अगस्त्योपाख्यान : ऋषियों के तेज और सगरपुत्रों के विनाश का क्या कारण था?
तप और क्षमा का धर्म
महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
महाभारत — खण्ड २ · वनपर्व → तीर्थयात्रापर्व · अध्याय 96–108 · पृष्ठ 690–766
8,838 शब्द · 45 मिनटका पाठ · 40 श्लोक
लोमश मुनि ने युधिष्ठिर (कौन्तेय) से कहा
अगस्त्याश्रम में तीर्थयात्रा के समय
वैशम्पायन जी कहते हैं— जनमेजय! तदनन्तर प्रचुर दक्षिणा देनेवाले कुन्तीनन्दन राजा युधिष्ठिर ने गया से प्रस्थान किया और अगस्त्याश्रम में जाकर दुर्जय मणिमती नगरी में निवास किया। वहीं वक्ताओं में श्रेष्ठ राजा युधिष्ठिर ने महर्षि लोमश से पूछा— 'ब्रह्मन्! अगस्त्यजी ने यहाँ वातापिको किसलिए नष्ट किया? मनुष्यों का विनाश करनेवाले उस दैत्य का प्रभाव कैसा था? और महात्मा अगस्त्यजी के मन में क्रोध का उदय कैसे हुआ?'
ततः सम्प्रस्थितो राजा कौन्तेयो भूरिदक्षिणः ।
अगस्त्याश्रममासाद्य दुर्जयायामुवास ह ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! तदनन्तर प्रचुर दक्षिणा देनेवाले कुन्तीनन्दन राजा युधिष्ठिरने गयासे प्रस्थान किया और अगस्त्याश्रममें जाकर दुर्जय मणिमती नगरीमें निवास किया ।
लोमश जी ने कहा— कौरवनन्दन! पूर्वकाल की बात है, इस मणिमती नगरी में इल्वल नामक दैत्य रहता था। वातापि उसी का छोटा भाई था। उन ब्राह्मण देवता ने इल्वल को इन्द्र के समान पुत्र नहीं दिया; इससे वह असुर उन ब्राह्मण देवता पर बहुत कुपित हो उठा। राजन्! तभी से इल्वल दैत्य क्रोध में भरकर ब्राह्मणों की हत्या करने लगा। वह मायावी अपने भाई वातापिको को माया से बकरा बना देता था। वातापि भी इच्छानुसार रूप धारण करने में समर्थ था! अतः वह क्षणभर में भेड़ और बकरा बन जाता था। फिर इल्वल उस भेड़ या बकरे को पकाकर उसका मांस राँधता और किसी ब्राह्मण को खिला देता था। इसके बाद वह ब्राह्मण को मारने की इच्छा करता था।
तत्रैव लोमशं राजा पप्रच्छ वदतां वरः ।
अगस्त्येनेह वातापिः किमर्थमुपशामितः ॥
वहीं वक्ताओंमें श्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरने महर्षि लोमशसे पूछा — ‘ ब्रह्मन्! अगस्त्यजीने यहाँ वातापिको किसलिये नष्ट किया?
इल्वल में यह शक्ति थी कि वह जिस किसी भी यमलोक में गये हुए प्राणी को उसका नाम लेकर बुलाता, वह पुनः शरीर धारण करके जीवित दिखाई देने लगता था। उस दिन वातापि दैत्य को बकरा बनाकर इल्वल उसके मांस का संस्कार किया और उन ब्राह्मण देवताओं को वह मांस खिलाकर पुनः अपने भाई को पुकारा। राजन्! इल्वल के द्वारा उच्च स्वर से बोली हुई वाणी सुनकर वह अत्यन्त मायावी ब्राह्मण शत्रु बलवान् महादैत्य वातापि उस ब्राह्मण की पसली को फाड़कर हँसता हुआ निकल आया। राजन्! इस प्रकार दुष्ट हृदय इल्वल दैत्य बार-बार ब्राह्मणों को भोजन कराकर अपने भाई द्वारा उनकी हिंसा करा देता था।
एवं स ब्राह्मणान् राजन् भोजयित्वा पुनः पुनः ।
हिंसयामास दैतेय इल्वलो दुष्टचेतनः ॥
राजन्! इस प्रकार दुष्टहृदय इल्वल दैत्य बार-बार ब्राह्मणोंको भोजन कराकर अपने भाईद्वारा उनकी हिंसा करा देता था ( इसीलिये अगस्त्यमुनिने वातापिको नष्ट किया था )
इसी दिनों भगवान अगस्त्य मुनि कहीं चले जा रहे थे। उन्होंने एक जगह अपने पितरों को देखा जो एक गड्ढे में नीचे मुँह किये लटक रहे थे। तब उन लटकते हुए पितरों से अगस्त्यजी ने पूछा— 'आप लोग यहाँ किसलिए नीचे मुँह किये काँपते हुए लटक रहे हैं?' यह सुनकर उन वेदवादी पितरों ने उत्तर दिया— 'सन्तान परम्परा के लोप की सम्भावना के कारण हमारी यह दुर्दशा हो रही है। हम तुम्हारे ही पितर हैं। सन्तान के इच्छुक होकर इस गड्ढे में लटक रहे हैं। अगस्त्य! यदि तुम हमारे लिये उत्तम सन्तान उत्पन्न कर सको तो हम इस नरक से छुटकारा पा सकते हैं और बेटा! तुम्हें भी सद्गति प्राप्त होगी।' तब सत्यधर्मपरायण तेजस्वी अगस्त्य ने उनसे कहा— 'पितरो! मैं आपकी इच्छा पूर्ण करूँगा। आपकी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिये।'
यदि नो जनयेथास्त्वमगस्त्यापत्यमुत्तमम् ।
स्यान्नोऽस्मान्निरयान्मोक्षस्त्वं च पुत्राप्नुया गतिम् ॥
‘ अगस्त्य! यदि तुम हमारे लिये उत्तम संतान उत्पन्न कर सको तो हम इस नरकसे छुटकारा पा सकते हैं और बेटा! तुम्हें भी सद्गति प्राप्त होगी '
तब भगवान् महर्षि अगस्त्य ने सन्तानोत्पादन की चिन्ता करते हुए अपने अनुरूप सन्तान को गर्भ में धारण करने के लिये योग्य पत्नी का अनुसन्धान किया, परन्तु उन्हें कोई योग्य स्त्री दिखाई नहीं दी। तब उन्होंने एक-एक जन्तु के उत्तमोत्तम अङ्गों का भावना द्वारा सङ्ग्रह करके उन सबके द्वारा एक परम सुन्दर स्त्री का निर्माण किया। उन दिनों विदर्भराज पुत्र के लिये तपस्या कर रहे थे। महातपस्वी अगस्त्य मुनि ने अपने लिये निर्मित की हुई वह स्त्री राजा को दे दी। उस सुन्दरी कन्या का उस राजभवन में बिजली के समान प्रादुर्भाव हुआ। वह शरीर से प्रकाशमान हो रही थी। उसका मुख बहुत सुन्दर था, वह राजकन्या वहाँ दिनों दिन बढ़ने लगी। भरतनन्दन! राजा विदर्भ ने उस कन्या के उत्पन्न होते ही हर्ष में भरकर ब्राह्मणों को यह शुभ संवाद सुनाया— 'अभ्यनन्दन्त तां सर्वे ब्राह्मणा वसुधाधिप। लोपामुद्रेति तस्याश्च चक्रिरे नाम ते द्विजाः॥' राजन्! उस समय सब ब्राह्मणों ने राजा का अभिनन्दन किया और उस कन्या का नाम 'लोपामुद्रा' रख दिया।
राजेन्द्र! जब उसने युवावस्था में पदार्पण किया, उस समय उस कल्याणी कन्या को वस्त्राभूषणों से विभूषित सौ सुन्दरी कन्याएँ और सौ दासियाँ उसकी आज्ञा के अधीन होकर घेरे रहतीं और उसकी सेवा किया करती थीं। सौ दासियों और सौ कन्याओं के बीच में वह तेजस्विनी कन्या आकाश में सूर्य की प्रभा तथा नक्षत्रों में रोहिणी के समान सुशोभित होती थी। यद्यपि वह युवती और शील एवं सदाचार से सम्पन्न थी, तो भी महात्मा अगस्त्य के भय से किसी राजकुमार ने उसका वरण नहीं किया। वह सत्यवती राजकुमारी रूप में अप्सराओं से भी बढ़कर थी। उसने अपने शील-स्वभाव से पिता तथा स्वजनों को सन्तुष्ट कर दिया था। पिता विदर्भराज पुत्री को युवावस्था में प्रविष्ट हुई देख मन ही मन यह विचार करने लगे कि 'इस कन्या का किसके साथ विवाह करूँ?'
लोमश जी कहते हैं— युधिष्ठिर! जब मुनिवर अगस्त्यजी को यह मालूम हो गया कि विदर्भ राजकुमारी मेरी गृहस्थी चलाने के योग्य हो गयी है, तब वे विदर्भ नरेश के पास जाकर बोले— 'राजन्! पुत्रोत्त्तिके लिये मेरा विवाह करने का विचार है। अतः महीपाल! मैं आपकी कन्या का वरण करता हूँ। आप लोपामुद्रा को मुझे दे दीजिये।' मुनिवर अगस्त्य के ऐसा कहने पर विदर्भराज के होश उड़ गये। वे न तो अस्वीकार कर सके और न उन्होंने अपनी कन्या देने की इच्छा ही की। तब विदर्भ नरेश अपनी पत्नी के पास जाकर बोले— 'प्रिये! ये महर्षि अगस्त्य बड़े शक्तिशाली हैं। यदि कुपित हों तो हमें शाप की अग्नि से भस्म कर सकते हैं।'
इस प्रकार दुःखी देख लोपामुद्रा उनके पास गयी और समय के अनुसार इस प्रकार बोली— 'राजन्! आपको मेरे लिये दुःख नहीं मानना चाहिये। पिताजी! आप मुझे अगस्त्यजी की सेवा में दे दें और मेरे द्वारा अपनी रक्षा करें।' युधिष्ठिर! पुत्री की यह बात सुनकर राजा ने महात्मा अगस्त्य मुनि को विधिपूर्वक अपनी कन्या लोपामुद्रा ब्याह दी। लोपामुद्रा को पत्नी रूप में पाकर महर्षि अगस्त्य ने उससे कहा— 'ये तुम्हारे वस्त्र और आभूषण बहुमूल्य हैं। इन्हें उतार दो।' तब कदली के समान जाँघ तथा विशाल नेत्रों वाली लोपामुद्रा ने अपने बहुमूल्य, महीन एवं दर्शनीय वस्त्र उतार दिये और फटे-पुराने वस्त्र तथा वल्कल और मृगचर्म धारण कर लिये। वह विशाल नयनी बाला पतिके समान ही व्रत और आचार का पालन करने वाली हो गयी। तदनन्तर मुनिश्रेष्ठ भगवान अगस्त्य अपनी अनुकूल पत्नी के साथ गङ्गाद्वार में आकर घोर तपस्या में संलग्न हो गये। लोपामुद्रा बड़ी ही प्रसन्नता और विशेष आदर के साथ पतिदेव की सेवा करने लगी। शक्तिशाली महर्षि अगस्त्यजी भी अपनी पत्नी पर बड़ा प्रेम रखते थे।
सा प्रीता बहुमानाच्च पतिं पर्यचरत् तदा ।
अगस्त्यश्च परां प्रीतिं भार्यायामचरत् प्रभुः ॥
लोपामुद्रा बड़ी ही प्रसन्नता और विशेष आदरके साथ पतिदेवकी सेवा करने लगी । शक्तिशाली महर्षि अगस्त्यजी भी अपनी पत्नीपर बड़ा प्रेम रखते थे ।
राजन्! जब इसी प्रकार बहुत समय व्यतीत हो गया, तब एक दिन भगवान अगस्त्य मुनि ने ऋतुस्नान से निवृत्त हुई पत्नी लोपामुद्रा को देखा। वह तपस्या के तेज से प्रकाशित हो रही थी। महर्षि ने अपनी पत्नी की सेवा, पवित्रता, इन्द्रिय संयम, शोभा तथा रूप-सौन्दर्य से प्रसन्न होकर उसे मैथुन के लिये पास बुलाया।
लोपामुद्रा बोली— 'महर्षे! इसमें सन्देह नहीं कि पतिदेव ने अपनी इस पत्नी को सन्तान के लिये ही ग्रहण किया है, परन्तु आपके प्रति मेरे हृदय में जो प्रीति है, वह भी आपको सफल करनी चाहिये। ब्रह्मन्! मैं अपने पिता के घर उनके महल में जैसी शय्या पर सोया करती थी, वैसी ही शय्या पर आप मेरे साथ समागम करें। मैं चाहती हूँ कि आप सुन्दर हार और आभूषणों से विभूषित हों और मैं भी दिव्य अलङ्कारों से अलङ्कृत हो इच्छानुसार आपके साथ समागम सुख का अनुभव करूँ। अन्यथा मैं यह जीर्ण-शीर्ण काषाय वस्त्र पहनकर आपके साथ समागम नहीं करूँगी। ब्रह्मर्षे! तपस्वी जनों का यह पवित्र आभूषण किसी प्रकार सम्भोग आदिके द्वारा अपवित्र नहीं होना चाहिये।'
असंशयं प्रजाहेतोर्भार्यां पतिरविन्दत ।
या तु त्वयि मम प्रीतिस्तामृषे कर्तुमर्हसि ॥
' महर्षे! इसमें संदेह नहीं कि पतिदेवने अपनी इस पत्नीको संतानके लिये ही ग्रहण किया है, परंतु आपके प्रति मेरे हृदयमें जो प्रीति है, वह भी आपको सफल करनी चाहिये ।
अगस्त्यजी ने कहा— 'सुन्दर कटिप्रदेश वाली कल्याणी लोपामुद्रे! तुम्हारे पिता के घर में जैसे धन-वैभव है, वे न तो तुम्हारे पास हैं और न मेरे ही पास (फिर ऐसा कैसे हो सकता है?)'
