श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 1291–1300

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1291–1300

पृष्ठ 1291

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वेदविद्वेषी मूर्ख, नास्तिक, अदृढ़निश्चयवाले, क्रियाहीन तथा अन्नार्थियोंको बिना कुछ दिये ही घरसे निकाल देनेवाले पापी मनुष्य अधम गतिको प्राप्त होते हैं ॥

नास्त्यस्तीति पुनर्जन्म कवयोऽप्यत्र मोहिताः ।

नाधिगच्छन्ति तन्नित्यं हेतुवादशतैरपि ॥

पुनर्जन्म नहीं होता है या होता है, इस विषयमें बड़े - बड़े विद्वान् मोहित हो जाते हैं । वे सैकड़ों युक्तिवादोंद्वारा भी उसे सर्वथा नहीं समझ पाते हैं ॥

एषा ब्रह्मकृता माया दुर्विज्ञेया सुरासुरैः ।

किं पुनर्मानवैर्लोके ज्ञातुकामैः कुबुद्धिभिः ॥

यह ब्रह्माजीके द्वारा रची माया है, जिसे देवता और असुर भी बड़ी कठिनाईसे समझ पाते हैं; फिर दूषित बुद्धिवाले मानव यदि लोकमें इस विषयको जानना चाहें तो कैसे जान सकते हैं ॥

केवलं श्रद्धया देवि श्रुतिमात्रनिविष्टया ।

ततोऽस्तीत्येव मन्तव्यं तथा हितमवाप्नुयात् ॥

देवि! केवल वेदमें पूर्णतः श्रद्धा करके ' परलोक एवं पुनर्जन्म होता है' ऐसा मानना चाहिये । इससे आस्तिक मनुष्यका हित होता है ॥

दैवगुह्येषु चान्येषु हेतुर्देवि निरर्थकः ।

बधिरान्धवदेवात्र वर्तितव्यं हितैषिणा ॥

एतत् ते कथितं देवि ऋषिगुह्यं प्रजाहितम् ॥

देवि! देवसम्बन्धी जो दूसरे- दूसरे गुह्य विषय हैं, उनमें युक्तिवाद काम नहीं देता । जो अपना हित चाहनेवाले हैं, उन्हें इस विषयमें अन्धे और बहरेके समान बर्ताव करना चाहिये । अर्थात् नास्तिकोंकी ओर न तो देखे और न उनकी बातें ही सुने । देवि! यह ऋषियोंके लिये गोपनीय तथा प्रजाके लिये हितकर विषय तुम्हें बताया गया है ॥ (दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त )

पृष्ठ 1292

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[ यमलोक तथा वहाँके मार्गोंका वर्णन, पापियोंकी नरकयातनाओं तथा कर्मानुसार विभिन्न योनियोंमें उनके जन्मका उल्लेख ] उमोवाच

भगवन् सर्वलोकेश त्रिपुरार्दन शंकर ।

कीदृशा यमदण्डास्ते कीदृशाः परिचारकाः ॥

उमाने पूछा— भगवन्! सर्वलोकेश्वर! त्रिपुरनाशन! शंकर! यमदण्ड कैसे होते हैं? तथा यमराजके सेवक किस तरहके होते हैं? ॥

कथं मृतास्ते गच्छन्ति प्राणिनो यमसादनम् ।

कीदृशं भवनं तस्य कथं दण्डयति प्रजाः ॥

एतत् सर्वं महादेव श्रोतुमिच्छाम्यहं प्रभो ॥

मृत प्राणी यमलोकको कैसे जाते हैं? यमराजका भवन कैसा है? तथा वे प्रजावर्गको किस तरह दण्ड देते हैं? प्रभो! महादेव! मैं यह सब सुनना चाहती हूँ ॥ श्रीमहेश्वर उवाच

शृणु कल्याणि तत् सर्वं यत् ते देवि मनः प्रियम् ।

दक्षिणस्यां दिशि शुभे यमस्य सदनं महत् ॥

श्रीमहेश्वरने कहा— कल्याणि! देवि! तुम्हारे मनमें जो- जो पूछने योग्य बातें हैं, उन सबका उत्तर सुनो । शुभे! दक्षिणदिशामें यमराजका विशाल भवन है ॥

