श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 1671–1680

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1671–1680

पृष्ठ 1671

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षष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः युधिष्ठिरका धर्मकी प्रामाणिकतापर संदेह उपस्थित करना युधिष्ठिरउवाच

सूक्ष्मं साधु समादिष्टं भवता धर्मलक्षणम् ।

प्रतिभा त्वस्ति मे काचित् तां ब्रूयामनुमानतः ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने कहा — पितामह! आपने धर्मका सूक्ष्म एवं सुन्दर लक्षण बताया है; परंतु मुझे कुछ और ही स्फुरित हो रहा है। अतः मैं उसके सम्बन्धमें अनुमानसे ही कुछ कहूँगा ॥ १ ॥

भूयांसो हृदये ये मे प्रश्नास्ते व्याहृतास्त्वया ।

इदं त्वन्यत् प्रवक्ष्यामि न राजन् निग्रहादिव ॥ २ ॥

मेरे हृदयमें जो बहुत -से प्रश्न उठे थे, उन सबका निराकरण आपने कर दिया । महाराज! अब मैं यह दूसरा प्रश्न उपस्थित कर रहा हूँ। इसमें जिज्ञासा ही कारण है, दुराग्रह नहीं ॥ २ ॥

इमानि हि प्राणयन्ति सृजन्त्युत्तारयन्ति च ।

न धर्मः परिपाठेन शक्यो भारत वेदितुम् ॥ ३ ॥

भरतनन्दन! धर्म ही इन प्राणियोंकी सृष्टि करते हैं । धर्म ही उनके जीवनधारण और उद्धारमें कारण होते हैं; परंतु धर्मको केवल वेदोंके पाठमात्रसे नहीं जाना जा सकता ॥ ३ ॥

अन्यो धर्मः समस्थस्य विषमस्थस्य चापरः ।

आपदस्तु कथं शक्याः परिपाठेन वेदितुम् ॥ ४ ॥

जो मनुष्य अच्छी स्थितिमें है, उसका धर्म दूसरा है और जो संकटमें पड़ा हुआ है, उसका धर्म दूसरा ही है । केवल वेदोंके पाठसे आपद्धर्मका ज्ञान कैसे हो सकता है? ॥ ४ ॥

सदाचारो मतो धर्मः सन्तस्त्वाचारलक्षणाः ।

साध्यासाध्यं कथं शक्यं सदाचारो ह्यलक्षणः ॥ ५ ॥

आपके कथनानुसार सत्पुरुषोंका आचरण धर्म माना गया है और जिनमें धर्माचरण लक्षित होता है, वे ही सत्पुरुष हैं । ऐसी दशामें अन्योन्याश्रय दोष पड़नेके कारण साध्य और असाध्यका विवेक कैसे हो सकता है? ऐसी दशामें सदाचार धर्मका लक्षण नहीं हो सकता ॥

दृश्यते हि धर्मरूपेणाधर्मं प्राकृतश्चरन् ।

धर्मं चाधर्मरूपेण कश्चिदप्राकृतश्चरन् ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1672

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इस लोकमें देखा जाता है कि कितने ही प्राकृत मनुष्य धर्म से दिखायी देनेवाले अधर्मका आचरण करते हैं और कितने ही अप्राकृत ( शिष्ट ) पुरुष अधर्म प्रतीत होनेवाले धर्मका अनुष्ठान करते हैं ( अतः केवल आचारसे धर्माधर्मका निर्णय नहीं हो सकता) ॥ ६ ॥

पुनरस्य प्रमाणं हि निर्दिष्टं शास्त्रकोविदैः ।

वेदवादाश्चानुयुगं हसन्तीतीह नः श्रुतम् ॥ ७ ॥

शास्त्रज्ञ पुरुषोंने धर्ममें वेदको ही प्रमाण बताया है; किंतु हमने सुना है कि युग- युगमें वेदोंका ह्रास होता है अर्थात् धर्मके सम्बन्धमें जो वेदोंका निश्चय है, वह प्रत्येक युगमें बदलता रहता है ॥ ७ ॥

