श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 1741–1750
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1741–1750
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अनुत्तरीयवसनमनुपस्तीर्णशायिनम् ।
बाहूपधानं शाम्यन्तं तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥ ३० ॥
जिसके पास वस्त्रके नामपर एक लंगोटी मात्र है, ओढ़नेके लिये एक चादरतक नहीं है, जो बिना बिछौनेके ही सोता है, बाँहोंका ही तकिया लगाता है और सदा शान्तभावसे रहता है, उसीको देवता ब्राह्मण मानते हैं ॥ ३० ॥
द्वन्द्वारामेषु सर्वेषु य एको रमते मुनिः ।
परेषामननुध्यायंस्तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥ ३१ ॥
जो मुनि शीत - उष्ण आदि सम्पूर्ण द्वन्द्वरूपी उपवनोंमें अकेला ही आनन्दपूर्वक रहता है और दूसरोंका चिन्तन नहीं करता, उसे देवतालोग ब्राह्मण ( ब्रह्मज्ञानी ) समझते हैं ॥ ३१ ॥
येन सर्वमिदं बुद्धं प्रकृतिर्विकृतिश्च या ।
गतिज्ञः सर्वभूतानां तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥ ३२ ॥
जिसको इस सम्पूर्ण जगत्की नश्वरताका ज्ञान है, जो प्रकृति और उसके विकारोंसे परिचित है तथा जिसे सम्पूर्ण भूतोंकी गतिका ज्ञान है, उसे देवतालोग ब्रह्मज्ञानी मानते हैं ॥ ३२ ॥
अभयं सर्वभूतेभ्यः सर्वेषामभयं यतः ।
सर्वभूतात्मभूतो यस्तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥ ३३ ॥
जो सम्पूर्ण भूतोंसे निर्भय है, जिससे समस्त प्राणी भय नहीं मानते हैं तथा जो सब भूतोंका आत्मा है, उसीको देवता ब्रह्मज्ञानी मानते हैं ॥ ३३ ॥
नान्तरेणानुजानन्ति दानयज्ञक्रियाफलम् ।
अविज्ञाय च तत् सर्वमन्यद् रोचयते फलम् ॥ ३४ ॥
परंतु मूढ़ मानव दान और यज्ञ- कर्मके फलके सिवा योग आदिके फलका अनुमोदन नहीं करते । वे उन मोक्षप्रद समस्त साधनोंके महत्त्वको न जाननेके कारण स्वर्ग आदि अन्य फलोंमें ही रुचि रखते हैं ॥
स्वकर्मभिः संश्रितानां तपो घोरत्वमागतम् ।
तं सदाचारमाश्रित्य पुराणं शाश्वतं ध्रुवम् ॥ ३५ ॥
किंतु उस पुराण, शाश्वत एवं ध्रुव यौगिक सदाचारका आश्रय लेकर अपने कर्तव्य कर्मोंमें परायण रहनेवाले ज्ञानियोंका तप उत्तरोत्तर तीव्रताको प्राप्त होता है ॥ ३५ ॥
अशक्नुवन्तश्चरितुं किंचिद् धर्मेषु सूत्रितम् ।
निरापद्धर्म आचारो ह्यप्रमादोऽपराभवः ॥ ३६ ॥
प्रवृत्तिमार्गी मनुष्य योगशास्त्रके सूत्रोंमें कथित यम-नियमादिका अनुष्ठान नहीं कर सकते । वह यौगिक आचार आपत्तिशून्य, प्रमादरहित है । वह कामादिसे पराभवको नहीं प्राप्त होता है ॥ ३६ ॥
फलवन्ति च कर्माणि व्युष्टिमन्ति ध्रुवाणि च ।
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विगुणानि च पश्यन्ति तथानैकान्तिकानि च ॥ ३७ ॥