विचित्रं रमणीयं च नानाभावसमन्वितम् ।

पितृभिः प्रेतसंघैश्च यमदूतैश्च संततम् ॥

वह बहुत ही विचित्र, रमणीय एवं नाना प्रकारके भावोंसे युक्त है । पितरों, प्रेतों और यमदूतोंसे व्याप्त है ॥

प्राणिसंघैश्च बहुभिः कर्मवश्यैश्च पूरितम् ।

तत्रास्ते दण्डयन् नित्यं यमो लोकहिते रतः ॥

कर्मोंके अधीन हुए बहुत - से प्राणियोंके समुदाय उस यमलोकको भरे हुए हैं । वहाँ लोकहितमें तत्पर रहनेवाले यम पापियोंको सदा दण्ड देते हुए निवास करते हैं ॥

मायया सततं वेत्ति प्राणिनां यच्छुभाशुभम् ।

मायया संहरंस्तत्र प्राणिसङ्घान् यतस्ततः ॥

वे अपनी मायाशक्तिसे ही सदा प्राणियोंके शुभाशुभ कर्मको जानते हैं और मायाद्वारा ही जहाँ- तहाँसे प्राणि- समुदायका संहार कर लाते हैं ॥

तस्य मायामयाः पाशा न वेद्यन्ते सुरासुरैः ।

को हि मानुषमात्रस्तु देवस्य चरितं महत् ॥

पृष्ठ 1293

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उनके मायामय पाश हैं, जिन्हें न देवता जानते हैं, न असुर । फिर मनुष्योंमें कौन ऐसा है, जो उन यमदेवके महान् चरित्रको जान सके ॥

एवं संवसतस्तस्य यमस्य परिचारकाः ।

गृहीत्वा संनयन्त्येव प्राणिनः क्षीणकर्मणः ॥

इस प्रकार यमलोकमें निवास करते हुए यमराजके दूत जिनके प्रारब्धकर्म क्षीण हो गये हैं, उन प्राणियोंको पकड़कर उनके पास ले जाते हैं ॥

येन केनापदेशेन त्वपदेशस्तदुद्भवः ।

कर्मणा प्राणिनो लोके उत्तमाधममध्यमाः ॥

यथार्हं तान् समादाय नयन्ति यमसादनम् । जिस किसी निमित्तसे वे प्राणियोंको ले जाते हैं, वह निमित्त वे स्वयं बना लेते हैं । जगत्में कर्मानुसार उत्तम, मध्यम और अधम तीन प्रकारके प्राणी होते हैं । यथायोग्य उन सभी प्राणियोंको लेकर वे यमलोकमें पहुँचाते हैं ॥ धार्मिकानुत्तमान् विद्धि स्वर्गिणस्ते यथामराः ॥ नृषु जन्म लभन्ते ये कर्मणा मध्यमाः स्मृताः । धार्मिक पुरुषोंको उत्तम समझो । वे देवताओंके समान स्वर्गके अधिकारी होते हैं । जो अपने कर्मके अनुसार मनुष्योंमें जन्म लेते हैं, वे मध्यम माने गये हैं ॥ तिर्यङ्नरकगन्तारो ह्यधमास्ते नराधमाः ॥

पन्थानस्त्रिविधा दृष्टाः सर्वेषां गतजीविनाम् ।

रमणीयं निराबाधं दुर्दर्शमिति नामतः ॥

जो नराधम पशु- पक्षियोंकी योनि तथा नरकमें जानेवाले हैं, वे अधमकोटिके अन्तर्गत हैं । सभी मरे हुए प्राणियोंके लिये तीन प्रकारके मार्ग देखे गये हैं -एक रमणीय, दूसरा निराबाध और तीसरा दुर्दर्श ॥

