श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 1001–1010
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1001–1010
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सर्वभूतात्मभूतस्य सर्वभूतानि पश्यतः ।
देवाऽपि मार्गे मुह्यन्ति अपदस्य पदैषिणः ॥ ७ ॥
जो सम्पूर्ण भूतोंका आत्मा है, अर्थात् सबकी आत्माको अपनी ही आत्मा समझता है तथा जो सब भूतोंको समान भावसे देखता है, उस गमनागमनसे रहित ज्ञानीकी गतिका पता लगाते समय देवता भी मोहमें पड़ जाते हैं ॥ ७ ॥
न तत् परस्य संदध्यात् प्रतिकूलं यदात्मनः ।
एष संक्षेपतो धर्मः कामादन्यः प्रवर्तते ॥ ८ ॥
जो बात अपनेको अच्छी न लगे, वह दूसरोंके प्रति भी नहीं करनी चाहिये । यही धर्मका संक्षिप्त लक्षण है । इससे भिन्न जो बर्ताव होता है, वह कामनामूलक है ॥ ८ ॥
प्रत्याख्याने च दाने च सुखदुःखे प्रियाप्रिये ।
आत्मौपम्येन पुरुषः प्रमाणमधिगच्छति ॥ ९ ॥
माँगनेपर देने और इनकार करनेसे, सुख और दुःख पहुँचानेसे तथा प्रिय और अप्रिय करनेसे पुरुषको स्वयं जैसे हर्ष-शोकका अनुभव होता है, उसी प्रकार दूसरोंके लिये भी समझे ॥ ९ ॥
यथा परः प्रक्रमते परेषु तथापरे प्रक्रमन्ते परस्मिन् । तथैव तेऽस्तूपमा जीवलोके यथा धर्मो नैपुणेनोपदिष्टः ॥ १० ॥
जैसे एक मनुष्य दूसरोंपर आक्रमण करता है, उसी प्रकार अवसर आनेपर दूसरे भी उसके ऊपर आक्रमण करते हैं । इसीको तुम जगत्में अपने लिये भी दृष्टान्त समझो । अतः किसीपर आक्रमण नहीं करना चाहिये । इस प्रकार यहाँ कौशलपूर्वक धर्मका उपदेश किया है ॥ १० ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्त्वा तं सुरगुरुर्धर्मराजं युधिष्ठिरम् ।
दिवमाचक्रमे धीमान् पश्यतामेव नस्तदा ॥ ११ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! धर्मराज युधिष्ठिरसे इस प्रकार कहकर परम बुद्धिमान् देवगुरु बृहस्पतिजी उस समय हमलोगोंके देखते - देखते स्वर्ग लोकको चले गये ॥ ११ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि संसारचक्रसमाप्तौ त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें संसारचक्रकी समाप्तिविषयक एक सौ तेरहवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ११३ ॥
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चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः हिंसा और मांसभक्षणकी घोर निन्दा वैशम्पायन उवाच
ततो युधिष्ठिरो राजा शरतल्पे पितामहम् ।
पुनरेव महातेजाः पप्रच्छ वदतां वरः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तदनन्तर महातेजस्वी और वक्ताओंमें श्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरने बाणशय्यापर पड़े हुए पितामह भीष्मसे पुनः प्रश्न किया ॥ युधिष्ठिर उवाच
