श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ३ — पृष्ठ 1091–1100

महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1091–1100

पृष्ठ 1091

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O mmi पाण्डव -सेनापति-२ धृष्टद्युम्न

पृष्ठ 1092

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उसके साथ पांचालों और प्रभद्रकोंकी बहुत बड़ी सेना है । वह उन रथियोंके समूहद्वारा युद्धमें महान् कर्म कर दिखायेगा ॥ ३ ॥

धृष्टद्युम्नश्च सेनानीः सर्वसेनासु भारत ।

मतो मेऽतिरथो राजन् द्रोणशिष्यो महारथः ॥ ४ ॥

भारत! जो पाण्डवोंकी सम्पूर्ण सेनाका सेनापति है, वह द्रोणाचार्यका महारथी शिष्य धृष्टद्युम्न मेरे विचारसे अतिरथी है ॥ ४ ॥

एष योत्स्यति संग्रामे सूदयन् वै परान् रणे ।

भगवानिव संक्रुद्धः पिनाकी युगसंक्षये ॥ ५ ॥

जैसे प्रलयकालमें पिनाकधारी भगवान् रुद्र कुपित होकर प्रजाका संहार करते हैं, उसी प्रकार यह संग्राममें शत्रुओंका संहार करता हुआ युद्ध करेगा ॥ ५ ॥

एतस्य तद् रथानीकं कथयन्ति रणप्रियाः ।

बहुत्वात् सागरप्रख्यं देवानामिव संयुगे ॥ ॥

इसके पास रथियोंकी जो देवसेनाके समान विशाल सेना है, उसकी संख्या बहुत होनेके कारण युद्धप्रेमी सैनिक रणक्षेत्रमें उसे समुद्रके समान बताते हैं ॥ ६ ॥

क्षत्रधर्मा तु राजेन्द्र मतो मेऽर्धरथो नृप ।

धृष्टद्युम्नस्य तनयो बाल्यान्नातिकृतश्रमः ॥ ७ ॥

राजेन्द्र! धृष्टद्युम्नका पुत्र क्षत्रधर्मा मेरी समझमें अभी अर्धरथी है। बाल्यावस्था होनेके कारण उसने अस्त्र - विद्यामें अधिक परिश्रम नहीं किया है ॥ ७ ॥

शिशुपालसुतो वीरश्चेदिराजो महारथः ।

धृष्टकेतुर्महेष्वासः सम्बन्धी पाण्डवस्य ह ॥ ८ ॥

शिशुपालका वीर पुत्र महाधनुर्धर चेदिराज धृष्टकेतु पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरका सम्बन्धी एवं महारथी है ॥ ८ ॥

एष चेदिपतिः शूरः सह पुत्रेण भारत ।

महारथानां सुकरं महत् कर्म करिष्यति ॥ ९ ॥

भारत! यह शौर्यसम्पन्न चेदिराज अपने पुत्रके साथ आकर महारथियोंके लिये सहजसाध्य महान् पराक्रम कर दिखायेगा ॥ ॥

क्षत्रधर्मरतो मह्यं मतः परपुरंजयः ।

क्षत्रदेवस्तु राजेन्द्र पाण्डवेषु रथोत्तमः ॥ १० ॥

राजेन्द्र! शत्रुओंकी नगरीपर विजय पानेवाला क्षत्रियधर्मपरायण क्षत्रदेव मेरे मतमें पाण्डवसेनाका एक श्रेष्ठ रथी है ॥ १० ॥

जयन्तश्चामितौजाश्च सत्यजिच्च महारथः ।

महारथा महात्मानः सर्वे पाञ्चालसत्तमाः ॥ ११ ॥

योत्स्यन्ते समरे तात संरब्धा इव कुञ्जराः ।

पृष्ठ 1093

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जयन्त, अमितौजा और महारथी सत्यजित्– ये सभी पांचालशिरोमणि महामनस्वी वीर महारथी ही हैं। तात! ये सब - के - सब क्रोधमें भरे हुए गजराजोंकी भाँति समरभूमिमें युद्ध करेंगे ॥ ११३ ॥