अन्ये कृतयुगे धर्मास्त्रेतायां द्वापरे परे ।

अन्ये कलियुगे धर्मा यथाशक्ति कृता इव ॥ ८ ॥

सत्ययुगके धर्म कुछ और हैं, त्रेता और द्वापरके धर्म कुछ और ही हैं और कलियुगके धर्म कुछ और ही बताये गये हैं । मानो मुनियोंने लोगोंकी शक्तिके अनुसार ही धर्मकी व्यवस्था की है ॥ ८ ॥

आम्नायवचनं सत्यमित्ययं लोकसंग्रहः ।

आम्नायेभ्यः पुनर्वेदाः प्रसृताः सर्वतोमुखाः ॥ ९ ॥

वेदोंका वचन सत्य है, यह कथन लोकरंजनमात्र है । वेदोंसे ही सर्वतोमुखी स्मृतियोंका प्रचार और प्रसार हुआ है ॥ ९ ॥

ते चेत् सर्वप्रमाणं वै प्रमाणं ह्यत्र विद्यते ।

प्रमाणेऽप्यप्रमाणेन विरुद्धे शास्त्रता कुतः ॥ १० ॥

यदि सम्पूर्ण वेद प्रामाणिक हैं तो स्मृतियाँ भी प्रामाणिक हो सकती हैं; परंतु जब ( युग-युगमें धर्मके विषयमें विभिन्न प्रकारकी बात कहनेसे ) प्रमाणभूत वेद भी अप्रामाणिक हो तो वेदमूलक स्मृतियाँ भी प्रामाणिक नहीं रहेंगी । यदि स्मृतिका श्रुतिके साथ विरोध हो तो उसमें शास्त्रत्व कैसे रह सकता है? ॥ १० ॥

धर्मस्य क्रियमाणस्य बलवद्भिर्दुरात्मभिः ।

या या विक्रियते संस्था ततः सापि प्रणश्यति ॥ ११ ॥

जब धर्मका अनुष्ठान हो रहा हो, उस समय बलवान् दुरात्माओंद्वारा उसमें जो - जो विकृति उत्पन्न की जाती है, उसके कारण उस धर्ममर्यादाका ही लोप हो जाता है ॥ ११ ॥

विद्म चैवं न वा विद्म शक्यं वा वेदितुं न वा ।

अणीयान् क्षुरधाराया गरीयानपि पर्वतात् ॥ १२ ॥

हम धर्मको जानते हों या न जानते हों, धर्मस्वरूप जाना जा सकता हो या नहीं; इतना तो हम समझते ही हैं कि धर्म छूरेकी धारसे भी सूक्ष्म और पर्वतसे भी अधिक विशाल एवं भारी है ॥ १२ ॥

गन्धर्वनगराकारः प्रथमं सम्प्रदृश्यते ।

पृष्ठ 1673

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अन्वीक्ष्यमाणः कविभिः पुनर्गच्छत्यदर्शनम् ॥ १३ ॥

धर्मके विषयमें जब आलोचना की जाती है, तब पहले तो वह गन्धर्वनगरके समान दिखायी देता है; फिर विद्वानोंद्वारा विशेष रूपसे विचार करनेपर यह प्रतीत होता है कि वह अदृश्य हो गया ॥ १३ ॥

निपानानीव गोभ्योऽपि क्षेत्रे कुल्ये च भारत ।

स्मृतिर्हि शाश्वतो धर्मो विप्रहीणो न दृश्यते ॥ १४ ॥

भरतनन्दन! जैसे बहुत - सी गौओं को पानी पिलानेसे निपान ( क्षुद्र जलाशय ) सूख जाते हैं तथा जैसे अधिक खेतोंकी सिंचाई करनेसे नहरोंका पानी निपट जाता है, उसी प्रकार सनातन वैदिक धर्म अथवा स्मृति- शास्त्र धीरे- धीरे क्षीण होकर कलियुगके अन्तिम भागमें दिखायी ही नहीं देता है ॥ १४ ॥

