श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 901–910

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 901–910

पृष्ठ 901

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ततो वर्षे द्वादशे श्वेतकेतु- रष्टावक्रं पितुरङ्के निषण्णम् । अपाकर्षद् गृह्य पाणौ रुदन्तं नायं तवाङ्कः पितुरित्युक्तवांश्च ॥ १८ ॥

तदनन्तर एक दिन, जब अष्टावक्रकी आयु बारह वर्षकी थी और वे पितृतुल्य उद्दालक मुनिकी गोदमें बैठे हुए थे, उसी समय श्वेतकेतु वहाँ आये और रोते हुए अष्टावक्रका हाथ पकड़कर उन्हें दूर खींच ले गये । इस प्रकार अष्टावक्रको दूर हटाकर श्वेतकेतुने कहा - ' यह तेरे बापकी गोदी नहीं है' ॥ १८ ॥

यत् तेनोक्तं दुरुक्तं तत् तदानीं हृदि स्थितं तस्य सुदुःखमासीत् । गृहं गत्वा मातरं सोऽभिगम्य पप्रच्छेदं क्व नु तातो ममेति ॥ १ ९ ॥ श्वेतकेतुकी उस कटूक्तिने उस समय अष्टावक्रके हृदयमें गहरी चोट पहुँचायी । इससे उन्हें बड़ा दुःख हुआ । उन्होंने घरमें माताके पास जाकर पूछा —' माँ! मेरे पिताजी कहाँ हैं? ' ॥ १ ९ ॥ ततः सुजाता परमार्तरूपा

शापाद् भीता सर्वमेवाचचक्षे ।

तद्वै तत्त्वं सर्वमाज्ञाय रात्रा- वित्यब्रवीच्छ्वेतकेतुं स विप्रः ॥ २० ॥

गच्छाव यज्ञं जनकस्य राज्ञो

बह्वाश्चर्यः श्रूयते तस्य यज्ञः ।

श्रोष्यावोऽत्र ब्राह्मणानां विवाद- मर्थं चाग्रयं तत्र भोक्ष्यावहे च ॥ २१ ॥

बालकके इस प्रश्नसे सुजाताके मनमें बड़ी व्यथा हुई, उसने शापके भयसे घबराकर सब बात बता दी । यह सब रहस्य जानकर उन्होंने रातमें श्वेतकेतुसे इस प्रकार कहा — ‘ हम दोनों राजा जनकके यज्ञमें चलें । सुना जाता है, उस यज्ञमें बड़े आश्चर्यकी बातें देखनेमें आती हैं । हम दोनों वहाँ विद्वान् ब्राह्मणोंका शास्त्रार्थ सुनेंगे और वहीं उत्तम पदार्थ भोजन करेंगे ॥ २०-२१ ॥ विचक्षणत्वं च भविष्यते नौ शिवश्च सौम्यश्च हि ब्रह्मघोषः ॥ २२ ॥

‘ वहाँ जानेसे हमलोगोंकी प्रवचनशक्ति एवं जानकारी बढ़ेगी और हमें सुमधुर स्वरमें वेद- मन्त्रोंका कल्याणकारी घोष सुननेका अवसर

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मिलेगा ' ॥ २२ ॥

तौ जग्मतुर्मातुलभागिनेयी यज्ञं समृद्धं जनकस्य राज्ञः । अष्टावक्रः पथि राज्ञा समेत्य प्रोत्सार्यमाणो वाक्यमिदं जगाद ॥ २३ ॥

ऐसा निश्चय करके वे दोनों मामा- भानजे राजा जनकके समृद्धिशाली यज्ञमें गये । अष्टावक्रकी यज्ञ मण्डपके मार्गमें ही राजासे भेंट हो गयी । उस समय राजसेवक उन्हें रास्तेसे'दूरदूर' हटाने लगे, तब वे इस प्रकार बोले ॥ २३ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायामष्टावक्रीये द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३२ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें अष्टावक्रीयोपाख्यानविषयक एक सौ बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३२ ॥

