श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 1731–1740
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1731–1740
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गच्छत्येव परित्यागी वानप्रस्थश्च गच्छति ।
गृहस्थो ब्रह्मचारी च उभौ तावपि गच्छतः ॥ १३ ॥
संन्यासी परमपदको प्राप्त कर सकता है, वानप्रस्थ भी वहीं जा सकता है । गृहस्थ और ब्रह्मचारी – ये दोनों भी उसी पदको प्राप्त हो सकते हैं ॥ १३ ॥
देवयाना हि पन्थानश्चत्वारः शाश्वता मताः ।
एषां ज्यायः कनीयस्त्वं फलेषूक्तं बलाबलम् ॥ १४ ॥
चारों आश्रम ही देवयाननामक चार सनातन मार्ग माने गये हैं । इनमें कौन बड़ा है कौन छोटा; अतः कौन प्रबल है, कौन दुर्बल– यह उनके फलोंको निमित्त बनाकर बताया गया है ॥ १४ ॥
एवं विदित्वा सर्वार्थानारभेतेति वैदिकम् ।
नारभेतेति चान्यत्र नैष्ठिकी श्रूयते श्रुतिः ॥ १५ ॥
ऐसा जानकर समस्त कार्योंका आरम्भ करे, यह वैदिक मत है । अन्यत्र यह सिद्धान्तभूत श्रुति भी सुनी जाती है कि कर्मोंका आरम्भ ही न करे ॥ १५ ॥
अनालम्भे ह्यदोषः स्यादालम्भे दोष उत्तमः ।
एवं स्थितस्य शास्त्रस्य दुर्विज्ञेयं बलाबलम् ॥ १६ ॥
क्योंकि यज्ञ आदि कार्योंमें आलम्भन न करनेपर दोषकी प्राप्ति नहीं होती है और आलम्भन करनेपर महान् दोष प्राप्त होता है । ऐसी स्थितिमें वेदवचनोंके बलाबलको जानना अत्यन्त कठिन है ॥ १६ ॥
यद्यत्र किंचित् प्रत्यक्षमहिंसायाः परं मतम् ।
ऋते त्वागमशास्त्रेभ्यो ब्रूहि तद् यदि पश्यसि ॥ १७ ॥
वेदों और तदनुकूल आगमोंको छोड़कर अन्यत्र अहिंसासे भिन्न हिंसाबोधक शास्त्रका कोई फल यदि युक्तिसे भी प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाला प्रतीत होता हो अथवा तुम अनुभवमें उसका साक्षात्कार कर रहे हो तो उसे स्पष्ट बताओ ॥ १७ ॥
स्यूमरश्मिरुवाच
स्वर्गकामो यजेतेति सततं श्रूयते श्रुतिः ।
फलं प्रकल्प्य पूर्वं हि ततो यज्ञः प्रतायते ॥ १८ ॥
स्यूमरश्मिने कहा - ' स्वर्गकी इच्छा रखनेवाला पुरुष यज्ञ करे' यह श्रुति सदा ही सुनी जाती है । अतः मनुष्य पहले स्वर्गरूप फलकी कल्पना ( संकल्प ) करके फिर यज्ञका अनुष्ठान आरम्भ करता है ॥ १८ ॥
अजश्चाश्वश्च मेषश्च गौश्च पक्षिगणाश्च ये ।
ग्राम्यारण्याश्चौषधयः प्राणस्यान्नमिति श्रुतिः ॥ १ ९ ॥
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बकरा, घोड़ा, भेड़, गाय, पक्षी, ग्राम्य अन्न तथा जंगली अन्न आदि सारी वस्तुएँ प्राणके लिये अन्न हैं— ऐसा श्रुतिका कथन है ॥ १ ९ ॥
तथैवान्नं ह्यहरहः सायंप्रातर्निरूप्यते ।
