श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 1721–1730

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1721–1730

पृष्ठ 1721

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इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि चिरकारिकोपाख्याने षट्षष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २६६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें चिरकारीका उपाख्यानविषयक दो सौ छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ || २६६ // 0

पृष्ठ 1722

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सप्तषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः द्युमत्सेन और सत्यवान्‌का संवाद - अहिंसापूर्वक राज्यशासनकी श्रेष्ठताका कथन युधिष्ठिरउवाच

कथं राजा प्रजा रक्षेन्न च किंचित् प्रघातयेत् ।

पृच्छामि त्वां सतां श्रेष्ठ तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा — सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ पितामह! मैं आपसे यह पूछ रहा हूँ कि राजा किस प्रकार प्रजाकी रक्षा करे, जिससे उसको किसीकी हिंसा न करनी पड़े, वह आप मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।

द्युमत्सेनस्य संवादं राज्ञा सत्यवता सह ॥ २ ॥

भीष्मजीने कहा - युधिष्ठिर! इस विषयमें राजा सत्यवान्‌के साथ उनके पिता द्युमत्सेनका जो संवाद हुआ था, उसी प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ॥ २ ॥

अव्याहृतं व्याजहार सत्यवानिति नः श्रुतम् ।

वधायोन्नीयमानेषु पितुरेवानुशासनात् ॥ ३ ॥

हमने सुना है कि एक दिन सत्यवान्ने देखा कि पिताकी आज्ञासे बहुत - से अपराधी शूलीपर चढ़ा देनेके लिये ले जाये जा रहे हैं । उस समय उन्होंने पिताके पास जाकर ऐसी बात कही, जो पहले किसीने नहीं कही थी ॥ ३ ॥

अधर्मतां याति धर्मों यात्यधर्मश्च धर्मताम् ।

वधो नाम भवेद् धर्मो नैतद् भवितुमर्हति ॥ ४ ॥

‘ पिताजी! यह सत्य है कि कभी ऊपरसे धर्म- सा दिखायी देनेवाला कार्य अधर्मरूप हो जाता है और अधर्म भी धर्मके रूपमें परिणत हो जाता है, तथापि किसी प्राणीका वध करना भी धर्म हो — ऐसा कदापि नहीं हो सकता' ॥ ४ ॥

द्युमत्सेन उवाच

अथ चेदवधो धर्मोऽधर्मः को जातु चिद् भवेत् ।

दस्यवश्चेन्न हन्येरन् सत्यवन् संकरो भवेत् ॥ ५ ॥

द्युमत्सेनने कहा- बेटा सत्यवान्! यदि अपराधीका वध न करना भी कभी धर्म हो तो अधर्म क्या हो सकता है? यदि चोर- डाकू मारे न जायँ तो प्रजामें वर्णसंकरता और धर्मसंकरता फैल जाय ॥ ५ ॥

पृष्ठ 1723

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ममेदमिति नास्यैतत् प्रवर्तेत कलौ युगे ।

लोकयात्रा न चैव स्यादथ चेद् वेत्थ शंस नः ॥ ६ ॥

कलियुग आनेपर तो लोग ' यह वस्तु मेरी है, इसकी नहीं है ' ऐसा कहकर सीधे ही दूसरोंका धन हड़प लेंगे । इस तरह लोकयात्राका निर्वाह असम्भव हो जायगा । यदि तुम इसका कोई समाधान जानते हो, तो मुझसे बताओ ॥ ६ ॥

सत्यवानुवाच

सर्व एते त्रयो वर्णाः कार्या ब्राह्मणबन्धनाः ।

धर्मपाशनिबद्धानामन्योऽप्येवं चरिष्यति ॥ ७ ॥

सत्यवान् बोले — पिताजी! क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र—-इन तीनों वर्णोंको ब्राह्मणोंके अधीन कर देना चाहिये । जब चारों वर्णोंके लोग धर्मके बन्धनमें बँधकर उसका पालन करने लगेंगे तो उनकी देखा- देखी दूसरे मनुष्य सूत-मागध आदि भी धर्मका आचरण करेंगे ॥ ७ ॥

