श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 191–200

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 191–200

पृष्ठ 191

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जो अज्ञानान्धकारसे परे चिन्मय परमज्योतिःस्वरूप हैं, तपस्वीजनोंके परम तप हैं तथा जिनका ज्ञान प्राप्त करके ज्ञानी पुरुष कभी शोक नहीं करते हैं, उन्हीं भगवान् शिवसे हम वर प्राप्त करना चाहते हैं ॥ १ ९ ६ ॥

भूतभावनभावज्ञं सर्वभूताभिभावनम् ।

सर्वगं सर्वदं देवं पूजयामि पुरन्दर ॥ १ ९ ७ ॥

पुरंदर! जो सम्पूर्ण भूतोंके उत्पादक तथा उनके मनोभावोंको जाननेवाले हैं, समस्त प्राणियोंके पराभव ( विलय ) - के भी जो एकमात्र स्थान हैं तथा जो सर्वव्यापी और सब कुछ देनेमें समर्थ हैं, उन्हीं महादेवजीकी मैं पूजा करता हूँ ॥ १ ९ ७ ॥

हेतुवादैर्विनिर्मुक्तं सांख्ययोगार्थदं परम् ।

यमुपासन्ति तत्त्वज्ञा वरं तस्माद् वृणीमहे ॥ १ ९ ८ ॥

जो युक्तिवादसे दूर हैं, जो अपने भक्तोंको सांख्य और योगका परम प्रयोजन ( आत्यन्तिक दुःखनिवृत्ति और ब्रह्मसाक्षात्कार) प्रदान करनेवाले हैं, तत्त्वज्ञ पुरुष जिनकी सदा उपासना करते हैं, उन्हीं महादेवजीसे हम वरके लिये प्रार्थना करते हैं ॥ १ ९ ८ ॥

मघवन् मघवात्मानं यं वदन्ति सुरेश्वरम् ।

सर्वभूतगुरुं देवं वरं तस्माद् वृणीमहे ॥ १ ९९ ॥

मघवन्! ज्ञानी पुरुष जिन्हें देवेश्वर इन्द्ररूप तथा सम्पूर्ण भूतोंके गुरुदेव बताते हैं, उन्हींसे हम वर लेना चाहते हैं ॥ १ ९९ ॥

यः पूर्वमसृजद् देवं ब्रह्माणं लोकभावनम् ।

अण्डमाकाशमापूर्य वरं तस्माद् वृणीमहे ॥ २०० ॥

जिन्होंने पूर्वकालमें आकाशव्यापी ब्रह्माण्ड एवं लोकस्रष्टा देवेश्वर ब्रह्माको उत्पन्न किया, उन्हीं महादेवजीसे हम वर प्राप्त करना चाहते हैं ॥ २०० ॥

अग्निरापोऽनिलः पृथ्वी खं बुद्धिश्च मनो महान् ।

स्रष्टा चैषां भवेद् योऽन्यो ब्रूहि कः परमेश्वरात् ॥ २०१ ॥

देवराज! जो अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार— इन सबका स्रष्टा हो, वह परमेश्वरसे भिन्न दूसरा कौन पुरुष है? यह बताओ ॥

मनो मतिरहंकारस्तन्मात्राणीन्द्रियाणि च ।

ब्रूहि चैषां भवेच्छक्र कोऽन्योऽस्ति परमं शिवात् ॥ २०२ ॥

शक्र! जो मन, बुद्धि, अहंकार, पञ्चतन्मात्रा और दस इन्द्रिय- इन सबकी सृष्टि कर सके, ऐसा कौन पुरुष है जो भगवान् शिवसे भिन्न अथवा उत्कृष्ट हो? यह बताओ ॥ २०२ ॥

स्रष्टारं भुवनस्येह वदन्तीह पितामहम् ।

आराध्य स तु देवेशमनुते महतीं श्रियम् ॥ २०३ ॥

पृष्ठ 192

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ज्ञानी महात्मा ब्रह्माजीको ही सम्पूर्ण विश्वका स्रष्टा बताते हैं । परंतु वे देवेश्वर महादेवजीकी आराधना करके ही महान् ऐश्वर्य प्राप्त करते हैं ॥ २०३ ॥