लोपामुद्रा बोली— 'तपोधन! इस जीव जगत् में जो कुछ भी धन है, वह सब क्षण भर में आप अपनी तपस्या के प्रभाव से जुटा लेने में समर्थ हैं।'
अगस्त्यजी ने कहा— 'प्रिये! तुम्हारा कथन ठीक है। परन्तु ऐसा करने से तपस्या का क्षय होगा। मुझे ऐसा कोई उपाय बताओ जिससे मेरी तपस्या क्षीण न हो।'
लोपामुद्रा बोली— 'तपोधन! मेरे ऋतुकाल का थोड़ा ही समय शेष रह गया है। मैं जैसा बता चुकी हूँ, उसके सिवा और किसी तरह आपसे समागम नहीं करना चाहती। साथ ही मेरी यह भी इच्छा नहीं है कि किसी प्रकार आपके धर्म का लोप हो। इस प्रकार अपने तप एवं धर्म की रक्षा करते हुए जिस तरह सम्भव हो उसी तरह आप मेरी इच्छा पूर्ण करें।'
अगस्त्यजी ने कहा— 'सुभगे! यदि तुमने अपनी बुद्धि से यही मनोरथ पाने का निश्चय कर लिया है तो मैं धन लाने के लिये जाता हूँ, तुम यहीं रहकर इच्छानुसार धर्माचरण करो।'
यद्येष कामः सुभगे तव बुद्धया विनिश्चितः ।
हर्तुं गच्छाम्यहं भद्रे चर काममिह स्थिता ॥
अगस्त्यजीने कहा – सुभगे! यदि तुमने अपनी बुद्धिसे यही मनोरथ पानेका निश्चय कर लिया है तो मैं धन लानेके लिये जाता हूँ, तुम यहीं रहकर इच्छानुसार धर्माचरण करो ।
लोमशजी कहते हैं- कुरुनन्दन! तदनन्तर अगस्त्यजी धन माँगने के लिये महाराज श्रुतर्वा के पास गये, जिन्हें वे सब राजाओं से अधिक वैभवसम्पन्न समझते थे। राजा को जब यह मालूम हुआ कि महर्षि अगस्त्य मेरे यहाँ आ रहे हैं, तब वे मन्त्रियों के साथ अपने राज्य की सीमा पर चले आये और बड़े आदर-सत्कार से उन्हें अपने साथ लिवा ले गये। भूपाल श्रुतर्वाने उनके लिये यथायोग्य अर्घ्य निवेदन करके विनीत भाव से हाथ जोड़कर उनके पधारने का प्रयोजन पूछा।
तब अगस्त्यजी ने कहा— 'पृथ्वीपते! आपको मालूम होना चाहिये कि मैं धन माँगने के लिये आपके यहाँ आया हूँ। दूसरे प्राणियों को कष्ट न देते हुए यथाशक्ति अपने धन का जितना अंश मुझे दे सकें, दे दें।'
लोमशजी कहते हैं- युधिष्ठिर! तब राजा श्रुतर्वाने महर्षि के सामने अपने आय-व्यय का पूरा ब्योरा रख दिया और कहा— 'ज्ञानी महर्षे! इस धन में से जो आप ठीक समझें, वह ले लें।' ब्रह्मर्षि अगस्त्य की बुद्धि सम थी। उन्होंने आय और व्यय दोनों को बराबर देखकर यह विचार किया कि इसमें से थोड़ा-सा भी धन लेने पर दूसरे प्राणियों को सर्वथा कष्ट हो सकता है। तब वे श्रुतर्वा को साथ लेकर राजा ब्रध्नश्व के पास गये। उन्होंने भी अपने राज्य की सीमा पर आकर उन दोनों सम्माननीय अतिथियों की अगवानी की और विधिपूर्वक उन्हें अपनाया। ब्रध्नश्व ने उन दोनों को अर्घ्य और पाद्य निवेदन किये, फिर उनकी आज्ञा ले अपने यहाँ पधारने का प्रयोजन पूछा।
तत आयव्ययौ दृष्ट्वा समौ सममतिर्द्विजः ।
सर्वथा प्राणिनां पीडामुपादानादमन्यत ॥
तब समान बुद्धिवाले ब्रह्मर्षि अगस्त्यने उस विवरणमें आय और व्यय बराबर देखकर यह निश्चय किया कि इसमें से यदि थोड़ा- सा भी धन लिया जाय तो दूसरे प्राणियोंको सर्वथा कष्ट हो सकता है ।
अगस्त्यजी ने कहा— 'पृथ्वीपते! आपको विदित हो कि हम दोनों आपके यहाँ धन की इच्छा से आये हैं। दूसरे प्राणियों को कष्ट न देते हुए जो धन आपके पास बचता हो, उसमें से यथाशक्ति कुछ भाग हमें भी दीजिये।'
लोमशजी कहते हैं- युधिष्ठिर! तब राजा ब्रध्नश्व ने भी उन दोनों के सामने अपने आय और व्यय का पूरा विवरण रख दिया और कहा— 'आप दोनों को इसमें जो धन अधिक जान पड़ता हो, वह ले लें।' तब समान बुद्धि वाले ब्रह्मर्षि अगस्त्य ने उस विवरण में आय और व्यय बराबर देखकर यह निश्चय किया कि इसमें से यदि थोड़ा-सा भी धन लिया जाय तो दूसरे प्राणियों को सर्वथा कष्ट हो सकता है।
तब अगस्त्य, श्रुतर्वा और ब्रध्नश्व— तीनों पुरुकुत्सनन्दन-महाधनी त्रसदस्यु के पास गये। महाराज! भूपालों में श्रेष्ठ इक्ष्वाकुवंशी महामना त्रसदस्यु ने उन्हें आते देख राज्य की सीमा पर पहुँचकर विधिपूर्वक उन सबका स्वागत-सत्कार किया और उन सबसे अपने यहाँ पधारने का प्रयोजन पूछा। अगस्त्य ने कहा— 'पृथ्वीपते! आपको विदित हो कि हम धन की कामना से यहाँ आये हैं। आप दूसरे प्राणियों को पीड़ा न देते हुए यथाशक्ति अपने धन का कुछ भाग हमें दीजिये।'
लोमशजी कहते हैं— युधिष्ठिर! तब राजा ने उन्हें अपना आय-व्यय का पूरा विवरण दे दिया और कहा— 'इसे समझकर जो धन शेष बचता हो, वह आप लोग ले लें।' समबुद्धि वाले महर्षि अगस्त्य ने वहाँ भी आय और व्यय का लेखा बराबर देखकर यही माना कि इसमें से धन लिया जाय तो दूसरे प्राणियों को सर्वथा कष्ट हो सकता है।
महाराज! तब वे सब राजा परस्पर मिलकर एक-दूसरे की ओर देखते हुए महामुनि अगस्त्य से इस प्रकार बोले— 'ब्रह्मन्! यह इल्वल दानव इस पृथ्वी पर सबसे अधिक धनी है। हम सब लोग उसी के पास चलकर आज धन माँगें।'
अयं वै दानवो ब्रह्मन्निल्वलो वसुमान् भुवि ।
तमतिक्रम्य सर्वेऽद्य वयं चार्थामहे वसु ॥
‘ब्रह्मन्! यह इल्वल दानव इस पृथ्वीपर सबसे अधिक धनी है । हम सब लोग उसीके पास चलकर आज धन माँगें '
लोमशजी कहते हैं— युधिष्ठिर! उस समय उन सबको इल्वल के यहाँ याचना करना ही ठीक जान पड़ा, अतः वे एक साथ होकर इल्वल के यहाँ शीघ्रतापूर्वक गये।
इल्वल ने महर्षि सहित उन राजाओं को आता जान मन्त्रियों के साथ अपने राज्य की सीमा पर उपस्थित होकर उन सबका पूजन किया। उस समय असुरश्रेष्ठ इल्वल ने अपने भाई वातापिका का मांस राँधकर उसके द्वारा उन सबका आतिथ्य किया। जब उन सभी राजर्षियों ने देखा कि भेड़ के रूप में महान् दैत्य वातापिको ही राँधा गया है, तो उनका मन खिन्न हो गया और वे अचेत से हो गये।
तब ऋषिश्रेष्ठ अगस्त्य ने उन राजर्षियों को आश्वासन देते हुए कहा— 'तुम लोगों को चिन्ता नहीं करनी चाहिये। मैं ही इस महादैत्य को खा जाऊँगा।' ऐसा कहकर महर्षि अगस्त्य प्रधान आसन पर जा बैठे। दैत्यराज इल्वल ने हँसते हुए उन्हें वह मांस परोस दिया।
अथाब्रवीदगस्त्यस्तान् राजर्षीनृषिसत्तमः ।
विषादो वो न कर्तव्यो ह्यहं भोक्ष्ये महासुरम् ॥
धुर्यासनमथासाद्य निषसाद महानृषिः ।
तं पर्यवेषद् दैत्येन्द्र इल्वलः प्रहसन्निव ॥
तब ऋषिश्रेष्ठ अगस्त्यने उन राजर्षियोंसे (आश्वासन देते हुए) कहा – ' तुमलोगोंको चिन्ता नहीं करनी चाहिये । मैं ही इस महादैत्यको खा जाऊँगा । ' ऐसा कहकर महर्षि अगस्त्य प्रधान आसनपर जा बैठे और दैत्यराज इल्वलने हँसते हुए - से उन्हें वह मांस परोस दिया ।
अगस्त्यजी ही वातापिका सारा मांस खा गये; जब वे भोजन कर चुके, तब असुर इल्वल ने वातापिका का नाम लेकर पुकारा। उस समय महात्मा अगस्त्य की गुदा से मेघ की भाँति भारी आवाज के साथ अधोवायु निकली। इल्वल बार-बार कहने लगा— 'वातापे! निकलो-निकलो।'
राजन्! तब मुनिश्रेष्ठ अगस्त्य ने उससे हँसकर कहा— 'अब वह कैसे निकल सकता है, मैंने लोकहित के लिये उस असुर को पचा लिया है।' महादैत्य वातापिको पच गया देख इल्वल को बड़ा खेद हुआ। उसने मन्त्रियों सहित हाथ जोड़कर उन अतिथियों से पूछा— 'आप लोग किस प्रयोजन से यहाँ पधारे हैं, बताइये, मैं आप लोगों की क्या सेवा करूँ?'
