श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 1151–1160
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1151–1160
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सोम ) ॥
तयोर्हि ग्रथितं सर्वं सौम्याग्नेयमिदं जगत् ।
सौम्यत्वं सततं विष्णौ मय्याग्नेयं प्रतिष्ठितम् ॥
अनेन वपुषा नित्यं सर्वलोकान् बिभर्म्यहम् । अग्नि- सोम- रूप यह सम्पूर्ण जगत् उन शीत और उष्ण तत्त्वोंमें गुँथा हुआ है । सौम्य गुणकी स्थिति सदा भगवान् विष्णुमें है और मुझमें आग्नेय ( तैजस ) गुण प्रतिष्ठित है । इस प्रकार इस विष्णु और शिवरूप शरीरसे मैं सदा समस्त लोकोंकी रक्षा करता हूँ ॥
रौद्राकृतिं विरूपाक्षं शूलपट्टिशसंयुतम् ।
आग्नेयमिति मे रूपं देवि लोकहिते रतम् ॥
देवि! यह जो विकराल नेत्रोंसे युक्त और शूल- पट्टिशसे सुशोभित भयानक
आकृतिवाला मेरा रूप है, यही आग्नेय है । यह सम्पूर्ण जगत्के हितमें तत्पर रहता है ॥
यद्यहं विपरीतः स्यामेतत् त्यक्त्वा शुभानने ।
तदैव सर्वलोकानां विपरीतं प्रवर्तते ॥
शुभानने! यदि मैं इस रूपको त्यागकर इसके विपरीत हो जाऊँ तो उसी समय सम्पूर्ण लोकोंकी दशा विपरीत हो जायगी ॥
तस्मान्मयेदं ध्रियते रूपं लोकहितैषिणा ।
इति ते कथितं देवि किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥
देवि! इसलिये लोकहितकी इच्छासे ही मैंने यह रूप धारण किया है । अपने रूपका यह सारा रहस्य बता दिया, अब और क्या सुनना चाहती हो? ॥ नारद उवाच
एवं ब्रुवति देवेशे विस्मिता परमर्षयः ।
वाग्भिःसाञ्जलिमालाभिरभितुष्टुवुरीश्वरम् ॥
नारदजी कहते हैं — देवेश्वर भगवान् शंकरके ऐसा कहनेपर सभी महर्षि बड़े विस्मित हुए और हाथ जोड़कर अपनी वाणीद्वारा उन महादेवजीकी स्तुति करने लगे ॥ ऋषय ऊचुः
नमः शङ्कर सर्वेश नमः सर्वजगद्गुरो ।
देवादिदेवाय नमः शशिकलाधर ॥
ऋषि बोले — सर्वेश्वर शंकर! आपको नमस्कार है । सम्पूर्ण जगत्के गुरुदेव! आपको नमस्कार है । देवताओंके भी आदि देवता! आपको नमस्कार है । चन्द्रकलाधारी शिव! आपको नमस्कार है ॥
नमो घोरतराद् घोर नमो रुद्राय शङ्कर ।
नमः शान्ततराच्छान्त नमश्चन्द्रस्य पालक ॥
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अत्यन्त घोरसे भी घोर रुद्रदेव! शंकर! आपको बार - बार नमस्कार है । अत्यन्त शान्तसे
भी शान्त शिव! आपको नमस्कार है । चन्द्रमाके पालक! आपको नमस्कार है ॥
नमः सोमाय देवाय नमस्तुभ्यं चतुर्मुख ।
नमो भूतपते शम्भो जह्नुकन्याम्बुशेखर ॥
उमासहित महादेवजीको नमस्कार है । चतुर्मुख! आपको नमस्कार है । गंगाजीके जलको सिरपर धारण करनेवाले भूतनाथ शम्भो! आपको नमस्कार है ॥
नमस्त्रिशूलहस्ताय पन्नगाभरणाय च ।
नमोऽस्तु विषमाक्षाय दक्षयज्ञप्रदाहक ॥
