श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 1651–1660
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1651–1660
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(अनुगीतापर्व) षोडशोऽध्यायः अर्जुनका श्रीकृष्णसे गीताका विषय पूछना और श्रीकृष्णका अर्जुनसे सिद्ध, महर्षि एवं काश्यपका संवाद सुनाना जनमेजय उवाच
सभायां वसतोस्तत्र निहत्यारीन् महात्मनोः ।
केशवार्जुनयोः का नु कथा समभवद् द्विज ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा — ब्रह्मन्! शत्रुओंका नाश करके जब महात्मा श्रीकृष्ण और अर्जुन सभाभवनमें रहने लगे, उन दिनों उन दोनोंमें क्या - क्या बातचीत हुई? ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच
कृष्णेन सहितः पार्थः स्वं राज्यं प्राप्य केवलम् ।
तस्यां सभायां दिव्यायां विजहार मुदा युतः ॥ २ ॥
वैशम्पायनजीने कहा- राजन्! श्रीकृष्णके सहित अर्जुनने जब केवल अपने राज्यपर पूरा अधिकार प्राप्त कर लिया, तब वे उस दिव्य सभाभवनमें आनन्दपूर्वक रहने लगे ॥ २ ॥
तत्र कंचित् सभोद्देशं स्वर्गोद्देशसमं नृप ।
यदृच्छया तौ मुदितौ जग्मतुः स्वजनावृतौ ॥ ३ ॥
नरेश्वर! एक दिन वहाँ स्वजनोंसे घिरे हुए वे दोनों मित्र स्वेच्छासे घूमते- घामते सभामण्डपके एक ऐसे भागमें पहुँचे, जो स्वर्गके समान सुन्दर था ॥ ३ ॥
ततः प्रतीतः कृष्णेन सहितः पाण्डवोऽर्जुनः ।
निरीक्ष्य तां सभां रम्यामिदं वचनमब्रवीत् ॥ ४ ॥
पाण्डुनन्दन अर्जुन भगवान् श्रीकृष्णके साथ रहकर बहुत प्रसन्न थे । उन्होंने एक बार उस रमणीय सभाकी ओर दृष्टि डालकर भगवान् श्रीकृष्णसे कहा- ॥ ४ ॥
विदितं मे महाबाहो संग्रामे समुपस्थिते ।
माहात्म्यं देवकीमातस्तच्च ते रूपमैश्वरम् ॥ ५ ॥
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‘ महाबाहो! देवकीनन्दन! जब संग्रामका समय उपस्थित था, उस समय मुझे आपके माहात्म्यका ज्ञान और ईश्वरीय स्वरूपका दर्शन हुआ था ॥ ५ ॥
यत् तद् भगवता प्रोक्तं पुरा केशव सौहृदात् ।
तत् सर्वं पुरुषव्याघ्र नष्टं मे भ्रष्टचेतसः ॥ ६ ॥
‘ किंतु केशव! आपने सौहार्दवश पहले मुझे जो ज्ञानका उपदेश दिया था, मेरा वह सब ज्ञान इस समय विचलित - चित्त हो जानेके कारण नष्ट हो गया ( भूल गया) है ॥ ६ ॥
मम कौतूहलं त्वस्ति तेष्वर्थेषु पुनः पुनः ।
भवांस्तु द्वारकां गन्ता नचिरादिव माधव ॥ ७ ॥
‘ माधव! उन विषयोंको सुननेके लिये मेरे मनमें बारंबार उत्कण्ठा होती है । इधर आप जल्दी ही द्वारका जानेवाले हैं; अतः पुनः वह सब विषय मुझे सुना दीजिये ' ॥ ७ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तु तं कृष्णः फाल्गुनं प्रत्यभाषत ।
