श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 1011–1020
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1011–1020
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घातकः खादकार्थाय तद् घातयति वै नरः ॥ २ ९ ॥ यदि कोई भी मांस खानेवाला न रह जाय तो पशुओंकी हिंसा करनेवाला भी कोई न रहे; क्योंकि हत्यारा मनुष्य मांस खानेवालोंके लिये ही पशुओंकी हिंसा करता है ॥ २ ९ ॥
अभक्ष्यमेतदिति वै इति हिंसा निवर्तते ।
खादकार्थमतो हिंसा मृगादीनां प्रवर्तते ॥ ३० ॥
यदि मांसको अभक्ष्य समझकर सब लोग उसे खाना छोड़ दें तो पशुओंकी हत्या स्वतः ही बंद हो जाय; क्योंकि मांस खानेवालोंके लिये ही मृग आदि पशुओंकी हत्या होती है ॥ ३० ॥
यस्माद् ग्रसति चैवायुहिंसकानां महाद्युते ।
तस्माद् विवर्जयेन्मांसं य इच्छेद् भूतिमात्मनः ॥ ३१ ॥
महातेजस्वी नरेश! हिंसकोंकी आयुको उनका पाप ग्रस लेता है । इसलिये जो अपना कल्याण चाहता हो, वह मनुष्य मांसका सर्वथा परित्याग कर दे ॥ ३१ ॥
त्रातारं नाधिगच्छन्ति रौद्राः प्राणिविहिंसकाः ।
उद्वेजनीया भूतानां यथा व्यालमृगास्तथा ॥ ३२ ॥
जैसे यहाँ हिंसक पशुओंका लोग शिकार खेलते हैं और वे पशु अपने लिये कहीं कोई रक्षक नहीं पाते, उसी प्रकार प्राणियोंकी हिंसा करनेवाले भयंकर मनुष्य दूसरे जन्ममें सभी प्राणियोंके उद्वेगपात्र होते हैं और अपने लिये कोई संरक्षक नहीं पाते हैं ॥ ३२ ॥
लोभाद् वा बुद्धिमोहाद् वा बलवीर्यार्थमेव च ।
संसर्गादथ पापानामधर्मरुचिता नृणाम् ॥ ३३ ॥
लोभसे, बुद्धिके मोहसे, बल- वीर्यकी प्राप्तिके लिये अथवा पापियोंके संसर्गमें आनेसे मनुष्योंकी अधर्ममें रुचि हो जाती है ॥ ३३ ॥
स्वमांसं परमांसेन यो वर्धयितुमिच्छति ।
उद्विग्नवासो वसति यत्र यत्राभिजायते ॥ ३४ ॥
जो दूसरोंके मांससे अपना मांस बढ़ाना चाहता है, वह जहाँ कहीं भी जन्म लेता है, चैनसे नहीं रहने पाता है ॥ ३४ ॥
धन्यं यशस्यमायुष्यं स्वर्ग्यं स्वस्त्ययनं महत् ।
मांसस्याभक्षणं प्राहुर्नियताः परमर्षयः ॥ ३५ ॥
नियमपरायण महर्षियोंने मांस भक्षणके त्यागको ही धन, यश, आयु तथा स्वर्गकी प्राप्तिका प्रधान उपाय और परमकल्याणका साधन बतलाया है ॥ ३५ ॥
इदं तु खलु कौन्तेय श्रुतमासीत् पुरा मया ।
मार्कण्डेयस्य वदतो ये दोषा मांसभक्षणे ॥ ३६ ॥
कुन्तीनन्दन! मांसभक्षणमें जो दोष हैं, उन्हें बतलाते हुए मार्कण्डेयजीके मुखसे मैंने पूर्वकालमें ऐसा सुन रखा है— ॥ ३६ ॥
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यो हि खादति मांसानि प्राणिनां जीवितैषिणाम् ।
हतानां वा मृतानां वा यथा हन्ता तथैव सः ॥ ३७ ॥
'जो जीवित रहनेकी इच्छावाले प्राणियोंको मारकर अथवा उनके स्वयं मर जानेपर उनका मांस खाता है, वह न मारनेपर भी उन प्राणियोंका हत्यारा ही समझा जाता है ॥ ३७ ॥
