श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 1041–1050
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1041–1050
पृष्ठ 1041
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
भीष्म उवाच
राग द्वेषस्तथा मोहो हर्षः शोकोऽभिमानिता ।
कामः क्रोधश्च दर्पश्च तन्द्री चालस्यमेव च ॥ ६ ॥
इच्छा द्वेषस्तथा तापः परवृद्ध्युपतापिता ।
अज्ञानमेतन्निर्दिष्टं पापानां चैव याः क्रियाः ॥ ७ ॥
भीष्मजीने कहा- राजन् । राग, द्वेष, मोह, हर्ष, शोक, अभिमान, काम, क्रोध, दर्प, तन्द्रा, आलस्य, इच्छा, वैर, ताप, दूसरोंकी उन्नति देखकर जलना और पापाचार करना— इन सबको ( अज्ञानका कार्य होनेसे ) अज्ञान बताया गया है ॥ ६-७ ॥
एतस्य वा प्रवृत्तेश्च वृद्ध्यादीन्यांश्च पृच्छसि ।
विस्तरेण महाराज शृणु तच्च विशेषतः ॥ ८ ॥
महाराज! इस अज्ञानकी उत्पत्ति और वृद्धि आदिके विषयमें जो प्रश्न कर रहे हो,. उसके विषयमें विशेष विस्तारके साथ किया हुआ मेरा वर्णन सुनो ॥ ८ ॥
उभावेतौ समफलौ समदोषौ च भारत ।
अज्ञानं चातिलोभश्चाप्येकं जानीहि पार्थिव ॥ ९ ॥
भारत! पृथ्वीनाथ! अज्ञान और अत्यन्त लोभ- इन दोनोंको एक समझो, क्योंकि इनके परिणाम और दोष समान ही हैं ॥ ९ ॥
लोभप्रभवमज्ञानं वृद्धं भूयः प्रवर्धते ।
स्थाने स्थानं क्षये क्षैण्यमुपैति विविधां गतिम् ॥ १० ॥
लोभसे ही अज्ञान प्रकट होता है और लोभके बढ़नेपर वह अज्ञान और भी बढ़ता है । जबतक लोभ रहता है, तबतक अज्ञान भी बना रहता है और जब लोभका क्षय होता है, तब अज्ञान भी क्षीण हो जाता है । अज्ञान और लोभके कारण ही जीव नाना प्रकारकी योनियोंमें जन्म लेता है ॥ १० ॥
मूलं लोभस्य मोहो वै कालात्मगतिरेव च ।
छिने भिन्ने तथा लोभे कारणं काल एव च ॥ ११ ॥
मोह ही निःसंदेह लोभका मूलकारण है । यह कालस्वरूप मोहात्मक अज्ञान ही
मनुष्यकी बुरी गतिका कारण है । लोभके छिन्न-भिन्न होनेमें भी काल ही कारण है ॥ ११ ॥
तस्याज्ञानाद्धि लोभो हि लोभादज्ञानमेव च ।
सर्वदोषास्तथा लोभात् तस्मालोभं विवर्जयेत् ॥ १२ ॥
मूढ़ मनुष्यको अज्ञानसे लोभ और लोभसे अज्ञान होता है । लोभसे ही सारे दोष पैदा होते हैं; इसलिये लोभको त्याग देना चाहिये ॥ १२ ॥
जनको युवनाश्वश्च वृषादर्भिः प्रसेनजित् ।
लोभक्षयाद् दिवं प्राप्तास्तथैवान्ये नराधिपाः ॥ १३ ॥
पृष्ठ 1042
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
जनक, युवनाश्व, वृषादर्भि, प्रसेनजित् तथा अन्य नरेश लोभका नाश करके ही दिव्यलोकमें गये हैं ॥ १३ ॥
प्रत्यक्षं तु कुरुश्रेष्ठ त्यज लोभमिहात्मना ।
त्यक्त्वा लोभं सुखं लोके प्रेत्य चानुचरिष्यसि ॥ १४ ॥