पशवश्चाथ धान्यं च यज्ञस्याङ्गमिति श्रुतिः ॥ २० ॥
प्रतिदिन सबेरे - शाम अन्नको प्राणका भोज्य बताया गया है । पशु और धान्य — ये यज्ञके अंग हैं, ऐसा श्रुति कहती है ॥ २० ॥
एतानि सह यज्ञेन प्रजापतिरकल्पयत् ।
तेन प्रजापतिर्देवान् यज्ञेनायजत प्रभुः ॥ २१ ॥
भगवान् प्रजापतिने यज्ञके साथ- साथ इन सबकी सृष्टि की । फिर उन प्रजापतिने ही इन यज्ञसामग्रियोंद्वारा देवताओंसे यज्ञका अनुष्ठान कराया ॥ २१ ॥
तदन्योन्यवराः सर्वे प्राणिनः सप्त सप्तधा ।
यज्ञेषूपाकृतं विश्वं प्राहुरुत्तमसंज्ञितम् ॥ २२ ॥
सात- सात प्रकारके जो ग्राम्य और आरण्य ( जंगली ) प्राणी हैं, वे सब एक- दूसरेकी अपेक्षा श्रेष्ठ हैं । इन सबमें ' उत्तम ' नामसे प्रसिद्ध जो सब- के - सब पुरुष या मनुष्यसंज्ञक प्राणी हैं, उन्हें भी यज्ञके लिये नियुक्त बताया गया है ॥ २२ ॥
एतच्चैवाभ्यनुज्ञातं पूर्वैः पूर्वतरैस्तथा ।
को जातु न विचिन्वीत विद्वान् स्वां शक्तिमात्मनः ॥ २३ ॥
पूर्ववर्ती तथा अधिक पूर्ववर्ती पुरुषोंने इन समस्त द्रव्योंको यज्ञका अंग माना है, अतः कौन विद्वान् मनुष्य अपनी शक्तिके अनुसार कभी किसी यज्ञको अपने लिये नहीं चुनेगा ॥ २३ ॥
पशवश्च मनुष्याश्च द्रुमाश्चौषधिभिः सह ।
स्वर्गमेवाभिकांक्षन्ते न च स्वर्गस्ततो मखात् ॥ २४ ॥
पशु, मनुष्य, वृक्ष और ओषधियाँ - ये सब- के - सब स्वर्ग चाहते हैं, परंतु यज्ञको छोड़कर और किसी साधनसे वह विशाल स्वर्गलोक सुलभ नहीं हो सकता है ॥ २४ ॥
ओषध्यः पशवो वृक्षा वीरुदाज्यं पयो दधि ।
हविर्भूमिर्दिशः श्रद्धा कालश्चैतानि द्वादश ॥ २५ ॥
ओषधि ( अन्न आदि), पशु, वृक्ष, लता, घी, दूध, दही, अन्यान्य हविष्य, भूमि, दिशा, श्रद्धा और काल — ये बारह यज्ञके अंग हैं ॥ २५ ॥
ऋचो यजूंषि सामानि यजमानश्च षोडश ।
अग्निर्ज्ञेयो गृहपतिः स सप्तदश उच्यते ॥ २६ ॥
ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और यजमान – ये चार मिलकर सोलह यज्ञांग होते हैं तथा गार्हपत्य अग्निको सत्रहवाँ यज्ञांग समझना चाहिये । इस प्रकार ये सत्रह अंग बताये जाते हैं ॥ २६ ॥
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अङ्गान्येतानि यज्ञस्य यज्ञो मूलमिति श्रुतिः ।
आज्येन पयसा दध्ना शकृताऽऽमिक्षया त्वचा ॥ २७ ॥
बालैः शृङ्गेण पादेन सम्भवत्येव गौर्मखम् ।
एवं प्रत्येकशः सर्वं यद् यदस्य विधीयते ॥ २८ ॥
ये सब यज्ञके अंग हैं और यज्ञ इस जगत्की स्थितिका मूल कारण है; ऐसा श्रुतिका कथन है । घी, दूध, दही, छाछ, गोबर, चमड़ा, बाल, सींग और पैर – इन सबके द्वारा गौ यज्ञकर्मका सम्पादन करती है । इस प्रकार इनमेंसे प्रत्येक वस्तुका, जो- जो विहित है, संग्रह करना चाहिये ॥ २७-२८ ॥