कामादन्येच्छया चान्ये कारणैरपरैस्तथा ।

असन्तोऽपि वृथाचारं भजन्ते बहवोऽपरे ॥ १५ ॥

क्योंकि उस समय कुछ लोग स्वार्थवश, दूसरे लोग दूसरोंकी इच्छासे तथा अन्य मनुष्य अन्यान्य कारणोंसे धर्माचरण करते हैं और बहुत-से असाधु पुरुष भी व्यर्थ धर्माचरणका ढोंग फैला लेते हैं ॥ १५ ॥

धर्मो भवति स क्षिप्रं प्रलापस्त्वेव साधुषु ।

अथैतानाहुरुन्मत्तानपि चावहसन्त्युत ॥ १६ ॥

उन दिनों लोगोंद्वारा प्रायः सकामभावसे ही धर्मका आचरण होता देखा जाता है । श्रेष्ठ पुरुषोंमें जो यथार्थ धर्म होता है, वह शीघ्र ही मूढ़ मनुष्योंकी दृष्टिमें प्रलापमात्र सिद्ध होता है । वे मूढ उन धर्मात्मा पुरुषोंको पागल कहते और उनकी हँसी उड़ाते हैं ॥ १६ ॥

महाजना ह्युपावृत्ता राजधर्मं समाश्रिताः ।

न हि सर्वहितः कश्चिदाचारः सम्प्रवर्तते ॥ १७ ॥

आचार्य द्रोण- जैसे महापुरुष भी स्वधर्मसे हटकर क्षत्रियधर्मका आश्रय लेते हैं; अतः कोई भी आचार ऐसा नहीं है, जो सबके लिये समानरूपसे हितकर या सबके द्वारा समानरूपसे पालित हो ॥ १७ ॥

तेनैवान्यः प्रभवति सोऽपरं बाधते पुनः ।

दृश्यते चैव स पुनस्तुल्यरूपो यदृच्छया ॥ १८ ॥

यह भी देखा जाता है कि उसी धर्मके आचरणसे विश्वामित्र आदि अन्य महापुरुषोंने उन्नति प्राप्त की है तथा रावणादि निशाचर उसी धर्मके बलसे दूसरोंको पीड़ा देते हैं एवं कश्यप आदि अनेक महर्षि ईश्वरकी इच्छासे उसी धर्मके द्वारा सदा एक-सी स्थितिमें दिखायी देते हैं ॥ १८ ॥

येनैवान्यः प्रभवति सोऽपरानपि बाधते ।

आचाराणामनैकाग्र्यं सर्वेषामुपलक्षयेत् ॥ १ ९ ॥

पृष्ठ 1674

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जिस धर्मको अपनाकर एक व्यक्ति उन्नति करता है, उसीसे दूसरा दूसरोंको पीड़ा देता है; अतः सबके लिये आचारोंकी एकरूपता कोई नहीं दिखा सकता ॥ १ ९ ॥

चिराभिपन्नः कविभिः पूर्वं धर्म उदाहृतः ।

तेनाचारेण पूर्वेण संस्था भवति शाश्वती ॥ २० ॥

आपने पहले उसी धर्मका वर्णन किया है, जिसे विद्वान्‌लोग चिरकालसे धारण करते चले आ रहे हैं । मैं भी यही समझता हूँ कि उस पूर्वप्रचलित धर्मके आचरणद्वारा ही समाजकी मर्यादा दीर्घकालतक टिकी रहती है ॥ २० ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि धर्मप्रामाण्याक्षेपे षष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २६० ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें धर्मकीप्रामाणिकतापर आक्षेपविषयक दो सौ साठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६० ॥

पृष्ठ 1675

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एकषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः जाजलिकी घोर तपस्या, सिरपर जटाओंमें पक्षियोंके घोंसला बनानेसे उनका अभिमान और आकाशवाणीकी प्रेरणासे उनका तुलाधार वैश्यके पास जाना भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।

तुलाधारस्य वाक्यानि धर्मे जाजलिना सह ॥ १ ॥

भीष्मजीने कहा- राजन्! धर्मके विषयमें जाजलिके साथ तुलाधार वैश्यकी जो बातें हुई थीं, उसी प्राचीन इतिहासका विद्वान् पुरुष यहाँ उदाहरण दिया करते हैं ॥