कुरुश्रेष्ठ! तुम स्वयं प्रयत्न करके इस प्रत्यक्ष दीखने वाले लोभका परित्याग करो । लोभका त्याग कर इस लोकमें सुख तथा मृत्युके पश्चात् परलोकमें भी आनन्द प्राप्त करके सुखपूर्वक विचरोगे ॥ १४ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि अज्ञानमाहात्म्ये एकोनषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें अज्ञानका माहात्म्यविषयक एक सौ उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५ ९ ॥
पृष्ठ 1043
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः मन और इन्द्रियोंके संयमरूप दमका माहात्म्य युधिष्ठिरउवाच
स्वाध्याये कृतयत्नस्य नरस्य च पितामह ।
धर्मकामस्य धर्मात्मन् किं नु श्रेय इहोच्यते ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा- धर्मात्मा पितामह! जो स्वाध्यायके लिये यत्नशील है और धर्मपालनकी इच्छा रखता है, उस मनुष्यके लिये इस संसारमें श्रेय क्या बताया जाता है? ॥ १ ॥
बहुधा दर्शने लोके श्रेयो यदिह मन्यसे ।
अस्मिल्लोँके परे चैव तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ २ ॥
पितामह! जगत्में श्रेयका प्रतिपादन करनेवाले अनेक प्रकारके दर्शन ( मत) हैं; परंतु आप जिसे श्रेय मानते हों, जो इस लोक और परलोकमें भी कल्याण करनेवाला हो, उसे मुझे बताइये ॥ २ ॥
महानयं धर्मपथो बहुशाखश्च भारत ।
किंस्विदेवेह धर्माणामनुष्ठेयतमं मतम् ॥ ३ ॥
भारत! धर्मका यह मार्ग बहुत बड़ा है । इससे बहुत सी शाखाएँ निकली हुई हैं । इन धर्मोंमेंसे कौनसा धर्म सर्वोत्तम, अवश्य पालन करनेयोग्य माना गया है? ॥
धर्मस्य महतो राजन् बहुशाखस्य तत्त्वतः ।
यन्मूलं परमं तात तत् सर्वं ब्रूह्यशेषतः ॥ ४ ॥
राजन्! बहुत - सी शाखाओंसे युक्त इस महान् धर्मका वास्तवमें परम मूल क्या है? तात! ये सब बातें मुझे पूर्णरूपसे बताइये ॥ ४ ॥
भीष्म उवाच
हन्त ते कथयिष्यामि येन श्रेयो ह्यवाप्स्यसि ।
पीत्वामृतमिव प्राज्ञो ज्ञानतृप्तो भविष्यसि ॥ ५ ॥
भीष्मजी ने कहा - युधिष्ठिर! मैं बड़े हर्षके साथ तुम्हें वह उपाय बताता हूँ, जिससे तुम कल्याण प्राप्त कर लोगे । जैसे अमृतको पीकर पूर्ण तृप्ति हो जाती है, उसी प्रकार तुम ज्ञानी होकर इस ज्ञान- सुधासे पूर्णतः तृप्त हो जाओगे ॥ ५ ॥
धर्मस्य विधयो नैके ये वै प्रोक्ता महर्षिभिः ।
स्वं स्वं विज्ञानमाश्रित्य दमस्तेषां परायणम् ॥ ६ ॥
पृष्ठ 1044
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
महर्षियोंने अपने - अपने ज्ञानके अनुसार धर्मकी एक नहीं, अनेक विधियाँ बतायी हैं, परंतु उन सबका आधार दम ( मन और इन्द्रियोंका संयम ) ही है ॥ ६ ॥
दमं निःश्रेयसं प्राहुर्वृद्धा निश्चितदर्शिनः ।
ब्राह्मणस्य विशेषेण दमो धर्मः सनातनः ॥ ७ ॥
धर्मके सिद्धान्तको जाननेवाले वृद्ध पुरुष दमको निःश्रेयस ( परम कल्याण ) का साधन बताते हैं । विशेषतः ब्राह्मणके लिये तो दम ही सनातन धर्म है ॥ ७ ॥
दमात् तस्य क्रियासिद्धिर्यथावदुपलभ्यते ।
दो दानं तथा यज्ञानधीतं चातिवर्तते ॥ ८ ॥
