आप दूसरे ब्राह्मणोंसे सुने हुए नाना प्रकारके कतिपय आश्रमों, सरोवरों, सरिताओं तथा रमणीय पर्वतोंका पता बताइये । अर्जुनके बिना अब काम्यकवनमें रहना हमें अच्छा नहीं लगता; इसलिये अब दूसरी दिशाको चलेंगे' ॥