धनेन क्रयिको हन्ति खादकश्चोपभोगतः ।
घातको वधबन्धाभ्यामित्येष त्रिविधो वधः ॥ ३८ ॥
खरीदनेवाला धनके द्वारा, खानेवाला उपभोगके द्वारा और घातक वध एवं बन्धनके
द्वारा पशुओंकी हिंसा करता है । इस प्रकार यह तीन तरहसे प्राणियोंका वध होता है ॥
अखादन्ननुमोदंश्च भावदोषेण मानवः ।
योऽनुमोदति हन्यन्तं सोऽपि दोषेण लिप्यते ॥ ३ ९ ॥
‘ जो मांसको स्वयं नहीं खाता पर खानेवालेका अनुमोदन करता है, वह मनुष्य भी भावदोषके कारण मांसभक्षणके पापका भागी होता है । इसी प्रकार जो मारनेवालेका अनुमोदन करता है, वह भी हिंसाके दोषसे लिप्त होता है ॥ ३ ९ ॥
अधृष्यः सर्वभूतानामायुष्मान् नीरुजः सदा ।
भवत्यभक्षयन् मांसं दयावान् प्राणिनामिह ॥ ४० ॥
' जो मनुष्य मांस नहीं खाता और इस जगत्में सब जीवोंपर दया करता है, उसका कोई भी प्राणी तिरस्कार नहीं करते और वह सदा दीर्घायु एवं नीरोग होता है ॥ ४० ॥
हिरण्यदानैर्गोदानैर्भूमिदानैश्च सर्वशः ।
मांसस्याभक्षणे धर्मो विशिष्ट इति नः श्रुतिः ॥ ४१ ॥
‘ सुवर्णदान, गोदान और भूमिदान करनेसे जो धर्म प्राप्त होता है, मांसका भक्षण न करनेसे उसकी अपेक्षा भी विशिष्ट धर्मकी प्राप्ति होती है । यह हमारे सुननेमें आया है ॥ ४१ ॥
खादकस्य कृते जन्तून् यो हन्यात् पुरुषाधमः ।
महादोषतरस्तत्र घातको न तु खादक: ॥ ४२ ॥
‘जो मांस खानेवालोंके लिये पशुओंकी हत्या करता है, वह मनुष्योंमें अधम है ।
घातकको बहुत भारी दोष लगता है । मांस खानेवालेको उतना दोष नहीं लगता ॥ ४२ ॥
इज्यायज्ञ श्रुतिकृतैर्यो मार्गेरबुधोऽधमः ।
हन्याज्जन्तून् मांसगृध्नुः स वै नरकभाङ्नरः ॥ ४३ ॥
'जो मांसलोभी मूर्ख एवं अधम मनुष्य यज्ञ-याग आदि वैदिक मार्गोंके नामपर प्राणियोंकी हिंसा करता है, वह नरकगामी होता है ॥ ४३ ॥
भक्षयित्वापि यो मांसं पश्चादपि निवर्तते ।
तस्यापि सुमहान् धर्मो यः पापाद् विनिवर्तते ॥ ४४ ॥
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' जो पहले मांस खानेके बाद फिर उससे निवृत्त हो जाता है, उसको भी अत्यन्त महान् धर्मकी प्राप्ति होती है, क्योंकि वह पापसे निवृत्त हो गया है ॥ ४४ ॥
आहर्ता चानुमन्ता च विशस्ता क्रयविक्रयी ।
संस्कर्ता चोपभोक्ता च खादकाः सर्व एव ते ॥ ४५ ॥
'जो मनुष्य हत्याके लिये पशु लाता है, जो उसे मारनेकी अनुमति देता है, जो उसका वध करता है तथा जो खरीदता, बेचता, पकाता और खाता है, वे सबब- के - सब खानेवाले ही माने जाते हैं । अर्थात् वे सब खानेवालेके समान ही पापके भागी होते हैं ' ॥ ४५ ॥
इदमन्यत्तु वक्ष्यामि प्रमाणं विधिनिर्मितम् ।
पुराणमृषिभिर्जुष्टं वेदेषु परिनिष्ठितम् ॥ ४६ ॥
अब मैं इस विषयमें एक दूसरा प्रमाण बता रहा हूँ, जो साक्षात् ब्रह्माजीके द्वारा प्रतिपादित, पुरातन, ऋषियोंद्वारा सेवित तथा वेदोंमें प्रतिष्ठित है ॥ ४६ ॥