परिष्वज्य महातेजा वचनं वदतां वरः ॥ ८ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! अर्जुनके ऐसा कहनेपर वक्ताओंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी भगवान् श्रीकृष्णने उन्हें गलेसे लगाकर इस प्रकार उत्तर दिया ॥ ८ ॥
वासुदेव उवाच
श्रावितस्त्वं मया गुह्यं ज्ञापितश्च सनातनम् ।
धर्मं स्वरूपिणं पार्थ सर्वलोकांश्च शाश्वतान् ॥ ९ ॥
अबुद्धया नाग्रहीर्यस्त्वं तन्मे सुमहदप्रियम् ।
न च साद्य पुनर्भूयः स्मृतिर्मे सम्भविष्यति ॥ १० ॥
श्रीकृष्ण बोले- अर्जुन! उस समय मैंने तुम्हें अत्यन्त गोपनीय ज्ञानका श्रवण कराया था, अपने स्वरूपभूत धर्म- सनातन पुरुषोत्तमतत्त्वका परिचय दिया था और ( शुक्ल - कृष्ण गतिका निरूपण करते हुए ) सम्पूर्ण नित्य लोकोंका भी वर्णन किया था; किंतु तुमने जो अपनी नासमझीके कारण उस उपदेशको याद नहीं रखा, यह मुझे बहुत अप्रिय है । उन बातोंका अब पूरा - पूरा स्मरण होना सम्भव नहीं जान पड़ता ॥ ९ -१० ॥
नूनमश्रद्दधानोऽसि दुर्मेधा ह्यसि पाण्डव ।
न च शक्यं पुनर्वक्तुमशेषेण धनंजय ॥ ११ ॥
पाण्डुनन्दन! निश्चय ही तुम बड़े श्रद्धाहीन हो, तुम्हारी बुद्धि बहुत मन्द जान पड़ती है । धनंजय! अब मैं उस उपदेशको ज्यों -का- त्यों नहीं कह सकता ॥ ११ ॥
स हि धर्मः सुपर्याप्तो ब्रह्मणः पदवेदने ।
न शक्यं तन्मया भूयस्तथा वक्तुमशेषतः ॥ १२ ॥
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क्योंकि वह धर्म ब्रह्मपदकी प्राप्ति करानेके लिये पर्याप्त था, वह सारा का सारा धर्म उसी रूपमें फिर दुहरा देना अब मेरे वशकी बात भी नहीं है ॥ १२ ॥
परं हि ब्रह्म कथितं योगयुक्तेन तन्मया ।
इतिहासं तु वक्ष्यामि तस्मिन्नर्थे पुरातनम् ॥ १३ ॥
उस समय योगयुक्त होकर मैंने परमात्मतत्त्वका वर्णन किया था । अब उस विषयका ज्ञान करानेके लिये मैं एक प्राचीन इतिहासका वर्णन करता हूँ ॥ १३ ॥
यथा तां बुद्धिमास्थाय गतिमग्रयां गमिष्यसि ।
शृणु धर्मभृतां श्रेष्ठ गदितं सर्वमेव मे ॥ १४ ॥
जिससे तुम उस समत्वबुद्धिका आश्रय लेकर उत्तम गति प्राप्त कर लोगे । धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ अर्जुन! अब तुम मेरी सारी बातें ध्यान देकर सुनो ॥ १४ ॥
आगच्छद्ब्राह्मणः कश्चित् स्वर्गलोकादरिंदम ।
ब्रह्मलोकाच्च दुर्धर्षः सोऽस्माभिः पूजितोऽभवत् ॥ १५ ॥
अस्माभिः परिपृष्टश्च यदाह भरतर्षभ ।
दिव्येन विधिना पार्थ तच्छृणुष्वाविचारयन् ॥ १६ ॥
