श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 1031–1040
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1031–1040
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सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः सेमलका हार स्वीकार करना तथा बलवान्के साथ वैर न करनेका उपदेश भीष्म उवाच
ततो निश्चित्य मनसा शाल्मलिः क्षुभितस्तदा ।
शाखाः स्कन्धान् प्रशाखाश्च स्वयमेव व्यशातयत् ॥ १ ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! मन- ही- मन ऐसा विचारकर सेमलने क्षुभित हो अपनी शाखाओं, डालियों तथा टहनियोंको स्वयं ही नीचे गिरा दिया ॥ १ ॥
स परित्यज्य शाखाश्च पत्राणि कुसुमानि च ।
प्रभाते वायुमायान्तं प्रत्यैक्षत वनस्पतिः ॥ २ ॥
वह वनस्पति अपनी शाखाओं, पत्तों और फूलोंको त्यागकर प्रातःकाल वायुके आनेकी प्रतीक्षा करने लगा ॥ २ ॥
ततः क्रुद्धः श्वसन् वायुः पातयन् वै महाद्रुमान् ।
आजगामाथ तं देशमास्ते यत्र स शाल्मलिः ॥ ३ ॥
तत्पश्चात् सबेरा होनेपर वायुदेव कुपित हो बड़े - बड़े वृक्षोंको धराशायी करते हुए उस स्थानपर आये, जहाँ वह सेमलका वृक्ष था ॥ ३ ॥
तं ही पर्णं पतिताग्रशाखं निशीर्णपुष्पं प्रसमीक्ष्य वायुः । उवाच वाक्यं स्मयमान एवं मुदा युतः शाल्मलिमुग्रशाखम् ॥ ४ ॥
वायुने देखा कि सेमलके पत्ते गिर गये हैं और उसकी श्रेष्ठ शाखाएँ धराशायी हो गयी हैं । यह फूलोंसे भी हीन हो चुका है, तब वे बड़े प्रसन्न हुए और जिसकी शाखाएँ पहले बड़ी भंयकर थीं, उस सेमलसे मुसकराते हुए इस प्रकार बोले ॥ ४ ॥
वायुरुवाच
अहमप्येवमेव त्वां कुर्वाणः शाल्मले रुषा ।
आत्मना यत्कृतं कृच्छ्रं शाखानामपकर्षणम् ॥ ५ ॥
हीनपुष्पाग्रशाखस्त्वं शीर्णांकुरपलाशकः ।
आत्मदुर्मन्त्रितेनेह मद्वीर्यवशगः कृतः ॥ ६ ॥
वायुने कहा — शाल्मले! मैं भी रोषमें भरकर तुम्हें ऐसा ही बना देना चाहता था । तुमने स्वयं ही यह कष्ट स्वीकार कर लिया है, तुम्हारी शाखाएँ गिर गयीं, फूल पत्ते, डालियाँ और
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अंकुर सभी नष्ट हो गये । तुमने अपनी ही कुमतिसे यह विपत्ति मोल ली है । तुम्हें मेरे बल और पराक्रमका शिकार बनना पड़ा है ॥ ५-६ ॥ भीष्म उवाच
एतच्छ्रुत्वा वचो वायोः शाल्मलिव्रडितस्तदा ।
अतप्यत वचः स्मृत्वा नारदो यत् तदाब्रवीत् ॥ ७ ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! वायुका यह वचन सुनकर सेमल उस समय लज्जित हो गया और नारदजीने जो कुछ कहा था, उसे याद करके वह बहुत पछताने लगा ॥ ७ ॥
एवं हि राजशार्दूल दुर्बलः सन् बलीयसा ।
वैरमारभते बालस्तप्यते शाल्मलिर्यथा ॥ ८ ॥
