श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 701–710
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 701–710
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अष्टनवतितमोऽध्यायः धन प्राप्त करनेके लिये अगस्त्यका श्रुतर्वा, ब्रध्नश्व और त्रसदस्यु आदिके पास जाना लोमशउवाच
ततो जगाम कौरव्य सोऽगस्त्यो भिक्षितुं वसु ।
श्रुतर्वाणं महीपालं यं वेदाभ्यधिकं नृपैः ॥ १ ॥
लोमशजी कहते हैं- कुरुनन्दन! तदनन्तर अगस्त्यजी धन माँगनेके लिये महाराज श्रुतर्वाके पास गये, जिन्हें वे सब राजाओंसे अधिक वैभवसम्पन्न समझते थे ॥ १ ॥
स विदित्वा तु नृपतिः कुम्भयोनिमुपागतम् ।
विषयान्ते सहामात्यः प्रत्यगृह्णात् सुसत्कृतम् ॥ २ ॥
राजाको जब यह मालूम हुआ कि महर्षि अगस्त्य मेरे यहाँ आ रहे हैं, तब वे मन्त्रियोंके साथ अपने राज्यकी सीमापर चले आये और बड़े आदर - सत्कारसे उन्हें अपने साथ लिवा ले गये ॥ २ ॥
तस्मै चार्घ्यं यथान्यायमानीय पृथिवीपतिः ।
प्राञ्जलिः प्रयतो भूत्वा पप्रच्छागमनेऽर्थिताम् ॥ ३ ॥
भूपाल श्रुतर्वाने उनके लिये यथायोग्य अर्घ्य निवेदन करके विनीतभावसे हाथ जोड़कर उनके पधारनेका प्रयोजन पूछा ॥ ३ ॥
अगस्त्य उवाच
वित्तार्थिनमनुप्राप्तं विद्धि मां पृथिवीपते ।
यथाशक्त्यविहिंस्यान्यान् संविभागं प्रयच्छ मे ॥ ४ ॥
तब अगस्त्यजीने कहा – पृथ्वीपते! आपको मालूम होना चाहिये कि मैं धन माँगनेके लिये आपके यहाँ आया हूँ । दूसरे प्राणियोंको कष्ट न देते हुए यथाशक्ति अपने धनका जितना अंश मुझे दे सकें, दे दें ॥ ४ ॥
लोमशउवाच
तत आयव्ययौ पूर्णौ तस्मै राजा न्यवेदयत् ।
अतो विद्वन्नुपादत्स्व यदत्र वसु मन्यसे ॥ ५ ॥
लोमशजी कहते हैं - युधिष्ठिर! तब राजा श्रुतर्वाने महर्षिके सामने अपने आय-व्ययका पूरा ब्योरा रख दिया और कहा- ' ज्ञानी महर्षे! इस धनमेंसे जो आप ठीक समझें, वह ले लें ' ॥ ५ ॥
तत आयव्ययौ दृष्ट्वा समौ सममतिर्द्विजः ।
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सर्वथा प्राणिनां पीडामुपादानादमन्यत ॥ ६ ॥
ब्रह्मर्षि अगस्त्यकी बुद्धि सम थी । उन्होंने आय और व्यय दोनोंको बराबर देखकर यह विचार किया कि इसमेंसे थोड़ा- सा भी धन लेनेपर दूसरे प्राणियोंको सर्वथा कष्ट हो सकता है ॥ ६ ॥
स श्रुतर्वाणमादाय ब्रध्नश्वमगमत् ततः ।
स च तौ विषयस्यान्ते प्रत्यगृह्णाद् यथाविधि ॥ ७ ॥
तब वे श्रुतर्वाको साथ लेकर राजा ब्रध्नश्वके पास गये । उन्होंने भी अपने राज्यकी सीमापर आकर उन दोनों सम्माननीय अतिथियोंकी अगवानी की और विधिपूर्वक उन्हें अपनाया ॥ ७ ॥