किसी - किसी पुस्तकमें यहाँ एक श्लोक अधिक मिलता है, जो इस प्रकार है—

वेदान् साङ्गान् सर्वशास्त्रैरुपेतानधीतवानस्मि तव प्रसादात् ।

इहैव गर्भे तेन पितर्ब्रवीमि नेदं त्वत्तः सम्यगिवोपवर्तते ॥

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त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः अष्टावक्रका द्वारपाल तथा राजा जनकसे वार्तालाप अष्टावक्र उवाच अन्धस्य पन्था बधिरस्य पन्थाः स्त्रियः पन्था भारवाहस्य पन्थाः । राज्ञः पन्था ब्राह्मणेनासमेत्य समेत्य तु ब्राह्मणस्यैव पन्थाः ॥ १ ॥

अष्टावक्र बोले- राजन्! जबतक ब्राह्मणसे सामना न हो तबतक अंधेका मार्ग, बहरेका मार्ग, स्त्रीका मार्ग, बोझ ढोनेवालेका मार्ग तथा राजाका मार्ग उस- उसके जानेके लिये छोड़ देना चाहिये; परंतु यदि ब्राह्मण सामने मिल जाय तो सबसे पहले उसीको मार्ग देना चाहिये ॥ १ ॥

राजोवाच पन्था अयं तेऽद्य मयातिदिष्टो

येनेच्छसि तेन कामं व्रजस्व ।

न पावको विद्यते वै लघीया- निन्द्रोऽपि नित्यं नमते ब्राह्मणानाम् ॥ २ ॥

राजाने कहा — ब्राह्मणकुमार! लो मैंने तुम्हारे लिये आज यह मार्ग दे दिया है। तुम

जिससे जाना चाहो उसी मार्गसे इच्छानुसार चले जाओ । आग कभी छोटी नहीं होती ।

देवराज इन्द्र भी सदा ब्राह्मणोंके आगे मस्तक झुकाते हैं ॥ २ ॥

अष्टावक्र उवाच प्राप्तौ स्व यज्ञं नृप संदिदृक्षू कौतूहलं नौ बलवन्नरेन्द्र । प्राप्ताविहावामतिथी प्रवेशं काङ्क्षावहे द्वारपतेस्तवाज्ञाम् ॥ ३ ॥

अष्टावक्र बोले- राजन्! हम दोनों आपका यज्ञ देखनेके लिये आये हैं । नरेन्द्र! इसके लिये हम दोनोंके हृदयमें प्रबल उत्कण्ठा है । हम दोनों यहाँ अतिथिके रूपमें उपस्थित हैं और इस यज्ञमें प्रवेश करनेके लिये हम तुम्हारे द्वारपालकी आज्ञा चाहते हैं ॥ ३ ॥

ऐन्द्रद्युम्ने यज्ञदृशाविहावां विवक्षू वै जनकेन्द्रं दिदृक्षू । तौ वै क्रोधव्याधिना दह्यमाना-

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वयं च नौ द्वारपालो रुणद्धि ॥ ४ ॥

इन्द्रद्युम्नकुमार जनक! हम दोनों यहाँ यज्ञ देखनेके लिये आये हैं और आप जनकराजसे मिलना तथा बात करना चाहते हैं, परंतु यह द्वारपाल हमें रोकता है; अतः हम क्रोधरूप व्याधिसे दग्ध हो रहे हैं ॥ ४ ॥

द्वारपाल उवाच बन्देः समादेशकरा वयं स्म निबोध वाक्यं च मयेर्यमाणम् । न वै बालाः प्रविशन्त्यत्र विप्रा वृद्धा विदग्धाः प्रविशन्त्यत्र विप्राः ॥ ५ ॥

द्वारपाल बोला- ब्राह्मणकुमार! सुनो, हम बंदीके आज्ञापालक हैं । आप हमारी कही हुई बात सुनिये । इस यज्ञशालामें बालक ब्राह्मण नहीं प्रवेश करने पाते हैं । जो बूढ़े और बुद्धिमान् ब्राह्मण हैं, उन्हींका यहाँ प्रवेश होता है ॥ अष्टावक्र उवाच यद्यत्र वृद्धेषु कृतःप्रवेशो युक्तं प्रवेष्टुं मम द्वारपाल । वयं हि वृद्धाश्चरितव्रताश्च वेदप्रभावेण समन्विताश्च ॥ ६ ॥

अष्टावक्र बोले- द्वारपाल! यदि यहाँ वृद्ध ब्राह्मणोंके लिये प्रवेशका द्वार खुला है, तब तो हमारा प्रवेश होना भी उचित ही है; क्योंकि हमलोग वृद्ध ही हैं, हमने ब्रह्मचर्यव्रतका पालन किया है तथा हम वेदके प्रभावसे भी सम्पन्न हैं ॥ ६ ॥