योगशास्त्रमें कथित कर्म श्रेष्ठ फल देनेवाले, उन्नति करनेवाले एवं स्थायी हैं; तो भी प्रवृत्तिमार्गी मनुष्य उनको गुणरहित ( निष्फल ) और अस्थिर समझते हैं ॥
गुणाश्चात्र सुदुर्ज्ञेया ज्ञाताश्चात्र सुदुष्कराः ।
अनुष्ठिताश्चान्तवन्त इति त्वमनुपश्यसि ॥ ३८ ॥
गुणोंके कार्यभूत जो यज्ञ- यागादि हैं, उनके स्वरूप और विधि- विधानको समझना बहुत कठिन है । समझ लेनेपर भी उनका अनुष्ठान करना तो और भी कठिन है । यदि अनुष्ठान भी किया जाय तो भी उनसे नाशवान् फलकी ही प्राप्ति होती है । इन सब बातोंको तुम भी देखते और समझते हो ॥ ३८ ॥
स्यूमरश्मिरुवाच
यथा च वेदप्रामाण्यं त्यागश्च सफलो यथा ।
तौ पन्थानावुभौ व्यक्तौ भगवंस्तद् वदस्व मे ॥ ३ ९ ॥
स्यूमरश्मिने कहा — भगवन्! ' कर्म करो ' और ' कर्म छोड़ो ' ये जो परस्परविरुद्ध दो स्पष्ट मार्ग हैं, इनका उपदेश करनेवाले वेदकी प्रामाणिकताका निर्वाह कैसे हो? तथा त्याग कैसे सफल होता है? यह आप मुझको बताइये ॥ ३ ९ ॥ कपिल उवाच
प्रत्यक्षमिह पश्यन्ति भवन्तः सत्पथे स्थिताः ।
प्रत्यक्षं तु किमत्रास्ति यद् भवन्त उपासते ॥ ४० ॥
कपिलने कहा — आपलोग सन्मार्गमें स्थित रहकर यहाँ योगमार्गके फलका प्रत्यक्ष दर्शन कर सकते हैं; परंतु कर्ममार्गमें रहकर आपलोग जिस यज्ञकी उपासना करते हैं, उससे यहाँ कौन - सा प्रत्यक्ष फल प्राप्त होता है? ॥ ४० ॥
स्यूमरश्मिरुवाच
स्यूमरश्मिरहं ब्रह्मन् जिज्ञासार्थमिहागतः ।
श्रेयस्कामः प्रत्यवोचमार्जवान्न विवक्षया ॥ ४१ ॥
स्यूमरश्मिने कहा- ब्रह्मन्! मेरा नाम स्यूमरश्मि है । मैं ज्ञान प्राप्तिकी इच्छासे यहाँ आया हूँ। मैंने कल्याणकी इच्छा रखकर सरल भावसे ही अपनी बातें आपकी सेवामें उपस्थित की हैं, वाद - विवादकी इच्छासे नहीं ॥ ४१ ॥
इमं च संशयं घोरं भगवान् प्रब्रवीतु मे ।
प्रत्यक्षमिह पश्यन्तो भवन्तः सत्यथे स्थिताः ।
किमत्र प्रत्यक्षतमं भवन्तो यदुपासते ॥ ४२ ॥
अन्यत्र तर्कशास्त्रेभ्य आगमार्थं यथागमम् ।
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मेरे मनमें एक भयानक संशय उठ खड़ा हुआ है, इसे आप ही मिटा सकते हैं । आपने कहा था कि तुम सन्मार्गमें स्थित रहकर यहाँ योगमार्गके फलका प्रत्यक्ष दर्शन कर सकते हो । मैं पूछता हूँ कि आप जिसकी उपासना करते हैं, यहाँ उसका अत्यन्त प्रत्यक्ष फल क्या है? आप उसका तर्कका सहारा न लेकर प्रतिपादन कीजिये, जिससे मैं आगमके अर्थको जान सकूँ ॥ ४२ ॥
आगमो वेदवादास्तु तर्कशास्त्राणि चागमः ॥ ४३ ॥
वेदमतका अनुसरण करनेवाले शास्त्र तो आगम हैं ही, तर्कशास्त्र ( वेदोंके अर्थका निर्णय करनेवाले पूर्वोत्तर मीमांसा आदि) भी आगम हैं ॥ ४३ ॥
यथाश्रममुपासीत आगमस्तत्र सिध्यति ।
