श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 1281–1290
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1281–1290
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शरीर क्षीण होता है, आत्मा नहीं । वह वेदनाओंसे भी विचलित नहीं होता । जबतक कर्मफल शेष रहता है, तबतक जीवात्मा इस शरीरमें स्थित रहता है और कर्मोंका क्षय होनेपर पुनः चला जाता है ॥
आदिप्रभृति लोकेऽस्मिन्नेवमात्मगतिः स्मृता ।
एतत् ते कथितं देवि किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥
आदिकालसे ही इस जगत् में आत्माकी ऐसी ही गति मानी गयी है । देवि! यह सब
विषय तुम्हें बताया गया । अब और क्या सुनना चाहती हो? ॥
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त )
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[ प्राणियोंके चार भेदोंका निरूपण, पूर्वजन्मकी स्मृतिका रहस्य, मरकर फिर लौटने में कारण स्वप्नदर्शन, दैव और पुरुषार्थ तथा पुनर्जन्मका विवेचन] उमोवाच
भगवन् देवदेवेश कर्मणैव शुभाशुभम् ।
यथायोगं फलं जन्तुः प्राप्नोतीति विनिश्चयः ॥
उमाने पूछा — भगवन्! देवदेवेश्वर! जीव अपने कर्मसे यथायोग्य शुभाशुभ फल पाता है — यह निश्चय हुआ ॥
परेषां विप्रियं कुर्वन् यथा सम्प्राप्नुयाच्छुभम् ।
यदेतदस्मिंश्चेद् देहे तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
दूसरोंका अप्रिय करके भी इस शरीरमें स्थित हुआ जीवात्मा किस प्रकार शुभ फल पाता है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ श्रीमहेश्वर उवाच
तदप्यस्ति महाभागे अभिसंधिबलान्नृणाम् ।
हितार्थं दुःखमन्येषां कृत्वा सुखमवाप्नुयात् ॥
श्रीमहेश्वरने कहा – महाभागे! ऐसा भी होता है कि शुभ संकल्पके बलसे मनुष्योंके हितके लिये उन्हें दुःख देकर भी पुरुष सुख प्राप्त कर सके ॥
दण्डयन् भर्त्सयन् राजा प्रजाः पुण्यमवाप्नुयात् ।
गुरुः संतर्जयन् शिष्यान् भर्ता भृत्यजनान् स्वकान् ॥
राजा प्रजाको अपराधके कारण दण्ड देता और फटकारता है तो भी वह पुण्यका ही भागी होता है । गुरु अपने शिष्योंको और स्वामी अपने सेवकोंको उनके सुधारके लिये यदि डाँटता--फटकारता है तो इससे सुखका ही भागी होता है ॥ उन्मार्गप्रतिपन्नांश्च शास्ता धर्मफलं लभेत् ॥ चिकित्सकश्च दुःखानि जनयन् हितमाप्नुयात् । जो कुर्मागपर चल रहे हों, उनका शासन करनेवाला राजा धर्मका फल पाता है । चिकित्सक रोगीकी चिकित्सा करते समय उसे कष्ट ही देता है तथापि रोग मिटानेका प्रयत्न करनेके कारण वह हितका ही भागी होता है ॥ एवमन्ये सुमनसो हिंसकाः स्वर्गमाप्नुयुः ॥
एकस्मिन् निहते भद्रे बहवः सुखमाप्नुयुः ।
तस्मिन् हते भवेद् धर्मः कुत एव तु पातकम् ॥
इस प्रकार दूसरे लोग भी यदि शुद्ध हृदयसे किसीको कष्ट पहुँचाते हैं तो स्वर्गलोकमें जाते हैं । भद्रे! जहाँ किसी एक दुष्टके मारे जानेपर बहुत- से सत्पुरुषोंको सुख प्राप्त होता हो तो उसके मारनेपर पातक क्या लगेगा, उलटे धर्म होता है ॥
