श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 711–720
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 711–720
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दक्षिणां वै दिशं सर्वां प्लावयन्ती च मातृवत् ।
पूर्वं शम्भोर्जटाभ्रष्टा समुद्रमहिषी प्रिया ।
अस्यां नद्यां सुपुण्यायां यथेष्टमवगाह्यताम् ॥ ३३ ॥
पहले भगवान् शंकरकी जटासे गिरकर प्रवाहित होनेवाली समुद्रकी प्रियतमा महारानी गंगा सम्पूर्ण दक्षिण दिशाको इस प्रकार आप्लावित कर रही है, मानो माता अपनी संतानको नहला रही हो । इस परम पवित्र नदीमें तुम इच्छानुसार स्नान करो ॥ ३३ ॥
युधिष्ठिर निबोधेदं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ।
भृगोस्तीर्थं महाराज महर्षिगणसेवितम् ॥ ३४ ॥
महाराज युधिष्ठिर! इधर ध्यान दो, यह महर्षि- गणसेवित भृगुतीर्थ है, जो तीनों लोकोंमें विख्यात है ॥
यत्रोपस्पृष्टवान् रामो हृतं तेजस्तदाऽऽप्तवान् ।
अत्र त्वं भ्रातृभिः सार्धं कृष्णया चैव पाण्डव ॥ ३५ ॥
दुर्योधनहृतं तेजः पुनरादातुमर्हसि ।
कृतवैरेण रामेण यथा चोपहृतं पुनः ॥ ३६ ॥
जहाँ परशुरामजीने स्नान किया और उसी क्षण अपने खोये हुए तेजको पुनः प्राप्त कर लिया । पाण्डुनन्दन! तुम अपने भाइयों और द्रौपदीके साथ इसमें स्नान करके दुर्योधनद्वारा छीने हुए अपने तेजको पुनः प्राप्त कर सकते हो । जैसे दशरथनन्दन श्रीरामसे वैर करनेपर उनके द्वारा अपहृत हुए तेजको परशुरामने यहाँ स्नानके प्रभावसे पुनः पा लिया था ॥ ३५-३६ ॥ वैशम्पायन उवाच
स तत्र भ्रातृभिश्चैव कृष्णया चैव पाण्डवः ।
स्नात्वा देवान् पितॄंश्चैव तर्पयामास भारत ॥ ३७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं –जनमेजय! तब राजा युधिष्ठिरने अपने भाइयों और द्रौपदीके साथ उस तीर्थमें स्नान करके देवताओं और पितरोंका तर्पण किया ॥ ३७ ॥
तस्य तीर्थस्य रूपं वै दीप्ताद् दीप्ततरं बभौ ।
अप्रधृष्यतरश्चासीच्छात्रवाणां नरर्षभ ॥ ३८ ॥
नरश्रेष्ठ! उस तीर्थमें स्नान कर लेनेपर राजा युधिष्ठिरका रूप अत्यन्त तेजोयुक्त हो प्रकाशमान हो गया । अब वे शत्रुओंके लिये परम दुर्धर्ष हो गये ॥ ३८ ॥
अपृच्छच्चैव राजेन्द्र लोमशं पाण्डुनन्दनः ।
भगवन् किमर्थं रामस्य हृतमासीद् वपुः प्रभो ।
कथं प्रत्याहृतं चैव एतदाचक्ष्व पृच्छतः ॥ ३ ९ ॥
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राजेन्द्र! उस समय पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने महर्षि लोमशसे पूछा — ‘ भगवन्! परशुरामजीके तेजका अपहरण किसलिये किया गया था और प्रभो! वह इन्हें पुनः किस प्रकार प्राप्त हो गया? यह मैं जानना चाहता हूँ । आप कृपा करके इस प्रसंगका वर्णन करें ' ॥ ३ ९ ॥ लोमशउवाच
