श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 2001–2010
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2001–2010
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पुरुषप्रवर किरीटधारी अर्जुन दशार्णराज चित्रांगदको भी वशमें करके निषादराज एकलव्यके राज्यमें गये ॥ ७ ॥
एकलव्यसुतश्चैनं युद्धेन जगृहे तदा ।
तत्र चक्रे निषादैः स संग्रामं लोमहर्षणम् ॥ ८ ॥
वहाँ एकलव्यके पुत्रने युद्धके द्वारा उनका स्वागत किया । अर्जुनने निषादोंके साथ रोमांचकारी संग्राम किया ॥ ८ ॥
ततस्तमपि कौन्तेयः समरेष्वपराजितः ।
जिगाय युधि दुर्धर्षो यज्ञविघ्नार्थमागतम् ॥ ९ ॥
युद्धमें किसीसे परास्त न होनेवाले दुर्धर्ष वीर पार्थने यज्ञमें विघ्न डालनेके लिये आये हुए एकलव्य- कुमारको भी परास्त कर दिया ॥ ९ ॥
स तं जित्वा महाराज नैषादिं पाकशासनिः ।
अर्चितः प्रययौ भूयो दक्षिणं सलिलार्णवम् ॥ १० ॥
महाराज! एकलव्यके पुत्रको पराजित करके उसके द्वारा पूजित हुए इन्द्रकुमार अर्जुन फिर दक्षिण समुद्रके तटपर गये ॥ १० ॥
तत्रापि द्रविडैरान्ध्रे रौद्रैर्माहिषकैरपि ।
तथा कोल्लगिरेयैश्च युद्धमासीत् किरीटिनः ॥ ११ ॥
वहाँ भी द्रविड, आन्ध्र, रौद्र, माहिषक और कोलाचलके प्रान्तोंमें रहनेवाले वीरोंके साथ किरीटधारी अर्जुनका खूब युद्ध हुआ ॥ ११ ॥
तांश्चापि विजयो जित्वा नातितीव्रेण कर्मणा ।
तुरङ्गमवशेनाथ सुराष्ट्रानभितो ययौ ॥ १२ ॥
गोकर्णमथ चासाद्य प्रभासमपि जग्मिवान् । उन सबको मृदुल पराक्रमसे ही जीतकर वे घोड़ेकी इच्छानुसार उसके पीछे चलनेमें विवश हुए सौराष्ट्र, गोकर्ण और प्रभासक्षेत्रोंमें गये ॥ १२३ ॥
ततो द्वारवतीं रम्यां वृष्णिवीराभिपालिताम् ॥ १३ ॥
आससाद हयः श्रीमान् कुरुराजस्य यज्ञियः । तत्पश्चात् कुरुराज युधिष्ठिरका वह यज्ञसम्बन्धी कान्तिमान् अश्व वृष्णिवीरोंद्वारा सुरक्षित द्वारकापुरीमें जा पहुँचा ॥ १३३ ॥
तमुन्मथ्य हयश्रेष्ठं यादवानां कुमारकाः ॥ १४ ॥
प्रययुस्तांस्तदा राजन्नुग्रसेनो न्यवारयत् । राजन्! वहाँ यदुवंशी वीरोंके बालकोंने उस उत्तम अश्वको बलपूर्वक पकड़कर युद्धके लिये उद्योग किया; परंतु महाराज उग्रसेनने उन्हें रोक दिया ॥ १४ ॥
ततः पुराद् विनिष्क्रम्य वृष्ण्यन्धकपतिस्तदा ॥ १५ ॥
सहितो वसुदेवेन मातुलेन किरीटिनः ।
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तौ समेत्य कुरुश्रेष्ठं विधिवत् प्रीतिपूर्वकम् ॥ १६ ॥
परया भारतश्रेष्ठं पूजया समवस्थितौ ।
ततस्ताभ्यामनुज्ञातो ययौ येन हयो गतः ॥ १७ ॥