नृपश्रेष्ठ! इसी प्रकार जो मूर्ख मनुष्य स्वयं दुर्बल होकर किसी बलवान्के साथ वैर बाँध लेता है, वह सेमलके समान ही संतापका भागी होता है ॥ ८ ॥
तस्माद् वैरं न कुर्वीत दुर्बलो बलवत्तरैः ।
शोचेद्धि वैरं कुर्वाणो यथा वै शाल्मलिस्तथा ॥ ९ ॥
अतः दुर्बल मनुष्य बलवानोंके साथ वैर न करे । यदि वह करता है तो सेमलके समान ही शोचनीय दशाको पहुँचकर शोकमग्न होता है ॥ ९ ॥
न हि वैरं महात्मानो विवृण्वन्त्यपकारिषु ।
शनैः शनैर्महाराज दर्शयन्ति स्म ते बलम् ॥ १० ॥
महाराज! महामनस्वी पुरुष अपनी बुराई करने वालोंपर वैरभाव नहीं प्रकट करते हैं ।
वे धीरे- धीरे ही अपना बल दिखाते हैं ॥ १० ॥
वैरं न कुर्वीत नरो दुर्बुद्धिर्बुद्धिजीविना ।
बुद्धिर्बुद्धिमतो याति तृणेष्विव हुताशनः ॥ ११ ॥
खोटी बुद्धिवाला मनुष्य किसी बुद्धिजीवी पुरुषसे वैर न बाँधे; क्योंकि घास--फूँसपर फैलनेवाली आगके समान बुद्धिमानोंकी बुद्धि सर्वत्र पहुँच जाती है ॥ ११ ॥
न हि बुद्धया सम किंचिद् विद्यते पुरुषे नृप ।
तथा बलेन राजेन्द्र न समोऽस्तीह कश्चन ॥ १२ ॥
नरेश्वर! राजेन्द्र! पुरुषमें बुद्धिके समान दूसरी कोई वस्तु नहीं है । संसारमें जो बुद्धि-बलसे युक्त है, उसकी समानता करनेवाला दूसरा कोई पुरुष नहीं है ॥ १२ ॥
तस्मात् क्षमेत बालाय जडान्धबधिराय च ।
बलाधिकाय राजेन्द्र तद् दृष्टं त्वयि शत्रुहन् ॥ १३ ॥
शत्रुओंका नाश करनेवाले राजेन्द्र! इसलिये जो बालक, जड, अन्ध, बधिर, तथा बलमें अपनेसे बढ़ा - चढ़ा हो, उसके द्वारा किये गये प्रतिकूल बर्ताव को भी क्षमा कर देना चाहिये; यह क्षमाभाव तुम्हारे भीतर विद्यमान है ॥ १३ ॥
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अक्षौहिण्यो दशैका च सप्त चैव महाद्युते ।
बलेन न समा राजन्नर्जुनस्य महात्मनः ॥ १४ ॥
महातेजस्वी नरेश! अठारह अक्षौहिणी सेनाएँ भी बलमें महात्मा अर्जुनके समान नहीं ॥ १४ ॥
निहताश्चैव भग्नाश्च पाण्डवेन यशस्विना ।
चरता बलमास्थाय पाकशासनिना मृधे ॥ १५ ॥
इन्द्र और पाण्डुके यशस्वी पुत्र अर्जुनने अपने बलका भरोसा करते हुए युद्धमें विचरते हुए यहाँ उन समस्त सेनाओंको मार डाला और भगा दिया ॥ १५ ॥
उक्ताश्च ते राजधर्मा आपद्धर्माश्च भारत ।
विस्तरेण महाराज किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ १६ ॥
भरतनन्दन! महाराज! मैंने तुमसे राजधर्म और आपद्धर्मका विस्तारपूर्वक वर्णन किया है, अब और क्या सुनना चाहते हो ॥ १६ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि पवनशाल्मलिसंवादे सप्तपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें पवन-शाल्मलिसंवादविषयक एक सौ सत्तावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५७ ॥
