श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 731–740
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 731–740
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‘ सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये अवध्य महादैत्य बलिको भी आपने ही वामनरूप धारण करके त्रिलोकीके राज्यसे वंचित किया ॥ २३ ॥
असुरश्च महेष्वासो जम्भ इत्यभिविश्रुतः ।
यज्ञक्षोभकरः क्रूरस्त्वयैव विनिपातितः ॥ २४ ॥
'यज्ञोंका नाश करनेवाले क्रूरकर्मा महाधनुर्धर जम्भ नामसे विख्यात असुरको भी आपने ही मार गिराया था ॥ २४ ॥
एवमादीनि कर्माणि येषां संख्या न विद्यते ।
अस्माकं भयभीतानां त्वं गतिर्मधुसूदन ॥ २५ ॥
' ऐसे - ऐसे आपके अनेक कर्म हैं, जिनकी कोई संख्या नहीं है । मधुसूदन! हम भयभीत देवताओंके एकमात्र आश्रय आप ही हैं ॥ २५ ॥
तस्मात् त्वां देवदेवेश लोकार्थं ज्ञापयामहे ।
रक्ष लोकांश्च देवांश्च शक्रं च महतो भयात् ॥ २६ ॥
‘ देवदेवेश्वर! इसीलिये लोकहितके उद्देश्यसे हम यह निवेदन कर रहे हैं कि आप सम्पूर्ण जगत्के प्राणियों, देवताओं और इन्द्रकी भी महान् भयसे रक्षा कीजिये ' ॥ २६ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां विष्णुस्तवे द्वयधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें विष्णुस्तुतिविषयक एक सौ दोवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०२ ॥
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त्र्यधिकशततमोऽध्यायः भगवान् विष्णुके आदेशसे देवताओंका महर्षि अगस्त्यके आश्रमपर जाकर उनकी स्तुति करना देवा ऊचुः
तव प्रसादाद् वर्धन्ते प्रजाः सर्वाश्चतुर्विधाः ।
ता भाविता भावयन्ति हव्यकव्यैर्दिवौकसः ॥ १ ॥
देवता कहते हैं – प्रभो! जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज – इन चार भेदोंवाली सम्पूर्ण प्रजा आपकी कृपासे ही वृद्धिको प्राप्त होती है । अभ्युदयशील होनेपर वे ( मानव ) प्रजाएँ ही हव्य और कव्योंद्वारा देवताओंका भरण- पोषण करती हैं ॥ १ ॥
लोका ह्येवं विवर्धन्ते ह्यन्योन्यं समुपाश्रिताः ।
त्वत्प्रसादान्निरुद्विग्नास्त्वयैव परिरक्षिताः ॥ २ ॥
इदं च समनुप्राप्तं लोकानां भयमुत्तमम् ।
न च जानीम केनेमे रात्रौ वध्यन्ति ब्राह्मणाः ॥ ३ ॥
इसी प्रकार सब लोग एक - दूसरेके सहारे उन्नति करते हैं । आपकी ही कृपासे सब प्राणी उद्वेगरहित जीवन बिताते और आपके द्वारा ही सर्वथा सुरक्षित रहते हैं । भगवन्! मनुष्योंके समक्ष यह बड़ा भारी भय उपस्थित हुआ है । न जाने कौन रातमें आकर इन ब्राह्मणोंका वध कर रहा है ॥ २-३ ॥
क्षीणेषु च ब्राह्मणेषु पृथिवी क्षयमेष्यति ।
ततः पृथिव्यां क्षीणायां त्रिदिवं क्षयमेष्यति ॥ ४ ॥
ब्राह्मणोंके नष्ट होनेपर सारी पृथ्वी नष्ट हो जायगी और पृथ्वीका नाश होनेपर स्वर्ग भी नष्ट हो जायगा ॥ ४ ॥
त्वत्प्रसादान्महाबाहो लोकाः सर्वे जगत्पते ।
विनाशं नाधिगच्छेयुस्त्वया वै परिरक्षिताः ॥ ५ ॥
