श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 731–740
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 731–740
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* देखिये कर्णपर्व अध्याय ६ ९ श्लोक ३८ से ४५ तक । १. गंगाके तटपर किसी सर्पिणीने सहस्रों अण्डे देकर रख दिये थे । उन अण्डोंको एक उल्लूने रातमें फोड़- फोड़कर नष्ट कर दिया । इससे वह महान् पुण्यका भागी हुआ; अन्यथा उन अण्डोंसे हजारों विषैले सर्प पैदा होकर कितने ही लोगोंका विनाश कर डालते ।
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दशाधिकशततमोऽध्यायः सदाचार और ईश्वरभक्ति आदिको दुःखोंसे छूटनेका उपाय बताना युधिष्ठिर उवाच
क्लिश्यमानेषु भूतेषु तैस्तैर्भावैस्ततस्ततः ।
दुर्गाण्यतितरेद् येन तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा- पितामह! जगत्के जीव भिन्न-भिन्न भावोंके द्वारा जहाँ -तहाँ नाना प्रकारके कष्ट उठा रहे हैं; अतः जिस उपायसे मनुष्य इन दुःखोंसे छुटकारा पा सके, वह मुझे बताइये ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
आश्रमेषु यथोक्तेषु यथोक्तं ये द्विजातयः ।
वर्तन्ते संयतात्मानो दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा - ' राजन् जो द्विज अपने मनको वशमें करके शास्त्रोक्त चारों आश्रमोंमें रहते हुए उनके अनुसार ठीक- ठीक बर्ताव करते हैं, वे दुःखोंके पार हो जाते हैं ॥ २ ॥
ये दम्भान्नाचरन्ति स्म येषां वृत्तिश्च संयता ।
विषयांश्च निगृह्णन्ति दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ ३ ॥
जो दम्भयुक्त आचरण नहीं करते, जिनकी जीविका नियमानुकूल चलती है और जो विषयोंके लिये बढ़ती हुई इच्छाको रोकते हैं, वे दुःखोंको लाँघ जाते हैं ॥ ३ ॥
प्रत्याहुर्नोच्यमाना ये न हिंसन्ति च हिंसिताः ।
प्रयच्छन्ति न याचन्ते दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ ४ ॥
जो दूसरोंके कटु वचन सुनाने या निन्दा करनेपर भी स्वयं उन्हें उत्तर नहीं देते, मार खाकर भी किसीको मारते नहीं तथा स्वयं देते हैं, परंतु दूसरोंसे माँगते नहीं; वे भी दुर्गम संकटसे पार हो जाते हैं ॥ ४ ॥
वासयन्त्यतिथीन् नित्यं नित्यं ये चानसूयकाः ।
नित्यं स्वाध्यायशीलाश्च दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ ५ ॥
जो प्रतिदिन अतिथियोंको अपने घरमें सत्कारपूर्वक ठहराते हैं, कभी किसीके दोष नहीं देखते हैं तथा नित्य नियमपूर्वक वेदादि सद्ग्रन्थोंका स्वाध्याय करते रहते हैं, वे दुर्गम संकटोंसे पार हो जाते हैं ॥ ५ ॥
मातापित्रोश्च ये वृत्तिं वर्तन्ते धर्मकोविदाः ।
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वर्जयन्ति दिवा स्वप्नं दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ ६ ॥
जो धर्मज्ञ पुरुष सदा माता-पिताकी सेवामें लगे रहते हैं और दिनमें कभी सोते नहीं हैं, वे सभी दुःखोंसे छूट जाते हैं ॥ ६ ॥
