श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 1641–1650
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1641–1650
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मंगलयुक्त थे । धर्ममें सत्यकी प्रधानता थी और सत्य उत्तम विषयोंसे युक्त होता था ॥ धर्मासनस्थः सद्भिः स स्त्रीबालातुरवृद्धकान् ॥ वर्णाश्रमान् पूर्वकृतान् सकलान् रक्षणोद्यतः । धर्मके आसनपर बैठे हुए युधिष्ठिर सत्पुरुषों, स्त्रियों, बालकों, रोगियों, बड़े - बूढ़ों तथा पूर्वनिर्मित सम्पूर्ण वर्णाश्रम धर्मोकी रक्षाके लिये सदा उद्यत रहते थे ॥ अवृत्तिवृत्तिदानाद्यैर्यज्ञार्थैर्दीपितैरपि ।
आमुष्मिकं भयं नास्ति ऐहिकं कृतमेव तु ।
स्वर्गलोकोपमो लोकस्तदा तस्मिन् प्रशासति ॥
बभूव सुखमेकाग्रं तद्विशिष्टतरं परम् ॥
वे जीविकाहीन मनुष्योंको जीविका प्रदान करते, यज्ञके लिये धन दिलाते तथा अन्यान्य उपायोंद्वारा प्रजाकी रक्षा करते थे । अतः इहलोकका सारा सुख तो सबको प्राप्त ही था, परलोकका भी भय नहीं रह गया था । उनके शासनकालमें सारा जगत् स्वर्गलोकके समान सुखद हो गया था । यहाँका एकाग्र सुख स्वर्गसे भी विशिष्ट एवं उत्तम था ॥
नार्यः पतिव्रताः सर्वा रूपवत्यः स्वलंकृताः ।
यथोक्तवृत्ताः स्वगुणैर्बभूवुः प्रीतिहेतवः ॥
उनके राज्यकी सारी स्त्रियाँ पतिव्रता, रूपवती, आभूषणोंसे विभूषित और शास्त्रोक्त सदाचारसे सम्पन्न होती थीं । वे अपने उत्तम गुणोंद्वारा पतिकी प्रसन्नताको बढ़ानेमें कारण होती थीं ॥
पुमांसः पुण्यशीलाढ्याः स्वं स्वं धर्ममनुव्रताः ।
सुखिनः सूक्ष्ममप्येनो न कुर्वन्ति कदाचन ॥
पुरुष पुण्यशील, अपने - अपने धर्ममें अनुरक्त और सुखी थे । वे कभी सूक्ष्म से सूक्ष्म पाप भी नहीं करते थे ॥
सर्वे नराश्च नार्यश्च सततं प्रियवादिनः ।
अजिह्ममनसः शुक्लाः बभूवुः श्रमवर्जिताः ॥
सभी स्त्री- पुरुष सदा प्रिय वचन बोलते थे, मनमें कुटिलता नहीं आने देते थे, शुद्ध रहते थे और कभी थकावटका अनुभव नहीं करते थे ॥
भूषिताः कुण्डलैहरिः कटकैः कटिसूत्रकैः ।
सुवाससः सुगन्धाढ्याः प्रायशः पृथिवीतले ॥
उन दिनों प्रायः भूतलके सभी मनुष्य कुण्डल, हार, कड़े और करधनीसे विभूषित थे ।
सुन्दर वस्त्र और सुन्दर गन्धसे सुशोभित होते थे ॥
सर्वे ब्रह्मविदो विप्राः सर्वत्र परिनिष्ठिताः ।
वलीपलितहीनास्तु सुखिनो दीर्घजीविनः ॥
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सभी ब्राह्मण ब्रह्मवेत्ता और समस्त शास्त्रोंमें परिनिष्ठित थे । उनके शरीरमें झुर्रियाँ नहीं पड़ती थीं, उनके बाल सफेद नहीं होते थे और वे सुखी तथा दीर्घजीवी होते थे ॥
इच्छा न जायतेऽन्यत्र वर्णेषु च न संकरः ।
