श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 1661–1670

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1661–1670

पृष्ठ 1661

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शैत्यात् प्रकुपितः काये तीव्रवायुसमीरितः ॥ २१ ॥

यः स पञ्चसु भूतेषु प्राणापाने व्यवस्थितः ।

स गच्छत्यूर्ध्वगो वायुः कृच्छ्रान्मुक्त्वा शरीरिणः ॥ २२ ॥

अन्य प्रकारकी तीव्र वायुसे प्रेरित हो शरीरमें सर्दीसे कुपित हुई जो वायु पाँचों भूतोंमें प्राण और अपानके स्थानमें स्थित है, वही पञ्चभूतोंके संघातका नाश करती है तथा वह देहधारियोंको बड़े कष्टसे त्यागकर ऊर्ध्वलोकको चली जाती है ॥ २१-२२ ॥

शरीरं च जहात्येवं निरुच्छ्वासश्च दृश्यते ।

स निरूष्मा निरुच्छ्वासो निःश्रीको हतचेतनः ॥ २३ ॥

ब्रह्मणा सम्परित्यक्तो मृत इत्युच्यते नरैः । इस प्रकार जब जीव शरीरका त्याग करता है, तब प्राणियोंका शरीर उच्छ्वासहीन दिखायी देता है । उसमें गर्मी, उच्छ्वास, शोभा और चेतना कुछ भी नहीं रह जाती । इस तरह जीवात्मासे परित्यक्त उस शरीरको लोग मृत ( मरा हुआ ) कहते हैं ॥ २३३ ॥

स्रोतोभिर्यैर्विजानाति इन्द्रियार्थान् शरीरभृत् ॥ २४ ॥

तैरेव न विजानाति प्राणानाहारसम्भवान् ।

तत्रैव कुरुते काये यः स जीवः सनातनः ॥ २५ ॥

देहधारी जीव जिन इन्द्रियोंके द्वारा रूप, रस आदि विषयोंका अनुभव करता है, उनके द्वारा वह भोजनसे परिपुष्ट होनेवाले प्राणोंको नहीं जान पाता । इस शरीरके भीतर रहकर जो कार्य करता है, वह सनातन जीव है ॥ २४-२५ ॥

तथा यद्यद् भवेद् युक्तं संनिपाते क्वचित् क्वचित् ।

तत्तन्मर्म विजानीहि शास्त्रदृष्टं हि तत् तथा ॥ २६ ॥

कहीं - कहीं संधिस्थानोंमें जो-जो अंग संयुक्त होता है, उस उसको तुम मर्म समझो; क्योंकि शास्त्रमें मर्मस्थानका ऐसा ही लक्षण देखा गया है ॥ २६ ॥

तेषु मर्मसु भिन्नेषु ततः स समुदीरयन् ।

आविश्य हृदयं जन्तोः सत्त्वं चाशु रुणद्धि वै ॥ २७ ॥

उन मर्मस्थानों ( संधियों ) के विलग होनेपर वायु ऊपरको उठती हुई प्राणीके हृदयमें प्रविष्ट हो शीघ्र ही उसकी बुद्धिको अवरुद्ध कर लेती है ॥ २७ ॥

ततः सचेतनो जन्तुर्नाभिजानाति किंचन ।

तमसा संवृतज्ञानः संवृतेष्वेव मर्मसु ।

स जीवो निरधिष्ठानश्चाल्यते मातरिश्वना ॥ २८ ॥

तब अन्तकाल उपस्थित होनेपर प्राणी सचेतन होनेपर भी कुछ समझ नहीं पाता; क्योंकि तम ( अविद्या ) -के द्वारा उसकी ज्ञानशक्ति आवृत्त हो जाती है । मर्मस्थान भी अवरुद्ध हो जाते हैं । उस समय जीवके लिये कोई आधार नहीं रह जाता और वायु उसे अपने स्थानसे विचलित कर देती है ॥ २८ ॥

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ततः स तं महोच्छ्वासं भृशमुच्छ्वस्य दारुणम् ।