रमणीयं तु यन्मार्गं पताकाध्वजसंकुलम् ।

धूपितं सिक्तसम्मृष्टं पुष्पमालाभिसंकुलम् ॥

मनोहरं सुखस्पर्शं गच्छतामेव तद् भवेत् ।

निराबाधं यथालोकं सुप्रशस्तं कृतं भवेत् ॥

जो रमणीय मार्ग है, वह ध्वजा- पताकाओंसे सुशोभित और फूलोंकी मालाओंसे अलंकृत है । उसे झाड़ - बुहारकर उसके ऊपर जलका छिड़काव किया गया होता है । वहाँ धूपकी सुगन्ध छायी रहती है । उसका स्पर्श चलनेवालोंके लिये सुखद और मनोहर होता है । निराबाध वह मार्ग है, जो लौकिक मार्गोंके समान सुन्दर एवं प्रशस्त बनाया गया है । वहाँ किसी प्रकारकी बाधा नहीं होती ॥

तृतीयं यत् तु दुर्दर्शं दुर्गन्धितमसावृतम् ।

परुषं शर्कराकीर्णं श्वदंष्ट्राबहुलं भृशम् ॥

पृष्ठ 1294

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कृमिकीटसमाकीर्णं भजतामतिदुर्गमम् । जो तीसरा मार्ग है, वह देखनेमें भी दुःखद होनेके कारण दुर्दर्श कहलाता है । वह दुर्गन्धयुक्त एवं अन्धकार से आच्छन्न है । कंकड़- पत्थरोंसे व्याप्त और कठोर जान पड़ता है । वहाँ कुत्ते और दाढ़ोंवाले हिंसक जन्तु अधिक रहते हैं । कृमि और कीट सब ओर छाये रहते हैं । उस मार्गसे चलनेवालोंको वह अत्यन्त दुर्गम प्रतीत होता है ॥ मार्गेरेवं त्रिभिर्नित्यमुत्तमाधममध्यमान् ॥ संनयन्ति यथा काले तन्मे शृणु शुचिस्मिते । शुचिस्मिते! इस प्रकार तीन मार्गोंद्वारा वे सदा यथासमय उत्तम, मध्यम और अधम पुरुषोंको जिस प्रकार ले जाते हैं, वह मुझसे सुनो ॥

उत्तमानन्तकाले तु यमदूताः सुसंवृताः ।

नयन्ति सुखमादाय रमणीयपथेन वै ॥

उत्तम पुरुषोंको अन्तके समय ले जानेके लिये जो यमदूत आते हैं, वे सुन्दर वस्त्राभूषणोंसे विभूषित होते हैं और उन पुरुषोंको साथ ले रमणीय मार्गद्वारा सुखपूर्वक ले जाते हैं ॥ मध्यमान् योधवेषेण मध्यमेन पथा तथा ॥

चण्डालवेषास्त्वधमान् गृहीत्वा भर्त्सतर्जनैः ।

आकर्षन्तस्तथा पाशैर्दुर्दर्शेन नयन्ति तान् ॥

त्रिविधानेवमादाय नयन्ति यमसादनम् ॥

मध्यमकोटिके प्राणियोंको मध्यम मार्गके द्वारा योद्धाका वेष धारण किये हुए यमदूत अपने साथ ले जाते हैं तथा चाण्डालका वेष धारण करके अधमकोटिके प्राणियोंको पकड़कर उन्हें डाँटते - फटकारते तथा पाशोंद्वारा बाँधकर घसीटते हुए दुर्दर्श नामक मार्गसे ले जाते हैं । इस प्रकार त्रिविध प्राणियोंको लेकर वे उन्हें यमलोकमें पहुँचाते हैं ॥

धर्मासनगतं दक्षं भ्राजमानं स्वतेजसा ।

लोकपालं सभाध्यक्षं तथैव परिषद्गतम् ॥

दर्शयन्ति महाभागे यामिकास्तं निवेद्य ते । महाभागे! वहाँ धर्मके आसनपर अपने तेजसे प्रकाशित होते हुए अपनी सभाके सभापतिके रूपमें चतुर लोकपाल यम बैठे होते हैं । यमदूत उन्हें सूचना देकर अपने साथ लाये हुए प्राणीको दिखाते हैं ॥