तयोरर्घ्यं च पाद्यं च ब्रध्नश्वः प्रत्यवेदयत् ।
अनुज्ञाप्य च पप्रच्छ प्रयोजनमुपक्रमे ॥ ८ ॥
ब्रध्नश्वने उन दोनोंको अर्घ्य और पाद्य निवेदन किये, फिर उनकी आज्ञा ले अपने यहाँ पधारनेका प्रयोजन पूछा ॥ ८ ॥
अगस्त्य उवाच
वित्तकामाविह प्राप्तौ विद्धयावां पृथिवीपते ।
यथाशक्त्यविहिंस्यान्यान् संविभागं प्रयच्छ नौ ॥ ९ ॥
अगस्त्यजीने कहा — पृथ्वीपते! आपको विदित हो कि हम दोनों आपके यहाँ धनकी इच्छासे आये हैं । दूसरे प्राणियोंको कष्ट न देते हुए जो धन आपके पास बचता हो, उसमेंसे यथाशक्ति कुछ भाग हमें भी दीजिये ॥ ९ ॥
लोमशउवाच
तत आयव्ययौ पूर्णौ ताभ्यां राजा न्यवेदयत् ।
अतो ज्ञात्वा तु गृह्णीतं यदत्र व्यतिरिच्यते ॥ १० ॥
लोमशजी कहते हैं- युधिष्ठिर! तब राजा ब्रध्नश्वने भी उन दोनोंके सामने आय और व्ययका पूरा विवरण रख दिया और कहा- ' आप दोनोंको इसमें जो धन अधिक जान पड़ता हो, वह ले लें ' ॥ १० ॥
तत आयव्ययौ दृष्ट्वा समौ सममतिर्द्विजः ।
सर्वथा प्राणिनां पीडामुपादानादमन्यत ॥ ११ ॥
तब समान बुद्धिवाले ब्रह्मर्षि अगस्त्यने उस विवरणमें आय और व्यय बराबर देखकर यह निश्चय किया कि इसमें से यदि थोड़ा- सा भी धन लिया जाय तो दूसरे प्राणियोंको सर्वथा कष्ट हो सकता है ॥ ११ ॥
पौरुकुत्सं ततो जग्मुस्त्रसदस्युं महाधनम् ।
अगस्त्यश्च श्रुतर्वा च ब्रध्नश्वश्च महीपतिः ॥ १२ ॥
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तब अगस्त्य, श्रुतर्वा और ब्रध्नश्व– तीनों पुरुकुत्सनन्दन- महाधनी त्रसदस्युके पास गये ॥ १२ ॥
त्रसदस्युस्तु तान् दृष्ट्वा प्रत्यगृह्णाद् यथाविधि ।
अभिगम्य महाराज विषयान्ते महामनाः ॥ १३ ॥
अर्चयित्वा यथान्यायमिक्ष्वाकू राजसत्तमः ।
समस्तांश्च ततोऽपृच्छत् प्रयोजनमुपक्रमे ॥ १४ ॥
महाराज! भूपालोंमें श्रेष्ठ इक्ष्वाकुवंशी महामना त्रसदस्युने उन्हें आते देख राज्यकी सीमापर पहुँचकर विधिपूर्वक उन सबका स्वागत - सत्कार किया और उन सबसे अपने यहाँ पधारनेका प्रयोजन पूछा ॥ १३-१४ ॥ अगस्त्य उवाच
वित्तकामानिह प्राप्तान् विद्धि नः पृथिवीपते ।
यथाशक्त्यविहिंस्यान्यान् संविभागं प्रयच्छ नः ॥ १५ ॥
अगस्त्यने कहा — पृथ्वीपते! आपको विदित हो कि हम धनकी कामनासे यहाँ आये हैं । आप दूसरे प्राणियोंको पीड़ा न देते हुए यथाशक्ति अपने धनका कुछ भाग हम सबको दीजिये ॥ १५ ॥
लोमश उवाच
तत आयव्ययौ पूर्णौ तेषां राजा न्यवेदयत् ।
