श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 2111–2120
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2111–2120
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श्रावितस्त्रिविधं मोक्षं न च राज्याद्धि चालितः ॥ २७ ॥
वे सांख्यशास्त्रके प्रमुख विद्वान् हैं और सारा सिद्धान्त उन्हें यथावत् रूपसे प्रत्यक्षकी भाँति ठीक- ठीक ज्ञात है । उन्होंने मुझे त्रिविध मोक्षधर्म श्रवण कराया है, परंतु राज्यसे दूर हटने की आज्ञा नहीं दी है ॥ २७ ॥
सोऽहं तामखिलां वृत्तिं त्रिविधां मोक्षसंहिताम् ।
मुक्तरागश्चराम्येकः पदे परमके स्थितः ॥ २८ ॥
इस प्रकार उपदेश पाकर मैं विषयोंकी आसक्तिसे रहित हो मुक्तिविषयक तीन प्रकारकी समस्त वृत्तियोंका आचरण करता हूँ और अकेला ही परमपदमें स्थित हूँ ॥
वैराग्यं पुनरेतस्य मोक्षस्य परमो विधिः ।
ज्ञानादेव च वैराग्यं जायते येन मुच्यते ॥ २ ९ ॥
वैराग्य ही इस मुक्तिका प्रधान कारण है और ज्ञानसे ही वह वैराग्य प्राप्त होता है, जिससे मनुष्य मुक्त हो जाता है ॥ २ ९ ॥
ज्ञानेन कुरुते यत्नं यत्नेन प्राप्यते महत् ।
महद् द्वन्द्वप्रमोक्षाय सा सिद्धिर्या वयोऽतिगा ॥ ३० ॥
मनुष्य ज्ञानके द्वारा मुक्ति पानेके लिये यत्न करता है । उस यत्नसे महान् आत्मज्ञानकी प्राप्ति होती है । वह महान् आत्मज्ञान ही सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंसे छुटकारा दिलानेका साधन है, वही सिद्धि है, जो काल ( मृत्यु ) को भी लाँघ जानेवाली है ॥ ३० ॥
सेयं परमिका बुद्धेः प्राप्ता निर्द्वन्द्वता मया ।
इहैव गतमोहेन चरता मुक्तसङ्गिना ॥ ३१ ॥
मेरा मोह दूर हो गया है । मैं समस्त संसर्गोंका त्याग कर चुका हूँ; इसलिये मैंने इस गृहस्थधर्ममें रहते हुए ही बुद्धिकी परम निर्द्वन्द्वता प्राप्त कर ली है ॥ ३१ ॥
यथा क्षेत्रं मृदूभूतमद्भिराप्लावितं तथा ।
जनयत्यङ्कुरं कर्म नृणां तद्वत् पुनर्भवम् ॥ ३२ ॥
जैसे जिस खेतको जोतकर खूब मुलायम बना दिया गया हो और यथासमय उसे पानीसे सींचा गया हो, वही बोये हुए बीजमें अंकुर उत्पन्न करता है, उसी प्रकार मनुष्योंका शुभ- अशुभ कर्म ही पुनर्जन्मका उत्पादन करता है ॥ ३२ ॥
यथा चोत्तापितं बीजं कपाले यत्र तत्र वा ।
प्राप्याप्यङ्कुरहेतुत्वमबीजत्वान्न जायते ॥ ३३ ॥
तद्वद् भगवतानेन शिखा प्रोक्तेन भिक्षुणा ।
ज्ञानं कृतमबीजं मे विषयेषु न जायते ॥ ३४ ॥
जैसे मिट्टीके खपरेमें या और किसी भी बर्तनमें भूना गया बीज बीज न रह जानेके कारण अंकुर उगाने योग्य खेतमें पड़कर भी नहीं जमता है, उसी प्रकार मेरे संन्यासी गुरु
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भगवान् पंचशिखने मुझे जो ज्ञान प्रदान किया है, वह निर्बीज है । इसलिये विषयोंके क्षेत्रमें अंकुरित नहीं होता है ॥ ३३-३४ ॥
नाभिरज्यति कस्मिंश्चिन्नानर्थे न परिग्रहे ।
नाभिरज्यति चैतेषु व्यर्थत्वाद् रागरोषयोः ॥ ३५ ॥