यज्ञं वहन्ति सम्भूय सहर्त्विग्भिः सदक्षिणैः ।
संहृत्यैतानि सर्वाणि यज्ञं निर्वर्तयन्त्युत ॥ २ ९ ॥
ऋत्विक् और दक्षिणाओंके साथ ये सब मिलकर यज्ञका निर्वाह करते हैं । यजमान इन सारी वस्तुओंका संग्रह करके यज्ञका अनुष्ठान करते हैं ॥ २ ९ ॥
यज्ञार्थानि हि सृष्टानि यथार्था श्रूयते श्रुतिः ।
एवं पूर्वतराः सर्वे प्रवृत्ताश्चैव मानवाः ॥ ३० ॥
ये सारी वस्तुएँ यज्ञके लिये रची गयी हैं; यह श्रुतिका कथन यथार्थ ही है । पहलेके सभी मनुष्य इसी प्रकार यज्ञानुष्ठानमें प्रवृत्त होते आये हैं ॥ ३० ॥
न हिनस्ति नारभते नाभिद्रुह्यति किंचन ।
यज्ञो यष्टव्य इत्येव यो यजत्यफलेप्सया ॥ ३१ ॥
यज्ञका अनुष्ठान अपना कर्तव्य है - ऐसा समझकर जो फलकी इच्छा न रखते हुए यज्ञ करता है, वह न तो हिंसा करता है, न किसीसे द्रोह करता है और न अहंकारपूर्वक किसी कर्मका आरम्भ ही करता है ॥ ३१ ॥
यज्ञाङ्गान्यपि चैतानि यज्ञोक्तान्यनुपूर्वशः ।
विधिना विधियुक्तानि धारयन्ति परस्परम् ॥ ३२ ॥
यज्ञशास्त्रमें क्रमशः वर्णित ये सम्पूर्ण यज्ञांग विधि - पूर्वक यज्ञमें प्रयुक्त हो एक दूसरेको धारण करते हैं ॥
आम्नायमार्षं पश्यामि यस्मिन् वेदाः प्रतिष्ठिताः ।
तं विद्वांसोऽनुपश्यन्ति ब्राह्मणस्यानुदर्शनात् ॥ ३३ ॥
मैं ऋषियोंद्वारा कथित आम्नाय ( धर्मशास्त्र ) को देखता हूँ, जिसमें सारे वेद प्रतिष्ठित हैं । कर्ममें प्रवृत्ति करानेवाले ब्राह्मणग्रन्थके वाक्योंका उसमें दर्शन होनेसे विद्वान् पुरुष उस आर्षग्रन्थको प्रमाणभूत मानते हैं ॥ ३३ ॥
ब्राह्मणप्रभवो यज्ञो ब्राह्मणार्पण एव च ।
अनुयज्ञं जगत् सर्वं यज्ञश्चानुजगत् सदा ॥ ३४ ॥
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वेदोंके ब्राह्मणभागसे यज्ञका प्राकट्य हुआ है । वह यज्ञ ब्राह्मणोंको ही अर्पित किया जाता है । यज्ञके पीछे सारा जगत् और जगत्के पीछे सदा यज्ञ रहता है ॥ ३४ ॥
ओमिति ब्रह्मणो योनिर्नमः स्वाहा स्वधा वषट् ।
यस्यैतानि प्रयुज्यन्ते यथाशक्ति कृतान्यपि ॥ ३५ ॥
‘ ॐ ’ यह वेदका मूल कारण है । वह ॐ तथा नमः, स्वाहा, स्वधा और वषट्—ये पद यथाशक्ति जिसके यज्ञमें प्रयुक्त होते हैं, उसीका यज्ञ सांगोपांग सम्पन्न होता है ॥ ३५ ॥
न तस्य त्रिषु लोकेषु परलोकभयं विदुः ।
इति वेदा वदन्तीह सिद्धाश्च परमर्षयः ॥ ३६ ॥
ऐसे मनुष्यको तीनों लोकोंमें किसी भी प्राणीसे भय नहीं होता है । यह बात यहाँ सम्पूर्ण वेद तथा सिद्ध महर्षि भी कहते हैं ॥ ३६ ॥
ऋचो यजूंषि सामानि स्तोभाश्च विधिचोदिताः ।