ये वा पापं न कुर्वन्ति कर्मणा मनसा गिरा ।
निक्षिप्तदण्डा भूतेषु दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ ७ ॥
जो मन, वाणी और क्रियाद्वारा कभी पाप नहीं करते हैं और किसी भी प्राणीको कष्ट नहीं पहुँचाते हैं, वे भी संकट से पार हो जाते हैं ॥ ७ ॥
ये न लोभान्नयन्त्यर्थान् राजानो रजसान्विताः ।
विषयान् परिरक्षन्ति दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ ८ ॥
जो रजोगुणसम्पन्न राजा लोभवश प्रजाके धनका अपहरण नहीं करते हैं और अपने राज्यकी सब ओरसे रक्षा करते हैं, वे भी दुर्गम दुःखोंको लाँघ जाते हैं ॥ ८ ॥
स्वेषु दारेषु वर्तन्ते न्यायवृत्तिमृतावृतौ ।
अग्निहोत्रपराः सन्तो दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ ९ ॥
जो गृहस्थ प्रतिदिन अग्निहोत्र करते औरऋतुकालमें अपनी ही स्त्रीके साथ धर्मानुकूल समागम करते हैं, वे दुःखोंसे छूट जाते हैं ॥ ९
आहवेषु च ये शूरास्त्यक्त्वा मरणजं भयम् ।
धर्मेण जयमिच्छन्ति दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ १० ॥
जो शूरवीर युद्धस्थलमें मृत्युका भय छोड़कर धर्मपूर्वक विजय पाना चाहते हैं, वे सभी दुःखोंसे पार हो जाते हैं ॥ १० ॥
ये वदन्तीह सत्यानि प्राणत्यागेऽप्युपस्थिते ।
प्रमाणभूता भूतानां दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ ११ ॥
जो लोग प्राण जानेका अवसर उपस्थित होनेपर भी सत्य बोलना नहीं छोड़ते, वे सम्पूर्ण प्राणियोंके विश्वासपात्र बने रहकर सभी दुःखोंसे पार हो जाते हैं ॥
कर्माण्यकुहकार्थानि येषां वाचश्च सूनृताः ।
येषामर्थाश्च सम्बद्धा दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ १२ ॥
जिनके शुभ कर्म दिखावेके लिये नहीं होते, जो सदा मीठे वचन बोलते और जिनका धन सत्कर्मोंके लिये बँधा हुआ है, वे दुर्गम संकटोंसे पार हो जाते हैं ॥
अनध्यायेषु ये विप्राः स्वाध्यायं नेह कुर्वते ।
तपोनिष्ठाः सुतपसो दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ १३ ॥
जो अनध्यायके अवसरोंपर वेदोंका स्वाध्याय नहीं करते और तपस्यामें ही लगे रहते हैं, वे उत्तम तपस्वी ब्राह्मण दुस्तर विपत्तिसे छुटकारा पा जाते हैं ॥ १३ ॥
ये तपश्च तपस्यन्ति कौमारब्रह्मचारिणः ।
विद्यावेदव्रतस्नाता दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ १४ ॥
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जो तपस्या करते, कुमारावस्थासे ही ब्रह्मचर्यके पालनमें तत्पर रहते और विद्या एवं वेदोंके अध्ययन - सम्बन्धी व्रतको पूर्ण करके स्नातक हो चुके हैं, वे दुस्तर दुःखोंको तर जाते है ॥ १४ ॥
ये च संशान्तरजसः संशान्ततमसश्च ये ।
सत्त्वे स्थिता महात्मानो दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ १५ ॥
जिनके रजोगुण और तमोगुण शान्त हो गये हों तथा जो विशुद्ध सत्त्वगुणमें स्थित हैं, वे महात्मा दुर्लंघ्य संकटोंको भी लाँघ जाते हैं ॥ १५ ॥
