श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ३ — पृष्ठ 1201–1210
महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1201–1210
पृष्ठ 1201
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
राजन्! वह वन समृद्धिशाली यक्ष स्थूणाकर्णके द्वारा सुरक्षित था । इसीके भयसे साधारण लोगोंने उस वनमें आना- जाना छोड़ दिया था ॥ २० ॥
तत्र च स्थूणभवनं सुधामृत्तिकलेपनम् ।
लाजोल्लापिकधूमाढ्यमुच्चप्राकारतोरणम् ॥ २१ ॥
उसके भीतर स्थूणाकर्णका विशाल भवन था, जो चूना और मिट्टीसे लीपा गया था । उसके परकोटे और फाटक बहुत ऊँचे थे । उसमें खसकी जड़के धूमकी सुगन्ध फैली हुई थी ॥ २१ ॥
तत् प्रविश्य शिखण्डी सा द्रुपदस्यात्मजा नृप ।
अनश्नाना बहुतिथं शरीरमुदशोषयत् ॥ २२ ॥
उस भवनमें प्रवेश करके द्रुपदपुत्री शिखण्डिनी बहुत दिनोंतक उपवास करके शरीरको सुखाती रही ॥
दर्शयामास तां यक्षः स्थूणो मार्दवसंयुतः ।
किमर्थोऽयं तवारम्भः करिष्ये ब्रूहि मा चिरम् ॥ २३ ॥
स्थूणाकर्ण यक्षने उसे इस अवस्थामें देखा । देखकर उसके हृदयमें कोमल भावका उदय हुआ । फिर उसने पूछा- ' भद्रे! तुम्हारा यह उपवास व्रत किसलिये है? अपना
प्रयोजन शीघ्र बताओ । मैं उसे पूर्ण करूँगा' ॥ २३ ॥
अशक्यमिति सा यक्षं पुनः पुनरुवाच ह ।
करिष्यामीति वै क्षिप्रं प्रत्युवाचाथ गुह्यकः ॥ २४ ॥
यह सुनकर उसने यक्षसे बार- बार कहा - ' यह तुम्हारे लिये असम्भव है । ' तब यक्षने बार- बार उत्तर दिया — ‘ मैं तुम्हारा मनोरथ अवश्य पूर्ण कर दूँगा ॥ २४ ॥
धनेश्वरस्यानुचरो वरदोऽस्मि नृपात्मजे ।
अदेयमपि दास्यामि ब्रूहि यत् ते विवक्षितम् ॥ २५ ॥
‘ राजकुमारी! मैं कुबेरका सेवक हूँ । मुझमें वर देनेकी शक्ति है, तुम्हारी जो भी इच्छा हो बताओ । मैं तुम्हें अदेय वस्तु भी दे दूँगा' ॥ २५ ॥
ततः शिखण्डी तत् सर्वमखिलेन न्यवेदयत् ।
तस्मै यक्षप्रधानाय स्थूणाकर्णाय भारत ॥ २६ ॥
भरतनन्दन! तब शिखण्डिनीने उस यक्षप्रवर स्थूणाकर्णसे अपना सारा वृत्तान्त विस्तारपूर्वक बताया ॥ २६ ॥
शिखण्डिन्युवाच
अपुत्रो मे पिता यक्ष न चिरान्नाशमेष्यति ।
अभियास्यति सक्रोधो दशार्णाधिपतिर्हि तम् ॥ २७ ॥
पृष्ठ 1202
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
शिखण्डिनी बोली- यक्ष! मेरे पुत्रहीन पिता अब शीघ्र ही नष्ट हो जायँगे; क्योंकि दशार्णराज कुपित होकर उनपर आक्रमण करेंगे ॥ २७ ॥
महाबलो महोत्साहः सहेमकवचो नृपः ।
तस्माद् रक्षस्व मां यक्ष मातरं पितरं च मे ॥ २८ ॥
वे सुवर्णमय कवचसे युक्त नरेश महाबली और महान् उत्साही हैं - यक्ष! तुम मेरे माता-पिताकी और मेरी भी उनसे रक्षा करो ॥ २८ ॥