तब महर्षि अगस्त्य ने हँसकर इल्वल से कहा— 'असुर! हम सब लोग तुम्हें शक्तिशाली शासक एवं धन का स्वामी समझते हैं। ये नरेश अधिक धनवान नहीं हैं और मुझे बहुत धन की आवश्यकता आ पड़ी है। अतः दूसरे जीवों को कष्ट न देते हुए अपने धन में से यथाशक्ति कुछ भाग हमें दो।'
एते च नातिधनिनो धनार्थश्च महान् मम ।
यथाशक्त्यविहिंस्यान्यान् संविभागं प्रयच्छ नः ॥
‘ ये नरेश अधिक धनवान् नहीं हैं और मुझे बहुत धनकी आवश्यकता आ पड़ी है । अतः दूसरे जीवोंको कष्ट न देते हुए अपने धनमेंसे यथाशक्ति कुछ भाग हमें दो '
तब इल्वल ने महर्षि को प्रणाम करके कहा— 'मैं कितना धन देना चाहता हूँ? यह बात यदि आप जान लें तो मैं आपको धन दूँगा।' अगस्त्यजी ने कहा— 'महान् असुर! तुम इनमें से एक-एक राजा को दस-दस हजार गौएँ तथा इतनी ही सुवर्ण मुद्राएँ देना चाहते हो। इन राजाओं की अपेक्षा दूनी गौएँ और सुवर्ण मुद्राएँ तुमने मेरे लिये देने का विचार किया है। महादैत्य! इसके सिवा एक स्वर्णमय रथ, जिसमें मनके समान तीव्रगामी दो घोड़े जुते हों, तुम मुझे और देना चाहते हो।'
लोमशजी कहते हैं— कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर! पता लगाने पर वह रथ सोने का ही निकला, तब अपने भाई की मृत्यु से व्यथित उस दैत्य ने महर्षि को बहुत अधिक धन दिया। उस रथ में विराव और सुराव नामक दो घोड़े जुते हुए थे। वे धन सहित राजाओं तथा अगस्त्य मुनि को शीघ्र ही मानो पलक झपकते ही अगस्त्याश्रम की ओर ले भागे। उस समय इल्वल असुर ने अगस्त्य मुनि के पीछे जाकर उनको मारने की इच्छा की, परन्तु महातेजस्वी अगस्त्यमुनि ने उस महादैत्य इल्वल को अपनी हुङ्कार से ही भस्म कर दिया। तदनन्तर उन वायु के समान वेग वाले घोड़ों ने उन सबको मुनि के आश्रम पर पहुँचा दिया।
भरतनन्दन! फिर अगस्त्यजी की आज्ञा लेकर वे राजर्षिगण अपनी-अपनी राजधानी को चले गये और महर्षि ने लोपामुद्रा की सभी इच्छाएँ पूर्ण कीं। लोपामुद्रा बोली— 'भगवन्! मेरी जो-जो अभिलाषा थी, वह सब आपने पूर्ण कर दी। अब मुझसे एक अत्यन्त शक्तिशाली पुत्र उत्पन्न कीजिये।'
लोपामुद्रोवाच कृतवानसि तत् सर्वं भगवन् मम काङ्क्षितम् ।
उत्पादय सकृन्मह्यमपत्यं वीर्यवत्तरम् ॥
लोपामुद्रा बोली– भगवन्! मेरी जो - जो अभिलाषा थी, वह सब आपने पूर्ण कर दी । अब मुझसे एक अत्यन्त शक्तिशाली पुत्र उत्पन्न कीजिये ।
अगस्त्यजी ने कहा— 'शोभामयी कल्याणी! तुम्हारे सद्व्यवहार से मैं बहुत सन्तुष्ट हूँ। पुत्र के सम्बन्ध में तुम्हारे सामने एक विचार उपस्थित करता हूँ, सुनो।' लोपामुद्रा बोली— 'तपोधन! मुझे सहस्रों की समानता करने वाला एक ही श्रेष्ठ पुत्र प्राप्त हो; क्योंकि बहुत-से दुष्ट पुत्रों की अपेक्षा एक ही विद्वान् एवं श्रेष्ठ पुत्र उत्तम माना गया है।'
लोमशजी कहते हैं— राजन्! तब 'तथास्तु' कहकर श्रद्धालु महात्मा अगस्त्य ने समान शील-स्वभाव वाली श्रद्धालु पत्नी लोपामुद्रा के साथ यथासमय समागम किया। गर्भाधान करके अगस्त्यजी फिर वन में ही चले गये। उनके वन में चले जाने पर वह गर्भ सात वर्षों तक माता के पेट में ही पलता और बढ़ता रहा।
स तथेति प्रतिज्ञाय तया समभवन्मुनिः ।
समये समशीलिन्या श्रद्धावाञ्छ्रद्दधानया ॥
लोमशजी कहते हैं— राजन्! तब ' तथास्तु ' कहकर श्रद्धालु महात्मा अगस्त्यने समान शील- स्वभाववाली श्रद्धालु पत्नी लोपामुद्राके साथ यथासमय समागम किया ।
भारत! सात वर्ष बीतने पर अपने तेज और प्रभाव से प्रज्वलित होता हुआ वह गर्भ उदर से बाहर निकला। वही महाविद्वान् दृढस्यु के नाम से विख्यात हुआ। महर्षि का वह महातपस्वी और तेजस्वी पुत्र जन्म काल से ही अङ्ग और उपनिषदों सहित सम्पूर्ण वेदों का स्वाध्याय करने लगा। दृढस्यु ब्राह्मणों में महान् माने गये। पिता के घर में रहते हुए तेजस्वी दृढस्यु बाल्य काल से ही इध्म (समिधा) का भार वहन करके लाने लगे; अतः 'इध्मवाह' नाम से विख्यात हो गये। अपने पुत्र को स्वाध्याय और समिधानयन के कार्य में संलग्न देख महर्षि अगस्त्य बहुत प्रसन्न हुए।
भारत! इस प्रकार अगस्त्यजी ने उत्तम सन्तान उत्पन्न की। तदनन्तर उनके पितरों ने मनोवाञ्छित लोक प्राप्त कर लिये। इसके बाद से यह स्थान पृथ्वी पर 'अगस्त्याश्रम' के नाम से विख्यात हो गया। वातापि प्रह्लाद के गोत्र में उत्पन्न हुआ था, जिसे अगस्त्यजी ने इस प्रकार शान्त कर दिया। राजन्! यह उन्हीं का रमणीय गुणों से युक्त आश्रम है।
इसके समीप वह देव-गन्धर्व सेवित पुण्यसलिला भागीरथी है, जो आकाश में वायु की प्रेरणा से फहराने वाली श्वेत पताका के समान सुशोभित हो रही है। यह क्रमशः नीचे-नीचे के शिखरों पर गिरती हुई सदा तीव्र गति से बहती है और शिलाखण्डों के नीचे इस प्रकार समायी जाती है, मानो भयभीत सर्पिणी बिल में घुसी जा रही हो।
पहले भगवान शङ्कर की जटा से गिरकर प्रवाहित होने वाली समुद्र की प्रियतमा महारानी गङ्गा सम्पूर्ण दक्षिण दिशा को इस प्रकार आप्लावित कर रही है, मानो माता अपनी सन्तान को नहला रही हो। इस परम पवित्र नदी में तुम इच्छानुसार स्नान करो। महाराज युधिष्ठिर! इधर ध्यान दो, यह महर्षि-गण सेवित भृगुतीर्थ है, जो तीनों लोकों में विख्यात है:
दक्षिणां वै दिशं सर्वां प्लावयन्ती च मातृवत् ।
पूर्वं शम्भोर्जटाभ्रष्टा समुद्रमहिषी प्रिया ।
अस्यां नद्यां सुपुण्यायां यथेष्टमवगाह्यताम् ॥
पहले भगवान् शंकरकी जटासे गिरकर प्रवाहित होनेवाली समुद्रकी प्रियतमा महारानी गंगा सम्पूर्ण दक्षिण दिशाको इस प्रकार आप्लावित कर रही है, मानो माता अपनी संतानको नहला रही हो । इस परम पवित्र नदीमें तुम इच्छानुसार स्नान करो ।
'यत्रोपस्पृष्टवान् रामो हृतं तेजस्तदाऽऽप्तवान्। अत्र त्वं भ्रातृभिः सार्धं कृष्णया चैव पाण्डव॥'
जहाँ परशुरामजी ने स्नान किया और उसी क्षण अपने खोये हुए तेज को पुनः प्राप्त कर लिया। पाण्डुनन्दन! तुम अपने भाइयों और द्रौपदी के साथ इसमें स्नान करके दुर्योधन द्वारा छीने हुए अपने तेज को पुनः प्राप्त कर सकते हो। जैसे दशरथ नन्दन श्रीराम से वैर करने पर उनके द्वारा अपहृत हुए तेज को परशुराम ने यहाँ स्नान के प्रभाव से पुनः पा लिया था।
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तब राजा युधिष्ठिर ने अपने भाइयों और द्रौपदी के साथ उस तीर्थ में स्नान करके देवताओं और पितरों का तर्पण किया। नरश्रेष्ठ! उस तीर्थ में स्नान कर लेने पर राजा युधिष्ठिर का रूप अत्यन्त तेजोयुक्त होकर प्रकाशमान हो गया। अब वे शत्रुओं के लिये परम दुर्धर्ष हो गये।
दुर्योधनहृतं तेजः पुनरादातुमर्हसि ।
कृतवैरेण रामेण यथा चोपहृतं पुनः ॥
जहाँ परशुरामजीने स्नान किया और उसी क्षण अपने खोये हुए तेजको पुनः प्राप्त कर लिया । पाण्डुनन्दन! तुम अपने भाइयों और द्रौपदीके साथ इसमें स्नान करके दुर्योधनद्वारा छीने हुए अपने तेजको पुनः प्राप्त कर सकते हो । जैसे दशरथनन्दन श्रीरामसे वैर करनेपर उनके द्वारा अपहृत हुए तेजको परशुरामने यहाँ स्नानके प्रभावसे पुनः पा लिया था ।
राजेन्द्र! उस समय पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर ने महर्षि लोमश से पूछा— ‘भगवन्! परशुरामजी के तेज का अपहरण किसलिए किया गया था और प्रभो! वह इन्हें पुनः किस प्रकार प्राप्त हो गया? यह मैं जानना चाहता हूँ। आप कृपा करके इस प्रसङ्ग का वर्णन करें।’
लोमशजी ने कहा— 'राजेन्द्र! तुम दशरथनन्दन श्रीराम तथा परम बुद्धिमान् भृगुनन्दन परशुरामजी का चरित्र सुनो। पूर्वकाल में महात्मा राजा दशरथ के यहाँ साक्षात् भगवान् विष्णु अपने ही सच्चिदानन्दमय विग्रह से श्रीराम रूप में अवतीर्ण हुए थे। उनके अवतार का उद्देश्य था— पापी रावण का विनाश। अयोध्या में प्रकट हुए दशरथनन्दन श्रीराम का हम लोग प्रायः दर्शन करते रहते हैं।
अनायास ही महान् कर्म करने वाले दशरथकुमार श्रीराम का भारी पराक्रम सुनकर भृगु तथा ऋचीक के वंशज रेणुकानन्दन परशुराम उन्हें देखने के लिये उत्सुक हो, क्षत्रिय संहारक दिव्य धनुष लिये अयोध्या में आये। उनके शुभागमन का उद्देश्य था— दशरथनन्दन श्रीराम के बल-पराक्रम की परीक्षा करना। महाराज दशरथ ने जब सुना कि परशुरामजी हमारे राज्य की सीमा पर आ गये हैं, तब उन्होंने मुनि की अगवानी के लिये अपने पुत्र श्रीराम को भेजा। कुन्तीनन्दन! श्रीरामचन्द्रजी धनुष-बाराण हाथ में लिये आकर खड़े हैं— यह देखकर परशुरामजी ने हँसते हुए कहा— 'राजेन्द्र! प्रभो! भूपाल! यदि तुममें शक्ति हो तो यत्नपूर्वक इस धनुष पर प्रत्यञ्चा चढ़ाओ। यह वह धनुष है जिसके द्वारा मैंने क्षत्रियों का संहार किया है।'
उनके ऐसा कहने पर श्रीरामचन्द्रजी ने कहा— 'भगवन्! आपको इस तरह आक्षेप नहीं करना चाहिये। मैं भी समस्त द्विजातियों में क्षत्रिय धर्म का पालन करने में अधम नहीं हूँ। विशेषतः इक्ष्वाकु वंशी क्षत्रिय अपने बाहुबल की प्रशंसा नहीं करते।'
तमेवंवादिनं तत्र रामो वचनमब्रवीत् ।
अलं वै व्यपदेशेन धनुरायच्छ राघव ॥
श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर परशुरामजी बोले- ' रघुनन्दन! बातें बनानेकी कोई आवश्यकता नहीं । यह धनुष लो और इसपर प्रत्यञ्चा चढ़ाओ '
श्रीरामचन्द्रजी के ऐसा कहने पर परशुरामजी बोले— 'रघुनन्दन! बातें बनाने की कोई आवश्यकता नहीं। यह धनुष लो और इस पर प्रत्यञ्चा चढ़ाओ।' तब दशरथनन्दन श्रीरामजी ने रोषपूर्वक परशुराम का वह वीर क्षत्रियों का संहारक दिव्य धनुष उनके हाथ से ले लिया। भारत! उन्होंने लीलापूर्वक प्रत्यञ्चा चढ़ा दी। तत्पश्चात् पराक्रमी श्रीरामचन्द्रजी ने मुसकराते हुए धनुष की टङ्कार फैलायी।