महाबाहो! जगत्पते! आप ऐसी कृपा करें, जिससे आपके द्वारा सुरक्षित होकर सब लोग विनाशको न प्राप्त हों ॥ ५ ॥
विष्णुरुवाच
विदितं मे सुराः सर्वं प्रजानां क्षयकारणम् ।
भवतां चापि वक्ष्यामि शृणुध्वं विगतज्वराः ॥ ६ ॥
भगवान् विष्णु बोले- देवताओ! प्रजाके विनाशका जो कारण उपस्थित हुआ है वह सब मुझे ज्ञात है । मैं तुमलोगों को भी बता रहा हूँ; निश्चिन्त होकर सुनो ॥ ६ ॥
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कालेय इति विख्यातो गणः परमदारुणः ।
तैश्च वृत्रं समाश्रित्य जगत् सर्वं प्रमाथितम् ॥ ७ ॥
दैत्योंका एक अत्यन्त भयंकर दल है जो कालेय नामसे विख्यात है । उन दैत्योंने वृत्रासुरका सहारा लेकर सारे संसारमें तहलका मचा दिया था ॥ ७ ॥
ते वृत्रं निहतं दृष्ट्वा सहस्राक्षेण धीमता ।
जीवितं परिरक्षन्तः प्रविष्टा वरुणालयम् ॥ ८ ॥
परम बुद्धिमान् इन्द्रके द्वारा वृत्रासुरको मारा गया देख वे अपने प्राण बचानेके लिये समुद्रमें जाकर छिप गये हैं ॥ ८ ॥
ते प्रविश्योदधिं घोरं नक्रग्राहसमाकुलम् ।
उत्सादनार्थं लोकानां रात्रौ घ्नन्ति ऋषीनिह ॥ ९ ॥
नाक और ग्राहोंसे भरे हुए भयंकर समुद्रमें घुसकर वे सम्पूर्ण जगत्का संहार करनेके लिये रातमें निकलते तथा यहाँ ऋषियोंकी हत्या करते हैं ॥ ९ ॥
न तु शक्याः क्षयं नेतुं समुद्राश्रयगा हि ते ।
समुद्रस्य क्षये बुद्धिर्भवद्भिः सम्प्रधार्यताम् ॥ १० ॥
उन दानवोंका संहार नहीं किया जा सकता; क्योंकि वे दुर्गम समुद्रके आश्रयमें रहते हैं । अतः तुम- लोगोंको समुद्रको सुखानेका विचार करना चाहिये ॥ १० ॥
अगस्त्येन विना को हि शक्तोऽन्योऽर्णवशोषणे ।
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अन्यथा हि न शक्यास्ते विना सागरशोषणम् ॥ ११ ॥
महर्षि अगस्त्यके सिवा दूसरा कौन है जो समुद्रका शोषण करनेमें समर्थ हो । समुद्रको सुखाये बिना वे दानव काबूमें नहीं आ सकते ॥ ११ ॥
एतच्छ्रुत्वा तदा देवा विष्णुना समुदाहृतम् ।
परमेष्ठिनमाज्ञाप्य अगस्त्यस्याश्रमं ययुः ॥ १२ ॥
भगवान् विष्णुकी कही हुई यह बात सुनकर देवता ब्रह्माजीकी आज्ञा ले अगस्त्यके आश्रमपर गये ॥
तत्रापश्यन् महात्मानं वारुणिं दीप्ततेजसम् ।
उपास्यमानमृषिभिर्देवैरिव पितामहम् ॥ १३ ॥
वहाँ उन्होंने मित्रावरुणके पुत्र महात्मा अगस्त्यजीको देखा । उनका तेज उद्भासित हो रहा था । जैसे देवतालोग ब्रह्माजीके पास बैठते हैं, उसी प्रकार बहुत - से ऋषि -मुनि उनके निकट बैठे थे ॥ १३ ॥
तेऽभिगम्य महात्मानं मैत्रावरुणिमच्युतम् ।
आश्रमस्थं तपोराशिं कर्मभिः स्वैरभिष्टुवन् ॥ १४ ॥
अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले मित्रावरुण नन्दन तपोराशि महात्मा अगस्त्य आश्रममें ही विराजमान थे । देवताओंने समीप जाकर उनके अद्भुत कर्मोंका वर्णन करते हु स्तुति प्रारम्भ की ॥ १४ ॥
देवा ऊचुः
नहुषेणाभितप्तानां त्वं लोकानां गतिः पुरा ।
भ्रंशितश्च सुरैश्वर्यात् स्वर्लोकाल्लोककण्टकः ॥ १५ ॥
देवता बोले — भगवन्! पूर्वकालमें राजा नहुषके अन्यायसे संतप्त हुए लोकोंकी आपने ही रक्षा की थी । आपने ही उस लोककण्टक नरेशको देवेन्द्रपद तथा स्वर्गसे नीचे गिरा दिया था ॥ १५ ॥
