श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 2251–2260

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2251–2260

पृष्ठ 2251

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राजा धृतराष्ट्रको सदा पाण्डवोंके बर्तावसे जितनी प्रसन्नता होती थी, उतनी उत्कृष्ट प्रीति उन्हें अपने पुत्रोंसे भी कभी प्राप्त नहीं हुई थी ॥ २३३ ॥

ब्राह्मणानां यथावृत्तः क्षत्रियाणां यथाविधः ॥ २४ ॥

तथा विट्शूद्रसंघानामभवत् स प्रियस्तदा । युधिष्ठिर ब्राह्मणों और क्षत्रियोंके साथ जैसा सद्बर्ताव करते थे, वैसा ही वैश्यों और

शूद्रोंके साथ भी करते थे । इसलिये वे उन दिनों सबके प्रिय हो गये थे ॥

यच्च किंचित् तदा पापं धृतराष्ट्रसुतैः कृतम् ॥ २५ ॥

अकृत्वा हृदि तत् पापं तं नृपं सोऽन्ववर्तत । धृतराष्ट्रके पुत्रोंने उनके साथ जो कुछ बुराई की थी, उसे अपने हृदयमें स्थान न देकर वे युधिष्ठिर राजा धृतराष्ट्रकी सेवामें संलग्न रहते थे ॥ २५३ ॥

यश्च कश्चिन्नरः किंचिदप्रियं वाम्बिकासुते ॥ २६ ॥

कुरुते द्वेष्यतामेति स कौन्तेयस्य धीमतः । जो कोई मनुष्य राजा धृतराष्ट्रका थोड़ा-सा भी अप्रिय कर देता, वह बुद्धिमान् कुन्तीकुमार युधिष्ठिरके द्वेषका पात्र बन जाता था ॥ २६३ ॥

न राज्ञो धृतराष्ट्रस्य न च दुर्योधनस्य वै ॥ २७ ॥

उवाच दुष्कृतं कश्चिद् युधिष्ठिरभयान्नरः । युधिष्ठिरके भयसे कोई भी मनुष्य कभी राजा धृतराष्ट्र और दुर्योधनके कुकृत्योंकी चर्चा नहीं करता था ॥ धृत्या तुष्टो नरेन्द्रः स गान्धारी विदुरस्तथा ॥ २८ ॥

शौचेन चाजातशत्रोर्न तु भीमस्य शत्रुहन् । शत्रुसूदन जनमेजय! राजा धृतराष्ट्र, गान्धारी और विदुरजी अजातशत्रु युधिष्ठिरके धैर्य और शुद्ध व्यवहारसे विशेष प्रसन्न थे, किंतु भीमसेनके बर्तावसे उन्हें संतोष नहीं था ॥ २८ ३ ॥ अन्ववर्तत भीमोऽपि निश्चितो धर्मजं नृपम् ॥ २ ९ ॥ धृतराष्ट्रं च सम्प्रेक्ष्य सदा भवति दुर्मनाः । यद्यपि भीमसेन भी दृढ़ निश्चयके साथ युधिष्ठिरके ही पथका अनुसरण करते थे, तथापि धृतराष्ट्रको देखकर उनके मनमें सदा ही दुर्भावना जाग उठती थी ॥ २ ९ ३ ॥

राजानमनुवर्तन्तं धर्मपुत्रममित्रहा ।

अन्ववर्तत कौरव्यो हृदयेन पराङ्मुखः ॥ ३० ॥

धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरको धृतराष्ट्रके अनुकूल बर्ताव करते देख शत्रुसूदन कुरुनन्दन भीमसेन स्वयं भी ऊपरसे उनका अनुसरण ही करते थे, तथापि उनका हृदय धृतराष्ट्रसे विमुख ही रहता था ॥ ३० ॥

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इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥

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पृष्ठ 2253

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तृतीयोऽध्यायः राजा धृतराष्ट्रका गान्धारीके साथ वनमें जानेके लिये उद्योग एवं युधिष्ठिरसे अनुमति देनेके लिये अनुरोध तथा युधिष्ठिर और कुन्ती आदिका दुःखी होना वैशम्पायन उवाच

युधिष्ठिरस्य नृपतेर्दुर्योधनपितुस्तदा ।

नान्तरं ददृशू राज्ये पुरुषाः प्रणयं प्रति ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! राजा युधिष्ठिर और धृतराष्ट्रमें जो पारस्परिक प्रेम था, उसमें राज्यके लोगोंने कभी कोई अन्तर नहीं देखा ॥ १ ॥