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अभिसंधेरजिह्मत्वाच्छुद्धे धर्मस्य गौरवात् ।
एतत् कृत्वा तु पापेभ्यो न दोषं प्राप्नुयुः क्वचित् ॥
यदि उद्देश्य कुटिलतापूर्ण न हो, अपितु धर्मके गौरवसे शुद्ध हो तो पापियोंके प्रति ऐसा व्यवहार करके भी कहीं दोषकी प्राप्ति नहीं होती ॥ उमोवाच
चतुर्विधानां जन्तूनां कथं ज्ञानमिह स्मृतम् ।
कृत्रिमं तत्स्वभावं वा तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
उमाने पूछा — इस जगत्में रहनेवाले चार प्रकारके प्राणियोंको कैसे ज्ञान प्राप्त होता है! वह कृत्रिम है या स्वाभाविक? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ श्रीमहेश्वर उवाच
स्थावरं जङ्गमं चेति जगद् द्विविधमुच्यते ।
चतस्रो योनयस्तत्र प्रजानां क्रमशो यथा ॥
श्रीमहेश्वरने कहा — देवि! यह जगत् स्थावर और जंगमके भेदसे दो प्रकारका पाया जाता है! इसमें प्रजाकी क्रमशः चार योनियाँ हैं— जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज ॥
तेषामुद्भिदजा वृक्षा लतावल्ल्यश्च वीरुधः ।
दंशयूकादयश्चान्ये स्वेदजाः कृमिजातयः ॥
इनमेंसे वृक्ष, लता, वल्ली और तृण आदि उद्भिज्ज कहलाते हैं । डाँस और जूँ आदि कीट जातिके प्राणी स्वेदज कहे गये हैं ॥
पक्षिणश्छिद्रकर्णाश्च प्राणिनस्त्वण्डजा मताः ।
मृगव्यालमनुष्यांश्च विद्धि तेषां जरायुजान् ॥
जिनके पंख होते हैं और कानके स्थानमें एक छिद्र मात्र होता है, ऐसे प्राणी अण्डज माने गये हैं । पशु, व्याल ( हिंसक जन्तु बाघ, चीते आदि ) और मनुष्य–इनको जरायुज समझो ॥ एवं चतुर्विधां जातिमात्मा संसृत्य तिष्ठति ॥ इस तरह आत्मा इन चार प्रकारकी जातियोंका आश्रय लेकर रहता है ॥
तथा भूम्यम्बुसंयोगाद् भवन्त्युद्भिदजाः प्रिये ।
शीतोष्णयोस्तु संयोगाज्जायन्ते स्वेदजाः प्रिये ॥
प्रिये! पृथ्वी और जलके संयोगसे उद्भिज्ज प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है तथा स्वेदज जीव सर्दी और गर्मीके संयोगसे जीवन ग्रहण करते हैं ॥
अण्डजाश्चापि जायन्ते संयोगात् क्लेदबीजयोः ।
शुक्लशोणितसंयोगात् सम्भवन्ति जरायुजाः ॥
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जरायुजानां सर्वेषां मानुषं पदमुत्तमम् ॥ क्लेद और बीजके संयोगसे अण्डज प्राणियोंका जन्म होता है और जरायुज प्राणी रज- वीर्यके संयोगसे उत्पन्न होते हैं । समस्त जरायुजोंमें मनुष्यका स्थान सबसे ऊँचा है ॥
अतः परं तमोत्पत्तिं शृणु देवि समाहिता ।
द्विविधं हि तमो लोके शार्वरं देहजं तथा ॥
देवि! अब एकाग्रचित्त होकर तमकी उत्पत्ति सुनो । लोकमें दो प्रकारका तम बताया गया है— रात्रिका और देहजनित ॥
ज्योतिर्भिश्च तमो लोके नाशं गच्छति शार्वरम् ।
देहजं तु तमो लोके तैः समस्तैर्न शाम्यति ॥