सिद्धिः प्रत्यक्षरूपा च दृश्यत्यागमनिश्चयात् ॥ ४४ ॥
जिस-जिस आश्रममें जो- जो धर्म विहित है, वहाँ-वहाँ उसी -उसी धर्मकी उपासना करनी चाहिये । उस- उस स्थानपर उसी - उसी धर्मका आचरण करनेसे वहाँ आगम सफल होता है । एवं शास्त्रके निश्चयसे ही सिद्धिका प्रत्यक्ष दर्शन होता है ॥ ४४ ॥
नौर्नावीव निबद्धा हि स्रोतसा सनिबन्धना ।
ह्रियमाणा कथं विप्र कुबुद्धींस्तारयिष्यति ।
एतद् ब्रवीतु भगवानुपपन्नोऽस्म्यधीहि भोः ॥ ४५ ॥
जैसे एक जगह जानेवाली नावमें दूसरी जगह जानेवाली नाव बाँध दी जाय तो वह जलके स्रोतसे अपहृत हो किसीको गन्तव्य स्थानतक नहीं पहुँचा सकती, उसी प्रकार पूर्वजन्मके कर्मोंकी वासनासे बँधी हुई हमारी कर्ममयी नौका हम कुबुद्धि पुरुषोंको कैसे भवसागरसे पार उतारेगी? भगवन्! यह आप मुझे बताइये, मैं आपकी शरणमें आया हूँ, आप मुझे उपदेश दीजिये ॥ ४५ ॥
नैव त्यागी न संतुष्टो नाशोको न निरामयः ।
न निर्विधित्सो नावृत्तो नापवृत्तोऽस्ति कश्चन ॥ ४६ ॥
वास्तवमें इस जगत्के भीतर न कोई त्यागी है न संतुष्ट, न शोकहीन है न नीरोग । न तो कोई पुरुष कर्म करनेकी इच्छासे सर्वथा शून्य है, न आसक्तिसे रहित है और न सर्वथा कर्मका त्यागी ही है ॥ ४६ ॥
भवन्तोऽपि च हृष्यन्ति शोचन्ति च यथा वयम् ।
इन्द्रियार्थाश्च भवतां समानाः सर्वजन्तुषु ॥ ४७ ॥
आप भी हमलोगोंकी ही भाँति हर्ष और शोक प्रकट करते हैं । समस्त प्राणियोंके समान आपके समक्ष भी शब्द, स्पर्श आदि विषय उपस्थित और गृहीत होते हैं ॥ ४७ ॥
एवं चतुर्णां वर्णानामाश्रमाणां प्रवृत्तिषु ।
एकमालम्बमानानां निर्णये किं निरामयम् ॥ ४८ ॥
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इस प्रकार चारों वर्णों और आश्रमोंके लोग सभी प्रवृत्तियोंमें एकमात्र सुखका ही आश्रय लेते हैं — उसीको अपना लक्ष्य बनाकर चलते हैं, अतः सिद्धान्ततः अक्षय सुख क्या है, यह बताइये ॥ ४८ ॥
कपिलउवाच
यद् यदाचरते शास्त्रमर्थ्यं सर्वप्रवृत्तिषु ।
यस्य यत्र ह्यनुष्ठानं तत्र तत्र निरामयम् ॥ ४ ९ ॥
कपिलने कहा- जो- जो शास्त्र जिस- जिस अर्थका आचरण -प्रतिपादन करता है, वह- वह सभी प्रवृत्तियोंमें सफल होता है । जिस साधनका जहाँ अनुष्ठान होता है, वहाँ- वहाँ अक्षय सुखकी प्राप्ति होती है ॥ ४ ९ ॥
ज्ञानं प्लावयते सर्वं यो ज्ञानं ह्यनुवर्तते ।
ज्ञानादपेत्य या वृत्तिः सा विनाशयति प्रजाः ॥ ५० ॥
जो ज्ञानका अनुसरण करता है, ज्ञान उसके समस्त संसारबन्धनका नाश कर देता है । बिना ज्ञानकी जो प्रवृत्ति होती है, वह प्रजाको जन्म और मरणके चक्करमें डालकर उसका विनाश कर देती है ॥ ५० ॥
भवन्तो ज्ञानिनो व्यक्तं सर्वतश्च निरामयाः ।
ऐकात्म्यं नाम कश्चिद्धि कदाचिदुपपद्यते ॥ ५१ ॥