लोमशजी कहते हैं— राजन्! इतना सुनते ही श्रीरामचन्द्रजी मानो क्रोध से प्रज्वलित हो उठे और बोले— 'भृगुनन्दन! तुम बड़े घमण्डी हो। मैं तुम्हारी कठोर बातें सुनता हूँ फिर क्षमा कर लेता हूँ। तुमने अपने पितामह ऋचीक के प्रभाव से क्षत्रियों को जीतकर विशेष तेज प्राप्त किया है, निश्चय ही इसीलिये मुझ पर आक्षेप करते हो। लो! मैं तुम्हें दिव्य दृष्टि देता हूँ। उसके द्वारा मेरे यथार्थ स्वरूप का दर्शन करो।'
एतच्छ्रुत्वाब्रवीद् रामः प्रदीप्त इव मन्युना ।
श्रूयते क्षम्यते चैव दर्पपूर्णोऽसि भार्गव ॥
लोमशजी कहते हैं - राजन्! इतना सुनते ही श्रीरामचन्द्रजी मानो क्रोधसे प्रज्वलित हो उठे और बोले— ' भृगुनन्दन! तुम बड़े घमण्डी हो । मैं तुम्हारी कठोर बातें सुनता हूँ फिर क्षमा कर लेता हूँ ।
तब भृगुवंशी परशुरामजी ने श्रीरामचन्द्रजी के शरीर में बारह आदित्य, आठ वसु, ग्यारह रुद्र, साध्य देवता, उनचास मरुद्गण, पितृगण, अग्निदेव, नक्षत्र, ग्रह, गन्धर्व, राक्षस, यक्ष, नदियाँ, तीर्थ, सनातन ब्रह्मभूत बालखिल्य ऋषि, देवर्षि, सम्पूर्ण समुद्र, पर्वत, उपनिषदों सहित वेद, वषट्कार, यज्ञ, साम और धनुर्वेद— इन सभी को चेतन रूप धारण किये हुए प्रत्यक्ष देखा। भरतनन्दन युधिष्ठिर! मेघों के समूह, वर्षा और विद्युत् का भी उनके भीतर दर्शन हो रहा था।
तदनन्तर भगवान् विष्णुरूप श्रीरामचन्द्रजी ने उस बाण को छोड़ा। भारत! उस समय सारी पृथ्वी बिना बादल की बिजली और बड़ी-बड़ी उल्काओं से व्याप्त सी हो उठी। बड़े जोर की आँधी उठी और सब ओर धूल की वर्षा होने लगी। फिर मेघों की घटा घिर आयी और भूतल पर मूसलाधार वर्षा होने लगी। बार-बार भूकम्प होने लगा। मेघ गर्जन तथा अन्य भयानक उत्पात सूचक शब्द गूँजने लगे। श्रीरामचन्द्रजी की भुजाओं से प्रेरित हुआ वह प्रज्वलित बाण परशुरामजी को व्याकुल करके केवल उनके तेज को छीनकर पुनः लौट आया।
स रामं विह्वलं कृत्वा तेजश्चाक्षिप्य केवलम् ।
आगच्छज्ज्वलितो बाणो रामबाहुप्रचोदितः ॥
श्रीरामचन्द्रजीकी भुजाओंसे प्रेरित हुआ वह प्रज्वलित बाण परशुरामजीको व्याकुल करके केवल उनके तेजको छीनकर पुनः लौट आया ।
परशुरामजी एक बार मूर्च्छित होकर जब पुनः होश में आये, तब मरकर जी उठे हुए मनुष्य की भाँति उन्होंने विष्णु तेज धारण करने वाले भगवान् श्रीराम को नमस्कार किया। तत्पश्चात् भगवान् विष्णु की आज्ञा लेकर वे पुनः महेन्द्र पर्वत पर चले गये। वहाँ भयभीत और लज्जित होकर महान् तपस्या में संलग्न रहने लगे।
तदनन्तर एक वर्ष व्यतीत होने पर तेजोहीन और अभिमान शून्य होकर रहने वाले परशुराम को दुःखी देखकर उनके पितरों ने कहा— 'तुमने भगवान् विष्णु के पास जाकर जो बर्ताव किया है वह ठीक नहीं था। वे तीनों लोकों में सर्वदा पूजनीय और माननीय हैं। बेटा! अब तुम वधूसर नामक पुण्यमयी नदी के तट पर जाओ। वहाँ तीर्थों में स्नान करके पूर्ववत् अपना तेजोमय शरीर पुनः प्राप्त कर लोगे। राम! वह दीप्तोदक नामक तीर्थ है, जहाँ देवयुग में तुम्हारे प्रपितामह भृगु ने उत्तम तपस्या की थी।'
पितर ऊचुः न वै सम्यगिदं पुत्र विष्णुमासाद्य वै कृतम् ।
स हि पूज्यश्च मान्यश्च त्रिषु लोकेषु सर्वदा ॥
पितर बोले — तुमने भगवान् विष्णुके पास जाकर जो बर्ताव किया है वह ठीक नहीं था । वे तीनों लोकोंमें सर्वदा पूजनीय और माननीय हैं ।
कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर! पितरों के कहने से परशुरामजी ने वैसा ही किया। पाण्डुनन्दन! इस तीर्थ में नहाकर उन्होंने पुनः अपना तेज प्राप्त कर लिया। तात महाराज युधिष्ठिर! इस प्रकार पूर्वकाल में अनायास ही महान् कर्म करने वाले परशुराम विष्णु स्वरूप श्रीरामचन्द्रजी से भिड़कर इस दशा को प्राप्त हुए थे।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्व के अन्तर्गत तीर्थयात्रा पर्व के अन्तर्गत लोमश तीर्थयात्रा के प्रसङ्ग में परशुराम के तेज की हानि विषयक निन्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ।
लोमशजी ने कहा— 'महाराज! अमित तेजस्वी महर्षि अगस्त्य की कथा दिव्य, अद्भुत और अलौकिक है। उनका प्रभाव महान् है। मैं उसका वर्णन करता हूँ, सुनो।
सत्ययुग की बात है, दैत्यों के बहुत से भयङ्कर दल थे जो कालकेय नाम से विख्यात थे। उनका स्वभाव अत्यन्त निर्दय था। वे युद्ध में उन्मत्त होकर लड़ते थे। उन सबने एक दिन वृत्रासुर की शरण ले ली और उसकी अध्यक्षता में नाना प्रकार के आयुधों से सुसज्जित होकर महेन्द्र आदि देवताओं पर चारों ओर से आक्रमण कर दिया।
तब समस्त देवता वृत्रासुर के वध के प्रयत्न में लग गये। वे देवराज इन्द्र को आगे करके ब्रह्माजी के पास गये। वहाँ पहुँचकर सब देवता हाथ जोड़कर खड़े हो गये। तब ब्रह्माजी ने उनसे कहा— 'देवताओ! तुम जो कार्य सिद्ध करना चाहते हो वह सब मुझे मालूम है। मैं तुम्हें एक उपाय बता रहा हूँ, जिससे तुम वृत्रासुर का वध कर सकोगे। दधीच नाम से विख्यात जो उदारचेता महर्षि हैं, उनके पास जाकर तुम सब लोग एक साथ एक ही वर माँगो। वे बड़े धर्मात्मा हैं। अत्यन्त प्रसन्न मन से तुम्हें मुँह माँगी वस्तु देंगे।
दधीच इति विख्यातो महानृषिरुदारधीः ॥
तं गत्वा सहिताः सर्वे वरं वै सम्प्रयाचत ।
स वो दास्यति धर्मात्मा सुप्रीतेनान्तरात्मना ॥
‘ मैं तुम्हें एक उपाय बता रहा हूँ, जिससे तुम वृत्रासुरका वध कर सकोगे । दधीच नामसे विख्यात जो उदारचेता महर्षि हैं, उनके पास जाकर तुम सब लोग एक साथ एक ही वर माँगो । वे बड़े धर्मात्मा हैं । अत्यन्त प्रसन्नमनसे तुम्हें मुँहमाँगी वस्तु देंगे ।
जब वे वर देना स्वीकार कर लें तब विजय की अभिलाषा रखने वाले तुम सब लोग उनसे एक साथ यों कहना— 'महात्मन्! आप तीनों लोकों के हित के लिये अपने शरीर की हड्डियाँ प्रदान करें।' तुम्हारे माँगने पर वे शरीर त्यागकर अपनी हड्डियाँ दे देंगे। उनकी उन हड्डियों द्वारा तुम लोग सुदृढ़ एवं अत्यन्त भयङ्कर वज्र का निर्माण करो। देवताओ द्वारा वृत्रासुर के वध के लिये दधीच से उनकी अस्थियों की याचना कर, देवराज इन्द्र का वज्र के प्रहार से वृत्रासुर का वध कर डालना।'
उसकी आकृति षट्कोण के समान होगी। वह महान् एवं घोर शत्रुनाशक अस्त्र भयङ्कर गड़गड़ाहट पैदा करने वाला होगा। उस वज्र के द्वारा इन्द्र निश्चय ही वृत्रासुर का वध कर डालेंगे। ये सब बातें मैंने तुम्हें बता दी हैं। अतः अब शीघ्रता करो।'
ब्रह्माजी के ऐसा करने पर सब देवता उनकी आज्ञा लेकर भगवान् नारायण को आगे करके दधीच के आश्रम पर गये। वह आश्रम सरस्वती नदी के उस पार था। अनेक प्रकार के वृक्ष और लताएँ उसे घेरे हुए थीं। भ्रमरों के गीतों की ध्वनि से वह स्थान इस प्रकार गूँज रहा था, मानो सामगान करने वाले ब्राह्मणों द्वारा सामवेद का पाठ हो रहा हो। कोकिल के कलरवों से कूजित और दूसरे जन्तुओं के शब्दों से कोलाहलपूर्ण बना हुआ वह आश्रम सजीव-सा जान पड़ता था। भैंसे, सूअर, बाल मृग और चवँरी गायें बाघ-सिंहों के भय से रहित होकर उस आश्रम के आस-पास विचर रही थीं। अपने कपोलों से मद की धारा बहाने वाले हाथी और हथिनियाँ वहाँ सरोवर के जल में गोते लगाकर क्रीड़ाएँ कर रहे थे, जिससे आश्रम के चारों ओर कोलाहल-सा हो रहा था। पर्वतों की गुफाओं तथा कन्दराओं में लेटे, झाड़ियों में छिपे और वन में विचरते हुए जोर-जोर से दहाड़ने वाले सिंहों और व्याघ्रों की गर्जना से वह स्थान गूँज रहा था। विभिन्न स्थानों में अधिक शोभा पाने वाला महर्षि दधीच का वह मनोरम आश्रम स्वर्ग के समान प्रतीत होता था। देवता लोग वहाँ पहुँच गये।
एतद् वः सर्वमाख्यातं तस्माच्छीघ्रं विधीयताम् ।
एवमुक्तास्ततो देवा अनुज्ञाप्य पितामहम् ॥
नारायणं पुरस्कृत्य दधीचस्वाश्रमं ययुः ।
सरस्वत्याः परे पारे नानाद्रुमलतावृतम् ॥
' ये सब बातें मैंने तुम्हें बता दी हैं । अतः अब शीघ्रता करो । ' ब्रह्माजीके ऐसा करनेपर सब देवता उनकी आज्ञा ले भगवान् नारायणको आगे करके दधीचके आश्रमपर गये । वह आश्रम सरस्वती नदीके उस पार था । अनेक प्रकारके वृक्ष और लताएँ उसे घेरे हुए थीं ।
उन्होंने देखा, महर्षि दधीच भगवान् सूर्य के समान तेज से प्रकाशित हो रहे हैं। अपने शरीर की दिव्य कान्ति से साक्षात् ब्रह्माजी के समान जान पड़ते हैं। राजन्! उस समय सब देवताओं ने महर्षि के चरणों में अभिवादन एवं प्रणाम करके ब्रह्माजी ने जैसे कहा था, उसी प्रकार उनसे वर माँगा।
तब महर्षि दधीच ने अत्यन्त प्रसन्न होकर उन श्रेष्ठ देवताओं से इस प्रकार कहा— 'देवगण! आज मैं वही करूँगा, जिससे आप लोगों का हित हो। अपने इस शरीर को मैं स्वयं ही त्याग देता हूँ।' ऐसा कहकर मनुष्यों में श्रेष्ठ, जितेन्द्रिय महर्षि दधीच ने सहसा अपने प्राणों का त्याग कर दिया। तब देवताओं ने ब्रह्माजी के उपदेश के अनुसार महर्षि के निर्जीव शरीर से हड्डियाँ ले लीं। उन्होंने एकाग्र चित्त से प्रयत्नपूर्वक अत्यन्त भयङ्कर वज्र का निर्माण किया। तत्पश्चात् वे हर्ष में भरकर इन्द्र से बोले— 'देव! इस उत्तम वज्र से आप आज ही भयङ्कर देवद्रोही वृत्रासुर को भस्म कर डालिये। इस प्रकार शत्रु के मारे जाने पर आप देवगणों के साथ स्वर्ग में रहकर सुखपूर्वक सम्पूर्ण स्वर्ग का शासन एवं पालन कीजिये।' त्वष्टा प्रजापति के ऐसा कहने पर इन्द्र को बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने शुद्ध चित्त होकर उनके हाथ से वह वज्र ले लिया।'
इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें वज्रनिर्माणकथनविषयक सौवाँ अध्याय पूराहुआ ॥
लोमशजी कहते हैं— राजन्! तदनन्तर वज्रधारी इन्द्र बलवान् देवताओंसे सुरक्षित हो वृत्रासुरके पास गये। वह असुर भूलोक और आकाशको घेरकर खड़ा था। कालकेय नामवाले विशालकाय दैत्य, जो हाथोंमें हथियार लिये होने के कारण शृङ्गयुक्त पर्वतों के समान जान पड़ते थे, चारों ओर से उसकी रक्षा कर रहे थे। ततो युद्धं समभवद् देवानां दानवैः सह। इन्द्र के आते ही देवताओं का दानवों के साथ दो घड़ी तक बड़ा भीषण युद्ध हुआ, जो तीनों लोकों को त्रसा करने वाला था।