वने वनचरः कश्चिज्जाजलिर्नाम वै द्विजः ।

सागरोद्देशमागम्य तपस्तेपे महातपाः ॥ २ ॥

प्राचीन कालमें जाजलि नामसे प्रसिद्ध एक ब्राह्मण थे, जो वनमें ही रहते और विचरते थे । उन महातपस्वी जाजलिने समुद्रके तटपर जाकर बड़ी भारी तपस्या की ॥

नियतो नियताहारश्चीराजिनजटाधरः ।

मलपङ्कधरो धीमान् बहून् वर्षगणान् मुनिः ॥ ३ ॥

वे नियमसे रहते, नियमित भोजन करते और वल्कल, मृगचर्म एवं जटा धारण किया करते थे । वे बुद्धिमान् मुनि बहुत वर्षोंतक शरीरपर मैल और कीचड़ धारण किये खड़े रहे ॥ ३ ॥

स कदाचिन्महातेजा जलवासो महीपते ।

चचार लोकान् विप्रर्षिः प्रेक्षमाणो मनोजवः ॥ ४ ॥

राजन्! फिर किसी समय समुद्रतटस्थ जलयुक्त प्रदेशमें निवास करनेवाले वे महातेजस्वी विप्रर्षि सम्पूर्ण लोकोंको देखनेके लिये मनके समान तीव्र गतिसे विचरण करने लगे ॥ ४ ॥

स चिन्तयामास मुनिर्जलवासे कदाचन ।

विप्रेक्ष्य सागरान्तां वै महीं सवनकाननाम् ॥ ५ ॥

वन और काननोंसहित समुद्रपर्यन्त पृथ्वीका निरीक्षण करके समुद्रतटवर्ती सजल प्रदेशमें निवास करते समय जाजलि मुनि कभी इस प्रकार विचार करने लगे ॥ ५ ॥

न मया सदृशोऽस्तीह लोके स्थावरजङ्गमे ।

अप्सु वैहायसं गच्छेन्मया योऽन्यः सहेति वै ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1676

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इस चराचर जगत्में मेरे सिवा ऐसा कोई दूसरा मनुष्य नहीं है, जो मेरे साथ जलमें विचरने और आकाशमें घूमने - फिरनेकी शक्ति रखता हो ॥ ६ ॥

अदृश्यमानो रक्षोभिर्जलमध्ये वदंस्तथा ।

अब्रूवंश्च पिशाचास्तं नैवं त्वं वक्तुमर्हसि ॥ ७ ॥

राक्षसोंसे अदृश्य रहकर जलयुक्त प्रदेशमें निवास करनेवाले जाजलि मुनिने जब इस प्रकार कहा, तब अदृश्य पिशाचोंने उनसे कहा, ' मुने! तुम्हें ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये ॥ ७ ॥

तुलाधारो वणिग्धर्मा वाराणस्यां महायशाः ।

सोऽप्येवं नार्हते वक्तुं यथा त्वं द्विजसत्तम ॥ ८ ॥

‘ द्विजश्रेष्ठ! काशीमें महायशस्वी तुलाधार रहते हैं, जो वणिक् - धर्मका पालन करते हैं; किंतु वे भी ऐसी बात नहीं कह सकते, जैसी आज आप कह रहे हैं ' ॥

इत्युक्तो जाजलिर्भूतैः प्रत्युवाच महातपाः ।

पश्येयं तमहं प्राज्ञं तुलाधारं यशस्विनम् ॥ ९ ॥

उन अदृश्य भूतोंके ऐसा कहनेपर महातपस्वी जाजलिने उनसे कहा-' क्या मैं उन ज्ञानी एवं यशस्वी तुलाधारका दर्शन कर सकता हूँ' ॥ ९ ॥

इति ब्रुवाणं तमृषिं रक्षांस्युद्धृत्य सागरात् ।

अब्रुवन् गच्छ पन्थानमास्थायेमं द्विजोत्तम ॥ १० ॥

ऐसा कहते हुए उन महर्षिको समुद्रतटवर्ती जलप्रदेशसे बाहर निकालकर राक्षसोंने उनसे कहा — ‘ द्विजश्रेष्ठ! इस मार्गका आश्रय लेकर काशीपुरी चले जाइये ' ॥ १० ॥

