श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 1141–1150

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1141–1150

पृष्ठ 1141

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सधातुशिखराभोगो दीप्तदग्धलतौषधिः ॥ ३५ ॥

उसने क्षणभरमें हिमालय पर्वतको धातु और विशाल शिखरोंसहित दग्ध कर डाला ।

उसकी लताएँ और ओषधियाँ प्रज्वलित हो जलकर भस्म हो गयीं ॥

तं दृष्ट्वा मथितं शैलं शैलराजसुता ततः ।

भगवन्तं प्रपन्ना वै साञ्जलिप्रग्रहा स्थिता ॥ ३६ ॥

उस पर्वतको दग्ध हुआ देख गिरिराजकुमारी उमा दोनों हाथ जोड़कर भगवान् शंकरकी शरणमें गयीं ॥ ३६ ॥

उमां शर्वस्तदा दृष्ट्वा स्त्रीभावगतमार्दवाम् ।

पितुर्दैन्यमनिच्छन्ती प्रीत्यापश्यत् तदा गिरिम् ॥ ३७ ॥

उस समय उमामें नारी- स्वभाववश मृदुता ( कातरता ) आ गयी थी । वे पिताकी दयनीय अवस्था नहीं देखना चाहती थीं । उनकी ऐसी दशा देख भगवान् शंकरने हिमवान् पर्वतकी ओर प्रसन्नतापूर्ण दृष्टिसे देखा ॥ ३७ ॥

क्षणेन हिमवान् सर्वः प्रकृतिस्थः सुदर्शनः ।

प्रहृष्टविहगश्चैव सुपुष्पितवनद्रुमः ॥ ३८ ॥

उनकी दृष्टि पड़नेपर क्षणभरमें सारा हिमालय पर्वत पहली स्थितिमें आ गया । देखनेमें परम सुन्दर हो गया । वहाँ हर्षमें भरे हुए पक्षी कलरव करने लगे । उस वनके वृक्ष सुन्दर पुष्पोंसे सुशोभित हो गये ॥ ३८ ॥

प्रकृतिस्थं गिरिं दृष्ट्वा प्रीता देवं महेश्वरम् ।

उवाच सर्वलोकानां पतिं शिवमनिन्दिता ॥ ३ ९ ॥

पर्वतको पूर्वावस्थामें स्थित हुआ देख पतिव्रता पार्वती देवी बहुत प्रसन्न हुईं । फिर उन्होंने सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी कल्याणस्वरूप महेश्वरदेवसे पूछा ॥ ३ ९ ॥ उमोवाच

भगवन् सर्वभूतेश शूलपाणे महाव्रत ।

संशयो मे महान् जातस्तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ ४० ॥

उमा बोलीं — भगवन्! सर्वभूतेश्वर! शूलपाणे! महान् व्रतधारी महेश्वर! मेरे मनमें एक

महान् संशय उत्पन्न हुआ है । आप मुझसे उसकी व्याख्या कीजिये ॥

किमर्थं ते ललाटे वै तृतीयं नेत्रमुत्थितम् ।

किमर्थं च गिरिर्दग्धः सपक्षिगणकाननः ॥ ४१ ॥

किमर्थं च पुनर्देव प्रकृतिस्थस्त्वया कृतः ।

तथैव द्रुमसंच्छन्नः कृतोऽयं ते पिता मम ॥ ४२ ॥

क्यों आपके ललाटमें तीसरा नेत्र प्रकट हुआ? किसलिये आपने पक्षियों और वनोंसहित पर्वतको दग्ध किया और देव! फिर किसलिये आपने उसे पूर्वावस्थामें ला दिया ।

पृष्ठ 1142

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मेरे इन पिताको आपने जो पूर्ववत् वृक्षोंसे आच्छादित कर दिया, इसका क्या कारण है? ॥