शुश्रूषवश्चापि जितेन्द्रियाश्च

ज्ञानागमे चापि गताः स्म निष्ठाम् ।

न बाल इत्यवमन्तव्यमाहु- र्बालोऽप्यग्निर्दहति स्पृश्यमानः ॥ ७ ॥

साथ ही, हम गुरुजनोंके सेवक, जितेन्द्रिय तथा ज्ञानशास्त्रमें परिनिष्ठित भी हैं । अवस्थामें बालक होनेके कारण ही किसी ब्राह्मणको अपमानित करना उचित नहीं बताया गया है; क्योंकि आगकी छोटी-सी चिनगारी भी यदि छू जाय तो वह जला डालती है ॥ ७ ॥

द्वारपालउवाच सरस्वतीमीरय वेदजुष्टा- मेकाक्षरां बहुरूपां विराजम् ।

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अङ्गात्मानं समवेक्षस्व बालं किं श्लाघसे दुर्लभो वै मनीषी ॥ ८ ॥

द्वारपालने कहा –ब्राह्मणकुमार! तुम वेद-प्रतिपादित, एकाक्षरब्रह्मका बोध करानेवाली, अनेक रूपवाली, सुन्दर वाणीका उच्चारण करो और अपने - आपको बालक ही समझो, स्वयं ही अपनी प्रशंसा क्यों करते हो? इस जगत्में ज्ञानी दुर्लभ हैं ॥ ८ ॥

अष्टावक्र उवाच न ज्ञायते कायवृद्धया विवृद्धि- र्यथाष्ठीला शाल्मलेः सम्प्रवृद्धा । ह्रस्वोऽल्पकायः फलितो विवृद्धो यश्चाफलस्तस्य न वृद्धभावः ॥ ९ ॥

अष्टावक्र बोले — द्वारपाल! केवल शरीर बढ़ जानेसे किसीकी बढ़ती नहीं समझी जाती है । जैसे सेमलके फलकी गाँठ बढ़नेपर भी सारहीन होनेके कारण वह व्यर्थ ही है । छोटा और दुबला- पतला वृक्ष भी यदि फलोंके भारसे लदा है तो उसे ही वृद्ध ( बड़ा) जानना चाहिये । जिसमें फल नहीं लगते, उस वृक्षका बढ़ना भी नहीं के बराबर है ॥ ९ ॥

द्वारपाल उवाच वृद्धेभ्य एवेह मतिं स्म बाला गृह्णन्ति कालेन भवन्ति वृद्धाः । न हि ज्ञानल्पकालेन शक्यं कस्माद् बालः स्थविर इव प्रभाषसे ॥ १० ॥

द्वारपालने कहा — बालक बड़े - बूढ़ोंसे ही ज्ञान प्राप्त करते हैं और समयानुसार वे भी वृद्ध होते हैं । थोड़े समयमें ज्ञानकी प्राप्ति असम्भव है, अतः तुम बालक होकर भी क्यों वृद्धकी - सी बातें करते हो? ॥ १० ॥

अष्टावक्र उवाच

न तेन स्थविरो भवति येनास्य पलितं शिरः ।

बालोऽपि यः प्रजानाति तं देवाः स्थविरं विदुः ॥ ११ ॥

अष्टावक्र बोले - अमुक व्यक्तिके सिरके बाल पक गये हैं, इतने ही मात्रसे वह बूढ़ा नहीं होता है, अवस्थामें बालक होनेपर भी जो ज्ञानमें बढ़ा- चढ़ा है, उसीको देवगण वृद्ध मानते हैं ॥ ११ ॥

न हायनैर्न पलितैर्न वित्तेन न बन्धुभिः ।

ऋषयश्चक्रिरे धर्मं योऽनूचानः स नो महान् ॥ १२ ॥

पृष्ठ 906

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अधिक वर्षोंकी अवस्था होनेसे, बाल पकनेसे, धन बढ़ जानेसे और अधिक भाई- बन्धु हो जानेसे भी कोई बड़ा हो नहीं सकता; ऋषियोंने ऐसा नियम बनाया है कि हम ब्राह्मणोंमें जो अंगोंसहित सम्पूर्ण वेदोंका स्वाध्याय करनेवाला तथा वक्ता है, वही बड़ा है ॥ १२ ॥