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अष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः समस्त अनर्थोंका कारण लोभको बताकर उससे होनेवाले विभिन्न पापोंका वर्णन तथा श्रेष्ठ महापुरुषोंके लक्षण युधिष्ठिर उवाच
पापस्य यदधिष्ठानं यतः पापं प्रवर्तते ।
एतदिच्छाम्यहं श्रीतुं तत्त्वेन भरतर्षभ ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भरतश्रेष्ठ! मैं यथार्थरूपसे यह सुनना चाहता हूँ कि पापका अधिष्ठान क्या है और किससे उसकी प्रवृत्ति होती है? ॥ १ ॥
भीष्मउवाच
पापस्य यदधिष्ठानं तच्छृणुष्व नराधिप ।
एको लोभो महाग्राहो लोभात् पापं प्रवर्तते ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा- नरेश्वर! पापका जो अधिष्ठान है, उसे सुनो । एकमात्र लोभ ही पापका अधिष्ठान है । वह मनुष्यको निगल जानेके लिये एक बड़ा ग्राह है । लोभसे ही पापकी प्रवृत्ति होती है ॥ २ ॥
अतः पापमधर्मश्च यथा दुःखमनुत्तमम् ।
निकृत्या मूलमेतद्धि येन पापकृतो जनाः ॥ ३ ॥
लोभसे ही पाप, अधर्म तथा महान् दुःखकी उत्पत्ति होती है । शठता तथा छल-कपटका भी मूल कारण लोभ ही है । इसीके कारण मनुष्य पापाचारी हो जाते हैं ॥ ३ ॥
लोभात् क्रोधः प्रभवति लोभात् कामः प्रवर्तते ।
लोभान्मोहश्च माया च मानः स्तम्भः परासुता ॥ ४ ॥
लोभसे ही क्रोध प्रकट होता है, लोभसे ही कामकी प्रवृत्ति होती है और लोभसे ही माया, मोह, अभिमान उद्दण्डता तथा पराधीनता आदि दोष प्रकट होते हैं ॥ ४ ॥
अक्षमा ह्रीपरित्यागः श्रीनाशो धर्मसंक्षयः ।
अभिध्याप्रख्यता चैव सर्वं लोभात् प्रवर्तते ॥ ५ ॥
असहनशीलता, निर्लज्जता, सम्पत्तिनाश, धर्मक्षय, चिन्ता और अपयश – ये सब लोभसे ही सम्भव होते हैं ॥ ५ ॥
अत्यागश्चातितर्षश्च विकर्मसु च याः क्रियाः ।
कुलविद्यामदश्चैव रूपैश्वर्यमदस्तथा ॥ ६ ॥
सर्वभूतेष्वभिद्रोहः सर्वभूतेष्वसत्कृतिः ।
सर्वभूतेष्वविश्वासः सर्वभूतेष्वनार्जवम् ॥ ७ ॥
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लोभसे ही कृपणता, अत्यन्त तृष्णा, शास्त्रविरुद्ध कर्मोंमें प्रवृत्ति, कुल और विद्याविषयक अभिमान, रूप और ऐश्वर्यका मद, समस्त प्राणियोंके प्रति द्रोह, सबका तिरस्कार, सबके प्रति अविश्वास तथा कुटिलतापूर्ण बर्ताव होते हैं ॥ ६-७ ॥
हरणं परवित्तानां परदाराभिमर्शनम् ।
वाग्वेगो मनसो वेगो निन्दावेगस्तथैव च ॥ ८ ॥
उपस्थोदरयोर्वेगो मृत्युवेगश्च दारुणः ।
ईर्ष्यावेगश्च बलवान् मिथ्यावेगश्च दुर्जयः ॥ ९ ॥
रसवेगश्च दुर्वार्यः श्रोत्रवेगश्च दुःसहः ।
कुत्सा विकत्था मात्सर्यं पापं दुष्करकारिता ॥ १० ॥