प्रतिज्ञातो हि भवता दुःखप्रतिशमो मम ।
भवेयं पुरुषो यक्ष त्वत्प्रसादादनिन्दितः ॥ २ ९ ॥
यावदेव स राजा वै नोपयाति पुरं मम ।
तावदेव महायक्ष प्रसादं कुरु गुह्यक ॥ ३० ॥
गुह्यक! महायक्ष! तुमने मेरे दुःखनिवारणके लिये प्रतिज्ञा की है। मैं चाहती हूँ कि तुम्हारी कृपासे एक श्रेष्ठ पुरुष हो जाऊँ। जबतक राजा हिरण्यवर्मा हमारे नगरपर आक्रमण नहीं कर रहे हैं, तभीतक मुझपर कृपा करो ॥ इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि स्थूणाकर्णसमागमे एकनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १ ९ १ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्वमें स्थूणाकर्णके साथ शिखण्डिनीका भेंटविषयक एक सौ इक्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ९ १ ॥
पृष्ठ 1203
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
द्विनवत्यधिकशततमोऽध्यायः शिखण्डीको पुरुषत्वकी प्राप्ति, द्रुपद और हिरण्यवर्माकी प्रसन्नता, स्थूणाकर्णको कुबेरका शाप तथा भीष्मका शिखण्डीको न मारनेका निश्चय भीष्म उवाच
शिखण्डिवाक्यं श्रुत्वाथ स यक्षो भरतर्षभ ।
प्रोवाच मनसा चिन्त्य दैवेनोपनिपीडितः ॥ १ ॥
भवितव्यं तथा तद्धि मम दुःखाय कौरव ।
भद्रे कामं करिष्यामि समयं तु निबोध मे ॥ २ ॥
(स्वं ते पुंस्त्वं प्रदास्यामि स्त्रीत्वं धारयितास्मि ते । )
किंचित् कालान्तरे दास्ये पुंल्लिङ्गं स्वमिदं तव ।
आगन्तव्यं त्वया काले सत्यं चैव वदस्व मे ॥ ३ ॥
भीष्म कहते हैं— भरतश्रेष्ठ कौरव! शिखण्डिनीकी यह बात सुनकर दैवपीड़ित यक्षने मन- ही - मन कुछ सोचकर कहा -' भद्रे! तुम जैसा कहती हो वैसा हो तो जायगा; परंतु वह मेरे दुःखका कारण होगा, तथापि मैं तुम्हारी इच्छा पूर्ण करूँगा । इस विषयमें जो मेरी शर्त है, उसे सुनो । मैं तुम्हें अपना पुरुषत्व दूँगा और तुम्हारा स्त्रीत्व स्वयं धारण करूँगा; किंतु कुछ ही कालके लिये अपना यह पुरुषत्व तुम्हें दूँगा । उस निश्चित समयके भीतर ही तुम्हें
मेरा पुरुषत्व लौटानेके लिये यहाँ आ जाना चाहिये । इसके लिये मुझे सच्चा वचन दो ॥ १
-३ ॥
प्रभुः संकल्पसिद्धोऽस्मि कामचारी विहङ्गमः ।
मत्प्रसादात् पुरं चैव त्राहि बन्धूंश्च केवलम् ॥ ४ ॥
‘ मैं सिद्धसंकल्प, सामर्थ्यशाली, इच्छानुसार सर्वत्र विचरनेवाला तथा आकाशमें भी चलनेकी शक्ति रखनेवाला हूँ। तुम मेरी कृपासे केवल अपने नगर और बन्धु -बान्धवोंकी रक्षा करो ॥ ४ ॥
स्त्रीलिङ्गं धारयिष्यामि तदेवं पार्थिवात्मजे ।
सत्यं मे प्रतिजानीहि करिष्यामि प्रियं तव ॥ ५ ॥