ऋषयो ब्राह्मणा देवाः प्रशंसन्ति महामते ।
अहिंसालक्षणं धर्मं वेदप्रामाण्यदर्शनात् ॥ २ ॥
कर्मणा मनुजः कुर्वन् हिंसां पार्थिवसत्तम ।
वाचा च मनसा चैव कथं दुःखात् प्रमुच्यते ॥ ३ ॥
युधिष्ठिरने पूछा- महामते! देवता, ऋषि और ब्राह्मण वैदिक प्रमाणके अनुसार सदा अहिंसा - धर्मकी प्रशंसा किया करते हैं । अतः नृपश्रेष्ठ! मैं पूछता हूँ कि मन, वाणी और क्रियासे भी हिंसाका ही आचरण करनेवाला मनुष्य किस प्रकार उसके दुःखसे छुटकारा पा सकता है? ॥ २-३ ॥ भीष्म उवाच
चतुर्विधेयं निर्दिष्टा ह्यहिंसा ब्रह्मवादिभिः ।
एकैकतोऽपि विभ्रष्टा न भवत्यरिसूदन ॥ ४ ॥
भीष्मजीने कहा – शत्रुसूदन! ब्रह्मवादी पुरुषोंने ( मनसे, वाणीसे तथा कर्मसे हिंसा न करना एवं मांस न खाना– इन) चार उपायोंसे अहिंसाधर्मका पालन बतलाया है । इनमेंसे किसी एक अंशकी भी कमी रह गयी तो अहिंसा- धर्मका पूर्णतः पालन नहीं होता ॥ ४ ॥
यथा सर्वश्चतुष्पाद् वै त्रिभिः पादैर्न तिष्ठति ।
तथैवेयं महीपाल कारणैः प्रोच्यते त्रिभिः ॥ ५ ॥
महीपाल! जैसे चार पैरोंवाला पशु तीन पैरोंसे नहीं खड़ा रह सकता, उसी प्रकार केवल तीन ही कारणोंसे पालित हुई अहिंसा पूर्णतः अहिंसा नहीं कही जा सकती ॥ ५ ॥
यथा नागपदेऽन्यानि पदानि पदगामिनाम् ।
सर्वाण्येवापिधीयन्ते पदजातानि कौञ्जरे ॥ ६ ॥
एवं लोकेष्वहिंसा तु निर्दिष्टा धर्मतः पुरा ।
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जैसे हाथीके पैरके चिह्नमें सभी पदगामी प्राणियोंके पदचिह्न समा जाते हैं, उसी प्रकार पूर्वकालमें इस जगत् के भीतर धर्मतः अहिंसाका निर्देश किया गया है अर्थात् अहिंसाधर्ममें
सभी धर्मोंका समावेश हो जाता है । ऐसा माना गया है ॥ ६३ ॥
कर्मणा लिप्यते जन्तुर्वाचा च मनसापि च ॥ ७ ॥
पूर्वं तु मनसा त्यक्त्वा तथा वाचाथ कर्मणा ।
न भक्षयति यो मांसं त्रिविधं स विमुच्यते ॥ ८ ॥
जीव मन, वाणी और क्रियाके द्वारा हिंसाके दोषसे लिप्त होता है, किंतु जो क्रमशः पहले मनसे, फिर वाणीसे और फिर क्रियाद्वारा हिंसाका त्याग करके कभी मांस नहीं खाता, वह पूर्वोक्त तीनों प्रकारकी हिंसाके दोषसे भी मुक्त हो जाता है ॥ ७-८ ॥
त्रिकारणं तु निर्दिष्टं श्रूयते ब्रह्मवादिभिः ।
मनो वाचि तथाऽऽस्वादे दोषा ह्येषु प्रतिष्ठिताः ॥ ९ ॥
ब्रह्मवादी महात्माओंने हिंसादोषके प्रधान तीन कारण बतलाये हैं- मन ( मांस खानेकी इच्छा ), वाणी ( मांस खानेका उपदेश) और आस्वाद ( प्रत्यक्षरूपमें मांसका स्वाद लेना) । ये तीनों ही हिंसा - दोषके आधार हैं ॥ ९ ॥