यदा तु कौरवो राजा पुत्रं सस्मार दुर्मतिम् ।

तदा भीमं हृदा राजन्नपध्याति स पार्थिवः ॥ २ ॥

राजन्! परंतु वे कुरुवंशी राजा धृतराष्ट्र जब अपने दुर्बुद्धि पुत्र दुर्योधनका स्मरण करते I थे, तब मन -ही --मन भीमसेनका अनिष्ट चिन्तन किया करते थे ॥ २ ॥

तथैव भीमसेनोऽपि धृतराष्ट्रं जनाधिपम् ।

नामर्षयत राजेन्द्र सदैव दुष्टवद्धृदा ॥ ३ ॥

राजेन्द्र! उसी प्रकार भीमसेन भी सदा ही राजा धृतराष्ट्रके प्रति अपने मनमें दुर्भावना रखते थे । वे कभी उन्हें क्षमा नहीं कर पाते थे ॥ ३ ॥

अप्रकाशान्यप्रियाणि चकारास्य वृकोदरः ।

आज्ञां प्रत्यहरच्चापि कृतज्ञैः पुरुषैः सदा ॥ ४ ॥

भीमसेन गुप्त रीतिसे धृतराष्ट्रको अप्रिय लगनेवाले काम किया करते थे तथा अपने द्वारा नियुक्त किये हुए कृतज्ञ पुरुषोंसे उनकी आज्ञा भी भंग करा दिया करते थे ॥

स्मरन् दुर्मन्त्रितं तस्य वृत्तान्यप्यस्य कानिचित् ।

अथ भीमः सुहृन्मध्ये बाहुशब्दं तथाकरोत् ॥ ५ ॥

संश्रवे धृतराष्ट्रस्य गान्धार्याश्चाप्यमर्षणः ।

स्मृत्वा दुर्योधनं शत्रुं कर्णदुःशासनावपि ॥ ६ ॥

प्रोवाचेदं सुसंरब्धो भीमः स परुषं वचः ।

पृष्ठ 2254

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राजा धृतराष्ट्रकी जो दुष्टतापूर्ण मन्त्रणाएँ होती थीं और तदनुसार ही जो उनके कई दुर्बर्ताव हुए थे, उन्हें सदा भीमसेन याद रखते थे । एक दिन अमर्षमें भरे हुए भीमसेनने अपने मित्रोंके बीचमें बारंबार अपनी भुजाओंपर ताल ठोंका और धृतराष्ट्र एवं गान्धारीको सुनाते हुए रोषपूर्वक यह कठोर वचन कहा । वे अपने शत्रु दुर्योधन, कर्ण और दुःशासनको याद करके यों कहने लगे – ॥ ५-६३ ॥ अन्धस्य नृपतेः पुत्रा मया परिघबाहुना ॥ ७ ॥

नीता लोकममुं सर्वे नानाशस्त्रास्त्रयोधिनः । ‘ मित्रो! मेरी भुजाएँ परिघके समान सुदृढ़ हैं । मैंने ही उस अंधे राजाके समस्त पुत्रोंको, जो नाना प्रकारके अस्त्र - शस्त्रोंद्वारा युद्ध करते थे, यमलोकका अतिथि बनाया है ॥ ७३ ॥

इमौ तौ परिघप्रख्यौ भुजौ मम दुरासदौ ॥ ८ ॥

ययोरन्तरमासाद्य धार्तराष्ट्राः क्षयं गताः । ‘ देखो, ये हैं मेरे दोनों परिघके समान सुदृढ़ एवं दुर्जय बाहुदण्ड; जिनके बीचमें पड़कर धृतराष्ट्रके बेटे पिस गये हैं ॥ ८३ ॥

ताविमौ चन्दनेनाक्तौ चन्दनार्हौ च मे भुजौ ॥ ९ ॥

याभ्यां दुर्योधनो नीतः क्षयं ससुतबान्धवः । ‘ ये मेरी दोनों भुजाएँ चन्दनसे चर्चित एवं चन्दन लगानेके ही योग्य हैं, जिनके द्वारा पुत्रों और बन्धु - बान्धवोंसहित राजा दुर्योधन नष्ट कर दिया गया ' ॥ ९ ३ ॥ एताश्चान्याश्च विविधाः शल्यभूता नराधिपः ॥ १० ॥