पूजयन् दण्डयन् कांश्चित् तेषां शृण्वन् शुभाशुभम् ।

व्यावृतो बहुसाहस्रैस्तत्रास्ते सततं यमः ॥

यमराज कई सहस्र सदस्योंसे घिरे हुए अपनी सभामें विराजमान होते हैं । वे वहाँ आये हुए प्राणियोंके शुभाशुभ कर्मोंका ब्यौरेवार वर्णन सुनकर उनमेंसे किन्हींका आदर करते हैं और किन्हींको दण्ड देते हैं ॥

पृष्ठ 1295

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गतानां तु यमस्तेषामुत्तमानभिपूजयेत् ।

अभिसंगृह्य विधिवत् पृष्ट्वा स्वागतकौशलम् ॥

यमलोकमें गये हुए प्राणियोंमेंसे जो उत्तम होते हैं, उन्हें विधिपूर्वक अपनाकर स्वागतपूर्वक उनका कुशल- समाचार पूछकर यमराज उनकी पूजा करते हैं ॥

प्रस्तुत्य तत् कृतं तेषां लोकं संदिशते यमः ।

यमेनैवमनुज्ञाता यान्ति पश्चात् त्रिविष्टपम् ॥

उनके सत्कर्मोंकी भूरि- भूरि प्रशंसा करके यमराज उन्हें यह संदेश देते हैं कि ‘ आपको अमुक पुण्य लोकमें जाना है । ' यमराजकी ऐसी आज्ञा पानेके पश्चात् वे स्वर्गलोकमें जाते हैं ॥

मध्यमानां यमस्तेषां श्रुत्वा कर्म यथातथम् ।

जायन्तां मानुषेष्वेव इति संदिशते च तान् ॥

मध्यम कोटिके पुरुषोंके कर्मोंका यथावत् वर्णन सुनकर यमराज उनके लिये यह आज्ञा देते हैं कि ' ये लोग फिर मनुष्योंमें ही जन्म लें' ॥

अधमान् पाशसंयुक्तान् यमो नावेक्षते गतान् ।

यमस्य पुरुषा घोराश्चण्डालसमदर्शनाः ॥

यातनाः प्रापयन्त्येताँल्लोकपालस्य शासनात् ॥

पाशोंमें बँधे हुए जो अधम कोटिके प्राणी आते हैं, यमराज उनकी ओर आँख उठाकर देखते तक नहीं हैं । चाण्डालके समान दिखायी देनेवाले भयंकर यमदूत ही लोकपाल यमकी आज्ञासे उन पापियोंको यातनाके स्थानोंमें ले जाते हैं ॥

भिन्दन्तश्च तुदन्तश्च प्रकर्षन्तो यतस्ततः ।

क्रोशन्तः पातयन्त्येतान् मिथो गर्तेष्ववाङ्मुखान् ॥

वे उन्हें विदीर्ण किये डालते हैं, भाँति- भाँतिकी पीड़ाएँ देते हैं, जहाँ - तहाँ घसीटकर ले जाते हैं तथा उन्हें कोसते हुए नीचे मुँह करके नरकके गड्ढोंमें गिरा देते हैं ॥

संयामिन्यः शिलाश्चैषां पतन्ति शिरसि प्रिये ।

अयोमुखाः कङ्कवला भक्षयन्ति सुदारुणाः ॥

प्रिये! फिर उनके सिरपर ऊपरसे संयामिनी शिलाएँ गिरायी जाती हैं तथा लोहेकी - सी चोंचवाले अत्यन्त भयंकर कौए और बगुले उन्हें नोच खाते हैं ॥

असिपत्रवने घोरे चारयन्ति तथा परान् ।

तीक्ष्णदंष्ट्रास्तथा श्वानः कांश्चित् तत्र ह्यदन्ति वै ॥

दूसरे पापियोंको यमदूत घोर असिपत्रवनमें घुमाते हैं । वहाँ तीखी दाढ़ोंवाले कुत्ते कुछ पापियोंको काट खाते हैं ॥

तत्र वैतरणी नाम नदी ग्राहसमाकुला ।

दुष्प्रवेशा च घोरा च मूत्रशोणितवाहिनी ॥

पृष्ठ 1296

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यमलोकमें वैतरणी नामवाली एक नदी है, जो पानीकी जगह मूत और रक्त बहाती है । ग्राहोंसे भरी होनेके कारण वह बड़ी भयंकर जान पड़ती है । उसमें प्रवेश करना अत्यन्त कठिन है ॥