यस्मिन्नेतानि सर्वाणि भवन्तीह स वै द्विजः ॥ ३७ ॥
ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और विधिविहित स्तोभ* - ये सब जिसमें विद्यमान होते हैं, वही इस जगत्में द्विज कहलानेका अधिकारी है ॥ ३७ ॥
अग्न्याधेये यद् भवति यच्च सोमे सुते द्विज ।
यच्चेतरैर्महायज्ञैर्वेद तद् भगवान् पुनः ॥ ३८ ॥
ब्रह्मन्! अग्न्याधान, ( अग्निहोत्र ) तथा सोमयाग करनेसे जो फल मिलता है और अन्यान्य महायज्ञोंके अनुष्ठानसे जिस फलकी प्राप्ति होती है, उसे आप जानते हैं ॥ ३८ ॥
तस्माद् ब्रह्मन् यजेच्चैव याजयेच्चाविचारयन् ।
यजतः स्वर्गविधिना प्रेत्य स्वर्गफलं महत् ॥ ३ ९ ॥
अतः विप्रवर! प्रत्येक द्विजको चाहिये कि वह बिना किसी विचारके यज्ञ करे और करावे । जो स्वर्गदायक विधिसे यज्ञ करता है, उसे देहत्यागके पश्चात् महान् स्वर्गफलकी प्राप्ति होती है ॥ ३ ९ ॥
नायं लोकोऽस्त्ययज्ञानां परश्चेति विनिश्चयः ।
वेदवादविदश्चैव प्रमाणमुभयं तदा ॥ ४० ॥
यह निश्चय है कि जो यज्ञ नहीं करते हैं, ऐसे पुरुषोंके लिये न तो यह लोक सुखदायक होता है और न स्वर्ग ही । जो वेदोक्त विषयोंके जानकार हैं, वे प्रवृत्ति और निवृत्ति— दोनोंको ही प्रमाणभूत मानते हैं ॥ ४० ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि गोकपिलीये अष्टषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २६८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें गोकपिलीयोपाख्यानविषयक दोसौ अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६८ ॥
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* सामगानके जो ‘ हाऽऽयि, हाss वु ' इत्यादि पूरक अक्षर हैं, उन्हें ' स्तोभ ' कहते हैं ।
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एकोनसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः प्रवृत्ति एवं निवृत्तिमार्गके विषयमें स्यूमरश्मि- कपिल - संवाद कपिलउवाच
एतावदनुपश्यन्ति यतयो यान्ति मार्गगाः ।
नैषां सर्वेषु लोकेषु कश्चिदस्ति व्यतिक्रमः ॥ १ ॥
कपिलने कहा — यम- नियमोंका पालन करनेवाले संन्यासी ज्ञानमार्गका आश्रय लेकर परब्रह्म परमात्माको प्राप्त होते हैं । वे इस दृश्य प्रपंचको नश्वर समझते हैं । सम्पूर्ण लोकोंमें उनकी गतिका कहीं कोई अवरोध नहीं होता ॥ १ ॥
निर्द्वन्द्वा निर्नमस्कारा निराशीर्बन्धना बुधाः ।
विमुक्ताः सर्वपापेभ्यश्चरन्ति शुचयोऽमलाः । २ ॥