एतज्ज्ञात्वा ह्युपादध्वं यदत्र व्यतिरिच्यते ॥ १६ ॥
तत आयव्ययौ दृष्ट्वा समौ सममतिर्द्विजः ।
सर्वथा प्राणिनां पीडामुपादानादमन्यत ॥ १७ ॥
लोमशजी कहते हैं— युधिष्ठिर! तब राजाने उन्हें अपने आय- व्ययका पूरा विवरण दे दिया और कहा – ' इसे समझकर जो धन शेष बचता हो, वह आपलोग ले लें । ’ समबुद्धिवाले महर्षि अगस्त्यने वहाँ भी आय- व्ययका लेखा बराबर देखकर यही माना कि इसमेंसे धन लिया जाय तो दूसरे प्राणियोंको सर्वथा कष्ट हो सकता है ॥ १६-१७ ॥
ततः सर्वे समेत्याथ ते नृपास्तं महामुनिम् ।
इदमूचुर्महाराज समवेक्ष्य परस्परम् ॥ १८ ॥
महाराज! तब वे सब राजा परस्पर मिलकर एक- दूसरेकी ओर देखते हुए महामुनि अगस्त्यसे इस प्रकार बोले— ॥ १८ ॥
अयं वै दानवो ब्रह्मन्निल्वलो वसुमान् भुवि ।
तमतिक्रम्य सर्वेऽद्य वयं चार्थामहे वसु ॥ १ ९ ॥
‘ब्रह्मन्! यह इल्वल दानव इस पृथ्वीपर सबसे अधिक धनी है । हम सब लोग उसीके पास चलकर आज धन माँगें ' ॥ १ ९ ॥
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लोमशउवाच
तेषां तदासीदुचितमिल्वलस्यैव भिक्षणम् ।
ततस्ते सहिता राजन्निल्वलं समुपाद्रवन् ॥ २० ॥
लोमशजी कहते हैं— युधिष्ठिर! उस समय उन सबको इल्वलके यहाँ याचना करना ही ठीक जान पड़ा, अतः वे एक साथ होकर इल्वलके यहाँ शीघ्रतापूर्वक गये ॥ २० ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायामगस्त्योपाख्याने अष्टनवतितमोऽध्यायः ॥ ९ ८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें अगस्त्योपाख्यानविषयक अट्ठानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९८ ॥
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एकोनशततमोऽध्यायः अगस्त्यजीका इल्वलके यहाँ धनके लिये जाना, वातापि तथा इल्वलका वध, लोपामुद्राको पुत्रकी प्राप्ति तथा श्रीरामके द्वारा हरे हुए तेजकी परशुरामजीको तीर्थस्नानद्वारा पुनः प्राप्ति लोमशउवाच
इल्वलस्तान् विदित्वा तु महर्षिसहितान् नृपान् ।
उपस्थितान् सहामात्यो विषयान्ते ह्यपूजयत् ॥ १ ॥
लोमशजी कहते हैं - राजन्! इल्वलने महर्षिसहित उन राजाओंको आता जान मन्त्रियोंके साथ अपने राज्यकी सीमापर उपस्थित होकर उन सबका पूजन किया ॥
तेषां ततोऽसुरश्रेष्ठस्त्वातिथ्यमकरोत् तदा ।
सुसंस्कृतेन कौरव्य भ्रात्रा वातापिना यदा ॥ २ ॥
कुरुनन्दन! उस समय असुरश्रेष्ठ इल्वलने अपने भाई वातापिका मांस राँधकर उसके द्वारा उन सबका आतिथ्य किया ॥ २ ॥