तस्यां सम्मज्जयन्त्येते तृषितान् पाययन्ति तान् ।

आरोपयन्ति वै कांश्चित् तत्र कण्टकशाल्मलीम् ॥

यमदूत इन पापियोंको उसी नदीमें डुबो देते हैं । प्यासे प्राणियोंको उस वैतरणीका ही जल पिलाते हैं । वहाँ कितने ही काँटेदार सेमलके वृक्ष हैं । यमदूत कुछ पापियोंको उन्हीं वृक्षोंपर चढ़ाते हैं ॥

यन्त्रचक्रेषु तिलवत् पीड्यन्ते तत्र केचन ।

अङ्गारेषु च दह्यन्ते तथा दुष्कृतकारिणः ॥

जैसे कोल्हूमें तिल पेरे जाते हैं, उसी प्रकार कितने ही पापी मशीनके चक्कोंमें पेरे जाते हैं । कितने ही अंगारोंमें डालकर जलाये जाते हैं ॥

कुम्भीपाकेषु पच्यन्ते पच्यन्ते सिकतासु वै ।

पाट्यन्ते तरुवच्छस्त्रैः पापिनः क्रकचादिभिः ॥

कुछ कुम्भीपाकोंमें पकाये जाते हैं, कुछ तपी हुई बालुकाओंमें भूने जाते हैं और कितने ही पापी आरे आदि शस्त्रोंद्वारा वृक्षकी भाँति चीरे जाते हैं ॥ भिद्यन्ते भागशः शूलैस्तुद्यन्ते सूक्ष्मसूचिभिः ॥

एवं त्वया कृतो दोषस्तदर्थं दण्डनं त्विति ।

वाचैवं घोषयन्ति स्म दण्डमानाः समन्ततः ॥

कितनोंके शूलोंद्वारा टुकड़े -टुकड़े कर दिये जाते हैं । कुछ पापियोंके शरीरोंमें महीन सूइयाँ चुभोयी जाती हैं । दण्ड देनेवाले यमदूत अपनी वाणीद्वारा सब ओर यह घोषित करते रहते हैं कि तूने अमुक पाप किया है, जिसके लिये यह दण्ड तुझे मिल रहा है ॥

एवं ते यातनां प्राप्य शरीरैर्यातनाशयैः ।

प्रसहन्तश्च तद् दुःखं स्मरन्तः स्वापराधजम् ॥

क्रोशन्तश्च रुदन्तश्च न मुच्यन्ते कथंचन ।

स्मरन्तस्तत्र तप्यन्ते पापमात्मकृतं भृशम् ॥

इस प्रकार यातनाधीन शरीरोंद्वारा यातना पाकर नारकी जीव उसके दुःखको सहते और अपने पापको स्मरण करते हुए चीखते- चिल्लाते एवं रोते रहते हैं, किंतु किसी तरह उस यातनासे छुटकारा नहीं पाते हैं । अपने किये हुए पापको याद करके वे अत्यन्त संतप्त हो उठते हैं ॥

एवं बहुविधा दण्डा भुज्यन्ते पापकारिभिः ।

यातनाभिश्च पच्यन्ते नरकेषु पुनः पुनः ॥

पृष्ठ 1297

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इस प्रकार पापाचारी प्राणियोंको नाना प्रकारके दण्ड भोगने पड़ते हैं । वे बारंबार नरकोंमें विविध यातनाओंद्वारा पकाये जाते हैं ॥ अपरे यातना भुक्त्वा मुच्यन्ते तत्र किल्बिषात् ॥

पापदोषक्षयकरा यातना संस्मृता नृणाम् ।

बहु तप्तं यथा लोहममलं तत् तथा भवेत् ॥

दूसरे लोग वहाँ यातनाएँ भोगकर उस पाप से मुक्त हो जाते हैं । जैसे अधिक तपाया हुआ लोहा निर्मल एवं शुद्ध हो जाता है, उसी प्रकार मनुष्योंको जो नरकोंमें यातनाएँ प्राप्त होती हैं, वे उनके पाप -दोषका विनाश करनेवाली मानी गयी हैं ॥ उमोवाच