दमसे ही उसे अपने शुभ कर्मोंकी यथावत् सिद्धि प्राप्त होती है। दम उसके लिये दान, यज्ञ और स्वाध्यायसे भी बढ़कर है ॥ ८ ॥
दमस्तेजो वर्धयति पवित्रं च दमः परम् ।
विपाप्मा तेजसा युक्तः पुरुषो विन्दते महत् ॥ ९ ॥
दम तेजकी वृद्धि करता है, दम परम पवित्र साधन है, दमसे पापरहित हुआ तेजस्वी पुरुष परमपदको प्राप्त कर लेता है ॥ ९ ॥
दमेन सदृशं धर्मं नान्यं लोकेषु शुश्रुम ॥ दमो हि परमो लोके प्रशस्तः सर्वधर्मिणाम् ॥ १० ॥
हमने संसारमें दमके समान दूसरा कोई धर्म नहीं सुना । जगत्में सभी धर्मवालोंके यहाँ
दमको उत्कृष्ट बताया गया है । सबने उसकी भूरि- भूरि प्रशंसा की है ॥ १० ॥
प्रेत्य चात्र मनुष्येन्द्र परमं विन्दते सुखम् ।
दमेन हि समायुक्तो महान्तं धर्ममश्नुते ॥ ११ ॥
नरेन्द्र! दमसे अर्थात् इन्द्रिय और मनके संयमसे युक्त पुरुषको महान् धर्मकी प्राप्ति होती है । वह इहलोक और परलोकमें भी परम सुख पाता है ॥ ११ ॥
सुखं दान्तः प्रस्वपिति सुखं च प्रतिबुध्यते ।
सुखं पर्येति लोकांश्च मनश्चास्य प्रसीदति ॥ १२ ॥
जिसने अपने मन और इन्द्रियोंका दमन कर लिया है, वह सुखसे सोता, सुखसे ही
जागता और सुखपूर्वक ही लोकोंमें विचरता है । उसका मन सदा प्रसन्न रहता है ॥ १२ ॥
अदान्तः पुरुषः क्लेशमभीक्ष्णं प्रतिपद्यते ।
अनर्थांश्च बहूनन्यान् प्रसृजत्यात्मदोषजान् ॥ १३ ॥
जिसकी इन्द्रियाँ और मन वशमें नहीं है, वह पुरुष निरन्तर क्लेश उठाता है । साथ ही वह अपने ही दोषोंसे बहुत - से दूसरे दूसरे अनर्थोंकी भी सृष्टि कर लेता है ॥ १३ ॥
आश्रमेषु चतुर्ष्वहर्दममेवोत्तमं व्रतम् ।
तस्य लिङ्गानि वक्ष्यामि येषां समुदयो दमः ॥ १४ ॥
पृष्ठ 1045
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
चारों आश्रमोंमें दमको ही उत्तम व्रत बताया गया है । अब मैं इन्द्रिय - दमन एवं मनोनिग्रहके उन लक्षणोंको बताऊँगा, जिनका उदय होना ही दम कहा गया है ॥ १४ ॥
क्षमा धृतिरहिंसा च समता सत्यमार्जवम् ।
इन्द्रियाभिजयो दाक्ष्यं मार्दवं ह्रीरचापलम् ॥ १५ ॥
अकार्पण्यमसंरम्भः संतोषः प्रियवादिता ।
अविहिंसानसूया चाप्येषां समुदयो दमः ॥ १६ ॥
क्षमा, धीरता, अहिंसा, समता, सत्यवादिता, सरलता, इन्द्रिय- विजय, दक्षता, कोमलता, लज्जा, स्थिरता, उदारता, क्रोधहीनता, संतोष, प्रिय वचन बोलनेका स्वभाव, किसी भी प्राणीको कष्ट न देना और दूसरोंके दोष न देखना– इन सद्गुणोंका उदय होना ही दम कहलाता है ॥ १५-१६ ॥
गुरुपूजा च कौरव्य दया भूतेष्वपैशुनम् ।
जनवादं मृषावादं स्तुतिनिन्दाविसर्जनम् ॥ १७ ॥
कामं क्रोधं च लोभं च दर्पं स्तम्भं विकत्थनम् ।
रोषमीर्ष्यावमानं च नैव दान्तो निषेवते ॥ १८ ॥
कुरुनन्दन! जिसने मन और इन्द्रियोंका दमन कर लिया है, उसमें गुरुजनोंके प्रति आदरका भाव, समस्त प्राणियोंके प्रति दया और किसीकी भी चुगली न करनेकी प्रवृत्ति होती है । वह जनापवाद, असत्य भाषण, निन्दा -स्तुतिकी प्रवृत्ति, काम, क्रोध, लोभ, दर्प, जडता, डींग हाँकना, रोष, ईर्ष्या और दूसरोंका अपमान– इन दुर्गुणोंका कभी सेवन नहीं करता ॥ १७-१८ ॥