उन्हें सर्दी - गर्मी आदि द्वन्द्व विचलित नहीं करते । वे न तो किसीको प्रणाम करते हैं और न आशीर्वाद ही देते हैं। इतना ही नहीं, वे विद्वान् पुरुष कामनाओंके बन्धनमें भी नहीं बँधते हैं । सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त, पवित्र और निर्मल होकर सर्वत्र विचरते रहते हैं ॥ २ ॥
अपवर्गेऽथ संत्यागे बुद्धौ च कृतनिश्चयाः ।
ब्रह्मिष्ठा ब्रह्मभूताश्च ब्रह्मण्येव कृतालयाः ॥ ३ ॥
वे मोक्षकी प्राप्ति और सर्वस्वके त्यागके लिये अपनी बुद्धिमें दृढ़ निश्चय रखते हैं । ब्रह्मके ध्यानमें तत्पर एवं ब्रह्मस्वरूप होकर ब्रह्ममें ही निवास करते हैं ॥
विशोका नष्टरजसस्तेषां लोकाः सनातनाः ।
तेषां गतिं परां प्राप्य गार्हस्थ्ये किं प्रयोजनम् ॥ ४ ॥
उन्हें वे सनातन लोक प्राप्त होते हैं, जहाँ शोक और दुःखका सर्वथा अभाव है तथा जहाँ रजोगुण ( काम- क्रोध आदि) का दर्शन नहीं होता । उस परम गतिको पाकर उन्हें गार्हस्थ्य - आश्रममें रहने और यहाँके धर्मोंके पालन करनेकी क्या आवश्यकता रह जाती है? ॥ स्यूमरश्मिरुवाच
यद्येषा परमा काष्ठा यद्येषा परमा गतिः ।
गृहस्थानव्यपाश्रित्य नाश्रमोऽन्यः प्रवर्तते ॥ ५ ॥
स्यूमरश्मिने कहा –ज्ञान प्राप्त करके परब्रह्ममें स्थित हो जाना ही यदि पुरुषार्थकी चरम सीमा है, यदि वही उत्तम गति है, तब तो गृहस्थ - धर्मका महत्त्व और भी बढ़ जाता है; क्योंकि गृहस्थोंका सहारा लिये बिना कोई भी आश्रम न तो चल सकता है और न तो ज्ञानकी निष्ठा ही प्रदान कर सकता है ॥ ५ ॥
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यथा मातरमाश्रित्य सर्वे जीवन्ति जन्तवः ।
एवं गार्हस्थ्यमाश्रित्य वर्तन्त इतराश्रमाः ॥ ६ ॥
जैसे समस्त प्राणी माताकी गोदका सहारा पाकर ही जीवन धारण करते हैं, उसी प्रकार गृहस्थ - आश्रमका आश्रय लेकर ही दूसरे आश्रम टिके हुए हैं ॥ ६ ॥
गृहस्थ एव यजते गृहस्थस्तप्यते तपः ।
गार्हस्थ्यमस्य धर्मस्य मूलं यत्किंचिदेजते ॥ ७ ॥
गृहस्थ ही यज्ञ करता है, गृहस्थ ही तप करता है । मनुष्य जो कुछ भी चेष्टा करता है--जिस किसी भी शुभ कर्मका आचरण करता है, उस धर्मका मूल कारण गार्हस्थ्य - आश्रम ही है ॥ ७ ॥
प्रजनाद्यभिनिर्वृत्ताः सर्वे प्राणभृतो जनाः ।
प्रजनं चाप्युतान्यत्र न कथंचन विद्यते ॥ ८ ॥
समस्त प्राणधारी जीव संतानके उत्पादन आदिसे सुखका अनुभव करते हैं, परंतु संतान गार्हस्थ्य- आश्रमके सिवा अन्यत्र किसी तरह सुलभ नहीं है ॥ ८ ॥
यास्तु स्युर्बर्हिरोषध्यो बहिरन्यास्तथाद्रिजाः ।
ओषधिभ्यो बहिर्यस्मात् प्राणात् कश्चिन्न दृश्यते ॥ ९ ॥