शत्रुदमन! एक दिनकी बात है, एक दुर्धर्ष ब्राह्मण ब्रह्मलोकसे उतरकर स्वर्गलोकमें होते हुए मेरे यहाँ आये । मैंने उनकी विधिवत् पूजा की और मोक्षधर्मके विषयमें प्रश्न किया । भरतश्रेष्ठ! मेरे प्रश्नका उन्होंने सुन्दर विधिसे उत्तर दिया । पार्थ! वही मैं तुम्हें बतला रहा हूँ । कोई अन्यथा विचार न करके इसे ध्यान देकर सुनो ॥ १५-१६ ॥ ब्राह्मणउवाच
मोक्षधर्मं समाश्रित्य कृष्ण यन्मामपृच्छथाः ।
भूतानामनुकम्पार्थं यन्मोहच्छेदनं विभो ॥ १७ ॥
तत् तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि यथावन्मधुसूदन ।
शृणुष्वावहितो भूत्वा गदतो मम माधव ॥ १८ ॥
ब्राह्मणने कहा – श्रीकृष्ण! मधुसूदन! तुमने सब प्राणियोंपर कृपा करके उनके मोहका नाश करनेके लिये जो यह मोक्ष- धर्मसे सम्बन्ध रखनेवाला प्रश्न किया है, उसका मैं
यथावत् उत्तर दे रहा हूँ । प्रभो! माधव! सावधान होकर मेरी बात श्रवण करो ॥ १७-१८ ॥
कश्चिद् विप्रस्तपोयुक्तः काश्यपो धर्मवित्तमः ।
आससाद द्विजं कंचिद् धर्माणामागतागमम् ॥ १ ९ ॥
गतागते सुबहुशो ज्ञानविज्ञानपारगम् ।
लोकतत्त्वार्थकुशलं ज्ञातार्थं सुखदुःखयोः ॥ २० ॥
जातीमरणतत्त्वज्ञं कोविदं पापपुण्ययोः ।
द्रष्टारमुच्चनीचानां कर्मभिर्देहिनां गतिम् ॥ २१ ॥
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प्राचीन समयमें काश्यप नामके एक धर्मज्ञ और तपस्वी ब्राह्मण किसी सिद्ध महर्षिके पास गये; जो धर्मके विषयमें शास्त्रके सम्पूर्ण रहस्योंको जाननेवाले, भूत और भविष्यके ज्ञान- विज्ञानमें प्रवीण, लोक- तत्त्वके ज्ञानमें कुशल, सुख-दुःखके रहस्यको समझनेवाले, जन्म- मृत्युके तत्त्वज्ञ, पाप- पुण्यके ज्ञाता और ऊँच- नीच प्राणियोंको कर्मानुसार प्राप्त होनेवाली गतिके प्रत्यक्ष द्रष्टा थे ॥ १ ९ –२१ ॥
चरन्तं मुक्तवत्सिद्धं प्रशान्तं संयतेन्द्रियम् ।
दीप्यमानं श्रिया ब्राह्मया क्रममाणं च सर्वशः ॥ २२ ॥
अन्तर्धानगतिज्ञं च श्रुत्वा तत्त्वेन काश्यपः ।
तथैवान्तर्हितैः सिद्धैर्यान्तं चक्रधरैः सह ॥ २३ ॥
सम्भाषमाणमेकान्ते समासीनं च तैः सह ।
यदृच्छया च गच्छन्तमसक्तं पवनं यथा ॥ २४ ॥
वे मुक्तकी भाँति विचरनेवाले, सिद्ध, शान्तचित्त, जितेन्द्रिय, ब्रह्मतेजसे देदीप्यमान, सर्वत्र घूमनेवाले और अन्तर्धान विद्याके ज्ञाता थे । अदृश्य रहनेवाले चक्रधारी सिद्धोंके साथ वे विचरते, बातचीत करते और उन्हींके साथ एकान्तमें बैठते थे । जैसे वायु कहीं आसक्त न होकर सर्वत्र प्रवाहित होती है, उसी तरह वे सर्वत्र अनासक्त भावसे स्वच्छन्दतापूर्वक विचरा करते थे । महर्षि काश्यप उनकी उपर्युक्त महिमा सुनकर ही उनके पास गये थे ॥ २२– २४ ॥ तं समासाद्य मेधावी स तदा द्विजसत्तमः ।