(एष मे संशयो देव हृदि सम्प्रवर्तते ।

देवदेव नमस्तुभ्यं तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

देवदेव! मेरे हृदयमें यह संदेह विद्यमान है । आप इसका समाधान करनेकी कृपा करें ।

आपको मेरा सादर नमस्कार है ॥

नारद उवाच एवमुक्तस्तथा देव्या प्रीयमाणोऽब्रवीद् भवः ॥ ) नारदजी कहते हैं- देवी पार्वतीके ऐसा कहने पर भगवान् शंकर प्रसन्न होकर बोले ॥ श्रीमहेश्वर उवाच (स्थाने संशयितुं देवि धर्मज्ञे प्रियभाषिणी ॥ त्वदृते मां हि वै प्रष्टुं न शक्यं केनचित् प्रिये । श्रीमहेश्वरने कहा — धर्मको जानने तथा प्रिय वचन बोलनेवाली देवि! तुमने जो संशय उपस्थित किया है, वह उचित ही है । प्रिये! तुम्हारे सिवा दूसरा कोई मुझसे ऐसा प्रश्न नहीं कर सकता ॥ प्रकाशं यदि वा गुह्यं प्रियार्थं प्रब्रवीम्यहम् ॥ शृणु तत् सर्वमखिलमस्यां संसदि भामिनी । भामिनि! प्रकट या गुप्त जो भी बात होगी, तुम्हारा प्रिय करनेके लिये मैं सब कुछ बताऊँगा । तुम इस सभामें मुझसे सारी बातें सुनो ॥ सर्वेषामेव लोकानां कूटस्थं विद्धि मां प्रिये ॥

मदधीनास्त्रयो लोका यथा विष्णौ तथा मयि ।

स्रष्टा विष्णुरहं गोप्ता इत्येतद् विद्धि भामिनि ॥

प्रिये! सभी लोकोंमें मुझे कूटस्थ समझो । तीनों लोक मेरे अधीन हैं। ये जैसे भगवान् विष्णुके अधीन हैं, उसी प्रकार मेरे भी अधीन हैं । भामिनि! तुम यही जान लो कि भगवान् विष्णु जगत्के स्रष्टा हैं और मैं इसकी रक्षा करनेवाला हूँ ॥ तस्माद् यदा मां स्पृशति शुभं वा यदि वेतरत् । तथैवेदं जगत् सर्वं तत्तद् भवति शोभने ॥ ) शोभने! इसीलिये जब मुझसे शुभ या अशुभका स्पर्श होता है, तब यह सारा जगत् वैसा ही शुभ या अशुभ हो जाता है ॥

नेत्रे मे संवृते देवि त्वया बाल्यादनिन्दिते ।

नष्टालोकस्तदा लोकः क्षणेन समपद्यत ॥ ४३ ॥

पृष्ठ 1143

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देवि! अनिन्दिते! तुमने अपने भोलेपनके कारण मेरी दोनों आँखें बंद कर दीं । इससे क्षणभरमें समस्त संसारका प्रकाश तत्काल नष्ट हो गया ॥ ४३ ॥

नष्टादित्ये तथा लोके तमोभूते नगात्मजे ।

तृतीयं लोचनं दीप्तं सृष्टं मे रक्षता प्रजाः ॥ ४४ ॥

गिरिराजकुमारी! संसारमें जब सूर्य अदृश्य हो गये और सब ओर अन्धकार-ही-अन्धकार छा गया, तब मैंने प्रजाकी रक्षाके लिये अपने तीसरे तेजस्वी नेत्रकी सृष्टि की है ॥ ४४ ॥

तस्य चाक्ष्णो महत् तेजो येनायं मथितो गिरिः ।

त्वत्प्रियार्थं च मे देवि प्रकृतिस्थः पुनः कृतः ॥ ४५ ॥

उसी तीसरे नेत्रका यह महान् तेज था, जिसने इस पर्वतको मथ डाला । देवि! फिर तुम्हारा प्रिय करनेके लिये मैंने इस गिरिराज हिमवान्‌को पुनः प्रकृतिस्थ कर दिया है ॥ ४५ ॥