भगवत्युत्तमैश्वर्यं ब्रह्मविष्णुपुरोगमम् ।

विद्यते वै महादेवाद् ब्रूहि कः परमेश्वरात् ॥ २०४ ॥

जिस भगवान्में ब्रह्मा और विष्णुसे भी उत्तम ऐश्वर्य है, वह परमेश्वर महादेवके सिवा दूसरा कौन है? यह बताओ तो सही ॥ २०४ ॥

दैत्यदानवमुख्यानामाधिपत्यारिमर्दनात् ।

कोऽन्यः शक्नोति देवेशाद् दितेः सम्पादितुं सुतान् ॥ २०५ ॥

दैत्यों और दानवोंके प्रमुख वीर हिरण्यकशिपु आदिमें जो तीनों लोकोंपर आधिपत्य स्थापित करने और अपने शत्रुओंको कुचल देनेकी शक्ति सुनी गयी है, उसपर दृष्टिपात करके मैं यह पूछ रहा हूँ कि देवेश्वर महादेवके सिवा दूसरा कौन ऐसा है जो दितिके पुत्रोंको इस प्रकार अनुपम ऐश्वर्यसे सम्पन्न कर सके? ॥

दिक्कालसूर्यतेजांसि ग्रहवाय्विन्दुतारकाः ।

विद्धि त्वेते महादेवाद् ब्रूहि कः परमेश्वरात् ॥ २०६ ॥

दिशा, काल, सूर्य, अग्नि, अन्य ग्रह, वायु, चन्द्रमा और नक्षत्र– ये महादेवजीकी कृपासे ही ऐसे प्रभावशाली हुए हैं । इस बातको तुम जानते हो, अतः तुम्हीं बताओ, परमेश्वर महादेवजीके सिवा दूसरा कौन ऐसी अचिन्त्य शक्तिसे सम्पन्न है? ॥ २०६ ॥

अथोत्पत्तिविनाशे वा यज्ञस्य त्रिपुरस्य वा ।

दैत्यदानवमुख्यानामाधिपत्यारिमर्दनः ॥ २०७ ॥

यज्ञकी उत्पत्ति और त्रिपुरका विनाश भी उन्हींके द्वारा सम्पन्न हुआ है । प्रधान-प्रधान दैत्यों और दानवोंको आधिपत्य प्रदान करने और शत्रुमर्दनकी शक्ति देनेवाले भी वे ही हैं ॥ २०७ ॥

किं चात्र बहुभिः सूक्तैर्हेतुवादैः पुरंदर ।

सहस्रनयनं दृष्ट्वा त्वामेव सुरसत्तम ॥ २०८ ॥

पूजितं सिद्धगन्धर्वैर्देवैश्च ऋषिभिस्तथा ।

देवदेवप्रसादेन तत् सर्वं कुशिकोत्तम ॥ २० ९ ॥

सुरश्रेष्ठ पुरंदर! कौशिकवंशावतंस इन्द्र! यहाँ बहुत- सी युक्तियुक्त सूक्तियोंको सुनानेसे क्या लाभ? आप जो सहस्र नेत्रोंसे सुशोभित हैं तथा आपको देखकर सिद्ध, गन्धर्व, देवता और ऋषि जो सम्मान प्रदर्शित करते हैं, वह सब देवाधिदेव महादेवके प्रसादसे ही सम्भव हुआ है ॥ २०८-२०९ ॥

अव्यक्तमुक्तकेशाय सर्वगस्येदमात्मकम् ।

चेतनाचेतनाद्येषु शक्र विद्धि महेश्वरात् ॥ २१० ॥

पृष्ठ 193

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इन्द्र! चेतन और अचेतन आदि समस्त पदार्थोंमें ' यह ऐसा है ' इस प्रकारका जो लक्षण देखा जाता है, वह सब अव्यक्त, मुक्तकेश एवं सर्वव्यापी महादेवजीके ही प्रभावसे प्रकट है; अतएव सब कुछ महेश्वरसे ही उत्पन्न हुआ है - ऐसा समझो ॥ २१० ॥