शृणु रामस्य राजेन्द्र भार्गवस्य च धीमतः ।
जातो दशरथस्यासीत् पुत्रो रामो महात्मनः ॥ ४० ॥
विष्णुः स्वेन शरीरेण रावणस्य वधाय वै ।
पश्यामस्तमयोध्यायां जातं दाशरथिं ततः ॥ ४१ ॥
लोमशजीने कहा- राजेन्द्र! तुम दशरथनन्दन श्रीराम तथा परम बुद्धिमान् भृगुनन्दन परशुरामजीका चरित्र सुनो । पूर्वकालमें महात्मा राजा दशरथके यहाँ साक्षात् भगवान् विष्णु अपने ही सच्चिदानन्दमय विग्रहसे श्रीरामरूपमें अवतीर्ण हुए थे । उनके अवतारका उद्देश्य था— पापी रावणका विनाश । अयोध्यामें प्रकट हुए दशरथनन्दन श्रीरामका हम लोग प्रायः दर्शन करते रहते थे ॥ ४०-४१ ॥
ऋचीकनन्दनो रामो भार्गवो रेणकासुतः ।
तस्य दाशरथेः श्रुत्वा रामस्याक्लिष्टकर्मणः ॥ ४२ ॥
कौतूहलान्वितो रामस्त्वयोध्यामगमत् पुनः ।
धनुरादाय तद् दिव्यं क्षत्रियाणां निबर्हणम् ॥ ४३ ॥
अनायास ही महान् कर्म करनेवाले दशरथकुमार श्रीरामका भारी पराक्रम सुनकर भृगु तथा ऋचीकके वंशज रेणुकानन्दन परशुराम उन्हें देखनेके लिये उत्सुक हो क्षत्रियसंहारक दिव्य धनुष लिये अयोध्यामें आये ॥ ४२-४३ ॥
जिज्ञासमानो रामस्य वीर्यं दाशरथेस्तदा ।
तं वै दशरथः श्रुत्वा विषयान्तमुपागतम् ॥ ४४ ॥
प्रेषयामास रामस्य रामं पुत्रं पुरस्कृतम् ।
स तमभ्यागतं दृष्ट्वा उद्यतास्त्रमवस्थितम् ॥ ४५ ॥
प्रहसन्निव कौन्तेय रामो वचनमब्रवीत् ।
कृतकालं हि राजेन्द्र धनुरेतन्मया विभो ॥ ४६ ॥
समारोपय यत्नेन यदि शक्नोषि पार्थिव ।
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उनके शुभागमनका उद्देश्य था दशरथनन्दन श्रीरामके बल पराक्रमकी परीक्षा करना । महाराज दशरथने जब सुना कि परशुरामजी हमारे राज्यकी सीमापर आ गये हैं, तब उन्होंने मुनिकी अगवानीके लिये अपने पुत्र श्रीरामको भेजा । कुन्तीनन्दन! श्रीरामचन्द्रजी धनुष-बाण हाथमें लिये आकर खड़े हैं, यह देखकर परशुरामजीने हँसते हुए कहा — ' राजेन्द्र! प्रभो! भूपाल! यदि तुममें शक्ति हो तो यत्नपूर्वक इस धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ाओ । यह वह धनुष है जिसके द्वारा मैंने क्षत्रियोंका संहार किया है' ॥ ४४-४६३ ॥ इत्युक्तस्त्वाह भगवंस्त्वं नाधिक्षेप्तुमर्हसि ॥ ४७ ॥
उनके ऐसा कहनेपर श्रीरामचन्द्रजीने कहा —' भगवन्! आपको इस तरह आक्षेप नहीं करना चाहिये ॥
नाहमप्यधमो धर्मे क्षत्रियाणां द्विजातिषु ।