चरणौ धर्मकामोऽस्य तपस्वी सुसमाहितः ।
प्रतिपेदे यथान्यायं दृष्ट्वा तन्महदद्भुतम् ॥ २५ ॥
विस्मितश्चाद्भुतं दृष्ट्वा काश्यपस्तद् द्विजोत्तमम् ।
परिचारेण महता गुरुं तं पर्यंतोषयत् ॥ २६ ॥
उपपन्नं च तत्सर्वं श्रुतचारित्रसंयुतम् ।
भावेनातोषयच्चैनं गुरुवृत्त्या परंतपः ॥ २७ ॥
निकट जाकर उन मेधावी, तपस्वी, धर्माभिलाषी और एकाग्रचित्त महर्षिने न्यायानुसार उन सिद्ध महात्माके चरणोंमें प्रणाम किया । वे ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ और बड़े अद्भुत संत थे । उनमें सब प्रकारकी योग्यता थी । वे शास्त्रके ज्ञाता और सच्चरित्र थे । उनका दर्शन करके काश्यपको बड़ा विस्मय हुआ। वे उन्हें गुरु मानकर उनकी सेवामें लग गये और अपनी शुश्रूषा, गुरुभक्ति तथा श्रद्धाभावके द्वारा उन्होंने उन सिद्ध महात्माको संतुष्ट कर लिया ॥ २५–२७ ॥
तस्मै तुष्टः स शिष्याय प्रसन्नो वाक्यमब्रवीत् ।
सिद्धिं परामभिप्रेक्ष्य शृणु मत्तो जनार्दन ॥ २८ ॥
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जनार्दन! अपने शिष्य काश्यपके ऊपर प्रसन्न होकर उन सिद्ध महर्षिने परासिद्धिके सम्बन्धमें विचार करके जो उपदेश किया, उसे बताता हूँ, सुनो ॥ २८ ॥
सिद्ध उवाच
विविधैः कर्मभिस्तात पुण्ययोगैश्च केवलैः ।
गच्छन्तीह गतिं मर्त्या देवलोके च संस्थितिम् ॥ २ ९ ॥
सिद्धने कहा – तात काश्यप! मनुष्य नाना प्रकारके शुभ कर्मोंका अनुष्ठान करके केवल पुण्यके संयोगसे इस लोकमें उत्तम फल और देवलोकमें स्थान प्राप्त करते हैं ॥ २ ९ ॥
न क्वचित् सुखमत्यन्तं न क्वचिच्छाश्वती स्थितिः ।
स्थानाच्च महतो भ्रंशो दुःखलब्धात् पुनः पुनः ॥ ३० ॥
जीवको कहीं भी अत्यन्त सुख नहीं मिलता । किसी भी लोकमें वह सदा नहीं रहने पाता । तपस्या आदिके द्वारा कितने ही कष्ट सहकर बड़े- से - बड़े स्थानको क्यों न प्राप्त किया जाय, वहाँसे भी बार- बार नीचे आना ही पड़ता है ॥ ३० ॥
अशुभा गतयः प्राप्ताः कष्टा मे पापसेवनात् ।
काममन्युपरीतेन तृष्णया मोहितेन च ॥ ३१ ॥
मैंने काम - क्रोधसे युक्त और तृष्णासे मोहित होकर अनेक बार पाप किये हैं और उनके सेवनके फलस्वरूप घोर कष्ट देनेवाली अशुभ गतियोंको भोगा है ॥ ३१ ॥
पुनः पुनश्च मरणं जन्म चैव पुनः पुनः ।
आहारा विविधा भुक्ताः पीता नानाविधाः स्तनाः ॥ ३२ ॥
बार- बार जन्म और बार- बार मृत्युका क्लेश उठाया है । तरह-तरहके आहार ग्रहण किये और अनेक स्तनोंका दूध पीया है ॥ ३२ ॥
मातरो विविधा दृष्टाः पितरश्च पृथग्विधाः ।