येषां न कश्चित् त्रसति न सन्ति हि कस्यचित् ।
येषामात्मसमो लोको दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ १६ ॥
जिनसे कोई भयभीत नहीं होता, जो स्वयं भी किसीसे भय नहीं मानते तथा जिनकी दृष्टिमें यह सारा जगत् अपने आत्माके ही तुल्य है, वे दुस्तर संकटोंसे तर जाते हैं ॥ १६ ॥
परश्रिया न तप्यन्ति ये सन्तः पुरुषर्षभाः ।
ग्राम्यादर्थान्निवृत्ताश्च दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ १७ ॥
जो दूसरोंकी सम्पत्तिसे ईर्ष्यावश जलते नहीं हैं और ग्राम्य विषय - भोगसे निवृत्त हो गये हैं, वे मनुष्योंमें श्रेष्ठ साधु पुरुष दुस्तर विपत्तिसे छुटकारा पा जाते हैं ॥
सर्वान् देवान् नमस्यन्ति सर्वधर्मांश्च शृण्वते ।
ये श्रद्दधानाः शान्ताश्च दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ १८ ॥
जो सब देवताओंको प्रणाम करते और सभी धर्मोंको सुनते हैं, जिनमें श्रद्धा और शान्ति विद्यमान है, वे सम्पूर्ण दुःखोंसे पार हो जाते हैं ॥ १८ ॥
ये न मानित्वमिच्छन्ति मानयन्ति च ये परान् ।
मान्यमानान् नमस्यन्ति दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ १ ९ ॥
जो दूसरोंसे सम्मान नहीं चाहते, जो स्वयं ही दूसरोंको सम्मान देते हैं और सम्माननीय पुरुषोंको नमस्कार करते हैं, वे दुर्लंघ्य संकटोंसे पार हो जाते हैं ॥
ये च श्राद्धानि कुर्वन्ति तिथ्यां तिथ्यां प्रजार्थिनः ।
सुविशुद्धेन मनसा दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ २० ॥
जो संतानकी इच्छा रखकर प्रत्येक तिथिपर विशुद्ध हृदयसे पितरोंका श्राद्ध करते हैं, वे दुर्गम विपत्तिसे छुटकारा पा जाते हैं ॥ २० ॥
ये क्रोधं संनियच्छन्ति क्रुद्धान्संशमयन्ति च ।
न च कुप्यन्ति भूतानां दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ २१ ॥
जो क्रोधको काबूमें रखते हैं, क्रोधी मनुष्योंको शान्त करते और स्वयं किसी भी प्राणीपर कुपित नहीं होते हैं, वे दुर्लंघ्य संकटोंसे पार हो जाते हैं ॥ २१ ॥
मधु मांसं च ये नित्यं वर्जयन्तीह मानवाः ।
जन्मप्रभृति मद्यं च दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ २२ ॥
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जो मानव जन्मसे ही सदाके लिये मधु, मांस और मदिराका त्याग कर देते हैं, वे भी दुस्तर दुःखोंसे छूट जाते हैं ॥ २२ ॥
यात्रार्थं भोजनं येषां संतानार्थं च मैथुनम् ।
वाक् सत्यवचनार्थाय दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ २३ ॥
जिनका भोजन स्वादके लिये नहीं, जीवनयात्राका निर्वाह करनेके लिये होता है, जो विषयवासनाकी तृप्तिके लिये नहीं, संतानकी इच्छासे मैथुनमें प्रवृत्त होते हैं तथा जिनकी वाणी केवल सत्य बोलनेके लिये है, वे समस्त संकटोंसे पार हो जाते हैं ॥ २३ ॥
ईश्वरं सर्वभूतानां जगतः प्रभवाप्ययम् ।
भक्ता नारायणं देवं दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ २४ ॥