क्रोधात् प्रवृद्धः सहसा भास्करस्य नगोत्तमः ।
वचस्तवानतिक्रामन् विन्ध्यः शैलो न वर्धते ॥ १६ ॥
पर्वतोंमें श्रेष्ठ विन्ध्य सूर्यदेवपर क्रोध करके जब सहसा बढ़ने लगा तब आपने ही उसे रोका था । आपकी आज्ञाका उल्लंघन न करते हुए विन्ध्यगिरि आज भी बढ़ नहीं रहा है ॥ १६ ॥
तमसा चावृते लोके मृत्युनाभ्यर्दिताः प्रजाः ।
त्वामेव नाथमासाद्य निर्वृतिं परमां गताः ॥ १७ ॥
विन्ध्यगिरिके बढ़नेसे जब सारे जगत्में अन्धकार छा गया और सारी प्रजा मृत्युसे पीड़ित होने लगी । उस समय आपको ही अपना रक्षक पाकर सबने अत्यन्त हर्षका अनुभव
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किया था ॥ १७ ॥
अस्माकं भयभीतानां नित्यशो भगवान् गतिः ।
ततस्त्वार्ताः प्रयाचामो वरं त्वां वरदो ह्यसि ॥ १८ ॥
सदा आप ही हम भयभीत देवताओंके लिये आश्रय होते आये हैं । अतः इस समय भी संकटमें पड़कर हम आपसे वर माँग रहे हैं; क्योंकि आप ही वर देनेके योग्य हैं ॥ १८ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायामगस्त्यमाहात्म्यकथने त्र्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें अगस्त्यमाहात्म्य-वर्णनविषयक एक सौ तीनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०३ ॥
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चतुरधिकशततमोऽध्यायः अगस्त्यजीका विन्ध्यपर्वतको बढ़ने से रोकना और देवताओंके साथ सागर - तटपर जाना युधिष्ठिर उवाच
किमर्थं सहसा विन्ध्यः प्रवृद्धः क्रोधमूर्च्छितः ।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण महामुने ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा- महामुने! विन्ध्यपर्वत किसलिये क्रोधसे मूर्छति हो सहसा बढ़ने लगा था? मैं इस प्रसंगको विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥
लोमशउवाच
अद्रिराजं महाशैलं मेरुं कनकपर्वतम् ।
उदयास्तमने भानुः प्रदक्षिणमवर्तत ॥ २ ॥
लोमशजीने कहा- राजन्! सूर्यदेव सुवर्णमय महान् पर्वत गिरिराज मेरुकी उदय और अस्तके समय परिक्रमा किया करते हैं ॥ २ ॥
तं तु दृष्ट्वा तथा विन्ध्यः शैलः सूर्यमथाब्रवीत् ।
यथा हि मेरुर्भवता नित्यशः परिगम्यते ॥ ३ ॥
प्रदक्षिणश्च क्रियते मामेवं कुरु भास्कर ।
एवमुक्तस्ततः सूर्यः शैलेन्द्रं प्रत्यभाषत ॥ ४ ॥
नाहमात्मेच्छया शैलं करोम्येनं प्रदक्षिणम् ।
एष मार्गः प्रदिष्टो मे यैरिदं निर्मितं जगत् ॥ ५ ॥
उन्हें ऐसा करते देख विन्ध्यगिरिने उनसे कहा-' भास्कर! जैसे आप मेरुकी प्रतिदिन परिक्रमा करते हैं, उसी तरह मेरी भी कीजिये । ' यह सुनकर भगवान् सूर्यने गिरिराज विन्ध्यसे कहा— ‘ गिरिश्रेष्ठ! मैं अपनी इच्छासे मेरुगिरिकी परिक्रमा नहीं करता हूँ । जिन्होंने इस संसारकी सृष्टि की है, उन विधाताने मेरे लिये यही मार्ग निश्चित किया है' ॥ ३–५ ॥
एवमुक्तस्ततः क्रोधात् प्रवृद्धः सहसाचलः ।
सूर्याचन्द्रमसोर्मार्गं रोद्धुमिच्छन् परंतप ॥ ६ ॥