सुखानि च विचित्राणि दुःखानि च मयानघ ॥ ३३ ॥
अनघ! बहुत - से पिता और भाँति- भाँतिकी माताएँ देखी हैं । विचित्र- विचित्र सुख-दुःखोंका अनुभव किया है ॥
प्रियैर्विवासो बहुशः संवासश्चाप्रियैः सह ।
धननाशश्च सम्प्राप्तो लब्ध्वा दुःखेन तद् धनम् ॥ ३४ ॥
कितनी ही बार मुझसे प्रियजनोंका वियोग और अप्रिय जनोंका संयोग हुआ है । जिस धनको मैंने बहुत कष्ट सहकर कमाया था, वह मेरे देखते - देखते नष्ट हो गया है ॥ ३४ ॥
अवमानाः सुकष्टाश्च राजतः स्वजनात् तथा ।
शारीरा मानसा वापि वेदना भृशदारुणाः ॥ ३५ ॥
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राजा और स्वजनोंकी ओरसे मुझे कई बार बड़े - बड़े कष्ट और अपमान उठाने पड़े हैं ।
तन और मनकी अत्यन्त भयंकर वेदनाएँ सहनी पड़ी हैं ॥ ३५ ॥
प्राप्ता विमाननाश्चोग्रा वधबन्धाश्च दारुणाः ।
पतनं निरये चैव यातनाश्च यमक्षये ॥ ३६ ॥
मैंने अनेक बार घोर अपमान, प्राणदण्ड और कड़ी कैदकी सजाएँ भोगी हैं । मुझे नरकमें गिरना और यमलोकमें मिलनेवाली यातनाओंको सहना पड़ा है ॥ ३६ ॥
जरा रोगाश्च सततं व्यसनानि च भूरिशः ।
लोकेऽस्मिन्ननुभूतानि द्वन्द्वजानि भृशं मया ॥ ३७ ॥
इस लोकमें जन्म लेकर मैंने बारंबार बुढ़ापा, रोग, व्यसन और राग-द्वेषादि द्वन्द्वोंके प्रचुर दुःख सदा ही भोगे हैं ॥ ३७ ॥
ततः कदाचिन्निर्वेदान्निराकाराश्रितेन च ।
लोकतन्त्रं परित्यक्तं दुःखार्तेन भृशं मया ॥ ३८ ॥
इस प्रकार बारंबार क्लेश उठानेसे एक दिन मेरे मनमें बड़ा खेद हुआ और मैं दुखोंसे घबराकर निराकार परमात्माकी शरण ली तथा समस्त लोकव्यवहारका परित्याग कर दिया ॥ ३८ ॥
लोकेऽस्मिन्ननुभूयाहमिमं मार्गमनुष्ठितः ।
ततः सिद्धिरियं प्राप्ता प्रसादादात्मनो मया ॥ ३ ९ ॥
इस लोकमें अनुभवके पश्चात् मैंने इस मार्गका अवलम्बन किया है और अब परमात्माकी कृपासे मुझे यह उत्तम सिद्धि प्राप्त हुई है ॥ ३ ९ ॥
नाहं पुनरिहागन्ता लोकानालोकयाम्यहम् ।
आसिद्धेराप्रजासर्गादात्मनोऽपि गताः शुभाः ॥ ४० ॥
अब मैं पुनः इस संसारमें नहीं आऊँगा । जबतक यह सृष्टि कायम रहेगी और जबतक मेरी मुक्ति नहीं हो जायगी, तबतक मैं अपनी और दूसरे प्राणियोंकी शुभगतिका अवलोकन करूँगा ॥ ४० ॥
उपलब्धा द्विजश्रेष्ठ तथेयं सिद्धिरुत्तमा ।
इतः परं गमिष्यामि ततः परतरं पुनः ॥ ४१ ॥
ब्रह्मणः पदमव्यक्तं मा तेऽभूदत्र संशयः ।
नाहं पुनरिहागन्ता मर्त्यलोकं परंतप ॥ ४२ ॥