निष्क्रामन् कम्पयत्याशु तच्छरीरमचेतनम् ॥ २ ९ ॥

तब वह जीवात्मा बारंबार भयंकर एवं लंबी साँस छोड़कर बाहर निकलने लगता है ।

उस समय सहसा इस जड शरीरको कम्पित कर देता है ॥ २ ९ ॥

स जीवः प्रच्युतः कायात् कर्मभिः स्वैः समावृतः ।

अभितः स्वैः शुभैः पुण्यैः पापैर्वाप्युपपद्यते ॥ ३० ॥

शरीरसे अलग होनेपर वह जीव अपने किये हुए शुभकार्य पुण्य अथवा अशुभ कार्य पापकर्मोंद्वारा सब ओरसे घिरा रहता है ॥ ३० ॥

ब्राह्मणा ज्ञानसम्पन्ना यथावच्छ्रुतनिश्चयाः ।

इतरं कृतपुण्यं वा तं विजानन्ति लक्षणैः ॥ ३१ ॥

जिन्होंने वेद- शास्त्रोंके सिद्धान्तोंका यथावत् अध्ययन किया है, वे ज्ञानसम्पन्न ब्राह्मण लक्षणोंके द्वारा यह जान लेते हैं कि अमुक जीव पुण्यात्मा रहा है और अमुक जीव पापी ॥ ३१ ॥

यथान्धकारे खद्योतं लीयमानं ततस्ततः ।

चक्षुष्मन्तः प्रपश्यन्ति तथा च ज्ञानचक्षुषः ॥ ३२ ॥

पश्यन्त्येवंविधं सिद्धा जीवं दिव्येन चक्षुषा ।

च्यवन्तं जायमानं च योनिं चानुप्रवेशितम् ॥ ३३ ॥

जिस तरह आँखवाले मनुष्य अँधेरेमें इधर- उधर उगते-बुझते हुए खद्योतको देखते हैं, उसी प्रकार ज्ञान - नेत्रवाले सिद्ध पुरुष अपनी दिव्य दृष्टिसे जन्मते मरते तथा गर्भमें प्रवेश करते हुए जीवको सदा देखते रहते हैं ॥ ३२-३३ ॥

तस्य स्थानानि दृष्टानि त्रिविधानीह शास्त्रतः ।

कर्मभूमिरियं भूमिर्यत्र तिष्ठन्ति जन्तवः ॥ ३४ ॥

शास्त्रके अनुसार जीवके तीन प्रकारके स्थान देखे गये हैं ( मृत्युलोक, स्वर्गलोक और नरक ) । यह मर्त्यलोककी भूमि जहाँ बहुत -से प्राणी रहते हैं, कर्मभूमि कहलाती है ॥ ३४ ॥

ततः शुभाशुभं कृत्वा लभन्ते सर्वदेहिनः ।

इहैवोच्चावचान् भोगान् प्राप्नुवन्ति स्वकर्मभिः ॥ ३५ ॥

अतः यहाँ शुभ और अशुभ कर्म करके सब मनुष्य उसके फलस्वरूप अपने कर्मोंके अनुसार अच्छे- बुरे भोग प्राप्त करते हैं ॥ ३५ ॥

इहैवाशुभकर्माणः कर्मभिर्निरयं गताः ।

अवाग्गतिरियं कष्टा यत्र पच्यन्ति मानवाः ।

तस्मात् सुदुर्लभो मोक्षो रक्ष्यश्चात्मा ततो भृशम् ॥ ३६ ॥

यहीं पाप करनेवाले मानव अपने कर्मोंके अनुसार नरकमें पड़ते हैं । यह जीवकी अधोगति है जो घोर कष्ट देनेवाली है । इसमें पड़कर पापी मनुष्य नरकाग्निमें पकाये जाते

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हैं । उससे छुटकारा मिलना बहुत कठिन है । अतः ( पापकर्मसे दूर रहकर ) अपनेको नरकसे बचाये रखनेका विशेष प्रयत्न करना चाहिये ॥ ३६ ॥