लोकमें ज्योति या तेजके द्वारा रात्रिका अन्धकार नष्ट हो जाता है; परंतु जो देहजनित तम है, वह सम्पूर्ण ज्योतियोंके प्रकाशित होनेपर भी नहीं शान्त होता ॥
तमसस्तस्य नाशार्थं नोपायमधिजग्मिवान् ।
तपश्चचार विपुलं लोककर्ता पितामहः ॥
लोककर्ता पितामह ब्रह्माजीको जब उस तमका नाश करनेके लिये कोई उपाय नहीं सूझा, तब वे बड़ी भारी तपस्या करने लगे ॥
चरतस्तु समुद्भूता वेदाः साङ्गाः सहोत्तराः ।
ताँल्लब्ध्वा मुमुदे ब्रह्मा लोकानां हितकाम्यया ॥
देहजं तत् तमो घोरं वेदैरेव विनाशितम् ॥
तपस्या करते समय उनके मुखसे छहों अंगों और उपनिषदोंसहित चारों वेद प्रकट हुए । उन्हें पाकर ब्रह्माजी बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने लोकोंके हितकी कामनासे वेदोंके ज्ञानद्वारा ही उस देहजनित घोर तमका नाश किया ॥
कार्याकार्यमिदं चेति वाच्यावाच्यमिदं त्विति ।
यदि चेन्न भवेल्लोके श्रुतं चारित्रदैशिकम् ॥
पशुभिर्निर्विशेषं तु चेष्टन्ते मानुषा अपि ॥
यह वेदज्ञान कर्तव्य और अकर्तव्यकी शिक्षा देनेवाला है, वाच्य और अवाच्यका बोध करानेवाला है । यदि संसारमें सदाचारकी शिक्षा देनेवाली श्रुति न हो तो मनुष्य भी पशुओंके समान ही मनमानी चेष्टा करने लगें ॥
यज्ञादीनां समारम्भः श्रुतेनैव विधीयते ।
यज्ञस्य फलयोगेन देवलोकः समृद्ध्यते ॥
वेदोंके द्वारा ही यज्ञ आदि कर्मोंका आरम्भ किया जाता है । यज्ञफलके संयोगसे देवलोककी समृद्धि बढ़ती है ॥
प्रीतियुक्ताः पुनर्देवा मानुषाणां भवन्त्युत ।
एवं नित्यं प्रवर्धेते रोदसी च परस्परम् ॥
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इससे देवता मनुष्योंपर प्रसन्न होते हैं । इस प्रकार पृथ्वी और स्वर्गलोक दोनों एक-दूसरेकी उन्नतिमें सदा सहयोगी होते हैं ॥
लोकसंधारणं तस्माच्छ्रुतमित्यवधारय ।
ज्ञानाद् विशिष्टं जन्तूनां नास्ति लोकत्रयेऽपि च ॥
अतः तुम यह अच्छी तरह समझ लो कि वेद ही धर्मकी प्रवृत्तिद्वारा सम्पूर्ण जगत्को धारण करनेवाला है । जीवोंके लिये इस त्रिलोकीमें ज्ञानसे बढ़कर दूसरी कोई वस्तु नहीं है ॥
सम्प्रगृह्य श्रुतं सर्वं कृतकृत्यो भवत्युत ।
उपर्युपरि मर्त्यानां देववत् सम्प्रकाशते ॥
सम्पूर्ण वेदोंका यथार्थ ज्ञान प्राप्त करके द्विज कृतकृत्य हो जाता है और साधारण मनुष्योंकी अपेक्षा ऊँची स्थितिमें पहुँचकर देवताके समान प्रकाशित होने लगता है ॥
कामं क्रोधं भयं दर्पमज्ञानं चैव बुद्धिजम् ।
तच्छ्रुतं नुदति क्षिप्रं यथा वायुर्बलाहकान् ॥
जैसे हवा बादलोंको उड़ाकर छिन्न - भिन्न कर देती है, उसी प्रकार वेदशास्त्रजनित ज्ञान काम, क्रोध, भय, दर्प और बौद्धिक अज्ञानको भी शीघ्र ही दूर कर देता है ॥
अल्पमात्रं कृतो धर्मो भवेज्ज्ञानवता महान् ।
महानपि कृतो धर्मो ह्यज्ञानान्निष्फलो भवेत् ॥
ज्ञानवान् पुरुषके द्वारा किया हुआ थोड़ा-सा धर्म भी महान् बन जाता है और अज्ञानपूर्वक किया हुआ महान् धर्म भी निष्फल हो जाता है ॥ उमोवाच