परंतप युधिष्ठिर! सूर्यदेवके ऐसा कहनेपर विन्ध्य पर्वत सहसा कुपित हो सूर्य और चन्द्रमाका मार्ग रोक लेनेकी इच्छासे बढ़ने लगा ॥ ६ ॥
ततो देवाः सहिताः सर्व एव विन्ध्यं समागम्य महाद्रिराजम् । निवारयामासुरुपायतस्तं
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न च स्म तेषां वचनं चकार ॥ ७ ॥
यह देख सब देवता एक साथ मिलकर महान् पर्वतराज विन्ध्यके पास गये और अनेक उपायोंद्वारा उसके क्रोधका निवारण करने लगे; परंतु उसने उनकी बात नहीं मानी ॥ ७ ॥
अथाभिजग्मुर्मुनिमाश्रमस्थं तपस्विनं धर्मभृतां वरिष्ठम् । अगस्त्यमत्यद्भुतवीर्यवन्तं तं चार्थमूचुः सहिताः सुरास्ते ॥ ८ ॥
तब वे सब देवता मिलकर अपने आश्रमपर विराजमान धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ तपस्वी अगस्त्य मुनिके पास गये, जो अद्भुत प्रभावशाली थे । वहाँ जाकर उन्होंने अपना प्रयोजन कह सुनाया ॥ ८ ॥
देवा ऊचुः
सूर्याचन्द्रमसोर्मार्गं नक्षत्राणां गतिं तथा ।
शैलराजो वृणोत्येष विन्ध्यः क्रोधवशानुगः ॥ ९ ॥
तं निवारयितुं शक्तो नान्यः कश्चिद् द्विजोत्तम ।
ऋते त्वां हि महाभाग तस्मादेनं निवारय ॥ १० ॥
देवता बोले — द्विजश्रेष्ठ! यह पर्वतराज विन्ध्य क्रोधके वशीभूत होकर सूर्य और चन्द्रमाके मार्ग तथा नक्षत्रोंकी गतिको रोक रहा है । महाभाग! आपके सिवा दूसरा कोई
इसका निवारण नहीं कर सकता । अतः आप चलकर इसे रोकिये ॥ ९ -१० ॥
तच्छ्रुत्वा वचनं विप्रः सुराणां शैलमभ्यगात् ।
सोऽभिगम्याब्रवीद् विन्ध्यं सदारः समुपस्थितः ॥ ११ ॥
देवताओंकी यह बात सुनकर विप्रवर अगस्त्य अपनी पत्नी लोपामुद्राके साथ विन्ध्यपर्वतके समीप गये और वहाँ उपस्थित हो उससे इस प्रकार बोले- ॥ ११ ॥
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मार्गमिच्छाम्यहं दत्तं भवता पर्वतोत्तम ।
दक्षिणामभिगन्तास्मि दिशं कार्येण केनचित् ॥ १२ ॥
‘ पर्वतश्रेष्ठ! मैं किसी कार्यसे दक्षिण दिशाको जा रहा हूँ, मेरी इच्छा है, तुम मुझे मार्ग प्रदान करो ॥ १२ ॥
यावदागमनं मह्यं तावत् त्वं प्रतिपालय ।
निवृत्ते मयि शैलेन्द्र ततो वर्धस्व कामतः ॥ १३ ॥
'जबतक मैं पुनः लौटकर न आऊँ तबतक मेरी प्रतीक्षा करते रहो । शैलराज! मेरे लौट आनेपर तुम पुनः इच्छानुसार बढ़ते रहना' ॥ १३ ॥
एवं स समयं कृत्वा विन्ध्येनामित्रकर्शन ।
अद्यापि दक्षिणाद्देशाद् वारुणिर्न निवर्तते ॥ १४ ॥
शत्रुसूदन! विन्ध्यके साथ ऐसा नियम करके मित्रावरुणनन्दन अगस्त्यजी चले गये और आजतक दक्षिण प्रदेशसे नहीं लौटे ॥ १४ ॥
एतत् ते सर्वमाख्यातं यथा विन्ध्यो न वर्धते ।
अगस्त्यस्य प्रभावेण यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ १५ ॥
राजन्! तुम मुझसे जो बात पूछ रहे थे, वह सब प्रसंग मैंने कह दिया । महर्षि अगस्त्यके ही प्रभावसे विन्ध्यपर्वत बढ़ नहीं रहा है ॥ १५ ॥
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कालेयास्तु यथा राजन् सुरैः सर्वैर्निषूदिताः ।
अगस्त्याद् वरमासाद्य तन्मे निगदतः शृणु ॥ १६ ॥