साहसानां च सर्वेषामकार्याणां क्रियास्तथा । पराये धनका अपहरण, परायी स्त्रियोंके प्रति बलात्कार, वाणीका वेग, मनका वेग, निन्दा करनेकी विशेष प्रवृत्ति, जननेन्द्रियका वेग, उदरका वेग, मृत्युका भयंकर वेग अर्थात् आत्महत्या, ईर्ष्याका प्रबल वेग, मिथ्या का दुर्जय वेग, अनिवार्य रसनेन्द्रियका वेग, दुःसह श्रोत्रेन्द्रियका वेग, घृणा, अपनी प्रशंसाके लिये बढ़ - बढ़कर बातें बनाना, मत्सरता, पाप, दुष्कर कर्मोंमें प्रवृत्ति, न करने योग्य कार्य कर बैठना– इन सबका कारण भी लोभ ही है ॥ ८–१० ॥ जातौ बाल्ये च कौमारे यौवने चापि मानवाः ॥ ११ ॥
न संत्यजन्त्यात्मकर्म यो न जीर्यति जीर्यतः ।
यो न पूरयितुं शक्यो लोभः प्राप्त्या कुरूद्वह ॥ १२ ॥
नित्यं गम्भीरतोयाभिरापगाभिरिवोदधिः । कुरुश्रेष्ठ! मनुष्य जन्मकालमें, बाल्यावस्थामें तथा कौमार और यौवनावस्थामें जिसके कारण अपने बुरे कर्मोंको छोड़ नहीं पाते हैं, जो मनुष्यके वृद्ध होनेपर भी जीर्ण नहीं होता, वह लोभ ही है । जिस प्रकार गहरे जलवाली बहुत- सी नदियोंके मिल जानेसे भी समुद्र नहीं भरता है, उसी प्रकार कितने ही पदार्थोंका लाभ क्यों न हो जाय, लोभका पेट कभी नहीं भरता है ॥ ११-१२३ ॥ न प्रहृष्यति यो लाभैः कामैर्यश्च न तृप्यति ॥ १३ ॥
यो न देवैर्न गन्धर्वैर्नासुरैर्न महोरगैः ।
ज्ञायते नृप तत्त्वेन सर्वैर्भूतगणैस्तथा ॥ १४ ॥
लोभी मनुष्य बहुत - सा लाभ पाकर भी संतुष्ट नहीं होता । भोगोंसे वह कभी तृप्त नहीं होता । नरेश्वर! न देवताओं, न गन्धर्वों, न असुरों, न बड़े- बड़े नागों और न सम्पूर्ण भूतगणोंद्वारा ही लोभका स्वरूप यथार्थ-रूपसे जाना जाता है ॥ १३-१४ ॥
स लोभः सह मोहेन विजेतव्यो जितात्मना ।
दम्भो द्रोहश्च निन्दा च पैशुन्यं मत्सरस्तथा ॥ १५ ॥
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भवन्त्येतानि कौरव्य लुब्धानामकृतात्मनाम् । जिसने अपने मन और इन्द्रियोंको काबू कर लिया है, उस पुरुषको चाहिये कि वह मोहसहित लोभको जीते । कुरुनन्दन! दम्भ, द्रोह, निन्दा, चुगली, और मत्सरता — ये सभी दोष अजितात्मा लोभी पुरुषोंमें ही होते हैं ॥ १५३ ॥
सुमहान्त्यपि शास्त्राणि धारयन्ति बहुश्रुताः ॥ १६ ॥
छेत्तारः संशयानां च क्लिश्यन्तीहाल्पबुद्धयः । बहुश्रुत विद्वान् बड़े - बड़े शास्त्रोंको कण्ठस्थ कर लेते हैं । सबकी शंकाओंका निवारण कर देते हैं; परंतु इस लोभमें फँसकर उनकी बुद्धि मारी जाती है और वे निरन्तर क्लेश उठाते रहते हैं ॥ १६ ॥
द्वेषक्रोधप्रसक्ताश्च शिष्टाचारबहिष्कृताः ॥ १७ ॥
अन्तःक्रूरा वाङ्मधुराः कूपाश्छन्नास्तृणैरिव ।
धर्मवैतंसिकाः क्षुद्रा मुष्णन्ति ध्वजिनो जगत् ॥ १८ ॥