यो यस्तेषामपचरेत् तमाचक्षीत वै द्विजः ।

अयं मे न शृणोतीति तस्मिन् राजा प्रधारयेत् ॥ ८ ॥

इनमेंसे जो भी ब्राह्मणकी आज्ञाके विपरीत आचरण करे, उसके विषयमें ब्राह्मणको राजाके पास जाकर कहना चाहिये कि ' अमुक मनुष्य मेरी बात नहीं सुनता है । ' तब राजा उसी व्यक्तिको दण्ड दे ॥ ८ ॥

तत्त्वाभेदेन यच्छास्त्रं तत् कार्यं नान्यथाविधम् ।

असमीक्ष्यैव कर्माणि नीतिशास्त्रं यथाविधि ॥ ९ ॥

जो दण्ड- विधान शरीरके पाँचों तत्त्वोंको अलग- अलग न कर सके अर्थात् किसीके प्राण न ले, उसीका प्रयोग करना चाहिये । नीतिशास्त्रकी आलोचना और अपराधीके कार्यपर भलीभाँति विचार किये बिना ही इसके विपरीत कोई दण्ड नहीं देना चाहिये ॥ ९ ॥

दस्यून् निहन्ति वै राजा भूयसो वाप्यनागसः ।

भार्या माता पिता पुत्रो हन्यन्ते पुरुषेण ते ।

परेणापकृतो राजा तस्मात् सम्यक् प्रधारयेत् ॥ १० ॥

राजा डाकुओं अथवा दूसरे बहुत- से निरपराध मनुष्योंको मार डालता है और इस प्रकार उसके द्वारा मारे गये पुरुषके पिता- माता, स्त्री और पुत्र आदि भी जीविकाका कोई उपाय न रह जानेके कारण मानो मार दिये जाते हैं, अतः किसी दूसरेके अपकार करनेपर राजाको भलीभाँति विचार करना चाहिये (जल्दबाजी करके किसीको प्राणदण्ड नहीं देना चाहिये ) ॥ १० ॥

असाधुश्चैव पुरुषो लभते शीलमेकदा ।

पृष्ठ 1724

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साधोश्चापि ह्यसाधुभ्यः शोभना जायते प्रजा ॥ ११ ॥

दुष्ट पुरुष भी कभी साधुसंगसे सुधरकर सुशील बन जाता है तथा बहुत - से दुष्ट पुरुषोंकी संतानें भी अच्छी निकल जाती हैं ॥ ११ ॥

न मूलघातः कर्तव्यो नैष धर्मः सनातनः ।

अपि स्वल्पवधेनैव प्रायश्चित्तं विधीयते ॥ १२ ॥

इसलिये दुष्टोंको प्राणदण्ड देकर उनका मूलोच्छेद नहीं करना चाहिये । किसीकी जड़ उखाड़ना सनातन धर्म नहीं है । अपराधके अनुरूप साधारण दण्ड देना चाहिये, उसीसे अपराधीके पापोंका प्रायश्चित हो जाता है ॥ १२ ॥

उद्वेजनेन बन्धेन विरूपकरणेन च ।

वधदण्डेन ते क्लिश्या न पुरोहितसंसदि ॥ १३ ॥

अपराधीको उसका सर्वस्व छीन लेनेका भय दिखाया जाय अथवा उसे कैद कर लिया जाय या उसके किसी अंगको भंग करके उसे कुरूप बना दिया जाय; परंतु प्राणदण्ड देकर उनके कुटुम्बियोंको क्लेश पहुँचाना उचित नहीं है । इसी तरह यदि वे पुरोहित ब्राह्मणकी शरणमें जा चुके हों तो भी राजा उन्हें दण्ड न दे ॥ १३ ॥