राजन्! सब देवताओंने अगस्त्यसे वर पाकर जिस प्रकार कालेय नामक दैत्योंका संहार किया, वह बता रहा हूँ, सुनो - ॥ १६ ॥
त्रिदशानां वचः श्रुत्वा मैत्रावरुणिरब्रवीत् ।
किमर्थमभियाताः स्थ वरं मत्तः कमिच्छथ ।
एवमुक्तास्ततस्तेन देवता मुनिमब्रुवन् ॥ १७ ॥
( सर्वे प्राञ्जलयो भूत्वा पुरन्दरपुरोगमाः । ) देवताओंकी बात सुनकर मित्रावरुणनन्दन अगस्त्यने पूछा — ' देवताओ! आपलोग किसलिये यहाँ पधारे हैं और मुझसे कौन- सा वर चाहते हैं? ' उनके इस प्रकार पूछनेपर इन्द्रको आगे करके सब देवताओंने हाथ जोड़कर मुनिसे कहा- ॥ १७ ॥
एवं त्वयेच्छाम कृतं हि कार्यं महार्णवं पीयमानं महात्मन् । ततो वधिष्याम सहानुबन्धान् कालेयसंज्ञान् सुरविद्विषस्तान् ॥ १८ ॥
'महात्मन्! हम आपके द्वारा यह कार्य सम्पन्न कराना चाहते हैं कि आप सारे महासागरके जलको पी जायँ । तदनन्तर हमलोग देवद्रोही कालेय नामक दानवोंका उनके बन्धु - बान्धवोंसहित वध कर डालेंगे ' ॥ १८ ॥
त्रिदशानां वचः श्रुत्वा तथेति मुनिरब्रवीत् ।
करिष्ये भवतां कामं लोकानां च महत् सुखम् ॥ १ ९ ॥
देवताओंका यह कथन सुनकर महर्षि अगस्त्यने कहा- ' बहुत अच्छा ' मैं आपलोगोंका मनोरथ पूर्ण करूँगा । इससे सम्पूर्ण लोकोंको महान् सुख प्राप्त होगा ॥ १ ९ ॥
एवमुक्त्वा ततोऽगच्छत् समुद्रं सरितां पतिम् ।
ऋषिभिश्च तपःसिद्धैः सार्धं देवैश्च सुव्रत ॥ २० ॥
सुव्रत! ऐसा कहकर अगस्त्यजी देवताओं तथा तपःसिद्ध ऋषियोंके साथ नदीपति समुद्रके तटपर गये ॥
मनुष्योरगगन्धर्वयक्षकिंपुरुषास्तथा ।
अनुजग्मुर्महात्मानं द्रष्टुकामास्तदद्भुतम् ॥ २१ ॥
उस समय मनुष्य, नाग, गन्धर्व, यक्ष और किन्नर सभी उस अद्भुत दृश्यको देखनेके लिये उन महात्माके पीछे चल दिये ॥ २१ ॥
ततोऽभ्यगच्छन् सहिताः समुद्रं भीमनिःस्वनम् ।
नृत्यन्तमिव चोर्मीभिर्वल्गन्तमिव वायुना ॥ २२ ॥
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फिर वे सब लोग एक साथ भयंकर गर्जना करनेवाले समुद्रके समीप गये, जो अपने उत्ताल तरंगोंद्वारा मानो नृत्य कर रहा था; और वायुके द्वारा उछलता--कूदता- सा जान पड़ता था ॥ २२ ॥
हसन्तमिव फेनौघैः स्खलन्तं कन्दरेषु च ।
नानाग्राहसमाकीर्णं नानाद्विजगणान्वितम् ॥ २३ ॥
वह फेनोंके समुदायद्वारा मानो अपनी हास्यछटा बिखेर रहा था; और कन्दराओंसे टकराता- सा जान पड़ता था । उसमें नाना प्रकारके ग्राह आदि जलजन्तु भरे हुए थे, तथा बहुत - से पक्षी निवास करते थे ॥ २३ ॥
अगस्त्यसहिता देवाः सगन्धर्वमहोरगाः ।
ऋषयश्च महाभागाः समासेदुर्महोदधिम् ॥ २४ ॥
अगस्त्यजीके साथ देवता, गन्धर्व, बड़े -बड़े नाग और महाभाग ऋषिगण सभी महासागरके तटपर जा पहुँचे ॥ २४ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायामगस्त्योदधिगमने चतुरधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें अगस्त्यका समुद्रतटपर गमनविषयक एक सौचारवाँअध्याय पूराहुआ ॥ १०४ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठका श्लोक मिलाकर कुल २४३ श्लोक हैं )