मनुष्याणां महाराज मर्यादासु व्यवस्थितः ॥
महाराज! मनुष्योंकी इच्छा परायी स्त्रियोंके लिये नहीं होती थी, वर्णोंमें कभी संकरता नहीं आती थी और सब लोग मर्यादामें स्थित रहते थे ॥
तस्मिञ्छासति राजेन्द्रे मृगव्यालसरीसृपाः ।
अन्योन्यमपि चान्येषु न बाधन्ते कदाचन ॥
राजेन्द्र युधिष्ठिरके शासनकालमें हिंसक पशु, सर्प और बिच्छू आदि न तो आपसमें और न दूसरोंको ही कभी बाधा पहुँचाते थे ॥
गावः सुक्षीरभूयिष्ठाः सुवालधिमुखोदराः ।
अपीडिताः कर्षकाद्यैर्हृतव्याधितवत्सकाः ॥
गौएँ बहुत दूध देती थीं, उनके मुख, पूँछ और उदर सुन्दर होते थे । किसान आदि उन्हें पीड़ा नहीं देते थे और उनके बछड़े भी नीरोग होते थे ॥
अवन्ध्यकाला मनुजाः पुरुषार्थेषु च क्रमात् ।
विषयेष्वनिषिद्धेषु वेदशास्त्रेषु चोद्यताः ॥
उस समयके सभी मनुष्य अपने समयको व्यर्थ नहीं जाने देते थे । धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — इन पुरुषार्थोंमें क्रमशः प्रवृत्त होते थे । शास्त्रमें जिनका निषेध नहीं किया गया है, उन्हीं विषयोंका सेवन करते और वेदशास्त्रोंके स्वाध्यायके लिये सदा उद्यत रहते थे ॥ सुवृत्ता वृषभाः पुष्टाः सुस्वभावाः सुखोदयाः ।
अतीव मधुरः शब्दः स्पर्शश्चातिसुखं रसम् ।
रूपं दृष्टिक्षमं रम्यं मनोज्ञं गन्धवद् बभौ ॥
उस समयके बैल अच्छी चाल-ढालवाले, हृष्ट- पुष्ट, अच्छे स्वभाववाले और सुखकी प्राप्ति करानेवाले होते थे । उन दिनों शब्द और स्पर्श नामक विषय अत्यन्त मधुर होते थे । रस बहुत ही सुखद जान पड़ता था, रूप दर्शनीय एवं रमणीय प्रतीत होता था और गन्ध नामक विषय भी मनोरम जान पड़ता था ॥
धर्मार्थकामसंयुक्तं मोक्षाभ्युदयसाधनम् ।
प्रह्लादजननं पुण्यं सम्बभूवाथ मानसम् ॥
सबका मन धर्म, अर्थ और काममें संलग्न, मोक्ष और अभ्युदयके साधनमें तत्पर, आनन्दजनक और पवित्र होता था ॥
स्थावरा बहुपुष्पाढ्याः फलच्छायावहास्तथा ।
सुस्पर्शा विषहीनाश्च सुपत्रत्वक्प्ररोहिणः ॥
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स्थावर ( वृक्ष ) बहुत - से फूलोंसे सुशोभित तथा फल और छाया देनेवाले होते थे । उनका स्पर्श सुखद जान पड़ता था और वे विषसे हीन तथा सुन्दर पत्र, छाल और अंकुरसे युक्त होते थे ॥
मनोऽनुकूलाः सर्वेषां चेष्टा भूस्तापवर्जिता ।
यथा बभूव राजर्षिस्तद्वृत्तमभवद् भुवि ॥
सबकी चेष्टाएँ मनके अनुकूल होती थीं। पृथ्वीपर किसी प्रकारका संताप नहीं होता था । राजर्षि युधिष्ठिर स्वयं जैसे आचार-विचारसे युक्त थे, उसीका भूतलपर प्रसार हुआ था ॥
सर्वलक्षणसम्पन्नाः पाण्डवा धर्मचारिणः ।
ज्येष्ठानुवर्तिनः सर्वे बभूवुः प्रियदर्शनाः ॥