ऊर्ध्वं तु जन्तवो गत्वा येषु स्थानेष्ववस्थिताः ।

कीर्त्यमानानि तानीह तत्त्वतः संनिबोध मे ॥ ३७ ॥

स्वर्ग आदि ऊर्ध्वलोकोंमें जाकर प्राणी जिन स्थानोंमें निवास करते हैं, उनका यहाँ वर्णन किया जाता है, इस विषयको यथार्थरूपसे मुझसे सुनो ॥ ३७ ॥

नच्छ्रुत्वा नैष्ठिकीं बुद्धिं बुद्धयेथाः कर्मनिश्चयम् ।

तारारूपाणि सर्वाणि यत्रैतच्चन्द्रमण्डलम् ॥ ३८ ॥

यत्र विभ्राजते लोके स्वभासा सूर्यमण्डलम् ।

स्थानान्येतानि जानीहि जनानां पुण्यकर्मणाम् ॥ ३ ९ ॥

इसको सुननेसे तुम्हें कर्मोंकी गतिका निश्चय हो जायगा और नैष्ठिकी बुद्धि प्राप्त होगी । जहाँ ये समस्त तारे हैं, जहाँ वह चन्द्रमण्डल प्रकाशित होता है और जहाँ सूर्यमण्डल जगत्में अपनी प्रभासे उद्भासित हो रहा है, ये सब- के - सब पुण्यकर्मा पुरुषोंके स्थान हैं, ऐसा जानो [ पुण्यात्मा मुनष्य उन्हीं लोकोंमें जाकर अपने पुण्योंका फल भोगते हैं] ॥ ३८-३९ ॥

कर्मक्षयाच्च ते सर्वे च्यवन्ते वै पुनः पुनः ।

तत्रापि च विशेषोऽस्ति दिवि नीचोच्चमध्यमः ॥ ४० ॥

जब जीवोंके पुण्यकर्मोंका भोग समाप्त हो जाता है, तब वे वहाँसे नीचे गिरते हैं । इस प्रकार बारंबार उनका आवागमन होता रहता है । स्वर्गमें भी उत्तम, मध्यम और अधमका भेद रहता है ॥ ४० ॥

न च तत्रापि संतोषो दृष्ट्वा दीप्ततरां श्रियम् ।

इत्येता गतयः सर्वाः पृथक्ते समुदीरिताः ॥ ४१ ॥

वहाँ भी दूसरोंका अपनेसे बहुत अधिक दीप्तिमान् तेज एवं ऐश्वर्य देखकर मनमें संतोष नहीं होता है । इस प्रकार जीवकी इन सभी गतियोंका मैंने तुम्हारे समक्ष पृथक् - पृथक् वर्णन किया है ॥ ४१ ॥

उपपत्तिं तु वक्ष्यामि गर्भस्याहमतः परम् ।

तथा तन्मे निगदतः शृणुष्वावहितो द्विज ॥ ४२ ॥

अब मैं यह बतलाऊँगा कि जीव किस प्रकार गर्भमें आकर जन्म धारण करता है ।

ब्रह्मन्! तुम एकाग्रचित्त होकर मेरे मुखसे इस विषयका वर्णन सुनो ॥ ४२ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें सत्रहवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १७ ॥

पृष्ठ 1664

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पृष्ठ 1665

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अष्टादशोऽध्यायः जीवके गर्भ प्रवेश, आचार - धर्म, कर्म- फलकी अनिवार्यता तथा संसारसे तरनेके उपायका वर्णन ब्राह्मणउवाच

शुभानामशुभानां च नेह नाशोऽस्ति कर्मणाम् ।

प्राप्य प्राप्यानुपच्यन्ते क्षेत्रं क्षेत्रं तथा तथा ॥ १ ॥

सिद्ध ब्राह्मण बोले- काश्यप! इस लोकमें किये हुए शुभ और अशुभ कर्मोंका फल भोगे बिना नाश नहीं होता । वे कर्म वैसा- वैसा कर्मानुसार एकके बाद एक शरीर धारण कराकर अपना फल देते रहते हैं ॥ १ ॥