कुश- काश आदि तृण, धान-जौ आदि ओषधि, नगरके बाहर उत्पन्न होनेवाली दूसरी ओषधियाँ तथा पर्वतपर होनेवाली जो ओषधियाँ हैं, उन सबका मूल भी गार्हस्थ्य- आश्रम ही है ( क्योंकि वहींके यज्ञसे पर्जन्य ( मेघ ) की उत्पत्ति होती है, जिससे वर्षा आदिके द्वारा तृण-लता, ओषधियाँ उत्पन्न होती हैं ) । प्राणस्वरूप जो ओषधियाँ हैं; उससे बाहर कोई दिखायी नहीं देता ॥ ९ ॥
कस्यैषा वाग् भवेत् सत्या मोक्षो नास्ति गृहादिति ।
अश्रद्दधानैरप्राज्ञैः सूक्ष्मदर्शनवर्जितैः ॥ १० ॥
निरासैरलसैः श्रान्तैस्तप्यमानैः स्वकर्मभिः ।
शमस्योपरमो दृष्टः प्रव्रज्यायामपण्डितैः ॥ ११ ॥
गृहस्थाश्रमके धर्मोंका पालन करनेसे मोक्ष नहीं होता है, ऐसी किसकी वाणी सत्य होगी । जो श्रद्धारहित, मूढ़ और सूक्ष्मदृष्टिसे वंचित हैं, अस्थिर, आलसी, श्रान्त और अपने पूर्वकृत कर्मोंसे संतप्त हैं, वे अज्ञानी पुरुष ही संन्यास- मार्गका आश्रय ले गृहस्थाश्रममें शान्तिका अभाव देखते हैं ॥ १०-११ ॥
त्रैलोक्यस्यैव हेतुर्हि मर्यादा शाश्वती ध्रुवा ।
ब्राह्मणो नाम भगवान् जन्मप्रभृति पूज्यते ॥ १२ ॥
वैदिक धर्मकी सनातन मर्यादा तीनों लोकोंका हित करनेवाली एवं ध्रुव है । ब्राह्मण पूजनीय है और जन्म - कालसे ही उसका सबके द्वारा समादर होता है ॥ १२ ॥
प्राग्गर्भाधानान्मन्त्रा हि प्रवर्तन्ते द्विजातिषु ।
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अविश्रम्भेषु वर्तन्ते विश्रम्भेष्वप्यसंशयम् ॥ १३ ॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य- तीनों वर्णोंमें गर्भाधानसे पहले वेदमन्त्रोंका उच्चारण किया जाता है । फिर लौकिक और पारलौकिक सभी कार्योंमें निस्संदेह उन वेदमन्त्रोंकी प्रवृत्ति होती है ॥ १३ ॥
दाहे पुनः संश्रयणे संश्रिते पात्रभोजने ।
दाने गवां पशूनां वा पिण्डानामप्सु मज्जने ॥ १४ ॥
मृतकके दाह - संस्कारमें, पुनः देह धारण करनेमें, देह धारण कर लेनेपर, मृत व्यक्तिकी तृप्तिके लिये प्रतिदिन तर्पण और श्राद्ध करनेमें, वैतरणीके निमित्त गौओं अथवा अन्य पशुओंका दान करनेमें तथा श्राद्धकर्ममें दिये हुए पिण्डोंका जलके भीतर विसर्जन करनेमें भी वैदिक मन्त्रोंका उपयोग होता है - इन सब कार्योंके मूल वेद- मन्त्र हैं ॥ १४ ॥
अर्चिष्मन्तो बर्हिषदः कव्यादाः पितरस्तथा ।
मृतस्याप्यनुमन्यन्ते मन्त्रान् मन्त्राश्च कारणम् ॥ १५ ॥
अर्चिष्मत्, बर्हिषद् तथा कव्यवाह संज्ञक पितर भी मृत व्यक्तिके ( सुख- शान्ति एवं प्रसन्नता) के लिये मन्त्र- पाठकी अनुमति देते हैं । मन्त्र ही सब धर्मोंके कारण हैं ॥ १५ ॥
एवं क्रोशत्सु वेदेषु कुतो मोक्षोऽस्ति कस्यचित् ।
ऋणवन्तो यदा मर्त्याः पितृदेवद्विजातिषु ॥ १६ ॥