समस्त पाण्डव सम्पूर्ण शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, धर्माचरण करनेवाले और बड़े भाईकी
आज्ञाके अधीन रहनेवाले थे । उनका दर्शन सभीको प्रिय था ॥
सिंहोरस्का जितक्रोधास्तेजोबलसमन्विताः ।
आजानुबाहवः सर्वे दानशीला जितेन्द्रियाः ॥
उनकी छाती सिंहके समान चौड़ी थी । वे क्रोधपर विजय पानेवाले और तेज एवं बलसे सम्पन्न थे । उन सबकी भुजाएँ घुटनोंतक लंबी थीं । वे सभी दानशील एवं जितेन्द्रिय थे ॥
तेषु शासत्सु धरणीमृतवः स्वगुणैर्बभुः ।
सुखोदयाय वर्तन्ते ग्रहास्तारागणैः सह ॥
पाण्डव जब इस पृथ्वीका शासन कर रहे थे, उस समय सभी ऋतुएँ अपने गुणोंसे सुशोभित होती थीं । ताराओंसहित समस्त ग्रह सबके लिये सुखद हो गये थे ॥
मही सस्यप्रबहुला सर्वरत्नगुणोदया ।
कामधुग्धेनुवद् भोगान् फलति स्म सहस्रधा ॥
पृथ्वीपर खेतीकी उपज बढ़ गयी थी । सभी रत्न और गुण प्रकट हो गये थे । कामधेनुके समान वह सहस्रों प्रकारके भोगरूप फल देती थी ॥ मन्वादिभिः कृताः पूर्वं मर्यादा मानवेषु याः ।
अनतिक्रम्य ताः सर्वाः कुलेषु समयानि च ।
अन्वशासन्त राजानो धर्मपुत्रप्रियंकराः ॥
पूर्वकालमें मनु आदि राजर्षियोंने मनुष्योंमें जो मर्यादाएँ स्थापित की थीं, उन सबका तथा कुलोचित सदाचारोंका उल्लंघन न करते हुए भूमण्डलके सभी राजा अपने - अपने राज्यका शासन करते थे । इस प्रकार सभी भूपाल धर्मपुत्र युधिष्ठिरका प्रिय करनेवाले थे ॥
महाकुलानि धर्मिष्ठा वर्धयन्तो विशेषतः ।
मनुप्रणीतया कृत्या तेऽन्वशासन् वसुन्धराम् ॥
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धर्मिष्ठ राजा श्रेष्ठ कुलोंको विशेष प्रोत्साहन देते थे । वे मनुकी बनायी हुई राजनीतिके अनुसार इस वसुधाका शासन करते थे ॥
राजवृत्तिर्हि सा शश्वद् धर्मिष्ठाभून्महीतले ।
प्रायो लोकमतिस्तात राजवृत्तानुगामिनी ॥
तात! इस पृथ्वीपर राजाओंके बर्ताव सदा धर्मानुकूल होते थे । प्रायः लोगोंकी बुद्धि राजाके ही बर्तावका अनुसरण करनेवाली होती है ॥ एवं भारतवर्षं स्वं राजा स्वर्गं सुरेन्द्रवत् । शशास विष्णुना सार्धं गुप्तो गाण्डीवधन्वना ॥ ) जैसे इन्द्र स्वर्गका शासन करते हैं, उसी प्रकार गाण्डीवधारी अर्जुनसे सुरक्षित राजा युधिष्ठिर भगवान् श्रीकृष्णके सहयोगसे अपने राज्य- भारतवर्षका शासन करते थे ॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३०३ श्लोक मिलाकर कुल ४७३ श्लोक हैं )
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पञ्चदशोऽध्यायः भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनसे द्वारका जानेका प्रस्ताव करना जनमेजय उवाच
विजिते पाण्डवेयैस्तु प्रशान्ते च द्विजोत्तम ।