‘ राजकुमारी! इस प्रकार मैं तुम्हारा स्त्रीत्व धारण करूँगा, कार्य पूर्ण हो जानेपर तुम मेरा पुरुषत्व लौटा देनेकी मुझसे सच्ची प्रतिज्ञा करो; तब मैं तुम्हारा प्रिय कार्य करूँगा ' ॥ ५ ॥
शिखण्डिन्युवाच
पृष्ठ 1204
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रतिदास्यामि भगवन् पुँल्लिङ्गं तव सुव्रत ।
किञ्चित्कालान्तरं स्त्रीत्वं धारयस्व निशाचर ॥ ६ ॥
शिखण्डिनी बोली- भगवन्! तुम्हारा यह पुरुषत्व मैं समयपर लौटा दूँगी । निशाचर! तुम कुछ ही समयके लिये मेरा स्त्रीत्व धारण कर लो ॥ ६ ॥
प्रतियाते दशार्णे तु पार्थिवे हेमवर्मणि ।
कन्यैव हि भविष्यामि पुरुषस्त्वं भविष्यसि ॥ ७ ॥
दशार्णदेशके स्वामी राजा हिरण्यवर्माके लौट जानेपर मैं फिर कन्या ही हो जाऊँगी और तुम पूर्ववत् पुरुष हो जाओगे ॥ ७ ॥
भीष्म उवाच
इत्युक्त्वा समयं तत्र चक्राते तावुभौ नृप ।
अन्योऽन्यस्याभिसंदेहे तौ संक्रामयतां ततः ॥ ८ ॥
स्त्रीलिङ्गं धारयामास स्थूणायक्षोऽथ भारत ।
यक्षरूपं च तद् दीप्तं शिखण्डी प्रत्यपद्यत ॥ ९ ॥
भीष्मजी कहते हैं— नरेश्वर! इस प्रकार बात करके उन्होंने परस्पर प्रतिज्ञा कर ली तथा उन दोनोंने एक- दूसरेके शरीरमें अपने- अपने पुरुषत्व और स्त्रीत्वका संक्रमण करा दिया । भारत! स्थूणाकर्ण यक्षने उस शिखण्डिनीके स्त्रीत्वको धारण कर लिया और शिखण्डिनीने यक्षका प्रकाशमान पुरुषत्व प्राप्त कर लिया ॥ ८ - ९ ॥
ततः शिखण्डी पाञ्चाल्यः पुंस्त्वमासाद्य पार्थिव ।
विवेश नगरं हृष्टः पितरं च समासदत् ॥ १० ॥
राजन्! इस प्रकार पुरुषत्व पाकर पांचालराजकुमार शिखण्डी बड़े हर्षके साथ नगरमें आया और अपने पितासे मिला ॥ १० ॥
यथावृत्तं तु तत् सर्वमाचख्यौ द्रुपदस्य तत् ।
द्रुपदस्तस्य तच्छ्रुत्वा हर्षमाहारयत् परम् ॥ ११ ॥
उसने जैसे जो वृत्तान्त हुआ था, वह सब राजा द्रुपदसे कह सुनाया । उसकी यह बात सुनकर राजा द्रुपदको अपार हर्ष हुआ ॥ ११ ॥
सभार्यस्तच्च सस्मार महेश्वरवचस्तदा ।
ततः सम्प्रेषयामास दशार्णाधिपतेर्नृपः ॥ १२ ॥
पुरुषोऽयं मम सुतः श्रद्धत्तां मे भवानिति । पत्नीसहित राजाको भगवान् महेश्वरके दिये हुए वरका स्मरण हो आया । तदनन्तर राजा द्रुपदने दशार्णराजके पास दूत भेजा और यह कहलाया कि मेरा पुत्र पुरुष है । आप मेरी इस बातपर विश्वास करें ॥ १२३ ॥
अथ दाशार्णको राजा सहसाभ्यागमत् तदा ॥ १३ ॥
पृष्ठ 1205
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
पञ्चालराजं द्रुपदं दुःखशोकसमन्वितः । इधर दुःख और शोकमें डूबे हुए दशार्णराजने सहसा पांचालराज द्रुपदपर आक्रमण किया ॥ १३३ ॥
