श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ३ — पृष्ठ 1191–1200

महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1191–1200

पृष्ठ 1191

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रानीने कहा — महाराज! भगवान् शिवका दिया हुआ वर किसी तरह मिथ्या नहीं होगा । भला, तीनों लोकोंकी सृष्टि करनेवाले भगवान् झूठी बात कैसे कह सकते हैं? राजन्! यदि आपको अच्छा लगे तो कहूँ । मेरी बात सुनिये । पृषतनन्दन! इसे सुनकर अपनी बुद्धिके अनुसार ग्रहण करें ॥ ५-६ ॥

क्रियतामस्य यत्नेन विधिवद् दारसंग्रहः ।

भविता तद्वचः सत्यमिति मे निश्चिता मतिः ॥ ७ ॥

मेरा तो यह दृढ़ विश्वास है कि भगवान्‌का वचन सत्य होगा । अतः आप प्रयत्नपूर्वक शास्त्रीय विधिके अनुसार इसका कन्याके साथ विवाह कर दें ॥ ७ ॥

ततस्तौ निश्चयं कृत्वा तस्मिन् कार्येऽथ दम्पती ।

वरयांचक्रतुः कन्यां दशार्णाधिपतेः सुताम् ॥ ८ ॥

इस प्रकार विवाहका निश्चय करके दोनों पति- पत्नीने दशार्णराजकी पुत्रीका अपने पुत्रके लिये वरण किया ॥ ८ ॥

ततो राजा द्रुपदो राजसिंहः सर्वान् राज्ञ कुलतः संनिशाम्य । दाशार्णकस्य नृपतेस्तनूजां शिखण्डिने वरयामास दारान् ॥ ९ ॥

तदनन्तर राजाओंमें श्रेष्ठ द्रुपदने समस्त राजाओंके कुल आदिका परिचय सुनकर दशार्णराजकी ही पुत्रीका शिखण्डीके लिये वरण किया ॥ ९ ॥

हिरण्यवर्मेति नृपो योऽसौ दाशार्णकः स्मृतः ।

स च प्रादान्महीपालः कन्यां तस्मै शिखण्डिने ॥ १० ॥

दशार्णदेशके राजाका नाम हिरण्यवर्मा था । भूपाल हिरण्यवर्माने शिखण्डीको अपनी कन्या दे दी ॥ १० ॥

स च राजा दशार्णेषु महानासीत् सुदुर्जयः ।

हिरण्यवर्मा दुर्धर्षो महासेनो महामनाः ॥ ११ ॥

दशार्णदेशका वह राजा हिरण्यवर्मा महान् दुर्जय और दुर्धर्ष वीर था । उसके पास विशाल सेना थी । साथ ही उसका हृदय भी विशाल था ॥ ११ ॥

कृते विवाहे तु तदा सा कन्या राजसत्तम ।

यौवनं समनुप्राप्ता सा च कन्या शिखण्डिनी ॥ १२ ॥

कृतदारः शिखण्डी च काम्पिल्यं पुनरागमत् ।

ततः सा वेद तां कन्यां कञ्चित् कालं स्त्रियं किल ॥ १३ ॥

नृपश्रेष्ठ! हिरण्यवर्माकी पुत्री भी युवावस्थाको प्राप्त थी । इधर द्रुपदकी कन्या शिखण्डिनी भी पूर्ण युवती हो गयी थी । विवाहकार्य सम्पन्न हो जानेपर पत्नीसहित

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शिखण्डी पुनः काम्पिल्य नगरमें आया । दशार्णराजकी कन्याने कुछ ही दिनोंमें यह समझ लिया कि शिखण्डी तो स्त्री है ॥ १२-१३ ॥ हिरण्यवर्मणः कन्या ज्ञात्वा तां तु शिखण्डिनीम् ।

धात्रीणां च सखीनां च व्रीडमाना न्यवेदयत् ।

कन्यां पञ्चालराजस्य सुतां तां वै शिखण्डिनीम् ॥ १४ ॥

हिरण्यवर्माकी पुत्रीने शिखण्डीके यथार्थ स्वरूपको जानकर अपनी धाय तथा सखियोंसे लजाते - लजाते यह गुप्त बात कह दी कि पांचालराजके पुत्र शिखण्डी वास्तवमें पुरुष नहीं, स्त्री हैं ॥ १४ ॥