भगवन् मानुषाः केचिज्जातिस्मरणसंयुताः ।
किमर्थमभिजायन्ते जानन्तः पौर्वदैहिकम् ॥
उमाने पूछा- भगवन्! कुछ मनुष्योंको पूर्वजन्म की बातोंका स्मरण होता है । वे किसलिये पूर्व शरीरके वृत्तान्तको जानते हुए जन्म लेते हैं? ॥ श्रीमहेश्वर उवाच तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु तत्त्वं समाहिता ॥
ये'मृताः सहसा मर्त्या जायन्ते सहसा पुनः ।
तेषां पौराणिकोऽभ्यासः कंचिद् कालं हि तिष्ठति ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— देवि! मैं तुम्हें तत्त्वकी बात बता रहा हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो । जो मनुष्य सहसा मृत्युको प्राप्त होकर फिर कहीं सहसा जन्म ले लेते हैं, उनका पुराना अभ्यास या संस्कार कुछ कालतक बना रहता है ॥ तस्माज्जातिस्मरा लोके जायन्ते बोधसंयुताः ।
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तेषां विवर्धतां संज्ञा स्वप्नवत् सा प्रणश्यति ॥ परलोकस्य चास्तित्वे मूढानां कारणं त्विदम् ॥ इसलिये वे लोकमें पूर्वजन्मकी बातोंके ज्ञानसे युक्त होकर जन्म लेते हैं और जातिस्मर ( पूर्वजन्मका स्मरण करनेवाले ) कहलाते हैं । फिर ज्यों-ज्यों वे बढ़ने लगते हैं, त्यों- त्यों उनकी स्वप्न -जैसी वह पुरानी स्मृति नष्ट होने लगती है । ऐसी घटनाएँ मूर्ख मनुष्योंको परलोककी सत्तापर विश्वास करानेमें कारण बनती हैं ॥ उमोवाच
भगवन् मानुषाः केचिन्मृता भूत्वापि सम्प्रति ।
निवर्तमाना दृश्यन्ते देहेष्वेव पुनर्नराः ॥
उमाने पूछा— भगवन्! कई मनुष्य मरनेके बाद भी फिर उसी शरीरमें लौटते देखे जाते हैं । इसका क्या कारण है? ॥ श्रीमहेश्वर उवाच तदहं ते प्रवक्ष्यामि कारणं शृणु शोभने ।
प्राणैर्वियुज्यमानानां बहुत्वात् प्राणिनां क्षये ।
तथैव नामसामान्याद् यमदूता नृणां प्रति ॥
वहन्ति ते क्वचिन्मोहादन्यं मर्त्यं तु धार्मिकाः ।
निर्विकारं हि तत् सर्वं यमो वेद कृताकृतम् ॥
श्रीमहेश्वरने कहा— शोभने! वह कारण मैं बताता हूँ, सुनो । प्राणी बहुत हैं और मृत्युकाल आनेपर सभीका अपने प्राणोंसे वियोग हो जाता है । धार्मिक यमदूत कभी - कभी कई मनुष्योंके एक ही नाम होनेके कारण मोहवश एकके बदले दूसरेको पकड़ ले जाते हैं, परंतु यमराज निर्विकार भावसे दूतोंके द्वारा किये गये और नहीं किये गये, सभी कार्योंको जानते हैं ॥
तस्मात् संयमनीं प्राप्य यमेनैकेन मोक्षिताः ।
पुनरेवं निवर्तन्ते शेषं भोक्तुं स्वकर्मणः ॥
स्वकर्मण्यसमाप्ते तु निवर्तन्ते हि मानवाः ॥
अतः संयमनीपुरीमें जानेपर भूलसे गये हुए मनुष्यको एकमात्र यमराज फिर छोड़ देते हैं; अतः वे अपने प्रारब्ध कर्मका शेष भाग भोगनेके लिये पुनः लौट आते हैं । वे ही मनुष्य लौटते हैं, जिनका कर्म- भोग समाप्त नहीं हुआ होता है ॥ उमोवाच
भगवन् सुप्तमात्रेण प्राणिनां स्वप्नदर्शनम् ।