इक्ष्वाकूणां विशेषेण बाहुवीर्ये न कत्थनम् ॥ ४८ ॥
‘ मैं भी समस्त द्विजातियोंमें क्षत्रियधर्मका पालन करनेमें अधम नहीं हूँ । विशेषतः इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रिय अपने बाहुबलकी प्रशंसा नहीं करते ' ॥ ४८ ॥
तमेवंवादिनं तत्र रामो वचनमब्रवीत् ।
अलं वै व्यपदेशेन धनुरायच्छ राघव ॥ ४ ९ ॥
श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर परशुरामजी बोले- ' रघुनन्दन! बातें बनानेकी कोई आवश्यकता नहीं । यह धनुष लो और इसपर प्रत्यञ्चा चढ़ाओ ' ॥ ४ ९ ॥
ततो जग्राह रोषेण क्षत्रियर्षभसूदनम् ।
रामो दाशरथिर्दिव्यं हस्ताद् रामस्य कार्मुकम् ॥ ५० ॥
धनुरारोपयामास सलील इव भारत ।
ज्याशब्दमकरोच्चैव स्मयमानः स वीर्यवान् ॥ ५१ ॥
तब दशरथनन्दन श्रीरामजीने रोषपूर्वक परशुरामका वह वीर क्षत्रियोंका संहारक दिव्य धनुष उनके हाथसे ले लिया । भारत! उन्होंने लीलापूर्वक प्रत्यञ्चा चढ़ा दी । तत्पश्चात् पराक्रमी श्रीरामचन्द्रजीने मुसकराते हुए धनुषकी टंकार फैलायी ॥ ५०-५१ ॥
तस्य शब्दस्य भूतानि वित्रसन्त्यशनेरिव ।
अथाब्रवीत् तदा रामो रामं दाशरथिस्तदा ॥ ५२ ॥
इदमारोपितं ब्रह्मन् किमन्यत् करवाणि ते ।
तस्य रामो ददौ दिव्यं जामदग्न्यो महात्मनः ।
शरमाकर्णदेशान्तमयमाकृष्यतामिति ॥ ५३ ॥
बिजलीकी गड़गड़ाहटके समान उस टंकार- ध्वनिको सुनकर सब प्राणी घबरा उठे । उस समय दशरथनन्दन श्रीरामने परशुरामजी से कहा - 'ब्रह्मन्! यह धनुष तो मैंने चढ़ा दिया अब और आपका कौन- सा कार्य करूँ? ' तब जमदग्निनन्दन परशुरामने महात्मा
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श्रीरामचन्द्रजीको एक दिव्य बाण दे दिया और कहा - ' इसे धनुषपर रखकर अपने कानके पासतक खींचिये ' ॥ लोमश उवाच
एतच्छ्रुत्वाब्रवीद् रामः प्रदीप्त इव मन्युना ।
श्रूयते क्षम्यते चैव दर्पपूर्णोऽसि भार्गव ॥ ५४ ॥
लोमशजी कहते हैं - राजन्! इतना सुनते ही श्रीरामचन्द्रजी मानो क्रोधसे प्रज्वलित हो उठे और बोले— ' भृगुनन्दन! तुम बड़े घमण्डी हो । मैं तुम्हारी कठोर बातें सुनता हूँ फिर क्षमा कर लेता हूँ ॥ ५४ ॥
त्वया ह्यधिगतं तेजः क्षत्रियेभ्यो विशेषतः ।
पितामहप्रसादेन तेन मां क्षिपसि ध्रुवम् ॥ ५५ ॥
' तुमने अपने पितामह ऋचीकके प्रभावसे क्षत्रियोंको जीतकर विशेष तेज प्राप्त किया है, निश्चय ही, इसीलिये मुझपर आक्षेप करते हो ॥ ५५ ॥
पश्य मां स्वेन रूपेण चक्षुस्ते वितराम्यहम् ।
ततो रामशरीरे वै रामः पश्यति भार्गवः ॥ ५६ ॥
आदित्यान् सवसून् रुद्रान् साध्यांश्च समरुद्गणान् ।