ततस्ता राजशार्दूल धात्र्यो दाशार्णिकास्तदा ।

जग्मुरार्तिं परां प्रेष्याः प्रेषयामासुरेव च ॥ १५ ॥

नृपश्रेष्ठ! यह सुनकर दशार्णदेशकी धायोंको बड़ा दुःख हुआ । उन्होंने यह समाचार सूचित करनेके लिये बहुत- सी दासियोंको दशार्णराजके यहाँ भेजा ॥ १५ ॥

ततो दशार्णाधिपतेः प्रेष्याः सर्वा न्यवेदयन् ।

विप्रलम्भं यथावृत्तं स च चुक्रोध पार्थिवः ॥ १६ ॥

वे सब दासियाँ दशार्णराजसे सब बातें ठीक -ठीक बताती हुई बोलीं कि ' राजा द्रुपदने

बहुत बड़ा धोखा दिया है' । यह सुनकर दशार्णराज अत्यन्त कुपित हो उठे ॥ १६ ॥

शिखण्ड्यपि महाराज पुंवद् राजकुले तदा ।

विजहार मुदा युक्तः स्त्रीत्वं नैवातिरोचयन् ॥ १७ ॥

महाराज! शिखण्डी भी उस राजपरिवारमें पुरुषकी ही भाँति आनन्दपूर्वक घूमता-फिरता था । उसे अपना स्त्रीत्व अच्छा नहीं लगता था ॥ १७ ॥

ततः कतिपयाहस्य तच्छ्रुत्वा भरतर्षभ ।

हिरण्यवर्मा राजेन्द्र रोषादार्तिं जगाम ह ॥ १८ ॥

भरतश्रेष्ठ! राजेन्द्र! तदनन्तर कुछ दिनोंमें उसके स्त्री होनेका समाचार सुनकर हिरण्यवर्मा क्रोधसे पीड़ित हो गया ॥ १८ ॥

ततो दाशार्णको राजा तीव्रकोपसमन्वितः ।

दूतं प्रस्थापयामास द्रुपदस्य निवेशनम् ॥ १ ९ ॥

तदनन्तर दशार्णराजने दुःसह क्रोधसे युक्त हो राजा द्रुपदके दरबारमें दूत भेजा ॥ १ ९ ॥

ततो द्रुपदमासाद्य दूतः काञ्चनवर्मणः ।

एक एकान्तमुत्सार्य रहो वचनमब्रवीत् ॥ २० ॥

हिरण्यवर्माका वह दूत द्रुपदके पास पहुँचकर अकेला एकान्तमें सबको हटाकर केवल राजासे इस प्रकार बोला- ॥ २० ॥

दाशार्णराजो राजंस्त्वामिदं वचनमब्रवीत् ।

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अभिषङ्गात् प्रकुपितो विप्रलब्धस्त्वयानघ ॥ २१ ॥

‘ निष्पाप नरेश! आपने दशार्णराजको धोखा दिया है । आपके द्वारा किये गये अपमानसे उनका क्रोध बहुत बढ़ गया है । उन्होंने आपसे कहनेके लिये यह संदेश भेजा ॥ २१ ॥

अवमन्यसे मां नृपते नूनं दुर्मन्त्रितं तव ।

यन्मे कन्यां स्वकन्यार्थे मोहाद् याचितवानसि ॥ २२ ॥

तस्याद्य विप्रलम्भस्य फलं प्राप्नुहि दुर्मते ।

एष त्वां सजनामात्यमुद्धरामि स्थिरो भव ॥ २३ ॥

‘ नरेश्वर! तुमने जो मेरा अपमान किया है, वह निश्चय ही तुम्हारे खोटे विचारका परिचय है । तुमने मोहवश अपनी पुत्रीके लिये मेरी पुत्रीका वरण किया था । दुर्मते! उस ठगी और वंचनाका फल अब तुम्हें शीघ्र ही प्राप्त होगा, धीरज रखो । मैं अभी सेवकों और मन्त्रियोंसहित तुम्हें जड़मूलसहित उखाड़ फेकता हूँ' ॥ २२-२३ ॥ इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि हिरण्यवर्मदूतागमने एकोननवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्वमें हिरण्यवर्माके दूतका आगमनविषयक एक सौ नवासीवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १८९ ॥