हाथोंमें त्रिशूल धारण करनेवाले तथा सर्पमय आभूषणोंसे विभूषित आप महादेवको नमस्कार है । दक्ष - यज्ञको दग्ध करनेवाले त्रिलोचन! आपको नमस्कार है ॥
नमोऽस्तु बहुनेत्राय लोकरक्षणतत्पर ।
अहो देवस्य माहात्म्यमहो देवस्य वै कृपा ॥
एवं धर्मपरत्वं च देवदेवस्य चार्हति । लोकरक्षामें तत्पर रहनेवाले शंकर! आपके बहुत से नेत्र हैं, आपको नमस्कार है । अहो! महादेवजीका कैसा माहात्म्य है । अहो! रुद्रदेवकी कैसी कृपा है । ऐसी धर्मपरायणता देवदेव महादेवके ही योग्य है ॥ नारद उवाच एवं ब्रुवत्सु मुनिषु वचो देव्यब्रवीद्धरम् । सम्प्रीत्यर्थं मुनीनां सा क्षणज्ञा परमं हितम् ॥ ) नारदजी कहते हैं- जब मुनि इस प्रकार स्तुति कर रहे थे, उसी समय अवसरको जाननेवाली देवी पार्वती मुनियोंकी प्रसन्नताके लिये भगवान् शंकरसे परम हितकी बात बोलीं ॥ उमोवाच
भगवन् सर्वभूतेश सर्वधर्मविदां वर ।
पिनाकपाणे वरद संशयो मे महानयम् ॥ २० ॥
उमाने पूछा — सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाताओंमें श्रेष्ठ! सर्वभूतेश्वर! भगवन्! वरदायक! पिनाकपाणे! मेरे मनमें यह एक और महान् संशय है ॥ २० ॥
अयं मुनिगणः सर्वस्तपस्तेप इति प्रभो ।
तपोवेषकरो लोके भ्रमते विविधाकृतिः ॥ २१ ॥
अस्य चैवर्षिसंघस्य मम च प्रियकाम्यया ।
एतं ममेह संदेहं वक्तुमर्हस्यरिंदम ॥ २२ ॥
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प्रभो! यह जो मुनियोंका सारा समुदाय यहाँ उपस्थित है, सदा तपस्यामें संलग्न रहा है और तपस्वीका वेष धारण किये लोकमें भ्रमण कर रहा है; इन सबकी आकृति भिन्न - भिन्न प्रकारकी है । शत्रुदमन शिव! इस ऋषिसमुदायका तथा मेरा भी प्रिय करनेकी इच्छासे आप मेरे इस संदेहका समाधान करें ॥ २१-२२ ॥
धर्मः किंलक्षणः प्रोक्तः कथं वा चरितुं नरैः ।
शक्यो धर्ममविन्दद्भिर्धर्मज्ञ वद मे प्रभो ॥ २३ ॥
प्रभो! धर्मज्ञ! धर्मका क्या लक्षण बताया गया है? तथा जो धर्मको नहीं जानते हैं ऐसे मनुष्य उस धर्मका आचरण कैसे कर सकते हैं? यह मुझे बताइये ॥ २३ ॥
नारद उवाच
ततो मुनिगणः सर्वस्तां देवीं प्रत्यपूजयत् ।
वाग्भिरृग्भूषितार्थाभिः स्तवैश्चार्थविशारदैः ॥ २४ ॥
नारदजी कहते हैं -तदनन्तर समस्त मुनि- समुदायने देवी पार्वतीकी ऋग्वेदके मन्त्रार्थोंसे सुशोभित वाणी तथा उत्तम अर्थयुक्त स्तोत्रोंद्वारा स्तुति एवं प्रशंसा की ॥ २४ ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
अहिंसा सत्यवचनं सर्वभूतानुकम्पनम् ।
शमो दानं यथाशक्ति गार्हस्थ्यो धर्म उत्तमः ॥ २५ ॥
श्रीमहेश्वरने कहा - देवि! किसी भी जीवकी हिंसा न करना, सत्य बोलना, सब प्राणियोंपर दया करना, मन और इन्द्रियोंपर काबू रखना तथा अपनी शक्तिके अनुसार दान देना गृहस्थ आश्रमका उत्तम धर्म है ॥ २५ ॥