वे दोष और क्रोधमें फँसकर शिष्टाचारको छोड़ देते हैं और ऊपरसे मीठे वचन बोलते हुए भी भीतरसे अत्यन्त कठोर हो जाते हैं । उनकी स्थिति घास - फूँससे ढके हुए कुएँके समान होती है । वे धर्मके नामपर संसारको धोखा देनेवाले क्षुद्र मनुष्य धर्मध्वजी होकर ( धर्मका ढोंग फैलाकर ) जगत्को लूटते हैं ॥ १७-१८ ॥
कुर्वते च बहून् मार्गांस्तान् हेतुबलमाश्रिताः ।
सतां मार्गान् विलुम्पन्ति लोभाज्ञानेषु निष्ठिताः ॥ १ ९ ॥
युक्तिबलका आश्रय लेकर बहुत-से असत् मार्ग खड़े कर देते हैं तथा लोभ और अज्ञानमें स्थित हो सत्पुरुषोंके स्थापित किये हुए मार्गों ( धर्ममर्यादाओं ) का नाश करने लगते हैं ॥ १ ९ ॥
धर्मस्य ह्रियमाणस्य लोभग्रस्तैर्दुरात्मभिः ।
या या विक्रियते संस्था ततः सापि प्रपद्यते ॥ २० ॥
लोभग्रस्त दुरात्मा पुरुषोंद्वारा अपहृत ( विकृत ) होनेवाले धर्मकी जो -जो स्थिति बिगड़ जाती या बदल जाती है, वह उसी रूपमें प्रचलित हो जाती है ॥ २० ॥
दर्पः क्रोधो मदः स्वप्नो हर्षः शोकोऽतिमानिता ।
एत एव हि कौरव्य दृश्यन्ते लुब्धबुद्धिषु ॥ २१ ॥
कुरुनन्दन! जिनकी बुद्धि लोभमें फँसी हुई है, उन मनुष्योंमें दर्प, क्रोध, मद, दुःस्वप्न, हर्ष, शोक तथा अत्यन्त अभिमान- ये ही दोष दिखायी देते हैं ॥ २१ ॥
एतानशिष्टान् बुध्यस्व नित्यं लोभसमन्वितान् ।
शिष्टांस्तु परिपृच्छेथा यान् वक्ष्यामि शुचिव्रतान् ॥ २२ ॥
जो सदा लोभमें डूबे रहते हैं, ऐसे ही मनुष्योंको तुम अशिष्ट समझो। तुम्हें शिष्ट पुरुषोंसे ही अपनी शंकाएँ पूछनी चाहिये । पवित्र नियमोंका पालन करनेवाले उन शिष्ट पुरुषोंका मैं
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परिचय दे रहा हूँ ॥ २२ ॥
येष्वावृत्तिभयं नास्ति परलोकभयं न च ।
नामिषेषु प्रसंगोऽस्ति न प्रियेष्वप्रियेषु च ॥ २३ ॥
जिन्हें फिर संसारमें जन्म लेनेका भय नहीं है, परलोकसे भी भय नहीं है, जिनकी भोगोंमें आसक्ति नहीं है तथा प्रिय और अप्रियमें भी जिनका राग-द्वेष नहीं है ॥ २३ ॥
शिष्टाचारः प्रियो येषु दमो येषु प्रतिष्ठितः ।
सुखं दुःखं समं येषां सत्यं येषां परायणम् ॥ २४ ॥
जिन्हें शिष्टाचार प्रिय है । जिनमें इन्द्रिय- संयम प्रतिष्ठित है । जिनके लिये सुख और दुःख समान है । सत्य ही जिनका परम आश्रय है ॥ २४ ॥
दातारो न ग्रहीतारो दयावन्तस्तथैव च ।
पितृदेवातिथेयाश्च नित्योद्युक्तास्तथैव च ॥ २५ ॥
वे देते हैं, लेते नहीं । उनमें स्वभावसे ही दया भरी रहती है । वे देवताओं, पितरों तथा अतिथियोंके सेवक होते हैं और सत्कर्म करनेके लिये सदा उद्यत रहते हैं ॥ २५ ॥
सर्वोपकारिणो वीराः सर्वधर्मानुपालकाः ।
सर्वभूतहिताश्चैव सर्वदेयाश्च भारत ॥ २६ ॥
