श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 181–190
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 181–190
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‘ बेटा! सदा सर्वतोभावसे उन्हीं भगवान् शंकरकी शरण लेकर उनकी कृपासे ही इच्छानुसार फल पा सकोगे' ॥ १२८ ॥
जनन्यास्तद् वचः श्रुत्वा तदाप्रभृति शत्रुहन् ।
प्राञ्जलिः प्रणतो भूत्वा इदमम्बामचोदयम् ॥ १२ ९ ॥
शत्रुसूदन! जननीकी वह बात सुनकर उसी समय मैंने उनके चरणोंमें प्रणाम किया और हाथ जोड़कर माताजीसे यह पूछा- ॥ १२ ९ ॥
कोऽयमम्ब महादेवः स कथं च प्रसीदति ।
कुत्र वा वसते देवो द्रष्टव्यो वा कथञ्चन ॥ १३० ॥
' अम्व! ये महादेवजी कौन हैं? और कैसे प्रसन्न होते हैं? वे शिव देवता कहाँ रहते हैं और कैसे उनका दर्शन किया जा सकता है? ॥ १३० ॥
तुष्यते वा कथं शर्वो रूपं तस्य च कीदृशम् ।
कथं ज्ञेयः प्रसन्नो वा दर्शयेज्जननि मम ॥ १३१ ॥
मेरी माँ! यह बताओ कि शिवजीका रूप कैसा है? वे कैसे संतुष्ट होते हैं? उन्हें किस तरह जाना जाय अथवा वे कैसे प्रसन्न होकर मुझे दर्शन दे सकते हैं? ' ॥ १३१ ॥
एवमुक्ता तदा कृष्ण माता मे सुतवत्सला ।
मूर्धन्याघ्राय गोविन्द सबाष्पाकुललोचना ॥ १३२ ॥
प्रमार्जन्ती च गात्राणि मम वै मधुसूदन ।
दैन्यमालम्ब्य जननी इदमाह सुरोत्तम ॥ १३३ ॥
सच्चिदानन्दस्वरूप गोविन्द! सुरश्रेष्ठ मधुसूदन! मेरे इस प्रकार पूछनेपर मेरी पुत्रवत्सला माताके नेत्रोंमें आँसू भर आये । वह मेरा मस्तक सूँघकर मेरे सभी अङ्गोंपर हाथ फेरने लगी और कुछ दीन- सी होकर यों बोली ॥ १३२-१३३ ॥ अम्बोवाच
दुर्विज्ञेयो महादेवो दुराधारो दुरन्तकः ।
दुराबाधश्च दुर्ग्राह्यो दुर्दृश्यो ह्यकृतात्मभिः ॥ १३४ ॥
माताने कहा-जिन्होंने अपने मनको वशमें नहीं किया है, ऐसे लोगोंके लिये महादेवजीका ज्ञान होना बहुत कठिन है । उनका मनसे धारण करनेमें आना मुश्किल है । उनकी प्राप्तिके मार्गमें बड़े - बड़े विघ्न हैं । दुस्तर बाधाएँ हैं । उनका ग्रहण और दर्शन होना भी अत्यन्त कठिन है ॥ १३४ ॥
यस्य रूपाण्यनेकानि प्रवदन्ति मनीषिणः ।
स्थानानि च विचित्राणि प्रसादाश्चाप्यनेकशः ॥ १३५ ॥
मनीषी पुरुष कहते हैं कि भगवान् शंकरके अनेक रूप हैं । उनके रहनेके विचित्र स्थान हैं और उनका कृपाप्रसाद भी अनेक रूपोंमें प्रकट होता है ॥ १३५ ॥
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को हि तत्त्वेन तद् वेद ईशस्य चरितं शुभम् ।
कृतवान् यानि रूपाणि देवदेवः पुरा किल ।
क्रीडते च तथा शर्वः प्रसीदति यथा च वै ॥ १३६ ॥
पूर्वकालमें देवाधिदेव महादेवने जो - जो रूप धारण किये हैं, ईश्वरके उस शुभ चरित्रको कौन यथार्थरूपसे जानता है? वे कैसे क्रीडा करते हैं और किस तरह प्रसन्न होते हैं? यह कौन समझ सकता है ॥ १३६ ॥