परदारेष्वसंसर्गो न्यासस्त्रीपरिरक्षणम् ।
अदत्तादानविरमो मधुमांसस्य वर्जनम् ॥ २६ ॥
एष पञ्चविधो धर्मो बहुशाखः सुखोदयः ।
देहिभिर्धर्मपरमैश्चर्तव्यो धर्मसम्भवः ॥ २७ ॥
( उक्त गृहस्थ- धर्मका पालन करना ) परायी स्त्रीके संसर्गसे दूर रहना, धरोहर और स्त्रीकी रक्षा करना, बिना दिये किसीकी वस्तु न लेना तथा मांस और मदिराको त्याग देना —से धर्मके पाँच भेद हैं, जो सुखकी प्राप्ति करानेवाले हैं । इनमेंसे एक- एक धर्मकी अनेक शाखाएँ हैं । धर्मको श्रेष्ठ माननेवाले मनुष्योंको चाहिये कि वे पुण्यप्रद धर्मका पालन अवश्य करें ॥ उमोवाच
भगवन् संशयः पृष्ठस्तन्मे शंसितुमर्हसि ।
चातुर्वर्ण्यस्य यो धर्मः स्वे स्वे वर्णे गुणावहः ॥ २८ ॥
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उमाने पूछा— भगवन्! मैं एक और संशय उपस्थित करती हूँ; चारों वर्णोंका जो - जो धर्म अपने -अपने वर्णके लिये विशेष लाभकारी हो, वह मुझे बतानेकी कृपा कीजिये ॥ २८ ॥
ब्राह्मणे कीदृशो धर्मः क्षत्रिये कीदृशोऽभवत् ।
वैश्ये किंलक्षणो धर्मः शूद्रे किंलक्षणो भवेत् ॥ २ ९ ॥
ब्राह्मणके लिये धर्मका स्वरूप कैसा है, क्षत्रियके लिये कैसा है, वैश्यके लिये उपयोगी धर्मका क्या लक्षण है तथा शूद्रके धर्मका भी क्या लक्षण है? ॥ २ ९ ॥ श्रीमहेश्वर उवाच
(एतत्ते कथयिष्यामि यत्ते देवि मनः प्रियम् ।
शृणु तत् सर्वमखिलं धर्मं वर्णाश्रमाश्रितम् ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! तुम्हारे मनको प्रिय लगनेवाला जो यह धर्मका विषय है, उसे बताऊँगा । तुम वर्णों और आश्रमोंपर अवलम्बित समस्त धर्मका पूर्णरूपसे वर्णन सुनो ॥
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चेति चतुर्विधम् ।
ब्रह्मणा विहिताः पूर्वं लोकतन्त्रमभीप्सता ॥
कर्माणि च तदर्हाणि शास्त्रेषु विहितानि वै । ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र– ये वर्णोंके चार भेद हैं । लोकतन्त्रकी इच्छा रखनेवाले विधाताने सबसे पहले ब्राह्मणोंकी सृष्टि की है और शास्त्रोंमें उनके योग्य कर्मोंका विधान किया है ॥ यदीदमेकवर्णं स्याज्जगत् सर्वं विनश्यति ॥ सहैव देवि वर्णानि चत्वारि विहितान्यतः ।
देवि! यदि यह सारा जगत् एक ही वर्णका होता तो सब साथ ही नष्ट हो जाता ।
इसलिये विधाताने चार वर्ण बनाये हैं ॥
मुखतो ब्राह्मणाः सृष्टास्तस्मात् ते वाग्विशारदाः ॥
बाहुभ्यां क्षत्रियाः सृष्टास्तस्मात् ते बाहुगर्विताः । ब्राह्मणोंकी सृष्टि विधाताके मुखसे हुई है, इसीलिये वे वाणीविशारद होते हैं । क्षत्रियोंकी सृष्टि दोनों भुजाओंसे हुई है, इसीलिये उन्हें अपने बाहुबलपर गर्व होता है ॥ उदरादुद्गता वैश्यास्तस्माद् वार्तोपजीविनः ॥
शूद्राश्च पादतः सृष्टास्तस्मात् ते परिचारकाः ।