यदा पुरोहितं वा ते पर्येयुः शरणैषिणः ।

करिष्यामः पुनर्ब्रह्मन् न पापमिति वादिनः ॥ १४ ॥

तदा विसर्गमर्हाः स्युरितीदं धातृशासनम् ।

बिभ्रद् दण्डाजिनं मुण्डो ब्राह्मणोऽर्हति शासनम् ॥ १५ ॥

यदि शरण चाहनेवाले डाकू या दुष्ट पुरुष पुरोहितकी शरणमें चले जायँ और यह प्रतिज्ञा करें कि ‘ ब्रह्मन्! अब हम फिर ऐसा पाप नहीं करेंगे ' तो उन्हें छोड़ देना चाहिये । यह ब्रह्माजीका उपदेश है । सिर मुड़ाकर दण्ड और मृगचर्म धारण करनेवाला संन्यासी ब्राह्मण भी यदि पाप करे तो दण्ड पानेका अधिकारी है ॥ १४-१५ ॥

गरीयांसो गरीयांसमपराधे पुनः पुनः ।

तदा विसर्गमर्हन्ति न यथा प्रथमे तथा ॥ १६ ॥

यदि मनुष्य बार- बार अपराध करे, तो प्रमुख विचारकगण उसके अपराधके लिये गुरुतर दण्ड प्रदान करें । उस अवस्थामें पहले बारके अपराधकी भाँति वे बिना दण्ड दिये छोड़ देनेके योग्य नहीं रह जाते हैं ॥ १६ ॥

द्युमत्सेन उवाच

यत्र यत्रैव शक्येरन् संयन्तुं समये प्रजाः ।

स तावान् प्रोच्यते धर्मो यावन्न प्रतिलङ्घ्यते ॥ १७ ॥

द्युमत्सेनने कहा- बेटा! जहाँ- जहाँ भी प्रजाको धर्मकी मर्यादाके भीतर नियन्त्रित करके रखा जा सके वहाँ - वहाँ वैसा करना धर्म ही बताया जाता है । जबतक कि धर्मका

पृष्ठ 1725

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उल्लंघन नहीं किया जाता ( तबतक ही वहाँ ऐसी व्यवस्था कर लेनी चाहिये ) ॥ १७ ॥

अहन्यमानेषु पुनः सर्वमेव पराभवेत् ।

पूर्वे पूर्वतरे चैव सुशास्या ह्यभवन् जनाः ॥ १८ ॥

मृदवः सत्यभूयिष्ठा अल्पद्रोहाल्पमन्यवः ।

पुराधिग्दण्ड एवासीद् वाग्दण्डस्तदनन्तरम् ॥ १९ ॥

यदि धर्मका उल्लंघन करनेपर भी लुटेरोंका वध न किया जाय तो उनसे सारी प्रजाको कष्ट पहुँच सकता है । पहले और बहुत पहलेके लोगोंपर शासन करना सुगम था, क्योंकि उनका स्वभाव कोमल था, सत्यमें उनकी विशेष रुचि थी और द्रोह तथा क्रोधकी मात्रा उनमें बहुत कम थी । पहले अपराधीको धिक्कार देना ही बड़ा भारी दण्ड समझा जाता था । तदनन्तर अपराधकी मात्रा बढ़नेपर वाग्दण्डका प्रचार हुआ- अपराधीको कटुवचन सुनाकर छोड़ दिया जाने लगा ॥

आसीदादानदण्डोऽपि वधदण्डोऽद्य वर्तते ।

वधेनापि न शक्यन्ते नियन्तुमपरे जनाः ॥ २० ॥

इसके बाद आवश्यकता समझकर अर्थदण्ड भी चालू किया गया और आजकल तो वधका दण्ड भी प्रचलित हो गया है । बहुत - से दुष्टात्मा मनुष्योंको तो प्राणदण्डके द्वारा भी काबूमें लाना या मर्यादाके भीतर रखना असम्भव - सा हो रहा है ॥ २० ॥

