श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 651–660

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 651–660

पृष्ठ 651

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इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि धौम्यतीर्थयात्रायां षडशीतितमोऽध्यायः ॥ ८६ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें धौम्यकी तीर्थयात्राविषयक छियासीवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ८६ ॥

पृष्ठ 652

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सप्ताशीतितमोऽध्यायः धौम्यद्वारा पूर्वदिशाके तीर्थोंका वर्णन वैशम्पायन उवाच

तान् सर्वानुत्सुकान् दृष्ट्वा पाण्डवान् दीनचेतसः ।

आश्वासयंस्तथा धौम्यो बृहस्पतिसमोऽब्रवीत् ॥ १ ॥

ब्राह्मणानुमतान् पुण्यानाश्रमान् भरतर्षभ ।

दिशस्तीर्थानि शैलांश्च शृणु मे वदतोऽनघ ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! पाण्डवोंका चित्त अर्जुनके लिये अत्यन्त दीन हो रहा था । वे सब- के - सब उनसे मिलनेको उत्सुक थे । उनकी ऐसी अवस्था देखकर बृहस्पतिके समान तेजस्वी महर्षि धौम्यने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा — ‘ पापरहित भरतकुलभूषण! ब्राह्मणलोग जिन्हें आदर देते हैं, उन पुण्य आश्रमों, दिशाओं, तीर्थों और पर्वतोंका मैं वर्णन करता हूँ, सुनो ॥

याञ्छ्रुत्वा गदतो राजन् विशोको भवितासि ह ।

द्रौपद्या चानया सार्धं भ्रातृभिश्च नरेश्वर ॥ ३ ॥

‘ नरेश्वर! राजन्! मेरे मुखसे उन सबका वर्णन सुनकर तुम द्रौपदी तथा भाइयोंके साथ शोकरहित हो जाओगे ॥ ३ ॥

श्रवणाच्चैव तेषां त्वं पुण्यमाप्स्यसि पाण्डव ।

गत्वा शतगुणं चैव तेभ्य एव नरोत्तम ॥ ४ ॥

‘ नरश्रेष्ठ पाण्डुनन्दन! उनका श्रवण करनेमात्रसे तुम्हें उनके सेवनका पुण्य प्राप्त होगा; और वहाँ जानेसे सौगुने पुण्यकी प्राप्ति होगी ॥ ४ ॥

पूर्वं प्राचीं दिशं राजन् राजर्षिगणसेविताम् ।

रम्यां ते कथयिष्यामि युधिष्ठिर यथास्मृति ॥ ५ ॥

' महाराज युधिष्ठिर! मैं अपनी स्मरणशक्तिके अनुसार सबसे पहले राजर्षिगणोंद्वारा सेवित रमणीय प्राची दिशाका वर्णन करूँगा ॥ ५ ॥

तस्यां देवर्षिजुष्टायां नैमिषं नाम भारत ।

यत्र तीर्थानि देवानां पुण्यानि च पृथक् पृथक् ॥ ६ ॥

‘ भरतनन्दन! देवर्षिसेवित प्राची दिशामें नैमिष नामक तीर्थ है, जहाँ भिन्न-भिन्न देवताओंके अलग - अलग पुण्यतीर्थ हैं ॥ ६ ॥

यत्र सा गोमती पुण्या रम्या देवर्षिसेविता ।

यज्ञभूमिश्च देवानां शामित्रं च विवस्वतः ॥ ७ ॥

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‘ जहाँ देवर्षिसेवित परम रमणीय पुण्यमयी गोमती नदी है । देवताओंकी यज्ञभूमि और सूर्यका यज्ञपात्र विद्यमान है ॥ ७ ॥