उमोवाच

भगवन् केन ते वक्त्रं चन्द्रवत् प्रियदर्शनम् ।

पूर्वं तथैव श्रीकान्तमुत्तरं पश्चिमं तथा ॥ ४६ ॥

दक्षिणं च मुखं रौद्रं केनोर्ध्वं कपिला जटाः ।

केन कण्ठश्च ते नीलो बर्हिबर्हनिभः कृतः ॥ ४७ ॥

उमाने कहा — भगवन्! ( आपके चार मुख क्यों हैं । ) आपका पूर्व दिशावाला मुख चन्द्रमाके समान कान्तिमान् एवं देखनेमें अत्यन्त प्रिय है । उत्तर और पश्चिम दिशाके मुख भी पूर्वकी ही भाँति कमनीय कान्तिसे युक्त हैं। परंतु दक्षिण दिशावाला मुख बड़ा भयंकर है । यह अन्तर क्यों? तथा आपके सिरपर कपिल वर्णकी जटाएँ कैसे हुईं? क्या कारण है कि आपका कण्ठ मोरकी पाँखके समान नीला हो गया? ॥ ४६-४७ ॥

हस्ते देव पिनाकं ते सततं केन तिष्ठति ।

जटिलो ब्रह्मचारी च किमर्थमसि नित्यदा ॥ ४८ ॥

देव! आपके हाथमें पिनाक क्यों सदा विद्यमान रहता है? आप किसलिये नित्य जटाधारी ब्रह्मचारीके वेशमें रहते हैं? ॥ ४८ ॥

एतन्मे संशयं सर्वं वक्तुमर्हसि वै प्रभो ।

सधर्मचारिणी चाहं भक्ता चेति वृषध्वज ॥ ४ ९ ॥

प्रभो! वृषध्वज! मेरे इस सारे संशयका समाधान कीजिये; क्योंकि मैं आपकी सहधर्मिणी और भक्त हूँ ॥ ४ ९ ॥ भीष्म उवाच एवमुक्तः स भगवान् शैलपुत्र्या पिनाकधृत् ।

पृष्ठ 1144

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तस्या धृत्या च बुद्ध्या च प्रीतिमानभवत् प्रभुः ॥ ५० ॥

भीष्मजी कहते हैं - राजन्! गिरिराजकुमारी उमाके इस प्रकार पूछनेपर पिनाकधारी भगवान् शिव उनके धैर्य और बुद्धिसे बहुत प्रसन्न हुए ॥ ५० ॥

ततस्तामब्रवीद् देवः सुभगे श्रूयतामिति ।

हेतुभिर्यैर्ममैतानि रूपाणि रुचिरानने ॥ ५१ ॥

तत्पश्चात् उन्होंने पार्वतीजीसे कहा — ' सुभगे! रुचिरानने! जिन हेतुओंसे मेरे ये रूप हुए हैं, उन्हें बता रहा हूँ, सुनो ॥ ५१ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि उमामहेश्वरसंवादो नाम चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें उमामहेश्वरसंवादनामक एक सौचालीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १४० ॥

( दाक्षिणात्य अधिक पाठके ६३ श्लोक मिलाकर कुल ५७३ श्लोक हैं )

पृष्ठ 1145

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एकचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः शिव - पार्वतीका धर्मविषयक संवाद - वर्णाश्रमधर्मसम्बन्धी आचार एवं प्रवृत्ति - निवृत्तिरूप धर्मका निरूपण श्रीभगवानुवाच