भुवाद्येषु महान्तेषु लोकालोकान्तरेषु च ।

द्वीपस्थानेषु मेरोश्च विभवेष्वन्तरेषु च ॥ २११ ॥

भगवन् मघवन् देवं वदन्ते तत्त्वदर्शिनः । भगवान् देवराज! भूलोकसे लेकर महर्लोकतक समस्त लोक- लोकान्तरोंमें, पर्वतके मध्यभागमें, सम्पूर्ण द्वीपस्थानोंमें, मेरुपर्वतके वैभवपूर्ण प्रान्तोंमें सर्वत्र ही तत्त्वदर्शी पुरुष महादेवजीकी स्थिति बताते हैं ॥ २११३ ॥

यदि देवाः सुराः शक्र पश्यन्त्यन्यां भवाद् गतिम् ॥ २१२ ॥

किं न गच्छन्ति शरणं मर्दिताश्चासुरैः सुराः । शक्र! यदि तेजस्वी देवगण महादेवजीके सिवा दूसरा कोई सहारा देखते हैं तो असुरोंद्वारा कुचले जानेपर वे उसीकी शरणमें क्यों नहीं जाते हैं? ॥ २१२३ ॥

अभिघातेषु देवानां सयक्षोरगरक्षसाम् ॥ २१३ ॥

परस्परविनाशेषु स्वस्थानैश्वर्यदो भवः । देवता, यक्ष, नाग और राक्षस- इनमें जब संघर्ष होता और परस्पर एक- दूसरेसे विनाशका अवसर उपस्थित होता है तब उन्हें अपने स्थान और ऐश्वर्यकी प्राप्ति करानेवाले भगवान् शिव ही हैं ॥ २१३ ॥

अन्धकस्याथ शुक्रस्य दुन्दुभेर्महिषस्य च ॥ २१४ ॥

यक्षेन्द्रबलरक्षःसु निवातकवचेषु च ।

वरदानावघाताय ब्रूहि कोऽन्यो महेश्वरात् ॥ २१५ ॥

बताओ तो सही, अन्धकको, शुक्रको, दुन्दुभिको, महिषको, यक्षराज कुबेरकी सेनाके राक्षसोंको तथा निवातकवच नामक दानवोंको वरदान देने और उनका विनाश करनेमें भगवान् महेश्वरको छोड़कर दूसरा कौन समर्थ है? ॥ २१४-२१५ ॥

सुरासुरगुरोर्वक्त्रे कस्य रेतः पुरा हुतम् ।

कस्य वान्यस्य रेतस्तद् येन हैमो गिरिः कृतः ॥ २१६ ॥

पूर्वकालमें महादेवजीके सिवा दूसरे किस देवताके वीर्यकी देवासुरगुरु अग्निके मुखमें आहुति दी गयी थी? जिसके द्वारा सुवर्णमय मेरुगिरिका निर्माण हुआ, वह भगवान् शिवके सिवा और किस देवताका वीर्य था? ॥ २१६ ॥

दिग्वासाः कीर्त्यते कोऽन्यो लोके कश्चोर्ध्वरेतसः ।

कस्य चार्धे स्थिता कान्ता अनङ्गः केन निर्जितः ॥ २१७ ॥

दूसरा कौन दिगम्बर कहलाता है? संसारमें दूसरा कौन ऊर्ध्वरेता है? किसके आधे शरीरमें धर्मपत्नी स्थित रहती है तथा किसने कामदेवको परास्त किया है? ॥

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ब्रूहीन्द्र परमं स्थानं कस्य देवैः प्रशस्यते ।

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श्मशाने कस्य क्रीडार्थं नृत्ते वा कोऽभिभाष्यते ॥ २१८ ॥

इन्द्र! बताओ तो सही, किसके उत्कृष्ट स्थानकी देवताओंद्वारा प्रशंसा की जाती है? किसकी क्रीड़ाके लिये श्मशानभूमिमें स्थान नियत किया गया है? तथा ताण्डव- नृत्यमें कौन सर्वोपरि बताया जाता है ॥ २१८ ॥

कस्यैश्वर्यं समानं च भूतैः को वापि क्रीडते ।

कस्य तुल्यबला देव गणाश्चैश्वर्यदर्पिताः ॥ २१ ९ ॥

भगवान् शंकरके समान दूसरे किसका ऐश्वर्य है? कौन भूतोंके साथ क्रीड़ा करता है? देव! किसके पार्षदगण स्वामीके समान ही बलवान् और ऐश्वर्यपर अभिमान करनेवाले हैं? ॥ २१ ९ ॥