भगवंस्ते कथं तत्र दण्ड्यन्ते नरकेषु वै ।

कति ते नरका घोराः कीदृशास्ते महेश्वर ॥

उमाने पूछा — भगवन्! महेश्वर! नरकोंमें पापियोंको किस प्रकार दण्ड दिया जाता है? वे भयानक नरक कितने और कैसे हैं? ॥ श्रीमहेश्वर उवाच

शृणु भामिनि तत् सर्वं पञ्चैते नरकाः स्मृताः ।

भूमेरधस्ताद् विहिता घोरा दुष्कृतकर्मणाम् ॥

श्रीमहेश्वरने कहा — भामिनि! तुमने जो पूछा है, वह सब सुनो । पापाचारी प्राणियोंके लिये भूमिके नीचे जो भयानक नरक बनाये गये हैं, वे मुख्यतः पाँच माने गये हैं ॥

प्रथमं रौरवं नाम शतयोजनमायतम् ।

तावत्प्रमाणविस्तीर्णं तामसं पापपीडितम् ॥

उनमें पहला रौरव नामक नरक है, जिसकी लंबाई सौ योजन है । उसकी चौड़ाई भी उतनी ही है । वह तमोमय नरक पापके कारण प्राप्त होनेवाली पीड़ाओंसे परिपूर्ण है ॥

भृशं दुर्गन्धि परुषं कृमिभिर्दारुणैर्युतम् ।

अतिघोरमनिर्देश्यं प्रतिकूलं ततस्ततः ॥

उससे बड़ी दुर्गन्ध निकलती है, वह कठोर नरक क्रूर स्वभाववाले कीटोंसे भरा हुआ है ।

वह अत्यन्त घोर, अवर्णनीय और सर्वथा प्रतिकूल है ॥

ते चिरं तत्र तिष्ठन्ति न तत्र शयनासने ।

कृमिभिर्भक्ष्यमाणाश्च विष्ठागन्धसमायुताः ॥

वे पापी उस नरकमें सुदीर्घकालतक खड़े रहते हैं । वहाँ सोने और बैठनेकी सुविधा नहीं है । विष्ठाकी दुर्गन्धमें सने हुए उन पापियोंको वहाँके कीड़े खाते रहते हैं ॥

एवं प्रमाणमुद्विग्ना यावत् तिष्ठन्ति तत्र ते ।

यातनाभ्यो दशगुणं नरके दुःखमिष्यते ॥

पृष्ठ 1298

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ऐसे विशाल नरकमें वे जबतक रहते हैं, उद्विग्न भावसे खड़े रहते हैं । साधारण यातनाओंकी अपेक्षा नरकमें दसगुना दुःख होता है ॥

तत्र चात्यन्तिकं दुःखमिष्यते च शुभेक्षणे ।

क्रोशन्तश्च रुदन्तश्च वेदनास्तत्र भुञ्जते ॥

शुभेक्षणे! वहाँ आत्यन्तिक दुःखकी प्राप्ति होती है । पापी जीव चीखते - चिल्लाते और रोते हुए वहाँकी यातनाएँ भोगते हैं ॥

भ्रमन्ति दुःखमोक्षार्थं ज्ञाता कश्चिन्न विद्यते ।

दुःखस्यान्तरमात्रं तु ज्ञानं वा न च लभ्यते ॥

वे दुःखोंसे छुटकारा पानेके लिये चारों ओर चक्कर काटते हैं; परंतु कोई भी उन्हें जाननेवाला वहाँ नहीं होता । उस दुःखमें तनिक भी अन्तर नहीं होता और न उसे छुड़ानेवाला ज्ञान ही उपलब्ध होता है ॥

महारौरवसंज्ञं तु द्वितीयं नरकं प्रिये ।

तस्माद् द्विगुणितं विद्धि माने दुःखे च रौरवात् ॥

प्रिये! दूसरे नरकका नाम है महारौरव | वह लंबाई, चौड़ाई और दुःखमें रौरवसे दूना बड़ा है ॥