अजो भोजश्च विक्रान्तौ पाण्डवार्थे महारथौ ॥ १२ ॥

योत्स्येते बलिनौ शूरौ परं शक्त्या क्षयिष्यतः । पाण्डवोंके लिये महान् पराक्रम करनेवाले बलवान् शूरवीर अज और भोज दोनों महारथी हैं । वे सम्पूर्ण शक्ति लगाकर युद्ध करेंगे और अपने पुरुषार्थका परिचय देंगे ॥ १२ || शीघ्रास्त्राश्चित्रयोद्धारः कृतिनो दृढविक्रमाः ॥ १३ ॥

केकयाः पञ्च राजेन्द्र भ्रातरो दृढविक्रमाः ।

सर्वे चैव रथोदाराः सर्वे लोहितकध्वजाः ॥ १४ ॥

राजेन्द्र! शीघ्रतापूर्वक अस्त्र चलानेवाले, विचित्र योद्धा, युद्धकालमें निपुण और दृढ़ पराक्रमी जो पाँच भाई केकयराजकुमार हैं, वे सभी उदार रथी माने गये हैं । उन सबकी ध्वजा लाल रंगकी है ॥ १३-१४ ॥

काशिकःकः सुकुमारश्च नीलो यश्चापरो नृप ।

सूर्यदत्तश्च शङ्खश्च मदिराश्चश्च नामतः ॥ १५ ॥

सर्व एव रथोदाराः सर्वे चाहवलक्षणाः ।

सर्वास्त्रविदुषः सर्वे महात्मानो मता मम ॥ १६ ॥

सुकुमार, काशिक, नील, सूर्यदत्त, शंख और मदिराश्व नामक ये सभी योद्धा उदार रथी हैं । युद्ध ही इन सबका शौर्यसूचक चिह्न है । मैं इन सभीको सम्पूर्ण अस्त्रोंके ज्ञाता और महामनस्वी मानता हूँ ॥ १५-१६ ॥

वार्धक्षेमिर्महाराज मतो मम महारथः ।

चित्रायुधश्च नृपतिर्मतो मे रथसत्तमः ॥ १७ ॥

महाराज! वार्धक्षेमिको मैं महारथी मानता हूँ तथा राजा चित्रायुध मेरे विचारसे श्रेष्ठ रथी ॥ १७ ॥

स हि संग्रामशोभी च भक्तश्चापि किरीटिनः ।

चेकितानः सत्यधृतिः पाण्डवानां महारथौ ।

द्वाविमौ पुरुषव्याघ्रौ रथोदारौ मतौ मम ॥ १८ ॥

चित्रायुध संग्राममें शोभा पानेवाले तथा अर्जुनके भक्त हैं । चेकितान और सत्यधृति — ये दो पुरुषसिंह पाण्डव - सेनाके महारथी हैं । मैं इन्हें रथियोंमें श्रेष्ठ मानता हूँ ॥ १८ ॥

व्याघ्रदत्तश्च राजेन्द्र चन्द्रसेनश्च भारत ।

मतौ मम रथोदारौ पाण्डवानां न संशयः ॥ १ ९ ॥

पृष्ठ 1094

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भरतनन्दन! महाराज! व्याघ्रदत्त और चन्द्रसेन -ये दो नरेश भी मेरे मतमें पाण्डवसेनाके श्रेष्ठ रथी हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ १ ९ ॥

सेनाबिन्दुश्च राजेन्द्र क्रोधहन्ता च नामतः ।

यः समो वासुदेवेन भीमसेनेन वा विभो ॥ २० ॥

स योत्स्यति हि विक्रम्य समरे तव सैनिकैः । राजेन्द्र! राजा सेनाबिन्दुका दूसरा नाम क्रोधहन्ता भी है । प्रभो! वे भगवान् श्रीकृष्ण तथा भीमसेनके समान पराक्रमी माने जाते हैं । वे समरांगणमें तुम्हारे सैनिकोंके साथ पराक्रम प्रकट करते हुए युद्ध करेंगे ॥ २०३ ॥