हृदिस्थः सर्वभूतानां विश्वरूपो महेश्वरः ।
भक्तानामनुकम्पार्थं दर्शनं च यथाश्रुतम् ॥ १३७ ॥
मुनीनां ब्रुवतां दिव्यमीशानचरितं शुभम् । वे विश्वरूपधारी महेश्वर समस्त प्राणियोंके हृदयमन्दिरमें विराजमान हैं । वे भक्तोंपर कृपा करनेके लिये किस प्रकार दर्शन देते हैं? यह शंकरजीके दिव्य एवं कल्याणमय चरित्रका वर्णन करनेवाले मुनियोंके मुखसे जैसा मैंने सुना है वह बताऊँगी ॥ १३७३ ॥
कृतवान् यानि रूपाणि कथितानि दिवौकसैः ॥ १३८ ॥
अनुग्रहर्थं विप्राणां शृणु वत्स समासतः ।
तानि ते कीर्तयिष्यामि यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ १३ ९ ॥
वत्स! उन्होंने ब्राह्मणोंपर अनुग्रह करनेके लिये देवताओंद्वारा कथित जो -जो रूप ग्रहण किये हैं, उन्हें संक्षेपसे सुनो । वत्स! तुम मुझसे जो कुछ पूछ रहे हो, वे सारी बातें मैं तुम्हें बताऊँगी ॥ १३८-१३९ ॥ अम्बोवाच
ब्रह्मविष्णुसुरेन्द्राणां रुद्रादित्याश्विनामपि ।
विश्वेषामपि देवानां वपुर्धारयते भवः ॥ १४० ॥
ऐसा कहकर माता फिर कहने लगी- भगवान् शिव ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, रुद्र, आदित्य, अश्विनीकुमार तथा सम्पूर्ण देवताओंका शरीर धारण करते हैं ॥ १४० ॥
नराणां देवनारीणां तथा प्रेतपिशाचयोः ।
किरातशबराणां च जलजानामनेकशः ॥ १४१ ॥
करोति भगवान् रूपमाटव्यशबराण्यपि । वे भगवान् पुरुषों, देवांगनाओं, प्रेतों, पिशाचों, किरातों, शबरों, अनेकानेक जलजन्तुओं तथा जंगली भीलोंके भी रूप ग्रहण कर लेते हैं ॥ १४१ ॥
कूर्मो मत्स्यस्तथा शङ्खः प्रवालाङ्कुरभूषणः ॥ १४२ ॥
यक्षराक्षससर्पाणां दैत्यदानवयोरपि ।
वपुर्धारयते देवो भूयश्च विलवासिनाम् ॥ १४३ ॥
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कूर्म, मत्स्य, शंख, नये - नये पल्लवोंके अंकुरसे सुशोभित होनेवाले वसंत आदिके रूपोंमें भी वे ही प्रकट होते हैं । वे महादेवजी यक्ष, राक्षस, सर्प, दैत्य, दानव और पातालवासियोंका भी रूप धारण करते हैं ॥ १४२-१४३ ॥
व्याघ्रसिंहमृगाणां च तरवृक्षपतत्रिणाम् ।
उलूकश्वशृगालानां रूपाणि कुरुतेऽपि च ॥ १४४ ॥
वे व्याघ्र, सिंह, मृग, तरक्षु, रीछ, पक्षी, उल्लू, कुत्ते और सियारोंके भी रूप धारण कर लेते हैं ॥ १४४ ॥
हंसकाकमयूराणां कृकलासकसारसाम् ।
रूपाणि च बलाकानां गृध्रचक्राङ्गयोरपि ॥ १४५ ॥
करोति वा स रूपाणि धारयत्यपि पर्वतम् ।
गोरूपं च महादेवो हस्त्यश्वोष्ट्रखराकृतिः ॥ १४६ ॥
हंस, काक, मोर, गिरगिट, सारस, बगले, गीध और चक्रांग ( सविशेष ) के भी रूप वे महादेवजी धारण करते हैं । पर्वत, गाय, हाथी, घोड़े, ऊँट और गदहेके आकारमें भी वे प्रकट हो जाते हैं ॥ १४५-१४६ ॥