न भक्षयन्त्यतो मांसं तपोयुक्ता मनीषिणः ।
दोषांस्तु भक्षणे राजन् मांसस्येह निबोध मे ॥ १० ॥
इसलिये तपस्यामें लगे हुए मनीषी पुरुष कभी मांस नहीं खाते हैं । राजन्! अब मैं मांसभक्षणमें जो दोष है, उनको यहाँ बता रहा हूँ, सुनो ॥ १० ॥
पुत्रमांसोपमं जानन् खादते योऽविचक्षणः ।
मांसं मोहसमायुक्तः पुरुषः सोऽधमः स्मृतः ॥ ११ ॥
जो मूर्ख यह जानते हुए भी कि पुत्रके मांसमें और दूसरे साधारण मांसोंमें कोई अन्तर नहीं है, मोहवश मांस खाता है, वह नराधम है ॥ ११ ॥
पितृमातृसमायोगे पुत्रत्वं जायते यथा ।
हिंसां कृत्वावशः पापो भूयिष्ठं जायते तथा ॥ १२ ॥
जैसे पिता और माताके संयोगसे पुत्रकी उत्पत्ति होती है, उसी प्रकार हिंसा करनेसे पापी पुरुषको विवश होकर बारंबार पापयोनिमें जन्म लेना पड़ता है ॥ १२ ॥
रसं च प्रतिजिह्वाया ज्ञानं प्रज्ञायते यथा ।
तथा शास्त्रेषु नियतं रागो ह्यास्वादिताद् भवेत् ॥ १३ ॥
जैसे जीभसे जब रसका ज्ञान होता है, तब उसके प्रति वह आकृष्ट होने लगती है, उसी प्रकार मांसका आस्वादन करनेपर उसके प्रति आसक्ति बढ़ती है । शास्त्रोंमें भी कहा है कि विषयोंके आस्वादनसे उनके प्रति आसक्ति उत्पन्न होती है ॥ १३ ॥
संस्कृतासंस्कृताः पक्वा लवणालवणास्तथा ।
प्रजायन्ते यथा भावास्तथा चित्तं निरुध्यते ॥ १४ ॥
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संस्कृत ( मसाले आदि डालकर संस्कृत किया हुआ ) असंस्कृत (मसाला आदिके संस्कारसे रहित ), पक्व, केवल नमक मिला हुआ और अलोना - ये मांसकी जो- जो अवस्थाएँ होती हैं, उन्हीं - उन्हींमें रुचिभेदसे मांसाहारी मनुष्यका चित्त आसक्त होता ॥ १४ ॥
भेरीमृदंगशब्दांश्च तन्त्रीशब्दांश्च पुष्कलान् ।
निषेविष्यन्ति वै मन्दा मांसभक्षाः कथं नराः ॥ १५ ॥
मांसभक्षी मूर्ख मनुष्य स्वर्गमें पूर्णतः सुलभ होनेवाले भेरी, मृदंग और वीणाके दिव्य मधुर शब्दोंका सेवन कैसे कर सकेंगे; क्योंकि वे स्वर्गमें नहीं जा सकते ॥ ( परेषां धनधान्यानां हिंसकास्तावकास्तथा । प्रशंसकाश्च मांसस्य नित्यं स्वर्गे बहिष्कृताः ॥ ) दूसरोंके धन- धान्यको नष्ट करनेवाले तथा मांस भक्षणकी स्तुति-प्रशंसा करनेवाले मनुष्य सदा ही स्वर्गसे बहिष्कृत होते हैं ॥
अचिन्तितमनिर्दिष्टमसंकल्पितमेव च ।
रसगृद्धयाभिभूता ये प्रशंसन्ति फलार्थिनः ॥ १६ ॥
जो मांसके रसमें होनेवाली आसक्तिसे अभिभूत होकर उसी अभीष्ट फल मांसकी अभिलाषा रखते हैं तथा उसके बारंबार गुण गाते हैं, उन्हें ऐसी दुर्गति प्राप्त होती है, जो कभी चिन्तनमें नहीं आयी है । जिसका वाणीद्वारा कहीं निर्देश नहीं किया गया है तथा जो कभी मनकी कल्पनामें भी नहीं आयी है ॥ १६ ॥