वीरों की भुजाओं के साथ उठे हुए खड्ग शत्रु के शरीरों पर पड़ते और विपक्षी योद्धाओं के घातक प्रहारों से टूटकर चूर-चूर हो जाते थे; उस समय उनका अत्यन्त भयङ्कर शब्द सुनाई देता था। महाराज! अपने मूल स्थान से टूटकर गिरे हुए ताल-फलों के समान आकाश से गिरते हुए योद्धाओं के मस्तकों द्वारा वहाँ की भूमि आच्छादित दिखाई देती थी। कालकेयों ने सोने के कवच धारण करके हाथों में परिघ लिये देवताओं पर धावा किया; उस समय वे दानव दावानल से दग्ध हुए पर्वतों की भाँति दिखाई देते थे। उन वेगशाली दैत्यों का वेग देवताओं के लिए असह्य हो गया और वे अपने दल से बिछुड़कर भय से भागने लगे।
देवताओं को डरकर भागते देख, वृत्रासुर की प्रगतिका अनुमान करके सहस्र नेत्रों वाले इन्द्र पर महान् मोह छा गया। इन्द्र को इस प्रकार मोहाच्छन्न होते देख सनातन भगवान् विष्णु ने उनका बल बढ़ाते हुए उनमें अपना तेज स्थापित कर दिया। देवताओं ने देखा कि इन्द्र भगवान विष्णु के द्वारा सुरक्षित हो गये हैं, तब उन सबने तथा शुद्ध अन्तःकरण वाले ब्रह्मर्षियों ने भी देवराज इन्द्र में अपना-अपना तेज भर दिया। देवताओंसहित श्रीविष्णु तथा महाभाग महर्षियों के तेज से परिपूर्ण होकर देवराज इन्द्र अत्यन्त बलशाली हो गये।
देवेश्वर इन्द्र को बल से सम्पन्न जान वृत्रासुर ने बड़ी विकट गर्जना की। उसके सिंहनाद से भूलोक, सम्पूर्ण दिशाएँ, आकाश, स्वर्गलोक तथा पर्वत— सब के सब काँप उठे! राजन्! उस समय उस अत्यन्त भयानक गर्जना को सुनकर देवराज इन्द्र बहुत सन्तप्त हो उठे और भयभीत होकर उन्होंने बड़ी उतावली के साथ वृत्रासुर के वध के लिये अपने महान् वज्र का प्रहार किया। इन्द्र के वज्र से आहत होकर सुवर्णमालाधारी वह महान् असुर, पूर्वकाल में भगवान् विष्णु के हाथ से छूटे हुए महान् पर्वत मन्दर की भाँति पृथ्वी पर गिर पड़ा।
महादैत्य वृत्र के मारे जाने पर भी इन्द्र भय से पीड़ित होकर (छिपने की इच्छा से) तालाब में प्रवेश करने दौड़े; उन्हें भय के कारण यह विश्वास नहीं हो रहा था कि वज्र मेरे हाथ से छूट चुका है और वृत्रासुर भी अवश्य मारा गया है। उस समय सब देवता बड़े प्रसन्न हुए। महर्षिगण भी हर्षोल्लास में भरकर इन्द्रदेव की स्तुति करने लगे। तत्पश्चात् सब देवताओं ने मिलकर वृत्रासुर के वध से सन्तप्त हुए समस्त दैत्यों को तुरन्त मार भगाया।
सङ्गठित देवताओं द्वारा त्रास दिये जाने पर वे सब दैत्य भय से आतुर होकर समुद्र में ही प्रवेश कर गये। मत्स्यों और मगरों से भरे हुए उस अपार महासागर में प्रविष्ट होकर वे सम्पूर्ण दानव तीनों लोकों का नाश करने के लिये बड़े गर्व से एक साथ मन्त्रणा करने लगे। उनमें से कुछ दैत्य, जो अपनी बुद्धिके निश्चय को स्पष्ट रूप से जानने वाले थे, जगत् के विनाश के लिये उपयोगी विभिन्न उपायों का वर्णन करने लगे। उन्होंने सोचा कि जो लोग विद्वान् और तपस्वी हों, सबसे पहले उन्हीं का विनाश करना चाहिये; क्योंकि सम्पूर्ण लोग तपसे ही टिके हुए हैं। अतः तुम सब लोग तपस्या के विनाश के लिये शीघ्रतापूर्वक कार्य करो। भूमण्डल में जो कोई भी तपस्वी, धर्मज्ञ एवं उन्हें जानने-मानने वाले लोग हों, उन सबका तुरन्त वध कर डालो; उनके नष्ट होने पर सारा जगत् नष्ट हो जाएगा। इस प्रकार बुद्धि और विचार से हीन वे समस्त दैत्य संसार के विनाश की बात सोचकर अत्यन्त हर्ष का अनुभव करने लगे। उत्ताल तरङ्गों से भरे हुए वरुण के निवासस्थान रत्नाकर समुद्र रूप दुर्ग का आश्रय लेकर वे उसमें निर्भय होकर रहने लगे।
तेषां तु तत्र क्रमकालयोगाद् घोरा मतिश्चिन्तयतां बभूव ।
ये सन्ति विद्यातपसोपपन्ना- स्तेषां विनाशः प्रथमं तु कार्यः ॥
लोका हि सर्वे तपसा ध्रियन्ते तस्मात् त्वरध्वं तपसः क्षयाय ।
ये सन्ति केचिच्च वसुंधरायां तपस्विनो धर्मविदश्च तज्ज्ञाः ॥
तेषां वधः क्रियतां क्षिप्रमेव तेषु प्रणष्टेषु जगत् प्रणष्टम् ।
एवं हि सर्वे गतबुद्धिभावा जगद्विनाशे परमप्रहृष्टाः ॥
दुर्गं समाश्रित्य महोर्मिमन्तं रत्नाकरं वरुणस्यालयं स्म ॥
कि जो लोग विद्वान् और तपस्वी हों, सबसे पहले उन्हींका विनाश करना चाहिये । सम्पूर्ण लोग तपसे ही टिके हुए हैं । अतः तुम सब लोग तपस्याके विनाशके लिये शीघ्रतापूर्वक कार्य करो । भूमण्डलमें जो कोई भी तपस्वी, धर्मज्ञ एवं उन्हें जानने - माननेवाले लोग हों, उन सबका तुरंत वध कर डालो । उनके नष्ट होनेपर सारा जगत् नष्ट हो जायगा । इस प्रकार बुद्धि और विचारसे हीन वे समस्त दैत्य संसारके विनाशकी बात सोचकर अत्यन्त हर्षका अनुभव करने लगे । उत्ताल तरंगों से भरे हुए वरुणके निवासस्थान रत्नाकर समुद्ररूप दुर्गका आश्रय लेकर वे उसमें निर्भय होकर रहने लगे ।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्व के अन्तर्गत तीर्थयात्रा पर्व में लोमश तीर्थयात्रा के प्रसङ्ग में वृत्रवध उपाख्यान विषयक एक सौ एकवाँ अध्याय पूरा हुआ।
लोमशजी कहते हैं— राजन्! वरुण के निवासस्थान जलनिधि समुद्र का आश्रय लेकर कालेय नामक दैत्य तीनों लोकों के विनाश के कार्य में लग गये। वे सदा रात में कुपित होकर आते और आश्रमों तथा पुण्य स्थानों में जो निवास करते थे, उन मुनियों को खा जाते थे। उन दुरात्माओं ने वसिष्ठ के आश्रम में निवास करने वाले एक सौ अट्ठासी ब्राह्मणों तथा नौ दूसरे तपस्वियों को अपना आहार बना लिया। च्यवन मुनि के पवित्र आश्रम में, जहाँ बहुत से द्विज निवास करते थे, जाकर उन दैत्यों ने फल-मूल का आहार करने वाले सौ मुनियों का भक्षण कर लिया।
इस प्रकार वे रात में तपस्वी मुनियों का संहार करते और दिन में समुद्र के जल में प्रवेश कर जाते थे। भरद्वाज मुनि के आश्रम में वायु और जल पीकर संयम-नियम के साथ रहने वाले बीस ब्रह्मचारियों को कालेयों ने काल के गाल में डाल दिया। इस तरह क्रमशः सभी आश्रमों में जाकर अपने बाहुबल के भरोसे उन्मत्त रहने वाले दानव रात में वहाँ के निवासियों को सर्वथा कष्ट पहुँचाया करते थे। नरश्रेष्ठ! कालेय दानव काल के अधीन हो रहे थे; इसलिये वे असङ्ख्य ब्राह्मणों की हत्या करते चले जा रहे थे। मनुष्यों को इस षड्यन्त्र का पता नहीं लगता था। इस प्रकार वे तपस्या के धनी तापसों के संहार में प्रवृत्त हो रहे थे।
प्रातःकाल आने पर नियमित आहार से दुर्बल मुनिगण अपने अस्थिमात्रावशिष्ट निष्प्राण शरीरों से पृथ्वी पर पड़े दिखाई देते थे। राक्षसों द्वारा भक्षण करने के कारण उनके शरीरों का मांस तथा रक्त क्षीण हो चुका था; वे मज्जा, आँतें और सन्धिस्थानों (घुटने आदि) से रहित हो गये थे। इस तरह सब ओर फैली हुई सफेद हड्डियों के कारण वहाँ की भूमि शङ्खराशि से आच्छादित-सी प्रतीत होती थी। उलटे-पुलटे पड़े हुए कलशों, टूटे-फूटे स्रुवों तथा बिखरी पड़ी हुई अग्निहोत्र की सामग्रियों से उन आश्रमों की भूमि आच्छादित हो रही थी। स्वाध्याय और वषट्कार बन्द हो गये; यज्ञोत्सव आदि कार्य नष्ट हो गये। कालेयों के भय से पीड़ित हुए सम्पूर्ण जगत् में कहीं भी कोई उत्साह नहीं रह गया था।
आत्मत्राण पराभीता: प्राद्रवन्त दिशो भयात्।
नरेश्वर! इस प्रकार दिन-दिन नष्ट होने वाले मनुष्य भयभीत होकर अपनी रक्षा के लिये चारों दिशाओं में भाग गये। कुछ लोग गुफाओं में जा छिपे; कितने ही मानव झरनों के आस-पास रहने लगे और कितने ही मनुष्य मृत्यु से इतने घबरा गये कि भय से ही उनके प्राण निकल गये। इस भूतल पर कुछ महान् धनुर्धर शूरवीर भी थे, जो अत्यन्त हर्ष और उत्साह से युक्त होकर दानवों के स्थान का पता लगाते हुए उनके दमन के लिये भारी प्रयत्न करने लगे; परन्तु समुद्र में छिपे हुए दानवों को वे पकड़ नहीं पाते। उन्होंने बहुत परिश्रम किया और अन्त में थककर वे पुनः अपने घर को ही लौट आये।
मनुजेश्वर! यज्ञोत्सव आदि कार्यों के नष्ट हो जाने पर जब जगत् का विनाश होने लगा, तब देवताओं को बड़ी पीड़ा हुई। इन्द्र आदि सब देवताओं ने मिलकर भय से मुक्त होने के लिये मन्त्रणा की। फिर वे समस्त देवता— सबको शरण देने वाले, शरणागत वत्सल, अजन्मा एवं सर्वव्यापी, अपराजित वैकुण्ठनाथ भगवान् नारायणदेव की शरण में गये और नमस्कार करके उन मधुसूदन से बोले:
"त्वं नः स्रष्टा च भर्ता च हर्ता च जगतः प्रभो। त्वया सृष्टमिदं विश्वं यच्चेङ्गं यच्च नेङ्गति॥"
हे प्रभो! आप ही हमारे स्रष्टा और पालक हैं; आप ही सम्पूर्ण जगत् का संहार करने वाले हैं। इस स्थावर और जङ्गम सम्पूर्ण जगत् की सृष्टि आपने ही की है।
"त्वया भूमिः पुरा नष्टा समुद्रात् पुष्करेक्षण। वाराहं वपुराश्रित्य जगदर्थे समुद्धृता॥"
हे कमलनयन! पूर्वकाल में आपने वाराहरूप धारण करके सम्पूर्ण जगत् के हित के लिये समुद्र के जल से इस खोयी हुई पृथ्वी का उद्धार किया था।
"पुरुषोत्तम! प्राचीनकाल में आपने ही नृसिंह-शरीर धारण करके महापराक्रमी आदिदैत्य हिरण्यकशिपु का वध किया था।"
"सम्पूर्ण प्राणियों के लिये अवध्य महादैत्य बलिको भी आपने ही वामनरूप धारण करके त्रिलोकी के राज्य से वञ्चित किया।"
"यज्ञों का नाश करने वाले क्रूरकर्मा महाधनुर्धर जम्भ नाम से विख्यात असुर को भी आपने ही मार गिराया।"
हे मधुसूदन! ऐसे-ऐसे आपके अनेक कर्म हैं, जिनकी कोई सङ्ख्या नहीं है। हम भयभीत देवताओं के एकमात्र आश्रय आप ही हैं। देवदेवेश्वर! इसलिये कि लोकहित के उद्देश्य से हम यह निवेदन कर रहे हैं कि आप सम्पूर्ण जगत् के प्राणियों, देवताओं और इन्द्र की भी महान् भय से रक्षा कीजिये।
लोका ह्येवं विवर्धन्ते ह्यन्योन्यं समुपाश्रिताः ।
त्वत्प्रसादान्निरुद्विग्नास्त्वयैव परिरक्षिताः ॥
इदं च समनुप्राप्तं लोकानां भयमुत्तमम् ।
न च जानीम केनेमे रात्रौ वध्यन्ति ब्राह्मणाः ॥