ततः काम्पिल्यमासाद्य दशार्णाधिपतिस्ततः ॥ १४ ॥
प्रेषयामास सत्कृत्य दूतं ब्रह्मविदां वरम् । काम्पिल्य नगरके निकट पहुँचकर दशार्णराजने वेद- वेत्ताओंमें श्रेष्ठ एक ब्राह्मणको सत्कारपूर्वक दूत बनाकर भेजा ॥ १४ ॥
ब्रूहि मद्वचनाद् दूत पाञ्चाल्यं तं नृपाधमम् ॥ १५ ॥
यन्मे कन्यां स्वकन्यार्थे वृतवानसि दुर्मते ।
फलं तस्यावलेपस्य द्रक्ष्यस्यद्य न संशयः ॥ १६ ॥
और कहा – ' दूत! मेरे कथनानुसार राजाओंमें अधम उस पांचालनरेशसे कहिये । दुर्मते! तुमने जो अपनी कन्याके लिये मेरी कन्याका वरण किया था, उस घमंडका फल तुम्हें आज देखना पड़ेगा, इसमें संशय नहीं है ' ॥ १५-१६ ॥
एवमुक्तश्च तेनासौ ब्राह्मणो राजसत्तम ।
दूतः प्रयातो नगरं दाशार्णनृपचोदितः ॥ १७ ॥
नृपश्रेष्ठ! दशार्णराजका यह संदेश पाकर और उन्हींकी प्रेरणासे दूत बनकर वे ब्राह्मणदेवता काम्पिल्य नगरमें आये ॥ १७ ॥
तत आसादयामास पुरोधा द्रुपदं पुरे ।
तस्मै पाञ्चालको राजा गामर्घ्यं च सुसत्कृतम् ॥ १८ ॥
प्रापयामास राजेन्द्र सह तेन शिखण्डिना ।
तां पूजां नाभ्यनन्दत् स वाक्यं चेदमुवाच ह ॥ १ ९ ॥
नगरमें आकर वे पुरोहित ब्राह्मण महाराज द्रुपदसे मिले । पांचालराजने सत्कारपूर्वक उन्हें अर्घ्य तथा गौ अर्पण की । उनके साथ राजकुमार शिखण्डी भी थे । राजेन्द्र! पुरोहितने वह पूजा ग्रहण नहीं की और इस प्रकार कहा— ॥ १८-१९ ॥
यदुक्तं तेन वीरेण राज्ञा काञ्चनवर्मणा ।
यत् तेऽहमधमाचार दुहित्रास्म्यभिवञ्चितः ॥ २० ॥
तस्य पापस्य करणात् फलं प्राप्नुहि दुर्मते ।
देहि युद्धं नरपते ममाद्य रणमूर्धनि ॥ २१ ॥
उद्धरिष्यामि ते सद्यः सामात्यसुतबान्धवम् । ‘ राजन्! वीरवर राजा हिरण्यवर्माने जो संदेश दिया है, उसे सुनिये । पापाचारी दुर्बुद्धि नरेश! तुम्हारी पुत्रीके द्वारा मैं ठगा गया हूँ। वह पाप तुमने ही किया है; अतः उसका फल भोगो । नरेश्वर! युद्धके मैदानमें आकर मुझे युद्धका अवसर दो । मैं मन्त्री, पुत्र और बान्धवोंसहित तुम्हारे समस्त कुलको उखाड़ फेंकूँगा' ॥ २०-२१ ३ ॥
पृष्ठ 1206
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तदुपालम्भसंयुक्तं श्रावितः किल पार्थिवः ॥ २२ ॥
दशार्णपतिना चोक्तो मन्त्रिमध्ये पुरोधसा । इस प्रकार पुरोहितने मन्त्रियोंके बीचमें बैठे हुए राजा द्रुपदसे दशार्णराजका कहा हुआ उपालम्भयुक्त संदेश सुनाया ॥ २२ ॥
अभवद् भरतश्रेष्ठ द्रुपदः प्रणयानतः ॥ २३ ॥
यदाह मां भवान् ब्रह्मन् सम्बन्धिवचनाद् वचः ।
अस्योत्तरं प्रतिवचो दूतो राज्ञे वदिष्यति ॥ २४ ॥