तस्यां गिरिवरः पुण्यो गयो राजर्षिसत्कृतः ।

शिवं ब्रह्मसरो यत्र सेवितं त्रिदशर्षिभिः ॥ ८ ॥

' प्राची दिशामें ही पुण्य पर्वतश्रेष्ठ गय है जो राजर्षि गयके द्वारा सम्मानित हुआ है । वहाँ कल्याणमय ब्रह्मसरोवर है जिसका देवर्षिगण सेवन करते हैं ॥ ८ ॥

यदर्थे पुरुषव्याघ्र कीर्तयन्ति पुरातनाः ।

एष्टव्या बहवः पुत्रा यद्येकोऽपि गयां व्रजेत् ॥ ९ ॥

यजेत वाश्वमेधेन नीलं वा वृषमुत्सृजेत् ।

उत्तारयति संतत्या दशपूर्वान् दशावरान् ॥ १० ॥

' पुरुषसिंह! उस गयाके विषयमें ही प्राचीनलोग यह कहा करते हैं कि ' बहुत - से पुत्रोंकी इच्छा करनी चाहिये; सम्भव है उनमेंसे एक भी गया जाय या अश्वमेधयज्ञ करे अथवा नीलवृषका * उत्सर्ग करे । ऐसा पुरुष अपनी संततिद्वारा दस पहलेकी और दस बादकी पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है ' ॥ ९ -१० ॥

महानदी च तत्रैव तथा गयशिरो नृप ।

यत्रासौ कीर्त्यते विप्रैरक्षय्यकरणो वटः ॥ ११ ॥

‘ राजन्! वहीं महानदी और गयशीर्षतीर्थ है, जहाँ ब्राह्मणोंने अक्षयवटकी स्थिति बतायी है जिसके जड़ और शाखा आदि उपकरण कभी नष्ट नहीं होते ॥ ११ ॥

यत्र दत्तं पितृभ्योऽन्नमक्षय्यं भवति प्रभो ।

सा च पुण्यजला तत्र फल्गुर्नाम महानदी ॥ १२ ॥

बहुमूलफला चापि कौशिकी भरतर्षभ ।

विश्वामित्रोऽध्यगाद् यत्र ब्राह्मणत्वं तपोधनः ॥ १३ ॥

‘ प्रभो! वहाँ पितरोंके लिये दिया हुआ अन्न अक्षय होता है । भरतश्रेष्ठ! वहीं फल्गु नामवाली पुण्यसलिला महानदी है और वहीं बहुत- से फल- मूलोंवाली कौशिकी नदी प्रवाहित होती है जहाँ तपोधन विश्वामित्र ब्राह्मणत्वको प्राप्त हुए थे ॥ १२-१३ ॥

गङ्गा यत्र नदी पुण्या यस्यास्तीरे भगीरथः ।

अयजत् तत्र बहुभिः क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः ॥ १४ ॥

‘ पूर्वदिशामें ही पुण्यनदी गङ्गा बहती है, जिसके तटपर राजा भगीरथने प्रचुर दक्षिणावाले बहुत - से यज्ञोंका अनुष्ठान किया था ॥ १४ ॥

पञ्चालेषु च कौरव्य कथयन्त्युत्पलावनम् ।

पृष्ठ 654

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विश्वामित्रोऽयजद् यत्र पुत्रेण सह कौशिकः ॥ १५ ॥

' कुरुनन्दन! पंचालदेशमें ऋषिलोग उत्पलावन बतलाते हैं, जहाँ कुशिकनन्दन विश्वामित्रने अपने पुत्रके साथ यज्ञ किया था ॥ १५ ॥

यत्रानुवंशं भगवाञ्जामदग्न्यस्तथा जगौ ।

विश्वामित्रस्य तां दृष्ट्वा विभूतिमतिमानुषीम् ॥ १६ ॥

' उसी यज्ञमें विश्वामित्रका अलौकिक वैभव देखकर जमदग्निनन्दन परशुरामने उनके वंशके अनुरूप यशका वर्णन किया था ॥ १६ ॥