प्रवृत्तिलक्षणो धर्मः प्रजार्थिभिरुदाहृतः ।
यथोक्तं राजशार्दूल न तु तन्मोक्षकाङ्क्षिणाम् ॥ ४७ ॥
नृपश्रेष्ठ! प्रजार्थी पुरुषोंने प्रवृत्तिरूप धर्मका प्रतिपादन किया है, परन्तु वह मोक्षकी अभिलाषा रखनेवाले विरक्त पुरुषोंके लिये अभीष्ट नहीं है ॥ ४७ ॥
य इच्छेत् पुरुषोऽत्यन्तमात्मानं निरुपद्रवम् ।
स वर्जयेत मांसानि प्राणिनामिह सर्वशः ॥ ४८ ॥
जो मनुष्य अपने आपको अत्यन्त उपद्रवरहित बनाये रखना चाहता हो, वह इस जगत्में प्राणियोंके मांसका सर्वथा परित्याग कर दे ॥ ४८ ॥
श्रूयते हि पुराकल्पे नृणां व्रीहिमयः पशुः ।
येनायजन्त यज्वानः पुण्यलोकपरायणाः ॥ ४९ ॥
सुना है, पूर्वकल्पमें मनुष्योंके यज्ञमें पुरोडाश आदिके रूपमें अन्नमय पशुका ही उपयोग होता था । पुण्यलोककी प्राप्तिके साधनोंमें लगे रहनेवाले याज्ञिक पुरुष उस अन्नके द्वारा ही यज्ञ करते थे ॥ ४ ९ ॥
ऋषिभिः संशयं पृष्टो वसुश्चेदिपतिः पुरा ।
अभक्ष्यमपि मांसं यः प्राह भक्ष्यमिति प्रभो ॥ ५० ॥
प्रभो! प्राचीन कालमें ऋषियोंने चेदिराज वसुसे अपना संदेह पूछा था । उस समय वसुने मांसको भी जो सर्वथा अभक्ष्य है, भक्ष्य बता दिया ॥ ५० ॥
आकाशादवनिं प्राप्तस्ततः स पृथिवीपतिः ।
एतदेव पुनश्चोक्त्वा विवेश धरणीतलम् ॥ ५१ ॥
उस समय आकाशचारी राजा वसु अनुचित निर्णय देनेके कारण आकाशसे पृथ्वीपर गिर पड़े । तदनन्तर पृथ्वीपर भी फिर यही निर्णय देनेके कारण वे पातालमें समा गये ॥ ५१ ॥
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इदं तु शृणु राजेन्द्र कीर्त्यमानं मयानघ ।
अभक्षणे सर्वसुखं मांसस्य मनुजाधिप ॥ ५२ ॥
निष्पाप राजेन्द्र! मनुजेश्वर! मेरी कही हुई यह बात भी सुनो- मांस भक्षण न करनेसे सब प्रकारका सुख मिलता है ॥ ५२ ॥
यस्तु वर्षशतं पूर्णं तपस्तप्येत् सुदारुणम् ।
यश्चैव वर्जयेन्मांसं सममेतन्मतं मम ॥ ५३ ॥
जो मनुष्य सौ वर्षोंतक कठोर तपस्या करता है तथा जो केवल मांसका परित्याग कर देता है— ये दोनों मेरी दृष्टिमें एक समान हैं ॥ ५३ ॥
कौमुदे तु विशेषेण शुक्लपक्षे नराधिप ।
वर्जयेन्मधुमांसानि धर्मो ह्यत्र विधीयते ॥ ५४ ॥
नरेश्वर! विशेषतः शरद्ऋतु, शुक्लपक्षमें मद्य और मांसका सर्वथा त्याग कर दे; क्योंकि ऐसा करनेमें धर्म होता है ॥ ५४ ॥
चतुरो वार्षिकान् मासान् यो मांसं परिवर्जयेत् ।
चत्वारि भद्राण्यवाप्नोति कीर्तिमायुर्यशोबलम् ॥ ५५ ॥
जो मनुष्य वर्षाके चार महीनोंमें मांसका परित्याग कर देता है, वह चार कल्याणमयी वस्तुओं — कीर्ति, आयु, यश और बलको प्राप्त कर लेता है ॥ ५५ ॥
अथवा मासमेकं वै सर्वमांसान्यभक्षयन् ।
अतीत्य सर्वदुःखानि सुखं जीवेन्निरामयः ॥ ५६ ॥
अथवा एक महीनेतक सब प्रकारके मांसोंका त्याग करनेवाला पुरुष सम्पूर्ण दुःखोंसे पार हो सुखी एवं नीरोग जीवन व्यतीत करता है ॥ ५६ ॥