राष्ट्रे किं चक्रतुर्वीरौ वासुदेवधनंजयौ ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा – द्विजश्रेष्ठ! जब पाण्डवोंने अपने राष्ट्रपर विजय पा ली और राज्यमें सब ओर शान्ति स्थापित हो गयी, उसके बाद श्रीकृष्ण और अर्जुन इन दोनों वीरोंने क्या किया? ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच
विजिते पाण्डवै राजन् प्रशान्ते च विशाम्पते ।
राष्ट्रे बभूवतुर्हष्टौ वासुदेवधनंजयौ ॥ २ ॥
वैशम्पायनजीने कहा - प्रजानाथ! नरेश्वर! जब पाण्डवोंने राष्ट्रपर विजय पा ली और सर्वत्र शान्ति स्थापित हो गयी, तब भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ २ ॥
विजहाते मुदा युक्तौ दिवि देवेश्वराविव ।
तौ वनेषु विचित्रेषु पर्वतेषु ससानुषु ॥ ३ ॥
स्वर्गलोकमें विहार करनेवाले दो देवेश्वरोंकी भाँति वे दोनों मित्र आनन्दमग्न हो विचित्र-विचित्र वनोंमें और पर्वतोंके सुरम्य शिखरोंपर विचरने लगे ॥ ३ ॥
तीर्थेषु चैव पुण्येषु पल्वलेषु नदीषु च ।
चङ्क्रम्यमाणौ संहृष्टावश्विनाविव नन्दने ॥ ४ ॥
पवित्र तीर्थों, छोटे तालाबों और नदियोंके तटोंपर विचरण करते हुए वे दोनों नन्दन-वनमें विहार करनेवाले अश्विनीकुमारोंके समान हर्षका अनुभव करते थे ॥ ४ ॥
इन्द्रप्रस्थे महात्मानौ रेमतुः कृष्णपाण्डवौ ।
प्रविश्य तां सभां रम्यां विजहाते च भारत ॥ ५ ॥
भरतनन्दन! फिर इन्द्रप्रस्थमें लौटकर महात्मा श्रीकृष्ण और अर्जुन मयनिर्मित रमणीय सभामें प्रवेश करके आनन्दपूर्वक मनोविनोद करने लगे ॥ ५ ॥
तत्र युद्धकथाश्चित्राः परिक्लेशांश्च पार्थिव ।
कथायोगे कथायोगे कथयामासतुः सदा ॥ ६ ॥
ऋषीणां देवतानां च वंशांस्तावाहतुः सदा ।
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प्रीयमाणी महात्मानौ पुराणावृषिसत्तमौ ॥ ७ ॥
पृथ्वीनाथ! वे दोनों महात्मा पुरातन ऋषिप्रवर नर और नारायण थे तथा आपसमें बहुत प्रेम रखते थे । बातचीतके प्रसंगमें वे दोनों मित्र सदा देवताओं तथा ऋषियोंके वंशोंकी चर्चा करते थे और युद्धकी विचित्र कथाओं एवं क्लेशोंका वर्णन किया करते थे ॥ ६-७ ॥
मधुरास्तु कथाश्चित्राश्चित्रार्थपदनिश्चयाः ।
निश्चयज्ञः स पार्थाय कथयामास केशवः ॥ ८ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण सब प्रकारके सिद्धान्तोंको जाननेवाले थे । उन्होंने अर्जुनको विचित्र पद, अर्थ एवं सिद्धान्तोंसे युक्त बड़ी विलक्षण एवं मधुर कथाएँ सुनायीं ॥
पुत्रशोकाभिसंतप्तं ज्ञातीनां च सहस्रशः ।
कथाभिः शमयामास पार्थं शौरिर्जनार्दनः ॥ ९ ॥
कुन्तीकुमार अर्जुन पुत्रशोकसे संतप्त थे । सहस्रों भाई- बन्धुओंके मारे जानेका भी उनके मनमें बड़ा दुःख था । वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णने अनेक प्रकारकी कथाएँ सुनाकर उस समय पार्थको शान्त किया ॥ ९ ॥