( भस्म विष्ठा कृमिर्वापि निष्ठा यस्येदृशी ध्रुवा । स कायः परपीडाभिः कथं धार्यो विपश्चिता ॥ ) प्रशंसा ह्येव मांसस्य दोषकर्मफलान्विता ॥ १७ ॥
जो मृत्युके पश्चात् चितापर जला देनेसे भस्म हो जाता है अथवा किसी हिंसक प्राणीका खाद्य बनकर उसकी विष्ठाके रूपमें परिणत हो जाता है, या यों ही फेंक देनेसे जिसमें कीड़े पड़ जाते हैं - इन तीनोंमेंसे यह एक न एक परिणाम जिसके लिये सुनिश्चित है, उस शरीरको विद्वान् पुरुष दूसरोंको पीड़ा देकर उसके मांससे कैसे पोषण कर सकता है? मांसकी प्रशंसा भी पापमय कर्मफलसे सम्बन्ध कर देती है ॥ १७ ॥
जीवितं हि परित्यज्य बहवः साधवो जनाः ।
स्वमांसैः परमांसानि परिपाल्य दिवं गताः ॥ १८ ॥
उशीनर शिबि आदि बहुत- से श्रेष्ठ पुरुष दूसरोंकी रक्षाके लिये अपने प्राण देकर, अपने मांससे दूसरोंके मांसकी रक्षा करके स्वर्गलोकमें गये हैं ॥ १८ ॥
एवमेषा महाराज चतुर्भिः कारणैर्वृता ।
अहिंसा तव निर्दिष्टा सर्वधर्मानुसंहिता ॥ १ ९ ॥
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महाराज! इस प्रकार चार उपायोंसे जिसका पालन होता है, उस अहिंसा- धर्मका तुम्हारे
लिये प्रतिपादन किया गया । यह सम्पूर्ण धर्मोंमें ओतप्रोत है ॥ १ ९ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि मांसवर्जनकथने चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें मांसके परित्यागका उपदेशविषयक एक सौ चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११४ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल २१ श्लोक हैं )
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पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः , मद्य और मांस भक्षणमें महान् दोष उनके त्यागकी महिमा एवं त्यागमें परम लाभका प्रतिपादन युधिष्ठिरउवाच अहिंसा परमो धर्म इत्युक्तं बहुशस्त्वया ।
जातो नः संशयो धर्मे मांसस्य परिवर्जने ।
दोषो भक्षयतः कः स्यात् कश्चाभक्षयतो गुणः ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा — पितामह! आपने बहुत बार यह बात कही है कि अहिंसा परम धर्म है; अतः मांसके परित्यागरूप धर्मके विषयमें मुझे संदेह हो गया है । इसलिये मैं यह जानना चाहता हूँ कि मांस खानेवालेकी क्या हानि होती है और जो मांस नहीं खाता उसे कौन - सा लाभ मिलता है? ॥ १ ॥
हत्वा भक्षयतो वापि परेणोपहृतस्य वा ।
हन्याद् वा यः परस्यार्थे क्रीत्वा वा भक्षयेन्नरः ॥ २ ॥