घुष्यते ह्यचलं स्थानं कस्य त्रैलोक्यपूजितम् ।

वर्षते तपते कोऽन्यो ज्वलते तेजसा च कः ॥ २२० ।

किसका स्थान तीनों लोकोंमें पूजित और अविचल बताया जाता है । भगवान् शंकरके सिवा दूसरा कौन वर्षा करता है? कौन तपता है? और कौन अपने तेजसे प्रज्वलित होता है? ॥ २२० ॥

कस्मादोषधिसम्पत्तिः को वा धारयते वसु ।

प्रकामं क्रीडते को वा त्रैलोक्ये सचराचरे ॥ २२१ ॥

किससे ओषधियाँ — खेती- बारी या शस्य - सम्पत्ति बढ़ती है? कौन धनका धारण - पोषण करता है? कौन चराचर प्राणियोंसहित त्रिलोकीमें इच्छानुसार क्रीड़ा करता है? ॥ २२१ ॥

ज्ञानसिद्धिक्रियायोगैः सेव्यमानश्च योगिभिः ।

ऋषिगन्धर्वसिद्धैश्च विहितं कारणं परम् ॥ २२२ ॥

योगीजन ज्ञान, सिद्धि और क्रिया- योगद्वारा भगवान् शिवकी ही सेवा करते हैं तथा ऋषि, गन्धर्व और सिद्धगण उन्हें ही परम कारण मानकर उनका आश्रय लेते हैं ॥ २२२ ॥

कर्मयज्ञक्रियायोगैः सेव्यमानः सुरासुरैः ।

नित्यं कर्मफलैर्हीनं तमहं कारणं वदे ॥ २२३ ॥

देवता और असुर सब लोग कर्म, यज्ञ और क्रिया- योगद्वारा सदा जिनकी सेवा करते हैं, उन कर्मफलरहित महादेवजीको मैं सबका कारण कहता हूँ ॥ २२३ ॥

स्थूलं सूक्ष्ममनौपम्यमग्राह्यं गुणगोचरम् ।

गुणहीनं गुणाध्यक्षं परं माहेश्वरं पदम् ॥ २२४ ॥

महादेवजीका परमपद स्थूल, सूक्ष्म, उपमा -रहित, इन्द्रियोंद्वारा अग्राह्य, सगुण, निर्गुण तथा गुणोंका नियामक है ॥ २२४ ॥

विश्वेशं कारणगुरुं लोकालोकान्तकारणम् ।

भूताभूतभविष्यच्च जनकं सर्वकारणम् ॥ २२५ ॥

अक्षरक्षरमव्यक्तं विद्याविद्ये कृताकृते ।

पृष्ठ 196

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धर्माधर्मौ यतः शक्र तमहं कारणं ब्रुवे ॥ २२६ ॥

इन्द्र! जो सम्पूर्ण विश्वके अधीश्वर, प्रकृतिके भी नियामक, लोक (जगत्की सृष्टि ) तथा सम्पूर्ण लोकोंके संहारके भी कारण हैं, भूत, वर्तमान और भविष्य - तीनों काल जिनके ही स्वरूप हैं, जो सबके उत्पादक एवं कारण हैं, क्षर-अक्षर, अव्यक्त, विद्या - अविद्या, कृत-अकृत तथा धर्म और अधर्म जिनसे ही प्रकट हुए हैं, उन महादेवजीको ही मैं सबका परम कारण बताता हूँ ॥ २२५-२२६ ॥

प्रत्यक्षमिह देवेन्द्र पश्य लिङ्गं भगाङ्कितम् ।

देवदेवेन रुद्रेण सृष्टिसंहारहेतुना ॥ २२७ ॥

देवेन्द्र! सृष्टि और संहारके कारणभूत देवाधिदेव भगवान् रुद्रने जो भगचिह्नित लिङ्गमूर्ति धारण की है, उसे आप यहाँ प्रत्यक्ष देख लें । यह उनके कारण - स्वरूपका परिचायक है ॥ २२७ ॥