तेषां धर्मांश्च कर्माणि शृणु देवि समाहिता ॥
वैश्योंकी उत्पत्ति उदरसे हुई है, इसीलिये वे उदर- पोषणके निमित्त कृषि, वाणिज्यादि वार्तावृत्तिका आश्रय ले जीवन निर्वाह करते हैं । शूद्रोंकी सृष्टि पैरसे हुई है, इसलिये वे
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परिचारक होते हैं । देवि! अब तुम एकाग्रचित्त होकर चारों वर्णोंके धर्म और कर्मोंका वर्णन सुनो ॥
विप्राः कृता भूमिदेवा लोकानां धारणे कृताः ।
ते कैश्चिन्नावमन्तव्या ब्राह्मणा हितमिच्छुभिः ॥
ब्राह्मणको इस भूमिका देवता बनाया गया है । वे सब लोकोंकी रक्षाके लिये उत्पन्न किये गये हैं । अतः अपने हितकी इच्छा रखनेवाले किसी भी मनुष्यको ब्राह्मणोंका अपमान नहीं करना चाहिये ॥
यदि ते ब्राह्मणा न स्युर्दानयोगवहाः सदा ।
उभयोर्लोकयोर्देवि स्थितिर्न स्यात् समासतः ॥
देवि! यदि दान और योगका वहन करनेवाले वे ब्राह्मण न हों तो लोक और परलोक दोनोंकी स्थिति कदापि नहीं रह सकती ॥
ब्राह्मणान् योऽवमन्येत निन्देच्च क्रोधयेच्च वा ।
प्रहरेत हरेद् वापि धनं तेषां नराधमः ॥
कारयेद्धीनकर्माणि कामलोभविमोहनात् ।
स च मामवमन्येत मां क्रोधयति निन्दति ॥
मामेव प्रहरेन्मूढो मद्धनस्यापहारकः ।
मामेव प्रेषणं कृत्वा निन्दते मूढचेतनः ॥
जो ब्राह्मणोंका अपमान और निन्दा करता अथवा उन्हें क्रोध दिलाता या उनपर प्रहार करता अथवा उनका धन हर लेता है या काम, लोभ एवं मोहके वशीभूत होकर उनसे नीच कर्म कराता है, वह नराधम मेरा ही अपमान या निन्दा करता है । मुझे ही क्रोध दिलाता है, मुझपर ही प्रहार करता है, वह मूढ़ मेरे ही धनका अपहरण करता है तथा वह मूढ़चित्त मानव मुझे ही इधर- उधर भेजकर नीच कर्म कराता और निन्दा करता है ॥
स्वाध्यायो यजनं दानं तस्य धर्म इति स्थितिः ।
कर्माण्यध्यापनं चैव याजनं च प्रतिग्रहः ॥
सत्यं शान्तिस्तपः शौचं तस्य धर्मः सनातनः । वेदोंका स्वाध्याय, यज्ञ और दान ब्राह्मणका धर्म है, यह शास्त्रका निर्णय है । वेदोंको
पढ़ाना, यजमानका यज्ञ कराना और दान लेना –ये उसकी जीविकाके साधनभूत कर्म हैं ।
सत्य, मनोनिग्रह, तप और शौचाचारका पालन- यह उनका सनातन धर्म है ॥
विक्रयो रसधान्यानां ब्राह्मणस्य विगर्हितः ॥
रस और धान्य ( अनाज ) का विक्रय करना ब्राह्मणके लिये निन्दित है ॥
तप एव सदा धर्मो ब्राह्मणस्य न संशयः । स तु धर्मार्थमुत्पन्नः पूर्वं धात्रा तपोबलात् ॥ )
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सदा तप करना ही ब्राह्मणका धर्म है, इसमें संशय नहीं है । विधाताने पूर्वकालमें धर्मका अनुष्ठान करनेके लिये ही अपने तपोबलसे ब्राह्मणको उत्पन्न किया था ॥
न्यायतस्ते महाभागे सर्वशः समुदीरितः ।
भूमिदेवा महाभागाः सदा लोके द्विजातयः ॥ ३० ॥