ततो राजर्षयः सर्वे विषण्णा गतचेतसः ।
वातापिं संस्कृतं दृष्ट्वा मेषभूतं महासुरम् ॥ ३ ॥
भेड़के रूपमें महान् दैत्य वातापिको ही राँधा गया देख उन सभी राजर्षियोंका मन खिन्न हो गया और वे अचेतसे हो गये ॥ ३ ॥
अथाब्रवीदगस्त्यस्तान् राजर्षीनृषिसत्तमः ।
विषादो वो न कर्तव्यो ह्यहं भोक्ष्ये महासुरम् ॥ ४ ॥
धुर्यासनमथासाद्य निषसाद महानृषिः ।
तं पर्यवेषद् दैत्येन्द्र इल्वलः प्रहसन्निव ॥ ५ ॥
तब ऋषिश्रेष्ठ अगस्त्यने उन राजर्षियोंसे (आश्वासन देते हुए) कहा – ' तुमलोगोंको चिन्ता नहीं करनी चाहिये । मैं ही इस महादैत्यको खा जाऊँगा । ' ऐसा कहकर महर्षि अगस्त्य प्रधान आसनपर जा बैठे और दैत्यराज इल्वलने हँसते हुए - से उन्हें वह मांस परोस दिया ॥ ४-५ ॥
अगस्त्य एव कृत्स्नं तु वातापिं बुभुजे ततः ।
भुक्तवत्यसुरोऽऽह्वानमकरोत् तस्य चेल्वलः ॥ ६ ॥
अगस्त्यजी ही वातापिका सारा मांस खा गये; जब वे भोजन कर चुके, तब असुर इल्वलने वातापिका नाम लेकर पुकारा ॥ ६ ॥
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ततो वायुः प्रादुरभूदधस्तस्य महात्मनः ।
शब्देन महता तात गर्जन्निव यथा घनः ॥ ७ ॥
तात! उस समय महात्मा अगस्त्यकी गुदासे गर्जते हुए मेघकी भाँति भारी आवाजके साथ अधोवायु निकली ॥ ७ ॥
वातापे निष्क्रमस्वेति पुनः पुनरुवाच ह ।
तं प्रहस्याब्रवीद् राजन्नगस्त्यो मुनिसत्तमः ॥ ८ ॥
इल्वल बार- बार कहने लगा- ' वातापे! निकलो-निकलो । ' राजन्! तब मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यने उससे हँसकर कहा— ॥ ८ ॥
कुतो निष्क्रमितुं शक्तो मया जीर्णस्तु सोऽसुरः ।
इल्वलस्तु विषण्णोऽभूद् दृष्ट्वा जीर्णं महासुरम् ॥ ९ ॥
‘ अब वह कैसे निकल सकता है, मैंने ( लोकहितके लिये ) उस असुरको पचा लिया है । ' महादैत्य वातापिको पच गया देख इल्वलको बड़ा खेद हुआ ॥ ९ ॥
प्राञ्जलिश्च सहामात्यैरिदं वचनमब्रवीत् ।
किमर्थमुपयाताः स्थ ब्रूत किं करवाणि वः ॥ १० ॥
उसने मन्त्रियोंसहित हाथ जोड़कर उन अतिथियोंसे यह बात पूछी - ' आपलोग किस प्रयोजनसे यहाँ पधारे हैं, बताइये, मैं आपलोगोंकी क्या सेवा करूँ? ' ॥ १० ॥
प्रत्युवाच ततोऽगस्त्यः प्रहसन्निल्वलं तदा ।
ईशं ह्यसुर विद्मस्त्वां वयं सर्वे धनेश्वरम् ॥ ११ ॥
तब महर्षि अगस्त्यने हँसकर इल्वलसे कहा- ' असुर! हम सब लोग तुम्हें शक्तिशाली शासक एवं धनका स्वामी समझते हैं ॥ ११ ॥
एते च नातिधनिनो धनार्थश्च महान् मम ।
यथाशक्त्यविहिंस्यान्यान् संविभागं प्रयच्छ नः ॥ १२ ॥