तिलोत्तमा नाम पुरा ब्रह्मणा योषिदुत्तमा ।

तिलं तिलं समुद्धृत्य रत्नानां निर्मिता शुभा ॥ १ ॥

भगवान् शिवने कहा – प्रिये! पूर्वकालमें ब्रह्माजीने एक सर्वोत्तम नारीकी सृष्टि की थी । उन्होंने सम्पूर्ण रत्नोंका तिल-तिलभर सार उद्धृत करके उस शुभलक्षणा सुन्दरीके अंगोंका निर्माण किया था; इसलिये वह तिलोत्तमा नामसे प्रसिद्ध हुई ॥ १ ॥

साभ्यगच्छत मां देवि रूपेणाप्रतिमा भुवि ।

प्रदक्षिणं लोभयन्ती मां शुभे रुचिरानना ॥ २ ॥

देवि! शुभे! इस पृथ्वीपर तिलोत्तमाके रूपकी कहीं तुलना नहीं थी । वह सुमुखी बाला मुझे लुभाती हुई मेरी परिक्रमा करनेके लिये आयी ॥ २ ॥

यतो यतः सा सुदती मामुपाधावदन्तिके ।

ततस्ततो मुखं चारु मम देवि विनिर्गतम् ॥ ३ ॥

देवि! वह सुन्दर दाँतोंवाली सुन्दरी निकटसे मेरी परिक्रमा करती हुई जिस - जिस दिशाकी ओर गयी, उस- उस दिशाकी ओर मेरा मनोरम मुख प्रकट होता गया ॥ ३ ॥

तां दिदृक्षुरहं योगाच्चतुर्मूर्तित्वमागतः ।

चतुर्मुखश्च संवृत्तो दर्शयन् योगमुत्तमम् ॥ ४ ॥

तिलोत्तमाके रूपको देखनेकी इच्छासे मैं योगबलसे चतुर्मूर्ति एवं चतुर्मुख हो गया । इस प्रकार मैंने लोगोंको उत्तम योगशक्तिका दर्शन कराया ॥ ४ ॥

पूर्वेण वदनेनाहमिन्द्रत्वमनुशास्मि ह ।

उत्तरेण त्वया सार्धं रमाम्यहमनिन्दिते ॥ ५ ॥

मैं पूर्व दिशावाले मुखके द्वारा इन्द्रपदका अनुशासन करता हूँ। अनिन्दिते! मैं उत्तरवर्ती मुखके द्वारा तुम्हारे साथ वार्तालापके सुखका अनुभव करता हूँ ॥ ५ ॥

पश्चिमं मे मुखं सौम्यं सर्वप्राणिसुखावहम् ।

दक्षिणं भीमसंकाशं रौद्रं संहरति प्रजाः ॥ ६ ॥

मेरा पश्चिमवाला मुख सौम्य है और सम्पूर्ण प्राणियोंको सुख देनेवाला है तथा दक्षिण दिशावाला भयानक मुख रौद्र है, जो समस्त प्रजाका संहार करता है ॥ जटिलो ब्रह्मचारी च लोकानां हितकाम्यया ।

पृष्ठ 1146

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देवकार्यार्थसिद्ध्यर्थं पिनाकं मे करे स्थितम् ॥ ७ ॥

लोगोंके हितकी कामनासे ही मैं जटाधारी ब्रह्मचारीके वेषमें रहता हूँ । देवताओंका हित करनेके लिये पिनाक सदा मेरे हाथमें रहता है ॥ ७ ॥

इन्द्रेण च पुरा व्रजं क्षिप्तं श्रीकाङ्क्षिणा मम ।

दग्ध्वा कण्ठं तु तद् यातं तेन श्रीकण्ठता मम ॥ ८ ॥

पूर्वकालमें इन्द्रने मेरी श्री प्राप्त करनेकी इच्छासे मुझपर वज्रका प्रहार किया था । वह