द्विजश्रेष्ठ! इस प्रकार मुझे यह उत्तम सिद्धि मिली है। इसके बाद मैं उत्तम लोकमें जाऊँगा । फिर उससे भी परम उत्कृष्ट सत्यलोकमें जा पहुँचूँगा और क्रमशः अव्यक्त ब्रह्मपद ( मोक्ष) -को प्राप्त कर लूँगा । इसमें तुम्हें संशय नहीं करना चाहिये । काम- क्रोध आदि शत्रुओंको संताप देनेवाले काश्यप! अब मैं पुनः इस मर्त्यलोकमें नहीं आऊँगा ॥ ४१-४२ ॥ प्रीतोऽस्मि ते महाप्राज्ञ ब्रूहि किं करवाणि ते ।
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यदीप्सुरुपपन्नस्त्वं तस्य कालोऽयमागतः ॥ ४३ ॥
महाप्राज्ञ! मैं तुम्हारे ऊपर बहुत प्रसन्न हूँ । बोलो, तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य करूँ? तुम जिस वस्तुको पानेकी इच्छासे मेरे पास आये हो, उसके प्राप्त होनेका यह समय आ गया है ॥ ४३ ॥
अभिजाने च तदहं यदर्थं मामुपागतः ।
अचिरात् तु गमिष्यामि तेनाहं त्वामचूचुदम् ॥ ४४ ॥
तुम्हारे आनेका उद्देश्य क्या है, इसे मैं जानता हूँ और शीघ्र ही यहाँसे चला जाऊँगा । इसीलिये मैंने स्वयं तुम्हें प्रश्न करनेके लिये प्रेरित किया है ॥ ४४ ॥
भृशं प्रीतोऽस्मि भवतश्चारित्रेण विचक्षण ।
परिपृच्छस्व कुशलं भाषेयं यत् तवेप्सितम् ॥ ४५ ॥
विद्वन्! तुम्हारे उत्तम आचरणसे मुझे बड़ा संतोष है । तुम अपने कल्याणकी बात पूछो ।
मैं तुम्हारे अभीष्ट प्रश्नका उत्तर दूँगा ॥ ४५ ॥
बहु मन्ये च ते बुद्धिं भृशं सम्पूजयामि च ।
येनाहं भवता बुद्धो मेधावी ह्यसि काश्यप ॥ ४६ ॥
काश्यप! मैं तुम्हारी बुद्धिकी सराहना करता और उसे बहुत आदर देता हूँ । तुमने मुझे पहचान लिया है, इसीसे कहता हूँ कि बड़े बुद्धिमान् हो ॥ ४६ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६ ॥
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सप्तदशोऽध्यायः काश्यपके प्रश्नोंके उत्तरमें सिद्ध महात्माद्वारा जीवकी विविध गतियोंका वर्णन वासुदेव उवाच
ततस्तस्योपसंगृह्य पादौ प्रश्नान् सुदुर्वचान् ।
पप्रच्छ तांश्च धर्मान् स प्राह धर्मभृतां वरः ॥ १ ॥
भगवान् श्रीकृष्णने कहा-तदनन्तर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ काश्यपने उन सिद्ध महात्माके दोनों पैर पकड़कर जिनका उत्तर कठिनाईसे दिया जा सके, ऐसे बहुत - से धर्मयुक्त प्रश्न पूछे ॥ १ ॥
काश्यप उवाच
कथं शरीरं च्यवते कथं चैवोपपद्यते ।
कथं कष्टाच्च संसारात् संसरन् परिमुच्यते ॥ २ ॥
काश्यपने पूछा — महात्मन्! यह शरीर किस प्रकार गिर जाता है? फिर दूसरा शरीर कैसे प्राप्त होता है? संसारी जीव किस तरह इस दुःखमय संसारसे मुक्त होता है? ॥ २ ॥
आत्मा च प्रकृतिं मुक्त्वा तच्छरीरं विमुञ्चति ।
शरीरतश्च निर्मुक्तः कथमन्यत् प्रपद्यते ॥ ३ ॥