अनिन्दितो ह्यकामात्मा नाल्पेष्वर्थ्यनसूयकः ।
समुद्रकल्पः स नरो न कथंचन पूर्यते ॥ १ ९ ॥
इन्द्रिय और मनको वशमें रखनेवाले पुरुषकी कभी निन्दा नहीं होती । उसके मनमें कोई कामना नहीं होती । वह छोटी-छोटी वस्तुओंके लिये किसीके सामने हाथ नहीं फैलाता अथवा तुच्छ विषय- सुखोंकी अभिलाषा नहीं रखता, दूसरोंके दोष नहीं देखता । वह मनुष्य समुद्रके समान अगाध गाम्भीर्य धारण करता है । जैसे समुद्र अनन्त जलराशि पाकर भी भरता नहीं है, उसी प्रकार वह भी निरन्तर धर्मसंचयसे कभी तृप्त नहीं होता ॥ १ ९ ॥
अहं त्वयि मयि त्वं च मयि ते तेषु चाप्यहम् ।
पूर्वसम्बन्धिसंयोगं नैतद् दान्तो निषेवते ॥ २० ॥
'मैं तुमपर स्नेह रखता हूँ और तुम मुझपर । वे मुझमें अनुराग रखते हैं और मैं उनमें ' इस प्रकार पहलेके सम्बन्धियोंके सम्बन्धका जितेन्द्रिय पुरुष चिन्तन नहीं करता ॥ २० ॥
सर्वाग्राम्यास्तथाऽऽरण्या याश्च लोके प्रवृत्तयः ।
निन्दां चैव प्रशंसां च यो नाश्रयति मुच्यते ॥ २१ ॥
पृष्ठ 1046
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
जगत्में ग्रामीणों और वनवासियोंकी जो-जो प्रवृत्तियाँ होती हैं, उन सबका जो सेवन नहीं करता तथा दूसरोंकी निन्दा और प्रशंसासे भी दूर रहता है, उसकी मुक्ति हो जाती है ॥ २१ ॥
मैत्रोऽथ शीलसम्पन्नः प्रसन्नात्माऽऽत्मविच्च यः ।
मुक्तस्य विविधैः सङ्गैस्तस्य प्रेत्य फलं महत् ॥ २२ ॥
जो सबके प्रति मित्रताका भाव रखनेवाला और सुशील है, जिसका मन प्रसन्न है, जो नाना प्रकारकी आसक्तियोंसे मुक्त तथा आत्मज्ञानी है, उसे मृत्युके पश्चात् मोक्षरूप महान् फलकी प्राप्ति होती है ॥ २२ ॥
सुवृत्तः शीलसम्पन्नः प्रसन्नात्माऽऽत्मविद् बुधः ।
प्राप्येह लोके सत्कारं सुगतिं प्रतिपद्यते ॥ २३ ॥
जो सदाचारी, शीलसम्पन्न, प्रसन्नचित्त और आत्मतत्त्वको जाननेवाला है, वह विद्वान् पुरुष इस लोकमें सत्कार पाकर परलोकमें परम गति पाता है ॥ २३ ॥
कर्म यच्छुभमेवेह सद्भिराचरितं च यत् ।
तदेव ज्ञानयुक्तस्य मुनेर्वर्त्म न हीयते ॥ २४ ॥
इस जगत्में जो केवल शुभ ( कल्याणकारी ) कर्म है तथा सत्पुरुषोंने जिसका आचरण किया है, वही ज्ञानवान् मुनिका मार्ग है । वह स्वभावतः उसका आचरण करता है । उससे कभी च्युत नहीं होता ॥ २४ ॥
निष्क्रम्य वनमास्थाय ज्ञानयुक्तो जितेन्द्रियः ।
कालाकांक्षी चरत्येवं ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ २५ ॥
ज्ञानसम्पन्न जितेन्द्रिय पुरुष घरसे निकलकर वनका आश्रय ले वहाँ मृत्युकालकी प्रतीक्षा करता हुआ निर्द्वन्द्व विचरता रहता है । इस प्रकार वह ब्रह्मभावको प्राप्त होनेमें समर्थ हो जाता है ॥ २५ ॥
अभयं यस्य भूतेभ्यो भूतानामभयं यतः ।