मेरी बुद्धि किसी अनर्थमें अथवा भोगोंके संग्रहमें भी आसक्त नहीं होती है । स्त्री आदिके विषयमें जो अनुराग और शत्रु आदिके विषयमें जो क्रोध होता है, वह व्यर्थ होनेके कारण उसकी ओर मेरी बुद्धिकी प्रवृत्ति नहीं होती है ॥ ३५ ॥
यश्च मे दक्षिणं बाहुं चन्दनेन समुक्षयेत् ।
सव्यं वास्यापि यस्तक्षेत् समावेतावुभौ मम ॥ ३६ ॥
जो मेरी दाहिनी बाँहपर चन्दन छिड़के और जो बायीं बाँहको बँसूलेसे काटे तो ये दोनों ही मनुष्य मेरे लिये एक समान हैं ॥ ३६ ॥
सुखी सोऽहमवाप्तार्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।
मुक्तसङ्गः स्थितो राज्ये विशिष्टोऽन्यैस्त्रिदण्डिभिः ॥ ३७ ॥
मैं आप्तकाम होकर सदा सुखका अनुभव करता हूँ । मेरी दृष्टिमें मिट्टीके ढेले, पत्थर और सुवर्ण सब एक- से हैं । मैं आसक्तिरहित होकर राजाके पदपर प्रतिष्ठित हूँ । अतः अन्य त्रिदण्डी साधुओंसे मेरा स्थान विशिष्ट है ॥ ३७ ॥
मोक्षे हि त्रिविधा निष्ठा दृष्टान्यैर्मोक्षवित्तमैः ।
ज्ञानं लोकोत्तरं यच्च सर्वत्यागश्च कर्मणाम् ॥ ३८ ॥
अलौकिक जो ज्ञान है, अलौकिक जो संन्यास है तथा जो कर्मोंका अलौकिक अनुष्ठान है अर्थात् निष्काम भावसे कर्मोंका करना है— इन तीन प्रकारकी निष्ठाओंको ही मोक्षवेत्ता विद्वानोंने मोक्षका उपाय देखा और समझा है ॥ ३८ ॥
ज्ञाननिष्ठां वदन्त्येके मोक्षशास्त्रविदो जनाः ।
कर्मनिष्ठां तथैवान्ये यतयः सूक्ष्मदर्शिनः ॥ ३ ९ ॥
मोक्षशास्त्रका ज्ञान रखनेवाले एक श्रेणीके लोग कहते हैं कि ज्ञाननिष्ठा ही मोक्षका साधन है तथा दूसरे सूक्ष्मदर्शी यति लोग कर्मनिष्ठाको ही मुक्तिका उपाय बताते हैं ॥ ३ ९ ॥
प्रहायोभयमप्येव ज्ञानं कर्म च केवलम् ।
तृतीयेयं समाख्याता निष्ठा तेन महात्मना ॥ ४० ॥
किंतु उन महात्मा पंचशिखाचार्यने पूर्वोक्त केवल ज्ञान और केवल कर्म–इन दोनों पक्षोंका परित्याग करके एक तीसरी निष्ठा बतायी है ॥ ४० ॥
यमे च नियमे चैव कामे द्वेषे परिग्रहे ।
माने दम्भे तथा स्नेहे सदृशास्ते कुटुम्बिभिः ॥ ४१ ॥
यम, नियम, काम, द्वेष, परिग्रह, मान, दम्भ तथा स्नेह करके उनसे होनेवाले लाभ और हानिमें संन्यासी भी गृहस्थोंके ही तुल्य है अर्थात् यम- नियम आदिका अभ्यास करनेपर
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गृहस्थ भी मोक्षलाभ कर सकते हैं और कामना तथा द्वेष होनेपर संन्यासी भी मुक्तिसे वंचित हो सकते हैं ॥ ४१ ॥
त्रिदण्डादिषु यद्यस्ति मोक्षो ज्ञानेन कस्यचित् ।
छत्रादिषु कथं न स्यात् तुल्यहेतौ परिग्रहे ॥ ४२ ॥
संन्यासी त्रिदण्ड आदि धारण करते हैं और गृहस्थ नरेश छत्र- चँवर आदि । यदि त्रिदण्ड धारण करनेपर किसीको ज्ञानद्वारा मोक्ष प्राप्त हो सकता है तो छत्र आदि धारण करनेपर दूसरेको उसी ज्ञानके द्वारा मोक्ष कैसे प्राप्त नहीं हो सकता? क्योंकि प्रतिबन्धका कारण परिग्रह दोनोंके लिये समान है –एक त्रिदण्ड आदिका संग्रह करता है और दूसरा छत्र आदिका ॥ ४२ ॥
येन येन हि यस्यार्थः कारणेनेह कर्मणि ।
तत्तदालम्बते सर्वः स्वे स्वे स्वार्थपरिग्रहे ॥ ४३ ॥