छागशार्दूलरूपश्च अनेकमृगरूपधृक् ।
अण्डजानां च दिव्यानां वपुर्धारयते भवः ॥ १४७ ॥
वे बकरे और शार्दूलके रूपमें भी उपलब्ध होते हैं। नाना प्रकारके मृगों –वन्य पशुओंके भी रूप धारण करते हैं तथा भगवान् शिव दिव्य पक्षियोंके भी रूप धारण कर लेते हैं ॥ १४७ ॥
दण्डी छत्री च कुण्डी च द्विजानां धारणस्तथा ।
षण्मुखो वै बहुमुखस्त्रिनेत्रो बहुशीर्षकः ॥ १४८ ॥
वे द्विजोंके चिह्न दण्ड, छत्र और कुण्ड ( कमण्डलु) धारण करते हैं । कभी छः मुख और कभी बहुत - से मुखवाले हो जाते हैं । कभी तीन नेत्र धारण करते हैं । कभी बहुत - से मस्तक बना लेते हैं ॥ १४८ ॥
अनेककटिपादश्च अनेकोदरवक्त्रधृक् ।
अनेकपाणिपार्श्वश्च अनेकगणसंवृतः ॥ १४ ९ ॥
उनके पैर और कटिभाग अनेक हैं । वे बहुसंख्यक पेट और मुख धारण करते हैं । उनके हाथ और पार्श्वभाग भी अनेकानेक हैं । अनेक पार्षदगण उन्हें सब ओरसे घेरे रहते हैं ॥ १४ ९ ॥
ऋषिगन्धर्वरूपश्च सिद्धचारणरूपधृक् ।
भस्मपाण्डुरगात्रश्च चन्द्रार्धकृत भूषणः ॥ १५० ॥
वे ऋषि और गन्धर्वरूप हैं । सिद्ध और चारणोंके भी रूप धारण करते हैं । उनका सारा शरीर भस्म रमाये रहनेसे सफेद जान पड़ता है । वे ललाटमें अर्द्धचन्द्रका आभूषण धारण
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करते हैं ॥ १५० ॥
अनेकरावसंघुष्टश्चानेकस्तुतिसंस्कृतः ।
सर्वभूतान्तकः सर्वः सर्वलोकप्रतिष्ठितः ॥ १५१ ॥
उनके पास अनेक प्रकारके शब्दोंका घोष होता रहता है । वे अनेक प्रकारकी स्तुतियोंसे सम्मानित होते हैं, समस्त प्राणियोंका संहार करते हैं, स्वयं सर्वस्वरूप हैं तथा सबके अन्तरात्मारूपसे सम्पूर्ण लोकोंमें प्रतिष्ठित हैं ॥ १५१ ॥
सर्वलोकान्तरात्मा च सर्वगः सर्ववाद्यपि ।
सर्वत्र भगवान् ज्ञेयो हृदिस्थः सर्वदेहिनाम् ॥ १५२ ॥
वे सम्पूर्ण जगत्के अन्तरात्मा, सर्वव्यापी और सर्ववादी हैं, उन भगवान् शिवको सर्वत्र और सम्पूर्ण देहधारियोंके हृदयमें विराजमान जानना चाहिये ॥ १५२ ॥
यो हि यं कामयेत् कामं यस्मिन्नर्थेऽर्च्यते पुनः ।
तत् सर्वं वेत्ति देवेशस्तं प्रपद्य यदीच्छसि ॥ १५३ ॥
जो जिस मनोरथको चाहता है और जिस उद्देश्यसे उसके द्वारा भगवान्की अर्चना की जाती है, देवेश्वर भगवान् शिव वह सब जानते हैं । इसलिये यदि तुम कोई वस्तु चाहते हो तो उन्हींकी शरण लो ॥ १५३ ॥
नन्दते कुप्यते चापि तथा हुंकारयत्यपि ।
चक्री शूली गदापाणिर्मुसली खड्गपट्टिशी ॥ १५४ ॥
वे कभी आनन्दित रहकर आनन्द देते, कभी कुपित होकर कोप प्रकट करते और कभी हुंकार करते हैं, अपने हाथोंमें चक्र, शूल, गदा, मुसल, खड्ग और पट्टिश धारण करते हैं ॥ १५४ ॥