भरतश्रेष्ठ! तब राजा द्रुपद प्रेमसे विनीत हो गये और इस प्रकार बोले— ' ब्रह्मन्! आपने मेरे सम्बन्धीके कथनानुसार जो बात मुझे सुनायी है, इसका उत्तर मेरा दूत स्वयं जाकर राजाको देगा ' ॥ २३-२४ ॥
ततः सम्प्रेषयामास द्रुपदोऽपि महात्मने ।
हिरण्यवर्मणे दूतं ब्राह्मणं वेदपारगम् ॥ २५ ॥
तदनन्तर द्रुपदने भी महामना हिरण्यवर्माके पास वेदोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणको दूत बनाकर भेजा ॥ २५ ॥
तमागम्य तु राजानं दशार्णाधिपतिं तदा ।
तद् वाक्यमाददे राजन् यदुक्तं द्रुपदेन ह ॥ २६ ॥
राजन्! उन्होंने दशार्णनरेशके पास आकर द्रुपदने जो कुछ कहा था, वह सब दुहरा दिया ॥ २६ ॥
आगमः क्रियतां व्यक्तः कुमारोऽयं सुतो मम ।
मिथ्यैतदुक्तं केनापि तदश्रद्धेयमित्युत ॥ २७ ॥
‘ राजन्! आप आकर स्पष्टरूपसे परीक्षा कर लें । मेरा यह कुमार पुत्र है ( कन्या नहीं ) । आपसे किसीने झूठे ही उसके कन्या होनेकी बात कह दी है, जो विश्वास करनेके योग्य नहीं है ' ॥ २७ ॥
ततः स राजा द्रुपदस्य श्रुत्वा विमर्षयुक्तो युवतीर्वरिष्ठाः । सम्प्रेषयामास सुचारुरूपाः शिखण्डिनं स्त्री पुमान् वेति वेत्तुम् ॥ २८ ॥
राजा द्रुपदका यह उत्तर सुनकर हिरण्यवर्माने कुछ विचार किया और अत्यन्त मनोहर रूपवाली कुछ श्रेष्ठ युवतियोंको यह जाननेके लिये भेजा कि शिखण्डी स्त्री है या पुरुष ॥ २८ ॥
ताः प्रेषितास्तत्त्वभावं विदित्वा प्रीत्या राज्ञे तच्छशंसुर्हि सर्वम् । शिखण्डिनं पुरुषं कौरवेन्द्र
पृष्ठ 1207
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
दाशार्णराजाय महानुभावम् ॥ २ ९ ॥ कौरवराज! उन भेजी हुई युवतियोंने वास्तविक बात जानकर राजा हिरण्यवर्माको बड़ी प्रसन्नताके साथ सब कुछ बता दिया । उन्होंने दशार्णराजको यह विश्वास दिला दिया कि शिखण्डी महान् प्रभावशाली पुरुष है ॥ २ ९ ॥
ततः कृत्वा तु राजा स आगमं प्रीतिमानथ ।
सम्बन्धिना समागम्य हृष्टो वासमुवास ह ॥ ३० ॥
इस प्रकार परीक्षा करके राजा हिरण्यवर्मा बड़े प्रसन्न हुए। फिर उन्होंने सम्बन्धीसे मिलकर बड़े हर्ष और उल्लासके साथ वहाँ निवास किया ॥ ३० ॥
शिखण्डिने च मुदितः प्रादाद् वित्तं जनेश्वरः ।
हस्तिनोऽश्वांश्च गाश्चैव दास्योऽथ बहुलास्तथा ॥ ३१ ॥
राजाने अत्यन्त प्रसन्न होकर अपने जामाता शिखण्डीको भी बहुत धन, हाथी, घोड़े, गाय, बैल और दासियाँ दीं ॥ ३१ ॥
पूजितश्च प्रतिययौ निर्भर्त्स्य तनयां किल ।
विनीतकिल्विषे प्रीते हेमवर्मणि पार्थिवे ।
प्रतियाते दशार्णे तु हृष्टरूपा शिखण्डिनी ॥ ३२ ॥