तृतीयं नरकं तत्र कण्टकावनसंज्ञितम् ।

ततो द्विगुणितं तच्च पूर्वाभ्यां दुःखमानयोः ॥

महापातकसंयुक्ता घोरास्तस्मिन् विशन्ति हि ॥

वहाँ तीसरा नरक है कण्टकावन, जो दुःख और लंबाई - चौड़ाईमें पहलेके दोनों नरकोंसे दुगुना बड़ा है । उसमें घोर महापातकयुक्त प्राणी प्रवेश करते हैं ॥

अग्निकुण्डमिति ख्यातं चतुर्थं नरकं प्रिये ।

एतद् द्विगुणितं तस्माद् यथानिष्टसुखं तथा ॥

ततो दुःखं हि सुमहदमानुषमिति स्मृतम् ।

भुञ्जते तत्र तत्रैव दुःखं दुष्कृतकारिणः ॥

प्रिये! चौथा नरक अग्निकुण्डके नामसे विख्यात है । यह पहलेकी अपेक्षा दूना दुःख देनेवाला है । वहाँ महान् अमानुषिक दुःख भोगने पड़ते हैं । उन सभीमें पापाचारी प्राणी दुःख भोगते हैं ॥

पञ्चकष्टमिति ख्यातं नरकं पञ्चमं प्रिये ।

तत्र दुःखमनिर्देश्यं महाघोरं यथातथम् ॥

प्रिये! पाँचवें नरकका नाम पंचकष्ट है । वहाँ जो महाघोर दुःख प्राप्त होता है, उसका यथावत् वर्णन नहीं किया जा सकता ॥

पञ्चेन्द्रियैरसह्यत्वात् पञ्चकष्टमिति स्मृतम् ।

भुञ्जते तत्र तत्रैवं दुःखं दुष्कृतकारिणः ॥

पृष्ठ 1299

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पाँचों इन्द्रियोंसे असह्य होनेके कारण उसका नाम ' पंचकष्ट ' है । पापी पुरुष उन - उन नरकोंमें महान् दुःख भोगते हैं ॥

अमानुषार्हजं दुःखं महाभूतैश्च भुज्यते ।

अतिघोरं चिरं कृत्वा महाभूतानि यान्ति तम् ॥

वहाँ बड़े -बड़े जीव चिरकालतक अत्यन्त घोर अमानुषिक दुःख भोगते हैं और महान् भूतोंके समुदाय उस पापी पुरुषका अनुसरण करते हैं ॥

पञ्चकष्टेन हि समं नास्ति दुःखं तथा परम् ।

दुःखस्थानमिति प्राहुः पञ्चकष्टमिति प्रिये ॥

प्रिये! पंचकष्टके समान या उससे बढ़कर दुःख कोई नहीं है । पंचकष्टको समस्त दुःखोंका निवासस्थान बताया गया है ॥

एवं त्वेतेषु तिष्ठन्ति प्राणिनो दुःखभागिनः ।

अन्ये च नरकाः सन्त्यवीचिप्रमुखाः प्रिये ॥

इस प्रकार इन नरकोंमें दुःख भोगनेवाले प्राणी निवास करते हैं। प्रिये! इन नरकोंके सिवा और भी बहुत - से अवीचि आदि नरक हैं ।

क्रोशन्तश्च रुदन्तश्च वेदनार्ता भुशातुराः ।

केचिद् भ्रमन्तश्चेष्टन्ते केचिद् धावन्ति चातुराः ॥

वेदनासे पीड़ित हो अत्यन्त आतुर हुए नरकनिवासी जीव रोते - चिल्लाते रहते हैं । कोई चारों ओर चक्कर काटते हैं, कोई पृथ्वीपर पड़े - पड़े छटपटाते हैं और कोई आतुर होकर दौड़ते रहते हैं ॥

आधावन्तो निवार्यन्ते शूलहस्तैर्यतस्ततः ।

रुजार्दितास्तृषायुक्ताः प्राणिनः पापकारिणः ॥

कोई दौड़ते हुए प्राणी हाथमें त्रिशूल लिये हुए यमदूतोंद्वारा जहाँ- तहाँ रोके जाते हैं । वहाँ पापाचारी जीव रोगोंसे व्यथित और प्याससे पीड़ित रहते हैं ॥