यथा प्रसूयमानस्तु फली दद्यात् फलं बहु 1 तथा स्याद् विपुलं पुण्यं शुद्धेन मनसा कृतम् ॥ २ ॥

जैसे फल देनेवाला वृक्ष फलनेका समय आनेपर बहुत - से फल प्रदान करता है, उसी प्रकार शुद्ध हृदयसे किये हुए पुण्यका फल अधिक होता है ॥ २ ॥

पापं चापि तथैव स्यात् पापेन मनसा कृतम् ।

पुरोधाय मनो हीदं कर्मण्यात्मा प्रवर्तते ॥ ३ ॥

इसी तरह कलुषित चित्तसे किये हुए पापके फलमें भी वृद्धि होती है; क्योंकि जीवात्मा मनको आगे करके ही प्रत्येक कार्यमें प्रवृत्त होता है ॥ ३ ॥

यथा कर्मसमाविष्टः काममन्युसमावृतः ।

नरो गर्भं प्रविशति तच्चापि शृणु चोत्तरम् ॥ ४ ॥

काम- क्रोधसे घिरा हुआ मनुष्य जिस प्रकार कर्मजालमें आबद्ध होकर गर्भमें प्रवेश करता है, उसका भी उत्तर सुनो ॥ ४ ॥

शुक्रं शोणितसंसृष्टं स्त्रिया गर्भाशयं गतम् ।

क्षेत्रं कर्मजमाप्नोति शुभं वा यदि वाशुभम् ॥ ५ ॥

जीव पहले पुरुषके वीर्यमें प्रविष्ट होता है, फिर स्त्रीके गर्भाशयमें जाकर उसके रजमें मिल जाता है । तत्पश्चात् उसे कर्मानुसार शुभ या अशुभ शरीरकी प्राप्ति होती है ॥ ५ ॥

सौक्ष्म्यादव्यक्तभावाच्च न च क्वचन सज्जति ।

सम्प्राप्य ब्राह्मणः कामं तस्मात् तद् ब्रह्म शाश्वतम् ॥ ६ ॥

जीव अपनी इच्छाके अनुसार उस शरीरमें प्रवेश करके सूक्ष्म और अव्यक्त होनेके कारण कहीं आसक्त नहीं होता है; क्योंकि वास्तवमें वह सनातन परब्रह्म - स्वरूप है ॥ ६ ॥

तद् बीजं सर्वभूतानां तेन जीवन्ति जन्तवः ।

पृष्ठ 1666

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स जीवः सर्वगात्राणि गर्भस्याविश्य भागशः ॥ ७ ॥

दधाति चेतसा सद्यः प्राणस्थानेष्ववस्थितः ।

ततः स्पन्दयतेऽङ्गानि स गर्भश्चेतनान्वितः ॥ ८ ॥

वह जीवात्मा सम्पूर्ण भूतोंकी स्थितिका हेतु है, क्योंकि उसीके द्वारा सब प्राणी जीवित रहते हैं । वह जीव गर्भके समस्त अंगमें प्रविष्ट हो उसके प्रत्येक अंशमें तत्काल चेतनता ला देता है और वही प्राणोंके स्थान - वक्षःस्थलमें स्थित हो समस्त अंगोंका संचालन करता है । तभी वह गर्भ चेतनासे सम्पन्न होता है ॥ ७-८ ॥

यथा लोहस्य निःस्यन्दो निषिक्तो बिम्बविग्रहम् ।

उपैति तद् विजानीहि गर्भे जीवप्रवेशनम् ॥ ९ ॥

जैसे तपाये हुए लोहेका द्रव जैसे साँचेमें ढाला जाता है उसीका रूप धारण कर लेता है, उसी प्रकार गर्भमें जीवका प्रवेश होता है, ऐसा समझो ( अर्थात् जीव जिस प्रकारकी योनिमें प्रविष्ट होता है, उसी रूपमें उसका शरीर बन जाता है ) ॥ ९ ॥