तस्य देहाद् विमुक्तस्य भयं नास्ति कुतश्चन ॥ २६ ॥
जिसको दूसरे प्राणियोंसे भय नहीं है तथा जिससे दूसरे प्राणी भी भय नहीं मानते, उस देहाभिमानसे रहित महात्मा पुरुषको कहींसे भी भय नहीं प्राप्त होता ॥ २६ ॥
अवाचिनोति कर्माणि न च सम्प्रचिनोति ह ।
समः सर्वेषु भूतेषु मैत्रायणगतिश्चरेत् ॥ २७ ॥
वह उपभोगद्वारा प्रारब्ध- कर्मोंको क्षीण करता है और कर्तृत्वाभिमान तथा फलासक्तिसे शून्य होनेके कारण नूतन कर्मोंका संचय नहीं करता है। सभी प्राणियोंमें समानभाव रखकर सबको मित्रकी भाँति अभयदान देता हुआ विचरता है ॥ २७ ॥
शकुनीनामिवाकाशे जले वारिचरस्य च ।
यथा गतिने दृश्येत तथा तस्य न संशयः ॥ २८ ॥
पृष्ठ 1047
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
जैसे आकाशमें पक्षियोंका और जलमें जलचर जन्तुओंका पदचिह्न नहीं दिखायी देता, उसी प्रकार ज्ञानीकी गति भी जाननेमें नहीं आती है । इसमें तनिक भी संशय नहीं है ॥ २८ ॥
गृहानुत्सृज्य यो'राजन् मोक्षमेवाभिपद्यते ।
लोकास्तेजोमयास्तस्य कल्पन्ते शाश्वतीः समाः ॥ २ ९ ॥
राजन्! जो घर- बार को छोड़कर मोक्षमार्गाका ही आश्रय लेता है, उसे अनन्त वर्षोंके लिये दिव्य तेजोमय लोक प्राप्त होते हैं ॥ २ ९ ॥
संन्यस्य सर्वकर्माणि संन्यस्य विधिवत् तपः ।
संन्यस्य विविधा विद्याः सर्वं संन्यस्य चैव ह ॥ ३० ॥
कामे शुचिरनावृत्तः प्रसन्नात्माऽऽत्मविच्छुचिः ।
प्राप्येह लोके सत्कारं स्वर्गं समभिपद्यते ॥ ३१ ॥
जिसका आचार- विचार शुद्ध और अन्तःकरण निर्मल है, जिसकी कामनाएँ शुद्ध हैं तथा जो भोगोंसे पराङ्मुख हो चुका है, वह आत्मज्ञानी पुरुष सम्पूर्ण कर्मोंका, तपस्याका तथा नाना प्रकारकी विद्याओंका विधिवत् संन्यास ( त्याग ) करके सर्वत्यागी संन्यासी होकर इहलोकमें सम्मानित हो परलोकमें अक्षय स्वर्ग (ब्रह्मधाम) को प्राप्त होता है ॥ ३०-३१ ॥
यच्च पैतामहं स्थानं ब्रह्मराशिसमुद्भवम् ।
गुहायां पिहितं नित्यं तद् दमेनाभिगम्यते ॥ ३२ ॥
ब्रह्मराशिसे उत्पन्न हुआ जो पितामह ब्रह्माजीका उत्तम धाम है, वह हृदयगुहामें छिपा हुआ है । उसकी प्राप्ति सदा दम ( इन्द्रियसंयम और मनोनिग्रह ) से ही होती है ॥ ३२ ॥
ज्ञानारामस्य बुद्धस्य सर्वभूताविरोधिनः ।
नावृत्तिभयमस्तीह परलोकभयं कुतः ॥ ३३ ॥
जिसका किसी भी प्राणीके साथ विरोध नहीं है, जो ज्ञानस्वरूप आत्मामें रमता रहता है, ऐसे ज्ञानीको इस लोकमें पुनः जन्म लेनेका भय ही नहीं रहता, फिर उसे परलोकका भय कैसे हो सकता है? ॥ ३३ ॥
एक एव दमे दोषो द्वितीयो नोपपद्यते ।
यदेनं क्षमया युक्तमशक्तं मन्यते जनः ॥ ३४ ॥
दम अर्थात् संयममें एक ही दोष है, दूसरा नहीं । वह यह कि क्षमाशील होनेके कारण उसे लोग असमर्थ समझने लगते हैं ॥ ३४ ॥
एकोऽस्य सुमहाप्राज्ञ दोषः स्यात् सुमहान् गुणः ।
क्षमया विपुला लोकाः सुलभा हि सहिष्णुता ॥ ३५ ॥