भरतनन्दन! वे वीर पुरुष सबका उपकार करनेवाले, सम्पूर्ण धर्मोंके रक्षक तथा समस्त
प्राणियोंके हितैषी होते हैं । वे परहितके लिये सर्वस्व निछावर कर देते हैं ॥ २६ ॥
न ते चालयितुं शक्या धर्मव्यापारकारिणः ।
न तेषां भिद्यते वृत्तं यत्पुरा साधुभिः कृतम् ॥ २७ ॥
उन्हें सत्कर्मसे विचलित नहीं किया जा सकता । वे केवल धर्मके अनुष्ठानमें तत्पर रहते हैं । पहलेके श्रेष्ठ पुरुषोंने जिसका पालन किया है, उसी सदाचारका वे भी पालन करते हैं । उनका वह आचार कभी नष्ट नहीं होता ॥ २७ ॥
न त्रासिनो न चपला न रौद्राः सत्यथे स्थिताः ।
ते सेव्याः साधुभिर्नित्यं येष्वहिंसा प्रतिष्ठिता ॥ २८ ॥
वे किसीको भय नहीं दिखाते, चपलता नहीं करते उनका स्वभाव किसीके लिये भंयकर नहीं होता है, वे सदा सन्मार्गमें ही स्थित रहते हैं, उनमें अहिंसा नित्य प्रतिष्ठित होती है, ऐसे श्रेष्ठ पुरुषोंका ही सदा सेवन करना चाहिये ॥ २८ ॥
कामक्रोधव्यपेता ये निर्ममा निरहंकृताः ।
सुव्रताः स्थिरमर्यादास्तानुपास्व च पृच्छ च ॥ २९ ॥
जो काम और क्रोधसे रहित, ममता और अहंकारसे शून्य, उत्तम व्रतका पालन करनेवाले तथा धर्ममर्यादाको स्थिर रखनेवाले हैं, उन्हीं महापुरुषोंका संग करो और उनसे अपना संदेह पूछो ॥ २ ९ ॥ न धनार्थं यशोऽर्थं वा धर्मस्तेषां युधिष्ठिर ।
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अवश्यं कार्य इत्येव शरीरस्य क्रियास्तथा ॥ ३० ॥
युधिष्ठिर! उनका धर्मपालन धन बटोरने या यश कमानेके लिये नहीं होता । वे धर्म तथा शारीरिक क्रियाओंको अवश्यकर्तव्य समझकर ही करते हैं ॥ ३० ॥
न भयं क्रोधचापल्ये न शोकस्तेषु विद्यते ।
न धर्मध्वजिनश्चैव न गुह्यं कञ्चिदास्थिताः ॥ ३१ ॥
उनमें भय, क्रोध, चपलता तथा शोक नहीं होता । वे धर्मध्वजी ( पाखण्डी ) नहीं होते, किसी गोपनीय पाखण्डपूर्ण धर्मका आश्रय नहीं लेते हैं ॥ ३१ ॥
येष्वलोभस्तथामोहो ये च सत्यार्जवे स्थिताः ।
तेषु कौन्तेय रज्येथा येषां न भ्रश्यते पुनः ॥ ३२ ॥
कुन्तीनन्दन! जिनमें लोभ और मोहका अभाव है, जो सत्य और सरलतामें स्थित हैं तथा कभी सदाचारसे भ्रष्ट नहीं होते हैं, ऐसे पुरुषोंमें तुम्हें प्रेम रखना चाहिये ॥ ३२ ॥
येन हृष्यन्ति लाभेषु नालाभेषु व्यथन्ति च ।
निर्ममा निरहंकाराः सत्त्वस्थाः समदर्शिनः ॥ ३३ ॥
लाभालाभौ सुखदुःखे च तात प्रियाप्रिये मरणं जीवितं च । समानि येषां स्थिरविक्रमाणां बुभुत्सतां सत्त्वपथे स्थितानाम् ॥ ३४ ॥
धर्मप्रियांस्तान् सुमहानुभावान् दान्तोऽप्रमत्तश्च समर्चयेथाः । दैवात् सर्वे गुणवन्तो भवन्ति शुभाशुभे वाक्प्रलापास्तथान्ये ॥ ३५ ॥