तदनन्तर अर्जुनके मामा वसुदेवको साथ ले वृष्णि और अन्धककुलके राजा उग्रसेन नगरसे बाहर निकले । वे दोनों बड़ी प्रसन्नताके साथ कुरुश्रेष्ठ अर्जुनसे विधिपूर्वक मिले । उन्होंने भरतकुलके उस श्रेष्ठ वीरका बड़ा आदर- सत्कार किया । फिर उन दोनोंकी आज्ञा ले अर्जुन उसी ओर चल दिये, जिधर वह अश्व गया था ॥ Milia
ततः स पश्चिमं देशं समुद्रस्य तदा हयः ।
क्रमेण व्यचरत् स्फीतं ततः पञ्चनदं ययौ ॥ १८ ॥
वहाँसे पश्चिम समुद्रके तटवर्ती देशोंमें विचरता हुआ वह घोड़ा क्रमशः आगे बढ़ने लगा और समृद्धिशाली पञ्चनद प्रदेशमें जा पहुँचा ॥ १८ ॥
तस्मादपि स कौरव्य गन्धारविषयं हयः ।
विचचार यथाकामं कौन्तेयानुगतस्तदा ॥ १ ९ ॥
कुरुनन्दन! वहाँसे भी वह घोड़ा गान्धारदेशमें जाकर इच्छानुसार विचरने लगा ।
कुन्तीनन्दन अर्जुन भी उसके पीछे - पीछे वहीं जा पहुँचे ॥ १ ९ ॥
ततो गान्धारराजेन युद्धमासीत् किरीटिनः ।
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घोरं शकुनिपुत्रेण पूर्ववैरानुसारिणा ॥ २० ॥
फिर तो पूर्व वैरका अनुसरण करनेवाले गान्धारराज शकुनिपुत्रके साथ किरीटधारी अर्जुनका घोर युद्ध हुआ ॥ २० ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अश्वानुसरणे त्र्यशीतितमोऽध्यायः ॥ ८३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें यज्ञसम्बन्धी अश्वका अनुसरणविषयक तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८३ ॥
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चतुरशीतितमोऽध्यायः शकुनिपुत्रकी पराजय वैशम्पायन उवाच
शकुनेस्तनयो वीरो गान्धाराणां महारथः ।
प्रत्युद्ययौ गुडाकेशं सैन्येन महता वृतः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! शकुनिका पुत्र गान्धारोंमें सबसे बड़ा वीर और महारथी था । वह विशाल सेनासे घिरकर निद्राविजयी अर्जुनका सामना करनेके लिये चला ॥ १ ॥
हस्त्यश्वरथयुक्तेन पताकाध्वजमालिना ।
अमृष्यमाणास्ते योधा तृपस्य शकुनेर्वधम् ॥ २ ॥
अभ्ययुः सहिताः पार्थं प्रगृहीतशरासनाः । उसकी सेनामें हाथी, घोड़े और रथ सभी सम्मिलित थे । वह सेना ध्वजा - पताकाओंकी मालासे मण्डित थी । गान्धारदेशके योद्धा राजा शकुनिके वधका समाचार सुनकर अमर्षमें भरे हुए थे; अतः हाथमें धनुष -बाण ले उन्होंने एक साथ होकर अर्जुनपर धावा बोल दिया ॥ २१ ॥
स तानुवाच धर्मात्मा बीभत्सुरपराजितः ॥ ३ ॥
युधिष्ठिरस्य वचनं न च ते जगृहुर्हितम् । किसीसे परास्त न होनेवाले धर्मात्मा अर्जुनने उन्हें राजा युधिष्ठिरकी बात सुनायी; परंतु उस हितकर वचनको भी वे ग्रहण न कर सके ॥ ३३ ॥
वार्यमाणाऽपि पार्थेन सान्त्वपूर्वममर्षिताः ॥ ४ ॥