यावत् पूर्वकृतं तावन्न मुच्यन्ते कथंचन ।

कृमिभिर्भक्ष्यमाणाश्च वेदनार्तास्तृषान्विताः ॥

जबतक पूर्वकृत पापका भोग शेष है, तबतक किसी तरह उन्हें नरकोंसे छुटकारा नहीं मिलता है । उनको कीड़े काटते रहते हैं तथा वे वेदनासे पीड़ित और प्याससे व्याकुल होते हैं ॥

संस्मरन्तः स्वकं पापं कृतमात्मापराधजम् ।

शोचन्तस्तत्र तिष्ठन्ति यावत् पापक्षयं प्रिये ॥

एवं भुक्त्वा तु नरकं मुच्यन्ते पापसंक्षयात् ॥

प्रिये! जबतक सारे पापोंका क्षय नहीं हो जाता तबतक वे अपने ही किये हुए अपराधजनित पापको याद करके वहाँ शोकमग्न होते रहते हैं । इस प्रकार नरक भोगकर

पृष्ठ 1300

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पापोंका नाश करनेके पश्चात् वे उस कष्टसे मुक्ता हो जाते हैं ॥ उमोवाच

भगवन् कति कालं ते तिष्ठन्ति नरकेषु वै ।

एतद् वेदितुमिच्छामि तन्मे ब्रूहि महेश्वर ॥

उमाने पूछा — भगवन्! महेश्वर! पापी जीव कितने समयतक नरकोंमें रहते हैं, यह मैं जानना चाहती हूँ? अतः मुझे बताइये ॥ श्रीमहेश्वर उवाच

शतवर्षसहस्राणामादिं कृत्वा हि जन्तवः ।

तिष्ठन्ति नरकावासाः प्रलयान्तमिति स्थितिः ॥

श्रीमहेश्वरने कहा – प्राणी अपने पापोंके अनुसार एक लाख वर्षोंसे लेकर महाप्रलयकालतक नरकोंमें निवास करते हैं, ऐसा शास्त्रोंका निश्चय है ॥ उमोवाच भगवंस्तेषु के तत्र तिष्ठन्तीति वद प्रभो ॥ उमाने पूछा— भगवन्! प्रभो! उन नरकोंमें किस- किस तरहके पापी निवास करते हैं? यह मुझे बताइये ॥ श्रीमहेश्वर उवाच रौरवे शतसाहस्रं वर्षाणामिति संस्थितिःT: 1 मानुषघ्नाः कृतघ्नाश्च तथैवानृतवादिनः ॥ श्रीमहेश्वरने कहा— रौरव नरकमें एक लाख वर्षोंतक रहनेका नियम है । उसमें मनुष्योंकी हत्या करनेवाले, कृतघ्न तथा असत्यवादी मनुष्य जाते हैं ॥

द्वितीये द्विगुणं कालं पच्यन्ते तादृशा नराः ।

महापातकयुक्तास्तु तृतीये दुःखमाप्नुयुः ॥

दूसरे नरक ( महारौरव)- में वैसे ही पापी मनुष्य दूने काल ( दो लाख वर्ष) तक पकाये जाते हैं । तीसरे ( कण्टकावन ) - में महापातकी मनुष्य कष्ट भोगते हैं ॥ चतुर्थे परितप्यन्ते यावद् युगविपर्ययः ॥ चौथे नरकमें पापी लोग तबतक संतप्त होते हैं, जबतक कि महाप्रलय नहीं हो जाता ॥

सहन्तस्तादृशं घोरं पञ्चकष्टे तु यादृशम् ।

तत्रास्य चिरदुःखस्य ह्यधोऽन्यान् विद्धि मानुषान् ॥

पंचकष्ट नरकमें जैसा घोर दुःख होता है, उसको भी यहाँ सहन करते हैं । दीर्घकालतक दुःख देनेवाले इस घोर नरकसे नीचे मानवसम्बन्धी अन्य नरकोंकी स्थिति समझो ॥