भूधरो नागमौञ्जी च नागकुण्डलकुण्डली ।
नागयज्ञोपवीती च नागचर्मोत्तरच्छदः ॥ १५५ ॥
वे धरणीधर शेषनागरूप हैं, वे नागकी मेखला धारण करते हैं । नागमय कुण्डलसे कुण्डलधारी होते हैं । नागोंका ही यज्ञोपवीत धारण करते हैं तथा नागचर्मका ही उत्तरीय (चादर ) लिये रहते हैं ॥ १५५ ॥
हसते गायते चैव नृत्यते च मनोहरम् ।
वादयत्यपि वाद्यानि विचित्राणि गणैर्युतः ॥ १५६ ॥
वे अपने गणोंके साथ रहकर हँसते हैं, गाते हैं, मनोहर नृत्य करते हैं और विचित्र बाजे भी बजाते हैं ॥ १५६ ॥
वल्गते जृम्भते चैव रुदते रोदयत्यपि ।
उन्मत्तमत्तरूपं च भाषते चापि सुस्वरः ॥ १५७ ॥
भगवान् रुद्र उछलते - कूदते हैं । जँभाई लेते हैं । रोते हैं, रुलाते हैं । कभी पागलों और मतवालोंकी तरह बातें करते हैं और कभी मधुर स्वरसे उत्तम वचन बोलते हैं ॥ १५७ ॥
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अतीव हसते रौद्रस्त्रासयन् नयनैर्जनम् ।
जागर्ति चैव स्वपिति जृम्भते च यथासुखम् ॥ १५८ ॥
कभी भयंकर रूप धारण करके अपने नेत्रोंद्वारा लोगोंमें त्रास उत्पन्न करते हुए जोर-जोरसे अट्टहास करते, जागते, सोते और मौजसे अँगड़ाई लेते हैं ॥
जपते जप्यते चैव तपते तप्यते पुनः ।
ददाति प्रतिगृह्णाति युञ्जते ध्यायतेऽपि च ॥ १५ ९ ॥
वे जप करते हैं और वे ही जपे जाते हैं; तप करते हैं और तपे जाते हैं ( उन्हींके उद्देश्यसे तप किया जाता है ) । वे दान देते और दान लेते हैं तथा योग और ध्यान करते हैं ॥ १५ ९ ॥
वेदीमध्ये तथा यूपे गोष्ठमध्ये हुताशने ।
दृश्यते दृश्यते चापि बालो वृद्धो युवा तथा ॥ १६० ॥
यज्ञकी वेदीमें, यूपमें, गौशालामें तथा प्रज्वलित अग्निमें वे ही दिखायी देते हैं । बालक, वृद्ध और तरुणरूपमें भी उनका दर्शन होता है ॥ १६० ॥
क्रीडते ऋषिकन्याभिरृषिपत्नीभिरेव च ।
ऊर्ध्वकेशो महाशेफो नग्नो विकृतलोचनः ॥ १६१ ॥
वे ऋषिकन्याओं तथा मुनिपत्नियोंके साथ खेला करते हैं । कभी ऊर्ध्वकेश (ऊपर उठे हुए बालवाले ), कभी महालिंग, कभी नंग- धड़ंग और कभी विकराल नेत्रोंसे युक्त हो जाते ॥ १६१ ॥
गौरः श्यामस्तथा कृष्णः पाण्डुरो धूमलोहितः ।
विकृताक्षो विशालाक्षो दिग्वासाः सर्ववासकः ॥ १६२ ॥
कभी गोरे, कभी साँवले, कभी काले, कभी सफेद, कभी धूएँके समान रंगवाले एवं लोहित दिखायी देते हैं । कभी विकृत नेत्रोंसे युक्त होते हैं । कभी सुन्दर विशाल नेत्रोंसे सुशोभित होते हैं । कभी दिगम्बर दिखायी देते हैं और कभी सब प्रकारके वस्त्रोंसे विभूषित होते हैं ॥ १६२ ॥
अरूपस्याद्यरूपस्य अतिरूपाद्यरूपिणः ।
अनाद्यन्तमजस्यान्तं वेत्स्यते कोऽस्य तत्त्वतः ॥ १६३ ॥