परिवार्य हयं जग्मुस्ततश्चक्रोध पाण्डवः । यद्यपि पार्थने सान्त्वनापूर्वक समझा- बुझाकर उन सबको युद्धसे रोका, तथापि वे अमर्षशील योद्धा उस घोड़ेको चारों ओरसे घेरकर उसे पकड़नेके लिये आगे बढ़े । यह देख पाण्डुपुत्र अर्जुनको बड़ा क्रोध हुआ ॥ ४३ ॥
ततः शिरांसि दीप्ताग्रैस्तेषां चिच्छेद पाण्डवः ॥ ५ ॥
क्षुरैर्गाण्डीवनिर्मुक्तैर्नातियत्नादिवार्जुनः । वे गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए तेज धारवाले धुरोंसे बिना परिश्रमके ही उनके मस्तक काटने लगे ॥ ५३ ॥
ते वध्यमानाः पार्थेन हयमुत्सृज्य सम्भ्रमात् ॥ ६ ॥
न्यवर्तन्त महाराज शरवर्षार्जिता भृशम् ।
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महाराज! अर्जुनकी मार खाकर उनके बाणोंकी वर्षासे पीड़ित हुए गान्धार सैनिक उस घोड़ेको छोड़कर बड़े वेगसे पीछे लौट गये ॥ ६३ ॥
निरुध्यमानस्तैश्चापि गान्धारैः पाण्डुनन्दनः ॥ ७ ॥
आदिश्यादिश्य तेजस्वी शिरांस्येषां न्यपातयत् । गान्धारोंके द्वारा रोके जानेपर भी तेजस्वी वीर पाण्डुनन्दन अर्जुन उनके नाम ले - लेकर मस्तक काटने और गिराने लगे ॥ ७३ ॥
वध्यमानेषु तेष्वाजौ गान्धारेषु समन्ततः ॥ ८ ॥
स राजा शकुनेः पुत्रः पाण्डवं प्रत्यवारयत् । जब चारों ओर युद्धमें गान्धारोंका संहार आरम्भ हो गया, तब राजा शकुनि- पुत्रने पाण्डुकुमार अर्जुनको रोका ॥ ८३ ॥
तं युध्यमानं राजानं क्षत्रधर्मे व्यवस्थितम् ॥ ९ ॥
पार्थोऽब्रवीन्न मे वध्या राजानो राजशासनात् ।
अलं युद्धेन ते वीर न तेऽस्त्वद्य पराजयः ॥ १० ॥
क्षत्रियधर्ममें स्थित होकर युद्ध करनेवाले उस राजासे अर्जुनने इस प्रकार कहा — ‘ वीर! तुम्हें युद्ध करनेसे कोई लाभ नहीं है । महाराज युधिष्ठिरकी यह आज्ञा है कि मैं राजाओंका वध न करूँ । अतः तुम युद्धसे निवृत्त हो जाओ जिससे आज तुम्हारी पराजय न हो' ॥ ९ -१० ॥
इत्युक्तस्तदनादृत्य वाक्यमज्ञानमोहितः ।
स शक्रसमकर्माणं समवाकिरदाशुगैः ॥ ११ ॥
उनके ऐसा कहनेपर भी वह अज्ञानसे मोहित होनेके कारण उनकी बातकी अवहेलना करके इन्द्रके समान पराक्रमी अर्जुनपर शीघ्रगामी बाणोंकी वर्षा करने लगा ॥ ११ ॥
तस्य पार्थः शिरस्त्राणमर्धचन्द्रेण पत्रिणा ।
अपाहरदमेयात्मा जयद्रथशिरो यथा ॥ १२ ॥
तब अमेय आत्मबलसे सम्पन्न अर्जुनने जिस प्रकार जयद्रथका सिर उड़ाया था, उसी प्रकार शकुनि- पुत्रके शिरस्त्राण ( टोप ) को एक अर्धचन्द्राकार बाणसे काट गिराया ॥ १२ ॥
तं दृष्ट्वा विस्मयं जग्मुर्गान्धाराः सर्व एव ते ।
इच्छता तेन न हतो राजेत्यसि च तं विदुः ॥ १३ ॥