महाभागे! मैंने तुम्हारे निकट सब प्रकारसे धर्मका निर्णय किया है । महाभाग ब्राह्मण इस लोकमें सदा भूमिदेव माने गये हैं ॥ ३० ॥
उपवासः सदा धर्मो ब्राह्मणस्य न संशयः ।
स हि धर्मार्थसम्पन्नो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ३१ ॥
इसमें संशय नहीं कि उपवास ( इन्द्रियसंयम) व्रतका आचरण करना ब्राह्मणके लिये सदा धर्म बतलाया गया है । धर्मार्थसम्पन्न ब्राह्मण ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है ॥ ३१ ॥
तस्य धर्मक्रिया देवि ब्रह्मचर्या च न्यायतः ।
व्रतोपनयनं चैव द्विजो येनोपपद्यते ॥ ३२ ॥
देवि! उसे धर्मका अनुष्ठान और न्यायतः ब्रह्मचर्यका पालन करना चाहिये । व्रतके पालनपूर्वक उपनयन-संस्कारका होना उसके लिये परम आवश्यक है, क्योंकि उसीसे वह द्विज होता है ॥ ३२ ॥
गुरुदैवतपूजार्थं स्वाध्यायाभ्यसनात्मकः ।
देहिभिर्धर्मपरमैश्चर्तव्यो धर्मसम्भवः ॥ ३३ ॥
गुरु और देवताओंकी पूजा तथा स्वाध्याय और अभ्यासरूप धर्मका पालन ब्राह्मणको अवश्य करना चाहिये । धर्मपरायण देहधारियोंको उचित है कि वे पुण्यप्रद धर्मका आचरण अवश्य करें ॥ ३३ ॥
उमोवाच
भगवन् संशयो मेऽस्ति तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ।
चातुर्वर्ण्यस्य धर्म वै नैपुण्येन प्रकीर्तय ॥ ३४ ॥
उमाने कहा — भगवन्! मेरे मनमें अभी संशय रह गया है । अतः उसकी व्याख्या करके मुझे समझाइये । चारों वर्णोंका जो धर्म है, उसका पूर्णरूपसे प्रतिपादन कीजिये ॥ ३४ ॥
श्रीमहेश्वर उवाच
रहस्यश्रवणं धर्मो वेदव्रतनिषेवणम् ।
अग्निकार्यं तथा धर्मो गुरुकार्यप्रसाधनम् ॥ ३५ ॥
श्रीमहेश्वरने कहा – धर्मका रहस्य सुनना, वेदोक्त व्रतका पालन करना, होम और गुरुसेवा करना - यह ब्रह्मचर्य आश्रमका धर्म है ॥ ३५ ॥
भैक्षचर्या परो धर्मो नित्ययज्ञोपवीतिता ।
नित्यं स्वाध्यायिता धर्मो ब्रह्मचर्याश्रमस्तथा ॥ ३६ ॥
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ब्रह्मचारीके लिये भैक्षचर्या ( गाँवोंमेंसे भिक्षा माँगकर लाना और गुरुको समर्पित करना ) परम धर्म है । नित्य यज्ञोपवीत धारण किये रहना, प्रतिदिन वेदका स्वाध्याय करना और ब्रह्मचर्याश्रमके नियमोंके पालनमें लगे रहना, ब्रह्मचारीका प्रधान कर्म है ॥ ३६ ॥
गुरुणा चाभ्यनुज्ञातः समावर्तेत वै द्विजः ।
विन्देतानन्तरं भार्यामनुरूपां यथाविधि ॥ ३७ ॥
ब्रह्मचर्यकी अवधि समाप्त होनेपर द्विज अपने गुरुकी आज्ञा लेकर समावर्तन करे और घर आकर अनुरूप स्त्रीसे विधिपूर्वक विवाह करे ॥ ३७ ॥
शूद्रान्नवर्जनं धर्मस्तथा सत्पथसेवनम् ।
धर्मो नित्योपवासित्वं ब्रह्मचर्यं तथैव च ॥ ३८ ॥
ब्राह्मणको शूद्रका अन्न नहीं खाना चाहिये, यह उसका धर्म है | सन्मार्गका सेवन, नित्य उपवास- व्रत और ब्रह्मचर्यका पालन भी धर्म है ॥ ३८ ॥