किं तत् स्वभावमन्यद् वा तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
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उमाने पूछा- भगवन्! सोनेमात्रसे प्राणियोंको स्वप्नका दर्शन होने लगता है । यह उनका स्वभाव है, या और कोई बात है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ श्रीमहेश्वर उवाच
सुप्तानां तु मनश्चेष्टा स्वप्न इत्यभिधीयते ।
अनागतमतिक्रान्तं पश्यते संचरन्मनः ॥
श्रीमहेश्वरने कहा — प्रिये! सोये हुए प्राणियोंके मनकी जो चेष्टा है, उसीको स्वप्न कहते हैं । स्वप्नमें विचरता हुआ मन भूत और भविष्यकी घटनाओंको देखता है ॥
निमित्तं च भवेत् तस्मात् प्राणिनां स्वप्नदर्शनम् ।
एतत् ते कथितं देवि भूयः श्रोतुं किमिच्छसि ॥
अतः उन घटनाओंके देखनेमें प्राणियोंके लिये स्वप्नदर्शन निमित्त बनता है । देवि! तुम्हें स्वप्नका विषय बताया गया, अब और क्या सुनना चाहती हो? ॥ उमोवाच
भगवन् सर्वभूतेश लोके कर्मक्रियापथे ।
दैवात् प्रवर्तते सर्वमिति केचिद् व्यवस्थिताः ॥
उमाने कहा – भगवन्! सर्वभूतेश्वर! जगत्में दैवकी प्रेरणासे ही सबकी कर्ममार्गमें
प्रवृत्ति होती है । ऐसी कुछ लोगोंकी मान्यता है ॥
अपरे चेष्टया चेति दृष्ट्वा प्रत्यक्षतः क्रियाम् ।
पक्षभेदे द्विधा चास्मिन् संशयस्थं मनो मम ॥
तत्त्वं वद महादेव श्रोतुं कौतूहलं हि मे ॥
दूसरे लोग क्रियाको प्रत्यक्ष देखकर ऐसा मानते हैं कि चेष्टासे ही सबकी प्रवृत्ति होती है, दैवसे नहीं । ये दो पक्ष हैं । इनमें मेरा मन संशयमें पड़ जाता है; अतः महादेव! यथार्थ बात बताइये । इसे सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल हो रहा है ॥ श्रीमहेश्वर उवाच तदहं ते प्रवक्ष्यामि शृणु तत्त्वं समाहिता । श्रीमहेश्वरने कहा — देवि! मैं तुम्हें तत्त्वकी बात बता रहा हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो ॥
लक्ष्यते द्विविधं कर्म मानुषेष्वेव तच्छृणु ।
पुराकृतं तयोरेकमैहिकं त्वितरत् तथा ॥
मनुष्योंमें दो प्रकारका कर्म देखा जाता है, उसे सुनो । इनमें एक तो पूर्वकृत कर्म है और दूसरा इहलोकमें किया गया है ॥
लौकिकं तु प्रवक्ष्यामि देवमानुषनिर्मितम् ।
कृषौ तु दृश्यते कर्म कर्षणं वपनं तथा ॥
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रोपणं चैव लवनं यच्चान्यत् पौरुषं स्मृतम् ।
दैवादसिद्धिश्च भवेद् दुष्कृतं चास्ति पौरुषे ॥
अब मैं देव और मनुष्य दोनोंसे सम्पादित होनेवाले लौकिक कर्मका वर्णन करता हूँ । कृषिमें जो जुताई, बोवाई, रोपनी, कटनी तथा ऐसे ही और भी जो कार्य देखे जाते हैं, वे सब मानुष कहे गये हैं । दैवसे उस कर्ममें सफलता और असफलता होती है । मानुष कर्ममें बुराई भी सम्भव है ॥
सुयत्नाल्लभ्यते कीर्तिर्दुर्यत्नादयशस्तथा ।
एवं लोकगतिर्देवि आदिप्रभृति वर्तते ॥
उत्तम प्रयत्न करनेसे कीर्ति प्राप्त होती है और बुरे उपायोंके अवलम्बनसे अपयश ।