अपने - अपने अभीष्ट अर्थकी सिद्धिके लिये जिस मनुष्यको जिस -जिस साधनभूत वस्तुसे प्रयोजन होता है, वे सभी अपना- अपना काम बनानेके लिये उन- उन वस्तुओंका आश्रय लेते हैं ॥ ४३ ॥
दोषदर्शी तु गार्हस्थ्ये यो व्रजत्याश्रमान्तरे ।
उत्सृजन् परिगृह्णंश्च सोऽपि सङ्गान्न मुच्यते ॥ ४४ ॥
जो गृहस्थ - आश्रममें दोष देखकर उसका परित्याग करके दूसरे आश्रममें चला जाता है, वह भी कुछ छोड़ता है और कुछ ग्रहण करता है; अतः उसे भी संगदोषसे छुटकारा नहीं मिलता है ॥ ४४ ॥
आधिपत्ये तथा तुल्ये निग्रहानुग्रहात्मके ।
राजभिर्भिक्षुकास्तुल्या मुच्यन्ते केन हेतुना ॥ ४५ ॥
किसीका निग्रह और किसीपर अनुग्रह करना ही आधिपत्य ( प्रभुत्व) कहलाता है । यह जैसे राजामें है, वैसे संन्यासीमें भी है । इस दृष्टिसे जब संन्यासी भी राजाओंके ही समान हैं, तब केवल वे ही मुक्त होते हैं - ऐसा माननेका क्या कारण है? ॥ ४५ ॥
अथ सत्याधिपत्येऽपि ज्ञानेनैवेह केवलम् ।
मुच्यन्ते सर्वपापेभ्यो देहे परमके स्थिताः ॥ ४६ ॥
मनुष्यरूप उत्तम शरीरमें स्थित हुए प्राणी प्रभुत्व रखते हुए भी केवल ज्ञानके ही बलसे यहाँ समस्त पापोंसे मुक्त हो जाते हैं ॥ ४६ ॥
काषायधारणं मौण्ड्यं त्रिविष्टब्धं कमण्डलुम् ।
लिङ्गान्युत्पथभूतानि न मोक्षायेति मे मतिः ॥ ४७ ॥
मेरी तो यह धारणा है कि गेरुआ वस्त्र पहनना, मस्तक मुड़ा लेना तथा त्रिदण्ड और -कमण्डलु धारण करना – ये सब उत्कृष्ट संन्यासमार्गका परिचय देनेवाले चिह्नमात्र हैं । इनके द्वारा मोक्षकी सिद्धि नहीं होती ॥
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यदि सत्यपि लिङ्गेऽस्मिन् ज्ञानमेवात्र कारणम् ।
निर्मोक्षायेह दुःखस्य लिङ्गमात्रं निरर्थकम् ॥ ४८ ॥
यदि इन चिह्नोंके रहते हुए भी यहाँ दुःखसे सर्वथा मोक्ष पानेके लिये एकमात्र ज्ञान ही उपाय है तो जितने भी चिह्न धारण किये जाते हैं, वे सब निरर्थक हैं ॥ ४८ ॥
अथवा दुःखशैथिल्यं वीक्ष्य लिङ्गे कृता मतिः ।
किं तदेवार्थसामान्यं छत्रादिषु न लक्ष्यते ॥ ४ ९ ॥
अथवा यदि कहें कि त्रिदण्ड और गैरिक वस्त्र आदि धारण करनेसे कुछ सुविधा प्राप्त होती है और कष्ट कम होता है, इसलिये संन्यासियोंने उन चिह्नोंको धारण करनेका विचार किया है तो छत्र आदि धारण करनेमें भी इसी सामान्य प्रयोजनकी ओर क्यों न दृष्टि रखी जाय? ॥ ४ ९ ॥
आकिंचन्ये न मोक्षोऽस्ति किंचन्ये नास्ति बन्धनम् ।
किंचन्ये चेतरे चैव जन्तुर्ज्ञानेन मुच्यते ॥ ५० ॥
न तो अकिंचनता ( दरिद्रता ) - में मोक्ष है और न किंचनता ( आवश्यक वस्तुओंसे सम्पन्न होने ) -में बन्धन ही है । धन और निर्धनता दोनों ही अवस्थाओंमें ज्ञानसे ही जीवको मोक्षकी प्राप्ति होती है ॥ ५० ॥
तस्माद् धर्मार्थकामेषु तथा राज्यपरिग्रहे ।
बन्धनायतनेष्वेषु विद्धयबन्धे पदे स्थितम् ॥ ५१ ॥
इसलिये धर्म, अर्थ, काम तथा राज्यपरिग्रह – इन बन्धनके स्थानोंमें रहते हुए भी मुझे आप बन्धनरहित ( जीवन्मुक्त ) पदपर प्रतिष्ठित समझें ॥ ५१ ॥