आहिताग्निरधीयानो जुह्वानः संयतेन्द्रियः ।
विघसाशी यताहारो गृहस्थः सत्यवाक् शुचिः ॥ ३ ९ ॥
गृहस्थको अग्निस्थापनपूर्वक अग्निहोत्र करनेवाला, स्वाध्यायशील, होमपरायण, जितेन्द्रिय, विघसाशी, मिताहारी, सत्यवादी और पवित्र होना चाहिये ॥ ३ ९ ॥
अतिथिव्रतता धर्मो धर्मस्त्रेताग्निधारणम् ।
इष्टीश्च पशुबन्धांश्च विधिपूर्वं समाचरेत् ॥ ४० ॥
अतिथि - सत्कार करना और गार्हपत्य आदि त्रिविध अग्नियोंकी रक्षा करना उसके लिये धर्म है । वह नाना प्रकारकी इष्टियों और पशुरक्षाकर्मका भी विधिपूर्वक आचरण करे ॥ ४० ॥
यज्ञश्च परमो धर्मस्तथाहिंसा च देहिषु ।
अपूर्वभोजनं धर्मो विघसाशित्वमेव च ॥ ४१ ॥
यज्ञ करना तथा किसी भी जीवकी हिंसा न करना उसके लिये परम धर्म है । घरमें पहले भोजन न करना तथा विघसाशी होना- कुटुम्बके लोगोंके भोजन करानेके बाद ही अवशिष्ट अन्नका भोजन करना - यह भी उसका धर्म है ॥ ४१ ॥
भुक्ते परिजने पश्चाद् भोजनं धर्म उच्यते ।
ब्राह्मणस्य गृहस्थस्य श्रोत्रियस्य विशेषतः ॥ ४२ ॥
जब कुटुम्बीजन भोजन कर लें उसके पश्चात् स्वयं भोजन करना —यह गृहस्थ ब्राह्मणका विशेषतः श्रोत्रियका मुख्य धर्म बताया गया है ॥ ४२ ॥
दम्पत्योः समशीलत्वं धर्मः स्याद् गृहमेधिनः ।
गृह्याणां चैव देवानां नित्यपुष्पबलिक्रिया ॥ ४३ ॥
नित्योपलेपनं धर्मस्तथा नित्योपवासिता ।
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पति और पत्नीका स्वभाव एक-सा होना चाहिये । यह गृहस्थका धर्म है । घरके देवताओंकी प्रतिदिन पुष्पोंद्वारा पूजा करना, उन्हें अन्नकी बलि समर्पित करना, रोज- रोज घर लीपना और प्रतिदिन व्रत रखना भी गृहस्थका धर्म है ॥ ४३३ ॥
सुसम्मृष्टोपलिप्ते च साज्यधूमो भवेद् गृहे ॥ ४४ ॥
एष द्विजजने धर्मो गार्हस्थ्यो लोकधारणः ।
द्विजानां च सतां नित्यं सदैवैष प्रवर्तते ॥ ४५ ॥
झाड़ - बुहार, लीप-पोतकर स्वच्छ किये हुए घरमें घृतयुक्त आहुति करके उसका धुआँ फैलाना चाहिये । यह ब्राह्मणोंका गार्हस्थ्य धर्म बतलाया, जो संसारकी रक्षा करनेवाला है । अच्छे ब्राह्मणोंके यहाँ सदा ही इस धर्मका पालन किया जाता है ॥ ४४-४५ ॥
यस्तु क्षत्रगतो देवि मया धर्म उदीरितः ।
तमहं ते प्रवक्ष्यामि तन्मे शृणु समाहिता ॥ ४६ ॥
देवि! मेरे द्वारा जो क्षत्रिय धर्म बताया गया है, उसीका अब तुम्हारे समक्ष वर्णन करता हूँ, तुम मुझसे एकाग्रचित्त होकर सुनो ॥ ४६ ॥
क्षत्रियस्य स्मृतो धर्मः प्रजापालनमादितः ।
निर्दिष्टफलभोक्ता हि राजा धर्मेण युज्यते ॥ ४७ ॥
क्षत्रियका सबसे पहला धर्म है प्रजाका पालन करना । प्रजाकी आयके छठे भागका उपभोग करनेवाला राजा धर्मका फल पाता है ॥ ४७ ॥
( क्षत्रियास्तु ततो देवि द्विजानां पालने स्मृताः ।
यदि न क्षत्रियो लोके जगत् स्यादधरोत्तरम् ॥