स तमाश्वास्य विधिवद् विज्ञानज्ञो महातपाः ।
अपहृत्यात्मनो भारं विशश्रामेव सात्वतः ॥ १० ॥
महातपस्वी विज्ञानवेत्ता श्रीकृष्णने विधिपूर्वक अर्जुनको सान्त्वना देकर अपना भार उतार दिया और वे सुखपूर्वक विश्राम- सा करने लगे ॥ १० ॥
ततः कथान्ते गोविन्दो गुडाकेशमुवाच ह ।
सान्त्वयन् श्लक्ष्णया वाचा हेतुयुक्तमिदं वचः ॥ ११ ॥
बातचीतके अन्तमें गोविन्दने गुडाकेश अर्जुनको अपनी मधुर वाणीद्वारा सान्त्वना प्रदान करते हुए उनसे यह युक्तियुक्त बात कही ॥ ११ ॥
वासुदेव उवाच
विजितेयं धरा कृत्स्ना सव्यसाचिन् परंतप ।
त्वद्बाहुबलमाश्रित्य राज्ञा धर्मसुतेन ह ॥ १२ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण बोले- शत्रुओंको संताप देनेवाले सव्यसाची अर्जुन! धर्मपुत्र युधिष्ठिरने तुम्हारे बाहुबलका सहारा लेकर इस समूची पृथ्वीपर विजय प्राप्त कर ली ॥
असपत्नां महीं भुङ्क्ते धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
भीमसेनानुभावेन यमयोश्च नरोत्तम ॥ १३ ॥
नरश्रेष्ठ! भीमसेन तथा नकुल सहदेवके प्रभावसे धर्मराज युधिष्ठिर इस पृथ्वीका निष्कण्टक राज्य भोग रहे हैं ॥ १३ ॥
धर्मेण राज्ञा धर्मज्ञ प्राप्तं राज्यमकण्टकम् ।
धर्मेण निहतः संख्ये स च राजा सुयोधनः ॥ १४ ॥
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धर्मज्ञ! राजा युधिष्ठिरने यह निष्कण्टक राज्य धर्मके बलसे ही प्राप्त किया है । धर्मसे ही राजा दुर्योधन युद्धमें मारा गया है ॥ १४ ॥
अधर्मरुचयो लुब्धाः सदा चाप्रियवादिनः ।
धार्तराष्ट्रा दुरात्मानः सानुबन्धा निपातिताः ॥ १५ ॥
धृतराष्ट्रके पुत्र अधर्ममें रुचि रखनेवाले, लोभी, कटुवादी और दुरात्मा थे । इसलिये अपने सगे - सम्बन्धियोंसहित मार गिराये गये ॥ १५ ॥
प्रशान्तामखिलां पार्थ पृथिवीं पृथिवीपतिः ।
भुङ्क्ते धर्मसुतो राजा त्वया गुप्तः कुरूद्वह ॥ १६ ॥
कुरुकुलतिलक कुन्तीकुमार! धर्मपुत्र पृथ्वीपति राजा युधिष्ठिर आज तुमसे सुरक्षित होकर सर्वथा शान्त हुई समूची पृथ्वीका राज्य भोगते हैं ॥ १६ ॥
रमे चाहं त्वया सार्धमरण्येष्वपि पाण्डव ।
किमु यत्र जनोऽयं वै पृथा चामित्रकर्षण ॥ १७ ॥
शत्रुसूदन पाण्डुकुमार! तुम्हारे साथ रहनेपर निर्जन वनमें भी मुझे सुख और आनन्द मिल सकता है । फिर जहाँ इतने लोग और मेरी बुआ कुन्ती हों, वहाँकी तो बात ही क्या है? ॥ १७ ॥
यत्र धर्मसुतो राजा यत्र भीमो महाबलः ।
यत्र माद्रवतीपुत्रौ रतिस्तत्र परा मम ॥ १८ ॥
जहाँ धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर हों, महाबली भीमसेन और माद्रीकुमार नकुल सहदेव हों, वहाँ मुझे परम आनन्द प्राप्त हो सकता है ॥ १८ ॥