पितरो हुताशनश्चैव नक्षत्राणि ग्रहास्तथा ॥ ५७ ॥
गन्धर्वा राक्षसा यक्षा नद्यस्तीर्थानि यानि च ।
ऋषयो बालखिल्याश्च ब्रह्मभूताः सनातनाः ॥ ५८ ॥
देवर्षयश्च कार्त्स्न्येन समुद्राः पर्वतास्तथा ।
वेदाश्च सोपनिषदो वषट्करैः सहाध्वरैः ॥ ५ ९ ॥
चेतोमन्ति च सामानि धनुर्वेदश्च भारत ।
मेघवृन्दानि वर्षाणि विद्युतश्च युधिष्ठिर ॥ ६० ॥
‘ लो! मैं तुम्हें दिव्यदृष्टि देता हूँ । उसके द्वारा मेरे यथार्थ स्वरूपका दर्शन करो । ' तब भृगुवंशी परशुरामजीने श्रीरामचन्द्रजीके शरीरमें बारह आदित्य, आठ वसु, ग्यारह रुद्र, साध्य देवता, उनचास मरुद्गण, पितृगण, अग्निदेव, नक्षत्र, ग्रह, गन्धर्व, राक्षस, यक्ष, नदियाँ, तीर्थ, सनातन ब्रह्मभूत बालखिल्य ऋषि, देवर्षि, सम्पूर्ण समुद्र, पर्वत, उपनिषदोंसहित वेद, वषट्कार, यज्ञ, साम और धनुर्वेद, इन सभीको चेतनरूप धारण किये हुए प्रत्यक्ष देखा । भरतनन्दन युधिष्ठिर! मेघोंके समूह, वर्षा और विद्युत्का भी उनके भीतर दर्शन हो रहा था ॥ ५६–६० ॥
ततः स भगवान् विष्णुस्तं वै बाणं मुमोच ह ।
शुष्काशनिसमाकीर्णं महोल्काभिश्च भारत ॥ ६१ ॥
पांसुवर्षेण महता मेघवर्षैश्च भूतलम् ।
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भूमिकम्पैश्च निर्घातैर्नादैश्च विपुलैरपि ॥ ६२ ॥
तदनन्तर भगवान् विष्णुरूप श्रीरामचन्द्रजीने उस बाणको छोड़ा । भारत! उस समय सारी पृथ्वी बिना बादलकी बिजली और बड़ी- बड़ी उल्काओंसे व्याप्त- सी हो उठी । बड़े जोरकी आँधी उठी और सब ओर धूलकी वर्षा होने लगी । फिर मेघोंकी घटा घिर आयी और भूतलपर मूसलाधार वर्षा होने लगी । बार-बार भूकम्प होने लगा । मेघगर्जन तथा अन्य भयानक उत्पातसूचक शब्द गूँजने लगे ॥ ६१-६२ ॥
स रामं विह्वलं कृत्वा तेजश्चाक्षिप्य केवलम् ।
आगच्छज्ज्वलितो बाणो रामबाहुप्रचोदितः ॥ ६३ ॥
श्रीरामचन्द्रजीकी भुजाओंसे प्रेरित हुआ वह प्रज्वलित बाण परशुरामजीको व्याकुल करके केवल उनके तेजको छीनकर पुनः लौट आया ॥ ६३ ॥
स तु विह्वलतां गत्वा प्रतिलभ्य च चेतनाम् ।
रामः प्रत्यागतप्राणः प्राणमद् विष्णुतेजसम् ॥ ६४ ॥
विष्णुना सोऽभ्यनुज्ञातो महेन्द्रमगमत् पुनः ।
भीतस्तु तत्र न्यवसद् व्रीडितस्तु महातपाः ॥ ६५ ॥
परशुरामजी एक बार मूर्च्छित होकर जब पुनः होशमें आये तब मरकर जी उठे हुए मनुष्यकी भाँति उन्होंने विष्णुतेज धारण करनेवाले भगवान् श्रीरामको नमस्कार किया । तत्पश्चात् भगवान् विष्णु श्रीरामकी आज्ञा लेकर वे पुनः महेन्द्रपर्वतपर चले गये । वहाँ भयभीत और लज्जित हो महान् तपस्यामें संलग्न होकर रहने लगे ॥ ६४-६५ ॥