रक्षणात् क्षत्रियैरेव जगद् भवति शाश्वतम् । देवि! क्षत्रिय ब्राह्मणोंके पालनमें तत्पर रहते हैं । यदि संसारमें क्षत्रिय न होता तो इस जगत्में भारी उलट - फेर या विप्लव मच जाता । क्षत्रियोंद्वारा रक्षा होनेसे ही यह जगत् सदा टिका रहता है ॥ सम्यग्गुणहितो धर्मो धर्मः पौरहितक्रिया । व्यवहारस्थितिर्नित्यं गुणयुक्तो महीपतिः ॥ ) उत्तम गुणोंका सम्पादन और पुरवासियोंका हितसाधन उसके लिये धर्म है । गुणवान् राजा सदा न्याययुक्त व्यवहारमें स्थित रहे ॥
प्रजाः पालयते यो हि धर्मेण मनुजाधिपः ।
तस्य धर्मार्जिता लोकाः प्रजापालनसंचिताः ॥ ४८ ॥
जो राजा धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करता है, उसे उसके प्रजापालनरूपी धर्मके प्रभावसे उत्तम लोक प्राप्त होते हैं ॥ ४८ ॥
तस्य राज्ञः परो धर्मो दमः स्वाध्याय एव च ।
अग्निहोत्रपरिस्पन्दो दानाध्ययनमेव च ॥ ४ ९ ॥
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यज्ञोपवीत धरणं यज्ञो धर्मक्रियास्तथा ।
भृत्यानां भरणं धर्मः कृते कर्मण्यमोघता ॥ ५० ॥
सम्यग्दण्डे स्थितिर्धमो धर्मो वेदक्रतुर्क्रियाः ।
व्यवहारस्थितिर्धर्मः सत्यवाक्यरतिस्तथा ॥ ५१ ॥
राजाका परम धर्म है— इन्द्रियसंयम, स्वाध्याय, अग्निहोत्रकर्म, दान, अध्ययन, यज्ञोपवीत- धारण, यज्ञानुष्ठान, धार्मिक कार्यका सम्पादन, पोष्यवर्गका भरण- पोषण, आरम्भ किये हुए कर्मको सफल बनाना, अपराधके अनुसार उचित दण्ड देना, वैदिक यज्ञादि कर्मोंका अनुष्ठान करना, व्यवहारमें न्यायकी रक्षा करना और सत्यभाषणमें अनुरक्त होना । ये सभी कर्म राजाके लिये धर्म ही हैं ॥
आर्तहस्तप्रदो राजा प्रेत्य चेह महीयते ।
गोब्राह्मणार्थे विक्रान्तः संग्रामे निधनं गतः ॥ ५२ ॥
अश्वमेधजिताँल्लोकानाप्नोति त्रिदिवालये ॥ ५३ ॥
जो राजा दुखी मनुष्योंको हाथका सहारा देता है, वह इस लोक और परलोकमें भी सम्मानित होता है । गौओं और ब्राह्मणोंको संकटसे बचानेके लिये जो पराक्रम दिखाकर संग्राममें मृत्युको प्राप्त होता है, वह स्वर्गमें अश्वमेध यज्ञोंद्वारा जीते हुए लोकोंपर अधिकार जमा लेता है ॥ ५२-५३ ॥
( तथैव देवि वैश्याश्च लोकयात्राहिताः स्मृताः ।
अन्ये तानुपजीवन्ति प्रत्यक्षफलदा हि ते ॥
यदि न स्युस्तथा वैश्या न भवेयुस्तथा परे । ) देवि! इसी प्रकार वैश्य भी लोगोंकी जीवन- यात्राके निर्वाहमें सहायक माने गये हैं । दूसरे वर्णोंके लोग उन्हींके सहारे जीवन- निर्वाह करते हैं, क्योंकि वे प्रत्यक्ष फल देनेवाले हैं । यदि वैश्य न हों तो दूसरे वर्णके लोग भी न रहें ॥
वैश्यस्य सततं धर्मः पाशुपाल्यं कृषिस्तथा ।
अग्निहोत्रपरिस्पन्दो दानाध्ययनमेव च ॥ ५४ ॥
वाणिज्यं सत्पथस्थानमातिथ्यं प्रशमो दमः ।