आपलोग ज्ञानी हैं, यह बात सर्वविदित है । आप सब ओरसे नीरोग भी हैं; परंतु क्या आपलोगोंमेंसे कोई भी किसी भी कालमें एकात्मताको प्राप्त हुआ है? (जब एकमात्र अद्वितीय आत्मा अर्थात् ब्रह्मकी ही सत्ताका सर्वत्र बोध होने लगे, तब उसे एकात्मताका ज्ञान कहते हैं ) ॥ ५१ ॥
शास्त्रं ह्यबुद्ध्वा तत्त्वेन केचिद् वादबलाज्जनाः ।
कामद्वेषाभिभूतत्वादहङ्कारवशं गताः ॥ ५२ ॥
शास्त्रको यथार्थरूपसे न जानकर कुछ लोग वितण्डावादके ही बलसे राग- द्वेषसे अभिभूत होनेके कारण अहंकारके अधीन हो गये हैं ॥ ५२ ॥
याथातथ्यमविज्ञाय शास्त्राणां शास्त्रदस्यवः ।
ब्रह्मस्तेना निरारम्भा दम्भमोहवशानुगाः ॥ ५३ ॥
वे शास्त्रोंके यथार्थ तात्पर्यको न जाननेके कारण शास्त्रदस्यु ( शास्त्रोंके अर्थपर डाका डालनेवाले लुटेरे ) कहे जाते हैं । सर्वव्यापी ब्रह्मका भी अपलाप करनेके कारण ब्रह्मचोरकी पदवीसे विभूषित होते हैं । शम- दम आदि साधनोंका कभी अनुष्ठान नहीं करते हैं तथा दम्भ और मोहके वशमें पड़े रहते हैं ॥ ५३ ॥
नैर्गुण्यमेव पश्यन्ति न गुणाननुयुञ्जते ।
तेषां तमः शरीराणां तम एव परायणम् ॥ ५४ ॥
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वे शम- दम आदि साधनोंको सदा निष्फल ही देखते और समझते हैं । ज्ञान, ऐश्वर्य आदि सद्गुणोंकी जिज्ञासा नहीं करते हैं। उन तमोमय शरीरवाले पुरुषोंका तमोगुण ही सबसे बड़ा अवलम्ब है ॥ ५४ ॥
यो यथाप्रकृतिर्जन्तुः प्रकृतेः स्याद् वशानुगः ।
तस्य द्वेषश्च कामश्च क्रोधो दम्भोऽनृतं मदः ।
नित्यमेवाभिवर्तन्ते गुणाः प्रकृतिसम्भवाः ॥ ५५ ॥
जिस प्राणीकी जैसी प्रकृति होती है, उस प्रकृतिके वह अधीन होता है । उसके भीतर द्वेष, काम, क्रोध, दम्भ, असत्य और मद -ये प्रकृतिजनित गुण सदा ही विद्यमान रहते हैं ॥ ५५ ॥
एवं ध्यात्वानुपश्यन्तः संत्यजेयुः शुभाशुभम् ।
परां गतिमभीप्सन्तो यतयः संयमे रताः ॥ ५६ ॥
परम गति प्राप्त करनेकी इच्छावाले संयमशील यति इस प्रकार सोच- विचारकर शुभ और अशुभ'दोनोंका परित्याग कर देते हैं ॥ ५६ ॥
स्यूमरश्मिरुवाच
सर्वमेतन्मया ब्रह्मन् शास्त्रतः परिकीर्तितम् ।
न ह्यविज्ञाय शास्त्रार्थं प्रवर्तन्ते प्रवृत्तयः ॥ ५७ ॥
स्यूमरश्मिने कहा – ब्रह्मन्! मैंने यहाँ जो कुछ कहा है, वह सब शास्त्रसे प्रतिपादित है; क्योंकि शास्त्रके अर्थको जाने बिना किसीकी किसी भी कार्यमें प्रवृत्ति नहीं होती ॥ ५७ ॥
यः कश्चिन्न्याय्य आचारः सर्वं शास्त्रमिति श्रुतिः ।
यदन्याय्यमशास्त्रं तदित्येषा श्रूयते श्रुतिः ॥ ५८ ॥
जो कोई भी न्यायोचित आचार है, वह सब शास्त्र है, ऐसा श्रुतिका कथन है । जो अन्यायपूर्ण बर्ताव है, वह अशास्त्रीय है, ऐसी श्रुति भी सुनी जाती है ॥ ५८ ॥
न प्रवृत्तिरृते शास्त्रात् काचिदस्तीति निश्चयः ।