‘ ये नरेश अधिक धनवान् नहीं हैं और मुझे बहुत धनकी आवश्यकता आ पड़ी है । अतः दूसरे जीवोंको कष्ट न देते हुए अपने धनमेंसे यथाशक्ति कुछ भाग हमें दो ' ॥ १२ ॥
ततोऽभिवाद्य तमृषिमिल्वलो वाक्यमब्रवीत् ।
दित्सितं यदि वेत्सि त्वं ततो दास्यामि ते वसु ॥ १३ ॥
तब इल्वलने महर्षिको प्रणाम करके कहा- ' मैं कितना धन देना चाहता हूँ? यह बात यदि आप जान लें तो मैं आपको धन दूँगा ' ॥ १३ ॥
अगस्त्य उवाच
गवां दशसहस्राणि राज्ञामेकैकशोऽसुर ।
तावदेव सुवर्णस्य दित्सितं ते महासुर ॥ १४ ॥
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अगस्त्यजीने कहा – महान् असुर! तुम इनमेंसे एक-एक राजाको दस - दस हजार गौएँ तथा इतनी ही ( दस- दस हजार) सुवर्णमुद्राएँ देना चाहते हो ॥ १४ ॥
मह्यं ततो वै द्विगुणं रथश्चैव हिरण्मयः ।
मनोजवौ वाजिनौ च दित्सितं ते महासुर ॥ १५ ॥
इन राजाओंकी अपेक्षा दूनी गौएँ और सुवर्ण मुद्राएँ तुमने मेरे लिये देनेका विचार किया है । महादैत्य! इसके सिवा एक स्वर्णमय रथ, जिसमें मनके समान तीव्रगामी दो घोड़े जुते हों, तुम मुझे और देना चाहते हो ॥ १५ ॥
(लोमश उवाच
इल्वलस्तु मुनिं प्राह सर्वमस्ति यथाऽऽत्थ माम् ।
रथं तु यमवोचो मां नैनं विद्मो हिरण्मयम् ॥
लोमशजी कहते हैं - राजन्! इसपर इल्वलने अगस्त्य मुनिसे कहा कि ' आपने मुझसे जो कुछ कहा है, वह सब सत्य है; किंतु आपने जो मुझसे रथकी बात कही है, उस रथको हमलोग सुवर्णमय नहीं समझते हैं' । अगस्त्य उवाच न मे वागनृता काचिदुक्तपूर्वा महासुर । ) जिज्ञास्यतां रथः सद्यो व्यक्त एष हिरण्मयः । अगस्त्यजीने कहा — महादैत्य! मेरे मुँहसे पहले कभी कोई बात झूठी नहीं निकली है, अतः शीघ्र पता लगाओ, यह रथ निश्चय ही सोनेका है ॥ लोमशउवाच
जिज्ञास्यमानः स रथः कौन्तेयासीद्धिरण्मयः ।
ततः प्रव्यथितो दैत्यो ददावभ्यधिकं वसु ॥ १६ ॥
लोमशजी कहते हैं— कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर! पता लगानेपर वह रथ सोनेका ही निकला, तब मनमें ( भाईकी मृत्युसे ) व्यथित हुए उस दैत्यने महर्षिको बहुत अधिक धन दिया ॥ १६ ॥
विरावश्च सुरावश्च तस्मिन् युक्तौ रथे हयौ ।
ऊहतुः सवसूनाशु तावगस्त्याश्रमं प्रति ॥ १७ ॥
सर्वान् राज्ञः सहागस्त्यान् निमेषादिव भारत ।
( इल्वलस्त्वनुगम्यैनमगस्त्यं हन्तुमैच्छत ।
भस्म चक्रे महातेजा हुंकारेण महासुरम् ॥
मुनेराश्रममश्वौ तौ निन्यतुर्वातरंहसौ । ) अगस्त्येनाभ्यनुज्ञाता जग्मू राजर्षयस्तदा ।