इत्युक्तो जाजलिर्भूतैर्जगाम विमनास्तदा ।

वाराणस्यां तुलाधारं समासाद्याब्रवीदिदम् ॥ ११ ॥

उन अदृश्य भूतोंके ऐसा कहनेपर जाजलि मुनि उदास होकर काशीमें गये और तुलाधारके पास पहुँचकर उससे इस प्रकार बोले ॥ ११ ॥

युधिष्ठिर उवाच

किं कृतं दुष्करं तात कर्म जाजलिना पुरा ।

येन सिद्धिं परां प्राप्तस्तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ १२ ॥

युधिष्ठिरने पूछा – तात! पूर्वकालमें जाजलिने कौन - सा ऐसा दुष्कर कार्य किया था, जिससे वे परम सिद्धिको प्राप्त हो गये, यह मुझे विस्तारपूर्वक बतानेकी कृपा करें ॥ १२ ॥

भीष्म उवाच

अतीव तपसा युक्तो घोरेण स बभूव ह ।

तथोपस्पर्शनरतः सायं प्रातर्महातपाः ॥ १३ ॥

अग्नीन् परिचरन् सम्यक् स्वाध्यायपरमो द्विजः ।

पृष्ठ 1677

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वानप्रस्थविधानज्ञो जाजलिर्ज्वलितः श्रिया ॥ १४ ॥

भीष्मजीने कहा- बेटा! जाजलि मुनि महान् तपस्वी थे और अत्यन्त घोर तपस्यामें लगे हुए थे । वे प्रतिदिन सायंकाल और प्रातःकाल स्नान एवं संध्योपासना करके विधिपूर्वक अग्निहोत्र करते और वेदोंके स्वाध्यायमें तत्पर रहते थे । ब्रह्मर्षि जाजलि वानप्रस्थके धर्मकी विधिको जानने और पालनेवाले थे, वे अपने तेजसे प्रज्वलित हो रहे थे ॥ १३-१४ ॥

वने तपस्यतिष्ठत् स न च धर्ममवैक्षत ।

वर्षास्वाकाशशायी च हेमन्ते जलसंश्रयः ॥ १५ ॥

वातातपसहो ग्रीष्मे न च धर्ममविन्दत ।

दुःखशय्याश्च विविधा भूमौ च परिवर्तते ॥ १६ ॥

वे वनमें रहकर तपस्यामें ही लगे रहते, किंतु अपने धर्मकी कभी अवहेलना नहीं करते थे । वे वर्षाके दिनोंमें खुले आकाशके नीचे सोते और हेमन्त ऋतुमें पानीके भीतर बैठा करते थे । इसी तरह गर्मीके महीनोंमें कड़ी धूप और लूका कष्ट सहते थे; परंतु उनको वास्तविक धर्मका ज्ञान नहीं हुआ । वे पृथ्वीपर ही लोटते और तरह-तरहसे इस प्रकार सोते, जिससे दुःख और कष्टका ही अधिक अनुभव होता था ॥ १६ ॥

ततः कदाचित् स मुनिर्वर्षास्वाकाशमास्थितः ।

अन्तरिक्षाज्जलं मूर्ध्ना प्रत्यगृह्णान्मुहुर्मुहुः ॥ १७ ॥

तदनन्तर किसी समय वर्षा --ऋतु आनेपर वे मुनि खुले आकाशके नीचे खड़े हो गये और आकाशसे जो जलकी मूसलाधार वृष्टि होती थी, उसके आघातको बारंबार अपने मस्तकपर ही सहने लगे ॥ १७ ॥

अथ तस्य जटाः क्लिन्ना बभूवुर्ग्रथिताः प्रभो ।

अरण्यगमनान्नित्यं मलिनोऽमलसंयुतः ॥ १८ ॥

प्रभो! उनके सिरके बाल बराबर भींगे रहनेके कारण उलझकर जटाके रूपमें परिणत हो गये । सदा वनमें ही विचरण करनेके कारण उनके शरीरपर मैल जम गयी थी; परंतु उनका अन्तःकरण निर्मल हो गया था ॥ १८ ॥