इतना ही नहीं, उन्होंने झूठी खबर भेजनेके कारण अपनी पुत्रीको भी झिड़कियाँ दीं । फिर वे राजा द्रुपदसे सम्मानित होकर लौट गये । मनोमालिन्य दूर करके दशार्णराज हिरण्यवर्माके प्रसन्नतापूर्वक लौट जानेपर शिखण्डिनीको भी बड़ा हर्ष हुआ ॥ ३२ ॥
कस्यचित् त्वथ कालस्य कुबेरो नरवाहनः ।
लोकयात्रां प्रकुर्वाणः स्थूणस्यागान्निवेशनम् ॥ ३३ ॥
उधर कुछ कालके पश्चात् नरवाहन कुबेर लोकमें भ्रमण करते हुए स्थूणाकर्णके घरपर आये ॥ स तद्गृहस्योपरि वर्तमान आलोकयामास धनाधिगोप्ता । स्थूणस्य यक्षस्य विवेश वेश्म स्वलंकृतं माल्यगुणैर्विचित्रैः ॥ ३४ ॥
लाज्यैश्च गन्धैश्च तथा वितानै- रभ्यर्चितं धूपनधूपितं च । ध्वजैः पताकाभिरलंकृतं च भक्ष्यान्नपेयामिषदन्तहोमम् ॥ ३५ ॥
उसके घरके ऊपर आकाशमें स्थित हो धनाध्यक्ष कुबेरने उसका अच्छी तरह अवलोकन किया । स्थूणाकर्ण यक्षका वह भवन विचित्र हारोंसे सजाया गया था । खशकी और अन्य पदार्थोंकी सुगन्धसे भी अर्चित तथा चँदोवोंसे सुशोभित था । उसमें सब ओर
पृष्ठ 1208
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
धूपकी सुगन्ध फैली हुई थी । अनेकानेक ध्वज और पताकाएँ उसकी शोभा बढ़ा रही थीं । वहाँ भक्ष्य, भोज्य, पेय आदि सभी वस्तुएँ, जिनका दन्त और जिह्वाद्वारा उदराग्निमें हवन
किया जाता है, प्रस्तुत थीं । तत्पश्चात् कुबेरने उस भवनमें प्रवेश किया ॥ ३४-३५ ॥
तत् स्थानं तस्य दृष्ट्वा तु सर्वतः समलंकृतम् ।
मणिरत्नसुवर्णानां मालाभिः परिपूरितम् ॥ ३६ ॥
नानाकुसुमगन्धाढ्यं सिक्तसम्मृष्टशोभितम् ।
अथाब्रवीद् यक्षपतिस्तान् यक्षाननुगांस्तदा ॥ ३७ ॥
स्वलंकृतमिदं वेश्म स्थूणस्यामितविक्रमाः ।
नोपसर्पति मां चैव कस्मादद्य स मन्दधीः ॥ ३८ ॥
कुबेरने उसके निवासस्थानको सब ओरसे सुसज्जित, मणि, रत्न तथा सुवर्णकी मालाओंसे परिपूर्ण, भाँति- भाँतिके पुष्पोंकी सुगन्धसे व्याप्त तथा झाड़ - बुहार और धो - पोंछ देनेके कारण शोभासम्पन्न देखकर यक्षराजने स्थूणाकर्णके सेवकोंसे पूछा — ‘ अमित पराक्रमी यक्षो! स्थूणाकर्णका यह भवन तो सब प्रकारसे सजाया हुआ दिखायी देता है ( इससे सिद्ध है कि वह घरमें ही है ), तथापि वह मूर्ख मेरे पास आता क्यों नहीं है? ॥
यस्माज्जानन् स मन्दात्मा मामसौ नोपसर्पति ।
तस्मात् तस्मै महादण्डो धार्यः स्यादिति मे मतिः ॥ ३ ९ ॥
' वह मन्दबुद्धि यक्ष मुझे आया हुआ जानकर भी मेरे निकट नहीं आ रहा है; इसलिये उसे महान् दण्ड देना चाहिये, ऐसा मेरा विचार है ' ॥ ३ ९ ॥ यक्षाऊचुः
द्रुपदस्य सुता राजन् राज्ञो जाता शिखण्डिनी ।
तस्या निमित्ते कस्मिंश्चित् प्रादात् पुरुषलक्षणम् ॥ ४० ॥
अग्रहील्लक्षणं स्त्रीणां स्त्रीभूतो तिष्ठते गृहे ।
नोपसर्पति तेनासौ सव्रीडः स्त्रीसरूपवान् ॥ ४१ ॥