दिदृक्षुरस्मि सम्प्राप्तो बन्दिनं राजसंसदि ।

निवेदयस्व मां द्वाःस्थ राज्ञे पुष्करमालिने ॥ १३ ॥

द्वारपाल! मैं राजसभामें बन्दीसे मिलनेके लिये आया हूँ । तुम कमलपुष्पकी माला धारण किये हुए महाराज जनकको मेरे आगमनकी सूचना दे दो ॥ १३ ॥

द्रष्टास्यद्य वदतोऽस्मान् द्वारपाल मनीषिभिः ।

सह वादे विवृद्धे तु बन्दिनं चापि निर्जितम् ॥ १४ ॥

द्वारपाल! आज तुम हमें विद्वानोंके साथ शास्त्रार्थ करते देखोगे, साथ ही विवाद बढ़ जानेपर बंदीको परास्त हुआ पाओगे ॥ १४ ॥

पश्यन्तु विप्राः परिपूर्णविद्याः सहैव राज्ञा सपुरोधमुख्याः । उताहो वाप्युच्चतां नीचतां वा तूष्णींभूतेष्वेव सर्वेष्वथाद्य ॥ १५ ॥

आज सम्पूर्ण सभासद् चुपचाप बैठे रहें तथा राजा और उनके प्रधान पुरोहितोंके साथ पूर्णतः विद्वान् ब्राह्मण मेरी लघुता अथवा श्रेष्ठताको प्रत्यक्ष देखें ॥ १५ ॥

द्वारपालउवाच कथं यज्ञं दशवर्षो विशेस्त्वं विनीतानां विदुषां सम्प्रवेशम् । उपायतः प्रयतिष्ये तवाहं प्रवेशने कुरु यत्नं यथावत् ॥ १६ ॥

द्वारपालने कहा— जहाँ सुशिक्षित विद्वानोंका प्रवेश होता है; उस यज्ञमण्डपमें तुम-जैसे दस वर्षके बालकका प्रवेश होना कैसे सम्भव है । तथापि मैं किसी उपायसे तुम्हें उसके भीतर प्रवेश करानेका प्रयत्न करूँगा, तुम भी भीतर जानेके लिये यथोचित प्रयत्न करो ॥ १६ ॥

(एष राजा संश्रवणे स्थितस्ते स्तुह्येनं त्वं वचसा संस्कृतेन । स चानुज्ञां दास्यति प्रीतियुक्तः प्रवेशने यच्च किंचित् तवेष्टम् ॥ ) ये नरेश तुम्हारी बात सुन सकें, इतनी ही दूरीपर यज्ञमण्डपमें स्थित हैं, तुम अपने शुद्ध वचनोंद्वारा इनकी स्तुति करो । इससे ये प्रसन्न होकर तुम्हें प्रवेश करनेकी आज्ञा दे देंगे तथा

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तुम्हारी और भी कोई कामना हो तो वे पूरी करेंगे ॥ अष्टावक्र उवाच भो भो राजञ्जनकानां वरिष्ठ त्वं वै सम्राट् त्वयि सर्वं समृद्धम् । त्वं वा कर्ता कर्मणां यज्ञियानां ययातिरेको नृपतिर्वा पुरस्तात् ॥ १७ ॥

अष्टावक्र बोले — राजन्! आप जनकवंशके श्रेष्ठ पुरुष हैं, सम्राट् हैं । आपके यहाँ सभी प्रकारके ऐश्वर्य परिपूर्ण हैं, वर्तमान समयमें केवल आप ही उत्तम यज्ञकर्मोंका अनुष्ठान करनेवाले हैं; अथवा पूर्वकालमें एकमात्र राजा ययाति ऐसे हो चुके हैं ॥ १७ ॥

वृद्धान् बन्दी वादविदो निगृह्य

वादे भग्नानप्रतिशङ्कमानः ।

त्वयाभिसृष्टैः पुरुषैराप्तकृद्भि- र्जले सर्वान् मज्जयतीति नः श्रुतम् ॥ १८ ॥

हमने सुना है कि आपके यहाँ बन्दी नामसे प्रसिद्ध कोई विद्वान् हैं जो वाद -विवादके मर्मको जाननेवाले कितने ही वृद्ध ब्राह्मणोंको शास्त्रार्थमें हराकर वशमें कर लेते हैं और फिर आपके ही दिये हुए विश्वसनीय पुरुषोंद्वारा उन सबको निःशंक होकर पानीमें डुबवा देते हैं ॥ १८ ॥