यह देखकर समस्त गान्धारोंको बड़ा विस्मय हुआ और वे सब - के --ससब यह समझ गये कि अर्जुनने जान- बूझकर गान्धारराजको जीवित छोड़ दिया ॥ १३ ॥
गान्धारराजपुत्रस्तु पलायनकृतक्षणः ।
ययौ तैरेव सहितस्त्रस्तैः क्षुद्रमृगैरिव ॥ १४ ॥
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उस समय गान्धारराज शकुनिका पुत्र भागनेका अवसर देखने लगा । जैसे सिंहसे डरे हुए छोटे - छोटे मृग भाग जाते हैं, उसी प्रकार अर्जुनसे भयभीत हुए सैनिकोंके साथ वह स्वयं भी भाग निकला ॥ १४ ॥
तेषां तु तरसा पार्थस्तत्रैव परिधावताम् ।
प्रजहारोत्तमाङ्गानि भल्लैः संनतपर्वभिः ॥ १५ ॥
वहीं चक्कर काटनेवाले बहुत-से सैनिकोंके मस्तक अर्जुनने झुकी हुई गाँठवाले भल्लोंद्वारा वेगपूर्वक काट लिया ॥ १५ ॥
उच्छ्रितांस्तु भुजान् केचिन्नाबुध्यन्त शरैर्हृतान् ।
शरैर्गाण्डीवनिर्मुक्तैः पृथुभिः पार्थचोदितैः ॥ १६ ॥
अर्जुनद्वारा चलाये और गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए बहुसंख्यक बाणोंसे कितने ही योद्धाओंकी ऊँची उठी हुई भुजाएँ कटकर गिर गयीं और उन्हें इस बातका पतातक न लगा ॥ १६ ॥
सम्भ्रान्तनरनागाश्वमपतद् विद्रुतं बलम् ।
हतविध्वस्तभूयिष्ठमावर्तत मुहुर्मुहुः ॥ १७ ॥
सम्पूर्ण सेनाके मनुष्य, हाथी और घोड़े घबराकर इधर- उधर भटकने लगे । सारी सेना गिरती- पड़ती भागने लगी । उनके अधिकांश सिपाही युद्धमें मारे गये या नष्ट हो गये और वह बार- बार युद्धभूमिमें ही चक्कर काटने लगी ॥
नाभ्यदृश्यन्त वीरस्य केचिदग्रेऽग्रयकर्मणः ।
रिपवः पात्यमाना वै ये सहेयुर्धनंजयम् ॥ १८ ॥
श्रेष्ठ कर्म करनेवाले वीर अर्जुनके सामने कोई भी शत्रु खड़े नहीं दिखायी देते थे, जो अर्जुनकी मार पड़नेपर उनका वेग सहन कर सके ॥ १८ ॥
ततो गान्धारराजस्य मन्त्रिवृद्धपुरःसरा ।
जननी निर्ययौ भीता पुरस्कृत्यार्घ्यमुत्तमम् ॥ १ ९ ॥
तदनन्तर गान्धारराजकी माता अत्यन्त भयभीत होकर बूढ़े मन्त्रियोंको आगे करके उत्तम अर्घ्य ले नगरसे बाहर निकली और रणभूमिमें उपस्थित हुई ॥ १ ९ ॥
सा न्यवारयदव्यग्रं तं पुत्रं युद्धदुर्मदम् ।
प्रसादयामास च तं जिष्णुमक्लिष्टकारिणम् ॥ २० ॥
आते ही उसने अपने व्यग्रतारहित एवं रणोन्मत्त पुत्रको युद्ध करनेसे रोका और अनायास ही महान् कर्म करनेवाले विजयशील अर्जुनको प्रिय वचनोंद्वारा प्रसन्न किया ॥ २० ॥
तां पूजयित्वा बीभत्सुः प्रसादमकरोत् प्रभुः ।
शकुनेश्चापि तनयं सान्त्वयन्निदमब्रवीत् ॥ २१ ॥
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सामर्थ्यशाली अर्जुनने भी मामीका सम्मान करके उन्हें प्रसन्न किया और स्वयं उनपर कृपादृष्टि की । फिर शकुनिके पुत्रको भी सान्त्वना प्रदान करते हुए वे इस प्रकार बोले - ॥ २१ ॥