मां च द्रोणं कृपं चैव यथा सम्मन्यते भवान् ॥ २१ ॥

तथा स समरश्लाघी मन्तव्यो रथसत्तमः ।

काश्यः परमशीघ्रास्त्रः श्लाघनीयो नरोत्तमः ॥ २२ ॥

तुम मुझको, आचार्य द्रोणको तथा कृपाचार्यको जैसा समझते हो, युद्धमें दूसरे वीरोंसे स्पर्धा रखनेवाले तथा बहुत ही फुर्तीके साथ अस्त्र- शस्त्रोंका प्रयोग करनेवाले प्रशंसनीय एवं उत्तम रथी नरश्रेष्ठ काशिराजको भी तुम्हें वैसा ही मानना चाहिये ॥ २१-२२ ॥

रथ एकगुणो मह्यं ज्ञेयः परपुरंजयः ।

अयं च युधि विक्रान्तो मन्तव्योऽष्टगुणो रथः ॥ २३ ॥

मेरी दृष्टिमें शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले काशिराजको साधारण अवस्थामें एक रथी समझना चाहिये; परंतु जिस समय ये युद्धमें पराक्रम प्रकट करने लगते हैं उस समय इन्हें आठ रथियोंके बराबर मानना चाहिये ॥ २३ ॥

सत्यजित् समरश्लाघी द्रुपदस्यात्मजो युवा ।

गतः सोऽतिरथत्वं हि धृष्टद्युम्नेन सम्मितः ॥ २४ ॥

पाण्डवानां यशस्कामः परं कर्म करिष्यति । द्रुपदका तरुण पुत्र सत्यजित् सदा युद्धकी स्पृहा रखनेवाला है । वह धृष्टद्युम्नके समान ही अतिरथीका पद प्राप्त कर चुका है । वह पाण्डवोंके यशोविस्तारकी इच्छा रखकर युद्धमें महान् कर्म करेगा ॥ २४ ॥

अनुरक्तश्च शूरश्च रथोऽयमपरो महान् ॥ २५ ॥

पाण्ड्यराजो महावीर्यः पाण्डवानां धुरंधरः ।

दृढधन्वा महेष्वासः पाण्डवानां महारथः ॥ २६ ॥

पाण्डवपक्षके धुरंधर वीर महापराक्रमी पाण्ड्यराज भी एक अन्य महारथी हैं । ये पाण्डवोंके प्रति अनुराग रखनेवाले और शूरवीर हैं । इनका धनुष महान् और सुदृढ़ है । ये पाण्डवसेनाके सम्माननीय महारथी हैं ॥ २५-२६ ॥

श्रेणिमान् कौरवश्रेष्ठ वसुदानश्च पार्थिवः ।

उभावेतावतिरथौ मतौ परपुरंजयौ ॥ २७ ॥

पृष्ठ 1095

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कौरवश्रेष्ठ! राजा श्रेणिमान् और वसुदान – ये दोनों वीर अतिरथी माने गये हैं । ये शत्रुओंकी नगरीपर विजय पानेमें समर्थ हैं ॥ २७ ॥

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि रथातिरथसंख्यानपर्वणि एकसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७१ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत रथातिरथसंख्यानपर्वमें एक सौ इकहत्तरवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १७१ ॥

पृष्ठ 1096

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द्विसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः भीष्मका पाण्डवपक्षके अतिरथी वीरोंका वर्णन करते हुए शिखण्डी और पाण्डवोंका वध न करनेका कथन भीष्म उवाच

रोचमानो महाराज पाण्डवानां महारथः ।

योत्स्यतेऽमरवत् संख्ये परसैन्येषु भारत ॥ १ ॥

भीष्मजी कहते हैं - महाराज! भारत! पाण्डवपक्षमें राजा रोचमान महारथी हैं । वे युद्धमें शत्रुसेनाके साथ देवताओंके समान पराक्रम दिखाते हुए युद्ध करेंगे ॥ १ ॥