वे रूपरहित हैं । उनका स्वरूप ही सबका आदिकारण है । वे रूपसे अतीत हैं । सबसे पहले जिसकी सृष्टि हुई है जल उन्हींका रूप है । इन अजन्मा महादेवजीका स्वरूप आदि-अन्तसे रहित है । उसे कौन ठीक- ठीक जान सकता है ॥ १६३ ॥
हृदि प्राणो मनो जीवो योगात्मा योगसंज्ञितः ।
ध्यानं तत्परमात्मा च भावग्राह्यो महेश्वरः ॥ १६४ ॥
भगवान् शंकर प्राणियोंके हृदयमें प्राण, मन एवं जीवात्मारूपसे विराजमान हैं । वे ही योगस्वरूप, योगी, ध्यान तथा परमात्मा हैं । भगवान् महेश्वर भक्तिभावसे ही गृहीत होते
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हैं ॥ १६४ ॥
वादको गायनश्चैव सहस्रशतलोचनः ।
एकवक्त्रो द्विवक्त्रश्च त्रिवक्त्रोऽनेकवक्त्रकः ॥ १६५ ॥
वे बाजा बजानेवाले और गीत गानेवाले हैं । उनके लाखों नेत्र हैं । वे एकमुख, द्विमुख, त्रिमुख और अनेक मुखवाले हैं ॥ १६५ ॥
तद्भक्तस्तद्गतो नित्यं तन्निष्ठस्तत्परायणः ।
भज पुत्र महादेवं ततः प्राप्स्यसि चेप्सितम् ॥ १६६ ॥
बेटा! तुम उन्हींके भक्त बनकर उन्हींमें आसक्त रहो । सदा उन्हींपर निर्भर रहो और उन्हींके शरणागत होकर महादेवजीका निरन्तर भजन करते रहो । इससे तुम्हें मनोवाञ्छित वस्तुकी प्राप्ति होगी ॥ १६६ ॥
जनन्यास्तद् वचः श्रुत्वा तदाप्रभृति शत्रुहन् ।
मम भक्तिर्महादेवे नैष्ठिकी समपद्यत ॥ १६७ ॥
शत्रुसूदन श्रीकृष्ण! माताका वह उपदेश सुनकर तभीसे महादेवजीके प्रति मेरी सुदृढ़ भक्ति हो गयी ॥
ततोऽहं तप आस्थाय तोषयामास शङ्करम् ।
एकं वर्षसहस्रं तु वामाङ्गुष्ठाग्रविष्ठितः ॥ १६८ ॥
तदनन्तर मैंने तपस्याका आश्रय ले भगवान् शंकरको संतुष्ट किया । एक हजार वर्षतक केवल बायें पैरके अँगूठेके अग्रभागके बलपर मैं खड़ा रहा ॥ १६८ ॥
एकं वर्षशतं चैव फलाहारस्ततोऽभवम् ।
द्वितीयं शीर्णपर्णाशी तृतीयं चाम्बुभोजनः ॥ १६ ९ ॥
पहले तो एक सौ वर्षोंतक मैं फलाहारी रहा । दूसरे शतकमें गिरे पड़े सूखे पत्ते चबाकर रहा और तीसरे शतकमें केवल जल पीकर ही प्राण धारण करता रहा ॥ १६ ९ ॥
शतानि सप्त चैवाहं वायुभक्षस्तदाभवम् ।
एकं वर्षसहस्रं तु दिव्यमाराधितो मया ॥ १७० ॥
फिर शेष सात सौ वर्षोंतक केवल हवा पीकर रहा । इस प्रकार मैंने एक सहस्र दिव्य वर्षोंतक उनकी आराधना की ॥ १७० ॥
ततस्तुष्टो महादेवः सर्वलोकेश्वरः प्रभुः ।
एकभक्त इति ज्ञात्वा जिज्ञासां कुरुते तदा ॥ १७१ ॥
तदनन्तर सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी भगवान् महादेव मुझे अपना अनन्यभक्त जानकर संतुष्ट हुए और मेरी परीक्षा लेने लगे ॥ १७१ ॥
शक्ररूपं स कृत्वा तु सर्वैर्देवगणैर्वृतः ।
सहस्राक्षस्तदा भूत्वा वज्रपाणिर्महायशाः ॥ १७२ ॥
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उन्होंने सम्पूर्ण देवताओंसे घिरे हुए इन्द्रका रूप धारण करके पदार्पण किया । उस समय उनके सहस्र नेत्र शोभा पा रहे थे । उन महायशस्वी इन्द्रके हाथमें वज्र प्रकाशित हो रहा था ॥ १७२ ॥