राज्यैश्वर्यमयः पाशः स्नेहायतनबन्धनः ।
मोक्षाश्मनिशितेनेह च्छिन्नस्त्यागासिना मया ॥ ५२ ॥
मैंने मोक्षरूपी पत्थरपर रगड़कर तेज किये हुए त्याग - वैराग्यरूपी तलवारसे राज्य और ऐश्वर्यरूपी पाशको तथा स्नेहके आश्रयभूत स्त्री- पुत्र आदिके ममत्वरूपी बन्धनको काट डाला है ॥ ५२ ॥
सोऽहमेवंगतो मुक्तो जातास्थस्त्वयि भिक्षुकि ।
अयथार्थं हि ते वर्णं वक्ष्यामि शृणु तन्मम ॥ ५३ ॥
संन्यासिनी! इस प्रकार मैं जीवन्मुक्त हूँ । आपमें योगका प्रभाव देखकर यद्यपि आपके प्रति मेरी आस्था और आदर- बुद्धि हो गयी है तथापि मैं आपके इस रूप और सौन्दर्यको योगसाधनाके योग्य नहीं मानता, अतः इस विषयमें मैं जो कुछ कहता हूँ, मेरे उस वचनको आप सुनिये ॥ ५३ ॥
सौकुमार्यं तथा रूपं वपुरग्यं तथा वयः ।
तवैतानि समस्तानि नियमश्चेति संशयः ॥ ५४ ॥
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सुकुमारता, सौन्दर्य, मनोहर शरीर तथा यौवनावस्था - ये सारी वस्तुएँ योगके विरुद्ध हैं; फिर भी आपमें इन सब गुणोंके साथ- साथ योग और नियम भी हैं ही, यह कैसे सम्भव हुआ? यही मेरे मनमें संदेह है ॥ ५४ ॥
यच्चाप्यननुरूपं ते लिङ्गस्यास्य विचेष्टितम् ।
मुक्तोऽयं स्यान्न वेति स्याद् धर्षितो मत्परिग्रहः ॥ ५५ ॥
यह जो त्रिदण्डधारणरूप चिह्न है, उसके अनुरूप आपकी कोई चेष्टा नहीं है । यह मुक्त है या नहीं, इसकी परीक्षा लेनेके लिये आपने मेरे शरीरको अभिभूत कर दिया है — उसपर बलात् अधिकार जमा लिया है ॥ ५५ ॥
न च कामसमायुक्ते युक्तेऽप्यस्ति त्रिदण्डके ।
न रक्ष्यते त्वया चेदं न मुक्तस्यास्ति गोपना ॥ ५६ ॥
मनुष्य योगयुक्त होकर भी यदि कामभोगमें आसक्त हो जाय तो उसका त्रिदण्ड धारण करना अनुचित एवं व्यर्थ है । आप अपने इस बर्तावद्वारा संन्यास आश्रमके नियमकी रक्षा नहीं कर रही हैं । यदि अपने स्वरूपको छिपानेके लिये आपने ऐसा किया हो तो जीवन्मुक्त पुरुषके लिये आत्मगोपन आवश्यक नहीं है ॥ ५६ ॥
मत्यक्षसंश्रयाच्चायं शृणु यस्ते व्यतिक्रमः ।
आश्रयन्त्याः स्वभावेन मम पूर्वपरिग्रहम् ॥ ५७ ॥
आपने स्वभावतः सोच- समझकर मेरे पूर्व- शरीरका आश्रय लेनेकी चेष्टा की है, अतः मेरे पक्षका आश्रय लेने - मेरे शरीरमें प्रवेश करनेके कारण आपसे जो व्यतिक्रम बन गया है, उसे बताता हूँ, सुनिये ॥ ५७ ॥
प्रवेशस्ते कृतः केन मम राष्ट्रे पुरेऽपि वा ।
कस्य वा संनिकर्षात् त्वं प्रविष्टा हृदयं मम ॥ ५८ ॥
आपने किस कारणसे मेरे राज्य अथवा नगरमें प्रवेश किया है अथवा किसके संकेतसे आप मेरे हृदयमें घुस आयी हैं? ॥ ५८ ॥
वर्णप्रवरमुख्यासि ब्राह्मणी क्षत्रियस्त्वहम् ।
नावयोरेकयोगोऽस्ति मा कृथा वर्णसंकरम् ॥ ५ ९ ॥
वर्णोंमें श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी जो कन्याएँ हैं, उन सबमें आप प्रमुख हैं । आप ब्राह्मणी हैं और मैं क्षत्रिय हूँ; अतः हम दोनोंका एकत्र संयोग होना कदापि उचित नहीं है; इसलिये आप वर्णसंकर नामक दोषका उत्पादन न कीजिये ॥ ५ ९ ॥