न मे प्रियं महाबाहो यत्ते बुद्धिरियं कृता ।
प्रतियोद्धुममित्रघ्न भ्रातैव त्वं ममानघ ॥ २२ ॥
‘ शत्रुसूदन! महाबाहु वीर! तुमने जो मुझसे युद्ध करनेका विचार किया, यह मुझे प्रिय
नहीं लगा; क्योंकि अनघ । तुम तो मेरे भाई ही हो ॥ २२ ॥
गान्धारीं मातरं स्मृत्वा धृतराष्ट्रकृतेन च ।
तेन जीवसि राजंस्त्वं निहतास्त्वनुगास्तव ॥ २३ ॥
‘ राजन्! मैंने माता गान्धारीको याद करके पिता धृतराष्ट्रके सम्बन्धसे युद्धमें तुम्हारी उपेक्षा की है; इसीलिये तुम अभीतक जीवित हो । केवल तुम्हारे अनुगामी सैनिक ही मारे गये हैं ॥ २३ ॥
मैवं भूः शाम्यतां वैरं मा ते भूद् बुद्धिरीदृशी ।
गच्छेथास्त्वं परां चैत्रीमश्वमेधे नृपस्य नः ॥ २४ ॥
' अब हमलोगोंमें ऐसा बर्ताव नहीं होना चाहिये । आपसका वैर शान्त हो जाय । अब तुम कभी इस प्रकार हमलोगोंके विरुद्ध युद्ध ठाननेका विचार न करना । ' आगामी चैत्रमासकी पूर्णिमाको महाराज युधिष्ठिरका अश्वमेध यज्ञ होनेवाला है । उसमें तुम अवश्य आना' ॥ २४ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अश्वानुसरणे शकुनिपुत्रपराजये चतुरशीतितमोऽध्यायः ॥ ८४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें अश्वानुसरणके प्रसंगमें शकुनिपुत्रकी पराजयविषयक चौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८४ ॥
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पञ्चाशीतितमोऽध्यायः यज्ञभूमिकी तैयारी, नाना देशोंसे आये हुए राजाओंका यज्ञकी सजावट और आयोजन देखना वैशम्पायन उवाच
इत्युक्त्वानुययौ पार्थो हयं कामविहारिणम ।
न्यवर्तत ततो वाजी येन नागाह्वयं पुरम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! गान्धारराजसे यों कहकर अर्जुन इच्छानुसार विचरनेवाले घोड़ेके पीछे चल दिये । अब वह घोड़ा लौटकर हस्तिनापुरकी ओर चला ॥ १ ॥
तं निवृत्तं तु शुश्राव चारेणैव युधिष्ठिरः ।
श्रुत्वार्जुनं कुशलिनं स च हृष्टमनाऽभवत् ॥ २ ॥
इसी समय राजा युधिष्ठिरको एक जासूसके द्वारा यह समाचार मिला कि घोड़ा हस्तिनापुरको लौट रहा है और अर्जुन भी सकुशल आ रहे हैं । यह सुनकर उनके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ २ ॥
विजयस्य च तत् कर्म गान्धारविषये तदा ।
श्रुत्वा चान्येषु देशेषु स सुप्रीतोऽभवत् तदा ॥ ३ ॥
अर्जुनने गान्धारराज्यमें तथा अन्यान्य देशोंमें जो अद्भुत पराक्रम किया था, वह सब सुनकर युधिष्ठिरके हर्षकी सीमा न रही ॥ ३ ॥
एतस्मिन्नेव काले तु द्वादशीं माघमासिकीम् ।