जो स्वयं पशुका वध करके उसका मांस खाता है या दूसरेके दिये हुए मांसका भक्षण करता है या जो दूसरेके खानेके लिये पशुका वध करता है अथवा जो खरीदकर मांस खाता है, उसको क्या दण्ड मिलता है? ॥ २ ॥
एतदिच्छामि तत्त्वेन कथ्यमानं त्वयानघ ।
निश्चयेन चिकीर्षामि धर्ममेतं सनातनम् ॥ ३ ॥
निष्पाप पितामह! मैं चाहता हूँ कि आप इस विषयका यथार्थरूपसे विवेचन करें । मैं निश्चितरूपसे इस सनातन धर्मके पालनकी इच्छा रखता हूँ ॥ ३ ॥
कथमायुरवाप्नोति कथं भवति सत्त्ववान् ।
कथमव्यंगतामेति लक्षण्यो जायते कथम् ॥ ४ ॥
मनुष्य किस प्रकार आयु प्राप्त करता है, कैसे बलवान् होता है, किस तरह उसे पूर्णांगता प्राप्त होती है और कैसे वह शुभलक्षणोंसे संयुक्त होता है? ॥ ४ ॥
भीष्म उवाच
मांसस्याभक्षणाद् राजन् यो धर्मः कुरुनन्दन ।
तन्मे शृणु यथातत्त्वं यथास्य विधिरुत्तमः ॥ ५ ॥
भीष्मजीने कहा- राजन्! कुरुनन्दन! मांस न खानेसे जो धर्म होता है, उसका मुझसे यथार्थ वर्णन सुनो तथा उस धर्मकी जो उत्तम विधि है, वह भी जान लो ॥ रूपमव्यंगतामायुर्बुद्धिं सत्त्वं बलं स्मृतिम् ।
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प्राप्तुकामैर्नरैर्हिसा वर्जिता वै महात्मभिः ॥ ६ ॥
जो सुन्दर रूप, पूर्णांगता, पूर्ण आयु, उत्तम बुद्धि, सत्त्व, बल और स्मरणशक्ति प्राप्त करना चाहते थे, उन महात्मा पुरुषोंने हिंसाका सर्वथा त्याग कर दिया था ॥
ऋषीणामत्र संवादो बहुशः कुरुनन्दन ।
बभूव तेषां तु मतं यत् तच्छृणु युधिष्ठिर ॥ ७ ॥
कुरुनन्दन युधिष्ठिर! इस विषयको लेकर ऋषियोंमें अनेक बार प्रश्नोत्तर हो चुका है ।
अन्तमें उन सबकी रायसे जो सिद्धान्त निश्चित हुआ है, उसे बता रहा हूँ, सुनो ॥ ७ ॥
यो यजेताश्वमेधेन मासि मासि यतव्रतः ।
वर्जयेन्मधु मांसं च सममेतद् युधिष्ठिर ॥ ८ ।
युधिष्ठिर! जो पुरुष नियमपूर्वक व्रतका पालन करता हुआ प्रतिमास अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान करता है तथा जो केवल मद्य और मांसका परित्याग करता है, उन दोनोंको एक-सा ही फल मिलता है ॥ ८ ॥
सप्तर्षयो वालखिल्यास्तथैव च मरीचिपाः ।
अमांसभक्षणं राजन् प्रशंसन्ति मनीषिणः ॥ ९ ॥
राजन्! सप्तर्षि, वालखिल्य तथा सूर्यकी किरणोंका पान करनेवाले अन्यान्य मनीषी महर्षि मांस न खानेकी ही प्रशंसा करते हैं ॥ ९ ॥
न भक्षयति यो मांसं न च हन्यान्न घातयेत् ।
तन्मित्रं सर्वभूतानां मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ॥ १० ॥
स्वायम्भुव मनुका कथन है कि जो मनुष्य न मांस खाता और न पशुकी हिंसा करता और न दूसरेसे ही हिंसा कराता है, वह सम्पूर्ण प्राणियोंका मित्र है ॥ १० ॥
अधृष्यः सर्वभूतानां विश्वास्यः सर्वजन्तुषु ।