तथैव स्वर्गकल्पेषु सभोद्देशेषु कौरव ।
रमणीयेषु पुण्येषु सहितस्य त्वयानघ ॥ १ ९ ॥
कालो महांस्त्वतीतो मे शूरसूनुमपश्यतः ।
बलदेवं च कौरव्य तथान्यान् वृष्णिपुङ्गवान् ॥ २० ॥
सोऽहं गन्तुमभीप्सामि पुरीं द्वारावतीं प्रति ।
रोचतां गमनं मह्यं तवापि पुरुषर्षभ ॥ २१ ॥
निष्पाप कुरुनन्दन! इस सभाभवनके रमणीय एवं पवित्र स्थान स्वर्गके समान सुखद हैं। यहाँ तुम्हारे साथ रहते हुए बहुत दिन बीत गये । इतने दिनोंतक मैं अपने पिता शूरसेनकुमार वसुदेवजीका दर्शन न कर सका । भैया बलदेव तथा अन्यान्य वृष्णिवंशके श्रेष्ठ पुरुषोंके भी दर्शनसे वंचित रहा । अतः अब मैं द्वारकापुरीको जाना चाहता हूँ । पुरुषप्रवर! तुम्हें भी मेरे इस यात्रासम्बन्धी प्रस्तावको सहर्ष स्वीकार करना चाहिये ॥ १ ९ –२१ ॥
उक्तो बहुविधं राजा तत्र तत्र युधिष्ठिरः ।
सह भीष्मेण यद् युक्तमस्माभिः शोककारिते ॥ २२ ॥
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शोकावस्थामें मनुष्यका दुःख दूर करनेके लिये उसे जो कुछ उपदेश देना उचित है, वह भीष्मसहित हमलोगोंने विभिन्न स्थानोंमें राजा युधिष्ठिरको दिया है । उन्हें अनेक प्रकारसे समझाया है ॥ २२ ॥
शिष्टो युधिष्ठिरोऽस्माभिः शास्ता सन्नपि पाण्डवः ।
तेन तत् तु वचः सम्यग् गृहीतं सुमहात्मना ॥ २३ ॥
यद्यपि पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर हमारे शासक और शिक्षक हैं तो भी हमलोगोंने शिक्षा दी है और उन श्रेष्ठ महात्माने हमारी उन सभी बातोंको भलीभाँति स्वीकार किया है ॥
धर्मपुत्रे हि धर्मज्ञे कृतज्ञे सत्यवादिनि ।
सत्यं धर्मो मतिश्चाग्रया स्थितिश्च सततं स्थिरा ॥ २४ ॥
धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर धर्मज्ञ, कृतज्ञ और सत्यवादी हैं । उनमें सत्य, धर्म, उत्तम बुद्धि तथा ऊँची स्थिति आदि गुण सदा स्थिरभावसे रहते हैं ॥ २४ ॥
तत्र गत्वा महात्मानं यदि ते रोचतेऽर्जुन ।
अस्मद्गमनसंयुक्तं वचो ब्रूहि जनाधिपम् ॥ २५ ॥
अर्जुन! यदि तुम उचित समझो तो महात्मा राजा युधिष्ठिरके पास चलकर उनके समक्ष मेरे द्वारका जानेका प्रस्ताव उपस्थित करो ॥ २५ ॥
न हि तस्याप्रियं कुर्यां प्राणत्यागेऽप्युपस्थिते ।
कुतो गन्तुं महाबाहो पुरीं द्वारावतीं प्रति ॥ २६ ॥
महाबाहो! मेरे प्राणोंपर संकट आ जाय तब भी मैं धर्मराजका अप्रिय नहीं कर सकता; फिर द्वारका जानेके लिये उनका दिल दुखाऊँ, यह तो हो ही कैसे सकता है? ॥
सर्वं त्विदमहं पार्थ त्वत्प्रीतिहितकाम्यया ।
ब्रवीमि सत्यं कौरव्य न मिथ्यैतत् कथंचन ॥ २७ ॥
कुरुनन्दन! कुन्तीकुमार! मैं सच्ची बात बता रहा हूँ, मैंने जो कुछ किया या कहा है, वह सब तुम्हारी प्रसन्नताके लिये और तुम्हारे ही हितकी दृष्टिसे किया है । यह किसी तरह मिथ्या नहीं है ॥ २७ ॥