जो समस्त प्राणियोंके स्वामी तथा जगत्की उत्पत्ति और प्रलयके हेतुभूत भगवान् नारायणमें भक्तिभाव रखते हैं, वे दुस्तर दुःखोंसे तर जाते हैं ॥ २४ ॥
य एष पद्मरक्ताक्षः पीतवासा महाभुजः ।
सुहृद् भ्राता च मित्रं च सम्बन्धी च तथाच्युतः ॥ २५ ॥
युधिष्ठिर! ये जो कमल पुष्पके समान कुछ- कुछ लाल रंगके नेत्रोंसे सुशोभित पीताम्बरधारी महाबाहु श्रीकृष्ण हैं, जो तुम्हारे सुहृद् भाई, मित्र और सम्बन्धी भी हैं, यही साक्षात् नारायण हैं ॥ २५ ॥
य इमान् सकलाल्लोँकांश्चर्मवत् परिवेष्टयेत् ।
इच्छन् प्रभुरचिन्त्यात्मा गोविन्दः पुरुषोत्तमः ॥ २६ ॥
इनका स्वरूप अचिन्त्य है । ये पुरुषोत्तम भगवान् गोविन्द इन सम्पूर्ण लोकोंको इच्छापूर्वक चमड़ेकी भाँति आच्छादित किये हुए हैं ॥ २६ ॥
स्थितः प्रियहिते जिष्णोः स एष पुरुषोत्तमः ।
राजंस्तव च दुर्धर्षो वैकुण्ठः पुरुषर्षभ ॥ २७ ॥
पुरुषप्रवर युधिष्ठिर! वे ही ये दुर्धर्ष वीर पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण साक्षात् वैकुण्ठधामके निवासी श्रीविष्णु हैं । राजन्! ये इस समय तुम्हारे और अर्जुनके प्रिय तथा हितसाधनमें संलग्न हैं ॥ २७ ॥
य एनं संश्रयन्तीह भक्ता नारायणं हरिम् ।
ते तरन्तीह दुर्गाणि न चात्रास्ति विचारणा ॥ २८ ॥
जो भक्त पुरुष यहाँ इन भगवान् श्रीहरि- नारायण देवकी शरण लेते हैं, वे दुस्तर
संकटोंसे तर जाते हैं । इस विषयमें कोई संशय नहीं है ॥ २८ ॥
( अस्मिन्नर्पितकर्माणः सर्वभावेन भारत ।
कृष्णे कमलपत्राक्षे दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥
भारत! जो इन कमलनयन श्रीकृष्णको सम्पूर्ण भक्तिभावसे अपने सारे कर्म समर्पित कर देते हैं, वे दुर्गम संकटोंको लाँघ जाते हैं ॥
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ब्रह्माणं लोककर्तारं ये नमस्यन्ति सत्पतिम् ।
यष्टव्यं क्रतुभिर्देवं दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥
जो यज्ञोंद्वारा आराधनाके योग्य हैं, उन साधुप्रतिपालक विश्वविधाता भगवान् ब्रह्माको जो नमस्कार करते हैं, वे समस्त दुःखोंसे छुटकारा पा जाते हैं ॥
यं विष्णुरिन्द्रः शम्भुश्च ब्रह्मा लोकपितामहः ।
स्तुवन्ति विविधैः स्तोत्रैर्देवदेवं महेश्वरम् ॥
तमर्चयन्ति ये शश्वद् दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ ) विष्णु, इन्द्र, शिव तथा लोकपितामह ब्रह्मा नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा जिनकी स्तुति करते हैं, उन देवाधिदेव परमेश्वरकी जो सदा आराधना करते हैं, वे दुर्गम संकटोंसे पार हो जाते हैं ॥
दुर्गातितरणं ये च पठन्ति श्रावयन्ति च ।
कथयन्ति च विप्रेभ्यो दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ २ ९ ॥
जो लोग इस दुर्गातितरण नामक अध्यायको पढ़ते और सुनते हैं तथा ब्राह्मणोंके सामने इसकी चर्चा करते हैं, वे दुर्गम संकटोंसे पार हो जाते हैं ॥ २ ९ ॥
इति कृत्यसमुद्देशः कीर्तितस्ते मयानघ ।