कान्यकुब्जेऽपिबत् सोममिन्द्रेण सह कौशिकः ।

ततः क्षत्रादपाक्रामद् ब्राह्मणोऽस्मीति चाब्रवीत् ॥ १७ ॥

‘ विश्वामित्रजीने कान्यकुब्जदेशमें इन्द्रके साथ सोमपान किया; वहीं वे क्षत्रियत्वसे ऊपर उठ गये और ' मैं ब्राह्मण हूँ' यह बात घोषित कर दी ॥ १७ ॥

पवित्रमृषिभिर्जुष्टं पुण्यं पावनमुत्तमम् ।

गङ्गायमुनयोर्वीर संगमं लोकविश्रुतम् ॥ १८ ॥

‘ वीरवर! गंगा और यमुनाका परम उत्तम पुण्यमय पवित्र संगम सम्पूर्ण जगत्में विख्यात है और बड़े - बड़े महर्षि उसका सेवन करते हैं ॥ १८ ॥

यत्रायजत भूतात्मा पूर्वमेव पितामहः ।

प्रयागमिति विख्यातं तस्माद् भरतसत्तम ॥ १ ९ ॥

‘ जहाँ समस्त प्राणियोंके आत्मा भगवान् ब्रह्माजीने पहले ही यज्ञ किया था । भरतकुलभूषण! ब्रह्माजीके उस प्रकृष्टयागसे ही उस स्थानका नाम ' प्रयाग ' हो गया ॥

अगस्त्यस्य तु राजेन्द्र तत्राश्रमवरो नृप ।

तत् तथा तापसारण्यं तापसैरुपशोभितम् ॥ २० ॥

' राजेन्द्र! वहाँ महर्षि अगस्त्यका श्रेष्ठ आश्रम है । इसी प्रकार तापसारण्य तपस्वीजनोंसे सुशोभित है ॥ २० ॥

हिरण्यबिन्दुः कथितो गिरौ कालञ्जरे महान् ।

आगस्त्यपर्वतो रम्यः पुण्यो गिरिवरः शिवः ॥ २१ ॥

‘ कालञ्जर पर्वतपर हिरण्यबिन्दु नामसे प्रसिद्ध महान् तीर्थ बताया गया है ।

आगस्त्यपर्वत बहुत ही रमणीय, पवित्र, श्रेष्ठ एवं कल्याणस्वरूप है ॥ २१ ॥

महेन्द्रो नाम कौरव्य भार्गवस्य महात्मनः ।

अयजत् तत्र कौन्तेय पूर्वमेव पितामहः ॥ २२ ॥

‘ कुरुनन्दन! महात्मा भार्गवका निवासस्थान महेन्द्र- पर्वत है । कुन्तीनन्दन! वहाँ ब्रह्माजीने पूर्वकालमें यज्ञ किया था ॥ २२ ॥

यत्र भागीरथी पुण्या सरस्यासीद् युधिष्ठिर ।

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यत्र सा ब्रह्मशालेति पुण्या ख्याता विशाम्पते ॥ २३ ॥

धूतपाप्मभिराकीर्णा पुण्यं तस्याश्च दर्शनम् । ‘ युधिष्ठिर! जहाँ पुण्यसलिला भागीरथी गंगा सरोवरमें स्थित थी । महाराज! जहाँपर उन्हें ‘ ब्रह्मशाला' यह पवित्र नाम दिया गया है। वह पुण्यतीर्थ निष्पाप मनुष्योंसे व्याप्त है; उसका दर्शन पुण्यमय बताया गया है ॥ पवित्रो मङ्गलीयश्च ख्यातो लोके महात्मनः ॥ २४ ॥