यदन्यद् वेदवादेभ्यस्तदशास्त्रमिति श्रुतिः ॥ ५ ९ ॥
शास्त्रके बिना अर्थात् शास्त्रकी आज्ञाका उल्लंघन करके कोई प्रवृत्ति सफल नहीं हो सकती, यह विद्वानोंका निश्चय है । जो वैदिक वचनोंके विरुद्ध है, वह सब अशास्त्रीय है, ऐसा श्रुतिका कथन है ॥ ५ ९ ॥ शास्त्रादपेतं पश्यन्ति बहवो व्यक्तमानिनः ।
शास्त्रदोषान् न पश्यन्ति शोचन्ति च यथा वयम् ।
इन्द्रियार्थाश्च भवतां समानाः सर्वजन्तुषु ॥ ६० ॥
बहुत-से मनुष्य प्रत्यक्षको ही माननेवाले हैं । वे शास्त्रसे पृथक् इहलोकपर ही दृष्टि रखते हैं । शास्त्रोक्त दोषोंको नहीं देखते हैं और जैसे हमलोग शोक करते हैं, वैसे ही वे भी
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अवैदिकमतका आश्रय लेकर शोक किया करते हैं । आप जैसे ज्ञानियोंको भी सब जन्तुओंके समान ही इन्द्रियोंके विषयोंका अनुभव होता है ॥ ६० ॥
एवं चतुर्णां वर्णानामाश्रमाणां प्रवृत्तिषु ।
एकमालम्बमानानां निर्णये सर्वतोदिशम् ॥ ६१ ॥
आनन्त्यं वदमानेन शक्तेनावर्जितात्मना ।
अविज्ञानहतप्रज्ञा हीनप्रज्ञास्तमोवृताः ॥ ६२ ॥
इस प्रकार चारों वर्णों और आश्रमोंकी जो प्रवृत्तियाँ हैं, उनमें लगे हुए मनुष्य एकमात्र सुखका ही आश्रय लेते हैं - उसे ही प्राप्त करना चाहते हैं । उनमें से हम - जैसे लोग अज्ञानसे हतबुद्धि, तुच्छ विषयोंमें मन लगानेवाले तथा तमोगुणसे आवृत हैं । आप ऊहापोह करनेमें समर्थ-कुशल हैं, अतः सार्वदेशिक सिद्धान्तके रूपमें मोक्षसुखकी अनन्तता बताकर आपने मनसे हमें शान्ति पहुँचायी है ॥ ६१-६२ ॥
शक्यं त्वेकेन युक्तेन कृतकृत्येन सर्वशः ।
पिण्डमात्रं व्यपाश्रित्य चरितुं विजितात्मना ॥ ६३ ॥
वेदवादं व्यपाश्रित्य मोक्षोऽस्तीति प्रभाषितुम् ।
अपेतन्यायशास्त्रेण सर्वलोकविगर्हिणा ॥ ६४ ॥
जो आपके समान एकाकी, योगयुक्त, कृतकृत्य और मनपर विजय पानेवाला है तथा जो केवल शरीरका अथवा उसकी रक्षाके लिये स्वल्प भिक्षान्नमात्रका सहारा लेकर सम्पूर्ण दिशाओंमें विचरण कर सकता है, जिसने न्यायशास्त्रका परित्याग कर दिया है तथा जो सम्पूर्ण संसारको नाशवान् होनेके कारण गर्हित समझता है, ऐसा पुरुष ही वेद- वाक्योंका आश्रय लेकर ' मोक्ष है' यह साधिकार कह सकता है ॥ ६३-६४ ॥
इदं तु दुष्करं कर्म कुटुम्बमभिसंश्रितम् ।
दानमध्ययनं यज्ञः प्रजासंतानमार्जवम् ॥ ६५ ॥
गृहस्थाश्रमके अनुसार जो यह कुटुम्बके भरण- पोषणसे सम्बन्ध रखनेवाला कार्य है तथा दान, स्वाध्याय, यज्ञ, संतानोत्पादन एवं सदा सरल और कोमल भावसे बर्ताव करना रूप जो कर्म है, यह सब मनुष्यके लिये अत्यन्त दुष्कर है ॥ ६५ ॥
यद्येतदेवं कृत्वापि न विमोक्षोऽस्ति कस्यचित् ।
धिक् कर्तारं च कार्यं च श्रमश्चायं निरर्थकः ॥ ६६ ॥