मात्रा पूर्वं ममाख्यातं कारणं लोकलक्षणम् ।

नास्ति चेशात् परं शक्र तं प्रपद्य यदीच्छसि ॥ २२८ ॥

इन्द्र! मेरी माताने पहले कहा था कि महादेवजीके अतिरिक्त अथवा उनसे बढ़कर कोई लोकरूपी कार्यका कारण नहीं है; अतः यदि किसी अभीष्ट वस्तुके पानेकी तुम्हारी इच्छा हो तो भगवान् शंकरकी ही शरण लो ॥ २२८ ॥

प्रत्यक्षं ननु ते सुरेश विदितं संयोगलिङ्गोद्भवं त्रैलोक्यं सविकारनिर्गुण गणं ब्रह्मादिरेतोद्भवम् । यद्ब्रह्मेन्द्रहुताशविष्णुसहिता देवाश्च दैत्येश्वरा नान्यत् कामसहस्रकल्पितधियः शंसन्ति ईशात् परम् । तं देवं सचराचरस्य जगतो व्याख्यातवेद्योत्तमं कामार्थी वरयामि संयतमना मोक्षाय सद्यः शिवम् ॥ २२ ९ ॥ सुरेश्वर! तुम्हें प्रत्यक्ष विदित है कि ब्रह्मा आदि प्रजापतियोंके संकल्पसे उत्पन्न हुआ यह बद्ध और मुक्त जीवोंसे युक्त त्रिभुवन भग और लिंगसे प्रकट हुआ है तथा सहस्रों कामनाओंसे युक्त बुद्धिवाले तथा ब्रह्मा, इन्द्र, अग्नि एवं विष्णुसहित सम्पूर्ण देवता और दैत्यराज महादेवजीसे बढ़कर दूसरे किसी देवताको नहीं बताते हैं । जो सम्पूर्ण चराचर जगत्के लिये वेद - विख्यात सर्वोत्तम जाननेयोग्य तत्त्व हैं, उन्हीं कल्याणमय देव भगवान् शंकरका कामनापूर्तिके लिये वरण करता हूँ तथा संयतचित्त होकर सद्यःमुक्तिके लिये भी उन्हींसे प्रार्थना करता हूँ ॥ २२ ९ ॥

हेतुभिर्वा किमन्यैस्तैरीशः कारणकारणम् ।

न शुश्रुम यदन्यस्य लिङ्गमभ्यर्चितं सुरैः ॥ २३० ॥

दूसरे- दूसरे कारणोंको बतलानेसे क्या लाभ? भगवान् शंकर इसलिये भी समस्त कारणोंके भी कारण सिद्ध होते हैं कि हमने देवताओंद्वारा दूसरे किसीके लिंगको पूजित

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होते नहीं सुना है ॥ २३० ॥

कस्यान्यस्य सुरैः सर्वैर्लिङ्गं मुक्त्वा महेश्वरम् ।

अर्च्यतेऽर्चितपूर्वं वा ब्रूहि यद्यस्ति ते श्रुतिः ॥ २३१ ॥

भगवान् महेश्वरको छोड़कर दूसरे किसके लिंगकी सम्पूर्ण देवता पूजा करते हैं अथवा पहले कभी उन्होंने पूजा की है? यदि तुम्हारे सुननेमें आया हो तो बताओ ॥ २३१ ॥

यस्य ब्रह्मा च विष्णुश्च त्वं चापि सह देवतैः ।

अर्चयध्वं सदा लिङ्गं तस्मात् श्रेष्ठतमो हि सः ॥ २३२ ॥

ब्रह्मा, विष्णु तथा सम्पूर्ण देवताओंसहित तुम सदा ही शिवलिंगकी पूजा करते आये हो; इसलिये भगवान् शिव ही सबसे श्रेष्ठतम देवता हैं ॥ २३२ ॥

न पद्माङ्का न चक्राङ्का न वज्राङ्का यतः प्रजाः ।

लिङ्गाङ्का च भगाङ्का च तस्मान्माहेश्वरी प्रजा ॥ २३३ ॥

प्रजाओंके शरीरमें न तो पद्मका चिह्न है, न चक्रका चिह्न है और न वज्रका ही चिह्न उपलक्षित होता है । सभी प्रजा लिंग और भगके चिह्नसे युक्त हैं, इसलिये यह सिद्ध है कि सम्पूर्ण प्रजा माहेश्वरी है ( महादेवजीसे ही उत्पन्न हुई है ) ॥ २३३ ॥