केदारश्च मतङ्गस्य महानाश्रम उत्तमः ।

कुण्डोदः पर्वतो रम्यो बहुमूलफलोदकः ॥ २५ ॥

नैषधस्तृषितो यत्र जलं शर्म च लब्धवान् । ‘ वहीं महात्मा मतंगऋषिका महान् एवं उत्तम आश्रम केदारतीर्थ है । वह परम पवित्र, मंगलकारी और लोकमें विख्यात है । कुण्डोद नामक रमणीय पर्वत बहुत फल - मूल और जलसे सम्पन्न है, जहाँ प्यासे हुए निषधनरेशको जल और शान्तिकी उपलब्धि हुई थी ॥ यत्र देववनं पुण्यं तापसैरुपशोभितम् ॥ २६ ॥

बाहुदा च नदी यत्र नन्दा च गिरिमूर्धनि । 'वहीं तपस्वीजनोंसे सुशोभित पवित्र देववन नामक पुण्यक्षेत्र है, जहाँ पर्वतके शिखरपर बाहुदा और नन्दा नदी बहती हैं ॥ २६३ ॥

तीर्थानि सरितः शैलाः पुण्यान्यायतनानि च ॥ २७ ॥

प्राच्यां दिशि महाराज कीर्तितानि मया तव ।

तिसृष्वन्यानि पुण्यानि दिक्षु तीर्थानि मे शृणु ।

सरितः पर्वतांश्चैव पुण्यान्यायतनानि च ॥ २८ ॥

‘ महाराज! पूर्वदिशामें जो बहुत- से तीर्थ, नदियाँ, पर्वत और पुण्य मन्दिर आदि हैं, उनका मैंने तुमसे ( संक्षेपमें ) वर्णन किया है । अब शेष तीन दिशाओंके सरिताओं, पर्वतों और पुण्यस्थानोंका वर्णन करता हूँ, सुनो ' ॥ २७-२८ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि धौम्यतीर्थयात्रायां सप्ताशीतितमोऽध्यायः ॥ ८७ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें धौम्यतीर्थयात्राविषयक सत्तासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८७ ॥

* लोहितो यस्तु वर्णेन पुच्छाग्रेण तु पाण्डुरः । श्वेतः खुरविषाणाभ्यां स नीलो वृष उच्यते ॥ जिसका रंग तो लाल हो पर पूँछका अग्रभाग सफेद हो एवं खुर और सींग भी सफेद हों, वह नील वृष कहा जाता है ।

पृष्ठ 656

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अष्टाशीतितमोऽध्यायः धौम्यमुनिके द्वारा दक्षिण दिशावर्ती तीर्थोंका वर्णन धौम्य उवाच

दक्षिणस्यां तु पुण्यानि शृणु तीर्थानि भारत ।

विस्तरेण यथाबुद्धि कीर्त्यमानानि तानि वै ॥ १ ॥

धौम्यजी कहते हैं- भरतवंशी युधिष्ठिर! अब मैं अपनी बुद्धिके अनुसार दक्षिणदिशावर्ती पुण्यतीर्थोंका विस्तारपूर्वक वर्णन करता हूँ, सुनो - ॥ १ ॥

यस्यामाख्यायते पुण्या दिशि गोदावरी नदी ।

बह्वारामा बहुजला तापसाचरिता शिवा ॥ २ ॥

दक्षिणमें पुण्यमयी गोदावरी नदी बहुत प्रसिद्ध है, जिसके तटपर अनेक बगीचे सुशोभित हैं । उसके भीतर अगाध जल भरा हुआ है । बहुत - से तपस्वी उसका सेवन करते हैं तथा वह सबके लिये कल्याण- स्वरूपा है ॥ २ ॥

वेणा भीमरथी चैव नद्यौ पापभयापहे ।

मृगद्विजसमाकीर्णे तापसालयभूषिते ॥ ३ ॥

वेणा और भीमरथी -ये दो नदियाँ भी दक्षिणमें ही हैं जो समस्त पापभयका नाश करनेवाली हैं । उसके दोनों तट अनेक प्रकारके पशु -पक्षियोंसे व्याप्त और तपस्वीजनोंके आश्रमोंसे विभूषित हैं ॥ ३ ॥