पुरुजित् कुन्तिभोजश्च महेष्वासो महाबलः ।

मातुलो भीमसेनस्य स च मेऽतिरथो मतः ॥ २ ॥

कुन्तिभोजकुमार राजा पुरुजित् जो भीमसेनके मामा हैं, वे भी महाधनुर्धर और

अत्यन्त बलवान् हैं । मैं उन्हें भी अतिरथी मानता हूँ ॥ २ ॥

एष वीरो महेष्वासः कृती च निपुणश्च ह ।

चित्रयोधी च शक्तश्च मतो मे रथपुङ्गवः ॥ ३ ॥

इनका धनुष महान् है । ये अस्त्रविद्याके विद्वान् और युद्धकुशल हैं । रथियोंमें श्रेष्ठ वीर पुरुजित् विचित्र युद्ध करनेवाले और शक्तिशाली हैं ॥ ३ ॥

स योत्स्यति हि विक्रम्य मघवानिव दानवैः ।

योधा ये चास्य विख्याताः सर्वे युद्धविशारदाः ॥ ४ ॥

जैसे इन्द्र दानवोंके साथ पराक्रमपूर्वक युद्ध करते हैं, उसी प्रकार वे भी शत्रुओंके साथ युद्ध करेंगे । उनके साथ जो सैनिक आये हैं, वे सभी युद्धकी कलामें निपुण और विख्यात वीर हैं ॥ ४ ॥

भागिनेयकृते वीरः स करिष्यति संगरे ।

सुमहत् कर्म पाण्डूनां स्थितः प्रियहिते रतः ॥ ५ ॥

वीर पुरुजित् पाण्डवोंके प्रिय एवं हितमें तत्पर हो अपने भानजोंके लिये युद्धमें महान् कर्म करेंगे ॥ ५ ॥

भैमसेनिर्महाराज हैडिम्बो राक्षसेश्वरः ।

मतो मे बहुमायावी रथयूथपयूथपः ॥ ६ ॥

महाराज! भीमसेन और हिडिम्बाका पुत्र राक्षसराज घटोत्कच बड़ा मायावी है । वह मेरे मतमें रथयूथपतियोंका भी यूथपति है ॥ ६ ॥

योत्स्यते समरे तात मायावी समरप्रियः ।

पृष्ठ 1097

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ये चास्य राक्षसा वीराः सचिवा वशवर्तिनः ॥ ७ ॥

उसको युद्ध करना बहुत प्रिय है । तात! वह मायावी राक्षस समरभूमिमें उत्साहपूर्वक युद्ध करेगा । उसके साथ जो वीर राक्षस एवं सचिव हैं, वे सब उसीके वशमें रहनेवाले हैं ॥ ७ ॥

एते चान्ये च बहवो नानाजनपदेश्वराः ।

समेताः पाण्डवस्यार्थे वासुदेवपुरोगमाः ॥ ८ ॥

ये तथा और भी बहुत- से वीर क्षत्रिय जो विभिन्न जनपदोंके स्वामी हैं और जिनमें श्रीकृष्णका सबसे प्रधान स्थान है, पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरके लिये यहाँ एकत्र हुए हैं ॥

एते प्राधान्यतो राजन् पाण्डवस्य महात्मनः ।

रथाश्चातिरथाश्चैव ये चान्येऽर्धरथा नृप ॥ ९ ॥

राजन्! ये महात्मा पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरके मुख्य-मुख्य रथी, अतिरथी और अर्धरथी यहाँ बताये गये हैं ॥

नेष्यन्ति समरे सेनां भीमां यौधिष्ठिरीं नृप ।

महेन्द्रेणेव वीरेण पाल्यमानां किरीटिना ॥ १० ॥

नरेश्वर! देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी किरीटधारी वीरवर अर्जुनके द्वारा सुरक्षित हुई युधिष्ठिरकी भयंकर सेनाका ये उपर्युक्त वीर समरांगणमें संचालन करेंगे ॥