साधूनां सम्मतो नित्यं भवेन्मांसं विवर्जयन् ॥ ११ ॥
जो पुरुष मांसका परित्याग कर देता है, उसका कोई भी प्राणी तिरस्कार नहीं करता है, वह सब प्राणियोंका विश्वासपात्र हो जाता है तथा श्रेष्ठ पुरुष उसका सदा सम्मान करते हैं ॥ ११ ॥
स्वमांसं परमांसेन यो वर्धयितुमिच्छति ।
नारदः प्राह धर्मात्मा नियतं सोऽवसीदति ॥ १२ ॥
धर्मात्मा नारदजी कहते हैं—जो दूसरेके मांससे अपना मांस बढ़ाना चाहता है, वह निश्चय ही दुःख उठाता है ॥ १२ ॥
ददाति यजते चापि तपस्वी च भवत्यपि ।
मधुमांसनिवृत्त्येति प्राह चैवं बृहस्पतिः ॥ १३ ॥
बृहस्पतिजीका कथन है- जो मद्य और मांस त्याग देता है, वह दान देता, यज्ञ करता और तप करता है अर्थात् उसे दान, यज्ञ और तपस्याका फल प्राप्त होता है ॥ १३ ॥
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मासि मास्यश्वमेधेन यो यजेत शतं समाः ।
न खादति च यो मांसं सममेतन्मतं मम ॥ १४ ॥
जो सौ वर्षोंतक प्रतिमास अश्वमेध यज्ञ करता है और जो कभी मांस नहीं खाता है-इन दोनोंका समान फल माना गया है ॥ १४ ॥
सदा यजति सत्रेण सदा दानं प्रयच्छति ।
सदा तपस्वी भवति मधुमांसविवर्जनात् ॥ १५ ॥
मद्य और मांसका परित्याग करनेसे मनुष्य सदा यज्ञ करनेवाला, सदा दान देनेवाला और सदा तप करनेवाला होता है ॥ १५ ॥
सर्वे वेदा न तत् कुर्युः सर्वे यज्ञाश्च भारत ।
यो भक्षयित्वा मांसानि पश्चादपि निवर्तते ॥ १६ ॥
भारत! जो पहले मांस खाता रहा हो और पीछे उसका सर्वथा परित्याग कर दे, उसको जिस पुण्यकी प्राप्ति होती है, उसे सम्पूर्ण वेद और यज्ञ भी नहीं प्राप्त करा सकते ॥ १६ ॥
दुष्करं च रसज्ञाने मांसस्य परिवर्जनम् ।
चर्तुं व्रतमिदं श्रेष्ठं सर्वप्राण्यभयप्रदम् ॥ १७ ॥
मांसके रसका आस्वादन एवं अनुभव कर लेनेपर उसे त्यागना और समस्त प्राणियोंको अभय देनेवाले इस सर्वश्रेष्ठ अहिंसाव्रतका आचरण करना अत्यन्त कठिन हो जाता ॥ १७ ॥
सर्वभूतेषु यो विद्वान् ददात्यभयदक्षिणाम् ।
दाता भवति लोके स प्राणानां नात्र संशयः ॥ १८ ॥
जो विद्वान् सब जीवोंको अभयदान कर देता है, वह इस संसारमें निःसंदेह प्राणदाता माना जाता है ॥ १८ ॥
एवं वै परमं धर्मं प्रशंसन्ति मनीषिणः ।
प्राणा यथाऽऽत्मनोऽभीष्टा भूतानामपि वै तथा ॥ १ ९ ॥
इस प्रकार मनीषी पुरुष अहिंसारूप परमधर्मकी प्रशंसा करते हैं । जैसे मनुष्यको अपने प्राण प्रिय होते हैं, उसी प्रकार समस्त प्राणियोंको अपने- अपने प्राण प्रिय जान पड़ते हैं ॥ १ ९ ॥
आत्मौपम्येन मन्तव्यं बुद्धिमद्भिः कृतात्मभिः ।
मृत्युतो भयमस्तीति विदुषां भूतिमिच्छताम् ॥ २० ॥
किं पुनर्हन्यमानानां तरसा जीवितार्थिनाम् ।