जीवात्मा प्रकृति ( मूल विद्या) और उससे उत्पन्न होनेवाले शरीरका कैसे त्याग करता है? और शरीरसे छूटकर दूसरे में वह किस प्रकार प्रवेश करता है? ॥ ३ ॥
कथं शुभाशुभे चायं कर्मणी स्वकृते नरः ।
उपभुङ्क्ते क्व वा कर्म विदेहस्यावतिष्ठते ॥ ४ ॥
मनुष्य अपने किये हुए शुभाशुभ कर्मोंका फल कैसे भोगता है और शरीर न रहनेपर उसके कर्म कहाँ रहते हैं? ॥ ४ ॥
ब्राह्मणउवाच
एवं संचोदितः सिद्धः प्रश्नांस्तान् प्रत्यभाषत ।
आनुपूर्व्येण वार्ष्णेय तन्मे निगदतः शृणु ॥ ५ ॥
ब्राह्मण कहते हैं – वृष्णिनन्दन श्रीकृष्ण! काश्यपके इस प्रकार पूछनेपर सिद्ध महात्माने उनके प्रश्नोंका क्रमशः उत्तर देना आरम्भ किया । वह मैं बता रहा हूँ, सुनिये ॥ ५ ॥
सिद्धउवाच
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आयुः कीर्तिकराणीह यानि कृत्यानि सेवते ।
शरीरग्रहणे यस्मिंस्तेषु क्षीणेषु सर्वशः ॥ ६ ॥
आयुःक्षयपरीतात्मा विपरीतानि सेवते ।
बुद्धिर्व्यावर्तते चास्य विनाशे प्रत्युपस्थिते ॥ ७ ॥
सिद्धने कहा — काश्यप! मनुष्य इस लोकमें आयु और कीर्तिको बढ़ानेवाले जिन कर्मोंका सेवन करता है, वे शरीर- प्राप्तिमें कारण होते हैं । शरीर- ग्रहणके अनन्तर जब वे सभी कर्म अपना फल देकर क्षीण हो जाते हैं, उस समय जीवकी आयुका भी क्षय हो जाता है । उस अवस्थामें वह विपरीत कर्मोंका सेवन करने लगता है और विनाशकाल निकट आनेपर उसकी बुद्धि उलटी हो जाती है ॥ ६-७ ॥
सत्त्वं बलं च कालं च विदित्वा चात्मनस्तथा ।
अतिवेलमुपाश्नाति स्वविरुद्धान्यनात्मवान् ॥ ८ ॥
वह अपने सत्त्व ( धैर्य ), बल और अनुकूल समयको जानकर भी मनपर अधिकार न होनेके कारण असमयमें तथा अपनी प्रकृतिके विरुद्ध भोजन करता है ॥ ८ ॥
यदायमतिकष्टानि सर्वाण्युपनिषेवते ।
अत्यर्थमपि वा भुङ्क्ते न वा भुङ्क्ते कदाचन ॥ ९ ॥
अत्यन्त हानि पहुँचानेवाली जितनी वस्तुएँ हैं, उन सबका वह सेवन करता है । कभी तो बहुत अधिक खा लेता है, कभी बिलकुल ही भोजन नहीं करता है ॥ ९ ॥
दुष्टान्नामिषपानं च यदन्योन्यविरोधि च ।
गुरु चाप्यमितं भुङ्क्ते नातिजीर्णेऽपि वा पुनः ॥ १० ॥
कभी दूषित खाद्य अन्न- पानको भी ग्रहण कर लेता है, कभी एक- दूसरेसे विरुद्ध गुणवाले पदार्थोंको एक साथ खा लेता है । किसी दिन गरिष्ठ अन्न और वह भी बहुत अधिक मात्रामें खा जाता है । कभी- कभी एक बारका खाया हुआ अन्न पचने भी नहीं पाता कि दुबारा भोजन कर लेता है ॥ १० ॥
व्यायाममतिमात्रं च व्यवायं चोपसेवते ।
सततं कर्मलोभाद् वा प्राप्तं वेगं विधारयेत् ॥ ११ ॥
अधिक मात्रामें व्यायाम और स्त्री- सम्भोग करता है । सदा काम करनेके लोभसे मल- मूत्रके वेगको रोके रहता है ॥ ११ ॥