लोहपिण्डं यथा वह्निः प्रविश्य ह्यतितापयेत् ।

तथा त्वमपि जानीहि गर्भे जीवोपपादनम् ॥ १० ॥

जैसे आग लोहपिण्डमें प्रविष्ट होकर उसे बहुत तपा देती है, उसी प्रकार गर्भमें जीवका प्रवेश होता है और वह उसमें चेतनता ला देता है । इस बातको तुम अच्छी तरह समझ लो ॥ १० ॥

यथा च दीपः शरणे दीप्यमानः प्रकाशते ।

एवमेव शरीराणि प्रकाशयति चेतना ॥ ११ ॥

जिस प्रकार जलता हुआ दीपक समूचे घरमें प्रकाश फैलाता है, उसी प्रकार जीवकी चैतन्य शक्ति शरीरके सब अवयवोंको प्रकाशित करती है ॥ ११ ॥

यद् यच्च कुरुते कर्म शुभं वा यदि वाशुभम् ।

पूर्वदेहकृतं सर्वमवश्यमुपभुज्यते ॥ १२ ॥

मनुष्य शुभ अथवा अशुभ जो -जो कर्म करता है, पूर्व-जन्मके शरीरसे किये गये उन सब कर्मोंका फल उसे अवश्य भोगना पड़ता है ॥ १२ ॥

ततस्तु क्षीयते चैव पुनश्चान्यत् प्रचीयते ।

यावत् तन्मोक्षयोगस्थं धर्मं नैवावबुध्यते ॥ १३ ॥

उपभोगसे प्राचीन कर्मका तो क्षय होता है और फिर दूसरे नये - नये कर्मोंका संचय बढ़ जाता है । जबतक मोक्षकी प्राप्तिमें सहायक धर्मका उसे ज्ञान नहीं होता, तबतक यह कर्मोंकी परम्परा नहीं टूटती है ॥ १३ ॥

तत्र कर्म प्रवक्ष्यामि सुखी भवति येन वै ।

आवर्तमानो जातीषु यथान्योन्यासु सत्तम ॥ १४ ॥

पृष्ठ 1667

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साधुशिरोमणे! इस प्रकार भिन्न-भिन्न योनियोंमें भ्रमण करनेवाला जीव जिनके अनुष्ठानसे सुखी होता है, उन कर्मोंका वर्णन सुनो ॥ १४ ॥

दानं व्रतं ब्रह्मचर्यं यथोक्तं ब्रह्मधारणम् ।

दमः प्रशान्तता चैव भूतानां चानुकम्पनम् ॥ १५ ॥

संयमाश्चानृशंस्यं च परस्वादानवर्जनम् व्यलीकानामकरणं भूतानां मनसा भुवि ॥ १६ ॥

मातापित्रोश्च शुश्रूषा देवतातिथिपूजनम् ।

गुरुपूजा घृणा शौचं नित्यमिन्द्रियसंयमः ॥ १७ ॥

प्रवर्तनं शुभानां च तत् सतां वृत्तमुच्यते ।

ततो धर्मः प्रभवति यः प्रजाः पाति शाश्वतीः ॥ १८ ॥

दान, व्रत, ब्रह्मचर्य, शास्त्रोक्त रीतिसे वेदाध्ययन, इन्द्रियनिग्रह, शान्ति, समस्त प्राणियोंपर दया, चित्तका संयम, कोमलता, दूसरोंके धन लेनेकी इच्छाका त्याग, संसारके प्राणियोंका मनसे भी अहित न करना, माता- पिताकी सेवा, देवता, अतिथि और गुरुओंकी पूजा, दया, पवित्रता, इन्द्रियोंको सदा काबूमें रखना तथा शुभ कर्मोंका प्रचार करना — यह सब श्रेष्ठ पुरुषोंका बर्ताव कहलाता है । इनके अनुष्ठानसे धर्म होता है, जो सदा प्रजावर्गकी रक्षा करता है ॥ १५–१८ ॥