यदि यह सब दुष्कर कर्म करके भी किसीको मोक्ष नहीं प्राप्त हुआ तो कर्ताको धिक्कार है । उसके उस कार्यको धिक्कार है । और इसमें जो परिश्रम हुआ, वह व्यर्थ हो गया ॥ ६६ ॥
नास्तिक्यमन्यथा च स्याद् वेदानां पृष्ठतः क्रिया ।
एतस्यानन्त्यमिच्छामि भगवन् श्रोतुमञ्जसा ॥ ६७ ॥
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यदि कर्मकाण्डको व्यर्थ समझकर छोड़ दिया जाय तो यह नास्तिकता और वेदोंकी अवहेलना होगी; अतः भगवन्! मैं यह सुनना चाहता हूँ कि कर्मकाण्ड किस प्रकार सुगमतापूर्वक मोक्षका साधक होगा? ॥ ६७ ॥
तत्त्वं वदस्व मे ब्रह्मन्नुपसन्नोऽस्म्यधीहि भोः ।
यथा ते विदितो मोक्षस्तथेच्छाम्युपशिक्षितुम् ॥ ६८ ॥
ब्रह्मन्! आप मुझे तत्त्वकी बात बताइये । मैं शिष्यभावसे आपकी शरणमें आया हूँ। गुरुदेव! मुझे उपदेश कीजिये । आपको मोक्षके स्वरूपका जैसा ज्ञान है, वैसा ही मैं भी सीखना और जानना चाहता हूँ ॥ ६८ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि गोकपिलीये एकोनसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २६ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें गोकपिलीयोपाख्यानविषयक दो सौ उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६९ ॥
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सप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः स्यूमरश्मि - कपिल - संवाद - चारों आश्रमोंमें उत्तम साधनोंके द्वारा ब्रह्मकी प्राप्तिका कथन कपिल उवाच
वेदाः प्रमाणं लोकानां न वेदाः पृष्ठतः कृताः ।
द्वे ब्रह्मणी वेदितव्ये शब्दब्रह्म परं च यत् ॥ १ ॥
कपिलने कहा — स्यूमरश्मे! सम्पूर्ण लोकोंके लिये वेद ही प्रमाण हैं । अतः वेदोंकी अवहेलना नहीं की गयी है । ब्रह्मके दो रूप समझने चाहिये - शब्दब्रह्म ( वेद ) और परब्रह्म ( सच्चिदानन्दघन परमात्मा) ॥ १ ॥
शब्दब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति ।
शरीरमेतत् कुरुते यद् वेदे कुरुते तनुम् ॥ २ ॥
कृतशुद्धशरीरो हि पात्रं भवति ब्राह्मणः ।
आनन्त्यमत्र बुद्धयेदं कर्मणां तद् ब्रवीमि ते ॥ ३ ॥
जो पुरुष शब्दब्रह्ममें पारंगत ( वेदोक्त कर्मोंके अनुष्ठानसे शुद्धचित्त हो चुका ) है, वह परब्रह्मको प्राप्त कर लेता है । पिता और माता वेदोक्त गर्भाधानकी विधिसे बालकके जिस शरीरको जन्म देते हैं, वे उस बालकके उस शरीरका ही संस्कार करते हैं । इस प्रकार जिसका शरीर वैदिक संस्कारसे शुद्ध हो जाता है, वही ब्रह्मज्ञानका पात्र होता है । अब मैं अपनी बुद्धिके अनुसार तुम्हें यह बता रहा हूँ कि कर्म किस प्रकार अक्षय मोक्ष - सुखकी प्राप्ति करानेमें कारण होते हैं ॥
अनागममनैतिह्यं प्रत्यक्षं लोकसाक्षिकम् ।