इसी प्रकार सब लोग एक - दूसरेके सहारे उन्नति करते हैं । आपकी ही कृपासे सब प्राणी उद्वेगरहित जीवन बिताते और आपके द्वारा ही सर्वथा सुरक्षित रहते हैं । भगवन्! मनुष्योंके समक्ष यह बड़ा भारी भय उपस्थित हुआ है । न जाने कौन रातमें आकर इन ब्राह्मणोंका वध कर रहा है ।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्व के अन्तर्गत तीर्थयात्रा पर्व में लोमश तीर्थयात्रा के प्रसङ्ग में विष्णुस्तुति विषयक एक सौ दोवाँ अध्याय पूरा हुआ।
युधिष्ठिर ने पूछा—"हे महामुने! विन्ध्य पर्वत किसलिए क्रोध से मूर्छित होकर सहसा बढ़ने लगा था? मैं इस प्रसङ्ग को विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ।"
लोमश ऋषि कहने लगे—"राजन्! सूर्यदेव सुवर्णमय, महान् पर्वत गिरिराज मेरु की उदय और अस्त के समय परिक्रमा किया करते हैं। उन्हें ऐसा करते देख विन्ध्यगिरि ने उनसे कहा—'भास्कर! जैसे आप मेरु की प्रतिदिन परिक्रमा करते हैं, उसी तरह मेरी भी कीजिये।' यह सुनकर भगवान सूर्य ने गिरिराज विन्ध्य से कहा—'गिरिश्रेष्ठ! मैं अपनी इच्छा से मेरुगिरि की परिक्रमा नहीं करता हूँ। जिन्होंने इस संसार की सृष्टि की है, उन विधाता ने मेरे लिये यही मार्ग निश्चित किया है।'
यह देख सब देवता एक साथ मिलकर महान् पर्वतराज विन्ध्य के पास गये और अनेक उपायों द्वारा उसके क्रोध का निवारण करने लगे; परन्तु उसने उनकी बात नहीं मानी। तब वे सब देवता मिलकर अपने आश्रम पर विराजमान धर्मात्माओं में श्रेष्ठ तपस्वी अगस्त्य मुनि के पास गये, जो अद्भुत प्रभावशाली थे। वहाँ जाकर उन्होंने अपना प्रयोजन कह सुनाया।
देवता बोले—'द्विजश्रेष्ठ! यह पर्वतराज विन्ध्य क्रोध के वशीभूत होकर सूर्य और चन्द्रमा के मार्ग तथा नक्षत्रों की गतिको रोक रहा है। महाभाग! आपके सिवा दूसरा कोई इसका निवारण नहीं कर सकता। अतः आप चलकर इसे रोकिये।'
देवा ऊचुः सूर्याचन्द्रमसोर्मार्गं नक्षत्राणां गतिं तथा ।
शैलराजो वृणोत्येष विन्ध्यः क्रोधवशानुगः ॥
तं निवारयितुं शक्तो नान्यः कश्चिद् द्विजोत्तम ।
ऋते त्वां हि महाभाग तस्मादेनं निवारय ॥
देवता बोले — द्विजश्रेष्ठ! यह पर्वतराज विन्ध्य क्रोधके वशीभूत होकर सूर्य और चन्द्रमाके मार्ग तथा नक्षत्रोंकी गतिको रोक रहा है । महाभाग! आपके सिवा दूसरा कोई इसका निवारण नहीं कर सकता । अतः आप चलकर इसे रोकिये ।
देवताओं की यह बात सुनकर विप्रवर अगस्त्य अपनी पत्नी लोपामुद्रा के साथ विन्ध्य पर्वत के समीप गये और वहाँ उपस्थित होकर उससे इस प्रकार बोले—'पर्वतश्रेष्ठ! मैं किसी कार्य से दक्षिण दिशा को जा रहा हूँ, मेरी इच्छा है, तुम मुझे मार्ग प्रदान करो। जब तक मैं पुनः लौटकर न आऊँ तब तक मेरी प्रतीक्षा करते रहो। शैलराज! मेरे लौट आने पर तुम पुनः इच्छानुसार बढ़ते रहना।'
तं तु दृष्ट्वा तथा विन्ध्यः शैलः सूर्यमथाब्रवीत् ।
यथा हि मेरुर्भवता नित्यशः परिगम्यते ॥
प्रदक्षिणश्च क्रियते मामेवं कुरु भास्कर ।
एवमुक्तस्ततः सूर्यः शैलेन्द्रं प्रत्यभाषत ॥
नाहमात्मेच्छया शैलं करोम्येनं प्रदक्षिणम् ।
एष मार्गः प्रदिष्टो मे यैरिदं निर्मितं जगत् ॥
उन्हें ऐसा करते देख विन्ध्यगिरिने उनसे कहा-' भास्कर! जैसे आप मेरुकी प्रतिदिन परिक्रमा करते हैं, उसी तरह मेरी भी कीजिये । ' यह सुनकर भगवान् सूर्यने गिरिराज विन्ध्यसे कहा— ‘ गिरिश्रेष्ठ! मैं अपनी इच्छासे मेरुगिरिकी परिक्रमा नहीं करता हूँ । जिन्होंने इस संसारकी सृष्टि की है, उन विधाताने मेरे लिये यही मार्ग निश्चित किया है'
शत्रुसूदन! विन्ध्य के साथ ऐसा नियम करके मित्रावरुणनन्दन अगस्त्यजी चले गये और आज तक दक्षिण प्रदेश से नहीं लौटे। राजन्! तुम मुझसे जो बात पूछ रहे थे, वह सब प्रसङ्ग मैंने कह दिया। महर्षि अगस्त्य के ही प्रभाव से विन्ध्य पर्वत बढ़ नहीं रहा है।
राजन्! सब देवताओं ने अगस्त्य से वर पाकर जिस प्रकार कालेय नामक दैत्यों का संहार किया, वह बता रहा हूँ, सुनो—"
देवताओं की बात सुनकर मित्रावरुणनन्दन अगस्त्य ने पूछा—'देवताओ! आप लोग किस लिये यहाँ पधारे हैं और मुझसे कौन-सा वर चाहते हैं?' उनके इस प्रकार पूछने पर इन्द्र को आगे करके सब देवताओं ने हाथ जोड़कर मुनि से कहा—'महात्मन्! हम आपके द्वारा यह कार्य सम्पन्न कराना चाहते हैं कि आप सारे महासागर के जल को पी जाएँ। तदनन्तर हम लोग देवद्रोही कालेय नामक दानवों का उनके बन्धु-बान्धवों सहित वध कर डालेंगे।'
देवताओं का यह कथन सुनकर महर्षि अगस्त्य ने कहा—'बहुत अच्छा! मैं आप लोगों का मनोरथ पूर्ण करूँगा। इससे सम्पूर्ण लोकों को महान् सुख प्राप्त होगा।' ऐसा कहकर अगस्त्यजी देवताओं तथा तपःसिद्ध ऋषियों के साथ नदीपति समुद्र के तट पर गये। उस समय मनुष्य, नाग, गन्धर्व, यक्ष और किन्नर सभी उस अद्भुत दृश्य को देखने के लिये उन महात्मा के पीछे चल दिये।
फिर वे सब लोग एक साथ भयङ्कर गर्जना करने वाले समुद्र के समीप गये; जो अपने उत्ताल तरङ्गों द्वारा मानो नृत्य कर रहा था और वायु के द्वारा उछलता-कूदता सा जान पड़ता था। वह फेनों के समुदाय द्वारा मानो अपनी हास्यछटा बिखेर रहा था और कन्दराओं से टकराता-सा जान पड़ता था। उसमें नाना प्रकार के ग्राह आदि जलजन्तु भरे हुए थे तथा बहुत-से पक्षी निवास करते थे। अगस्त्यजी के साथ देवता, गन्धर्व, बड़े-बड़े नाग और महाभाग ऋषिगण सभी महासागर के तट पर जा पहुँचे।
लोमशजी कहते हैं—"राजन्! समुद्र के तट पर जाकर मित्रावरुण-नन्दन भगवान अगस्त्य मुनि वहाँ एकत्र हुए देवताओं तथा समागत ऋषियों से बोले—'मैं लोकहित के लिये समुद्र का जल पी लेता हूँ। फिर आप लोगों को जो कार्य करना हो उसे शीघ्र पूरा कर लें।'
समुद्रं स समासाद्य वारुणिर्भगवानृषिः ।
उवाच सहितान् देवानृषींश्चैव समागतान् ॥
अहं लोकहितार्थं वै पिबामि वरुणालयम् ।
भवद्भिर्यदनुष्ठेयं तच्छीघ्रं संविधीयताम् ॥
लोमशजी कहते हैं - राजन्! समुद्रके तटपर जाकर मित्रावरुण-नन्दन भगवान् अगस्त्यमुनि वहाँ एकत्र हुए देवताओं तथा समागत ऋषियोंसे बोले –'मैं लोकहितके लिये समुद्रका जल पी लेता हूँ । फिर आपलोगोंको जो कार्य करना हो उसे शीघ्र पूरा कर लें '
उन्हें समुद्र-पान करते देख इन्द्र सहित सम्पूर्ण देवता बड़े विस्मित हुए और स्तुतियों द्वारा उनका समादर करने लगे। वे कहने लगे—'लोकभावन महर्षे! आप हमारे रक्षक तथा सम्पूर्ण लोकों के विधाता हैं। आपकी कृपा से अब देवता सहित सम्पूर्ण जगत् विनाश को नहीं प्राप्त होगा।'
इस प्रकार जब देवता महात्मा अगस्त्य की प्रशंसा कर रहे थे, सब ओर गन्धर्वों के वाद्यों की ध्वनि फैल रही थी और अगस्त्यजी पर दिव्य फूलों की बौछार हो रही थी, उसी समय अगस्त्यजी ने सम्पूर्ण महासागर को जलशून्य कर दिया। उस महासमुद्र को निर्जल हुआ देख सब देवता बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने अपने दिव्य एवं श्रेष्ठ आयुध लेकर अत्यन्त उत्साह से दानवों पर आक्रमण किया।
महान् बलवान्, वेगशाली और महाबुद्धिमान् देवता जब सिंहगर्जना करते हुए दैत्यों को मारने लगे, उस समय वे उन वेगवान् महामना देवताओं का वेग न सह सके। भरतनन्दन! देवताओं की मार पड़ने पर दानवों ने भी भयङ्कर गर्जना करते हुए दो घड़ी तक उनके साथ घोर युद्ध किया। उन दैत्यों को शुद्ध अन्तःकरण वाले मुनियों ने अपनी तपस्या द्वारा पहले से ही दग्ध-सा कर रखा था, अतः पूरी शक्ति लगाकर अधिक-से-अधिक प्रयास करने पर भी देवता द्वारा वे मार डाले गये। सोने की मोहरों की मालाओं से भूषित तथा कुण्डल एवं बाजूबन्दधारी दैत्य वहाँ मारे जाकर खिले हुए पलाश के वृक्षों की भाँति शोभा पा रहे थे।
नरश्रेष्ठ! मरने से बचे हुए कुछ कालेय दैत्य वसुन्धरा देवी को विदीर्ण करके पाताल में चले गये। सब दानवों को मारा गया देख देवताओं ने नाना प्रकार के वचनों द्वारा मुनिवर अगस्त्यजी का स्तवन किया और यह बात कही—'महाभाग! आपकी कृपा से समस्त लोकों ने महान् सुख प्राप्त किया है; क्योंकि क्रूरतापूर्ण पराक्रम दिखाने वाले कालेय दैत्य आपके तेज से दग्ध हो गये। मुने! आपकी बाँहें बड़ी हैं। आप नूतन संसार की सृष्टि करने में समर्थ हैं। अब आप समुद्र को फिर भर दीजिये। आपने जो इसका जल पी लिया है, उसे फिर इसी में छोड़ दीजिये।'
उनके ऐसा कहने पर मुनिप्रवर भगवान अगस्त्य ने वहाँ एकत्र हुए इन्द्र आदि समस्त देवताओं से उस समय यों कहा—'देवगण! वह जल तो मैंने पचा लिया, अतः समुद्र को भरने के लिये सतत प्रयत्नशील रहकर आप लोग कोई दूसरा ही उपाय सोचें।' शुद्ध अन्तःकरण वाले महर्षि का यह वचन सुनकर सब देवता बड़े विस्मित हो गये; उनके मन में विषाद छा गया। वे आपस में सलाह करके मुनिवर अगस्त्यजी को प्रणाम कर वहाँ से चल दिये।
एवमुक्तः प्रत्युवाच भगवान् मुनिपुङ्गवः ।
( तांस्तदा सहितान् देवानगस्त्यः सपुरन्दरान् ।
) जीर्णं तद्धि मया तोयमुपायोऽन्यः प्रचिन्त्यताम् ॥
पूरणार्थं समुद्रस्य भवद्भिर्यत्नमास्थितैः ।
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं महर्षेर्भावितात्मनः ॥
विस्मिताश्च विषण्णाश्च बभूवुः सहिताः सुराः ।
परस्परमनुज्ञाप्य प्रणम्य मुनिपुङ्गवम् ॥
उनके ऐसा कहनेपर मुनिप्रवर भगवान् अगस्त्यने वहाँ एकत्र हुए इन्द्र आदि समस्त देवताओंसे उस समय यों कहा - ' देवगण! वह जल तो मैंने पचा लिया, अतः समुद्रको भरनेके लिये सतत प्रयत्नशील रहकर आपलोग कोई दूसरा ही उपाय सोचें । ' शुद्ध अन्तःकरणवाले महर्षिका यह वचन सुनकर सब देवता बड़े विस्मित हो गये; उनके मनमें विषाद छा गया । वे आपसमें सलाह करके मुनिवर अगस्त्यजीको प्रणाम कर वहाँसे चल दिये ।
महाराज! फिर सारी प्रजा जैसे आयी थी, वैसे ही लौट गयी। देवतुलोग भगवान विष्णु के साथ ब्रह्माजी के पास गये। समुद्र को भरने के उद्देश्य से बार-बार आपस में सलाह करके श्रीविष्णु सहित सब देवता ब्रह्माजी के निकट जा हाथ जोड़कर पूछने लगे कि 'समुद्र को पुनः भरने के लिये क्या उपाय किया जाय?'"