एवं सत्सु सदा पश्येत् तत्राप्येषा ध्रुवा स्थितिः ।

आचारो धर्ममाचष्टे यस्मिन् शान्ता व्यवस्थिताः ॥ १ ९ ॥

सत्पुरुषोंमें सदा ही इस प्रकारका धार्मिक आचरण देखा जाता है । उन्हींमें धर्मकी अटल स्थिति होती है । सदाचार ही धर्मका परिचय देता है । शान्तचित्त महात्मा पुरुष सदाचारमें ही स्थित रहते हैं ॥ १ ९ ॥

तेषु तत् कर्म निक्षिप्तं यः स धर्मः सनातनः ।

यस्तं समभिपद्येत न स दुर्गतिमाप्नुयात् ॥ २० ॥

उन्हींमें पूर्वोक्त दान आदि कर्मोंकी स्थिति है । वे ही कर्म सनातन धर्मके नामसे प्रसिद्ध हैं । जो उस सनातन धर्मका आश्रय लेता है, उसे कभी दुर्गति नहीं भोगनी पड़ती है ॥ २० ॥

अतो नियम्यते लोकः प्रच्यवन् धर्मवर्त्मसु ।

यश्च योगी च मुक्तश्च स एतेभ्यो विशिष्यते ॥ २१ ॥

इसीलिये धर्ममार्गसे भ्रष्ट होनेवाले लोगोंका नियन्त्रण किया जाता है । जो योगी और मुक्त है, वह अन्य धर्मात्माओंकी अपेक्षा श्रेष्ठ होता है ॥ २१ ॥

वर्तमानस्य धर्मेण शुभं यत्र यथा तथा ।

संसारतारणं ह्यस्य कालेन महता भवेत् ॥ २२ ॥

पृष्ठ 1668

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जो धर्मके अनुसार बर्ताव करता है, वह जहाँ जिस अवस्थामें हो, वहाँ उसी स्थितिमें उसको अपने कर्मानुसार उत्तम फलकी प्राप्ति होती है और वह धीरे - धीरे अधिक काल बीतनेपर संसार- सागरसे तर जाता है ॥

एवं पूर्वकृतं कर्म नित्यं जन्तुः प्रपद्यते ।

सर्वं तत्कारणं येन विकृतोऽयमिहागतः ॥ २३ ॥

इस प्रकार जीव सदा अपने पूर्वजन्मोंमें किये हुए कर्मोंका फल भोगता है । यह आत्मा निर्विकार ब्रह्म होनेपर भी विकृत होकर इस जगत् में जो जन्म धारण करता है, उसमें कर्म ही कारण है ॥ २३ ॥

शरीरग्रहणं चास्य केन पूर्वं प्रकल्पितम् ।

इत्येवं संशयो लोके तच्च वक्ष्याम्यतः परम् ॥ २४ ॥

आत्माके शरीर धारण करनेकी प्रथा सबसे पहले किसने चलायी है, इस प्रकारका संदेह प्रायः लोगोंके मनमें उठा करता है, अतः उसीका उत्तर दे रहा हूँ ॥ २४ ॥

शरीरमात्मनः कृत्वा सर्वलोकपितामहः ।

त्रैलोक्यमसृजद् ब्रह्मा कृत्स्नं स्थावरजङ्गमम् ॥ २५ ॥

सम्पूर्ण जगत्के पितामह ब्रह्माजीने सबसे पहले स्वयं ही शरीर धारण करके स्थावर-जंगमरूप समस्त त्रिलोकीकी ( कर्मानुसार ) रचना की ॥ २५ ॥

ततः प्रधानमसृजत् प्रकृतिं स शरीरिणाम् ।

यया सर्वमिदं व्याप्तं यां लोके परमां विदुः ॥ २६ ॥

उन्होंने प्रधान नामक तत्त्वकी उत्पत्ति की, जो देहधारी जीवोंकी प्रकृति कहलाती है । जिसने इस सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त कर रखा है तथा लोकमें जिसे मूल प्रकृतिके नामसे जानते हैं ॥ २६ ॥