नैव दस्युर्मनुष्याणां न देवानामिति श्रुतिः ।

न गन्धर्वपितॄणां च कः कस्येह न कश्चन ॥ २१ ॥

सुननेमें आया है कि डाकू मनुष्यों, देवताओं, गन्धर्वों अथवा पितरोंमेंसे किसीका आत्मीय नहीं होता । इतना ही नहीं, इस संसारमें कौन लुटेरा किसका है, यह प्रश्न ही नहीं उठ सकता । कोई डाकू किसीका नहीं होता है, यही कहना यथार्थ है ॥ २१ ॥

पद्मं श्मशानादादत्ते पिशाचाच्चापि दैवतम् ।

तेषु यः समयं कश्चित् कुर्वीत हतबुद्धिषु ॥ २२ ॥

वह तो मरघटमें जाकर मृत शरीरसे चिह्नभूत वस्त्र आदि उतार लाता है और देवताओंकी सम्पत्तिको भी लूट लेता है । जिनकी बुद्धि मारी गयी है, उन डाकुओंपर जो कोई विश्वास करता है, वह मूर्ख है ॥ सत्यवानुवाच

तान् न शक्नोषि चेत् साधून् परित्रातुमहिंसया ।

कस्यचिद् भूतभव्यस्य लाभेनान्तं तथा कुरु ॥ २३ ॥

सत्यवान्ने कहा — पिताजी! यदि आप लुटेरोंका वध न करके साधुओंकी रक्षा करनेमें असमर्थ हैं, अथवा उन दस्युओंको ही साधु बनाकर अहिंसाद्वारा उनकी प्राणरक्षा

पृष्ठ 1726

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1726 का मूल पृष्ठ
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नहीं कर सकते तो भूत, वर्तमान और भविष्यमें उनके पारमार्थिक लाभका उद्देश्य सामने रखकर किसी उत्तम उपायसे उनका या उनकी दस्युवृत्तिका अन्त कर दीजिये ॥ २३ ॥

राजानो लोकयात्रार्थं तप्यन्ते परमं तपः ।

तेऽपत्रपन्ति तादृग्भ्यस्तथावृत्ता भवन्ति च ॥ २४ ॥

बहुत-से नरेश, लोगोंकी जीवनयात्राका यथावत् रूपसे निर्वाह हो, इस उद्देश्यसे बड़ी भारी तपस्या करते हैं । वे राजा अपने राज्यमें चोर डाकुओंके होनेसे लज्जाका अनुभव करते हैं । इसीलिये प्रजाको शुद्ध, सदाचारी एवं सुखी बनानेकी इच्छासे वैसी तपस्यामें प्रवृत्त होते हैं ॥ २४ ॥

वित्रास्यमानाः सुकृतो न कामाद्ध्नन्ति दुष्कृतीन् ।

सुकृतेनैव राजानो भूयिष्ठं शासते प्रजाः ॥ २५ ॥

जब प्रजामें दण्डका भय उत्पन्न किया जाता है, तब वह सत्कर्मपरायण होती है; अतः भय दिखाकर प्रजाको धर्ममें लगाना ही दण्डका उद्देश्य है, किसीका प्राण लेना नहीं । राजालोग अपनी इच्छासे दुष्टोंका वध नहीं करते हैं । श्रेष्ठ नरेश प्रायः सत्कर्मों और सद्व्यवहारों - द्वारा ही दीर्घकालतक प्रजापर शासन करते हैं ॥ २५ ॥

श्रेयसः श्रेयसोऽप्येवं वृत्तं लोकोऽनुवर्तते ।

सदैव हि गुरोर्वृत्तमनुवर्तन्ति मानवाः ॥ २६ ॥

इस प्रकार परम श्रेष्ठ राजाके सद्व्यवहारका सब लोग अनुसरण करते हैं । मनुष्य स्वभावसे ही सदा बड़ोंके आचरणोंका अनुकरण करते हैं ॥ २६ ॥