सुधावदातं रक्ताक्षं स्तब्धकर्णं मदोत्कटम् ।
आवेष्टितकरं घोरं चतुर्दंष्ट्रं महागजम् ॥ १७३ ॥
समास्थितः स भगवान् दीप्यमानः स्वतेजसा ।
आजगाम किरीटी तु हारकेयूरभूषितः ॥ १७४ ॥
वे भगवान् इन्द्र लाल नेत्र और खड़े कानवाले, सुधाके समान उज्ज्वल, मुड़ी हुई सूँड़से सुशोभित, चार दाँतोंसे युक्त और देखनेमें भयंकर मदसे उन्मत्त महान् गजराज ऐरावतकी पीठपर बैठकर अपने तेजसे प्रकाशित होते हुए वहाँ पधारे । उनके मस्तकपर मुकुट, गलेमें हार और भुजाओंमें केयूर शोभा दे रहे थे ॥ १७३-१७४ ॥
पाण्डुरेणातपत्रेण ध्रियमाणेन मूर्धनि ।
सेव्यमानोऽप्सरोभिश्च दिव्यगन्धर्वनादितैः ॥ १७५ ॥
सिरपर श्वेत छत्र तना हुआ था । अप्सराएँ उनकी सेवा कर रही थीं और दिव्य गन्धर्वोंके संगीतकी मनोरम ध्वनि वहाँ सब ओर गूँज रही थी ॥ १७५ ॥
ततो मामाह देवेन्द्रस्तुष्टस्तेऽहं द्विजोत्तम ।
वरं वृणीष्व मत्तस्त्वं यत् ते मनसि वर्तते ॥ १७६ ॥
शक्रस्य तु वचः श्रुत्वा नाहं प्रीतमनाभवम् ।
अब्रुवंश्च तदा हृष्टो देवराजमिदं वचः ॥ १७७ ॥
उस समय देवराज इन्द्रने मुझसे कहा- ' द्विजश्रेष्ठ! मैं तुमपर बहुत संतुष्ट हूँ। तुम्हारे मनमें जो वर लेनेकी इच्छा हो, वही मुझसे माँग लो। ' इन्द्रकी बात सुनकर मेरा मन प्रसन्न नहीं हुआ । मैंने ऊपरसे हर्ष प्रकट करते हुए देवराजसे यह कहा- ॥ १७६-१७७ ॥
नाहं त्वत्तो वरं काङ्क्षे नान्यस्मादपि दैवतात् ।
महादेवादृते सौम्य सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ १७८ ॥
‘ सौम्य! मैं महादेवजीके सिवा तुमसे या दूसरे किसी देवतासे वर लेना नहीं चाहता । यह मैं सच्ची बात कहता हूँ ॥ १७८ ॥
सत्यं सत्यं हि नः शक्र वाक्यमेतत् सुनिश्चितम् ।
न यन्महेश्वरं मुक्त्वा कथान्या मम रोचते ॥ १७९ ॥
‘ इन्द्र! हमारा यह कथन सत्य है, सत्य है और सुनिश्चित है । मुझे महादेवजीको छोड़कर और कोई बात अच्छी ही नहीं लगती है ॥ १७ ९ ॥ पशुपतिवचनाद् भवामि सद्यः कृमिरथवा तरुरप्यनेकशाखः । अपशुपतिवरप्रसादजा मे
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त्रिभुवनराज्यविभूतिरप्यनिष्टा ॥ १८० ॥
‘ मैं भगवान् पशुपतिके कहनेसे तत्काल प्रसन्नतापूर्वक कीट अथवा अनेक शाखाओंसे युक्त वृक्ष भी हो सकता हूँ; परंतु भगवान् शिवसे भिन्न दूसरे किसीके वर- प्रसादसे मुझे त्रिभुवनका राज्यवैभव प्राप्त हो रहा हो तो वह भी अभीष्ट नहीं है ॥ १८० ॥
जन्म श्वपाकमध्येऽपि मेऽस्तु हरचरणवन्दनरतस्य । मा वानीश्वरभक्तो भवानि भवनेऽपि शक्रस्य ॥ १८१ ॥