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कृतवांश्च मुनिः सर्व लोपामुद्राचिकीर्षितम् ॥ १८ ॥
उस रथमें विराव और सुराव नामक दो घोड़े जुते हुए थे । वे धनसहित राजाओं तथा अगस्त्य मुनिको शीघ्र ही मानो पलक मारते ही अगस्त्याश्रमकी ओर ले भागे । उस समय इल्वल असुरने अगस्त्य मुनिके पीछे जाकर उनको मारनेकी इच्छा की, परंतु महातेजस्वी अगस्त्यमुनिने उस महादैत्य इल्वलको हुंकारसे ही भस्म कर दिया । तदनन्तर उन वायुके समान वेगवाले घोड़ोंने उन सबको मुनिके आश्रमपर पहुँचा दिया । भरतनन्दन! फिर अगस्त्यजीकी आज्ञा ले वे राजर्षिगण अपनी - अपनी राजधानीको चले गये और महर्षिने लोपामुद्राकी सभी इच्छाएँ पूर्ण कीं ॥ १७-१८ ॥ लोपामुद्रोवाच
कृतवानसि तत् सर्वं भगवन् मम काङ्क्षितम् ।
उत्पादय सकृन्मह्यमपत्यं वीर्यवत्तरम् ॥ १ ९ ॥
लोपामुद्रा बोली– भगवन्! मेरी जो - जो अभिलाषा थी, वह सब आपने पूर्ण कर दी ।
अब मुझसे एक अत्यन्त शक्तिशाली पुत्र उत्पन्न कीजिये ॥ १ ९ ॥
अगस्त्य उवाच
तुष्टोऽहमस्मि कल्याणि तव वृत्तेन शोभने ।
विचारणामपत्ये तु तव वक्ष्यामि तां शृणु ॥ २० ॥
अगस्त्यजीने कहा— शोभामयी कल्याणी! तुम्हारे सद्व्यवहारसे मैं बहुत संतुष्ट हूँ ।
पुत्रके सम्बन्धमें तुम्हारे सामने एक विचार उपस्थित करता हूँ, सुनो ॥ २० ॥
सहस्रं तेऽस्तु पुत्राणां शतं वा दशसम्मितम् ।
दश वा शततुल्याः स्युरेको वापि सहस्रजित् ॥ २१ ॥
क्या तुम्हारे गर्भसे एक हजार या एक सौ पुत्र उत्पन्न हों, जो दसके ही समान हों? अथवा दस ही पुत्र हों, जो सौ पुत्रोंकी समानता करनेवाले हों? अथवा एक ही पुत्र हो, जो हजारोंको जीतनेवाला हो? ॥ २१ ॥
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लोपामुद्रोवाच
सहस्रसम्मितः पुत्र एकोऽप्यस्तु तपोधन ।
एको हि बहुभिः श्रेयान् विद्वान् साधुरसाधुभिः ॥ २२ ॥
लोपामुद्रा बोली- तपोधन! मुझे सहस्रोंकी समानता करनेवाला एक ही श्रेष्ठ पुत्र प्राप्त हो; क्योंकि बहुत - से दुष्ट पुत्रोंकी अपेक्षा एक ही विद्वान् एवं श्रेष्ठ पुत्र उत्तम माना गया है ॥ २२ ॥
लोमशउवाच
स तथेति प्रतिज्ञाय तया समभवन्मुनिः ।
समये समशीलिन्या श्रद्धावाञ्छ्रद्दधानया ॥ २३ ॥
लोमशजी कहते हैं— राजन्! तब ' तथास्तु ' कहकर श्रद्धालु महात्मा अगस्त्यने समान शील- स्वभाववाली श्रद्धालु पत्नी लोपामुद्राके साथ यथासमय समागम किया ॥ २३ ॥
तत आधाय गर्भं तमगमद् वनमेव सः ।
तस्मिन् वनगते गर्भो ववृधे सप्त शारदान् ॥ २४ ॥