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नवत्यधिकशततमोऽध्यायः हिरण्यवर्माके आक्रमणके भयसे घबराये हुए द्रुपदका अपनी महारानीसे संकटनिवारणका उपाय पूछना भीष्म उवाच

एवमुक्तस्य दूतेन द्रुपदस्य तदा नृप ।

चोरस्येव गृहीतस्य न प्रावर्तत भारती ॥ १ ॥।

भीष्मजी कहते हैं - राजन्! दूतके ऐसा कहनेपर पकड़े गये चोरकी भाँति राजा द्रुपदके मुखसे सहसा कोई बात नहीं निकली ॥ १ ॥

स यत्नमकरोत् तीव्रं सम्बन्धिन्यनुमानने ।

दूतैर्मधुरसम्भाषैर्न तदस्तीति संदिशन् ॥ २ ॥

उन्होंने मधुरभाषी दूतोंके द्वारा यह संदेश देकर कि ' ऐसी बात नहीं है ( आपको धोखा नहीं दिया गया है ) ' अपने सम्बन्धीको मनानेका दुष्कर प्रयत्न किया ॥

स राजा भूय एवाथ ज्ञात्वा तत्त्वमथागमत् ।

कन्येति पाञ्चालसुतां त्वरमाणो विनिर्ययौ ॥ ३ ॥

राजा हिरण्यवर्माने जब पुनः पता लगाया तो पांचालराजकी पुत्री शिखण्डिनी कन्या ही है, यह बात ठीक जान पड़ी । इससे रुष्ट होकर उन्होंने बड़ी उतावलीके साथ द्रुपदपर आक्रमण करनेका निश्चय किया ॥ ३ ॥

ततः सम्प्रेषयामास मित्राणाममितौजसाम् ।

दुहितुर्विप्रलम्भं तं धात्रीणां वचनात् तदा ॥ ४ ॥

तदनन्तर राजाने धायोंके कथनानुसार अपनी कन्याको द्रुपदके द्वारा धोखा दिये जानेका समाचार अमिततेजस्वी मित्र राजाओंके पास भेजा ॥ ४ ॥

ततः समुदयं कृत्वा बलानां राजसत्तमः ।

अभियाने मतिं चक्रे द्रुपदं प्रति भारत ॥ ५ ॥

भारत! इसके बाद नृपश्रेष्ठ हिरण्यवर्माने सैन्य- संग्रह करके राजा द्रुपदके ऊपर चढ़ाई करनेका निश्चय किया ॥ ५ ॥

ततः सम्मन्त्रयामास मन्त्रिभिः स महीपतिः ।

हिरण्यवर्मा राजेन्द्र पाञ्चाल्यं पार्थिवं प्रति ॥ ६ ॥

राजेन्द्र! फिर राजा हिरण्यवर्माने अपने मन्त्रियोंके साथ बैठकर परामर्श किया कि मुझे पांचालनरेशके साथ कैसा बर्ताव करना चाहिये ॥ ६ ॥

तत्र वै निश्चितं तेषामभूद् राज्ञां महात्मनाम् ।

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तथ्यं भवति चेदेतत् कन्या राजन् शिखण्डिनी ॥ ७ ॥

बद्ध्वा पञ्चालराजानमानयिष्यामहे गृहम् ।

अन्यं राजानमाधाय पञ्चालेषु नरेश्वरम् ॥ ८ ॥

घातयिष्याम नृपतिं पाञ्चालं सशिखण्डिनम् ॥ ९ ॥

वहाँ महामना मित्र राजाओंका यह निश्चय घोषित हुआ कि राजन्! यदि यह सत्य सिद्ध हुआ कि शिखण्डी वास्तवमें पुत्र नहीं कन्या है, तब हमलोग पांचालराजको कैद करके अपने घरको ले आयेंगे और पांचालदेशके राज्यपर दूसरे किसी राजाको बिठाकर शिखण्डीसहित द्रुपदको मरवा डालेंगे ॥ ७-९ ॥