सोऽहं श्रुत्वा ब्राह्मणानां सकाशाद् ब्रह्माद्वैतं कथयितुमागतोऽस्मि । क्वासौ बन्दी यावदेनं समेत्य नक्षत्राणीव सविता नाशयामि ॥ १ ९ ॥ मैं ब्राह्मणोंके समीप यह समाचार सुनकर अद्वैत ब्रह्मके विषयमें वर्णन करनेके लिये यहाँ आया हूँ । वे बन्दी कहाँ हैं? मैं उनसे मिलकर उनके तेजको उसी प्रकार शान्त कर दूँगा, जैसे सूर्य ताराओंकी ज्योतिको विलुप्त कर देते हैं ॥ १ ९ ॥ राजोवाच आशंससे बन्दिनं वै विजेतु- मविज्ञाय त्वं वाक्यबलं परस्य । विज्ञातवीर्यैः शक्यमेवं प्रवक्तुं दृष्टश्चासौ ब्राह्मणैर्वेदशीलैः ॥ २० ॥

राजा बोले- ब्राह्मणकुमार! तुम अपने विपक्षीकी प्रवचन- शक्तिको जाने बिना ही बन्दीको जीतनेकी इच्छा रखते हो । जो प्रतिवादीके बलको जानते हों वे ही ऐसी बातें कह

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सकते हैं । वेदोंका अनुशीलन करनेवाले बहुत- से ब्राह्मण बन्दीका प्रभाव देख चुके हैं ॥ २० ॥

आशंससे त्वं बन्दिनं वै विजेतु- मविज्ञाय तु बलं बन्दिनोऽस्य । समागता ब्राह्मणास्तेन पूर्वं न शोभन्ते भास्करेणेव ताराः ॥ २१ ॥

तुम्हें इस बन्दीकी शक्तिका कुछ भी ज्ञान नहीं है । इसीलिये उसे जीतनेकी इच्छा कर रहे हो । आजसे पहले कितने ही विद्वान् ब्राह्मण बन्दीसे मिले हैं और जैसे सूर्यके सामने ताराओंका प्रकाश फीका पड़ जाता है उसी प्रकार वे बन्दीके सामने हतप्रभ हो गये हैं ॥ २१ ॥

आशंसन्तो बन्दिनं जेतुकामा- स्तस्यान्तिकं प्राप्य विलुप्तशोभाः । विज्ञानमत्ता निःसृताश्चैव तात कथं सदस्यैर्वचनं विस्तरेयुः ॥ २२ ॥

तात! कितने ही ज्ञानोन्मत्त ब्राह्मण बन्दीको जीतनेकी अभिलाषा रखकर शास्त्रार्थकी घोषणा करते हुए आये हैं; किंतु उनके निकट पहुँचते ही उनका प्रभाव नष्ट हो गया है ।

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इतना ही नहीं, वे पराजित एवं तिरस्कृत हो चुपचाप राजसभासे निकल गये हैं । फिर वे अन्य सदस्योंके साथ वार्तालाप ही कैसे कर सकते हैं ॥ २२ ॥

अष्टावक्र उवाच विवादितोऽसौ न हि मादृशैर्हि सिंहीकृतस्तेन वदत्यभीतः । समेत्य मां निहतः शेष्यतेऽद्य मार्गे भग्नं शकटमिवाचलाक्षम् ॥ २३ ॥

अष्टावक्र बोले- महाराज! अभी बन्दीको हम जैसोंके साथ शास्त्रार्थ करनेका अवसर नहीं मिला है, इसीलिये वह सिंह बना हुआ है और निडर होकर बातें करता है । आज मुझसे जब उसकी भेंट होगी, उस समय वह पराजित होकर मुर्देकी भाँति सो जायगा । ठीक उसी तरह, जैसे रास्तेमें टूटा हुआ छकड़ा जहाँ- का- तहाँ पड़ा रह जाता है— उसका पहिया एक पग भी आगे नहीं बढ़ता ॥ २३ ॥