तरन्ते येन दुर्गाणि परत्रेह च मानवाः ॥ ३० ॥
निष्पाप युधिष्ठिर! इस प्रकार मैंने यहाँ संक्षेपसे उस कर्तव्यका प्रतिपादन किया है, जिसका पालन करनेसे मनुष्य इहलोक और परलोकमें समस्त दुःखोंसे छुटकारा पा जाते हैं ॥ ३० ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि दुर्गातितरणं नाम दशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें दुर्गातितरण नामक एक सौ दसवाँ अध्याय पूरा हआ ॥ ११० ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३३ श्लोक मिलाकर कुल ३३३ श्लोक हैं ) OF FUTE
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एकादशाधिकशततमोऽध्यायः मनुष्यके स्वभावकी पहचान बतानेवाली बाघ और सियारकी कथा युधिष्ठिरउवाच
असौम्याः सौम्यरूपेण सौम्याश्चासौम्यदर्शनाः ।
ईदृशान् पुरुषांस्तात कथं विद्यामहे वयम् ॥ १ ॥।
युधिष्ठिरने पूछा – तात! बहुत- से कठोर स्वभाववाले मनुष्य ऊपरसे कोमल और शान्त बने रहते हैं तथा कोमल स्वभावके लोग कठोर दिखायी देते हैं, ऐसे मनुष्योंकी मुझे ठीक- ठीक पहचान कैसे हो? ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
व्याघ्रगोमायुसंवादं तं निबोध युधिष्ठिर ॥ २ ॥
भीष्मजी बोले – युधिष्ठिर! इस विषयमें जानकार लोग एक बाघ और सियारके संवादरूप प्राचीन आख्यानका उदाहरण दिया करते हैं, उसे ध्यान देकर सुनो ॥ २ ॥
पुरिकायां पुरि पुरा श्रीमत्यां पौरिको नृपः ।
परहिंसारतिः क्रूरो बभूव पुरुषाधमः ॥ ३ ॥
पूर्वकालकी बात है, प्रचुर धन- धान्यसे सम्पन्न पुरिका नामकी नगरीमें पौरिक नामसे प्रसिद्ध एक राजा राज्य करता था। वह बड़ा ही क्रूर और नराधम था, दूसरे प्राणियोंकी हिंसामें ही उसका मन लगता था ॥ ३ ॥
सत्वायुषि परिक्षीणे जगामानीप्सितां गतिम् ।
गोमायुत्वं च सम्प्रातो दूषितः पूर्वकर्मणा ॥ ४ ॥
धीरे - धीरे उसकी आयु समाप्त हो गयी और वह ऐसी गतिको प्राप्त हुआ, जो किसी भी प्राणीको अभीष्ट नहीं है। वह अपने पूर्वकर्मसे दूषित होकर दूसरे जन्ममें गीदड़ हो गया ॥ ४ ॥
संस्मृत्य पूर्वभूतिं च निर्वेदं परमं गतः ।
न भक्षयति मांसानि परैरुपहतान्यपि ॥ ५ ॥
उस समय अपने पूर्व जन्मके वैभवका स्मरण करके उस सियारको बड़ा खेद और वैराग्य हुआ । अतः वह दूसरोंके द्वारा दिये हुए मांसको भी नहीं खाता था ॥ ५ ॥
अहिंस्रः सर्वभूतेषु सत्यवाक् सुदृढव्रतः ।
स चकार यथाकालमाहारं पतितैः फलैः ॥ ६ ॥
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अब उसने जीवोंकी हिंसा करनी छोड़ दी, सत्य बोलनेका नियम ले लिया और दृढ़तापूर्वक अपने व्रतका पालन करने लगा । वह नियत समयपर वृक्षोंसे अपने आप गिरे हुए फलोंका आहार करता था ॥ ६ ॥
(पर्णाहारः कदाचिच्च नियमव्रतवानपि । कदाचिदुदकेनापि वर्तयन्ननुयन्त्रितः ॥ ) व्रत और नियमोंके पालनमें तत्पर हो कभी पत्ता चबा लेता और कभी पानी पीकर ही रह जाता था । उसका जीवन संयममें बँध गया था ॥
श्मशाने तस्य चावासो गोमायोः सम्मतोऽभवत् ।