तत् तथाभूतमाज्ञाय पुनर्दूतान्नराधिपः ।

प्रास्थापयत् पार्षताय निहन्मीति स्थिरो भव ॥ १० ॥

फिर दूतके मुखसे उस समाचारको यथार्थ जानकर राजा हिरण्यवर्माने द्रुपदके पास दूत भेजा । स्थिर रहो ( सावधान हो जाओ), मैं कुछ ही दिनोंमें तुम्हारा संहार कर डालूँगा ॥ १० ॥

भीष्म उवाच

स हि प्रकृत्या वै भीतः किल्विषी च नराधिपः ।

भयं तीव्रमनुप्राप्तो द्रुपदः पृथिवीपतिः ॥ ११ ॥

भीष्म कहते हैं - राजा द्रुपद उन दिनों स्वभावसे ही भीरु थे । फिर उनके द्वारा अपराध भी बन गया था । अतः उन्होंने बड़े भारी भयका अनुभव किया ॥ ११ ॥

विसृज्य दूतान् दाशार्णे द्रुपदः शोकमूर्च्छितः ।

समेत्य भार्यां रहिते वाक्यमाह नराधिपः ॥ १२ ॥

राजा द्रुपदने दशार्णनरेशके पास दूतोंको भेजकर शोकसे अधीर हो एकान्त स्थानमें अपनी पत्नीसे मिलकर इस विषयमें बातचीत करनेकी इच्छा की ॥ १२ ॥

भयेन महताऽऽविष्टो हृदि शोकेन चाहतः ।

पाञ्चालराजो दयितां मातरं वै शिखण्डिनः ॥ १३ ॥

पांचालराजके हृदयमें बड़ा भारी भय समा गया था । वे शोकसे पीड़ित थे । अतः उन्होंने अपनी प्यारी पत्नी शिखण्डीकी मातासे इस प्रकार कहा- ॥ १३ ॥

अभियास्यति मां कोपात् सम्बन्धी सुमहाबलः ।

हिरण्यवर्मा नृपतिः कर्षमाणो वरूथिनीम् ॥ १४ ॥

'देवि! मेरे महाबली सम्बन्धी हिरण्यवर्मा क्रोधवश अपनी विशाल सेना लाकर मेरे ऊपर आक्रमण करेंगे ॥ १४ ॥

किमिदानीं करिष्यावो मूढौ कन्यामिमां प्रति ।

शिखण्डी किल पुत्रस्ते कन्येति परिशङ्कितः ॥ १५ ॥

पृष्ठ 1196

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‘ इस समय हम दोनों क्या करें? इस कन्याके प्रश्नको लेकर हमलोग किंकर्तव्यविमूढ़ हो रहे हैं । सम्बन्धीके मनमें यह शंका दृढमूल हो गयी है कि तुम्हारा पुत्र शिखण्डी वास्तवमें कन्या है ॥ १५ ॥

इति संचिन्त्य यत्नेन समित्रः सबलानुगः ।

वञ्चितोऽस्मीति मन्वानो मां किलोद्धर्तुमिच्छति ॥ १६ ॥

किमत्र तथ्यं सुश्रोणि मिथ्या किं ब्रूहि शोभने ।

श्रुत्वा त्वत्तः शुभं वाक्यं संविधास्याम्यहं तथा ॥ १७ ॥

' यह सोचकर वे ऐसा मानने लगे हैं कि मेरे साथ धोखा किया गया है और इसलिये वे अपने मित्रों, सैनिकों तथा सेवकोंसहित आकर मुझे यत्नपूर्वक उखाड़ फेंकना चाहते हैं । सुश्रोणि! यहाँ क्या सच है और क्या झूठ? शोभने! इस बातको तुम्हीं बताओ । तुम्हारे मुखसे निकले हुए शुभ वचनको सुनकर मैं वैसा ही करूँगा ॥ १६-१७ ॥