राजोवाच

त्रिंशकद्वादशांशस्य चतुर्विंशतिपर्वणः ।

यस्त्रिषष्टिशतारस्य वेदार्थं स परः कविः ॥ २४ ॥

तब राजाने परीक्षा लेनेके लिये कहा- जो पुरुष तीस अवयव, बारह अंश, चौबीस पर्व और तीन सौ साठ अरोंवाले पदार्थको जानता है— उसके प्रयोजनको समझता है, वह उच्चकोटिका ज्ञानी है ॥ २४ ॥

अष्टावक्र उवाच

चतुर्विंशतिपर्व त्वां षण्नाभि द्वादशप्रधि ।

तत् त्रिषष्टिशतारं वै चक्रं पातु सदागति ॥ २५ ॥

अष्टावक्र बोले — राजन्! जिसमें बारह अमावास्या और बारह पूर्णिमारूपी चौबीस पर्व, ऋतुरूप छः नाभि, मासरूप बारह अंश और दिनरूप तीन सौ साठ अरे हैं, वह निरन्तर घूमनेवाला संवत्सररूप कालचक्र आपकी रक्षा करे ॥ २५ ॥

राजोवाच

वडवे इव संयुक्ते श्येनपाते दिवौकसाम् ।

कस्तयोर्गर्भमाधत्ते गर्भं सुषुवतुश्च कम् ॥ २६ ॥

राजाने पूछा— जो दो घोड़ियोंकी भाँति संयुक्त रहती हैं; एवं जो बाज पक्षीकी भाँति हठात् गिरनेवाली हैं उन दोनोंके गर्भको देवताओंमेंसे कौन धारण करता है तथा वे दोनों किस गर्भको उत्पन्न करती हैं? ॥ २६ ॥

अष्टावक्र उवाच

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मा स्म ते ते गृहे राजञ्छात्रवाणामपि ध्रुवम् ।

वातसारथिरागन्ता गर्भं सुषुवतुश्च तम् ॥ २७ ॥

अष्टावक्र बोले— राजन्! वे दोनों तुम्हारे शत्रुओंके घरपर भी कभी न गिरें । वायु जिसका सारथि है वह मेघरूप देव ही इन दोनोंके गर्भको धारण करनेवाला है और ये दोनों उस मेघरूप गर्भको उत्पन्न करनेवाले हैं * ॥ २७ ॥

राजोवाच

किंस्वित् सुप्तं न निमिषति किंस्विज्जातं न चोपति ।

कस्य स्विद्धृदयं नास्ति किं स्विद् वेगेन वर्धते ॥ २८ ॥

राजाने पूछा — सोते समय कौन नेत्र नहीं मूँदता, जन्म लेनेके बाद किसमें गति नहीं होती, किसके हृदय नहीं होता और कौन वेगसे बढ़ता है? ॥ २८ ॥

अष्टावक्र उवाच

मत्स्यः सुप्तो न निमिषत्यण्डं जातं न चोपति ।

अश्मनो हृदयं नास्ति नदी वेगेन वर्धते ॥ २ ९ ॥

अष्टावक्र बोले — मछली सोते समय भी आँख नहीं मूँदती, अण्डा उत्पन्न होनेपर चेष्टा नहीं करता, पत्थरके हृदय नहीं होता और नदी वेगसे बढ़ती है ॥ २ ९ ॥ राजोवाच न त्वां मन्ये मानुषं देवसत्त्वं न त्वं बालः स्थविरः सम्मतो मे । न ते तुल्यो विद्यते वाक्प्रलापे तस्मात् द्वारं वितराम्येष बन्दी ॥ ३० ॥

राजाने कहा — ब्रह्मन्! आपकी शक्ति तो देवताओंके समान है, मैं आपको मनुष्य नहीं मानता; आप बालक भी नहीं हैं । मैं तो आपको वृद्ध ही समझता हूँ । वाद - विवाद करनेमें आपके समान दूसरा कोई नहीं है, अतः आपको यज्ञ मण्डपमें जानेके लिये द्वार प्रदान करता हूँ । यही बन्दी हैं (जिनसे आप मिलना चाहते थे ) ॥ ३० ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायामष्टावक्रीये त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें अष्टावक्रीयोपाख्यानविषयक एक सौ तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३३ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ३१ श्लोक हैं)