देव्याः कारणरूपभावजनिताः सर्वा भगाङ्काः स्त्रियो लिंगेनापि हरस्य सर्वपुरुषाः प्रत्यक्षचिह्नीकृताः । योऽन्यत्कारणमीश्वरात् प्रवदते देव्या च यन्नाङ्कितं त्रैलोक्ये सचराचरे स तु पुमान् बाह्यो भवेद् दुर्मतिः ॥ २३४ ॥

देवी पार्वतीके कारणस्वरूप भावसे संसारकी समस्त स्त्रियाँ उत्पन्न हुई हैं; इसलिये भगके चिह्नसे अंकित हैं और भगवान् शिवसे उत्पन्न होनेके कारण सभी पुरुष लिंगके चिह्नसे चिह्नित हैं - यह सबको प्रत्यक्ष है; ऐसी दशामें जो शिव और पार्वतीके अतिरिक्त अन्य किसीको कारण बताता है, जिससे कि प्रजा चिह्नित नहीं है, वह अन्य कारणवादी दुर्बुद्धि पुरुष चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोकोंसे बाहर कर देने योग्य है ॥ २३४ ॥

पुंल्लिङ्गं सर्वमीशानं स्त्रीलिङ्गं विद्धि चाप्युमाम् ।

द्वाभ्यां तनुभ्यां व्याप्तं हि चराचरमिदं जगत् ॥ २३५ ॥

जितना भी पुँल्लिंग है, वह सब शिवस्वरूप है और जो भी स्त्रीलिंग है उसे उमा समझो । महेश्वर और उमा– इन दो शरीरोंसे ही यह सम्पूर्ण चराचर जगत् व्याप्त है ॥ २३५ ॥

(दिवसकरशशाङ्कवह्निनेत्रं

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त्रिभुवनसारमपारमीशमाद्यम् । अजरममरमप्रसाद्य रुद्रं जगति पुमानिह को लभेत शान्तिम् ॥ ) सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि जिनके नेत्र हैं, जो त्रिभुवनके सारतत्त्व, अपार, ईश्वर, सबके आदिकारण तथा अजर- अमर हैं, उन रुद्रदेवको प्रसन्न किये बिना इस संसारमें कौन पुरुष शान्ति पा सकता है ॥

तस्माद् वरमहं काङ्क्षे निधनं वापि कौशिक ।

गच्छ वा तिष्ठ वा शक्र यथेष्टं बलसूदन ॥ २३६ ॥

अतः कौशिक! मैं भगवान् शंकरसे ही वर अथवा मृत्यु पानेकी इच्छा रखता हूँ।

बलसूदन इन्द्र! तुम जाओ या खड़े रहो, जैसी इच्छा हो करो ॥ २३६ ॥

काममेष वरो मेऽस्तु शापो वाथ महेश्वरात् ।

न चान्यां देवतां काङ्क्षे सर्वकामफलामपि ॥ २३७ ॥

मुझे महेश्वरसे चाहे वर मिले, चाहे शाप प्राप्त हो, स्वीकार है, परंतु दूसरा देवता यदि सम्पूर्ण मनोवांछित फलोंको देनेवाला हो तो भी मैं उसे नहीं चाहता ॥ २३७ ॥

एवमुक्त्वा तु देवेन्द्रं दुःखादाकुलितेन्द्रियः ।

न प्रसीदति मे देवः किमेतदिति चिन्तयन् ॥ २३८ ॥

देवराज इन्द्रसे ऐसा कहकर मेरी इन्द्रियाँ दुःखसे व्याकुल हो उठीं और मैं सोचने लगा कि यह क्या कारण हो गया कि महादेवजी मुझपर प्रसन्न नहीं हो रहे हैं ॥ २३८ ॥

अथापश्यं क्षणेनैव तमेवैरावतं पुनः ।

हंसकुन्देन्दुसदृशं मृणालरजतप्रभम् ॥ २३ ९ ॥

वृषरूपधरं साक्षात् क्षीरोदमिव सागरम् ।

कृष्णपुच्छं महाकायं मधुपिङ्गललोचनम् ॥ २४० ॥

तदनन्तर एक ही क्षणमें मैंने देखा कि वही ऐरावत हाथी अब वृषभरूप धारण करके स्थित है । उसका वर्ण हंस, कुन्द और चन्द्रमाके समान श्वेत है । उसकी अंगकान्ति मृणालके समान उज्ज्वल और चाँदीके समान चमकीली है । जान पड़ता था साक्षात् क्षीरसागर ही वृषभरूप धारण करके खड़ा हो । काली पूँछ, विशाल शरीर और मधुके समान पिंगल वर्णवाले नेत्र शोभा पा रहे थे ॥ २३ ९ -२४० ॥