वृकोदरस्य ता वाचः श्रुत्वा निर्वेदमागमत् । ये तथा और भी नाना प्रकारकी भीमसेनकी कही हुई कठोर बातें जो हृदयमें काँटोंके समान कसक पैदा करनेवाली थीं, राजा धृतराष्ट्रने सुनीं । सुनकर उन्हें बड़ा खेद हुआ ॥ १० || सा च बुद्धिमती देवी कालपर्यायवेदिनी ॥ ११ ॥

गान्धारी सर्वधर्मज्ञा तान्यलीकानि शुश्रुवे । समयके उलट- फेरको समझने और समस्त धर्मोंको जाननेवाली बुद्धिमती गान्धारी देवीने भी इन कठोर वचनोंको सुना था ॥ ११३ ॥

ततः पञ्चदशे वर्षे समतीते नराधिपः ॥ १२ ॥

राजा निर्वेदमापेदे भीमवाग्बाणपीडितः । उस समयतक उन्हें राजा युधिष्ठिरके आश्रयमें रहते पंद्रह वर्ष व्यतीत हो चुके थे । पंद्रहवाँ वर्ष बीतनेपर भीमसेनके वाग्बाणोंसे पीड़ित हुए राजा धृतराष्ट्रको खेद एवं वैराग्य हुआ ॥ १२३ ॥

नान्वबुध्यत तद् राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ १३ ॥

पृष्ठ 2255

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श्वेताश्ववाथ कुन्ती वा द्रौपदी वा यशस्विनी । कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिरको इस बातकी जानकारी नहीं थी । अर्जुन, कुन्ती तथा यशस्विनी द्रौपदीको भी इसका पता नहीं था ॥ १३३ ॥

माद्रीपुत्रौ च धर्मज्ञौ चित्तं तस्यान्ववर्तताम् ॥ १४ ॥

राज्ञस्तु चित्तं रक्षन्तौ नोचतुः किंचिदप्रियम् । धर्मके ज्ञाता माद्रीपुत्र नकुल सहदेव सदा राजा धृतराष्ट्रके मनोऽनुकूल ही बर्ताव करते थे । वे उनका मन रखते हुए कभी कोई अप्रिय बात नहीं कहते थे ॥ ततः समानयामास धृतराष्ट्रः सुहृज्जनम् ॥ १५ ॥

वाष्पसंदिग्धमत्यर्थमिदमाह च तान् भृशम् । तदनन्तर धृतराष्ट्रने अपने मित्रोंको बुलवाया और नेत्रोंमें आँसू भरकर अत्यन्त गद्गद वाणीमें इस प्रकार कहा ॥ १५३ ॥

धृतराष्ट्रउवाच विदितं भवतामेतद् यथा वृत्तः कुरुक्षयः ॥ १६ ॥

ममापराधात् तत् सर्वमनुज्ञातं च कौरवैः । धृतराष्ट्र बोले- मित्रो! आपलोगोंको यह मालूम ही है कि कौरववंशका विनाश किस प्रकार हुआ है । समस्त कौरव इस बातको जानते हैं कि मेरे ही अपराधसे सारा अनर्थ हुआ है ॥ १६३ ॥

योऽहं दुष्टमतिं मन्दो ज्ञातीनां भयवर्धनम् ॥ १७ ॥

दुर्योधनं कौरवाणामाधिपत्येऽभ्यषेचयम् । दुर्योधनकी बुद्धिमें दुष्टता भरी थी । वह जाति- भाइयोंका भय बढ़ानेवाला था तो भी मुझ मूर्खने उसे कौरवोंके राजसिंहासनपर अभिषिक्त कर दिया ॥ १७ ॥

यच्चाहं वासुदेवस्य नाश्रौषं वाक्यमर्थवत् ॥ १८ ॥

वध्यतां साध्वयं पापः सामात्य इति दुर्मतिः ।

पुत्रस्नेहाभिभूतस्तु हितमुक्तो मनीषिभिः ॥ १ ९ ॥

मैंने वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णकी अर्थभरी बातें नहीं सुनी । मनीषी पुरुषोंने मुझे यह हितकी बात बतायी थी कि इस खोटी बुद्धिवाले पापी दुर्योधनको मन्त्रियोंसहित मार डाला जाय, इसीमें संसारका हित है; किंतु पुत्रस्नेहके वशीभूत होकर मैंने ऐसा नहीं किया ॥

विदुरेणाथ भीष्मेण द्रोणेन च कृपेण च ।

पदे पदे भगवता व्यासेन च महात्मना ॥ २० ॥

संजयेनाथ गान्धार्या तदिदं तप्यते च माम् ।

पृष्ठ 2256

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विदुर, भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, महात्मा भगवान् व्यास, संजय और गान्धारी देवीने भी मुझे पग- पगपर उचित सलाह दी, किंतु मैंने किसीकी बात नहीं मानी । यह भूल मुझे सदा संताप देती रहती है ॥ २० ॥