वे ही वेद- मन्त्र जब पुकार- पुकारकर कहते हैं कि मनुष्य देवताओं, पितरों और ऋषियोंके जन्मसे ही ऋणी होते हैं, तब गृहस्थाश्रममें रहकर उन ऋणोंको चुकाये बिना किसीका भी मोक्ष कैसे हो सकता है? ॥ १६ ॥
श्रिया विहीनैरलसैः पण्डितैः सम्प्रवर्तितम् ।
वेदवादापरिज्ञानं सत्याभासमिवानृतम् ॥ १७ ॥
श्रीहीन और आलसी पण्डितोंने कर्मोंके त्यागसे मोक्ष मिलता है - ऐसा मत चलाया है । यह सुननेमें सत्य- सा आभासित होता है, परंतु है मिथ्या । इस मार्गमें किसीको वेदके सिद्धान्तोंका तनिक भी ज्ञान नहीं है ॥ न वै पापैर्हियते कृष्यते वा यो ब्राह्मणो यजते वेदशास्तैः । ऊर्ध्वं यज्ञैः पशुभिः सार्धमेति संतर्पितस्तर्पयते च कामैः ॥ १८ ॥
जो ब्राह्मण वेद- शास्त्रोंके अनुसार यज्ञका अनुष्ठान करता है, उसपर पापोंका आक्रमण नहीं हो सकता और न पाप उसे अपनी ओर खींच ही सकते हैं । वह अपने किये हुए यज्ञों और उनमें उपयोगी पशुओंके साथ ऊपरके पुण्यलोकोंमें जाता है और स्वयं सब प्रकारके भोगोंसे तृप्त होकर दूसरोंको भी तृप्त करता है ॥ १८ ॥
न वेदानां परिभवान्न शाठ्येन न मायया ।
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महत् प्राप्नोति पुरुषो ब्रह्मणि ब्रह्म विन्दति ॥। १ ९ ॥ वेदोंका अनादर करनेसे, शठतासे तथा छल-कपटसे कोई भी मनुष्य परब्रह्म परमात्माको नहीं पाता है । वेदों तथा उनमें बताये हुए कर्मोंका आश्रय लेनेपर ही उसे परब्रह्मकी प्राप्ति होती है ॥ १ ९ ॥ कपिलउवाच
दर्शं च पौर्णमासं च अग्निहोत्रं च धीमतः ।
चातुर्मास्यानि चैवासंस्तेषु धर्मः सनातनः ॥ २० ॥
कपिलजीने कहा — बुद्धिमान् पुरुषके लिये दर्श, पौर्णमास, अग्निहोत्र तथा चातुर्मास्य आदिके अनुष्ठानका विधान है; क्योंकि उनमें सनातनधर्मकी स्थिति है ॥ २० ॥
अनारम्भाः सुधृतयः शुचयो ब्रह्मसंज्ञिताः ।
ब्रह्मणैव स्म ते देवांस्तर्पयन्त्यमृतैषिणः ॥ २१ ॥
परंतु जो संन्यास धर्म स्वीकार करके कर्मानुष्ठानसे निवृत्त हो गये हैं तथा धीर, पवित्र एवं ब्रह्मस्वरूपमें स्थित हैं, वे अविनाशी ब्रह्मको चाहनेवाले महात्मा पुरुष ब्रह्मज्ञानसे ही देवताओंको तृप्त करते हैं ॥ २१ ॥
सर्वभूतात्मभूतस्य सर्वभूतानि पश्यतः ।
देवाऽपि मार्गे मुह्यन्ति अपदस्य पदैषिणः ॥ २२ ॥
जो सम्पूर्ण भूतोंके आत्मारूपसे स्थित हैं और सम्पूर्ण प्राणियोंको आत्मभावसे ही -देखते हैं, जिनका कोई विशेष पद नहीं है, उन ज्ञानी पुरुषका पदचिह्न ढूँढ़नेवाले — उनकी गतिका पता लगानेवाले देवता भी मार्गमें मोहित हो जाते हैं ॥ २२ ॥
चतुर्द्वारं पुरुषं चतुर्मुखं चतुर्धा चैनमुपयाति वाचा । बाहुभ्यां वाच उदरादुपस्थात् द्वाद्वारपाल बुभूषेत् ॥ २३ ॥