इष्टं गृहीत्वा नक्षत्रं धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ ४ ॥
समानीय महातेजाः सर्वान् भ्रातॄन् महीपतिः ।
भीमं च नकुलं चैव सहदेवं च कौरव ॥ ५ ॥
प्रोवाचेदं वचः काले तदा धर्मभृतां वरः ।
आमन्त्र्य वदतां श्रेष्ठो भीमं प्रहरतां वरम् ॥ ६ ॥
कुरुनन्दन! उस दिन माघ महीनेकी शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथि थी । उसमें पुष्य-नक्षत्रका योग पाकर महातेजस्वी पृथ्वीपति धर्मराज युधिष्ठिरने अपने समस्त भाइयों— भीमसेन, नकुल और सहदेवको बुलवाया और प्रहार करनेवालोंमें श्रेष्ठ भीमसेनको सम्बोधित करके वक्ताओं तथा धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिरने यह समयोचित बात कही - ॥ ४–६ ॥ आयाति भीमसेनासौ सहाश्वेन तवानुजः ।
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यथा मे पुरुषाः प्राहुर्ये धनंजयसारिणः ॥ ७ ॥
‘ भीमसेन! तुम्हारे छोटे भाई अर्जुन घोड़ेके साथ आ रहे हैं, जैसा कि उनका समाचार लानेके लिये गये जासूसोंने मुझे बताया है ॥ ७ ॥
उपस्थितश्च कालोऽयमभितो वर्तते हयः ।
माघी च पौर्णमासीयं मासः शेषो वृकोदर ॥ ८ ॥
‘ वृकोदर! इधर यज्ञ आरम्भ करनेका समय भी निकट आ गया है । घोड़ा भी पास ही है । यह माघ- मासकी पूर्णिमा आ रही है, अब बीचमें केवल फाल्गुनका एक मास शेष है ॥ ८ ॥
प्रस्थाप्यन्तां हि विद्वांसो ब्राह्मणा वेदपारगाः ।
वाजिमेधार्थसिद्धयर्थं देशं पश्यन्तु यज्ञियम् ॥ ९ ॥
‘ अतः वेदके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणोंको भेजना चाहिये कि वे अश्वमेध -यज्ञकी सिद्धिके लिये उपयुक्त स्थान देखें ' ॥ ९ ॥
इत्युक्तः स तु तच्चक्रे भीमो नृपतिशासनम् ।
हृष्टः श्रुत्वा गुडाकेशमायान्तं पुरुषर्षभम् ॥ १० ॥
यह सुनकर भीमसेनने राजाकी आज्ञाका तुरंत पालन किया । वे पुरुषप्रवर अर्जुनका आगमन सुनकर बहुत प्रसन्न थे ॥ १० ॥
ततो ययौ भीमसेनः प्राज्ञैः स्थपतिभिः सह ।
ब्राह्मणानग्रतः कृत्वा कुशलान् यज्ञकर्मणि ॥ ११ ॥
तत्पश्चात् भीमसेन यज्ञकर्ममें कुशल ब्राह्मणोंको आगे करके शिल्पकर्मके जानकार कारीगरोंके साथ नगरसे बाहर गये ॥ ११ ॥
तं स शालचयं श्रीमत् सप्रतोलीसुघट्टितम् ।
मापयामास कौरव्यो यज्ञवाटं यथाविधि ॥ १२ ॥
उन्होंने शालवृक्षोंसे भरे हुए सुन्दर स्थान पसंद करके उसे चारों ओरसे नपवाया । तत्पश्चात् कुरुनन्दन भीमने वहाँ उत्तम मार्गोंसे सुशोभित यज्ञभूमिका विधिपूर्वक निर्माण कराया ॥ १२ ॥
प्रासादशतसम्बाधं मणिप्रवरकुट्टिमम् ।
कारयामास विधिवद्धेमरत्नविभूषितम् ॥ १३ ॥