स कदाचिन्निराहारो वायुभक्षो महातपाः ।

तस्थौ काष्ठवदव्यग्रो न चचाल च कर्हिचित् ॥ १ ९ ॥

एक समयकी बात है, वे महातपस्वी जाजलि निराहार रहकर वायु - भक्षण करते हुए काष्ठकी भाँति खड़े हो गये, उस समय उनके चित्तमें तनिक भी व्यग्रता नहीं थी और वे क्षणभरके लिये भी कभी विचलित नहीं होते थे ॥ १ ९ ॥

तस्य स्म स्थाणुभूतस्य निर्विचेष्टस्य भारत ।

कुलिङ्गशकुनौ राजन् नीडं शिरसि चक्रतुः ॥ २० ॥

भरतनन्दन! वे चेष्टाशून्य होनेके कारण किसी ठूंठे पेड़के समान जान पड़ते थे । राजन्! उस समय उनके सिरपर गौरैया पक्षीके एक जोड़ेने अपने रहनेके लिये एक घोंसला बना

पृष्ठ 1678

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लिया ॥ २० ॥

स तौ दयावान् ब्रह्मर्षिरुपप्रैक्षत दम्पती ।

कुर्वाणौ नीडकं तत्र जटासु तृणतन्तुभिः ॥ २१ ॥

वे विप्रर्षि बड़े दयालु थे, इसलिये उन्होंने उन दोनों पक्षियोंको तिनकोंसे अपनी जटाओंमें घोंसला बनाते देखकर भी उनकी उपेक्षा कर दी - उन्हें हटाने या उड़ानेकी कोई चेष्टा नहीं की ॥ २१ ॥

यदा न स चलत्येव स्थाणुभूतो महातपाः ।

ततस्तौ सुखविश्वस्तौ सुखं तत्रोषतुस्तदा ॥ २२ ॥

जब वे महातपस्वी ठँठे काठके समान होकर जरा भी हिले - डुले नहीं, तब अच्छी तरह विश्वास जम जानेके कारण वे दोनों पक्षी वहाँ बड़े सुखसे रहने लगे ॥ २२ ॥

अतीतास्वथ वर्षासु शरत्काल उपस्थिते ।

प्राजापत्येन विधिना विश्वासात् काममोहितौ ॥ २३ ॥

तत्रापातयतां राजन् शिरस्यण्डानि खेचरौ ।

तान्यबुध्यत तेजस्वी स विप्रः संशितव्रतः ॥ २४ ॥

राजन्! धीरे - धीरे वर्षा -ऋतु बीत गयी और शरत्काल उपस्थित हुआ । उस समय कामसे मोहित होकर उन गौरैयोंने संतानोत्पादनकी विधिसे परस्पर समागम किया और विश्वासके कारण महर्षिके सिरपर ही अण्डे दिये । कठोर व्रतका पालन करनेवाले उन तेजस्वी ब्राह्मणको यह मालूम हो गया कि पक्षियोंने मेरी जटाओंमें अण्डे दिये हैं ॥ २३-२४ ॥

बुद्ध्वा च स महातेजा न चचाल च जाजलिः ।

धर्मे कृतमना नित्यं नाधर्मं स त्वरोचयत् ॥ २५ ॥

इस बातको जानकर भी महातेजस्वी जाजलि विचलित नहीं हुए । उनका मन सदा धर्ममें लगा रहता था; अतः उन्हें अधर्मका कार्य पसंद नहीं था ॥ २५ ॥

अहन्यहनि चागत्य ततस्तौ तस्य मूर्धनि ।

आश्वासितौ निवसतः सम्प्रहृष्टौ तदा विभो ॥ २६ ॥

प्रभो! चिड़ियोंके वे जोड़े प्रतिदिन चारा चुगनेके लिये जाते और फिर लौटकर उनके मस्तकपर ही बसेरा लेते थे, वहाँ उन्हें बड़ा आश्वासन मिलता था और वे बहुत प्रसन्न रहते थे ॥ २६ ॥