अरोगाणामपापानां पापैर्मांसोपजीविभिः ॥ २१ ॥
अतः जो बुद्धिमान् और पुण्यात्मा है, उन्हें चाहिये कि सम्पूर्ण प्राणियोंको अपने समान समझें । जब अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले विद्वानोंको भी मृत्युका भय बना रहता है,
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तब जीवित रहनेकी इच्छावाले नीरोग और निरपराध प्राणियोंको, जो मांसपर जीविका चलानेवाले पापी पुरुषोंद्वारा बलपूर्वक मारे जाते हैं, क्यों न भय प्राप्त होगा ॥ २०-२१ ॥
तस्माद् विद्धि महाराज मांसस्य परिवर्जनम् ।
धर्मस्यायतनं श्रेष्ठं स्वर्गस्य च सुखस्य च ॥ २२ ॥
इसलिये महाराज! तुम्हें यह विदित होना चाहिये कि मांसका परित्याग ही धर्म, स्वर्ग और सुखका सर्वोत्तम आधार है ॥ २२ ॥
अहिंसा परमो धर्मस्तथाहिंसा परं तपः ।
अहिंसा परमं सत्यं यतो धर्मः प्रवर्तते ॥ २३ ॥
अहिंसा परम धर्म है, अहिंसा परम तप है और अहिंसा परम सत्य है; क्योंकि उसीसे धर्मकी प्रवृत्ति होती है ॥ २३ ॥
न हि मांसं तृणात् काष्ठादुपलाद् वापि जायते ।
हत्वा जन्तुं ततो मांसं तस्माद् दोषस्तु भक्षणे ॥ २४ ॥
तृणसे, काठसे अथवा पत्थरसे मांस नहीं पैदा होता है, वह जीवकी हत्या करनेपर ही उपलब्ध होता है; अतः उसके खानेमें महान् दोष है ॥ २४ ॥
स्वाहास्वधामृतभुजो देवाः सत्यार्जवप्रियाः ।
क्रव्यादान् राक्षसान् विद्धि जिह्मानृतपरायणान् ॥ २५ ॥
जो लोग स्वाहा ( देवयज्ञ ) और स्वधा ( पितृयज्ञ ) का अनुष्ठान करके यज्ञशिष्ट अमृतका भोजन करनेवाले तथा सत्य और सरलताके प्रेमी है, वे देवता हैं, किंतु जो कुटिलता और असत्य भाषणमें प्रवृत्त होकर सदा मांसभक्षण किया करते हैं, उन्हें राक्षस समझो ॥ २५ ॥
कान्तारेष्वथ घोरेषु दुर्गेषु गहनेषु च ।
रात्रावहनि संध्यासु चत्वरेषु सभासु च ॥ २६ ॥
उद्यतेषु च शस्त्रेषु मृगव्यालभयेषु च ।
अमांसभक्षणे राजन् भयमन्यैर्न गच्छति ॥ २७ ॥
राजन्! जो मनुष्य मांस नहीं खाता, उसे संकटपूर्ण स्थानों, भयंकर दुर्गों एवं गहन वनोंमें, रात - दिन और दोनों संध्याओंमें, चौराहोंपर तथा सभाओं में भी दूसरोंसे भय नहीं प्राप्त होता तथा यदि अपने विरुद्ध हथियार उठाये गये हों अथवा हिंसक पशु एवं सर्पोंके भय सामने हों तो भी वह दूसरोंसे नहीं डरता है ॥ २६-२७ ॥
शरण्यः सर्वभूतानां विश्वास्यः सर्वजन्तुषु ।
अनुद्वेगकरो लोके न चाप्युद्विजते सदा ॥ २८ ॥
इतना ही नहीं, वह समस्त प्राणियोंको शरण देनेवाला और उन सबका विश्वासपात्र होता है । संसारमें न तो वह दूसरेको उद्वेगमें डालता है और न स्वयं ही कभी किसीसे उद्विग्न होता है ॥ २८ ॥
यदि चेत् खादको न स्यान्न तदा घातको भवेत् ।