उस भूमिमें सैकड़ों महल बनवाये गये, जिसके फर्शमें अच्छे - अच्छे रत्न जड़े हुए थे । वह यज्ञशाला सोने और रत्नोंसे सजायी गयी थी और उसका निर्माण शास्त्रीय विधिके अनुसार कराया गया था ॥ १३ ॥
स्तम्भान् कनकचित्रांश्च तोरणानि बृहन्ति च ।
यज्ञायतनदेशेषु दत्त्वा शुद्धं च काननम् ॥ १४ ॥
अन्तःपुराणां राज्ञां च नानादेशसमीयुषाम् ।
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कारयामास धर्मात्मा तत्र तत्र यथाविधि ॥ १५ ॥
ब्राह्मणानां च वेश्मानि नानादेशसमीयुषाम् ।
कारयामास कौन्तेयो विधिवत् तान्यनेकशः ॥ १६ ॥
वहाँ सुवर्णमय विचित्र खम्भे और बड़े- बड़े तोरण ( फाटक ) बने हुए थे । धर्मात्मा भीमने यज्ञमण्डपके सभी स्थानोंमें शुद्ध सुवर्णका उपयोग किया था । उन्होंने अन्तःपुरकी स्त्रियों, विभिन्न देशोंसे आये हुए राजाओं, तथा नाना स्थानोंसे पधारे हुए ब्राह्मणोंके रहनेके लिये भी अनेकानेक उत्तम भवन बनवाये । उन सबका निर्माण कुन्तीकुमार भीमने शिल्पशास्त्रकी विधिके अनुसार कराया था ॥ १४–१६ ॥
तथा सम्प्रेषयामास दूतान् नृपतिशासनात् ।
भीमसेनो महाबाहो राज्ञामक्लिष्टकर्मणाम् ॥ १७ ॥
महाबाहो! यह सब काम हो जानेपर भीमसेनने महाराज युधिष्ठिरकी आज्ञासे अनायास ही महान् पराक्रम कर दिखानेवाले विभिन्न राजाओंको निमन्त्रण देनेके लिये बहुत - से दूत भेजे ॥ १७ ॥
ते प्रियार्थं कुरुपतेराययुर्नृपसत्तम ।
रत्नान्यनेकान्यादाय स्त्रियोऽश्वानायुधानि च ॥ १८ ॥
नृपश्रेष्ठ! निमन्त्रण पाकर वे सभी नरेश कुरुराज युधिष्ठिरका प्रिय करनेके लिये अनेकानेक रत्न, स्त्रियाँ, घोड़े और भाँति- भाँतिके अस्त्र- शस्त्र लेकर वहाँ उपस्थित हुए ॥ १८ ॥
तेषां निविशतां तेषु शिविरेषु महात्मनाम् ।
नर्दतः सागरस्येव दिवस्पृगभवत् स्वनः ॥ १९ ॥
वहाँ बने हुए विभिन्न शिविरोंमें प्रवेश करनेवाले महामनस्वी नरेशोंका जो कोलाहल सुनायी पड़ता था, वह समुद्र की गम्भीर गर्जनाके समान सम्पूर्ण आकाशमें व्याप्त हो रहा था ॥ १ ९ ॥
तेषामभ्यागतानां च स राजा कुरुवर्धनः ।
व्यादिदेशान्नपानानि शय्याश्चाप्यतिमानुषाः ॥ २० ॥
कुरुकुलकी वृद्धि करनेवाले राजा युधिष्ठिरने इन नवागत अतिथियोंका सत्कार करनेके लिये अन्न - पान और अलौकिक शय्याओंका प्रबन्ध किया ॥ २० ॥
वाहनानां च विविधाः शालाः शालीक्षुगोरसैः ।
उपेता भरतश्रेष्ठो व्यादिदेश च धर्मराट् ॥ २१ ॥
भरतभूषण! धर्मराज युधिष्ठिरने उन राजाओंकी सवारियोंके लिये भी धान, ऊँख और गोरससे भरे - पूरे घर दिये ॥ २१ ॥
तथा तस्मिन् महायज्ञे धर्मराजस्य धीमतः ।
समाजग्मुर्मुनिगणा बहवो ब्रह्मवादिनः ॥ २२ ॥