इदं तत्क्षरमित्युक्तं परं त्वमृतमक्षरम् ।

त्रयाणां मिथुनं सर्वमेकैकस्य पृथक् पृथक् ॥ २७ ॥

यह प्राकृत जगत् क्षर कहलाता है, इससे भिन्न अविनाशी जीवात्माको अक्षर कहते हैं । (इनसे विलक्षण शुद्ध परब्रह्म हैं ) – इन तीनोंमेंसे जो दो तत्त्व- क्षर और अक्षर हैं, वे सब प्रत्येक जीवके लिये पृथक् - पृथक् होते हैं ॥

असृजत् सर्वभूतानि पूर्वदृष्टः प्रजापतिः ।

स्थावराणि च भूतानि इत्येषा पौर्विकी श्रुतिः ॥ २८ ॥

श्रुतिमें जो सृष्टिके आरम्भमें सत्रूपसे निर्दिष्ट हुए हैं, उन प्रजापतिने समस्त स्थावर भूतों और जंगम प्राणियोंकी सृष्टि की है, यह पुरातन श्रुति है ॥ २८ ॥

तस्य कालपरीमाणमकरोत् स पितामहः ।

भूतेषु परिवृत्तिं च पुनरावृत्तिमेव च ॥ २ ९ ॥

पृष्ठ 1669

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पितामहने जीवके लिये नियत समयतक शरीर धारण किये रहनेकी, भिन्न- भिन्न योनियोंमें भ्रमण करनेकी और परलोकसे लौटकर फिर इस लोकमें जन्म लेने आदिकी भी व्यवस्था की है ॥ २ ९ ॥

यथात्र कश्चिन्मेधावी दृष्टात्मा पूर्वजन्मनि ।

यत् प्रवक्ष्यामि तत् सर्वं यथावदुपपद्यते ॥ ३० ॥

जिसने पूर्वजन्ममें अपने आत्माका साक्षात्कार कर लिया हो, ऐसा कोई मेधावी अधिकारी पुरुष संसारकी अनित्यताके विषयमें जैसी बात कह सकता है, वैसी ही मैं भी कहूँगा । मेरी कही हुई सारी बातें यथार्थ और संगत होंगी ॥ ३० ॥

सुखदुःखे यथा सम्यगनित्ये यः प्रपश्यति ।

कायं चामेध्यसंघातं विनाशं कर्मसंहितम् ॥ ३१ ॥

यच्च किंचित्सुखं तच्च दुःखं सर्वमिति स्मरन् ।

संसारसागरं घोरं तरिष्यति सुदुस्तरम् ॥ ३२ ॥

जो मनुष्य सुख और दुःख दोनोंको अनित्य समझता है, शरीरको अपवित्र वस्तुओंका समूह समझता है और मृत्युको कर्मका फल समझता है तथा सुखके रूपमें प्रतीत होनेवाला जोकुछ भी है वह सब दुःख ही दुःख है, ऐसा मानता है, वह घोर एवं दुस्तर संसार- सागरसे पार हो जायगा ॥ ३१-३२ ॥

जातीमरणरोगैश्च समाविष्टः प्रधानवित् ।

चेतनावत्सु चैतन्यं समं भूतेषु पश्यति ॥ ३३ ॥

निर्विद्यते ततः कृत्स्नं मार्गमाणः परं पदम् ।

तस्योपदेशं वक्ष्यामि याथातथ्येन सत्तम ॥ ३४ ॥

जन्म, मृत्यु एवं रोगोंसे घिरा हुआ जो पुरुष प्रधान तत्त्व (प्रकृति )- को जानता है और समस्त चेतन प्राणियोंमें चैतन्यको समानरूपसे व्याप्त देखता है, वह पूर्ण परमपदके अनुसंधानमें संलग्न हो जगत्के भोगोंसे विरक्त हो जाता है । साधुशिरोमणे! उस वैराग्यवान् पुरुषके लिये जो हितकर उपदेश है, उसका मैं यथार्थरूपसे वर्णन करूँगा ॥