वज्रसारमयैः शृङ्गैर्निष्टप्तकनकप्रभैः ।

सुतीक्ष्णैर्मृदुरक्ताग्रैरुत्किरन्तमिवावनिम् ॥ २४१ ॥

उसके सींग ऐसे जान पड़ते थे मानो वज्रके सारतत्त्वसे बने हों । उनसे तपाये हुए सुवर्णकी- सी प्रभा फैल रही थी । उन सींगोंके अग्रभाग अत्यन्त तीखे, कोमल तथा लाल रंगके थे । ऐसा लगता था मानो उन सींगोंके द्वारा वह इस पृथ्वीको विदीर्ण कर डालेगा ॥ २४१ ॥

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जाम्बूनदेन दाम्ना च सर्वतः समलंकृतम् ।

सुवक्त्रखुरनासं च सुकर्णं सुकटीतटम् ॥ २४२ ॥

उसके शरीरको सब ओरसे जाम्बूनद नामक सुवर्णकी लड़ियोंसे सजाया गया था ।

उसके मुख, खुर, नासिका ( नथुने ), कान और कटिप्रदेश - सभी बड़े सुन्दर थे ॥ २४२ ॥

सुपार्श्व विपुलस्कन्धं सुरूपं चारुदर्शनम् ।

ककुदं तस्य चाभाति स्कन्धमापूर्य धिष्ठितम् ॥ २४३ ॥

उसके अगल - बगलका भाग भी बड़ा मनोहर था । कंधे चौड़े और रूप सुन्दर था । वह

देखनेमें बड़ा मनोहर जान पड़ता था । उसका ककुद् समूचे कंधेको घेरकर ऊँचे उठा था ।

उसकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ २४३ ॥

तुषारगिरिकूटाभं सिताभ्रशिखरोपमम् ।

तमास्थितश्च भगवान् देवदेवः सहोमया ॥ २४४ ॥

अशोभत महादेवः पौर्णमास्यामिवोडुराट् । हिमालय पर्वतके शिखर अथवा श्वेत बादलोंके विशाल खण्डके समान प्रतीत होनेवाले उस नन्दिकेश्वरपर देवाधिदेव भगवान् महादेव भगवती उमाके साथ आरूढ़ हो पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति शोभा पा रहे थे ॥ २४४ ॥

तस्य तेजोभवो वह्निः समेघः स्तनयित्नुमान् ॥ २४५ ॥

सहस्रमिव सूर्याणां सर्वमापूर्य धिष्ठितः । उनके तेजसे प्रकट हुई अग्निकी -सी प्रभा गर्जना करनेवाले मेघोंसहित सम्पूर्ण आकाशको व्याप्त करके सहस्रों सूर्योंके समान प्रकाशित हो रही थी ॥ २४५३ ॥

ईश्वरः सुमहातेजाः संवर्तक इवानलः ॥ २४६ ॥

युगान्ते सर्वभूतानां दिधक्षुरिव चोद्यतः । वे महातेजस्वी महेश्वर ऐसे दिखायी देते थे मानो कल्पान्तके समय सम्पूर्ण भूतोंको दग्ध कर देनेकी इच्छासे उद्यत हुई प्रलयकालीन अग्नि प्रज्वलित हो उठी हो ॥ २४६३ ॥

तेजसा तु तदा व्याप्तं दुर्निरीक्ष्यं समन्ततः ॥ २४७ ॥

पुनरुद्विग्नहृदयः किमेतदिति चिन्तयम् । वे अपने तेजसे सब ओर व्याप्त हो रहे थे, अतः उनकी ओर देखना कठिन था । तब मैं उद्विग्नचित्त होकर फिर इस चिन्तामें पड़ गया कि यह क्या है? ॥ २४७३ ॥