महाप्राज्ञ युधिष्ठिर! उसका यह एक दोष ही महान् गुण हो सकता है । क्षमा धारण करनेसे उसको बहुत से पुण्यलोक सुलभ होते हैं । साथ ही क्षमासे सहिष्णुता भी आ जाती है ॥ ३५ ॥
पृष्ठ 1048
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
दान्तस्य किमरण्येन तथाऽदान्तस्य भारत ।
यत्रैव निवसेद् दान्तस्तदरण्यं स चाश्रमः ॥ ३६ ॥
भारत! संयमी पुरुषको वनमें जानेकी क्या आवश्यकता है? और जो असंयमी है, उसको वनमें रहनेसे भी क्या लाभ है? संयमी पुरुष जहाँ रहे, वहीं उसके लिये वन और आश्रम है ॥ ३६ ॥
वैशम्पायन उवाच
एतद् भीष्मस्य वचनं श्रुत्वा राजा युधिष्ठिरः ।
अमृतेनेव संतृप्तः प्रहृष्टः समपद्यत ॥ ३७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! भीष्मजीकी यह बात सुनकर राजा युधिष्ठिर बड़े प्रसन्न हुए, मानो अमृत पीकर तृप्त हो गये हों ॥ ३७ ॥
पुनश्च परिपप्रच्छ भीष्मं धर्मभृतां वरम् ।
तपः प्रति स चोवाच तस्मै सर्वं कुरूद्वह ॥ ३८ ॥
कुरुश्रेष्ठ! तत्पश्चात् उन्होंने धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ भीष्मजी से पुनः तपस्याके विषयमें प्रश्न किया । तब भीष्मजीने उन्हें उसके विषयमें सब कुछ बताना आरम्भ किया ॥ ३८ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि दमकथने षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें दमका वर्णनविषयक एक सौ साठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६० ॥
पृष्ठ 1049
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
एकषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः तपकी महिमा भीष्म उवाच
सर्वमेतत् तपोमूलं कवयः परिचक्षते ।
न ह्यतप्ततपा मूढः क्रियाफलमवाप्नुते ॥ १ ॥
भीष्मजीने कहा- राजन्! इस सर्च्य जगत्का मूल कारण तप ही है, ऐसा विद्वान् पुरुष कहते हैं । जिस मूढ़ने तपस्या नहीं की है, उसे अपने शुभ कर्मोंका फल नहीं मिलता है ॥ १ ॥
प्रजापतिरिदं सर्वं तपसैवासृजत् प्रभुः ।
तथैव वेदानृषयस्तपसा प्रतिपेदिरे ॥ २ ॥
भगवान् प्रजापतिने तपसे ही इस समस्त संसारकी सृष्टि की है तथा ऋषियोंने तपसे ही वेदोंका ज्ञान प्राप्त किया है ॥ २ ॥
तपसैव ससर्जान्नं फलमूलानि यानि च ।
त्रील्लोँकांस्तपसा सिद्धाः पश्यन्ति सुसमाहिताः ॥ ३ ॥
जो- जो फल, मूल और अन्न हैं, उनको विधाताने तपसे ही उत्पन्न किया है । तपस्यासे सिद्ध हुए एकाग्रचित्त महात्मा पुरुष तीनों लोकोंको प्रत्यक्ष देखते हैं ॥ ३ ॥
औषधान्यगदादीनि क्रियाश्च विविधास्तथा ।
तपसैव हि सिद्ध्यन्ति तपोमूलं हि साधनम् ॥ ४ ॥
औषध, आरोग्य आदिकी प्राप्ति तथा नाना प्रकारकी क्रियाएँ तपस्यासे ही सिद्ध होती हैं; क्योंकि प्रत्येक साधनकी जड़ तपस्या ही है ॥ ४ ॥
यद् दुरापं भवेत् किंचित् तत् सर्वं तपसो भवेत् ।
ऐश्वर्यमृषयः प्राप्तास्तपसैव न संशयः ॥ ५ ॥