वर्तसे मोक्षधर्मेण त्वं गार्हस्थ्येऽहमाश्रमे ।
अयं चापि सुकष्टस्ते द्वितीयोऽऽश्रमसंकरः ॥ ६० ॥
आप मोक्षधर्म ( संन्यास आश्रम ) के अनुसार बर्ताव करती हैं और मैं गृहस्थ - आश्रममें स्थित हूँ; अतः आपके द्वारा यह दूसरा आश्रमसंकर नामक दोषका उत्पादन किया जा रहा है, जो अत्यन्त कष्टप्रद है ॥
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सगोत्रां वासगोत्रां वा न वेद त्वां न वेत्थ'माम् 1 सगोत्रमाविशन्त्यास्ते तृतीयो गोत्रसंकरः ॥ ६१ ॥
मैं यह भी नहीं जानता कि आप सगोत्रा हैं या असगोत्रा । इसी प्रकार आप भी मेरे विषयमें कुछ नहीं जानतीं । अतः मुझ सगोत्रमें प्रवेश करनेके कारण आपके द्वारा तीसरा गोत्रसंकर नामक दोष उत्पन्न किया गया है ॥ ६१ ॥
अथ जीवति ते भर्ता प्रोषितोऽप्यथवा क्वचित् ।
अगम्या परभार्येति चतुर्थो धर्मसंकरः ॥ ६२ ॥
यदि आपके पति जीवित हैं अथवा कहीं परदेशमें चले गये हैं तो आप परायी स्त्री होनेके कारण मेरे लिये सर्वथा अगम्य हैं । ऐसी दशामें आपका यह बर्ताव धर्मसंकर नामक चौथा दोष है || ६२ ||
सा त्वमेतान्यकार्याणि कार्यापेक्षा व्यवस्यसि ।
अविज्ञानेन वा युक्ता मिथ्याज्ञानेन वा पुनः ॥ ६३ ॥
आप कार्य-साधनकी अपेक्षा रखकर अज्ञान अथवा मिथ्याज्ञानसे युक्त हो ये सब न करने योग्य कार्य कर डालनेको उद्यत हो गयी हैं ॥ ६३ ॥
अथवापि स्वतन्त्रासि स्वदोषेणेह कर्हिचित् ।
यदि किंचिच्छ्रतं तेऽस्ति सर्वं कृतमनर्थकम् ॥ ६४ ॥
अथवा यदि आप स्वतन्त्र हैं तो कभी आपके द्वारा यदि कुछ शास्त्रका श्रवण किया गया हो तो आपने अपने ही दोषसे वह सब व्यर्थ कर दिया है ॥ ६४ ॥
इदमन्यच्चतुर्थं ते भावस्पर्शविघातकम् ।
दुष्टाया लक्ष्यते लिङ्गं विवृण्वत्याप्रकाशितम् ॥ ६५ ॥
आपका जो दोष छिपा हुआ था, उसे आपने स्वयं ही प्रकाशित कर दिया । इससे आप दुष्टा जान पड़ती हैं । आपकी दुष्टताका यह और चौथा चिह्न स्पष्ट दिखायी दे रहा है, जो हृदयकी प्रीतिपर आघात करनेवाला है ॥ ६५ ॥
न मय्येवाभिसंधिस्ते जयैषिण्या जये कृतः ।
येयं मत्परिषत् कृत्स्ना जेतुमिच्छसि तामपि ॥ ६६ ॥
आप अपनी विजय चाहती हैं । आपने केवल मुझे ही जीतनेकी इच्छा नहीं की है, अपितु यह जो मेरी सारी सभा बैठी है, इसे भी जीतना चाहती हैं ॥ ६६ ॥
तथार्हतस्ततश्च त्वं दृष्टिं स्वां प्रतिमुञ्चसि ।
मत्यक्षप्रतिघाताय स्वपक्षोद्भावनाय च ॥ ६७ ॥
आप मेरे पक्षकी पराजय और अपने पक्षकी विजयके लिये इन माननीय सभासदोंपर भी बारंबार अपनी दृष्टि फेंक रही हैं ॥ ६७ ॥
सा स्वेनामर्षजेन त्वमृद्धिमोहेन मोहिता ।
भूयः सृजसि योगांस्त्वं विषामृतमिवैकताम् ॥ ६८ ॥
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आप अपनी असहिष्णुताजनित योगसमृद्धिके मोहसे मोहित हो विष और अमृतको एक करनेके समान कामके साथ योगका सम्बन्ध जोड़ रही हैं ॥ ६८ ॥
इच्छतोरत्र यो लाभः स्त्रीपुंसोरमृतोपमः ।
अलाभश्चापि रक्तस्य सोऽपि दोषो विषोपमः ॥ ६ ९ ॥