वज्र मेरा कण्ठ दग्ध करके चला गया । इससे मेरी श्रीकण्ठ नामसे ख्याति हुई ॥ ८ ॥

( पुरा युगान्तरे यत्नादमृतार्थं सुरासुरैः ।

बलवद्भिर्विमथितश्चिरकालं महोदधिः ॥

प्राचीन कालके दूसरे युगकी बात है, बलवान् देवताओं और असुरोंने मिलकर अमृतकी प्राप्तिके लिये महान् प्रयास करते हुए चिरकालतक महासागरका मन्थन किया था ॥

रज्जुना नागराजेन मथ्यमाने महोदधौ ।

विषं तत्र समुद्भूतं सर्वलोकविनाशनम् ॥

नागराज वासुकिकी रस्सीसे बँधी हुई मन्दराचलरूपी मथानीद्वारा जब महासागर मथा जाने लगा, तब उससे सम्पूर्ण लोकोंका विनाश करनेवाला विष प्रकट हुआ ॥

तद् दृष्ट्वा विबुधाः सर्वे तदा विमनसोऽभवन् ।

ग्रस्तं हि तन्मया देवि लोकानां हितकारणात् ॥

उसे देखकर सब देवताओंका मन उदास हो गया । देवि! तब मैंने तीनों लोकोंके हितके लिये उस विषको स्वयं पी लिया ॥

तत्कृता नीलता चासीत् कण्ठे बर्हिनिभा शुभे ।

तदाप्रभृति चैवाहं नीलकण्ठ इति स्मृतः ॥

एतत् ते सर्वमाख्यातं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि । शुभे! उस विषके ही कारण मेरे कण्ठमें मोर पंखके समान नीले रंगका चिह्न बन गया । तभीसे मैं नीलकण्ठ कहा जाने लगा । ये सारी बातें मैंने तुम्हें बता दी । अब और क्या सुनना चाहती हो? ॥ उमोवाच नीलकण्ठ नमस्तेऽस्तु सर्वलोकसुखावह ॥

बहूनामायुधानां त्वं पिनाकं धर्तुमिच्छसि ।

किमर्थं देवदेवेश तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

उमाने पूछा — सम्पूर्ण लोकोंको सुख देनेवाले नीलकण्ठ! आपको नमस्कार है । देवदेवेश्वर! बहुत - से आयुधोंके होते हुए भी आप पिनाकको ही किसलिये धारण करना चाहते हैं? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ॥