शाश्वतस्याव्ययस्याथ यदस्य ज्ञानमुत्तमम् ।

प्रोच्यमानं मया विप्र निबोधेदमशेषतः ॥ ३५ ॥

उसके लिये जो सनातन अविनाशी परमात्माका उत्तम ज्ञान अभीष्ट है, उसका मैं वर्णन करता हूँ । विप्रवर! तुम सारी बातोंको ध्यान देकर सुनो ॥ ३५ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें अट्ठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८ ॥

Fara

पृष्ठ 1670

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एकोनविंशोऽध्यायः गुरु - शिष्यके संवादमें मोक्षप्राप्तिके उपायका वर्णन ब्राह्मणउवाच

यः स्यादेकायने लीनस्तूष्णीं किंचिदचिन्तयन् ।

पूर्वं पूर्वं परित्यज्य स तीर्णो बन्धनाद् भवेत् ॥ १ ॥

सिद्ध ब्राह्मणने कहा- काश्यप! जो मनुष्य (स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरोंमेंसे क्रमशः ) पूर्व- पूर्वका अभिमान त्यागकर कुछ भी चिन्तन नहीं करता और मौनभावसे रहकर सबके एकमात्र अधिष्ठान - परब्रह्म परमात्मामें लीन रहता है, वही संसार- वन्धनसे मुक्त होता है ॥ १ ॥

सर्वमित्रः सर्वंसहः शमे रक्तो जितेन्द्रियः ।

व्यपेतभयमन्युश्च आत्मवान् मुच्यते नरः ॥ २ ॥

जो सबका मित्र, सब कुछ सहनेवाला, मनोनिग्रहमें तत्पर, जितेन्द्रिय, भय और क्रोधसे रहित तथा आत्मवान् है, वह मनुष्य बन्धनसे मुक्त हो जाता है ॥ २ ॥

आत्मवत् सर्वभूतेषु यश्चरेन्नियतः शुचिः ।

अमानी निरभीमानः सर्वतो मुक्त एव सः ॥ ३ ॥

जो नियमपरायण और पवित्र रहकर सब प्राणियोंके प्रति अपने -जैसा बर्ताव करता है, जिसके भीतर सम्मान पानेकी इच्छा नहीं है तथा जो अभिमानसे दूर रहता है, वह सर्वथा मुक्त ही है ॥ ३ ॥

जीवितं मरणं चोभे सुखदुःखे तथैव च ।

लाभालाभे प्रियद्वेष्ये यः समः स च मुच्यते ॥ ४ ॥

जो जीवन-मरण, सुख-दुःख, लाभ-हानि तथा प्रिय- अप्रिय आदि द्वन्द्वोंको समभावसे देखता है, वह मुक्त हो जाता है ॥ ४ ॥

न कस्यचित् स्पृहयते नावजानाति किंचन ।

निर्द्वन्द्वो वीतरागात्मा सर्वथा मुक्त एव सः ॥ ५ ॥

जो किसीके द्रव्यका लोभ नहीं रखता, किसीकी अवहेलना नहीं करता, जिसके मनपर द्वन्द्वोंका प्रभाव नहीं पड़ता और जिसके चित्तकी आसक्ति दूर हो गयी है, वह सर्वथा मुक्त ही है ॥ ५ ॥

अनमित्रश्च निर्बन्धुरनपत्यश्च यः क्वचित् ।

त्यक्तधर्मार्थकामश्च निराकाङ्क्षी च मुच्यते ॥ ६ ॥

जो किसीको अपना मित्र, बन्धु या संतान नहीं मानता, जिसने सकाम धर्म, अर्थ और कामका त्याग कर दिया है तथा जो सब प्रकारकी आकांक्षाओंसे रहित है, वह मुक्त हो