यच्चाहं पाण्डुपुत्रेषु गुणवत्सु महात्मसु ॥ २१ ॥

न दत्तवान् श्रियं दीप्तां पितृपैतामहीमिमाम् । महात्मा पाण्डव गुणवान् हैं तथापि उनके बाप -दादोंकी यह उज्ज्वल सम्पत्ति भी मैंने उन्हें नहीं दी ॥ विनाशं पश्यमानो हि सर्वराज्ञां गदाग्रजः ॥ २२ ॥

एतच्छ्रेयस्तु परमममन्यत जनार्दनः । समस्त राजाओंका विनाश देखते हुए गदाग्रज भगवान् श्रीकृष्णने यही परम कल्याणकारी माना कि मैं पाण्डवोंका राज्य उन्हें लौटा दूँ; परंतु मैं वैसा नहीं कर सका ॥ २२ ॥

सोऽहमेतान्यलीकानि निवृत्तान्यात्मनस्तदा ॥ २३ ॥

हृदये शल्यभूतानि धारयामि सहस्रशः । इस तरह अपनी की हुई हजारों भूलें मैं अपने हृदयमें धारण करता हूँ, जो इस समय काँटोंके समान कसक पैदा करती हैं ॥ २३ ॥

विशेषतस्तु पश्यामि वर्षे पञ्चदशेऽद्य वै ॥ २४ ॥

अस्य पापस्य शुद्धयर्थं नियतोऽस्मि सुदुर्मतिः । विशेषतः पंद्रहवें वर्षमें आज मुझ दुर्बुद्धिकी आँखें खुली हैं और अब मैं इस पापकी शुद्धिके लिये नियमका पालन करने लगा हूँ ॥ २४३ ॥

चतुर्थे नियते काले कदाचिदपि चाष्टमे ॥ २५ ॥

तृष्णाविनयनं भुजे गान्धारी वेद तन्मम ।

करोत्याहारमिति मां सर्वः परिजनः सदा ॥ २६ ॥

कभी चौथे समय ( अर्थात् दो दिनपर) और कभी आठवें समय अर्थात् चार दिनपर केवल भूखकी आग बुझानेके लिये मैं थोड़ा- सा आहार करता हूँ। मेरे इस नियमको केवल गान्धारी देवी जानती हैं । अन्य सब लोगोंको यही मालूम है कि मैं प्रतिदिन पूरा भोजन करता हूँ ॥ २५-२६ ॥

युधिष्ठिरभयादेति भृशं तप्यति पाण्डवः ।

भूमौ शये जप्यपरो दर्भेष्वजिनसंवृतः ॥ २७ ॥

नियमव्यपदेशेन गान्धारी च यशस्विनी ।

पृष्ठ 2257

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लोग युधिष्ठिरके भयसे मेरे पास आते हैं । पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर मुझे आराम देनेके लिये अत्यन्त चिन्तित रहते हैं । मैं और यशस्विनी गान्धारी दोनों नियम पालनके व्याजसे मृगचर्म पहन कुशासनपर बैठकर मन्त्रजप करते और भूमिपर सोते हैं ॥ २७ ॥

हतं शतं तु पुत्राणां ययोर्युद्धेऽपलायिनाम् ॥ २८ ॥

नानुतप्यामि तच्चाहं क्षत्रधर्मं हि ते विदुः । हम दोनोंके युद्धमें पीठ न दिखानेवाले सौ पुत्र मारे गये हैं, किंतु उनके लिये मुझे दुःख नहीं है; क्योंकि वे क्षत्रिय धर्मको जानते थे ( और उसीके अनुसार उन्होंने युद्धमें प्राण- त्याग किया है ) ॥ २८३ ॥

इत्युक्त्वा धर्मराजानमभ्यभाषत कौरवः ॥ २ ९ ॥ भद्रं ते यादवीमातर्वचश्चेदं निबोध मे । अपने सुहृदोंसे ऐसा कहकर धृतराष्ट्र राजा युधिष्ठिरसे बोले – ' कुन्तीनन्दन! तुम्हारा कल्याण हो । तुम मेरी यह बात सुनो ॥ २ ९ ॥ सुखमस्म्युषितः पुत्र त्वया सुपरिपालितः ॥ ३० ॥