जन्मभूम्यनुरोधाच्च नान्यवासमरोचयत् ॥ ७ ॥
वह श्मशानभूमिमें ही रहता था । वहीं उसका जन्म हुआ था, इसलिये वही स्थान उसे पंसद था । उसे और कहीं जाकर रहनेकी रुचि नहीं होती थी ॥ ७ ॥
तस्य शौचममृष्यन्तस्ते सर्वे सहजातयः ।
चालयन्ति स्म तां बुद्धिं वचनैः प्रश्रयोत्तरैः ॥ ८ ॥
सियारका इस तरह पवित्र आचार - विचारसे रहना उसके सभी जाति- भाइयोंको अच्छा न लगा । यह सब उनके लिये असह्य हो उठा; इसलिये वे प्रेम और विनयभरी बातें कहकर उसकी बुद्धिको विचलित करने लगे ॥ ८ ॥
वसन् पितृवने रौद्रे शौचे वर्तितुमिच्छसि ।
इयं विप्रतिपत्तिस्ते यदा त्वं पिशिताशनः ॥ ९ ॥
उन्होंने कहा ‘ भाई सियार! तू तो मांसाहारी जीव है और भयंकर श्मशानभूमिमें निवास करता है, फिर भी पवित्र आचार- विचारसे रहना चाहता है - यह विपरीत निश्चय है ॥ ९ ॥
तत्समानो भवास्माभिर्भोज्यं दास्यामहे वयम् ।
भुङ्क्ष्व शौचं परित्यज्य यद्धि भुक्तं सदास्तु ते ॥ १० ॥
‘ भैया! अतः तू हमारे ही समान होकर रह। तेरे लिये भोजन तो हमलोग ला दिया करेंगे । तू इस शौचाचारका नियम छोड़कर चुपचाप खा लिया करना । तेरी जातिका जो सदासे भोजन रहा है, वही तेरा भी होना चाहिये ' ॥ १० ॥
इति तेषां वचः श्रुत्वा प्रत्युवाच समाहितः ।
मधुरैः प्रसृतैर्वाक्यैर्हेतुमद्भिरनिष्ठुरैः ॥ ११ ॥
उनकी ऐसी बात सुनकर सियार एकाग्रचित्त हो मधुर, विस्तृत, युक्तियुक्त तथा कोमल वचनोंद्वारा इस प्रकार बोला- ॥ ११ ॥
अप्रमाणा प्रसूतिर्मे शीलतः क्रियते कुलम् ।
प्रार्थयामि च तत्कर्म येन विस्तीर्यते यशः ॥ १२ ॥
' बन्धुओ! अपने बुरे आचरणोंसे ही हमारी जातिका कोई विश्वास नहीं करता । अच्छे स्वभाव और आचरणसे ही कुलकी प्रतिष्ठा होती है; अतः मैं भी वही कर्म करना चाहता हूँ,
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जिससे अपने वंशका यश बढ़े ॥ १२ ॥
श्मशाने यदि मे वासः समाधिर्मे निशम्यताम् ।
आत्मा फलति कर्माणि नाश्रमो धर्मकारणम् ॥ १३ ॥
‘यदि मेरा निवास श्मशानभूमिमें है तो इसके लिये मैं जो समाधान देता हूँ, उसको सुनो । आत्मा ही शुभ कर्मोंके लिये प्रेरणा करता है । कोई आश्रम ही धर्मका कारण नहीं हुआ करता ॥ १३ ॥
आश्रमे यो द्विजं हन्याद् गां वा दद्यादनाश्रमे ।
किं तु तत्पातकं न स्यात् तद्वा दत्तं वृथा भवेत् ॥ १४ ॥
‘ क्या यदि कोई आश्रममें रहकर ब्राह्मणकी हत्या करे तो उसे उसका पातक नहीं लगेगा और यदि कोई बिना आश्रमके स्थानमें गोदान करे तो क्या वह व्यर्थ हो जायेगा? ॥ १४ ॥
भवन्तः स्वार्थलोभेन केवलं भक्षणे रताः ।
अनुबन्धे त्रयो दोषास्तान् न पश्यन्ति मोहिताः ॥ १५ ॥
‘ तुमलोग केवल स्वार्थके लोभसे मांसभक्षणमें रचे - पचे रहते हो । उसके परिणामस्वरूप जो तीन दोष प्राप्त होते हैं, उनकी ओर मोहवश तुम्हारी दृष्टि नहीं जाती ॥ १५ ॥
अप्रत्ययकृतां गह्यमर्थापनयदूषिताम् ।
इह चामुत्र चानिष्टां तस्माद् वृत्तिं न रोचये ॥। १६ ॥