मुहूर्तमिव तत् तेजो व्याप्य सर्वा दिशो दश ॥ २४८ ॥

प्रशान्तं दिक्षु सर्वासु देवदेवस्य मायया । इतनेहीमें एक मुहूर्त बीतते- बीतते वह तेज सम्पूर्ण दिशाओंमें फैलकर देवाधिदेव महादेवजीकी मायासे सब ओर शान्त हो गया ॥ २४८३ ॥

अथापश्यं स्थितं स्थाणुं भगवन्तं महेश्वरम् ॥ २४ ९ ॥

पृष्ठ 200

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नीलकण्ठं महात्मानमसक्तं तेजसां निधिम् ।

अष्टादशभुजं स्थाणुं सर्वाभरणभूषितम् ॥ २५० ॥

तत्पश्चात् मैंने देखा, भगवान् महेश्वर स्थिर भावसे खड़े हैं । उनके कण्ठमें नील चिह्न

शोभा पा रहा था । वे महात्मा कहीं भी आसक्त नहीं थे । वे तेजकी निधि जान पड़ते थे ।

उनके अठारह भुजाएँ थीं । वे भगवान् स्थाणु समस्त आभूषणोंसे विभूषित थे ॥

शुक्लाम्बरधरं देवं शुक्लमाल्यानुलेपनम् ।

शुक्लध्वजमनाधृष्यं शुक्लयज्ञोपवीतिनम् ॥ २५१ ॥

महादेवजीने श्वेत वस्त्र धारण कर रखा था । उनके श्रीअंगोंमें श्वेत चन्दनका अनुलेप लगा था । उनकी ध्वजा भी श्वेत वर्णकी ही थी । वे श्वेत रंगका यज्ञोपवीत धारण करनेवाले और अजेय थे ॥ २५१ ॥

गायद्भिर्नृत्यमानैश्च वादयद्भिश्च सर्वशः ।

वृतं पार्श्वचरैर्दिव्यैरात्मतुल्यपराक्रमैः ॥ २५२ ॥

वे अपने ही समान पराक्रमी दिव्य पार्षदोंसे घिरे हुए थे । उनके वे पार्षद सब ओर गाते, नाचते और बाजे बजाते थे ॥ २५२ ॥

बालेन्दुमुकुटं पाण्डुं शरच्चन्द्रमिवोदितम् ।

त्रिभिर्नेत्रैः कृतोद्योतं त्रिभिः सूर्यैरिवोदितैः ॥ २५३ ॥

भगवान् शिवके मस्तकपर बाल चन्द्रमाका मुकुट सुशोभित था । उनकी अंग - कान्ति श्वेतवर्णकी थी । वे शरद्-ऋतुके पूर्ण चन्द्रमाके समान उदित हुए थे । उनके तीनों नेत्रोंसे ऐसा प्रकाश - पुञ्ज छा रहा था मानो तीन सूर्य उदित हुए हों ॥ २५३ ॥

( सर्वविद्याधिपं देवं शरच्चन्द्रसमप्रभम् । नयनाह्लादसौभाग्यमपश्यं परमेश्वरम् ॥ ) जो सम्पूर्ण विद्याओंके अधिपति, शरत्कालके चन्द्रमाकी भाँति कान्तिमान् तथा नेत्रोंके लिये परमानन्द-दायक सौभाग्य प्रदान करनेवाले थे । इस प्रकार मैंने परमेश्वर महादेवजीके मनोहर रूपको देखा ॥

अशोभतास्य देवस्य माला गात्रे सितप्रभे ।

जातरूपमयैः पद्मैर्ग्रथिता रत्नभूषिता ॥ २५४ ॥

भगवान्‌के उज्ज्वल प्रभावाले गौर विग्रहपर सुवर्णमय कमलोंसे गुँथी हुई रत्नभूषित माला बड़ी शोभा पा रही थी ॥ २५४ ॥

मूर्तिमन्ति तथास्त्राणि सर्वतेजोमयानि च ।

मया दृष्टानि गोविन्द भवस्यामिततेजसः ॥ २५५ ॥

गोविन्द! मैंने अमित तेजस्वी महादेवजीके सम्पूर्ण तेजोमय आयुधोंको मूर्तिमान् होकर उनकी सेवामें उपस्थित देखा था ॥ २५५ ॥

इन्द्रायुधसवर्णाभं धनुस्तस्य महात्मनः ।