तात! जो लाभमें हर्षसे फूल नहीं उठते, हानिमें व्यथित नहीं होते, ममता और अहंकारसे शून्य हैं, जो सर्वदा सत्त्वगुणमें स्थित और समदर्शी होते हैं, जिनकी दृष्टिमें लाभ-हानि सुख- दुःख, प्रिय- अप्रिय तथा जीवन- मरण समान हैं, जो सुदृढ़ पराक्रमी, आध्यात्मिक उन्नतिके इच्छुक और सत्त्वमय मार्गमें स्थित हैं, उन धर्मप्रेमी महानुभावोंकी तुम सावधान और जितेन्द्रिय रहकर सेवा - सत्कार करो । ये सब महापुरुष स्वभावसे ही बड़े गुणवान् होते हैं। शुभ और अशुभके विषयमें उनकी वाणी यथार्थ होती है । दूसरे लोग तो केवल बातें बनानेवाले होते हैं ॥ ३३-३५ ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि आपन्मूलभूतदोषकथने अष्टपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें आपत्तिके मूलभूत दोषका वर्णनविषयक एक सौ अट्ठावनवाँअध्याय पूराहुआ ॥ १५८ ॥
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एकोनषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः अज्ञान और लोभको एक दूसरेका कारण बताकर दोनोंकी एकता करना और दोनोंको ही समस्त दोषोंका कारण सिद्ध करना युधिष्ठिर उवाच
अनर्थानामधिष्ठानमुक्तो लोभः पितामह ।
अज्ञानमपि वै तात श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा- पितामह! आपने सब अनर्थोंके आधारभूत लोभका वर्णन तो किया, अब अज्ञानका भी यथार्थरूपसे वर्णन कीजिये; मैं उसके परिणामको भी सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
करोति पापं योऽज्ञानान्नात्मनो वेत्ति च क्षयम् ।
प्रद्वेष्टि साधुवृत्तांश्च स लोकस्यैति वाच्यताम् ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा - युधिष्ठिर! जो मनुष्य अज्ञानवश पाप करता है और उससे होनेवाली अपनी ही हानिको नहीं समझता तथा श्रेष्ठ पुरुषोंसे द्वेष करता है, उसकी संसारमें बड़ी निन्दा होती है ॥ २ ॥
अज्ञानान्निरयं याति तथाज्ञानेन दुर्गतिम् ।
अज्ञानात् क्लेशमाप्नोति तथापत्सु निमज्जति ॥ ३ ॥
अज्ञानसे ही जीव नरकमें पड़ता है । अज्ञानसे ही उसकी दुर्गति होती है, अज्ञानसे वह कष्ट उठाता तथा विपत्तियोंके समुद्रमें डूब जाता है ॥ ३ ॥
युधिष्ठिर उवाच
अज्ञानस्य प्रवृत्तिं च स्थानं वृद्धिक्षयोदयौ ।
मूलं योगं गतिं कालं कारणं हेतुमेव च ॥ ४ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भूपाल! अज्ञानकी उत्पत्ति, स्थिति, वृद्धि, क्षय, उद्गम, मूल, योग, गति, काल, कारण और हेतु क्या हैं? ॥ ४ ॥
श्रोतुमिच्छामि तत्त्वेन यथावदिह पार्थिव ।
अज्ञानप्रसवं हीदं यद् दुःखमुपलभ्यते ॥ ५ ॥
पृथ्वीनाथ! मैं इस विषयको यथावत्रूपसे तत्त्वके विवेचनपूर्वक सुनना चाहता हूँ; क्योंकि यह जो दुःख उपलब्ध होता है, उसकी उत्पत्तिका कारण अज्ञान ही है ॥ ५ ॥