स्त्री और पुरुष जब एक- दूसरेको चाहते हों, उस समय उन्हें जो संयोग - सुखका लाभ होता है, वह अमृतके समान मधुर है । यदि अनुरक्त नारीको अनुरक्त पुरुषकी प्राप्ति नहीं हुई तो वह दोष विषके समान भयंकर होता है ॥ ६ ९ ॥ मा स्प्राक्षीः साधु जानीष्व स्वशास्त्रमनुपालय ।
कृतेयं हि विजिज्ञासा मुक्तो नेति त्वया मम ।
एतत् सर्वं प्रतिच्छन्नं मयि नार्हसि गूहितुम् ॥ ७० ॥
आप मेरा स्पर्श न करें । मेरे चरित्रको उत्तम और निष्कलंक समझें और अपने शास्त्र ( संन्यास - धर्म ) -का निरन्तर पालन करती रहें । आपने मेरे विषयमें यह जाननेकी इच्छा की थी कि यह राजा जीवन्मुक्त है या नहीं । यह सारा भाव आपके हृदयमें प्रच्छन्नभावसे स्थित था, अतः इस समय आप मुझसे इसको छिपा नहीं सकतीं ॥ ७० ॥
सा यदि त्वं स्वकार्येण यद्यन्यस्य महीपतेः ।
तत् त्वं सत्रप्रतिच्छन्ना मयि नार्हसि गूहितुम् ॥ ७१ ॥
यदि आप अपने कार्यसे या किसी दूसरे राजाके कार्यसे यहाँ वेष बदलकर आयी हों तो अब आपके लिये यथार्थ बातको गुप्त रखना उचित नहीं है ॥ ७१ ॥
न राजानं मृषा गच्छेन्न द्विजातिं कथंचन ।
न स्त्रियं स्त्रीगुणोपेतां हन्युर्ह्येते मृषा गताः ॥ ७२ ॥
मनुष्यको चाहिये कि वह किसी राजाके पास या किसी ब्राह्मणके निकट अथवा स्त्रीजनोचित पातिव्रत्य गुणसे सम्पन्न किसी सती- साध्वी नारीके समीप छद्मवेष धारण करके न जाय; क्योंकि ये राजा, ब्राह्मण और पतिव्रता स्त्री उस छद्मवेषधारी मनुष्यके धोखा देनेपर उसपर कुपित हो उसका विनाश कर देते हैं ॥ ७२ ॥
राज्ञां हि बलमैश्वर्यं ब्रह्म ब्रह्मविदां बलम् ।
रूपयौवनसौभाग्यं स्त्रीणां बलमनुत्तमम् ॥ ७३ ॥
राजाओंका बल ऐश्वर्य है, वेदज्ञ ब्राह्मणोंका बल वेद है तथा स्त्रियोंका परम उत्तम बल रूप, यौवन और सौभाग्य है ॥ ७३ ॥
अत एतैर्बलैरेव बलिनः स्वार्थमिच्छता ।
आर्जवेनाभिगन्तव्या विनाशाय ह्यनार्जवम् ॥ ७४ ॥
ये इन्हीं बलोंसे बलवान् होते हैं । अपने अभीष्ट अर्थकी सिद्धि चाहनेवाले पुरुषको इनके पास सरलभावसे जाना चाहिये; क्योंकि इनके प्रति किया हुआ कुटिल भाव विनाशका कारण बन जाता है ॥ ७४ ॥
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सा त्वं जातिं श्रुतं वृत्तं भावं प्रकृतिमात्मनः ।
कृत्यमागमने चैव वक्तुमर्हसि तत्त्वतः ॥ ७५ ॥
अतः संन्यासिनि! आपको अपनी जाति, शास्त्रज्ञान, चरित्र, अभिप्राय, स्वभाव एवं यहाँ आगमनका प्रयोजन भी यथार्थरूपसे बताना उचित है ॥ ७५ ॥
भीष्म उवाच
इत्येतैरसुखैर्वाक्यैरयुक्तैरसमञ्जसैः ।
प्रत्यादिष्टा नरेन्द्रेण सुलभा न व्यकम्पत ॥ ७६ ॥
भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! राजा जनकने इन दुःखजनक, अयोग्य और असंगत वचनोंद्वारा उसका बड़ा तिरस्कार किया, तो भी सुलभा अपने मनमें तनिक भी विचलित नहीं हुई ॥ ७६ ॥
उक्तवाक्ये तु नृपतौ सुलभा चारुदर्शना ।
ततश्चारुतरं वाक्यं प्रचक्रामाथ भाषितुम् ॥ ७७ ॥
जब राजाकी बात समाप्त हो गयी, तब परम सुन्दरी सुलभाने अत्यन्त मधुर वचनोंमें भाषण देना आरम्भ किया ॥ ७७ ॥