महादानानि दत्तानि श्राद्धानि च पुनः पुनः । ' बेटा! तुम्हारे द्वारा सुरक्षित होकर मैं यहाँ बड़े सुखसे रहा हूँ । मैंने बड़े - बड़े दान दिये हैं और बारंबार श्राद्धकर्मोंका अनुष्ठान किया है ॥ ३० ॥

प्रकृष्टं च यया पुत्र पुण्यं चीर्णं यथाबलम् ॥ ३१ ॥

गान्धारी हतपुत्रेयं धैर्येणोदीक्षते च माम् । ' पुत्र! जिसने अपनी शक्तिके अनुसार उत्कृष्ट पुण्यका अनुष्ठान किया है और जिसके सौ पुत्र मारे गये हैं, वही यह गान्धारीदेवी धैर्यपूर्वक मेरी देख- भाल करती है ॥ ३१३ ॥

द्रौपद्या ह्यपकर्तारस्तव चैश्वर्यहारिणः ॥ ३२ ॥

समतीता नृशंसास्ते स्वधर्मेण हता युधि ।

न तेषु प्रतिकर्तव्यं पश्यामि कुरुनन्दन ॥ ३३ ॥

‘ कुरुनन्दन! जिन्होंने द्रौपदीके साथ अत्याचार किया, तुम्हारे ऐश्वर्यका अपहरण किया, वे क्रूरकर्मी मेरे पुत्र क्षत्रियधर्मके अनुसार युद्धमें मारे गये हैं । अब उनके लिये कुछ करने आवश्यकता नहीं दिखायी देती है ॥ ३२-३३ ॥

सर्वे शस्त्रभृतां लोकान् गतास्तेऽभिमुखं हताः ।

आत्मनस्तु हितं पुण्यं प्रतिकर्तव्यमद्य वै ॥ ३४ ॥

गान्धार्याश्चैव राजेन्द्र तदनुज्ञातुमर्हसि । ' वे सब युद्धमें सम्मुख मारे गये हैं, अतः शस्त्रधारियोंको मिलनेवाले लोकोंमें गये हैं । राजेन्द्र! अब तो मुझे और गान्धारीदेवीको अपने हितके लिये पवित्र तप करना है; अतः इसके लिये हमें अनुमति दो ॥ ३४ ॥

पृष्ठ 2258

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त्वं तु शस्त्रभृतां श्रेष्ठः सततं धर्मवत्सलः ॥ ३५ ॥

राजा गुरुः प्राणभृतां तस्मादेतद् ब्रवीम्यहम् ।

अनुज्ञातस्त्वया वीर संश्रयेयं वनान्यहम् ॥ ३६ ॥

‘ तुम शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ और सदा धर्मपर अनुराग रखनेवाले हो। राजा समस्त प्राणियोंके लिये गुरुजनकी भाँति आदरणीय होता है । इसलिये तुमसे ऐसा अनुरोध करता हूँ। वीर! तुम्हारी अनुमति मिल जानेपर मैं वनको चला जाऊँगा ॥ ३५-३६ ॥

चीरवल्कलभृद् राजन् गान्धार्या सहितोऽनया ।

तवाशिषः प्रयुञ्जानो भविष्यामि वनेचरः ॥ ३७ ॥

' राजन्! वहाँ मैं चीर और वल्कल धारण करके इस गान्धारीके साथ वनमें विचरूँगा और तुम्हें आशीर्वाद देता रहूँगा ॥ ३७ ॥

उचितं नः कुले तात सर्वेषां भरतर्षभ ।

पुत्रेष्वैश्वर्यमाधाय वयसोऽन्ते वनं नृप ॥ ३८ ॥

' तात! भरतश्रेष्ठ नरेश्वर! हमारे कुलके सभी राजाओंके लिये यही उचित है कि वे अन्तिम अवस्थामें पुत्रोंको राज्य देकर स्वयं वनमें पधारें ॥ ३८ ॥

तत्राहं वायुभक्षो वा निराहारोऽपि वा वसन् ।

पत्न्या सहानया वीर चरिष्यामि तपः परम् ॥ ३ ९ ॥

' वीर! वहाँ मैं वायु पीकर अथवा उपवास करके रहूँगा तथा अपनी इस धर्मपत्नीके साथ उत्तम तपस्या करूँगा ॥ ३ ९ ॥