देवि! आदिकालसे ही जगत्की ऐसी ही अवस्था है ॥
रोपणं चैव लवनं यच्चान्यत् पौरुषं स्मृतम् ॥
काले वृष्टिः सुवापं च प्ररोहः पंक्तिरेव च ।
एवमादि तु यच्चान्यत् तद् दैवतमिति स्मृतम् ॥
बीजका रोपना और काटना आदि मनुष्यका काम है; परंतु समयपर वर्षा होना, बोवाईका सुन्दर परिणाम निकलना, बीजमें अंकुर उत्पन्न होना और शस्यका श्रेणीबद्ध होकर प्रकट होना इत्यादि कार्य देवसम्बन्धी बताये गये हैं। दैवकी अनुकूलतासे ही इन कार्योंका सम्पादन होता है ॥
पञ्चभूतस्थितिश्चैव ज्योतिषामयनं तथा ।
अबुद्धिगम्यं यन्मर्त्यैर्हेतुभिर्वा न विद्यते ॥
तादृशं कारणं दैवं शुभं वा यदि वेतरत् ।
यादृशं चात्मना शक्यं तत् पौरुषमिति स्मृतम् ॥
पंचभूतोंकी स्थिति, ग्रहनक्षत्रोंका चलना-फिरना तथा जहाँ मनुष्योंकी बुद्धि न पहुँच सके अथवा किन्हीं कारणों या युक्तियोंसे भी समझमें न आ सके –ऐसा कर्म शुभ हो या अशुभ दैव माना जाता है और जिस बातको मनुष्य स्वयं कर सके, उसे पौरुष कहा गया है ॥
केवलं फलनिष्पत्तिरेकेन तु न शक्यते ।
पौरुषेणैव दैवेन युगपद् ग्रथितं प्रिये ॥
केवल दैव या पुरुषार्थसे फलकी सिद्धि नहीं होती । प्रिये! प्रत्येक वस्तु या कार्य एक ही साथ पुरुषार्थ और दैव दोनोंसे ही गुँथा हुआ है ॥
तयोः समाहितं कर्म शीतोष्णं युगपत् तथा ।
पौरुषं तु तयोः पूर्वमारब्धव्यं विजानता ॥
आत्मना तु न शक्यं हि तथा कीर्तिमवाप्नुयात् ॥
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दैव और पुरुषार्थ दोनोंके समानकालिक सहयोगसे कर्म सम्पन्न होता है । जैसे एक ही कालमें सर्दी और गर्मी दोनों होती हैं, उसी प्रकार एक ही समय दैव और पुरुषार्थ दोनों काम करते हैं । इन दोनोंमें जो पुरुषार्थ है, उसका आरम्भ विज्ञ पुरुषको पहले करना चाहिये । जो अपने - आप होना सम्भव नहीं है, उसको आरम्भ करनेसे मनुष्य कीर्तिका भागी होता है ॥
खननान्मथनाल्लोके जलाग्निप्रापणं तथा ।
तथा पुरुषकारे तु दैवसम्पत् समाहिता ॥
जैसे लोकमें भूमि खोदनेसे जल तथा काष्ठका मन्थन करनेसे अग्निकी प्राप्ति होती है, उसी प्रकार पुरुषार्थ करनेपर दैवका सहयोग स्वतः प्राप्त हो जाता है ॥
नरस्याकुर्वतः कर्म दैवसम्पन्न लभ्यते ।
तस्मात् सर्वसमारम्भो दैवमानुषनिर्मितः ॥
जो मनुष्य कर्म नहीं करता, उसको दैवी सहायता नहीं प्राप्त होती; अतः समस्त कार्योंका आरम्भ दैव और पुरुषार्थ दोनोंपर निर्भर है ॥ उमोवाच
भगवन् सर्वलोकेश लोकनाथ वृषध्वज ।
नास्त्यात्मा कर्मभोक्तेति मृतो जन्तुर्न जायते ॥
उमाने पूछा — भगवन्! सर्वलोकेश्वर! लोकनाथ! वृषध्वज! कर्मोंका फल भतोनेवाले जीवात्मा नामक किसी द्रव्यकी सत्ता नहीं है; इसलिये मरा हुआ जीव फिर जन्म नहीं लेता है ॥
स्वभावाज्जायते सर्वं यथा वृक्षफलं तथा ।
यथोर्मयः सम्भवन्ति तथैव जगदाकृतिः ॥