अहं हि संशयं प्राप्तो बाला चेयं शिखण्डिनी ।

त्वं च राज्ञि महत् कृच्छ्रं सम्प्राप्ता वरवर्णिनि ॥ १८ ॥

' रानी! मेरा जीवन संशयमें पड़ गया है । यह शिखण्डिनी भी बालिका ही है । सुन्दरि! तुम भी महान् संकटमें फँस गयी हो ॥ १८ ॥

सा त्वं सर्वविमोक्षाय तत्त्वमाख्याहि पृच्छतः ।

तथा विदध्यां सुश्रोणि कृत्यमाशु शुचिस्मिते ॥ १ ९ ॥

सुश्रोणि! मैं पूछ रहा हूँ । सबको संकटसे छुड़ानेके लिये कोई यथार्थ उपाय बताओ ।

शुचिस्मिते! मैं उस उपायको शीघ्र ही काममें लाऊँगा ॥ १ ९ ॥

शिखण्डिनि च मा भैस्त्वं विधास्ये तत्र तत्त्वतः ।

कृपयाहं वरारोहे वञ्चितः पुत्रधर्मतः ॥ २० ॥

‘ सुन्दर अंगोंवाली महारानी! तुम शिखण्डीके विषयमें भय मत करो । मैं दया करके वही कार्य करूँगा, जो वस्तुतः हितकारक होगा, मैं स्वयं पुत्रधर्मसे वंचित हो गया हूँ ॥

मया दाशार्णको राजा वञ्चितः स महीपतिः ।

तदाचक्ष्व महाभागे विधास्ये तत्र यद्धितम् ॥ २१ ॥

‘ और मैंने दशार्णनरेश महाराज हिरण्यवर्माको भी वंचित किया है । अतः महाभागे! इस अवसरपर तुम्हारी दृष्टिमें जो हितकारक कार्य हो, उसे बताओ। मैं उसका अनुष्ठान करूँगा' ॥ २१ ॥

जानता हि नरेन्द्रेण ख्यापनार्थं परस्य वै ।

प्रकाशं चोदिता देवी प्रत्युवाच महीपतिम् ॥ २२ ॥

यद्यपि राजा द्रुपद सब कुछ जानते थे तो भी दूसरे लोगोंमें अपनी निर्दोषता सिद्ध करनेके लिये महारानीसे स्पष्ट शब्दोंमें पूछा । उनके प्रश्न करनेपर रानीने राजाको इस प्रकार उत्तर दिया ॥ २२ ॥

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इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि द्रुपदप्रश्ने नवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १ ९ ० ॥ इसप्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्वमें द्रुपदप्रश्नविषयक एक सौ नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ९० ॥

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महाभारत — खण्ड ३, पृष्ठ 1198 का मूल पृष्ठ
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एकनवत्यधिकशततमोऽध्यायः द्रुपदपत्नीका उत्तर, द्रुपदके द्वारा नगररक्षाकी व्यवस्था और देवाराधन तथा शिखण्डिनीका वनमें जाकर स्थूणाकर्ण नामक यक्षसे अपने दुःखनिवारणके लिये प्रार्थना करना भीष्म उवाच

ततः शिखण्डिनो माता यथातत्त्वं नराधिप ।

आचचक्षे महाबाहो भर्त्रे कन्यां शिखण्डिनीम् ॥ १ ॥

भीष्मजी कहते हैं - महाबाहु नरेश्वर! तब शिखण्डीकी माताने अपने पतिसे यथार्थ रहस्य बताते हुए कहा—' यह पुत्र शिखण्डी नहीं, शिखण्डिनी नामवाली कन्या है ॥ १ ॥

अपुत्रया मया राजन् सपत्नीनां भयादिदम् ।

कन्या शिखण्डिनी जाता पुरुषो वै निवेदिता ॥ २ ॥

' राजन्! पुत्ररहित होनेके कारण मैंने अपनी सौतोंके भयसे इस कन्या शिखण्डिनीके जन्म लेनेपर भी इसे पुत्र ही बताया ॥ २ ॥