तैरहं समरे वीर मायाविद्भिर्जयैषिभिः ।

योत्स्यामि जयमाकाङ्क्षन्नथवा निधनं रणे ॥ ११ ॥

वीर! मैं तुम्हारी ओरसे रणभूमिमें उन मायावेत्ता और विजयाभिलाषी पाण्डववीरोंके साथ अपनी विजय अथवा मृत्युकी आकांक्षा लेकर युद्ध करूँगा ॥ ११ ॥

वासुदेवं च पार्थं च चक्रगाण्डीवधारिणौ ।

संध्यागताविवार्केन्दू समेष्येते रथोत्तमौ ॥ १२ ॥

वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण और अर्जुन रथियोंमें श्रेष्ठ हैं । वे क्रमशः सुदर्शनचक्र और गाण्डीवधनुष धारण करते हैं । वे संध्याकालीन सूर्य और चन्द्रमाकी भाँति परस्पर मिलकर जब युद्धमें पधारेंगे, उस समय मैं उनका सामना करूँगा ॥ १२ ॥

ये चैव ते रथोदाराः पाण्डुपुत्रस्य सैनिकाः ।

सहसैन्यानहं तांश्च प्रतीयां रणमूर्धनि ॥ १३ ॥

पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरके और भी जो- जो श्रेष्ठ रथी सैनिक हैं, उनका और उनकी सेनाओंका मैं युद्धके मुहानेपर सामना करूँगा ॥ १३ ॥

एते रथाश्चातिरथाश्च तुभ्यं यथाप्रधानं नृप कीर्तिता मया । तथापरे येऽर्धरथाश्च केचित् तथैव तेषामपि कौरवेन्द्र ॥ १४ ॥

पृष्ठ 1098

महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1098 का मूल पृष्ठ
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राजन्! इस प्रकार मैंने तुम्हारे इन मुख्य- मुख्य रथियों और अतिरथियोंका वर्णन किया है । इनके सिवा, जो कोई अर्धरथी हैं, उनका भी परिचय दिया है । कौरवेन्द्र! इसी प्रकार पाण्डवपक्षके भी रथी आदिका दिग्दर्शन कराया गया है ॥ १४ ॥

अर्जुनं वासुदेवं च ये चान्ये तत्र पार्थिवाः ।

सर्वांस्तान् वारयिष्यामि यावद् द्रक्ष्यामि भारत ॥ १५ ॥

भारत! अर्जुन, श्रीकृष्ण तथा अन्य जो - जो भूपाल हैं, मैं उनमेंसे जितनोंको देखूँगा, उन सबको आगे बढ़नेसे रोक दूँगा ॥ १५ ॥

पाञ्चाल्यं तु महाबाहो नाहं हन्यां शिखण्डिनम् ।

उद्यतेषुमथो दृष्ट्वा प्रतियुध्यन्तमाहवे ॥ १६ ॥

परंतु महाबाहो! पांचालराजकुमार शिखण्डीको धनुषपर बाण चढ़ाये युद्धमें अपना सामना करते देखकर भी मैं नहीं मारूँगा ॥ १६ ॥

लोकस्तं वेद यदहं पितुः प्रियचिकीर्षया ।

प्राप्तं राज्यं परित्यज्य ब्रह्मचर्यव्रते स्थितः ॥ १७ ॥

सारा जगत् यह जानता है कि मैं मिले हुए राज्यको पिताका प्रिय करनेकी इच्छासे ठुकराकर ब्रह्मचर्यके पालनमें दृढ़तापूर्वक लग गया ॥ १७ ॥

चित्राङ्गदं कौरवाणामाधिपत्येऽभ्यषेचयम् ।

विचित्रवीर्यं च शिशुं यौवराज्येऽभ्यषेचयम् ॥ १८ ॥

माता सत्यवतीके ज्येष्ठ पुत्र चित्रांगदको कौरवोंके राज्यपर और बालक विचित्रवीर्यको युवराजके पदपर अभिषिक्त कर दिया था ॥ १८ ॥