सुलभोवाच
नवभिर्नवभिश्चैव दोषैर्वाग्बुद्धिदूषणैः ।
अपेतमुपपन्नार्थमष्टादशगुणान्वितम् ॥ ७८ ॥
सौक्ष्म्यं सांख्यक्रमौ चोभौ निर्णयः सप्रयोजनः ।
पञ्चैतान्यर्थजातानि वाक्यमित्युच्यते नृप ॥ ७ ९ ॥
सुलभा बोली – राजन्! वाणी और बुद्धिको दूषित करनेवाले जो नौ -नौ दोष हैं, उनसे रहित, अठारह गुणोंसे सम्पन्न और युक्तिसंगत अर्थसे युक्त पदसमूहको वाक्य कहते हैं । उस वाक्यमें सौक्ष्म्य, सांख्य, क्रम, निर्णय और प्रयोजन- ये पाँच प्रकारके अर्थ रहने चाहिये ॥ ७८-७९ ॥
एषामेकैकशोऽर्थानां सौक्ष्म्यादीनां स्वलक्षणम् ।
शृणु संसार्यमाणानां पदार्थपदवाक्यतः ॥ ८० ॥
ये जो सौक्ष्म्य आदि अर्थ हैं, ये पद, वाक्य, पदार्थ और वाक्यार्थरूपसे खोलकर बताये जा रहे हैं । आप इनमेंसे एक - एकका अलग - अलग लक्षण सुनिये ॥ ८० ॥
ज्ञानं ज्ञेयेषु भिन्नेषु यदा भेदेन वर्तते ।
तत्रातिशायिनी बुद्धिस्तत् सौक्ष्म्यमिति वर्तते ॥ ८१ ॥
जहाँ अनेक भिन्न-भिन्न ज्ञेय ( अर्थ ) उपस्थित हों और ' यह घट है, यह पट है ' इस प्रकार वस्तुओंका पृथक् - पृथक् ज्ञान होता हो, ऐसे स्थलोंमें यथार्थ निर्णय करनेवाली जो बुद्धि है, उसीका नाम सौक्ष्म्य है ॥ ८१ ॥
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दोषाणां च गुणानां च प्रमाणं प्रविभागतः ।
कंचिदर्थमभिप्रेत्य सा संख्येत्युपधार्यताम् ॥ ८२ ॥
जहाँ किसी विशेष अर्थको अभीष्ट मानकर उसके दोषों और गुणोंकी विभागपूर्वक गणना की जाती है, उस अर्थको संख्या अथवा सांख्य समझना चाहिये ॥
इदं पूर्वमिदं पश्चाद् वक्तव्यं यद् विवक्षितम् ।
क्रमयोगं तमप्याहुर्वाक्यं वाक्यविदो जनाः ॥ ८३ ॥
परिगणित गुणों और दोषोंमेंसे अमुक गुण या दोष पहले कहना चाहिये और अमुकको पीछे कहना अभीष्ट है । इस प्रकार जो पूर्वापरके क्रमका विचार होता है, उसका नाम क्रम है और जिस वाक्यमें ऐसा क्रम हो, उस वाक्यको वाक्यवेत्ता विद्वान् क्रमयुक्त कहते हैं ॥
धर्मकामार्थमोक्षेषु प्रतिज्ञाय विशेषतः ।
इदं तदिति वाक्यान्ते प्रोच्यते स विनिर्णयः ॥ ८४ ॥
धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके विषयमें किसी एकका विशेषरूपसे प्रतिपादन करनेकी प्रतिज्ञा करके प्रवचनके अन्तमें ' यही वह अभीष्ट विषय है ' ऐसा कहकर जो सिद्धान्त स्थिर किया जाता है, उसीका नाम निर्णय है ॥ ८४ ॥
इच्छाद्वेषभवैर्दुःखैः प्रकर्षो यत्र जायते ।
तत्र या नृपते वृत्तिस्तत् प्रयोजनमिष्यते ॥ ८५ ॥
नरेश्वर! इच्छा अथवा द्वेषसे उत्पन्न हुए दुःखोंद्वारा जहाँ किसी एक प्रकारके दुःखकी प्रधानता हो जाय, वहाँ जो वृत्ति उदय होती है, उसीको प्रयोजन कहते हैं ॥ ८५ ॥
तान्येतानि यथोक्तानि सौक्ष्म्यादीनि जनाधिप ।
एकार्थसमवेतानि वाक्यं मम निशामय ॥ ८६ ॥
जनेश्वर! जिस वाक्यमें पूर्वोक्त सौक्ष्म्य आदि गुण एक अर्थमें सम्मिलित हों, मेरे वैसे ही वाक्यको आप श्रवण करें ॥ ८६ ॥
उपेतार्थमभिन्नार्थं न्यायवृत्तं न चाधिकम् ।