जैसे वृक्षसे फल पैदा होता है, उसी प्रकार स्वभावसे ही सब कुछ उत्पन्न होता है और जैसे समुद्रसे लहरें प्रकट होती हैं, उसी प्रकार स्वभावसे ही जगत्की आकृति प्रकट होती है ॥
तपोदानानि यत् कर्म तत्र तद् दृश्यते वृथा ।
नास्ति पौनर्भवं जन्म इति केचिद् व्यवस्थिताः ॥
तप और दान आदि जो कर्म हैं, वे सब व्यर्थ दिखायी देते हैं, किंतु जीवात्माका
पुनर्जन्म नहीं होता है । ऐसी कुछ लोगोंकी मान्यता है ॥
परोक्षवचनं श्रुत्वा न प्रत्यक्षस्य दर्शनात् ।
तत् सर्वं नास्ति नास्तीति संशयस्थास्तथा परे ॥
पक्षभेदान्तरे चास्मिंस्तत्त्वं मे वक्तुमर्हसि ।
उक्तं भगवता यत् तु तत् तु लोकस्य संस्थितिः ॥
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शास्त्रोंके परोक्षवादी वचन सुनकर और प्रत्यक्ष दर्शन न होनेसे कितने ही लोग इस संशयमें पड़े रहते हैं कि वह सब ( परलोक ) नहीं है, नहीं है । इस पक्षभेदके भीतर यथार्थवाद क्या है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें । भगवन्! आपने जो कुछ बताया है, वही लोककी स्थिति है ॥ नारद उवाच
प्रश्नमेतत् तु पृच्छन्त्या रुद्राण्या परिषत् तदा ।
कौतूहलता श्रोतुं समाहितमनाभवत् ॥
नारदजी कहते हैं –रुद्राणीके यह प्रश्न उपस्थित करनेपर सारी मुनिमण्डली एकाग्रचित्त होकर इसका उत्तर सुननेके लिये उत्कण्ठित हो गयी ॥ श्रीमहेश्वर उवाच
नैतदस्ति महाभागे यद् वदन्तीह नास्तिकाः ।
एतदेवाभिशस्तानां श्रुतविद्वेषिणां मतम् ॥
श्रीमहेश्वरने कहा – महाभागे! इस विषयमें नास्तिक लोग जो कुछ कहते हैं, वह ठीक नहीं है । यह तो कलंकित शास्त्रद्रोही पुरुषोंका मत है ॥
सर्वमर्थं श्रुतं दृष्टं यत् प्रागुक्तं मया तव ।
तदाप्रभृति मर्त्यानां श्रुतमाश्रित्य पण्डिताः ॥
कामान् संछिद्य परिघान् धृत्या वै परमासनाः ।
अभियान्त्येव ते स्वर्गं पश्यन्तः कर्मणः फलम् ॥
मैंने पहले तुमसे जो कुछ कहा है, वह सारा विषय शास्त्रसम्मत तथा अनुभूत है । तभीसे मनुष्योंमें जो विद्वान् पुरुष हैं, वे वेद - शास्त्रका आश्रय ले परिघ - जैसी कामनाओंका उच्छेद करके धैर्यपूर्वक उत्तम आसन लगाये ध्यानमग्न रहते हैं, वे कर्मोंका फल प्रत्यक्ष देखते हुए स्वर्ग ( ब्रह्म ) लोकको ही जाते हैं ॥
एवं श्रद्धाभवं लोके परतः सुमहत् फलम् ।
बुद्धिः श्रद्धा च विनयः करणानि हितैषिणाम् ॥
इस प्रकार परलोकमें श्रद्धाजनित महान् फलकी प्राप्ति होती है । जो अपना हित चाहते हैं, उन पुरुषोंके लिये बुद्धि, श्रद्धा और विनय –ये कारण ( उन्नतिके साधन ) हैं ॥
तस्मात् स्वर्गाभिगन्तारः कतिचित् त्वभवन् नराः ।
अन्ये करणहीनत्वान्नास्तिक्यं भावमाश्रिताः ॥
अतः कुछ ही लोग उक्त साधनसे सम्पन्न होनेके कारण स्वर्ग आदि पुण्यलोकोंमें जाते हैं । दूसरे लोग उन साधनोंसे हीन होनेके कारण नास्तिकभावका अवलम्बन लेते हैं ॥
श्रुतविद्वेषिणो मूर्खा नास्तिकादृढनिश्चयाः ।
निष्क्रियास्तु निरन्नादाः पतन्त्येवाधमां गतिम् ॥