आत्मानमसमाधाय समाधित्सति यः परान् ।

विषयेष्विन्द्रियवशं मानवाः प्रहसन्ति तम् ॥ २७ ॥

जो राजा स्वयं विषय भोगनेके लिये इन्द्रियोंका दास हो रहा है, अपने मनको काबूमें नहीं रख पाता, वह यदि दूसरोंको सदाचारका उपदेश देने लगे तो लोग उसकी हँसी उड़ाते हैं ॥ २७ ॥

यो राज्ञो दम्भमोहेन किंचित् कुर्यादसाम्प्रतम् ।

सर्वोपायैर्नियम्यः स तथा पापान्निवर्तते ॥ २८ ॥

यदि कोई मनुष्य दम्भ या मोहके कारण राजाके साथ किंचिन्मात्र भी कोई अनुचित बर्ताव करने लगे तो सभी उपायोंसे उसका दमन करना चाहिये । ऐसा करनेपर वह पापकर्मसे दूर हट जाता है ॥ २८ ॥

आत्मैवादौ नियन्तव्यो दुष्कृतं संनियच्छता ।

दण्डयेच्च महादण्डैरपि बन्धूननन्तरान् ॥ २९ ॥

जो राजा पापकी प्रवृत्तिको रोकना चाहता हो, उसे पहले अपने मनको ही वशमें करना चाहिये । फिर अपने सगे बन्धु बान्धव भी अपराध करें तो उनको भी भारी - से - भारी दण्ड देना चाहिये ॥ २ ९ ॥

पृष्ठ 1727

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1727 का मूल पृष्ठ
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यत्र वै पापकृन्नीचो न महद् दुःखमर्च्छति ।

वर्धन्ते तत्र पापानि धर्मो ह्रसति च ध्रुवम् ॥ ३० ॥

जहाँ पाप करनेवाले नीचको महान् दुःख नहीं भोगना पड़ता है, वहाँ निश्चय ही पाप बढ़ता है और धर्मका ह्रास होता है ॥ ३० ॥

इति कारुण्यशीलस्तु विद्वान् वै ब्राह्मणोऽन्वशात् ।

इति चैवानुशिष्टोऽस्मि पूर्वैस्तात पितामहैः ॥ ३१ ॥

आश्वासयद्भिः सुभृशमनुक्रोशात् तथैव च ।

एतत् प्रथमकल्पेन राजा कृतयुगे जयेत् ॥ ३२ ॥

पिताजी! एक दयालु एवं विद्वान् ब्राह्मणने मुझे यह सब उपदेश दिया था । उस समय उसने कहा था कि ‘ तात सत्यवान्! मेरे पूर्वज पितामहोंने मुझे आश्वासन देते हुए अत्यन्त कृपापूर्वक ऐसी शिक्षा दी थी । इसलिये राजाको सत्ययुगमें जब कि धर्म अपने चारों चरणोंसे मौजूद रहता है, पूर्वोक्त प्रथम श्रेणीके ( अहिंसामय) दण्डद्वारा ही प्रजाको वशमें करना चाहिये ॥ ३१-३२ ॥

पादोनेनापि धर्मेण गच्छेत् त्रेतायुगे तथा ।

द्वापरे तु द्विपादेन पादेन त्वधरे युगे ॥ ३३ ॥

‘ त्रेतायुग आनेपर धर्मका प्रचार एक चौथाई कम हो जाता है, द्वापरमें धर्मके दो ही पैर रह जाते हैं; परंतु कलियुगमें तो धर्मका चतुर्थ भाग ही शेष रह जाता है ॥