अण्डेभ्यस्त्वथ पुष्टेभ्यः प्राजायन्त शकुन्तकाः ।

व्यवर्धन्त च तत्रैव न चाकम्पत जाजलिः ॥ २७ ॥

अण्डोंके पुष्ट होनेपर उन्हें फोड़कर बच्चे बाहर निकले और वहीं पलकर बड़े होने लगे, तथापि जाजलि मुनि हिले- डुले नहीं ॥ २७ ॥

पृष्ठ 1679

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मुनि जाजलिकी तपस्या

पृष्ठ 1680

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स रक्षमाणस्त्वण्डानि कुलिङ्गानां धृतव्रतः ।

तथैव तस्थौ धर्मात्मा निर्विचेष्टः समाहितः ॥ २८ ॥

दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करनेवाले वे एकाग्रचित्त धर्मात्मा मुनि उन पक्षियोंके अण्डोंकी रक्षा करते हुए पूर्ववत् निश्चेष्टभावसे खड़े रहे ॥ २८ ॥

ततस्तु कालसमये बभूवुस्तेऽथ पक्षिणः ।

बुबुधे तांस्तु स मुनिर्जातपक्षान् कुलिङ्गकान् ॥ २ ९ ॥

तदनन्तर कुछ समय बीतनेपर उन सब बच्चोंके पर निकल आये, मुनिको यह बात मालूम हो गयी कि चिड़ियोंके इन बच्चोंके पंख निकल आये हैं ॥ २ ९ ॥

ततः कदाचित् तांस्तत्र पश्यन् पक्षीन् यतव्रतः ।

बभूव परमप्रीतस्तदा मतिमतां वरः ॥ ३० ॥

तथा तानपि संवृद्धान् दृष्ट्वा चाप्नुवतां मुदम् ।

शकुनौ निर्भयौ तत्र ऊषतुश्चात्मजैः सह ॥ ३१ ॥

संयमपूर्वक व्रतके पालनमें तत्पर रहनेवाले, बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ जाजलि किसी दिन वहाँ उन पंखधारी बच्चोंको उड़ते देख बड़े प्रसन्न हुए तथा अपने बच्चोंको बड़ा हुआ देख वे दोनों पक्षी भी बड़े आनन्दका अनुभव करने लगे और अपनी संतानोंके साथ निर्भय होकर वहीं रहने लगे ॥ ३०-३१ ॥

जातपक्षांश्च सोऽपश्यदुड्डीनान् पुनरागतान् ।

सायं सायं द्विजान् विप्रो न चाकम्पत जाजलिः ॥ ३२ ॥

बच्चोंके पंख हो गये थे, इसलिये वे दिनमें चारा चुगनेके लिये उड़कर निकल जाते और प्रतिदिन सायंकाल फिर वहीं लौट आते थे । ब्राह्मणप्रवर जाजलि उन पक्षियोंको इस प्रकार आते -जाते देखते, परंतु हिलते डुलते नहीं थे ॥ ३२ ॥

कदाचित् पुनरभ्येत्य पुनर्गच्छन्ति संततम् ।

त्यक्ता मातापितृभ्यां ते न चाकम्पत जाजलिः ॥ ३३ ॥

किसी समय माता - पिता उनको छोड़कर उड़ गये । अब वे बच्चे कभी आकर फिर चले जाते और जाकर फिर चले आते थे, इस प्रकार वे सदा आने - जाने लगे । उस समयतक जाजलि मुनि हिले - डुले नहीं ॥

तथा ते दिवसं चापि गत्वा सायं पुनर्नृप ।

उपावर्तन्त तत्रैव निवासार्थं शकुन्तकाः ॥ ३४ ॥

नरेश्वर! अब वे पक्षी दिनभर चरनेके लिये चले जाते और शामको पुनः बसेरा लेनेके लिये वहीं आते थे ॥ ३४ ॥

कदाचिद् दिवसान् पञ्च समुत्पत्य विहङ्गमाः ।

षष्ठेऽहनि समाजग्मुर्न चाकम्पत जाजलिः ॥ ३५ ॥