गर्भाधान करके अगस्त्यजी फिर वनमें ही चले गये । उनके वनमें चले जानेपर वह गर्भ सात वर्षोंतक माताके पेटमें ही पलता और बढ़ता रहा ॥ २४ ॥
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सप्तमेऽब्दे गते चापि प्राच्यवत् स महाकविः ।
ज्वलन्निव प्रभावेण दृढस्युर्नाम भारत ॥ २५ ॥
भारत! सात वर्ष बीतनेपर अपने तेज और प्रभावसे प्रज्वलित होता हुआ वह गर्भ उदरसे बाहर निकला । वही महाविद्वान् दृढस्युके नामसे विख्यात हुआ ॥ २५ ॥
साङ्गोपनिषदान् वेदाञ्जपन्निव महातपाः ।
तस्य पुत्रोऽभवदृषेः स तेजस्वी महाद्विजः ॥ २६ ॥
महर्षिका वह महातपस्वी और तेजस्वी पुत्र जन्म- कालसे ही अंग और उपनिषदोंसहित सम्पूर्ण वेदोंका स्वाध्याय- सा करता जान पड़ा । दृढस्यु ब्राह्मणोंमें महान् माने गये ॥ २६ ॥
स बाल एव तेजस्वी पितुस्तस्य निवेशने ।
इध्मानां भारमाजह्रे इध्मवाहस्ततोऽभवत् ॥ २७ ॥
पिताके घरमें रहते हुए तेजस्वी दृढस्यु बाल्य कालसे ही इध्म ( समिधा) -का भार वहन करके लाने लगे; अतः ' इध्मवाह' नामसे विख्यात हो गये ॥ २७ ॥
तथायुक्तं तु तं दृष्ट्वा मुमुदे स मुनिस्तदा ।
एवं स जनयामास भारतापत्यमुत्तमम् ॥ २८ ॥
अपने पुत्रको स्वाध्याय और समिधानयनके कार्यमें संलग्न देख महर्षि अगस्त्य उस समय बहुत प्रसन्न हुए । भारत! इस प्रकार अगस्त्यजीने उत्तम संतान उत्पन्न की ॥ २८ ॥
लेभिरे पितरश्चास्य लोकान् राजन् यथेप्सितान् ।
तत ऊर्ध्वमयं ख्यातस्त्वगस्त्यस्याश्रमो भुवि ॥ २ ९ ॥
राजन्! तदनन्तर उनके पितरोंने मनोवांछित लोक प्राप्त कर लिये । उसके बादसे यह स्थान इस पृथ्वीपर अगस्त्याश्रमके नामसे विख्यात हो गया ॥ २ ९ ॥
प्राह्लादिरेवं वातापिरगस्त्येनोपशामितः ।
तस्यायमाश्रमो राजन् रमणीयैर्गुणैर्युतः ॥ ३० ॥
वातापि प्रह्लादके गोत्रमें उत्पन्न हुआ था, जिसे अगस्त्यजीने इस प्रकार शान्त कर दिया । राजन्! यह उन्हींका रमणीय गुणोंसे युक्त आश्रम है ॥ ३० ॥
एषा भागीरथी पुण्या देवगन्धर्वसेविता ।
वातेरिता पताकेव विराजति नभस्तले ॥ ३१ ॥
इसके समीप यह वही देव- गन्धर्वसेवित पुण्यसलिला भागीरथी है, जो आकाशमें वायुकी प्रेरणासे फहरानेवाली श्वेत पताकाके समान सुशोभित हो रही है ॥ ३१ ॥
प्रतार्यमाणा कूटेषु यथा निम्नेषु नित्यशः ।
शिलातलेषु संत्रस्ता पन्नगेन्द्रवधूरिव ॥ ३२ ॥
यह क्रमशः नीचे - नीचेके शिखरोंपर गिरती हुई सदा तीव्रगतिसे बहती है और शिलाखण्डोंके नीचे इस प्रकार समायी जाती है, मानो भयभीत सर्पिणी बिलमें घुसी जा रही हो ॥ ३२ ॥