वर्जयन्ति हि मांसानि मासशः पक्षशोऽपि वा ।
तेषां हिंसानिवृत्तानां ब्रह्मलोको विधीयते ॥ ५७ ॥
जो एक- एक मास अथवा एक-एक पक्षतक मांस खाना छोड़ देते हैं, हिंसासे दूर हटे हुए उन मनुष्योंको ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है ( फिर जो कभी भी मांस नहीं खाते, उनके लाभकी तो कोई सीमा ही नहीं है ) ॥ ५७ ॥
मांसं तु कौमुदं पक्षं वर्जितं पार्थ राजभिः ।
सर्वभूतात्मभूतस्थैर्विदितार्थपरावरैः ॥ ५८ ॥
नाभागेनाम्बरीषेण गयेन च महात्मना ।
आयुनाथानरण्येन दिलीपरघुपूरुभिः ॥ ५ ९ ॥
कार्तवीर्यानिरुद्धाभ्यां नहुषेण यतातिना ।
नृगेण विष्वगश्वेन तथैव शशबिन्दुना ॥ ६० ॥
युवनाश्वेन च तथा शिबिनौशीनरेण च ।
मुचुकुन्देन मान्धात्रा हरिश्चन्द्रेण वा विभो ॥ ६१ ॥
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कुन्तीनन्दन! जिन राजाओंने आश्विन मासके दोनों पक्ष अथवा एक पक्षमें मांस भक्षणका निषेध किया था, वे सम्पूर्ण भूतोंके आत्मरूप हो गये थे और उन्हें परावर तत्त्वका ज्ञान हो गया था । उनके नाम इस प्रकार हैं- नाभाग, अम्बरीष, महात्मा गय, आयु, अनरण्य, दिलीप, रघु, पूरु, कार्तवीर्य, अनिरुद्ध, नहुष, ययाति, नृग, विश्वगश्व, शशविन्दु, युवनाश्व, उशीनरपुत्र शिबि, मुचुकुन्द, मान्धाता अथवा हरिश्चन्द्र ॥ ५८-६१ ॥
सत्यं वदत मासत्यं सत्यं धर्मः सनातनः ।
हरिश्चन्द्रश्चरति वै दिवि सत्येन चन्द्रवत् ॥ ६२ ॥
सत्य बोलो, असत्य न बोलो, सत्य ही सनातन धर्म है । राजा हरिश्चन्द्र सत्यके प्रभावसे आकाशमें चन्द्रमाके समान विचरते हैं ॥ ६२ ॥
श्येनचित्रेण राजेन्द्र सोमकेन वृकेण च ।
रैवते रन्तिदेवेन वसुना सृञ्जयेन च ॥ ६३ ॥
एतैश्चान्यैश्च राजेन्द्र कृपेण भरतेन च ।
दुष्यन्तेन करूषेण रामालर्कनरैस्तथा ॥ ६४ ॥
विरूपाश्वेन निमिना जनकेन च धीमता ।
ऐलेन पृथुना चैव वीरसेनेन चैव ह ॥ ६५ ॥
इक्ष्वाकुणा शम्भुना च श्वेतेन सगरेण च ।
अजेन धुन्धुना चैव तथैव च सुबाहुना ॥ ६६ ॥
हर्यश्वेन च राजेन्द्र क्षुपेण भरतेन च ।
एतैश्चान्यैश्च राजेन्द्र पुरा मांसं न भक्षितम् ॥ ६७ ॥
राजेन्द्र! श्येनचित्र, सोमक, वृक, रैवत, रन्तिदेव, वसु, संजय, अन्यान्य नरेश, कृप, भरत, दुष्यन्त, करूष, राम, अलर्क, नर, विरूपाश्व, निमि, बुद्धिमान् जनक, पुरूरवा, पृथु, वीरसेन, इक्ष्वाकु, शम्भु, श्वेतसागर, अज, धुन्धु, सुबाहु, हर्यश्व, क्षुप, भरत — इन सबने तथा अन्यान्य राजाओंने भी कभी मांस नहीं खाया था ॥
ब्रह्मलोके च तिष्ठन्ति ज्वलमानाः श्रियान्विताः ।
उपास्यमाना गन्धर्वैः स्त्रीसहस्रसमन्विताः ॥ ६८ ॥
वे सब नरेश अपनी कान्तिसे प्रज्वलित होते हुए वहाँ ब्रह्मलोकमें विराज रहे हैं, गन्धर्व उनकी उपासना करते हैं और सहस्रों दिव्यांगनाएँ उन्हें घेरे रहती हैं ॥