लोमशजी कहते हैं— राजन्! जब समुद्र को भरने की चिन्ता में सभी देवता विवश थे, तब लोकपितामह ब्रह्माजी ने अपने समीप उपस्थित देवताओं से कहा— ‘देवगण! इस समय तुम सब लोग इच्छानुसार अभीष्ट स्थान को चले जाओ। अब दीर्घकाल के पश्चात् समुद्र फिर अपनी स्वाभाविक अवस्था में आ जाएगा। महाराज भगीरथ अपने कुटुम्बी जनों के उद्धार का उद्देश्य लेकर जलनिधि समुद्र को पुनः अगाध जलराशि से भर देंगे।’
तानुवाच समेतांस्तु ब्रह्मा लोकपितामहः ।
गच्छध्वं विबुधाः सर्वे यथाकामं यथेप्सितम् ॥
लोमशजी कहते हैं- राजन्! तब लोकपितामह ब्रह्माजीने अपने पास आये हुए सब देवताओंसे कहा — ‘ देवगण! इस समय तुम सब लोग इच्छानुसार अभीष्ट स्थानको चले जाओ ।
ब्रह्माजी की यह बात सुनकर सम्पूर्ण श्रेष्ठ देवता, जो अवसर की प्रतीक्षा कर रहे थे, वैसे ही चले गये जैसे वे आए थे।
युधिष्ठिर ने पूछा— 'ब्रह्मन्! भगीरथ के कुटुम्बी जन समुद्र की पूर्ति में निमित्त क्यों बने? मुने! उनके निमित्त बनने का कारण क्या है? और भगीरथ के आश्रय से किस प्रकार समुद्र की पूर्ति हुई? तपोधन! विप्रवर! मैं यह प्रसङ्ग, जिसमें राजाओं के उत्तम चरित्र का वर्णन है, आपके मुख से विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ।'
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! महात्मा धर्मराज के इस प्रकार पूछने पर विप्रवर लोमश ने महात्मा राजा सगर का माहात्म्य बताया।
लोमशजी कहते हैं— राजन्! इक्ष्वाकु वंश में सगर नाम के प्रसिद्ध एक राजा हुए। वे रूप, धैर्य और बल से सम्पन्न तथा बड़े प्रतापी थे; परन्तु उनका कोई पुत्र न था। उन्होंने हैहय तथा तालजङ्घ नामक क्षत्रियों का संहार करके सब राजाओं को अपने वश में कर लिया और अपने राज्य का शासन करने लगे।
भरतश्रेष्ठ! राजा सगर की दो पत्नियाँ थीं— वैदर्भी और शैब्या। उन दोनों को ही अपने रूप और यौवन का बड़ा अभिमान था।
राजेन्द्र! राजा सगर अपनी दोनों पत्नियों के साथ कैलास पर्वत पर जाकर पुत्र की इच्छा से बड़ी भारी तपस्या करने लगे। योगयुक्त होकर महान् तप में लगे हुए महाराज सगर को त्रिपुरनाशक, त्रिनेत्रधारी, शङ्कर, भव, ईशान, शूलपाणि, पिनाकी, त्र्यम्बक, उग्रेश, बहुरूप और उमापति आदि नामों से प्रसिद्ध महात्मा भगवान् शिव का दर्शन हुआ।
तं प्रीतिमान् हरः प्राह सभार्यं नृपसत्तमम् ।
यस्मिन् वृतो मुहूर्तेऽहं त्वयेह नृपते वरम् ॥
वरदायक भगवान् शिवको देखते ही महाबाहु राजा सगरने दोनों पत्नियोंसहित प्रणाम किया और पुत्रके लिये याचना की । तब भगवान् शिवने प्रसन्न होकर पत्नीसहित नृपश्रेष्ठ सगरसे कहा — ‘ राजन्! तुमने यहाँ जिस मुहूर्तमें वर माँगा है, उसका परिणाम यह होगा ।
महाबाहु राजा सगर ने भगवान् शिव को देखते ही अपनी दोनों पत्नियों सहित उन्हें प्रणाम किया और पुत्र के लिए याचना की। तब वरदायक भगवान् शिव ने प्रसन्न होकर नृपश्रेष्ठ सगर से कहा— ‘राजन्! तुमने यहाँ जिस मुहूर्त में वर माँगा है, उसका परिणाम यह होगा— तुम्हारी एक पत्नी के गर्भ से अत्यन्त अभिमानी साठ हजार शूरवीर पुत्र होंगे, परन्तु वे सब के सब एक ही साथ नष्ट हो जाएँगे। भूपाल! तुम्हारी जो दूसरी पत्नी है, उसके गर्भ से एक ही शूरवीर वंशधर पुत्र उत्पन्न होगा।’
षष्टिः पुत्रसहस्राणि शूराः परमदर्पिताः ।
एकस्यां सम्भविष्यन्ति पत्न्यां नरवरोत्तम ॥
ते चैव सर्वे सहिताः क्षयं यास्यन्ति पार्थिव ।
एको वंशधरः शूर एकस्यां सम्भविष्यति ॥
‘नरश्रेष्ठ! तुम्हारी एक पत्नीके गर्भसे अत्यन्त अभिमानी साठ हजार शूरवीर पुत्र होंगे, परंतु वे सब - के - सब एक ही साथ नष्ट हो जायँगे । भूपाल! तुम्हारी जो दूसरी पत्नी है, उसके गर्भसे एक ही शूरवीर वंशधर पुत्र उत्पन्न होगा'
ऐसा कहकर भगवान् शङ्कर वहीं अन्तर्धान हो गये। राजा सगर भी अत्यन्त प्रसन्नचित्त होकर अपनी पत्नियों सहित अपने निवास स्थान को चले गये। तदनन्तर उनकी वे दोनों कमलनयनी पत्नियाँ वैदर्भी और शैब्या गर्भवती हुईं। फिर समय आने पर वैदर्भी ने अपने गर्भ से एक तूंबी उत्पन्न की और शैब्याने देवता के समान सुन्दर रूप वाले एक पुत्र को जन्म दिया। राजा सगर ने उस तूंबी को फेंक देने का विचार किया।
उसी समय आकाश से एक गम्भीर वाणी सुनाई दी— 'राजन्! ऐसा दुःसाहस न करो। अपने इन पुत्रों का त्याग करना तुम्हारे लिये उचित नहीं है। इस तूंबी में से एक-एक बीज को निकालकर घी से भरे हुए गरम घड़ों में अलग-अलग रक्खो और यत्नपूर्वक इन सबकी रक्षा करो। पृथ्वीपते! ऐसा करने से तुम्हें साठ हजार पुत्र प्राप्त होंगे। नरश्रेष्ठ! महादेवजी ने तुम्हारे लिये इसी क्रम से पुत्र जन्म होने का निर्देश किया है; अतः तुम्हें कोई अन्यथा विचार नहीं होना चाहिए।'
ततः पुत्रसहस्राणि षष्टिं प्राप्स्यसि पार्थिव ।
महादेवेन दिष्टं ते पुत्रजन्म नराधिप ।
अनेन क्रमयोगेन मा ते बुद्धिरतोऽन्यथा ॥
‘ पृथ्वीपते! ऐसा करनेसे तुम्हें साठ हजार पुत्र प्राप्त होंगे । नरश्रेष्ठ! महादेवजीने तुम्हारे लिये इसी क्रमसे पुत्रजन्म होनेका निर्देश किया है; अतः तुम्हें कोई अन्यथा विचार नहीं होना चाहिये ।
लोमशजी कहते हैं— भरतश्रेष्ठ! यह आकाशवाणी सुनकर भूपाल शिरोमणि राजा सगर ने उस पर विश्वास करके उसके कथनानुसार सब कार्य किया। नरेश ने एक-एक बीज को अलग करके उन सबको घी से भरे हुए घड़ों में रख दिया। फिर पुत्रों की रक्षा के लिये तत्पर हो, उन्होंने सबके लिये पृथक्-पृथक् धायें नियुक्त कर दीं। तदनन्तर दीर्घकाल के पश्चात् उस अनुपम तेजस्वी नरेश के साठ हजार महाबली पुत्र उन घड़ों में से निकल आए।
युधिष्ठिर! राजर्षि सगर के वे सभी पुत्र भगवान् शिव की कृपा से ही उत्पन्न हुए थे। वे सब भयङ्कर स्वभाव वाले और क्रूरकर्मा थे। वे आकाश में भी सब ओर घूम-फिर सकते थे। उनकी सङ्ख्या अधिक होने के कारण वे देवता सहित सम्पूर्ण लोकों की अवहेलना करते थे। समरभूमि में शोभा पाने वाले वे शूरवीर राजकुमार देवताओं, गन्धर्वों, राक्षसों तथा सम्पूर्ण प्राणियों को कष्ट दिया करते थे।
मन्दबुद्धि सगरपुत्रों द्वारा सताए हुए सब लोग सम्पूर्ण देवताओं के साथ ब्रह्माजी की शरण में गये। उस समय सर्वलोकपितामह महाभाग ब्रह्माजी ने उनसे कहा— 'देवताओ! तुम सभी इन सब लोगों के साथ जैसे आये हो, वैसे लौट जाओ। अब थोड़े ही दिनों में अपने ही किये हुए अपराधों द्वारा इन सगरपुत्रों का अत्यन्त घोर और महान् संहार होगा।'
नरेश्वर! उनके ऐसा कहने पर सब देवता तथा अन्य लोग ब्रह्माजी की आज्ञा ले जैसे आये थे, वैसे ही लौट गये।
राजन्! उनका यज्ञिय अश्व उनके अत्यन्त उत्साही सभी पुत्रों द्वारा सुरक्षित हो, स्वच्छन्द गति से पृथ्वी पर विचरने लगा। जब वह अश्व भयङ्कर दिखायी देने वाले जलशून्य समुद्र के तट पर आया, तब प्रयत्नपूर्वक रक्षित होने पर भी वहाँ सहसा अदृश्य हो गया। तात! तब उस उत्तम अश्व को अपहृत जानकर सगरपुत्रों ने पिता के पास आकर कहा— ‘हमारे यज्ञिय अश्व को किसी ने चुरा लिया, अब वह दिखायी नहीं देता।’ यह सुनकर राजा सगर ने कहा— 'तुम सब लोग समुद्र, वन और द्वीपों सहित सारी पृथ्वी पर विचरते हुए सम्पूर्ण दिशाओं में जाकर उस अश्व का पता लगाओ।'
महाराज! तदनन्तर वे पिता की आज्ञा लेकर इस सम्पूर्ण भूतल में सभी दिशाओं में अश्व की खोज करने लगे। खोजते-खोजते सभी सगरपुत्र एक-दूसरे से मिले, परन्तु वे अश्व तथा अश्वहर्ता का पता न लगा सके। 'आज्ञा से समुद्र, वन, द्वीप, नदी, नद, कन्दरा, पर्वत और वन्य प्रदेश सहित सारी पृथ्वी खोज डाली, परन्तु हमें न तो अश्व मिला न उसका चुरानेवाला ही।' युधिष्ठिर! उनकी यह बात सुनकर राजा सगर क्रोध से मूर्च्छित हो उठे और उस समय दैववश उन सबसे इस प्रकार बोले— ‘जाओ, लौटकर न आना। पुनः घोड़े का पता लगाओ। पुत्रो! उस यज्ञ के अश्व को लिये बिना वापस न आना।’
आगम्य पितरं चोचुस्ततः प्राञ्जलयोऽग्रतः ।
ससमुद्रवनद्वीपा सनदीनदकन्दरा ॥
सपर्वतवनोद्देशा निखिलेन मही नृप ।
अस्माभिर्विचिता राजञ्छासनात् तव पार्थिव ॥
न चाश्वमधिगच्छामो नाश्वहर्तारमेव च ।
श्रुत्वा तु वचनं तेषां स राजा क्रोधमूर्च्छितः ॥
उवाच वचनं सर्वांस्तदा दैववशान्नृप ।
अनागमाय गच्छध्वं भूयो मार्गत वाजिनम् ॥
यज्ञियं तं विना ह्यश्वं नागन्तव्यं हि पुत्रकाः ।
प्रतिगृह्य तु संदेशं पितुस्ते सगरात्मजाः ॥
भूय एव महीं कृत्स्नां विचेतुमुपचक्रमुः ।
अथापश्यन्त ते वीराः पृथिवीमवदारिताम् ॥
आज्ञासे समुद्र, वन, द्वीप, नदी, नद, कन्दरा, पर्वत और वन्य प्रदेशोंसहित सारी पृथ्वी खोज डाली, परंतु हमें न तो अश्व मिला न उसका चुरानेवाला ही। ' युधिष्ठिर! उनकी यह बात सुनकर राजा सगर क्रोधसे मूर्च्छित हो उठे और उस समय दैववश उन सबसे इस प्रकार बोले — ‘ जाओ, लौटकर न आना । पुनः घोड़ेका पता लगाओ । पुत्रो! उस यज्ञके अश्वको लिये बिना वापस न आना । ' पिताका वह संदेश शिरोधार्य करके सगरपुत्रोंने फिर सारी पृथ्वीपर अश्वको ढूँढ़ना आरम्भ किया । तदनन्तर उन वीरोंने एक स्थानपर पृथ्वीमें दरार पड़ी हुई देखी ।
पिता का वह सन्देश शिरोधार्य करके सगरपुत्रों ने फिर सारी पृथ्वी पर अश्व को ढूँढ़ना आरम्भ किया। तदनन्तर उन वीरों ने एक स्थान पर पृथ्वी में दरार पड़ी हुई देखी। उस बिल के पास पहुँचकर सगरपुत्रों ने कुदालों और फावड़ों से समुद्र को प्रयत्नपूर्वक खोदना आरम्भ किया।
एक साथ लगे हुए सगरकुमारों के खोदने पर सब ओर से विदीर्ण होने वाले समुद्र को बड़ी पीड़ा का अनुभव होता था। सगरपुत्रों के हाथों मारे जाते हुए असुर, नाग, राक्षस और नाना प्रकार के जन्तु बड़े जोर से आर्तनाद करते थे। सैकड़ों और हजारों ऐसे प्राणी दिखायी देने लगे जिनके मस्तक कट गये थे, शरीर छिन्न-भिन्न हो गये थे, चमड़े छिल गये थे तथा हड्डियों के जोड़ टूट गये थे।
इस प्रकार वरुण के निवासभूत समुद्र की खुदाई करते-करते उनका बहुत समय बीत गया, परन्तु वह अश्व कहीं दिखायी नहीं दिया।
राजन्! तदनन्तर क्रोध में भरे हुए सगरपुत्रों ने समुद्र के पूर्वोत्तर प्रदेश में पाताल फोड़कर प्रवेश किया और वहाँ उस यज्ञिय अश्व को पृथ्वी पर विचरते देखा। वहीं तेज की परम उत्तम राशि महात्मा कपिल बैठे थे, जो अपने दिव्य तेज से उसी प्रकार उद्भासित हो रहे थे, जैसे लपटों से अग्नि।
ततः पूर्वोत्तरे देशे समुद्रस्य महीपते ।
विदार्य पातालमथ संक्रुद्धाः सगरात्मजाः ॥
अपश्यन्त हयं तत्र विचरन्तं महीतले ।
कपिलं च महात्मानं तेजोराशिमनुत्तमम् ।
तेजसा दीप्यमानं तु ज्वालाभिरिव पावकम् ॥
राजन्! तदनन्तर क्रोधमें भरे हुए सगरपुत्रोंने समुद्रके पूर्वोत्तर प्रदेशमें पाताल फोड़कर प्रवेश किया और वहाँ उस यज्ञिय अश्वको पृथ्वीपर विचरते देखा । वहीं तेजकी परम उत्तम राशि महात्मा कपिल बैठे थे, जो अपने दिव्य तेजसे उसी प्रकार उद्भासित हो रहे थे, जैसे लपटोंसे अग्नि ।
राजन्! उस अश्व को देखकर उनके शरीर में हर्ष जनित रोमाञ्च हो आया। वे काल से प्रेरित होकर क्रोध में भरकर महात्मा कपिल का अनादर करके उस अश्व को पकड़ने के लिये दौड़े। महाराज! तब मुनिश्रेष्ठ कपिल कुपित हो उठे।
मन्दबुद्धि सगरपुत्रों को जला देने के लिये उन महातेजस्वी ने विकराल आँखें करके अपना तेज उन पर छोड़ दिया और उन मन्दबुद्धि सगरपुत्रों को जलाकर भस्म कर दिया।
वासुदेवेति यं प्राहुः कपिलं मुनिपुङ्गवम् ।
स चक्षुर्विकृतं कृत्वा तेजस्तेषु समुत्सृजन् ॥
ददाह सुमहातेजा मन्दबुद्धीन् स सागरान् । मुनिप्रवर कपिल वे ही भगवान् विष्णु हैं जिन्हें वासुदेव कहते हैं । उन महातेजस्वीने विकराल आँखें करके अपना तेज उनपर छोड़ दिया और मन्दबुद्धि सगरपुत्रोंको जला दिया ।
महादेवजी के कथन पर विचार करते हुए राजा सगर दो घड़ी तक अनमने होकर बैठे रहे। पुत्र की मृत्यु से उपजी वेदना उन्हें भीतर ही भीतर कचोट रही थी। उन्होंने स्वयं को सान्त्वना देते हुए सोचा कि अब केवल उस यज्ञिय अश्व को ढूँढ़ना ही एकमात्र उपाय है।
तदनन्तर, वे अपने पौत्र अंशुमान के पास पहुँचे और अत्यन्त भारी मन से कहा— "तात! मेरे अमित तेजस्वी साठ हजार पुत्र महर्षि कपिल की क्रोधाग्नि में पड़कर भलभक (शलभ) की भाँति नष्ट हो गए हैं। अनघ! पुरवासियों के हित की रक्षा करते हुए और धर्म का पालन करते हुए मैंने तुम्हारे पिता को भी त्याग दिया था।"
कापिलं तेज आसाद्य मत्कृते निधनं गताः ।
तव चापि पिता तात परित्यक्तो मयानघ ।
धर्मं संरक्षमाणेन पौरणां हितमिच्छता ॥
उन्हें भस्म हुआ देख महातपस्वी नारदजी राजा सगरके समीप आये और उनसे सब समाचार निवेदित किया । मुनिके मुखसे निकले हुए इस घोर वचनको सुनकर राजा सगर दो घड़ीतक अनमने हो महादेवजीके कथनपर विचार करते रहे । पुत्रकी मृत्युजनित वेदनासे अत्यन्त दुखी हो स्वयं ही अपने- आपको सान्त्वना दे उन्होंने अश्वको ही ढूँढ़नेका विचार किया । भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर असमञ्जसके पुत्र अपने पौत्र अंशुमान्को बुलाकर यह बात कही — ‘ तात! मेरे अमिततेजस्वी साठ हजार पुत्र मेरे ही लिये महर्षि कपिलकी क्रोधाग्निमें पड़कर नष्ट हो गये । अनघ! पुरवासियोंके हितकी रक्षा रखकर धर्मकी रक्षा करते हुए मैंने तुम्हारे पिताको भी त्याग दिया है '
युधिष्ठिर ने जिज्ञासावश पूछा— "तपोधन! नृपश्रेष्ठ सगर ने अपने उस दुस्त्यज वीर पुत्र 'असमञ्जस' का त्याग किस कारण किया था? कृपया मुझे वह प्रसङ्ग बताइये।"
लोमश मुनि कहने लगे— "हे युधिष्ठिर! वह जहाँ-तहाँ खेल-कूद में लगा रहता और पुरवासियों के दुर्बल बालकों के समीप सहसा पहुँच जाता। फिर उनका गला पकड़कर उन्हें नदी में फेंक देता था। इस भयङ्कर उत्पात से त्रस्त होकर समस्त पुरवासी भय और शोक में डूबे हुए राजा सगर के पास आए। उन्होंने हाथ जोड़कर विनती की— 'महाराज! आप शत्रु-सेना आदि के भय से हमारी रक्षा करने वाले हैं, अतः इस असमञ्जस के घोर भय से हमारी रक्षा करें!'