रसाभियुक्तमन्नं वा दिवा स्वप्नं च सेवते ।
अपक्वानागते काले स्वयं दोषान् प्रकोपयेत् ॥ १२ ॥
रसीला अन्न खाता और दिनमें सोता है तथा कभी- कभी खाये हुए अन्नके पचनेके पहले असमयमें भोजन करके स्वयं ही अपने शरीरमें स्थित वात- पित्त आदि दोषोंको कुपित कर देता है ॥ १२ ॥
स्वदोषकोपनाद् रोगं लभते मरणान्तिकम् ।
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अपि वोद्बन्धनादीनि परीतानि व्यवस्यति ॥ १३ ॥
उन दोषोंके कुपित होनेसे वह अपने लिये प्राणनाशक रोगोंको बुला लेता है । अथवा फाँसी लगाने या जलमें डूबने आदि शास्त्रविरुद्ध उपायोंका आश्रय लेता है ॥ १३ ॥
तस्य तैः कारणैर्जन्तोः शरीरं च्यवते तदा ।
जीवितं प्रोच्यमानं तद् यथावदुपधारय ॥ १४ ॥
इन्हीं सब कारणोंसे जीवका शरीर नष्ट हो जाता है । इस प्रकार जो जीवका जीवन बताया जाता है, उसे अच्छी तरह समझ लो ॥ १४ ॥
ऊष्मा प्रकुपितः काये तीव्रवायुसमीरितः ।
शरीरमनुपर्येत्य सर्वान् प्राणान् रुणद्धि वै ॥ १५ ॥
शरीरमें तीव्र वायुसे प्रेरित हो पित्तका प्रकोप बढ़ जाता है और वह शरीरमें फैलकर समस्त प्राणोंकी गतिको रोक देता है ॥ १५ ॥
अत्यर्थं बलवानूष्मा शरीरे परिकोपितः ।
भिनत्ति जीवस्थानानि मर्माणि विद्धि तत्त्वतः ॥ १६ ॥
इस शरीरमें कुपित होकर अत्यन्त प्रबल हुआ पित्त जीवके मर्मस्थानोंको विदीर्ण कर देता है । इस बातको ठीक समझो ॥ १६ ॥
ततः सवेदनः सद्यो जीवः प्रच्यवते क्षरात् ।
शरीरं त्यजते जन्तुश्छिद्यमानेषु मर्मसु ॥ १७ ॥
जब मर्मस्थान छिन्न- भिन्न होने लगते हैं, तब वेदनासे व्यथित हुआ जीव तत्काल इस
जड शरीरसे निकल जाता है । उस शरीरको सदाके लिये त्याग देता है ॥ १७ ॥
वेदनाभिः परीतात्मा तद् विद्धि द्विजसत्तम ।
जातीमरणसंविग्नाः सततं सर्वजन्तवः ॥ १८ ॥
द्विजश्रेष्ठ! मृत्युकालमें जीवका तन- मन वेदनासे व्यथित होता है, इस बातको भलीभाँति जान लो । इस तरह संसारके सभी प्राणी सदा जन्म और मरणसे उद्विग्न रहते हैं ॥ १८ ॥
दृश्यन्ते संत्यजन्तश्च शरीराणि द्विजर्षभ ।
गर्भसंक्रमणे चापि मर्मणामतिसर्पणे ॥ १ ९ ॥
तादृशीमेव लभते वेदनां मानवः पुनः ।
भिन्नसंधिरथ क्लेदमद्भिः स लभते नरः ॥ २० ॥
विप्रवर! सभी जीव अपने शरीरोंका त्याग करते देखे जाते हैं । गर्भमें मनुष्य प्रवेश करते समय तथा गर्भसे नीचे गिरते समय भी वैसी ही वेदनाका अनुभव करता है । मृत्यु-कालमें जीवोंके शरीरकी सन्धियाँ टूटने लगती हैं और जन्मके समय वह गर्भस्थ जलसे भीगकर अत्यन्त व्याकुल हो उठता है ॥ १ ९ -२० ॥ यथा पञ्चसु भूतेषु सम्भूतत्वं नियच्छति ।