तदेतदुत्तमं धर्ममहिंसाधर्मलक्षणम् ।
ये चरन्ति महात्मानो नाकपृष्ठे वसन्ति ते ॥ ६ ९ ॥
अतः यह अहिंसारूप धर्म सब धर्मोंसे उत्तम है । जो महात्मा इसका आचरण करते हैं, वे स्वर्गलोकमें निवास करते हैं ॥ ६ ९ ॥
मधु मांसं च ये नित्यं वर्जयन्तीह धार्मिकाः ।
जन्मप्रभृति मद्यं च सर्वे ते मुनयः स्मृताः ॥ ७० ॥
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जो धर्मात्मा पुरुष जन्मसे ही इस जगत्में शहद, मद्य और मांसका सदाके लिये परित्याग कर देते हैं, वे सब - के - सब मुनि माने गये हैं ॥ ७० ॥
इमं धर्मममांसादं यश्चरेच्छ्रावयीत वा ।
अपि चेत् सुदुराचारो न जातु निरयं व्रजेत् ॥ ७१ ॥
जो मांस - भक्षणके परित्यागरूप इस धर्मका आचरण करता अथवा इसे दूसरोंको सुनाता है, वह कितना ही दुराचारी क्यों न रहा हो, नरकमें नहीं पड़ता ॥ ७१ ॥
पठेद् वा य इदं राजन् शृणुयाद् वाप्यभीक्ष्णशः ।
अमांसभक्षणविधिं पवित्रमृषिपूजितम् ॥ ७२ ॥
विमुक्तः सर्वपापेभ्यः सर्वकामैर्महीयते ।
विशिष्टतां ज्ञातिषु च लभते नात्र संशयः ॥ ७३ ॥
राजन्! जो ऋषियोंद्वारा सम्मानित एवं पवित्र इस मांस भक्षणके त्यागके प्रकरणको पढ़ता अथवा बारंबार सुनता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो सम्पूर्ण मनोवांछित भोगोंद्वारा सम्मानित होता है और अपने सजातीय बन्धुओंमें विशिष्ट स्थान प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ७२-७३ ॥
आपन्नश्चापदो मुच्येद् बद्धो मुच्येत बन्धनात् ।
मुच्येत्तथाऽऽतुरो रोगाद् दुःखान्मुच्येत दुःखितः ॥ ७४ ॥
इतना ही नहीं, इसके श्रवण अथवा पठनसे आपत्तिमें पड़ा हुआ आपत्तिसे, बन्धनमें बँधा हुआ बन्धनसे, रोगी रोगसे और दुःखी दुःखसे छुटकारा पा जाता है ॥ ७४ ॥
तिर्यग्योनिं न गच्छेत रूपवांश्च भवेन्नरः ।
ऋद्धिमान् वै कुरुश्रेष्ठ प्राप्नुयाच्च महद् यशः ॥ ७५ ॥
कुरुश्रेष्ठ! इसके प्रभावसे मनुष्य तिर्यग्योनिमें नहीं पड़ता तथा उसे सुन्दर रूप, सम्पत्ति और महान् यशकी प्राप्ति होती है ॥ ७५ ॥
एतत्ते कथितं राजन् मांसस्य परिवर्जने ।
प्रवृत्तौ च निवृत्तौ च विधानमृषिनिर्मितम् ॥ ७६ ॥
राजन्! यह मैंने तुम्हें ऋषियोंद्वारा निर्मित मांस- त्यागका विधान तथा प्रवृत्तिविषयक धर्म भी बताया है ॥ इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि मांसभक्षणनिषेधे पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११५ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें मांसभक्षणका निषेधविषयक एक सौ पंद्रहवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ११५ ॥
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षोडशाधिकशततमोऽध्यायः मांस न खानेसे लाभ और अहिंसाधर्मकी प्रशंसा युधिष्ठिर उवाच