संसारमें जो कुछ भी दुर्लभ वस्तु हो, वह सब तपस्यासे सुलभ हो सकती है । ऋषियोंने तपस्यासे ही अणिमा आदि अष्टविध ऐश्वर्यको प्राप्त किया है, इसमें संशय नहीं है ॥ ५ ॥
सुरापोऽसम्मतादायी भ्रूणहा गुरुतल्पगः ।
तपसैव सुतप्तेन नरः पापात् प्रमुच्यते ॥ ६ ॥
शराबी, किसीकी सम्मतिके बिना ही उसकी वस्तु उठा लेनेवाला ( चोर ), गर्भहत्यारा और गुरुपत्नीगामी मनुष्य भी अच्छी तरह की हुई तपस्याद्वारा ही पापसे छुटकारा पाता है ॥ ६ ॥
तपसो बहुरूपस्य तैस्तैद्वरिःप्रवर्ततः ।
निवृत्त्या वर्तमानस्य तपो नानशनात् परम् ॥ ७ ॥
पृष्ठ 1050
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तपस्याके अनेक रूप हैं और भिन्न- भिन्न साधनों एवं उपायोंद्वारा मनुष्य उसमें प्रवृत्त होता है; परंतु जो निवृत्तिमार्गसे चल रहा है, उसके लिये उपवाससे बढ़कर दूसरा कोई तप नहीं है ॥ ७ ॥
अहिंसा सत्यवचनं दानमिन्द्रियनिग्रहः ।
एतेभ्यो हि महाराज तपो नानशनात् परम् ॥ ८ ॥
महाराज! अहिंसा, सत्यभाषण, दान और इन्द्रिय- संयम – इन सबसे बढ़कर तप है और उपवाससे बड़ी कोई तपस्या नहीं है ॥ ८ ॥
न दुष्करतं दानान्नातिमातरमाश्रयः ।
त्रैविद्येभ्यः परं नास्ति संन्यासः परमं तपः ॥ ९ ॥
दानसे बढ़कर कोई दुष्कर धर्म नहीं है, माताकी सेवासे बड़ा कोई दूसरा आश्रय नहीं है, तीनों वेदोंके विद्वानोंसे श्रेष्ठ कोई विद्वान् नहीं है और संन्यास सबसे बड़ा तप है ॥ ९ ॥
इन्द्रियाणीह रक्षन्ति स्वर्गधर्माभिगुप्तये ।
तस्मादर्थे च धर्मे च तपो नानशनात् परम् ॥ १० ॥
इस संसारमें धार्मिक पुरुष स्वर्गके साधनभूत धर्मकी रक्षाके लिये इन्द्रियोंको सुरक्षित ( संयमशील बनाये ) रखते हैं । परंतु धर्म और अर्थ दोनोंकी सिद्धिके लिये तप ही श्रेष्ठ साधन है और उपवाससे बढ़कर कोई तपस्या नहीं है ॥ १० ॥
ऋषयः पितरो देवा मनुष्या मृगपक्षिणः ।
यानि चान्यानि भूतानि स्थावराणि चराणि च ॥ ११ ॥
तपः परायणाः सर्वे सिद्ध्यन्ति तपसा च ते ।
इत्येवं तपसा देवा महत्त्वं प्रतिपेदिरे ॥ १२ ॥
ऋषि, पितर, देवता, मनुष्य, पशु -पक्षी तथा दूसरे जो चराचर प्राणी हैं, वे सब तपस्यामें ही तत्पर रहते हैं । तपस्यासे ही उन्हें सिद्धि प्राप्त होती है । इसी प्रकार देवताओंने भी तपस्यासे ही महत्त्वपूर्ण पद प्राप्त किया है ॥ ११-१२ ॥
इमानीष्टविभागानि फलानि तपसः सदा ।
तपसा शक्यते प्राप्तुं देवत्वमपि निश्चयात् ॥ १३ ॥
ये जो भिन्न - भिन्न अभीष्ट फल कहे गये हैं, वे सब सदा तपस्यासे ही सुलभ होते हैं ।
तपस्यासे निश्चय ही देवत्व भी प्राप्त किया जा सकता है ॥ १३ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि तपःप्रशंसायामेकषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें तपस्याकी प्रशंसाविषयक एक सौ इकसठवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १६१ ॥