प्रयोजनं च निर्वृत्तमिह वासे ममार्जुन ।
धार्तराष्ट्रो हतो राजा सबलः सपदानुगः ॥ २८ ॥
अर्जुन! यहाँ मेरे रहनेका जो प्रयोजन था, वह पूरा हो गया है । धृतराष्ट्रका पुत्र राजा दुर्योधन अपनी सेना और सेवकोंके साथ मारा गया ॥ २८ ॥
पृथिवी च वशे तात धर्मपुत्रस्य धीमतः ।
स्थिता समुद्रवलया सशैलवनकानना ॥ २ ९ ॥
चिता रत्नैर्बहुविधैः कुरुराजस्य पाण्डव ।
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तात! पाण्डुनन्दन! नाना प्रकारके रत्नोंके संचयसे सम्पन्न, समुद्रसे घिरी हुई, पर्वत, वन और काननोंसहित यह सारी पृथ्वी भी बुद्धिमान् धर्मपुत्र कुरुराज युधिष्ठिरके अधीन हो गयी ॥ २ ९ ३ ॥ धर्मेण राजा धर्मज्ञः पातु सर्वां वसुन्धराम् ॥ ३० ॥
उपास्यमानो बहुभिः सिद्धैश्चापि महात्मभिः ।
स्तूयमानश्च सततं वन्दिभिर्भरतर्षभ ॥ ३१ ॥
भरतश्रेष्ठ! बहुत- से सिद्ध महात्माओंके संगसे सुशोभित तथा वन्दीजनोंके द्वारा सदा ही प्रशंसित होते हुए धर्मज्ञ राजा युधिष्ठिर अब धर्मपूर्वक सारी पृथ्वीका पालन करें ॥ ३०-३१ ॥
तं मया सह गत्वाद्य राजानं कुरु वर्धनम् ।
आपृच्छ कुरुशार्दूल गमनं द्वारकां प्रति ॥ ३२ ॥
कुरुश्रेष्ठ! अब तुम मेरे साथ चलकर राजाको बधाई दो और मेरे द्वारका जानेके विषयमें उनसे पूछकर आज्ञा दिला दो ॥ ३२ ॥
इदं शरीरं वसु यच्च मे गृहे निवेदितं पार्थ सदा युधिष्ठिरे । प्रियश्च मान्यश्च हि मे युधिष्ठिरः सदा कुरूणामधिपो महामतिः ॥ ३३ ॥
पार्थ! मेरे घरमें जो कुछ धन- सम्पत्ति है, वह और मेरा यह शरीर सदा धर्मराज युधिष्ठिरकी सेवामें समर्पित है। परम बुद्धिमान् कुरुराज युधिष्ठिर सर्वदा मेरे प्रिय और माननीय हैं ॥ ३३ ॥
प्रयोजनं चापि निवासकारणे न विद्यते मे त्वदृते नृपात्मज । स्थिता हि पृथ्वी तव पार्थ शासने गुरोः सुवृत्तस्य युधिष्ठिरस्य च ॥ ३४ ॥
राजकुमार! अब तुम्हारे साथ मन बहलानेके सिवा यहाँ मेरे रहनेका और कोई प्रयोजन नहीं रह गया है । पार्थ! यह सारी पृथ्वी तुम्हारे और सदाचारी गुरु युधिष्ठिरके शासनमें पूर्णतः स्थित है ॥ ३४ ॥
इतीदमुक्तः स तदा महात्मना
जनार्दनेनामितविक्रमोऽर्जुनः ।
तथेति दुःखादिव वाक्यमैरय- ज्जनार्दनं सम्प्रतिपूज्य पार्थिव ॥ ३५ ॥
पृथ्वीनाथ! उस समय महात्मा भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर अमित पराक्रमी अर्जुनने उनकी बातका आदर करते हुए बड़े दुःखके साथ ' तथास्तु' कहकर उनके जानेका
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प्रस्ताव स्वीकार किया ॥ ३५ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५ ॥