इमे वै मानवा लोके नृशंसा मांसगृद्धिनः ।
विसृज्य विविधान् भक्ष्यान् महारक्षोगणा इव ॥ १ ॥
युधिष्ठिर कहते हैं - पितामह! बड़े खेदकी बात है कि संसारके ये निर्दयी मनुष्य अच्छे - अच्छे खाद्य पदार्थोंका परित्याग करके महान् राक्षसोंके समान मांसका स्वाद लेना चाहते हैं ॥ १ ॥
अपूपान् विविधाकाराञ्शाकानि विविधानि च ।
खाण्डवान् रसयोगान्न तथेच्छन्ति यथाऽऽमिषम् ॥ २ ॥
भाँति- भाँतिके मालपूओं, नाना प्रकारके शाकों तथा रसीली मिठाइयोंकी भी वैसी इच्छा नहीं रखते, जैसी रुचि मांसके लिये रखते हैं ॥ २ ॥
तदिच्छामि गुणान् श्रोतुं मांसस्याभक्षणे प्रभो ।
भक्षणे चैव ये दोषास्तांश्चैव पुरुषर्षभ ॥ ३ ॥
प्रभो! पुरुषप्रवर! अतः मैं मांस न खानेसे होनेवाले लाभ और उसे खानेसे होनेवाली हानियोंको पुनः सुनना चाहता हूँ ॥ ३ ॥
सर्वं तत्त्वेन धर्मज्ञ यथावदिह धर्मतः ।
किं च भक्ष्यमभक्ष्यं वा सर्वमेतद् वदस्व मे ॥ ४ ॥
धर्मज्ञ पितामह! इस समय धर्मके अनुसार यथावत्रूपसे यहाँ सब बातें ठीक- ठीक बताइये । इसके सिवा यह भी कहिये कि भोजन करने योग्य क्या वस्तु है और भोजन न करने योग्य क्या वस्तु है ॥ ४ ॥
यथैतद् यादृशं चैव गुणा ये चास्य वर्जने ।
दोषा भक्षयतो येऽपि तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ ५ ॥
पितामह! मांसका जो स्वरूप है, यह जैसा है, इसका त्याग कर देनेमें जो लाभ है और इसे खानेवाले पुरुषको जो दोष प्राप्त होते हैं- ये सब बातें मुझे बताइये ॥ ५ ॥
भीष्म उवाच एवमेतन्महाबाहो यथा वदसि भारत ।
विवर्जिते तु बहवो गुणाः कौरवनन्दन ।
ये भवन्ति मनुष्याणां तान् मे निगदतः शृणु ॥ ६ ॥
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भीष्मजीने कहा – महाबाहो! भरतनन्दन! तुम जैसा कहते हो ठीक वैसी ही बात है । कौरवनन्दन! मांस न खानेमें बहुत- से लाभ हैं, जो वैसे मनुष्योंको सुलभ होते हैं; मैं बता रहा हूँ; सुनो ॥ ६ ॥
स्वमांसं परमांसेन यो वर्धयितुमिच्छति ।
नास्ति क्षुद्रतरस्तस्मात् स नृशंसतरो नरः ॥ ७ ॥
जो दूसरेके मांससे अपना मांस बढ़ाना चाहता है, उससे बढ़कर नीच और निर्दयी मनुष्य दूसरा कोई नहीं है ॥ ७ ॥
न हि प्राणात् प्रियतरं लोके किंचन विद्यते ।
तस्माद् दयां नरः कुर्याद् यथाऽऽत्मनि तथा परे ॥ ८ ॥
जगत्में अपने प्राणोंसे अधिक प्रिय दूसरी कोई वस्तु नहीं है । इसलिये मनुष्य जैसे अपने ऊपर दया चाहता है, उसी तरह दूसरोंपर भी दया करे ॥ ८ ॥
शुक्राच्च तात सम्भूतिर्मांसस्येह न संशयः ।
भक्षणे तु महान् दोषो निवृत्त्या पुण्यमुच्यते ॥ ९ ॥
तात! मांस - भक्षण करनेमें महान् दोष है; क्योंकि मांसकी उत्पत्ति वीर्यसे होती है, इसमें संशय नहीं है । अतः उससे निवृत्त होनेमें ही पुण्य बताया गया है ॥ ९ ॥