विप्राणां स्वागतं त्यागो वैश्यधर्मः सनातनः ॥ ५५ ॥
पशुओंका पालन, खेती, व्यापार, अग्निहोत्रकर्म, दान, अध्ययन, सन्मार्गका आश्रय लेकर सदाचारका पालन, अतिथि सत्कार, शम, दम, ब्राह्मणोंका स्वागत और त्याग — ये सब वैश्योंके सनातन धर्म हैं ॥ ५४-५५ ॥
तिलान् गन्धान् रसांश्चैव विक्रीणीयान्न चैव हि ।
वणिक्पथमुपासीनो वैश्यः सत्पथमाश्रितः ॥ ५६ ॥
सर्वातिथ्यं त्रिवर्गस्य यथाशक्ति यथार्हतः ।
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व्यापार करनेवाले सदाचारी वैश्यको तिल, चन्दन और रसकी विक्री नहीं करनी चाहिये तथा ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य –इस त्रिवर्गका सब प्रकारसे यथाशक्ति यथायोग्य आतिथ्यसत्कार करना चाहिये ॥ शूद्रधर्मः परो नित्यं शुश्रूषा च द्विजातिषु ॥ ५७ ॥
स शूद्रः संशिततपाः सत्यवादी जितेन्द्रियः ।
शुश्रूषुरतिथिं प्राप्तं तपः संचिनुते महत् ॥ ५८ ॥
शूद्रका परम धर्म है तीनों वर्णोंकी सेवा । जो शूद्र सत्यवादी जितेन्द्रिय और घरपर आये हुए अतिथिकी सेवा करनेवाला है, वह महान् तपका संचय कर लेता है । उसका सेवारूप धर्म उसके लिये कठोर तप है ॥ ५७-५८ ॥
नित्यं स हि शुभाचारो देवताद्विजपूजकः ।
शूद्रो धर्मफलैरिष्टैः सम्प्रयुज्येत बुद्धिमान् ॥ ५ ९ ॥
नित्य सदाचारका पालन और देवता तथा ब्राह्मणोंकी पूजा करनेवाले बुद्धिमान् शूद्रको धर्मका मनोवांछित फल प्राप्त होता है ॥ ५ ९ ॥
(तथैव शूद्रा विहिताः सर्वधर्मप्रसाधकाः ।
शूद्राश्च यदि ते न स्युः कर्मकर्ता न विद्यते ॥
इसी प्रकार शूद्र भी सम्पूर्ण धर्मोंके साधक बताये गये हैं। यदि शूद्र न हों तो सेवाका कार्य करनेवाला कोई नहीं है ॥
त्रयः पूर्वे शूद्रमूलाः सर्वे कर्मकराः स्मृताः ।
ब्राह्मणादिषु शुश्रूषा दासधर्म इति स्मृतः ॥
पहलेके जो तीन वर्ण हैं, वे सब शूद्रमूलक ही हैं, क्योंकि शूद्र ही सेवाका कर्म करनेवाले माने गये हैं । ब्राह्मण आदिकी सेवा ही दास या शूद्रका धर्म माना गया है ॥
वार्ता च कारुकर्माणि शिल्पं नाट्यं तथैव च ।
अहिंसकः शुभाचारो दैवतद्विजवन्दकः ॥
वाणिज्य, कारीगरके कार्य, शिल्प तथा नाट्य भी शूद्रका धर्म है । उसे अहिंसक, सदाचारी और देवताओं तथा ब्राह्मणोंका पूजक होना चाहिये ॥ शूद्रो धर्मफलैरिष्टैः स्वधर्मेणोपयुज्यते । एवमादि तथान्यच्च शूद्रधर्म इति स्मृतः ॥ ) ऐसा शूद्र अपने धर्मसे सम्पन्न और उसके अभीष्ट फलोंका भागी होता है । यह तथा और भी शूद्र - धर्म कहा गया है ॥
एतत् ते सर्वमाख्यातं चातुर्वर्ण्यस्य शोभने ।
एकैकस्येह सुभगे किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ॥ ६० ॥
शोभने! इस प्रकार मैंने तुम्हें एक- एक करके चारों वर्णोंका सारा धर्म बतलाया । सुभगे! अब और क्या सुनना चाहती हो? ॥ ६० ॥