राजर्षेस्तस्य च सरिन्नृगस्य भरतर्षभ ।

रम्यतीर्था बहुजला पयोष्णी द्विजसेविता ॥ ४ ॥

भरतकुलभूषण! राजा नृगकी नदी पयोष्णी भी उधर ही है जो रमणीय तीर्थों और

अगाध जलसे सुशोभित है । द्विज उसका सेवन करते हैं ॥ ४ ॥

अपि चात्र महायोगी मार्कण्डेयो महायशाः ।

अनुवंश्यां जगौ गाथां नृगस्य धरणीपतेः ॥ ५ ॥

नृगस्य यजमानस्य प्रत्यक्षमिति नः श्रुतम् ।

अमाद्यदिन्द्रः सोमेन दक्षिणाभिर्द्विजातयः ॥ ६ ॥

पयोष्ण्यां यजमानस्य वाराहे तीर्थ उत्तमे ।

उद्धतं भूतलस्थं वा वायुना समुदीरितम् ।

पयोष्ण्या हरते तोयं पापमामरणान्तिकम् ॥ ७ ॥

इस विषयमें हमारे सुननेमें आया है कि महायोगी एवं महायशस्वी मार्कण्डेयने यजमान राजा नृगके सामने उनके वंशके योग्य यशोगाथाका वर्णन इस प्रकार किया था - ' पयोष्णीके तटपर उत्तम वाराहतीर्थमें यज्ञ करनेवाले राजा नृगके यज्ञमें इन्द्र सोमपान

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करके मस्त हो गये थे और प्रचुर दक्षिणा पाकर ब्राह्मणलोग भी हर्षोल्लाससे पूर्ण हो गये थे। ' पयोष्णीका जल हाथसे उठाया गया हो या धरतीपर पड़ा हो अथवा वायुके वेगसे उछलकर अपने ऊपर पड़ गया हो तो वह जन्मसे लेकर मृत्युपर्यन्त किये हुए समस्त पापोंको हर लेता है ॥ ५–७ ॥

स्वर्गादुत्तुङ्गममलं विषाणं यत्र शूलिनः ।

स्वमात्मविहितं दृष्ट्वा मर्त्यः शिवपुरं व्रजेत् ॥ ८ ॥

जहाँ भगवान् शंकरका स्वयं ही अपने लिये बनाया हुआ शृंग नामक वाद्यविशेष स्वर्गसे भी ऊँचा और निर्मल है, उसका दर्शन करके मरणधर्मा मानव शिवधाममें चला जाता है ॥ ८ ॥

एकतः सरितः सर्वा गङ्गाद्याः सलिलोच्चयाः ।

पयोष्णी चैकतः पुण्या तीर्थेभ्यो हि मता मम ॥ ९ ॥

एक ओर अगाध जलराशिसे भरी हुई गंगा आदि सम्पूर्ण नदियाँ हों और दूसरी ओर केवल पुण्यसलिला पयोष्णी नदी हो तो वही अन्य सब नदियोंकी अपेक्षा श्रेष्ठ है; ऐसा मेरा विचार है ॥ ९ ॥

माठरस्य वनं पुण्यं बहुमूलफलं शिवम् ।

यूपश्च भरतश्रेष्ठ वरुणस्रोतसे गिरौ ॥ १० ॥

भरतश्रेष्ठ! दक्षिणमें पवित्र माठरवन है, जो प्रचुर फलमूलसे सम्पन्न और कल्याणस्वरूप है । वहाँ वरुण- स्रोतस नामक पर्वतपर माठर ( सूर्यके पार्श्ववर्ती देवता) का विजय- स्तम्भ सुशोभित होता है ॥ १० ॥