मनुष्योंके हाथ - पैर, वाणी, उदर और उपस्थ -ये चार द्वार हैं । इनका द्वारपाल होनेकी इच्छा करे अर्थात् इनपर संयम रखे । वह शास्त्रवाक्योंके अनुसार इन चारों द्वारोंके संयमसे प्राप्य ऋक्, यजुः, साम, अथर्वरूप चार मुखोंसे युक्त परमपुरुषको भक्तियोग, ज्ञानयोग, कर्मयोग एवं अष्टाङ्गयोग – इन चार उपायोंसे प्राप्त करता है ॥ २३ ॥
नाक्षैर्दीव्येन्नाददीतान्यवित्तं
न वायोनीयस्य शृतं प्रगृह्णात् ।
क्रुद्धो न चैव प्रहरेत धीमां- स्तथास्य तत्पाणिपादं सुगुप्तम् ॥ २४ ॥
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बुद्धिमान् पुरुष जूआ न खेले, दूसरोंका धन न ले, नीच पुरुषका बनाया हुआ अन्न न ग्रहण करे और क्रोधमें आकर किसीको मार न बैठे – ऐसा करनेसे उसके हाथ - पैर सुरक्षित रहते हैं ॥ २४ ॥
नाक्रोशमृच्छेन्न वृथा वदेच्च
न पैशुनं जनवादं च कुर्यात् ।
सत्यव्रतो मितभाषोऽप्रमत्त- स्तथास्य वाग्द्वारमथो सुगुप्तम् ॥ २५ ॥
किसीको गाली न दे, व्यर्थ न बोले, दूसरोंकी चुगली या निन्दा न करे, मितभाषी हो, सत्य वचन बोले तथा इसके लिये सदा सावधान रहे- ऐसा करनेसे वाक् - इन्द्रियरूप द्वारकी रक्षा होती है ॥ २५ ॥
नानाशनः स्यान्न महाशनः स्या- दलोलुपः साधुभिरागतः स्यात् । यात्रार्थमाहारमिहाददीत तथास्य स्याज्जाठरी द्वारगुप्तिः ॥ २६ ॥
उपवास न करे, किंतु बहुत अधिक भी न खाय, सदा भोजनके लिये लालायित न रहे । सज्जनोंका संग करे और जीवननिर्वाहके लिये जितना आवश्यक हो, उतना ही अन्न पेटमें डाले — इससे उदरद्वारका संरक्षण होता है ॥ २६ ॥
न वीर पत्नीं विहरेत नारीं न चापि नारीमनृतावाह्वयीत । भार्याव्रतं ह्यात्मनि धारयीत तथास्योपस्थद्वारगुप्तिर्भवेत ॥ २७ ॥
वीर युधिष्ठिर! अपनी धर्मपत्नीके साथ ही विहार करे, परायी स्त्रीके साथ नहीं, अपनी स्त्रीको भी जबतक वह ऋतुस्नाता न हुई हो, समागमके लिये अपने पास न बुलाये और मनमें एकपत्नीव्रत धारण करे । ऐसा करनेसे उसके उपस्थ-द्वारकी रक्षा हो सकती है ॥ २७ ॥
द्वाराणि यस्य सर्वाणि सुगुप्तानि मनीषिणः ।
उपस्थमुदरं बाहू वाक् चतुर्थी स वै द्विजः ॥ २८ ॥
जिस मनीषी पुरुषके उपस्थ, उदर, हाथ- पैर और वाणी - ये सभी द्वार पूर्णतः रक्षित हैं, वही वास्तवमें ब्राह्मण है ॥ २८ ॥
मोघान्यगुप्तद्वारस्य सर्वाण्येव भवन्त्युत ।
किं तस्य तपसा कार्यं किं यज्ञेन किमात्मना ॥ २ ९ ॥
जिसके ये द्वार सुरक्षित नहीं हैं, उसके सारे शुभ कर्म निष्फल होते हैं, ऐसे मनुष्यको तपस्या, यज्ञ तथा आत्मचिन्तनसे क्या लाभ हो सकता है? ॥ २ ९ ॥