तथा कलियुगे प्राप्ते राज्ञो दुश्चरितेन ह ।

भवेत् कालविशेषेण कला धर्मस्य षोडशी ॥ ३४ ॥

‘ इस प्रकार कलियुग उपस्थित होनेपर राजाके दुर्व्यवहारसे तथा उस कालविशेषका प्रभाव पड़नेसे सम्पूर्ण धर्मकी सोलहवीं कलामात्र शेष रह जायगी ॥ ३४ ॥

अथ प्रथमकल्पेन सत्यवन् संकरो भवेत् ।

आयुः शक्तिं च कालं च निर्दिश्य तप आदिशेत् ॥ ३५ ॥

‘ सत्यवान्! यदि प्रथम श्रेणीके अहिंसात्मक दण्डसे धर्म और अधर्मका सम्मिश्रण होने लगे, तब दण्डनीय व्यक्तिकी आयु, शक्ति और कालको ध्यानमें रखते हुए राजा यथोचित दण्डके लिये आज्ञा प्रदान करे ॥ ३५ । ।

सत्याय हि यथा नेह जह्याद् धर्मफलं महत् ।

भूतानामनुकम्पार्थं मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ॥ ३६ ॥

'स्वायम्भुव मनुने प्राणियोंपर अनुग्रह करनेके लिये धर्मका उपदेश किया है, जिससे इस जगत्में वह सत्यस्वरूप परमात्माकी प्राप्ति करानेवाले धर्मके महान् फलसे वंचित न रह जाय' ॥ ३६ ॥

पृष्ठ 1728

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इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि द्युमत्सेनसत्यवत्संवादे सप्तषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २६७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें द्युमत्सेन और सत्यवान्का संवादविषयक दो सौ सरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६७ ॥

पृष्ठ 1729

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1729 का मूल पृष्ठ
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अष्टषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः स्यूमरश्मि और कपिलका संवाद - स्यूमरश्मिके द्वारा यज्ञकी अवश्यकर्तव्यताका निरूपण युधिष्ठिरउवाच

अविरोधेन भूतानां योगः षाड्गुण्यकारकः ।

यः स्यादुभयभाग्धर्मस्तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा- पितामह! प्राणियोंका विरोध ( अहित) न करते हुए मनुष्योंको शम-दमादि छहों गुणोंकी प्राप्ति करानेवाला जो योग है तथा जो भोग और मोक्ष दोनों फलोंको प्राप्त करानेवाला धर्म है, वह मुझे बतलाइये ॥ १ ॥

गार्हस्थ्यस्य च धर्मस्य योगधर्मस्य चोभयोः ।

अदूरसम्प्रस्थितयोः किंस्विच्छ्रेयः पितामह ॥ २ ॥

दादाजी! गार्हस्थ्यधर्म और योगधर्म दोनों एक दूसरेसे दूर नहीं हैं, तथापि उन दोनोंमेंसे कौन श्रेष्ठ है? यह बतानेकी कृपा करें ॥ २ ॥

भीष्मउवाच

उभौ धर्मी महाभागावुभौ परमदुश्चरौ ।

उभौ महाफलौ तौ तु सद्भिराचरितावुभौ ॥ ३ ॥

भीष्मजीने कहा- राजन्! गार्हस्थ्य और योगधर्म दोनों महान् सौभाग्य प्रदान करनेवाले हैं, दोनों अत्यन्त दुष्कर हैं । दोनोंके ही फल महान् हैं और दोनोंका ही श्रेष्ठ पुरुषोंने आचरण किया है ॥ ३ ॥

अत्र ते वर्तयिष्यामि प्रामाण्यमुभयोस्तयोः ।

शृणुष्वैकमनाः पार्थ च्छिन्नधर्मार्थसंशयम् ॥ ४ ॥

कुन्तीनन्दन! मैं तुम्हें इन दोनों धर्मोंकी प्रामाणिकताका प्रतिपादन करूँगा और तुम्हारे

धर्म तथा अर्थविषयक संदेहको मिटा दूँगा । तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो ॥ ४ ॥