न ह्यतः सदृशं किंचिदिह लोके परत्र च ।
यत् सर्वेष्विह भूतेषु दया कौरवनन्दन ॥ १० ॥
कौरवनन्दन! इस लोक और परलोकमें इसके समान दूसरा कोई पुण्यकार्य नहीं है कि इस जगत्में समस्त प्राणियोंपर दया की जाय ॥ १० ॥
न भयं विद्यते जातु नरस्येह दयावतः ।
दयावतामिमे लोकाः परे चापि तपस्विनाम् ॥ ११ ॥
इस जगत्में दयालु मनुष्यको कभी भयका सामना नहीं करना पड़ता । दयालु और तपस्वी पुरुषोंके लिये इहलोक और परलोक दोनों ही सुखद होते हैं ॥ ११ ॥
अहिंसालक्षणो धर्म इति धर्मविदो विदुः ।
यदहिंसात्मकं कर्म तत् कुर्यादात्मवान् नरः ॥ १२ ॥
धर्मज्ञ पुरुष यह जानते हैं कि अहिंसा ही धर्मका लक्षण है । मनस्वी पुरुष वही कर्म करे, जो अहिंसात्मक हो ॥ १२ ॥
अभयं सर्वभूतेभ्यो यो ददाति दयापरः ।
अभयं तस्य भूतानि ददतीत्यनुशुश्रुम ॥ १३ ॥
जो दयापरायण पुरुष सम्पूर्ण भूतोंको अभयदान देता है, उसे भी सब प्राणी अभयदान देते हैं । ऐसा हमने सुन रखा है ॥ १३ ॥
क्षतं च स्खलितं चैव पतितं कृष्टमाहतम् ।
सर्वभूतानि रक्षन्ति समेषु विषमेषु च ॥ १४ ॥
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वह घायल हो, लड़खड़ाता हो, गिर पड़ा हो, पानीके बहावमें खिंचकर बहा जाता हो, आहत हो अथवा किसी भी सम- विषम अवस्थामें पड़ा हो, सब प्राणी उसकी रक्षा करते हैं ॥ १४ ॥
नैनं ब्यालमृगा घ्नन्ति न पिशाचा न राक्षसाः ।
मुच्यते भयकालेषु मोक्षयेद् यो भये परान् ॥ १५ ॥
जो दूसरोंको भयसे छुड़ाता है, उसे न हिंसक पशु मारते हैं और न पिशाच तथा राक्षस
ही उसपर प्रहार करते हैं । वह भयका अवसर आनेपर उससे मुक्त हो जाता है ॥ १५ ॥
प्राणदानात् परं दानं न भूतं न भविष्यति ।
न ह्यात्मनः प्रियतरं किंचिदस्तीह निश्चितम् ॥ १६ ॥
प्राणदानसे बढ़कर दूसरा कोई दान न हुआ है और न होगा । अपने आत्मासे बढ़कर
प्रियतर वस्तु दूसरी कोई नहीं है । यह निश्चित बात है ॥ १६ ॥
अनिष्टं सर्वभूतानां मरणं नाम भारत ।
मृत्युकाले हि भूतानां सद्यो जायति वेपथुः ॥ १७ ॥
भरतनन्दन! किसी भी प्राणीको मृत्यु अभीष्ट नहीं है; क्योंकि मृत्युकालमें सभी प्राणियोंका शरीर तुरंत काँप उठता है ॥ १७ ॥
जातिजन्मजरादुःखैर्नित्यं संसारसागरे ।
जन्तवः परिवर्तन्ते मरणादुद्विजन्ति च ॥ १८ ॥
इस संसार- समुद्रमें समस्त प्राणी सदा गर्भवास, जन्म और बुढ़ापा आदिके दुःखोंसे दुःखी होकर चारों ओर भटकते रहते हैं। साथ ही मृत्युके भयसे उद्विग्न रहा करते हैं ॥ १८ ॥
गर्भवासेषु पच्यन्ते क्षाराम्लकटुकै रसैः ।
मूत्रस्वेदपुरीषाणां परुषैर्भृशदारुणैः ॥ १ ९ ॥
गर्भमें आये हुए प्राणी मल-मूत्र और पसीनोंके बीचमें रहकर खारे, खट्टे और कड़वे आदि रसोंसे, जिनका स्पर्श अत्यन्त कठोर और दुःखदायी होता है, पकते रहते हैं, जिससे उन्हें बड़ा भारी कष्ट होता है ॥