ततः संवत्सरेऽतीते हृतौजसमवस्थितम् ।
निर्मदं दुःखितं दृष्ट्वा पितरो राममब्रुवन् ॥ ६६ ॥
तदनन्तर एक वर्ष व्यतीत होनेपर तेजोहीन और अभिमानशून्य होकर रहनेवाले परशुरामको दुःखी देखकर उनके पितरोंने कहा ॥ ६६ ॥
पितर ऊचुः
न वै सम्यगिदं पुत्र विष्णुमासाद्य वै कृतम् ।
स हि पूज्यश्च मान्यश्च त्रिषु लोकेषु सर्वदा ॥ ६७ ॥
पितर बोले — तुमने भगवान् विष्णुके पास जाकर जो बर्ताव किया है वह ठीक नहीं था । वे तीनों लोकोंमें सर्वदा पूजनीय और माननीय हैं ॥ ६७ ॥
गच्छ पुत्र नदीं पुण्यां वधूसरकृताह्वयाम् ।
तत्रोपस्पृश्य तीर्थेषु पुनर्वपुरवाप्स्यसि ॥ ६८ ॥
बेटा! अब तुम वधूसर नामक पुण्यमयी नदीके तटपर जाओ । वहाँ तीर्थोंमें स्नान करके पूर्ववत् अपना तेजोमय शरीर पुनः प्राप्त कर लोगे ॥ ६८ ॥
दीप्तोदं नाम तत् तीर्थं यत्र ते प्रपितामहः ।
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भृगुर्देवयुगे राम तप्तवानुत्तमं तपः ॥ ६ ९ ॥ राम! वह दीप्तोदक नामक तीर्थ है, जहाँ देवयुगमें तुम्हारे प्रपितामह भृगुने उत्तम तपस्या की थी ॥ ६९ ॥
तत् तथा कृतवान् रामः कौन्तेय वचनात् पितुः ।
प्राप्तवांश्च पुनस्तेजस्तीर्थेऽस्मिन् पाण्डुनन्दन ॥ ७० ॥
कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर! पितरोंके कहने से परशुरामजीने वैसा ही किया । पाण्डुनन्दन! इस तीर्थमें नहाकर पुनः उन्होंने अपना तेज प्राप्त कर लिया ॥ ७० ॥
एतदीदृशकं तात रामेणाक्लिष्टकर्मणा ।
प्राप्तमासीन्महाराज विष्णुमासाद्य वै पुरा ॥ ७१ ॥
तात महाराज युधिष्ठिर! इस प्रकार पूर्वकालमें अनायास ही महान् कर्म करनेवाले परशुराम विष्णुस्वरूप श्रीरामचन्द्रजीसे भिड़कर इस दशाको प्राप्त हुए थे ॥ ७१ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां जामदग्न्यतेजोहानिकथने एकोनशततमोऽध्यायः ॥ ९९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें परशुरामके तेजकीहानिविषयक निन्यानबेवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ९९ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ श्लोक मिलाकर कुल ७४ श्लोक हैं )
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शततमोऽध्यायः वृत्रासुरसे त्रस्त देवताओंको महर्षि दधीचका अस्थिदान एवं वज्रका निर्माण युधिष्ठिरउवाच
भूय एवाहमिच्छामि महर्षेस्तस्य धीमतः ।
कर्मणां विस्तरं श्रोतुमगस्त्यस्य द्विजोत्तम ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा— द्विजश्रेष्ठ! मैं पुनः बुद्धिमान् महर्षि अगस्त्यजीके चरित्रका विस्तारपूर्वक वर्णन सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥
लोमशउवाच
शृणु राजन् कथां दिव्यामद्भूतामतिमानुषीम् ।
अगस्त्यस्य महाराज प्रभावममितौजसः ॥ २ ॥
लोमशजीने कहा – महाराज! अमिततेजस्वी महर्षि अगस्त्यकी कथा दिव्य, अद्भुत
और अलौकिक है । उनका प्रभाव महान् है । मैं उसका वर्णन करता हूँ, सुनो ॥ २ ॥
आसन् कृतयुगे घोरा दानवा युद्धदुर्मदाः ।
कालकेया इति ख्याता गणाः परमदारुणाः ॥ ३ ॥
सत्ययुगकी बात है, दैत्योंके बहुत- से भयंकर दल थे जो कालकेय नामसे विख्यात थे ।
उनका स्वभाव अत्यन्त निर्दय था । वे युद्धमें उन्मत्त होकर लड़ते थे ॥ ३ ॥
ते तु वृत्रं समाश्रित्य नानाप्रहरणोद्यताः ।
समन्तात् पर्यधावन्त महेन्द्रप्रमुखान् सुरान् ॥ ४ ॥
उन सबने एक दिन वृत्रासुरकी शरण ले उसकी अध्यक्षतामें नाना प्रकारके आयुधोंसे सुसज्जित हो महेन्द्र आदि देवताओंपर चारों ओरसे आक्रमण किया ॥ ४ ॥
ततो वृत्रवधे यत्नमकुर्वंस्त्रिदशाः पुरा ।
पुरंदरं पुरस्कृत्य ब्रह्माणमुपतस्थिरे ॥ ५ ॥
तब समस्त देवता वृत्रासुरके वधके प्रयत्नमें लग गये । वे देवराज इन्द्रको आगे करके ब्रह्माजीके पास गये ॥ ५ ॥
कृताञ्जलींस्तु तान् सर्वान् परमेष्ठीत्युवाच ह ।
विदितं मे सुराः सर्वं यद् वः कार्यं चिकीर्षितम् ॥ ६ ॥
वहाँ पहुँचकर सब देवता हाथ जोड़कर खड़े हो गये । तब ब्रह्माजीने उनसे कहा —‘देवताओ! तुम जो कार्य सिद्ध करना चाहते हो वह सब मुझे मालूम है ॥ ६ ॥
तमुपायं प्रवक्ष्यामि यथा वृत्रं वधिष्यथ ।
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दधीच इति विख्यातो महानृषिरुदारधीः ॥ ७ ॥
तं गत्वा सहिताः सर्वे वरं वै सम्प्रयाचत ।
स वो दास्यति धर्मात्मा सुप्रीतेनान्तरात्मना ॥ ८ ॥
‘ मैं तुम्हें एक उपाय बता रहा हूँ, जिससे तुम वृत्रासुरका वध कर सकोगे । दधीच नामसे विख्यात जो उदारचेता महर्षि हैं, उनके पास जाकर तुम सब लोग एक साथ एक ही वर माँगो । वे बड़े धर्मात्मा हैं । अत्यन्त प्रसन्नमनसे तुम्हें मुँहमाँगी वस्तु देंगे ॥ ७-८ ॥
स वाच्यः सहितैः सर्वैर्भवद्भिर्जयकाङ्क्षिभिः ।
स्वान्यस्थीनि प्रयच्छेति त्रैलोक्यस्य हिताय वै ॥ ९ ॥
‘ जब वे वर देना स्वीकार कर लें तब विजयकी अभिलाषा रखनेवाले तुम सब लोग उनसे एक साथ यों कहना- ' महात्मन्! आप तीनों लोकोंके हितके लिये अपने शरीरकी हड्डियाँ प्रदान करें ' ॥ ९ ॥
स शरीरं समुत्सृज्य स्वान्यस्थीनि प्रदास्यति ।
तस्यास्थिभिर्महाघोरं वज्रं संस्क्रियतां दृढम् ॥ १० ॥