प्रवेण्युत्तरमार्गे तु पुण्ये कण्वाश्रमे तथा ।

तापसानामरण्यानि कीर्तितानि यथाश्रुति ॥ ११ ॥

यह स्तम्भ प्रवेणी नदीके उत्तरवर्ती मार्गमें कण्वके पुण्यमय आश्रममें है । इस प्रकार जैसा कि मैंने सुन रखा था, तपस्वी महात्माओंके निवासयोग्य वनोंका वर्णन किया है ॥ ११ ॥

वेदी शूर्पारके तात जमदग्नेर्महात्मनः ।

रम्या पाषाणतीर्था च पुनश्चन्द्रा च भारत ॥ १२ ॥

तात! शूर्पारकक्षेत्रमें महात्मा जमदग्निकी वेदी है । भारत! वहीं रमणीय पाषाणतीर्था और पुनश्चन्द्रा नामक तीर्थ-विशेष हैं ॥ १२ ॥

अशोकतीर्थं तत्रैव कौन्तेय बहुलाश्रमम् ।

अगस्त्यतीर्थं पाण्ड्येषु वारुणं च युधिष्ठिर ॥ १३ ॥

कुमार्यः कथिताः पुण्याः पाण्ड्येष्वेव नरर्षभ ।

ताम्रपर्णी तु कौन्तेय कीर्तयिष्यामि तां शृणु ॥ १४ ॥

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कुन्तीनन्दन! उसी क्षेत्रमें अशोकतीर्थ है, जहाँ महर्षियोंके बहुत- से आश्रम हैं । युधिष्ठिर! पाण्ड्यदेशमें अगस्त्यतीर्थ और वारुणतीर्थ है । नरश्रेष्ठ! पाण्ड्यदेशके भीतर पवित्र कुमारी कन्याएँ ( कन्याकुमारी तीर्थ ) कही गयी हैं । कुन्तीकुमार! अब मैं तुमसे ताम्रपर्णी नदीकी महिमाका वर्णन करूँगा, सुनो ॥ १३-१४ ॥

यत्र देवैस्तपस्तप्तं महदिच्छद्भिराश्रमे ।

गोकर्ण इति विख्यातस्त्रिषु लोकेषु भारत ॥ १५ ॥

भरतनन्दन! वहाँ मोक्ष पानेकी इच्छासे देवताओंने आश्रममें रहकर बड़ी भारी तपस्या की थी । वहाँका गोकर्णतीर्थ तीनों लोकोंमें विख्यात है ॥ १५ ॥

शीततोयो बहुजलः पुण्यस्तात शिवः शुभः ।

ह्रदः परमदुष्प्रापो मानुषैरकृतात्मभिः ॥ १६ ॥

तात! गोकर्णतीर्थमें शीतल जल भरा रहता है । उसकी जलराशि अनन्त है । वह पवित्र, कल्याणमय और शुभ है । जिनका अन्तःकरण शुद्ध नहीं है, ऐसे मनुष्योंके लिये गोकर्णतीर्थ अत्यन्त दुर्लभ है ॥ १६ ॥

तत्र वृक्षतृणाद्यैश्च सम्पन्नः फलमूलवान् ।

आश्रमोऽगस्त्यशिष्यस्य पुण्यो देवसमो गिरिः ॥ १७ ॥

वहाँ अगस्त्यके शिष्यका पुण्यमय आश्रम है, जो वृक्षों और तृण आदिसे सम्पन्न एवं

फल - मूलोंसे परिपूर्ण है । देवसम नामक पर्वत ही वह आश्रम है ॥ १७ ॥

वैदूर्यपर्वतस्तत्र श्रीमान् मणिमयः शिवः ।

अगस्त्यस्याश्रमश्चैव बहुमूलफलोदकः ॥ १८ ॥

वहाँ परम सुन्दर मणिमय वैदूर्यपर्वत है जो शिवस्वरूप है । उसीपर महर्षि अगस्त्यका आश्रम है जो प्रचुर फल- मूल और जलसे सम्पन्न है ॥ १८ ॥