जाताश्चाप्यवशास्तत्र च्छिद्यमानाः पुनः पुनः ।
पाच्यमानाश्च दृश्यन्ते विवशा मांसगृद्धिनः ॥ २० ॥
मांसलोलुप जीव जन्म लेनेपर भी परवश होते हैं । वे बार- बार शस्त्रोंसे काटे और पकाये जाते हैं । उनकी यह बेवशी प्रत्यक्ष देखी जाती है ॥ २० ॥
कुम्भीपाके च पच्यन्ते तां तां योनिमुपागताः ।
आक्रम्य मार्यमाणाश्च भ्राम्यन्ते वै पुनः पुनः ॥ २१ ॥
वे अपने पापोंके कारण कुम्भीपाक नरकमें राँधे जाते और भिन्न- भिन्न योनियोंमें जन्म लेकर गला घोंट - घोंटकर मारे जाते हैं । इस प्रकार उन्हें बारंबार संसार-चक्रमें भटकना
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पड़ता है ॥ २१ ॥
नात्मनोऽस्ति प्रियतरः पृथिवीमनुसृत्य ह ।
तस्मात् प्राणिषु सर्वेषु दयावानात्मवान् भवेत् ॥ २२ ॥
इस भूमण्डलपर अपने आत्मासे बढ़कर कोई प्रिय वस्तु नहीं है । इसलिये सब प्राणियोंपर दया करे और सबको अपना आत्मा ही समझे ॥ २२ ॥
सर्वमांसानि यो राजन् यावज्जीवं न भक्षयेत् ।
स्वर्गे स विपुलं स्थानं प्राप्नुयान्नात्र संशयः ॥ २३ ॥
राजन्! जो जीवनभर किसी भी प्राणीका मांस नहीं खाता, वह स्वर्गमें श्रेष्ठ एवं विशाल स्थान पाता है, इसमें संशय नहीं है ॥ २३ ॥
ये भक्षयन्ति मांसानि भूतानां जीवितैषिणाम् ।
भक्ष्यन्ते तेऽपि भूतैस्तैरिति मे नास्ति संशयः ॥ २४ ॥
जो जीवित रहनेकी इच्छावाले प्राणियोंके मांसको खाते हैं, वे दूसरे जन्ममें उन्हीं
प्राणियोंद्वारा भक्षण किये जाते हैं । इस विषयमें मुझे संशय नहीं है ॥ २४ ॥
मां स भक्षयते यस्माद् भक्षयिष्ये तमप्यहम् ।
एतन्मांसस्य मांसत्वमनुबुद्ध्यस्व भारत ॥ २५ ॥
भरतनन्दन! ( जिसका वध किया जाता है, वह प्राणी कहता है - ) ' मां स भक्षयते यस्माद् भक्षयिष्ये तमप्यहम् । ' अर्थात् ' आज मुझे वह खाता है तो कभी मैं भी उसे खाऊँगा । ' यही मांसका मांसत्व है - इसे ही मांस शब्दका तात्पर्य समझो ॥ २५ ॥
घातको वध्यते नित्यं तथा वध्यति भक्षिता ।
आक्रोष्टा क्रुध्यते राजंस्तथा द्वेष्यत्वमाप्नुते ॥ २६ ॥
राजन्! इस जन्ममें जिस जीवकी हिंसा होती है, वह दूसरे जन्ममें सदा ही अपने घातकका वध करता है । फिर भक्षण करनेवालेको भी मार डालता है । जो दूसरोंकी निन्दा करता है, वह स्वयं भी दूसरोंके क्रोध और द्वेषका पात्र होता है ॥ २६ ॥
येन येन शरीरेण यद् यत् कर्म करोति यः ।
तेन तेन शरीरेण तत्तत् फलमुपाश्नुते ॥ २७ ॥
जो जिस -जिस शरीरसे जो -जो कर्म करता है, वह उस उस शरीरसे भी उस- उस कर्मका फल भोगता है ॥ २७ ॥
अहिंसा परमो धर्मस्तथाहिंसा परो दमः ।
अहिंसा परमं दानमहिंसा परमं तपः ॥ २८ ॥
अहिंसा परम धर्म है, अहिंसा परम संयम है, अहिंसा परम दान है और अहिंसा परम तपस्या है ॥
अहिंसा परमो यज्ञस्तथाहिंसा परं फलम् ।
अहिंसा परमं मित्रमहिंसा परमं सुखम् ॥ २ ९ ॥