पृष्ठ 1147

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श्रीमहेश्वर उवाच

शस्त्रागमं ते वक्ष्यामि शृणु धर्म्यं शुचिस्मिते ।

युगान्तरे महादेवि कण्वो नाम महामुनिः ॥

स हि दिव्यां तपश्चर्यां कर्तुमेवोपचक्रमे । श्रीमहेश्वरने कहा – पवित्र मुसकानवाली महादेवि! सुनो । मुझे जिस प्रकार धर्मानुकूल शस्त्रोंकी प्राप्ति हुई है, उसे बता रहा हूँ। युगान्तरमें कण्वनामसे प्रसिद्ध एक महामुनि हो गये हैं । उन्होंने दिव्य तपस्या करनी आरम्भ की ॥ तथा तस्य तपो घोरं चरतः कालपर्ययात् ॥ वल्मीकं पुनरुद्भूतं तस्यैव शिरसि प्रिये । धरमाणश्च तत् सर्वं तपश्चर्यां तथाकरोत् । प्रिये! उसके अनुसार घोर तपस्या करते हुए मुनिके मस्तकपर कालक्रमसे बाँबी जम गयी । वह सब अपने मस्तकपर लिये दिये वे पूर्ववत् तपश्चर्यामें लगे रहे ॥ तस्मै ब्रह्मा वरं दातुं जगाम तपसार्चितः ॥ दत्त्वा तस्मै वरं देवो वेणुं दृष्ट्वा त्वचिन्तयत् । मुनिकी तपस्यासे पूजित हुए ब्रह्माजी उन्हें वर देनेके लिये गये । वर देकर भगवान् ब्रह्माने वहाँ एक बाँस देखा और उसके उपयोगके लिये कुछ विचार किया ॥ लोककार्यं समुद्दिश्य वेणुनानेन भामिनि ॥ चिन्तयित्वा तमादाय कार्मुकार्थे न्ययोजयत् । भामिनि! उस बाँसके द्वारा जगत्का उपकार करनेके उद्देश्यसे कुछ सोचकर ब्रह्माजीने उस वेणुको हाथमें ले लिया और उसे धनुषके उपयोगमें लगाया ॥ विष्णोर्मम च सामर्थ्यं ज्ञात्वा लोकपितामहः ॥ धनुषी द्वे तदा प्रादाद् विष्णवे मम चैव तु । लोकपितामह ब्रह्माने भगवान् विष्णुकी और मेरी शक्ति जानकर उनके और मेरे लिये तत्काल दो धनुष बनाकर दिये ॥ पिनाकं नाम मे चापं शार्ङ्गं नाम हरेर्धनुः ॥ तृतीयमवशेषेण गाण्डीवमभवद् धनुः । मेरे धनुषका नाम पिनाक हुआ और श्रीहरिके धनुषका नाम शार्ङ्ग । उस वेणुके अवशेष भागसे एक तीसरा धनुष बनाया गया, जिसका नाम गाण्डीव हुआ ॥ तच्च सोमाय निर्दिश्य ब्रह्मा लोकं गतः पुनः ॥ एतत् ते सर्वमाख्यातं शस्त्रागममनिन्दिते । ) गाण्डीव धनुष सोमको देकर ब्रह्माजी फिर अपने लोकको चले गये । अनिन्दिते! शस्त्रोंकी प्राप्तिका यह सारा वृत्तान्त मैंने तुम्हें कह सुनाया ॥

पृष्ठ 1148

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उमोवाच

वाहनेष्वत्र सर्वेषु श्रीमत्स्वन्येषु सत्तम ।

कथं च वृषभो देव वाहनत्वमुपागतः ॥ ९ ॥

उमाने पूछा — सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ महादेव! इस जगत्में अन्य सब सुन्दर वाहनोंके होते हुए क्यों वृषभ ही आपका वाहन बना है? ॥ ९ ॥

श्रीमहेश्वर उवाच

सुरभीमसृजद् ब्रह्मा देवधेनुं पयोमुचम् ।

सा सृष्टा बहुधा जाता क्षरमाणा पयोऽमृतम् ॥ १० ॥

श्रीमहेश्वरने कहा – प्रिये! ब्रह्माजीने देवताओंके लिये दूध देनेवाली सुरभि नामक गायकी सृष्टि की, जो मेघके समान दूधरूपी जलकी वर्षा करनेवाली थी । उत्पन्न हुई सुरभि अमृतमय दूध बहाती हुई अनेक रूपोंमें प्रकट हो गयी ॥ १० ॥

तस्या वत्समुखोत्सृष्टः फेनो मद्गात्रमागतः ।

ततो दग्धा मया गावो नानावर्णत्वमागताः ॥ ११ ॥

एक दिन उसके बछड़ेके मुखसे निकला हुआ फेन मेरे शरीरपर पड़ गया । इससे मैंने कुपित होकर गौओंको ताप देना आरम्भ किया । मेरे रोषमें दग्ध हुई गौओंके रंग नाना प्रकारके हो गये ॥ ११ ॥

ततोऽहं लोकगुरुणा शमं नीतोऽर्थवेदिना ।

वृषं चैनं ध्वजार्थं मे ददौ वाहनमेव च ॥ १२ ॥

अब अर्थनीतिके ज्ञाता लोकगुरु ब्रह्माने मुझे शान्त किया तथा ध्वज -चिह्न और वाहनके रूपमें यह वृषभ मुझे प्रदान किया ॥ १२ ॥