यक्षोंने कहा — राजन्! राजा द्रुपदके यहाँ एक शिखण्डिनी नामकी कन्या उत्पन्न हुई है । उसीको किसी विशेष कारणवश इन्होंने अपना पुरुषत्व दे दिया है और उसका स्त्रीत्व स्वयं ग्रहण कर लिया है । तबसे वे स्त्रीरूप होकर घरमें ही रहते हैं । स्त्रीरूपमें होनेके कारण ही वे लज्जावश आपके पास नहीं आ रहे हैं ॥
एतस्मात् कारणाद् राजन् स्थूणो न त्वाद्य सर्पति ।
श्रुत्वा कुरु यथान्यायं विमानमिह तिष्ठताम् ॥ ४२ ॥
महाराज! इसी कारणसे स्थूणाकर्ण आज आपके सामने नहीं उपस्थित हो रहे हैं । यह
सुनकर आप जैसा उचित समझें, करें । आज आपका विमान यहीं रहना चाहिये ॥
आनीयतां स्थूण इति ततो यक्षाधिपोऽब्रवीत् ।
पृष्ठ 1209
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
कर्तास्मि निग्रहं तस्य प्रत्युवाच पुनः पुनः ॥ ४३ ॥
तब यक्षराजने कहा — ‘ स्थूणाकर्णको यहाँ बुला ले आओ । मैं उसे दण्ड दूँगा' । यह बात उन्होंने बार- बार दुहरायी ॥ ४३ ॥
सोऽभ्यगच्छत यक्षेन्द्रमाहूतः पृथिवीपते ।
स्त्रीसरूपो महाराज तस्थौ व्रीडासमन्वितः ॥ ४४ ॥
राजन्! इस प्रकार बुलानेपर वह यक्ष कुबेरकी सेवामें गया । महाराज! वह स्त्रीस्वरूप धारण करनेके कारण लज्जामें डूबा हुआ उनके सामने खड़ा हो गया ॥ ४४ ॥
तं शशापाथ संक्रुद्धो धनदः कुरुनन्दन ।
एवमेव भवत्वद्य स्त्रीत्वं पापस्य गुह्यकाः ॥ ४५ ॥
कुरुनन्दन! उसे इस रूपमें देखकर कुबेर अत्यन्त कुपित हो उठे और शाप देते हुए बोले — ‘ गुह्यको! इस पापी स्थूणाकर्णका यह स्त्रीत्व अब ऐसा ही बना रहे ' ॥ ततोऽब्रवीद् यक्षपतिर्महात्मा यस्माददास्त्ववमन्येह यक्षान् । शिखण्डिने लक्षणं पापबुद्धे स्त्रीलक्षणं चाग्रहीः पापकर्मन् ॥ ४६ ॥
अप्रवृत्तं सुदुर्बुद्धे यस्मादेतत् त्वया कृतम् ।
तस्मादद्य प्रभृत्येव स्त्री त्वं सा पुरुषस्तथा ॥ ४७ ॥
तदनन्तर महात्मा यक्षराजने उस यक्षसे कहा –' पापबुद्धि और पापाचारी यक्ष! तूने यक्षोंका तिरस्कार करके यहाँ शिखण्डीको अपना पुरुषत्व दे दिया और उसका स्त्रीत्व ग्रहण कर लिया है। दुर्बुद्धे! तूने जो यह अव्यावहारिक कार्य कर डाला है, इसके कारण आजसे तू स्त्री ही बना रहे और शिखण्डी पुरुषरूपमें ही रह जाय ' ॥ ४६-४७ ॥
ततः प्रसादयामासुर्यक्षा वैश्रवणं किल ।
स्थूणस्यार्थे कुरुष्वान्तं शापस्येति पुनः पुनः ॥ ४८ ॥
तब यक्षोंने अनुनय - विनय करके स्थूणाकर्णके लिये कुबेरको प्रसन्न किया और बारंबार आग्रहपूर्वक कहा — ‘ भगवन्! इस शापका अन्त कर दीजिये ' ॥ ४८ ॥
ततो महात्मा यक्षेन्द्रः प्रत्युवाचानुगामिनः ।
सर्वान् यक्षगणांस्तात शापस्यान्तचिकीर्षया ॥ ४ ९ ॥