‘ तुमलोगोंकी जीविका असंतोषसे पूर्ण, निन्दनीय, धर्मकी हानिके कारण दूषित तथा इहलोक और परलोकमें भी अनिष्ट फल देनेवाली है; इसलिये मैं उसे पसंद नहीं करता हूँ ॥ १६ ॥
तं शुचिं पण्डितं मत्वा शार्दूलः ख्यातविक्रमः ।
कृत्वाऽऽत्मसदृशीं पूजां साचिव्येऽवरयत् स्वयम् ॥ १७ ॥
सियारके इस पवित्र आचार- विचारकी चर्चा चारों ओर फैल जानेके कारण एक प्रख्यातपराक्रमी व्याघ्रने उसे विद्वान् और विशुद्ध स्वभावका मानकर उसके निकट पदार्पण किया और उसकी अपने अनुरूप पूजा करके स्वयं ही मन्त्री बनानेके लिये उसका वरण किया ॥ १७ ॥
शार्दूल उवाच
सौम्य विज्ञातरूपस्त्वं गच्छ यात्रां मया सह ।
व्रियन्तामीप्सिता भोगाः परिहार्याश्च पुष्कलाः ॥ १८ ॥
व्याघ्र बोला – सौम्य! मैं तुम्हारे स्वरूपसे परिचित हूँ । तुम मेरे साथ चलो और अपनी रुचिके अनुसार अधिक- से- अधिक भोगोंका उपभोग करो। जो वस्तुएँ प्रिय न हों, उन्हें त्याग देना ॥ १८ ॥
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तीक्ष्णा इति वयं ख्याता भवन्तं ज्ञापयामहे ।
मृदुपूर्वं हितं चैव श्रेयश्चाधिगमिष्यसि ॥ १ ९ ॥
परंतु एक बात मैं तुम्हें सूचित कर देता हूँ। सारे संसारमें यह बात प्रसिद्ध है कि हमारी जातिका स्वभाव कठोर होता है; अतः यदि तुम कोमलतापूर्वक व्यवहार करते हुए मेरे हित- साधनमें लगे रहोगे तो अवश्य ही कल्याणके भागी होओगे ॥ १ ९ ॥
अथ सम्पूज्य तद् वाक्यं मृगेन्द्रस्य महात्मनः ।
गोमायुः संश्रितं वाक्यं बभाषे किंचिदानतः ॥ २० ॥
महामनस्वी मृगराजके उस कथनकी भूरि- भूरि प्रशंसा करके सियारने कुछ नतमस्तक होकर विनययुक्त वाणीमें कहा ॥ २० ॥
गोमायुरुवाच
सदृशं मृगराजैतत् तव वाक्यं मदन्तरे ।
यत् सहायान् मृगयसे धर्मार्थकुशलान् शुचीन् ॥ २१ ॥
सियार बोला — मृगराज! आपने मेरे लिये जो बात कही है, वह सर्वथा आपके योग्य ही है तथा आप जो धर्म और अर्थसाधनमें कुशल एवं शुद्ध स्वभाववाले सहायकों ( मन्त्रियों) की खोज कर रहे हैं, यह भी उचित ही है ॥ २१ ॥
न शक्यं ह्यनमात्येन महत्त्वमनुशासितुम् ।
दुष्टामात्येन वा वीर शरीरपरिपन्थिना ॥ २२ ॥
वीर! मन्त्रीके बिना एकाकी राजा विशाल राज्यका शासन नहीं कर सकता । यदि शरीरको सुखा देनेवाला कोई दुष्ट मन्त्री मिल गया तो उसके द्वारा भी शासन नहीं चलाया जा सकता ॥ २२ ॥
सहायाननुरक्तांश्च नयज्ञानुपसंहितान् ।
परस्परमसंसृष्टान् विजिगीषूनलोलुपान् ॥ २३ ॥
अनतीतोपधान् प्राज्ञान् हिते युक्तान् मनस्विनः ।
पूजयेथा महाभाग यथाऽऽचार्यान् यथा पितॄन् ॥ २४ ॥
महाभाग! इसके लिये आपको चाहिये कि जिनका आपके प्रति अनुराग हो, जो नीतिके जानकार, सद्भाव- सम्पन्न, परस्पर गुटबंदीसे रहित, विजयकी अभिलाषासे युक्त, लोभरहित, कपटनीतिमें कुशल, बुद्धिमान्, स्वामीके हितसाधनमें तत्पर और मनस्वी हों, ऐसे व्यक्तियोंको सहायक या सचिव बनाकर आप पिता और गुरुके समान उनका सम्मान करें ॥ २३-२४ ॥
न त्वेव मम संतोषाद् रोचतेऽन्यन्मृगाधिप ।
न कामये सुखान् भोगानैश्वर्यं च तदाश्रयम् ॥ २५ ॥