सुराष्ट्रेष्वपि वक्ष्यामि पुण्यान्यायतनानि च ।

आश्रमान् सरितश्चैव सरांसि च नराधिप ॥ १ ९ ॥

नरेश्वर! अब मैं सुराष्ट्र ( सौराष्ट्र) - देशीय पुण्य स्थानों, मन्दिरों, आश्रमों, सरिताओं और सरोवरोंका वर्णन करता हूँ ॥ १ ९ ॥

चमसोद्भेदनं विप्रास्तत्रापि कथयन्त्युत ।

प्रभासं चोदधौ तीर्थं त्रिदशानां युधिष्ठिर ॥ २० ॥

विप्रगण! वहीं चमसोद्भेदतीर्थकी चर्चा की जाती है । युधिष्ठिर! सुराष्ट्रमें ही समुद्रके तटपर प्रभासक्षेत्र है जो देवताओंका तीर्थ कहा गया है ॥ २० ॥

तत्र पिण्डारकं नाम तापसाचरितं शिवम् ।

उज्जयन्तश्च शिखरी क्षिप्रं सिद्धिकरो महान् ॥ २१ ॥

वहीं पिण्डारक नामक तीर्थ है जो तपस्वी जनोंद्वारा सेवित और कल्याणस्वरूप है ।

उधर ही उज्जयन्त नामक महान् पर्वत है जो शीघ्र सिद्धि प्रदान करनेवाला है ॥ २१ ॥

पृष्ठ 659

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तत्र देवर्षिवर्येण नारदेनानुकीर्तितः ।

पुराणः श्रूयते श्लोकस्तं निबोध युधिष्ठिर ॥ २२ ॥

युधिष्ठिर! उसके विषयमें देवर्षिप्रवर श्रीनारदजीके द्वारा कहा हुआ एक प्राचीन श्लोक सुना जाता है, उसको मुझसे सुनो ॥ २२ ॥

पुण्ये गिरौ सुराष्ट्रेषु मृगपक्षिनिषेविते ।

उज्जयन्ते स्म तप्ताङ्गो नाकपृष्ठे महीयते ॥ २३ ॥

सुराष्ट्र देशमें मृगों और पक्षियोंसे सेवित उज्जयन्त नामक पुण्यपर्वतपर तपस्या करनेवाला पुरुष स्वर्गलोकमें पूजित होता है ॥ २३ ॥

पुण्या द्वारवती तत्र यत्रासौ मधुसूदनः ।

साक्षाद् देवः पुराणोऽसौ स हि धर्मः सनातनः ॥ २४ ॥

उज्जयन्तके ही आस - पास पुण्यमयी द्वारकापुरी है जहाँ साक्षात् पुराणपुरुष भगवान्

मधुसूदन निवास करते हैं । वे ही सनातन धर्मस्वरूप हैं ॥ २४ ॥

ये च वेदविदो विप्रा ये चाध्यात्मविदो जनाः ।

ते वदन्ति महात्मानं कृष्णं धर्मं सनातनम् ॥ २५ ॥

जो वेदवेत्ता और अध्यात्मशास्त्रके विद्वान् ब्राह्मण हैं, वे परमात्मा श्रीकृष्णको ही सनातन धर्मरूप बताते हैं ॥ ५४ ॥

पवित्राणां हि गोविन्दः पवित्रं परमुच्यते ।

पुण्यानामपि पुण्योऽसौ मङ्गलानां च मङ्गलम् ।

त्रैलोक्ये पुण्डरीकाक्षो देवदेवः सनातनः ॥ २६ ॥

अव्ययात्मा व्ययात्मा च क्षेत्रज्ञः परमेश्वरः ।

आस्ते हरिरचिन्त्यात्मा तत्रैव मधुसूदनः ॥ २७ ॥

भगवान् गोविन्द पवित्रोंको भी पावन करनेवाले परम पवित्र कहे जाते हैं । वे पुण्योंके भी पुण्य और मंगलोंके भी मंगल हैं । कमलनयन देवाधिदेव सनातन श्रीहरि अविनाशी परमात्मा, व्ययात्मा ( क्षरपुरुष ), क्षेत्रज्ञ और परमेश्वर हैं । वे अचिन्त्यस्वरूप भगवान् मधुसूदन वहीं द्वारकापुरीमें विराजमान हैं ॥ २६-२७ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि धौम्यतीर्थयात्रायामष्टाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८८ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें धौम्यतीर्थयात्राविषयक अठासीवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ८८ ॥