तात! तब महात्मा यक्षराजने स्थूणाकर्णका अनुगमन करनेवाले उन समस्त यक्षोंसे उस शापका अन्त कर देनेकी इच्छासे इस प्रकार कहा— ॥ ४ ९ ॥
शिखण्डिनि हते यक्षाः स्वं रूपं प्रतिपत्स्यते ।
स्थूण यक्ष निरुद्वेगो भवत्विति महामनाः ॥ ५० ॥
इत्युक्त्वा भगवान् देवो यक्षराजः सुपूजितः ।
प्रययौ सहितः सर्वैर्निमेषान्तरचारिभिः ॥ ५१ ॥
पृष्ठ 1210
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
‘ यक्षो! शिखण्डीके मारे जानेपर यह स्थूणाकर्ण यक्ष अपना पूर्वरूप फिर प्राप्त कर लेगा । अतः अब इसे निर्भय हो जाना चाहिये । ' ऐसा कहकर महामना भगवान् यक्षराज कुबेर उन यक्षोंद्वारा अत्यन्त पूजित हो निमेषमात्रमें ही अभीष्ट स्थानपर पहुँच जानेवाले अपने समस्त सेवकोंके साथ वहाँसे चले गये ॥ ५०-५१ ॥
स्थूणस्तु शापं सम्प्राप्य तत्रैव न्यवसत् तदा ।
समये चागमत् तूर्णं शिखण्डी तं क्षपाचरम् ॥ ५२ ॥
उस समय कुबेरका शाप पाकर स्थूणाकर्ण वहीं रहने लगा । शिखण्डी पूर्वनिश्चित समयपर उस निशाचर स्थूणाकर्णके पास तुरंत आ गया ॥ ५२ ॥
सोऽभिगम्याब्रवीद् वाक्यं प्राप्तोऽस्मि भगवन्निति ।
तमब्रवीत् ततः स्थूणः प्रीतोऽस्मीति पुनः पुनः ॥ ५३ ॥
उसके निकट जाकर शिखण्डीने कहा- ' भगवन्! मैं आपकी सेवामें उपस्थित हूँ । ' तब स्थूणाकर्णने उससे बारंबार कहा - ' मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ, बहुत प्रसन्न हूँ ' ॥
आर्जवेनागतं दृष्ट्वा राजपुत्रं शिखण्डिनम् ।
सर्वमेव यथावृत्तमाचचक्षे शिखण्डिने ॥ ५४ ॥
राजकुमार शिखण्डीको सरलतापूर्वक आया हुआ देख उससे यक्षने अपना सारा वृत्तान्त ठीक- ठीक कह सुनाया ॥ ५४ ॥
यक्षउवाच
शप्तो वैश्रवणेनाहं त्वत्कृते पार्थिवात्मज ।
गच्छेदानीं यथाकामं चर लोकान् यथासुखम् ॥ ५५ ॥
यक्षने कहा— राजकुमार! तुम्हारे लिये ही यक्षराजने मुझे शाप दे दिया है; अतः अब जाओ, इच्छानुसार सारे जगत्में सुखपूर्वक विचरो ॥ ५५ ॥
दिष्टमेतत् पुरा मन्ये न शक्यमतिवर्तितुम् ।
गमनं तव चेतो हि पौलस्त्यस्य च दर्शनम् ॥ ५६ ॥
मैं इसे अपना पुरातन प्रारब्ध ही मानता हूँ, जो कि तुम्हारा यहाँसे जाना और उसी
समय यक्षराज कुबेरका यहाँ आकर दर्शन देना हुआ । अब इसे टाला नहीं जा सकता ॥
भीष्म उवाच
एवमुक्तः शिखण्डी तु स्थूणयक्षेण भारत ।
प्रत्याजगाम नगरं हर्षेण महता वृतः ॥ ५७ ॥
भीष्म कहते हैं— भरतनन्दन! स्थूणाकर्ण यक्षके ऐसा कहनेपर शिखण्डी बड़े हर्षके साथ अपने नगरको लौट आया ॥ ५७ ॥
पूजयामास विविधैर्गन्धमाल्यैर्महाधनैः ।
द्विजातीन् देवताश्चैव चैत्यानथ चतुष्पथान् ॥ ५८ ॥