धर्म इत्येव ये यज्ञान् वितन्वन्ति निराशिषः ॥ ४ ॥
जो अपना धर्म ( कर्तव्य) समझकर बिना किसी प्रकारकी भोगेच्छाके यज्ञोंका अनुष्ठान करते हैं, उनके उस यज्ञका फल वेद या इतिहासद्वारा नहीं जाना जाता है । वह प्रत्यक्ष है और उसे सब लोग अपनी आँखों देखते हैं ॥ ४ ॥
उत्पन्नत्यागिनोऽलुब्धाः कृपासूयाविवर्जिताः ।
धनानामेष वै पन्थास्तीर्थेषु प्रतिपादनम् ॥ ५ ॥
अनाश्रिताः पापकर्म कदाचित् कर्मयोगिनः ।
मनः संकल्पसंसिद्धा विशुद्धज्ञाननिश्चयाः ॥ ६ ॥
जो प्राप्त हुए पदार्थोंका त्याग सब प्रकारके लालचको छोड़कर करते हैं, जो कृपणता और असूयासे रहित हैं और ' धनके उपयोगका यही सर्वोत्तम मार्ग है ' ऐसा समझकर
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सत्पात्रोंको दान करते हैं, कभी पापकर्मका आश्रय नहीं लेते तथा सदा कर्मयोगके साधनमें ही लगे रहते हैं, उनके मानसिक संकल्पकी सिद्धि होने लगती है और उन्हें विशुद्ध ज्ञानस्वरूप परब्रह्मके विषयमें दृढ़ निश्चय हो जाता है ॥ ५-६ ॥
अक्रुध्यन्तोऽनसूयन्तो निरहङ्कारमत्सराः ।
ज्ञाननिष्ठास्त्रिशुक्लाश्च सर्वभूतहिते रताः ॥ ७ ॥
वे किसीपर क्रोध नहीं करते, कहीं दोषदृष्टि नहीं रखते, अहंकार तथा मात्सर्यसे दूर रहते हैं, ज्ञानके साधनोंमें उनकी निष्ठा होती है, उनके जन्म, कर्म और विद्या-तीनों ही शुद्ध होते हैं तथा वे समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहते हैं ॥ ७ ॥
आसन् गृहस्था भूयिष्ठा अव्युत्क्रान्ताः स्वकर्मसु ।
राजानश्च तथा युक्ता ब्राह्मणाश्च यथाविधि ॥ ८ ॥
पूर्वकालमें बहुत - से ब्राह्मण और राजा ऐसे हो गये हैं, जो गृहस्थ आश्रममें ही रहते हुए अपने - अपने कर्मोंका त्याग न करके उनमें निष्काम भावसे विधिपूर्वक लगे रहे ॥ ८ ॥
समा ह्यार्जवसम्पन्नाः संतुष्टा ज्ञाननिश्चयाः ।
प्रत्यक्षधर्माः शुचयः श्रद्दधानाः परावरे ॥। ९ ॥
वे सब प्राणियोंपर समान दृष्टि रखते थे । सरल, संतुष्ट, ज्ञाननिष्ठ, प्रत्यक्ष फल देनेवाले धर्मके अनुष्ठाता और शुद्धचित्त होते थे तथा शब्दब्रह्म एवं परब्रह्म- दोनोंमें ही श्रद्धा रखते थे ॥ ९ ॥
पुरस्ताद् भावितात्मानो यथावच्चरितव्रताः ।
चरन्ति धर्मं कृच्छ्रेऽपि दुर्गे चैवापि संहताः ॥ १० ॥
संहत्य धर्मं चरतां पुराऽऽसीत् सुखमेव तत् ।
तेषां नासीद् विधातव्यं प्रायश्चित्तं कथंचन ॥ ११ ॥
वे आवश्यक नियमोंका यथावत् पालन करके पहले अपने चित्तको शुद्ध करते थे और कठिनाई तथा दुर्गम स्थानोंमें पड़ जानेपर भी परस्पर मिलकर धर्मानुष्ठानमें तत्पर रहते थे । संघ - बद्ध होकर धर्मानुष्ठान करनेवाले उन पूर्ववर्ती पुरुषोंको इसमें सुखका ही अनुभव होता था । उन्हें किसी प्रकारका प्रायश्चित्त करनेकी आवश्यकता नहीं पड़ती थी ॥ १०-११ ॥