‘ यदि मुझे भगवान् शंकरके चरणारविन्दोंकी वन्दनामें तत्पर रहनेका अवसर मिले तो मेरा जन्म चाण्डालोंमें भी हो जाय तो यह मुझे सहर्ष स्वीकार है । परंतु भगवान् शिवकी अनन्यभक्तिसे रहित होकर मैं इन्द्रके भवनमें भी स्थान पाना नहीं चाहता ॥ १८१ ॥
वाय्वम्बुभुजोऽपि सतो नरस्य दुःखक्षयः कुतस्तस्य । भवति हि सुरासुरगुरौ यस्य न विश्वेश्वरे भक्तिः ॥ १८२ ॥
'कोई जल या हवा पीकर ही रहनेवाला क्यों न हो, जिसकी सुरासुरगुरु भगवान् विश्वनाथमें भक्ति न हो, उसके दुःखोंका नाश कैसे हो सकता है? ॥ १८२ ॥
अलमन्याभिस्तेषां कथाभिरप्यन्यधर्मयुक्ताभिः । येषां न क्षणमपि रुचितो हरचरणस्मरणविच्छेदः ॥ १८३ ॥
‘ जिन्हें क्षणभरके लिये भी भगवान् शिवके चरणारविन्दोंके स्मरणका वियोग अच्छा नहीं लगता, उन पुरुषोंके लिये अन्यान्य धर्मोंसे युक्त दूसरी- दूसरी सारी कथाएँ व्यर्थ हैं ॥ १८३ ॥
हरचरणनिरतमतिना भवितव्यमनार्जवं युगं प्राप्य । संसारभयं न भवति हरभक्तिरसायनं पीत्वा ॥ १८४ ॥
' कुटिल कलिकालको पाकर सभी पुरुषोंको अपना मन भगवान् शंकरके चरणारविन्दोंके चिन्तनमें लगा देना चाहिये । शिव भक्तिरूपी रसायनके पी लेनेपर संसाररूपी रोगका भय नहीं रह जाता है ॥ १८४ ॥
दिवसं दिवसार्धं वा मुहूर्तं वा क्षणं लवम् ।
न ह्यलब्धप्रसादस्य भक्तिर्भवति शङ्करे ॥ १८५ ॥
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‘जिसपर भगवान् शिवकी कृपा नहीं है, उस मनुष्यकी एक दिन, आधे दिन, एक मुहूर्त, एक क्षण या एक लवके लिये भी भगवान् शंकरमें भक्ति नहीं होती है ॥ १८५ ॥
अपि कीटः पतङ्गो वा भवेयं शङ्कराज्ञया ।
न तु शक्र त्वया दत्तं त्रैलोक्यमपि कामये ॥ १८६ ॥
श्वापि महेश्वरवचनाद् भवामि स हि नः परः कामः । त्रिदशगणराज्यमपि खलु नेच्छाम्यमहेश्वराज्ञप्तम् ॥ १८७ ॥
‘ शक्र! मैं भगवान् शंकरकी आज्ञासे कीट या पतंग भी हो सकता हूँ, परंतु तुम्हारा दिया हुआ त्रिलोकीका राज्य भी नहीं लेना चाहता । महेश्वरके कहने से यदि मैं कुत्ता भी हो जाऊँ तो उसे मैं सर्वोत्तम मनोरथकी पूर्ति समझँगा; परंतु महादेवजीके सिवा दूसरे किसीसे प्राप्त हुए देवताओंके राज्यको लेनेकी भी मुझे इच्छा नहीं है ॥ १८६-१८७ ॥ न नाकपृष्ठं न च देवराज्यं न ब्रह्मलोकं न च निष्कलत्वम् । न सर्वकामानखिलान् वृणोमि हरस्य दासत्वमहं वृणोमि ॥ १८८ ॥
‘न तो मैं स्वर्गलोक चाहता हूँ, न देवताओंका राज्य पानेकी अभिलाषा रखता हूँ। न ब्रह्मलोककी इच्छा करता हूँ और न निर्गुण ब्रह्मका सायुज्य ही प्राप्त करना चाहता हूँ। भूमण्डलकी समस्त कामनाओंको भी पानेकी मेरी इच्छा नहीं है । मैं तो केवल भगवान् शिवकी दासताका ही वरण करता हूँ ॥ १८८ ॥
यावच्छशाङ्कधवलामलबद्धमौलि- र्न प्रीयते पशुपतिर्भगवान् ममेशः ।