उमोवाच

निवासा बहुरूपास्ते दिवि सर्वगुणान्विताः ।

तांश्च संत्यज्य भगवन् श्मशाने रमसे कथम् ॥ १३ ॥

उमाने पूछा — भगवन्! स्वर्गलोकमें अनेक प्रकारके सर्वगुणसम्पन्न निवासस्थान हैं, उन सबको छोड़कर आप श्मशान- भूमिमें कैसे रमते हैं? ॥ १३ ॥

केशास्थिकलिले भीमे कपालघटसंकुले ।

गृध्रगोमायुबहुले चिताग्निशतसंकुले ॥ १४ ॥

अशुचौ मांसकलिले वसाशोणितकर्दमे ।

विकीर्णान्त्रास्थिनिचये शिवानादविनादिते ॥ १५ ॥

श्मशानभूमि तो केशों और हड्डियोंसे भरी होती है । उस भयानक भूमिमें मनुष्योंकी खोपड़ियाँ और घड़े पड़े रहते हैं । गीधों और गीदड़ोंकी जमातें जुटी रहती हैं । वहाँ सब ओर चिताएँ जला करती हैं । मांस, वसा और रक्तकी कीच- सी मची रहती है । बिखरी हुई

पृष्ठ 1149

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आँतोंवाली हड्डियोंके ढेर पड़े रहते हैं और सियारिनोंकी हुआँ - हुआँकी ध्वनि वहाँ गूँजती रहती है, ऐसे अपवित्र स्थानमें आप क्यों रहते हैं? ॥ १४-१५ ॥ श्रीमहेश्वर उवाच

मेध्यान्वेषी महीं कृत्स्नां विचराम्यनिशं सदा ।

न च मेध्यतरं किंचित् श्मशानादिह लक्ष्यते ॥ १६ ॥

श्रीमहेश्वरने कहा — प्रिये! मैं पवित्र स्थान ढूँढ़नेके लिये सदा सारी पृथ्वीपर दिन - रात विचरता रहता हूँ, परंतु श्मशानसे * बढ़कर दूसरा कोई पवित्रतर स्थान यहाँ मुझे नहीं दिखायी दे रहा है ॥ १६ ॥

तेन मे सर्ववासानां श्मशाने रमते मनः ।

न्यग्रोधशाखासंछन्ने निर्भुग्नस्रग्विभूषिते ॥ १७ ॥

इसलिये सम्पूर्ण निवासस्थानोंमेंसे श्मशानमें ही मेरा मन अधिक रमता है । वह श्मशानभूमि बरगदकी डालियोंसे आच्छादित और मुर्दोंके शरीरसे टूटकर गिरी हुई पुष्पमालाअओंके द्वारा विभूषित होती है ॥ १७ ॥

तत्र चैव रमन्तीमे भूतसंघाः शुचिस्मिते ।

न च भूतगणैर्देवि विनाहं वस्तुमुत्सहे ॥ १८ ॥

पवित्र मुसकानवाली देवि! ये मेरे भूतगण श्मशानमें ही रमते हैं । इन भूतगणोंके बिना मैं कहीं भी रह नहीं सकता ॥ १८ ॥

एष वासो हि मे मेध्यः स्वर्गीयश्च मतः शुभे ।

पुण्यः परमकश्चैव मेध्यकामैरुपास्यते ॥ १ ९ ॥

शुभे! यह श्मशानका निवास ही मैंने अपने लिये पवित्र और स्वर्गीय माना है । यही परम पुण्यस्थली है । पवित्र वस्तुकी कामना रखनेवाले उपासक इसीकी उपासना करते हैं ॥ १ ९ ॥