सत्यं हि धर्ममास्थाय दुराधर्षतमा मताः ।
न मात्रामनुरुध्यन्ते न धर्मच्छलमन्ततः ॥ १२ ॥
वे सत्यधर्मका आश्रय लेकर ही अत्यन्त दुर्धर्ष माने जाते थे । लेशमात्र भी पाप नहीं करते थे और प्राणान्तका अवसर उपस्थित होनेपर भी धर्मके विषयमें छलसे काम नहीं लेते थे ॥ १२ ॥
य एव प्रथमः कल्पस्तमेवाभ्याचरन् सह ।
तेषां नासीद् विधातव्यं प्रायश्चित्तं कदाचन ॥ १३ ॥
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जो प्रथम श्रेणीका धर्म माना जाता था, उसीका वे सब लोग साथ रहकर आचरण करते थे, अतः उनके सामने कभी प्रायश्चित्त करनेका अवसर नहीं आता था ॥ १३ ॥
तस्मिन् विधौ स्थितानां हि प्रायश्चित्तं न विद्यते ।
दुर्बलात्मन उत्पन्नं प्रायश्चित्तमिति श्रुतिः ॥ १४ ॥
धर्मकी उस उत्तम श्रेणीमें स्थित हुए उन शुद्धचित्त पुरुषोंके लिये प्रायश्चित्त हैं ही नहीं । जिनका हृदय दुर्बल है, उन्हींसे पाप होता है और उन्हींके लिये प्रायश्चित्तका विधान किया गया है — ऐसा सुननेमें आता है ॥ १४ ॥
एवं बहुविधा विप्राः पुराणा यज्ञवाहनाः ।
त्रैविद्यवृद्धाः शुचयो वृत्तवन्तो यशस्विनः ॥ १५ ॥
इस प्रकार बहुत - से ब्राह्मण पूर्वकालमें यज्ञका निर्वाह करते थे । वे वेदविद्याके ज्ञानमें बढ़े - चढ़े, पवित्र, सदाचारी और यशस्वी थे ॥ १५ ॥
यजन्तोऽहरहर्यज्ञैर्निराशीर्बन्धना बुधाः ।
तेषां यज्ञाश्च वेदाश्च कर्माणि च यथागमम् ॥ १६ ॥
वे विद्वान् पुरुष प्रतिदिन कामनाओंके बन्धनसे मुक्त हो यज्ञोंद्वारा भगवान्का यजन करते थे । उनके वे यज्ञ, वेदाध्ययन तथा अन्यान्य कर्म शास्त्रविधिके अनुसार सम्पन्न होते थे ॥ १६ ॥
आगमाश्च यथाकाले संकल्पाश्च यथाक्रमम् ।
अपेतकामक्रोधानां दुश्चराचारकर्मणाम् ॥ १७ ॥
उन्होंने काम और क्रोधको त्याग दिया था । उनके आचार- कर्म दूसरोंके लिये आचरणमें लाने अत्यन्त कठिन थे । उनके हृदयमें यथासमय शास्त्र- ज्ञान और सत्यंकल्पका क्रमशः उदय होता था ॥ १७ ॥
स्वकर्मभिः शंसितानां प्रकृत्या शंसितात्मनाम् ।
ऋजूनां शमनित्यानां स्वेषु कर्मसु वर्तताम् ॥ १८ ॥
अपने उत्तम कर्मोंके कारण उनकी बड़ी प्रशंसा होती थी । वे स्वभावसे ही पवित्रचित्त, सरल, शान्तिपरायण और स्वधर्मनिष्ठ होते थे ॥ १८ ॥
सर्वमानन्त्यमेवासीदिति नः शाश्वती श्रुतिः ।
तेषामदीनसत्त्वानां दुश्चराचारकर्मणाम् ॥ १ ९ ॥
उनके हृदय बड़े उदार थे, उनके आचार और कर्म दूसरोंके लिये आचरणमें लानेमें अत्यन्त कठिन थे, अतः उनका सारा शुभ कर्म ही अक्षय मोक्षरूप फल देनेवाला था । यह बात सदा हमारे सुननेमें आयी है ॥
स्वकर्मभिः सम्भृतानां तपो घोरत्वमागतम् ।
तं सदाचारमाश्चर्यं पुराणं शाश्वतं ध्रुवम् ॥ २० ॥