तावज्जरामरणजन्मशताभिघातै- दुःखानि देहविहितानि समुद्वहामि ॥ १८ ९ ॥
‘ जिनके मस्तकपर अर्द्धचन्द्रमय उज्ज्वल एवं निर्मल मुकुट बँधा हुआ है, वे मेरे स्वामी भगवान् पशुपति जबतक प्रसन्न नहीं होते हैं, तबतक मैं जरा-मृत्यु और जन्मके सैकड़ों आघातोंसे प्राप्त होनेवाले दैहिक दुःखोंका भार ढोता रहूँगा ॥ १८ ९ ॥ दिवसकरशशाङ्कवह्निदीप्तं त्रिभुवनसारमसारमाद्यमेकम् । अजरममरमप्रसाद्य रुद्रं जगति पुमानिह को लभेत शान्तिम् ॥ १ ९० ॥ ' जो अपने नेत्रभूत सूर्य, चन्द्रमा और अग्निकी प्रभासे उद्भासित होते हैं, त्रिभुवनके साररूप हैं, जिनसे बढ़कर सारतत्त्व दूसरा नहीं है, जो जगत्के आदिकरण, अद्वितीय तथा
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अजर- अमर हैं, उन भगवान् रुद्रको भक्तिभावसे प्रसन्न किये बिना कौन पुरुष इस संसारमें शान्ति पा सकता है ॥ १ ९ ० ॥ यदि नाम जन्म भूयो भवति मदीयैः पुनर्दोषैः । तस्मिंस्तस्मिञ्जन्मनि भवे भवेन्मेऽक्षया भक्तिः ॥ १ ९ १ ॥ ' यदि मेरे दोषोंसे मुझे बारंबार इस जगत्में जन्म लेना पड़े तो मेरी यही इच्छा है कि उस- उस प्रत्येक जन्ममें भगवान् शिवमें मेरी अक्षय भक्ति हो ' ॥ १ ९ १ ॥ शक्र उवाच
कः पुनर्भवने हेतुरीशे कारणकारणे ।
येन शर्वादृतेऽन्यस्मात् प्रसादं नाभिकाङ्क्षसि ॥ १ ९ २ ॥
इन्द्रने पूछा- ब्रह्मन्! कारणके भी कारण जगदीश्वर शिवकी सत्तामें क्या प्रमाण है, जिससे तुम शिवके अतिरिक्त दूसरे किसी देवताका कृपा प्रसाद ग्रहण करना नहीं चाहते? ॥ १ ९ २ ॥ उपमन्युरुवाच
सदसद् व्यक्तमव्यक्तं यमाहुर्ब्रह्मवादिनः ।
नित्यमेकमनेकं च वरं तस्माद् वृणीमहे ॥ १ ९ ३ ॥
उपमन्युने कहा- देवराज! ब्रह्मवादी महात्मा जिन्हें विभिन्न मतोंके अनुसार सत्-असत्, व्यक्त - अव्यक्त, नित्य, एक और अनेक कहते हैं, उन्हीं महादेवजीसे हम वर माँगेंगे ॥ १ ९ ३ ॥
अनादिमध्यपर्यन्तं ज्ञानैश्वर्यमचिन्तितम् ।
आत्मानं परमं यस्माद् वरं तस्माद् वृणीमहे ॥ १ ९ ४ ॥
जिनका आदि, मध्य और अन्त नहीं है, ज्ञान ही जिनका ऐश्वर्य है तथा जो चित्तकी चिन्तनशक्तिसे भी परे हैं और इन्हीं कारणोंसे जिन्हें परमात्मा कहा जाता है, उन्हीं महादेवजीसे हम वर प्राप्त करेंगे ॥ १ ९ ४ ॥
ऐश्वर्यं सकलं यस्मादनुत्पादितमव्ययम् ।
अबीजाद् बीजसम्भूतं वरं तस्माद् वृणीमहे ॥ १ ९ ५ ॥
योगीलोग महादेवजीके समस्त ऐश्वर्यको ही नित्य सिद्ध और अविनाशी बताते हैं । वे कारणरहित हैं और उन्हींसे समस्त कारणोंकी उत्पत्ति हुई है । अतः महादेवजीकी ऐसी महिमा है, इसलिये हम उन्हीं से वर माँगते हैं ॥ १ ९ ५ ॥
तमसः परमं ज्योतिस्तपस्तद्वृत्तिनां परम् ।
यं ज्ञात्वा नानुशोचन्ति वरं तस्माद् वृणीमहे ॥ १ ९ ६ ॥