'तुम्हारे माँगनेपर वे शरीर त्यागकर अपनी हड्डियाँ दे देंगे । उनकी उन हड्डियोंद्वारा तुमलोग सुदृढ़ एवं अत्यन्त भयंकर वज्रका निर्माण करो ॥ १० ॥
महच्छत्रुहणं घोरं षडश्रं भीमनिःस्वनम् ।
तेन वज्रेण वै वृत्रं वधिष्यति शतक्रतुः ॥ ११ ॥
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देवताओंद्वारा वृत्रासुरके वधके लिये दधीचिसे उनकी अस्थियोंकी याचना देवराज इन्द्रका वज्रके प्रहारसे वृत्रासुरका वध करना
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‘ उसकी आकृति षट्कोणके समान होगी । वह महान् एवं घोर शत्रुनाशक अस्त्र भयंकर गड़गड़ाहट पैदा करनेवाला होगा । उस वज्रके द्वारा इन्द्र निश्चय ही वृत्रासुरका वध कर डालेंगे ॥ ११ ॥
एतद् वः सर्वमाख्यातं तस्माच्छीघ्रं विधीयताम् ।
एवमुक्तास्ततो देवा अनुज्ञाप्य पितामहम् ॥ १२ ॥
नारायणं पुरस्कृत्य दधीचस्वाश्रमं ययुः ।
सरस्वत्याः परे पारे नानाद्रुमलतावृतम् ॥ १३ ॥
' ये सब बातें मैंने तुम्हें बता दी हैं । अतः अब शीघ्रता करो । ' ब्रह्माजीके ऐसा करनेपर सब देवता उनकी आज्ञा ले भगवान् नारायणको आगे करके दधीचके आश्रमपर गये । वह आश्रम सरस्वती नदीके उस पार था । अनेक प्रकारके वृक्ष और लताएँ उसे घेरे हुए थीं ॥ १२-१३ ॥
षट्पदोद्गीतनिनदैर्विघुष्टं सामगैरिव ।
पुंस्कोकिलरवोन्मिश्रं जीवं जीवकनादितम् ॥ १४ ॥
भ्रमरोंके गीतोंकी ध्वनिसे वह स्थान इस प्रकार गूँज रहा था, मानो सामगान करनेवाले ब्राह्मणोंद्वारा सामवेदका पाठ हो रहा हो । कोकिलके कलरवोंसे कूजित और दूसरे जन्तुओं ( पशु - पक्षियों) के शब्दोंसे कोलाहलपूर्ण बना हुआ वह आश्रम सजीव- सा जान पड़ता था ॥ १४ ॥
महिषैश्च वराहैश्च सृमरैश्चमरैरपि ।
तत्र तत्रानुचरितं शार्दूलभयवर्जितैः ॥ १५ ॥
भैंसे, सूअर, बालमृग और चवँरी गायें बाघ - सिंहोंके भयसे रहित हो उस आश्रमके आस - पास विचर रही थीं ॥ १५ ॥
करेणुभिर्वारणैश्च प्रभिन्नकरटामुखैः ।
सरोऽवगाढैः क्रीडद्भिः समन्तादनुनादितम् ॥ १६ ॥
अपने कपोलोंसे मदकी धारा बहानेवाले हाथी और हथिनियाँ वहाँ सरोवरके जलमें गोते लगाकर क्रीड़ाएँ कर रहे थे, जिससे आश्रमके चारों ओर कोलाहल-सा हो रहा था ॥ १६ ॥
सिंहव्याघ्रैर्महानादान्नदद्भिरनुनादितम् ।
अपरैश्चापि संलीनैर्गुहाकन्दरशायिभिः ॥ १७ ॥
पर्वतोंकी गुफाओं तथा कन्दराओंमें लेटे, झाड़ियोंमें छिपे और वनमें विचरते हुए जोर-जोरसे दहाड़नेवाले सिंहों और व्याघ्रोंकी गर्जनासे वह स्थान गूँज रहा था ॥
तेषु तेष्ववकाशेषु शोभितं सुमनोरमम् ।
त्रिविष्टपसमप्रख्यं दधीचाश्रममागमन् ॥ १८ ॥