नाश्लक्ष्णं न च संदिग्धं वक्ष्यामि परमं ततः ॥ ८७ ॥
मैं ऐसा वाक्य बोलूँगी, जो सार्थक होगा । उसमें अर्थभेद नहीं होगा । वह न्याययुक्त होगा । उसमें आवश्यकतासे अधिक, कर्णकटु एवं संदेह -जनक पद नहीं होंगे । इस प्रकार मैं परम उत्तम वाक्य बोलूँगी ॥
न गुर्वक्षरसंयुक्तं पराङ्मुखसुखं न च ।
नानृतं न त्रिवर्गेण विरुद्धं नाप्यसंस्कृतम् ॥ ८८ ॥
मेरे इस वचनमें गुरु एवं निष्ठुर अक्षरोंका संयोग नहीं होगा; उसमें कोमलकान्त सुकुमार पदावली होगी । वह पराङ्मुख व्यक्तियोंके लिये सुखद नहीं होगा । वह न तो झूठ होगा न धर्म, अर्थ और कामके विरुद्ध और संस्कारशून्य ही होगा ॥ ८८ ॥
न न्यूनं कष्टशब्दं वा विक्रमाभिहितं न च ।
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न शेषमनु कल्पेन निष्कारणमहेतुकम् ॥ ८९ ॥
मेरे उस वाक्यमें न्यूनपदत्व नामक दोष नहीं रहेगा, कष्टकर शब्दोंका प्रयोग नहीं होगा, उसका क्रमरहित उच्चारण नहीं होगा । उसमें दूसरे पदोंके अध्याहार और लक्षणकी आवश्यकता नहीं होगी । यह वाक्य निष्प्रयोजन और युक्तिशून्य भी नहीं होगा ॥ ८ ९ ॥
कामात् क्रोधाद् भयाल्लोभाद् दैन्याच्चानार्यकात् तथा ।
तोऽनुक्रोशतो मानान्न वक्ष्यामि कथंचन ॥ ९० ॥
मैं काम, क्रोध, भय, लोभ, दैन्य, अनार्यता, लज्जा, दया तथा अभिमानसे किसी तरह कोई बात नहीं बोलूँगी ॥ ९ ० ॥
वक्ता श्रोता च वाक्यं च यदा त्वविकलं नृप ।
सममेति विवक्षायां तदा सोऽर्थः प्रकाशते ॥ ९ १ ॥
नरेश्वर! बोलनेकी इच्छा होनेपर जब वक्ता, श्रोता और वाक्य- तीनों अविकलभावसे सम-स्थितिमें आ जाते हैं, तब वक्ताका कहा हुआ अर्थ प्रकाशित होता है ( श्रोताके समझमें आ जाता है ) ॥ ९ १ ॥
वक्तव्ये तु यदा वक्ता श्रोतारमवमन्य वै ।
स्वार्थमाह परार्थं तत् तदा वाक्यं न रोहति ॥ ९ २ ॥
जब बोलते समय वक्ता श्रोताकी अवहेलना करके दूसरेके लिये अपनी बात कहने लगता है, उस समय वह वाक्य श्रोताके हृदयमें प्रवेश नहीं करता है ॥
अथ यः स्वार्थमुत्सृज्य परार्थं प्राह मानवः ।
विशङ्का जायते तस्मिन् वाक्यं तदपि दोषवत् ॥ ९ ३ ॥
और जो मनुष्य स्वार्थ त्यागकर दूसरेके लिये कुछ कहता है, उस समय उसके प्रति श्रोताके हृदयमें आशंका उत्पन्न होती है, अतः वह वाक्य भी दोषयुक्त ही है ॥ ९ ३ ॥
यस्तु वक्ता द्वयोरर्थमविरुद्धं प्रभाषते ।
श्रोतुश्चैवात्मनश्चैव स वक्ता नेतरो नृप ॥ ९ ४ ॥
परंतु नरेश्वर! जो वक्ता अपने और श्रोता दोनोंके लिये अनुकूल विषय ही बोलता है, वही वास्तवमें वक्ता है, दूसरा नहीं ॥ ९ ४ ॥
तदर्थवदिदं वाक्यमुपेतं वाक्यसम्पदा ।
अविक्षिप्तमना राजन्नेकाग्रः श्रोतुमर्हसि ॥ ९ ५ ॥
अतः राजन्! आप स्थिरचित्त एवं एकाग्र होकर यह वाक्यसम्पत्तिसे युक्त सार्थक वचन सुनिये ॥ ९ ५ ॥
कासि कस्य कुतश्चेति त्वयाहमभिचोदिता ।
तत्रोत्तरमिदं वाक्यं राजन्नेकमनाः शृणु ॥ ९ ६ ॥
महाराज! आपने मुझसे पूछा था कि आप कौन हैं, किसकी हैं और कहाँसे आयी हैं? अतः इसके उत्तरमें मेरा यह कथन एकचित्त होकर सुनिये ॥ ९ ६ ॥