पृष्ठ 660

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एकोननवतितमोऽध्यायः धौम्यद्वारा पश्चिम दिशाके तीर्थोंका वर्णन धौम्य उवाच

आनर्तेषु प्रतीच्यां वै कीर्तयिष्यामि ते दिशि ।

यानि तत्र पवित्राणि पुण्यान्यायतनानि च ॥ १ ॥

धौम्यजी कहते हैं — युधिष्ठिर! अब मैं पश्चिम दिशाके आनर्तदेशमें जो-जो पवित्र तीर्थ और पुण्यस्वरूप देवालय हैं, उन सबका वर्णन करूँगा ॥ १ ॥

प्रियङ्ग्वाम्रवणोपेता वानीरफलमालिनी ।

प्रत्यक्स्रोता नदी पुण्या नर्मदा तत्र भारत ॥ २ ॥

भरतनन्दन! पश्चिम दिशामें पुण्यमयी नर्मदा नदी प्रवाहित होती है, जिसकी धारा पूर्वसे पश्चिमकी ओर है । उसके तटपर प्रियंगु और आमके वृक्षोंका वन है । बेंत तथा फलवाले वृक्षोंकी श्रेणियाँ भी उसकी शोभा बढ़ाती हैं ॥ २ ॥

त्रैलोक्ये यानि तीर्थानि पुण्यान्यायतनानि च ।

सरिद्वनानि शैलेन्द्रा देवाश्च सपितामहाः ॥ ३ ॥

नर्मदायां कुरुश्रेष्ठ सह सिद्धर्षिचारणैः ।

स्नातुमायान्ति पुण्यौघैः सदा वारिषु भारत ॥ ४ ॥

भरतनन्दन कुरुश्रेष्ठ! त्रिलोकीमें जो- जो पुण्यतीर्थ, मन्दिर, नदी, वन, पर्वत, ब्रह्मा आदि देवता, सिद्ध, ऋषि, चारण एवं पुण्यात्माओंके समूह हैं, वे सब सदा नर्मदाके जलमें स्नान करनेके लिये आया करते हैं ॥ ३-४ ॥

निकेतः श्रूयते पुण्यो यत्र विश्रवसो मुनेः ।

जज्ञे धनपतिर्यत्र कुबेरो नरवाहनः ॥ ५ ॥

वहीं मुनिवर विश्रवाका पवित्र आश्रम सुना जाता है, जहाँ नरवाहन धनाध्यक्ष कुबेरका जन्म हुआ था ॥ ५ ॥

वैदूर्यशिखरो नाम पुण्यो गिरिवरः शिवः ।

नित्यपुष्पफलास्तत्र पादपा हरितच्छदाः ॥ ६ ॥

वैदूर्यशिखर नामक मंगलमय पवित्र पर्वत भी नर्मदा तटपर है, वहाँ हरे- हरे पत्तोंसे सुशोभित सदा फल और फूलोंके भारसे लदे हुए वृक्ष शोभा पाते हैं ॥

तस्य शैलस्य शिखरे सरः पुण्यं महीपते ।

फुल्लपद्मं महाराज देवगन्धर्वसेवितम् ॥ ७ ॥

राजन्! उस पर्वतके शिखरपर एक पुण्य सरोवर है जिसमें सदा कमल खिले रहते हैं ।

महाराज! देवता और गन्धर्व भी उस पुण्यतीर्थका सेवन करते हैं ॥ ७ ॥