(अस्माच्छ्मशानमेध्यं तु नास्ति किंचिदनिन्दिते ।

निस्सम्पातान्मनुष्याणां तस्माच्छुचितमं स्मृतम् ॥

अनिन्दिते! इस श्मशानभूमिसे अधिक पवित्र दूसरा कोई स्थान नहीं है, क्योंकि वहाँ

मनुष्योंका अधिक आना-जाना नहीं होता । इसीलिये वह स्थान पवित्रतम माना गया है ॥

स्थानं मे तत्र विहितं वीरस्थानमिति प्रिये ।

कपालशतसम्पूर्णमभिरूपं भयानकम् ॥

प्रिये! वह वीरोंका स्थान है, इसलिये मैंने वहाँ अपना निवास बनाया है । वह मृतकोंकी सैकड़ों खोपड़ियोंसे भरा हुआ भयानक स्थान भी मुझे सुन्दर लगता है ॥

मध्याह्ने संध्ययोस्तत्र नक्षत्रे रुद्रदैवते ।

आयुष्कामैरशुद्धैर्वा न गन्तव्यमिति स्थितिः ॥

पृष्ठ 1150

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दोपहरके समय, दोनों संध्याओंके समय तथा आर्द्रा नक्षत्रमें दीर्घायुकी कामना रखनेवाले अथवा अशुद्ध पुरुषोंको वहाँ नहीं जाना चाहिये, ऐसी मर्यादा है ॥ मदन्येन न शक्यं हि निहन्तुं भूतजं भयम् । तत्रस्थोऽहं प्रजाः सर्वाः पालयामि दिने दिने । मेरे सिवा दूसरा कोई भूतजनित भयका नाश नहीं कर सकता । इसलिये मैं श्मशानमें रहकर समस्त प्रजाओंका प्रतिदिन पालन करता हूँ ॥

मन्नियोगाद् भूतसंघा न च घ्नन्तीह कंचन ।

तांस्तु लोकहितार्थाय श्मशाने रमयाम्यहम् ॥

एतत्ते सर्वमाख्यातं किं भूयः श्रोतुमिच्छसि । मेरी आज्ञा मानकर ही भूतोंके समुदाय अब इस जगत्में किसीकी हत्या नहीं कर सकते हैं । सम्पूर्ण जगत्के हितके लिये मैं उन भूतोंको श्मशानभूमिमें रमाये रखता हूँ। श्मशानभूमिमें रहनेका सारा रहस्य मैंने तुमको बता दिया । अब और क्या सुनना चाहती हो? ॥ उमोवाच

भगवन् देवदेवेश त्रिनेत्र वृषभध्वज ।

पिङ्गलं विकृतं भाति रूपं ते तु भयानकम् ॥

उमाने पूछा — भगवन्! देवदेवेश्वर! त्रिनेत्र! वृषभध्वज! आपका रूप पिंगल, विकृत और भयानक प्रतीत होता है ॥

भस्मदिग्धं विरूपाक्षं तीक्ष्णदंष्ट्रं जटाकुलम् ।

व्याघ्रोदरत्वक्संवीतं कपिलश्मश्रुसंततम् ॥

आपके सारे शरीरमें भभूति पुती हुई है, आपकी आँख विकराल दिखायी देती है, दाढ़ें तीखी हैं और सिरपर जटाओंका भार लदा हुआ है, आप बाघम्बर लपेटे हुए हैं और आपके मुखपर कपिल रंगकी दाढ़ी - मूँछ फैली हुई है ॥

रौद्रं भयानकं घोरं शूलपट्टिशसंयुतम् ।

किमर्थं त्वीदृशं रूपं तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

आपका रूप ऐसा रौद्र, भयानक, घोर तथा शूल और पट्टिश आदिसे युक्त किसलिये है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ श्रीमहेश्वर उवाच

तदहं कथयिष्यामि शृणु तत्त्वं समाहिता ।

द्विविधो लौकिको भावः शीतमुष्णमिति प्रिये ॥

श्रीमहेश्वरने कहा – प्रिये! मैं इसका भी यथार्थ कारण बताता हूँ, तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो । जगत्के सारे पदार्थ दो भागोंमें विभक्त हैं- शीत और उष्ण ( अग्नि और