देवव्रतत्वं विज्ञाप्य पृथिवीं सर्वराजसु ।

नैव हन्यां स्त्रियं जातु न स्त्रीपूर्वं कदाचन ॥ १ ९ ॥

सम्पूर्ण भूमण्डलमें समस्त राजाओंके यहाँ अपने देवव्रतस्वरूपकी ख्याति कराकर मैं कभी भी किसी स्त्रीको अथवा जो पहले स्त्री रहा हो, उस पुरुषको भी नहीं मार सकता ॥ १ ९ ॥

स हि स्त्रीपूर्वको राजन् शिखण्डी यदि ते श्रुतः ।

कन्या भूत्वा पुमान् जातो न योत्स्ये तेन भारत ॥ २० ॥

राजन्! शायद तुम्हारे सुननेमें आया होगा, शिखण्डी पहले ' स्त्रीरूप ' में ही उत्पन्न हुआ था; भारत! पहले कन्या होकर वह फिर पुरुष हो गया था; इसीलिये मैं उससे युद्ध नहीं करूँगा ॥ २० ॥

सर्वांस्त्वन्यान् हनिष्यामि पार्थिवान् भरतर्षभ ।

यान् समेष्यामि समरे न तु कुन्तीसुतान् नृप ॥ २१ ॥

भरतश्रेष्ठ! मैं अन्य सब राजाओंको, जिन्हें युद्धमें पाऊँगा, मारूँगा; परंतु कुन्तीके पुत्रोंका वध कदापि नहीं करूँगा ॥ २१ ॥

पृष्ठ 1099

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इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि रथातिरथसंख्यानपर्वणि द्विसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत रथातिरथसंख्यानपर्वमें एक सौ बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७२ ॥

पृष्ठ 1100

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(अम्बोपाख्यानपर्व) त्रिसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः अम्बोपाख्यानका आरम्भ - भीष्मजीके द्वारा काशिराजकी कन्याओंका अपहरण दुर्योधन उवाच

किमर्थं भरतश्रेष्ठ नैव हन्याः शिखण्डिनम् ।

उद्यतेषुमथो दृष्ट्वा समरेष्वाततायिनम् ॥ १ ॥

दुर्योधनने पूछा- भरतश्रेष्ठ! जब शिखण्डी धनुष- बाण उठाये समरमें आततायीकी भाँति आपको मारने आयेगा, उस समय उसे इस रूपमें देखकर भी आप क्यों नहीं मारेंगे? ॥ १ ॥

पूर्वमुक्त्वा महाबाहो पञ्चालान् सह सोमकैः ।

हनिष्यामीति गाङ्गेय तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ २ ॥

महाबाहु गंगानन्दन! पितामह! आप पहले तो यह कह चुके हैं कि ' मैं सोमकोंसहित पंचालोंका वध करूँगा' ( फिर आप शिखण्डीको छोड़ क्यों रहे हैं? ) यह मुझे बताइये ॥ २ ॥

भीष्म उवाच

शृणु दुर्योधन कथां सहैभिर्वसुधाधिपैः ।

यदर्थं युधि सम्प्रेक्ष्य नाहं हन्यां शिखण्डिनम् ॥ ३ ॥

भीष्मजीने कहा- दुर्योधन! मैं जिस कारणसे समरांगणमें प्रहार करते देखकर भी शिखण्डीको नहीं मारूँगा, उसकी कथा कहता हूँ, इन भूमिपालोंके साथ सुनो ॥ ३ ॥

महाराजो मम पिता शान्तनुर्लोकविश्रुतः ।

दिष्टान्तमाप धर्मात्मा समये भरतर्षभ ॥ ४ ॥

ततोऽहं भरतश्रेष्ठ प्रतिज्ञां परिपालयन् ।

चित्राङ्गदं भ्रातरं वै महाराज्येऽभ्यषेचयम् ॥ ५ ॥

भरतश्रेष्ठ! मेरे धर्मात्मा पिता लोकविख्यात महाराज शान्तनुका जब निधन हो गया, उस समय अपनी प्रतिज्ञाका पालन करते हुए मैंने भाई चित्रांगदको इस महान् राज्यपर अभिषिक्त कर दिया ॥ ४-५ ॥