त्वया चैव नरश्रेष्ठ तन्मे प्रीत्यानुमोदितम् ।

पुत्रकर्म कृतं चैव कन्यायाः पार्थिवर्षभ ॥ ३ ॥

' नरश्रेष्ठ! आपने भी प्रेमवश मेरे इस कथनका अनुमोदन किया और महाराज! कन्या होनेपर भी आपने इसका पुत्रोचित संस्कार किया ॥ ३ ॥

भार्या चोढा त्वया राजन् दशार्णाधिपतेः सुता ।

मया च प्रत्यभिहितं देववाक्यार्थदर्शनात् ।

कन्या भूत्वा पुमान् भावीत्येवं चैतदुपेक्षितम् ॥ ४ ॥

' राजन्! मेरे ही कथनपर विश्वास करके आप दशार्णराजकी पुत्रीको इसकी पत्नी बनानेके लिये ब्याह लाये । महादेवजीके वरदानवाक्यपर दृष्टि रखनेके कारण मैंने इसके विषयमें पुत्र होनेकी घोषणा की थी । महादेवजीने कहा था कि पहले कन्या होगी, फिर वही पुत्र हो जायगा । इसीलिये इस वर्तमान संकटकी उपेक्षा की गयी ' ॥ ४ ॥

एतच्छ्रुत्वा द्रुपदो यज्ञसेनः सर्वं तत्त्वं मन्त्रविद्भयो निवेद्य । मन्त्रं राजा मन्त्रयामास राजन् यथायुक्तं रक्षणे वै प्रजानाम् ॥ ५ ॥

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यह सुनकर यज्ञसेन द्रुपदने मन्त्रियोंको सब बातें ठीक - ठीक बता दीं । राजन्! तत्पश्चात् प्रजाकी रक्षाके लिये जैसी व्यवस्था उचित है, उसके लिये उन्होंने पुनः मन्त्रियोंके साथ गुप्त मन्त्रणा की ॥ ५ ॥

सम्बन्धकं चैव समर्थ्यं तस्मिन्

दाशार्णके वै नृपतौ नरेन्द्र ।

स्वयं कृत्वा विप्रलम्भं यथाव- न्मन्त्रैकाग्रो निश्चयं वै जगाम ॥ ६ ॥

नरेन्द्र! यद्यपि राजा द्रुपदने स्वयं ही वंचना की थी, तथापि दशार्णराजके साथ सम्बन्ध और प्रेम बनाये रखनेकी इच्छा करके एकाग्रचित्तसे मन्त्रणा करते हुए वे एक निश्चयपर पहुँच गये ॥ ६ ॥

स्वभावगुप्तं नगरमापत्काले तु भारत ।

गोपयामास राजेन्द्र सर्वतः समलंकृतम् ॥ ७ ॥

भरतनन्दन राजेन्द्र! यद्यपि वह नगर स्वभावसे ही सुरक्षित था, तथापि उस विपत्तिके समय उसको सब प्रकारसे सजा करके उन्होंने उसकी रक्षाके लिये विशेष व्यवस्था की ॥ ७ ॥

आर्तिं च परमां राजा जगाम सह भार्यया ।

दशार्णपतिना सार्धं विरोधे भरतर्षभ ॥ ८ ॥

भरतश्रेष्ठ! दशार्णराजके साथ विरोधकी भावना होनेपर रानीसहित राजा द्रुपदको बड़ा कष्ट हुआ ॥ ८ ॥

कथं सम्बन्धिना सार्धं न मे स्वाद् विग्रहो महान् ।

इति संचिन्त्य मनसा देवतामर्चयत् तदा ॥ ९ ॥

अपने सम्बन्धीके साथ मेरा महान् युद्ध कैसे टल जाय - यह मन - ही - मन विचार करके उन्होंने देवताकी अर्चना आस्मभ कर दी ॥ ९ ॥

तं तु दृष्ट्वा तदा राजन् देवी देवपरं तदा ।

अर्चां प्रयुञ्जानमथो भार्या वचनमब्रवीत् ॥ १० ॥

राजन्! राजा द्रुपदको देवाराधनमें तत्पर देख महारानीने पूजा चढ़ाते हुए नरेशसे इस प्रकार कहा— ॥ १० ॥