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।

कपिलस्य गोश्च संवादं तन्निबोध युधिष्ठिर ॥ ५ ॥

युधिष्ठिर! इस विषयमें जानकार लोग महर्षि कपिल और गौके भीतर आविष्ट हुए स्यूमरश्मिके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं, उसे सुनो ॥

आम्नायमनुपश्यन् हि पुराणं शाश्वतं ध्रुवम् ।

नहुषः पूर्वमालेभे त्वष्टुर्गामिति नः श्रुतम् ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1730

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हमने सुना है कि पूर्वकालमें राजा नहुषने वेदके अनुशासनको प्राचीन, सनातन एवं नित्य समझकर अपने घरपर आये हुए अतिथि त्वष्टाके लिये एक गायका आलम्भ करनेका विचार किया ॥ ६ ॥

तां नियुक्तामदीनात्मा सत्त्वस्थः संयमे रतः ।

ज्ञानवान् नियताहारो ददर्श कपिलस्तथा ॥ ७ ॥

उस समय सत्त्वगुणमें स्थित, संयमपरायण, मिताहारी, उदारचित्त और ज्ञानवान् कपिलमुनिने त्वष्टाके लिये नियुक्त हुई उस गायको देखा ॥ ७ ॥

स बुद्धिमुत्तमां प्राप्तो नैष्ठिकीमकुतोभयाम् ।

सतीमशिथिलां सत्यां वेदा ३ इत्यब्रवीत् सकृत् ॥ ८ ॥

तब उत्तम, निर्भय, सुस्थिर, सत्य, सद्भावयुक्त एवं उत्साहयुक्त बुद्धिको प्राप्त हुए महर्षि कपिलने केवल एक बार इतना ही कहा –हा वेद! ( जो तुम्हारे नामपर लोग ऐसा अनाचार करते हैं ) ॥ ८ ॥

तां गामृषिः स्यूमरश्म प्रविश्य यतिमब्रवीत् ।

हंहो वेदा ३ यदि मता धर्माः केनापरे मताः ॥ ९ ॥

उस समय स्यूमरश्मि नामक एक ऋषिने उस गायके भीतर प्रवेश करके कपिलमुनिसे कहा— ‘ अहो! यदि वेदोंकी प्रामाणिकतापर आपको संदेह है तो अन्य धर्मशास्त्रोंको किस आधारपर प्रमाणभूत माना जा सकता है? ॥ ९ ॥

तपस्विनो धृतिमन्तः श्रुतिविज्ञानचक्षुषः ।

सर्वमार्षं हि मन्यन्ते व्याहृतं विदितात्मनः ॥ १० ॥

' तपस्वी, धैर्यवान्, वेद एवं विज्ञानरूप दृष्टिवाले ऋषिमुनि वेदको नित्यज्ञानसम्पन्न परमेश्वरकी निःश्वासभूत वाणी मानते हैं ॥ १० ॥

तस्यैवं गततृष्णस्य विज्वरस्य निराशिषः ।

का विवक्षास्ति वेदेषु निरारम्भस्य सर्वतः ॥ ११ ॥

' जो तृष्णारहित, उद्वेगशून्य, निष्काम तथा सब प्रकारके आरम्भोंसे रहित है, उस परमेश्वरके निःश्वाससे निःसृत वेदोंके विषयमें आप विपरीत वचन क्यों कह रहे हैं? ' ॥ ११ ॥

कपिलउवाच

नाहं वेदान् विनिन्दामि न विवक्ष्यामि कर्हिचित् ।

पृथगाश्रमिणां कर्माण्येकार्थानीति नः श्रुतम् ॥ १२ ॥

कपिलने कहा- मैं न तो वेदोंकी निन्दा करता हूँ और न कभी उन्हें विपरीत बात बतानेवाला बताता हूँ । पृथक् - पृथक् आश्रमवालोंके जो कर्म हैं, उन सबके उद्देश्य एक ही हैं - ऐसा हमने सुन रखा है ॥ १२ ॥