पुरवासियों के इन भयङ्कर वचनों को सुनकर नृपश्रेष्ठ सगर कुछ देर मौन रहे। फिर उन्होंने अपने मन्त्रियों को आदेश दिया— 'आज मेरे पुत्र असमञ्जस को मेरे घर से बाहर निकाल दो! यदि तुम्हें मेरा प्रिय कार्य करना है, तो मेरी इस आज्ञा का शीघ्र पालन करो।' मन्त्रियों ने राजा की आज्ञा मानकर उसे निर्वासित कर दिया।"
मुहुर्त विमना भूत्वा सचिवानिदमब्रवीत् ।
असमञ्जाः पुरादद्य सुतो मे विप्रवास्यताम् ॥
‘ अतः असमंजसके घोर भयसे आप हमारी रक्षा करें! ' पुरवासियोंका यह भयंकर वचन सुनकर नृपश्रेष्ठ सगर दो घड़ीतक अनमने होकर बैठे रहे । फिर मन्त्रियोंसे इस प्रकार बोले- ' आज मेरे पुत्र असमंजसको मेरे घरसे बाहर निकाल दो '
लोमश मुनि आगे कहते हैं— "अब मैं तुम्हें वह प्रसङ्ग सुनाता हूँ जब महाधनुर्धर अंशुमान से राजा सगर ने कहा था— 'हे पौत्र! यज्ञ में विघ्न पड़ जाने से मैं अत्यन्त दुखी और मोहित हूँ। तुम उस यज्ञिय अश्व को लेकर आओ और मेरा उद्धार करो।'
अंशुमान भारी मन से उसी मार्ग से समुद्र में उतरे जहाँ पृथ्वी विदीर्ण की गई थी। वहाँ उन्होंने महातेजस्वी कपिल मुनि के दर्शन किए। अंशुमान ने धरती पर माथा टेककर उन्हें प्रणाम किया और अपना सारा कार्य बताया। धर्मात्मा कपिल मुनि उनके इस व्यवहार से प्रसन्न हुए और बोले— 'अनघ! तुम्हारा कल्याण हो। तुम जो कुछ माँगोगे, मैं वह सब तुम्हें दूँगा। तुममें क्षमा, धर्म और सत्य प्रतिष्ठित है। तुम्हारे जैसे पौत्र को पाकर सगर कृतार्थ हैं और तुम्हारे पिता वास्तव में तुमसे पुत्रवान हैं। तुम्हारे ही प्रभाव से सकरने के वे सारे पुत्र, जो मेरी क्रोधाग्नि में शलभ की भाँति भस्म हो गए थे, अब स्वर्गलोक में चले जाएँगे। तुम्हारा पौत्र भगवान शङ्कर को सन्तुष्ट करके गङ्गाजी को पृथ्वी पर लेकर आएगा। हे नरश्रेष्ठ! तुम्हारा भला हो। इस यज्ञिय अश्व को ले जाओ और अपने पितामह सगर का यज्ञ पूर्ण करो।'"
T ततः प्रीतो महाराज कपिलोंऽशुमतोऽभवत् ।
उवाच चैनं धर्मात्मा वरदोऽस्मीति भारत ॥
भरतवंशी महाराज! इससे धर्मात्मा कपिलजी अंशुमान्पर प्रसन्न हो गये और बोले –'मैं तुम्हें वर देनेको उद्यत हूँ'
अंशुमान उस अश्व को लेकर यज्ञ-मण्डप में आए और सगर के चरणों में प्रणाम कर सारा समाचार सुनाया। जब उन्होंने बताया कि यज्ञिय अश्व आ गया है, तब राजा सगर ने पुत्रों के खोने का दुःख त्याग दिया और हर्षित होकर अपना यज्ञ पूर्ण किया। देवताओं ने उनका सत्कार किया। सगर ने वरुणालय समुद्र को अपना पुत्र मानकर दीर्घकाल तक राज्य किया और अन्त में अपने पौत्र अंशुमान पर राज्य का भार सौंपकर स्वर्गलोक चले गए।
धर्मात्मा अंशुमान ने भी अपने पितामह के समान ही पृथ्वी का पालन किया। उनके एक पुत्र हुए, जिनका नाम दिलीप था। जब दिलीप ने अपने पितरों के महान संहार का समाचार सुना, तो वे अत्यन्त दुखी हो उठे। उन्होंने गङ्गाजी को पृथ्वी पर उतारने के लिए महान प्रयत्न किए, किन्तु यथाशक्ति चेष्टा करने पर भी वे सफल न हो सके।
तदोपरान्त, उनके एक पुत्र हुए— भगीरथ। वे परम कान्तिमान, धर्मपरायण और सत्यवादी थे। जब भगीरथ ने सुना कि महात्मा कपिल द्वारा उनके साठ हजार पितरों की मृत्यु हुई है और वे स्वर्ग प्राप्ति से वञ्चित रह गए हैं, तो उन्होंने व्यथित हृदय से अपना राज्य मन्त्रियों को सौंपा और स्वयं हिमालय के शिखर पर तपस्या करने चले गए।
हिमालय का वह दृश्य अत्यन्त भव्य था। चारों ओर ऊँचे-ऊँचे शिखर थे, जो विविध धातुओं से अलङ्कृत थे। वायु के आधार पर उड़ते मेघ पर्वतों का अभिषेक कर रहे थे। गुफाओं में सिंह और व्याघ्र छिपे थे। विचित्र पक्षी— हंस, चातक, मोर और कोकिल वहाँ के वातावरण को जीवन्त बना रहे थे। यह शैलराज कहीं स्वर्ण जैसा, कहीं चाँदी जैसा तो कहीं कज्जल के समान काला दिखाई देता था।
भगीरथ उस हिमवान पर्वत पर जाकर घोर तपस्या में लीन हो गए। उन्होंने सहस्र वर्षों तक केवल फल, मूल और जल का आहार किया। एक हजार दिव्य वर्ष बीत जाने पर स्वयं महानदी गङ्गा ने साकार रूप में उन्हें दर्शन दिए।
जलस्थानेषु रम्येषु पद्मिनीभिश्च संकुलम् ।
सारसानां च मधुरैर्व्याहृतैः समलंकृतम् ॥
किन्नरैरप्सरोभिश्च निषेवितशिलातलम् ।
दिग्वारणविषाणाग्रैः समन्ताद् धृष्टपादपम् ॥
विद्याधरानुचरितं नानारत्नसमाकुलम् ।
विषोल्बणभुजंगश्च दीप्तजिह्वैर्निषेवितम् ॥
क्वचित् कनकसंकाशं क्वचिद् रजतसंनिभम् ।
क्वचिदञ्जनपुञ्जाभं हिमवन्तमुपागमत् ॥
स तु तत्र नरश्रेष्ठस्तपो घोरं समाश्रितः ।
फलमूलाम्बुसम्भक्षः सहस्रपरिवत्सरान् ॥
संवत्सरसहस्रे तु गते दिव्ये महानदी ।
दर्शयामास तं गङ्गा तदा मूर्तिमती स्वयम् ॥
शिखरोंपर विद्याधरगण विचर रहे हैं । नाना प्रकारके रत्न सब ओर व्याप्त हैं । प्रज्वलित जिह्वावाले भयंकर विषधर सर्प इस गिरिप्रदेशका सेवन करते हैं । यह शैलराज कहीं तो सुवर्णके समान उद्भासित होता है, कहीं चाँदीके समान चमकता है और कहीं कज्जलराशिके समान काला दिखायी देता है । नरश्रेष्ठ भगीरथ उस हिमवान् पर्वतपर गये और घोर तपस्यामें लग गये । उन्होंने सहस्र वर्षोंतक फल, मूल और जलका आहार किया । एक हजार दिव्य वर्ष बीत जानेपर महानदी गंगाने स्वयं साकार होकर उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया ।
गङ्गाजी ने पूछा— "महाराज! तुम मुझसे क्या चाहते हो? मैं तुम्हारी याचना पूर्ण करूँगी।"
भगीरथ की बात सुनकर विश्ववन्दिता गङ्गा अत्यन्त प्रसन्न हुईं। उन्होंने कहा— "महाराज! मैं तुम्हारी बात मानूँगी, इसमें संशय नहीं है; परन्तु आकाश से पृथ्वी पर गिरते समय मेरे वेग को रोकना बहुत कठिन है। देवश्रेष्ठ महेश्वर नीलकण्ठ को छोड़कर तीनों लोकों में कोई भी मेरा वेग धारण नहीं कर सकता। हे महाबाहो! तुम तपस्या द्वारा उन्हीं वरदायक भगवान शिव को सन्तुष्ट करो। स्वर्ग से गिरते समय वे ही मुझे अपने मस्तक पर धारण करेंगे। भगवान शङ्कर तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न होकर तुम्हारे पितरों के हित के लिए अवश्य तुम्हारा मनोरथ पूर्ण करेंगे।"
तं तोषय महाबाहो तपसा वरदं हरम् ।
स तु मां प्रच्युतां देवः शिरसा धारयिष्यति ॥
‘ महाबाहो! तुम तपस्याद्वारा उन्हीं वरदायक भगवान् शिवको संतुष्ट करो । स्वर्गसे गिरते समय वे ही मुझे अपने मस्तकपर धारण करेंगे ।
यह सुनकर भगीरथ कैलाश पर्वत पर पहुँचे और वहाँ तीव्र तपस्या करके महादेव को प्रसन्न किया। फिर गङ्गाजी की प्रेरणा के अनुसार, उन्होंने अपने पितरों को स्वर्ग की प्राप्ति कराने हेतु शिवजी से गङ्गा के वेग को धारण करने का वर माँगा।
In English
The Story of Agastya and Lopamudra
To fulfill the wish of his ancestors for an heir, the sage Agastya creates a woman named Lopamudra from various parts of living creatures. He later marries her, but she requests that he acquire wealth so they can enjoy intimacy with royal comforts without diminishing his ascetic power. Agastya visits several kings to ask for surplus wealth to satisfy her request.
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