देवानां प्रतिपत्तिश्च सत्या साधुमता सदा ।

किमु दुःखार्णवं प्राप्य तस्मादर्चयतां गुरून् ॥ ११ ॥

दैवतानि च सर्वाणि पूज्यन्तां भूरिदक्षिणम् ।

अग्नयश्चापि हूयन्तां दाशार्णप्रतिषेधने ॥ १२ ॥

‘ देवताओंकी आराधना साधु पुरुषोंके लिये सदा ही सत्य ( उत्तम) है । फिर जो दुःखके

पृष्ठ 1200

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समुद्रमें डूबा हुआ हो, उसके लिये तो कहना ही क्या है । अतः आप गुरुजनों और सम्पूर्ण देवताओंका पूजन करें, ब्राह्मणोंको पर्याप्त दक्षिणा दें और दशार्णराजके लौट जानेके लिये अग्नियोंमें होम करें ॥ ११-१२ ॥

अयुद्धेन निवृत्तिं च मनसा चिन्तय प्रभो ।

देवतानां प्रसादेन सर्वमेतद् भविष्यति ॥ १३ ॥

' प्रभो! मन- ही- मन यह चिन्तन कीजिये कि दशार्णराज बिना युद्ध किये ही लौट जायँ ।

देवताओंके कृपाप्रसादसे यह सब कुछ सिद्ध हो जायगा ॥ १३ ॥

मन्त्रिभिर्मन्त्रितं सार्धं त्वया पृथुललोचन ।

पुरस्यास्याविनाशाय यच्च राजंस्तथा कुरु ॥ १४ ॥

‘ विशाललोचन नरेश! आपने इस नगरकी रक्षाके लिये मन्त्रियोंके साथ जैसा विचार किया है वैसा कीजिये ॥ १४ ॥

दैवं हि मानुषोपेतं भृशं सिद्धयति पार्थिव ।

परस्परविरोधाद्धि सिद्धिरस्ति न चैतयोः ॥ १५ ॥

' भूपाल! पुरुषार्थसे संयुक्त होनेपर ही दैव विशेषरूपसे सिद्धिको प्राप्त होता है । दैव और पुरुषार्थमें परस्पर विरोध होनपर इन दोनोंकी ही सिद्धि नहीं होती ॥ १५ ॥

तस्माद् विधाय नगरे विधानं सचिवैः सह ।

अर्चयस्व यथाकामं दैवतानि विशाम्पते ॥ १६ ॥

‘ राजन्! अतः आप मन्त्रियोंके साथ नगरकी रक्षाके लिये आवश्यक व्यवस्था करके इच्छानुसार देवताओंकी अर्चना कीजिये' ॥ १६ ॥

एवं संभाषमाणौ तु दृष्ट्वा शोकपरायणौ ।

शिखण्डिनी तदा कन्या व्रीडितेव तपस्विनी ॥ १७ ॥

ततः सा चिन्तयामास मत्कृते दुःखितावुभौ ।

इमाविति ततश्चक्रे मतिं प्राणविनाशने ॥ १८ ॥

इन दोनोंको इस प्रकार शोकमग्न होकर बातचीत करते देख उनकी तपस्विनी पुत्री शिखण्डिनी लज्जित -सी होकर इस प्रकार चिन्ता करने लगी- ' ये मेरे माता और पिता दोनों मेरे ही कारण दुःखी हो रहे हैं । ' ऐसा सोचकर उसने प्राण त्याग देनेका विचार किया ॥ १७-१८ ॥

एवं सा निश्चयं कृत्वा भृशं शोकपरायणा ।

निर्जगाम गृहं त्यक्त्वा गहनं निर्जनं वनम् ॥ १ ९ ॥

इस प्रकार जीवनका अन्त कर देनेका निश्चय करके वह अत्यन्त शोकमग्न हो घर छोड़कर निर्जन एवं गहन वनमें चली गयी ॥ १ ९ ॥

यक्षेणर्द्धिमता राजन् स्थूणाकर्णेन पालितम् ।

तद्भयादेव च जनो विसर्जयति तद् वनम् ॥ २० ॥