त्वं चापि फलभाक् तात तपसः पार्थिवो ह्यसि ।

फलभाजो हि राजानः कल्याणस्येतरस्य वा ॥ ४० ॥

' बेटा! तुम भी उस तपस्याके उत्तम फलके भागी बनोगे; क्योंकि तुम राजा हो और राजा अपने राज्यके भीतर होनेवाले भले- बुरे सभी कर्मोंके फलभागी होते हैं ' ॥ ४० ॥

युधिष्ठिर उवाच

न मां प्रीणयते राज्यं त्वय्येवं दुःखिते नृप ।

धिङ्मामस्तु सुदुर्बुद्धिं राज्यसक्तं प्रमादिनम् ॥ ४१ ॥

युधिष्ठिरने कहा – महाराज! आप यहाँ रहकर इस प्रकार दुःख उठा रहे थे और मुझे इसकी जानकारी न हो सकी, इसलिये अब यह राज्य मुझे प्रसन्न नहीं रख सकता । हाय! मेरी बुद्धि कितनी खराब है? मुझ जैसे प्रमादी और राज्यासक्त पुरुषको धिक्कार है ॥ ४१ ॥

योऽहं भवन्तं दुःखार्तमुपवासकृशं भृशम् ।

जिताहारं क्षितिशयं न विन्दे भ्रातृभिः सह ॥ ४२ ॥

पृष्ठ 2259

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आप दुःखसे आतुर और उपवास करनेके कारण अत्यन्त दुर्बल होकर पृथ्वीपर शयन कर रहे हैं तथा भोजनपर भी संयम कर लिया है और मैं भाइयोंसहित आपकी इस अवस्थाका पता ही न पा सका ॥ ४२ ॥

अहोऽस्मि वञ्चितो मूढो भवता गूढबुद्धिना ।

विश्वासयित्वा पूर्वं मां यदिदं दुःखमश्नुथाः ॥ ४३ ॥

अहो! आपने अपने विचारोंको छिपाकर मुझ मूर्खको अबतक धोखेमें ही डाल रखा था; क्योंकि पहले मुझे यह विश्वास दिलाकर कि मैं सुखी हूँ, आप आजतक यह दुःख भोगते रहे ॥ ४३ ॥

किं मे राज्येन भोगैर्वा किं यज्ञैः किं सुखेन वा ।

यस्य मे त्वं महीपाल दुःखान्येतान्यवाप्तवान् ॥ ४४ ॥

महाराज! इस राज्यसे, इन भोगोंसे, इन यज्ञोंसे अथवा इस सुख-सामग्रीसे मुझे क्या लाभ हुआ? जब कि मेरे ही पास रहकर आपको इतने दुःख उठाने पड़े ॥

पीडितं चापि जानामि राज्यमात्मानमेव च ।

अनेन वचसा तुभ्यं दुःखितस्य जनेश्वर ॥ ४५ ॥

जनेश्वर! आप दुःखी होकर जो ऐसी बात कह रहे हैं, इससे मैं उस समस्त राज्यको और अपनेको भी दुःखित समझता हूँ ॥ ४५ ॥

भवान् पिता भवान् माता भवान् नः परमो गुरुः ।

भवता विप्रहीणा वै क्व नु तिष्ठामहे वयम् ॥ ४६ ॥

आप ही हमारे पिता, आप ही माता और आप ही हमारे परम गुरु हैं । आपसे विलग होकर हम कहाँ रहेंगे ॥ ४६ ॥

औरसो भवतः पुत्रो युयुत्सुर्नृपसत्तम ।

अस्तु राजा महाराज यमन्यं मन्यते भवान् ॥ ४७ ॥

अहं वनं गमिष्यामि भवान् राज्यं प्रशासतु ।

न मामयशसा दग्धं भूयस्त्वं दग्धुमर्हसि ॥ ४८ ॥

नृपश्रेष्ठ! महाराज! युयुत्सु आपके औरस पुत्र हैं; ये ही राजा हों अथवा और किसीको जिसे आप उचित समझते हों, राजा बना दें या स्वयं ही इस राज्यका शासन करें । मैं ही वनको चला जाऊँगा । पिताजी! मैं पहलेसे ही अपयशकी आगमें जल चुका हूँ, अब पुनः आप भी मुझे न जलाइये ॥ ४७ -४८ ॥

नाहं राजा भवान् राजा भवतः परवानहम् ।

कथं गुरुं त्वां धर्मज्ञमनुज्ञातुमिहोत्सहे ॥ ४ ९ ॥

मैं राजा नहीं, आप ही राजा हैं। मैं तो आपकी आज्ञाके अधीन रहनेवाला सेवक हूँ ।

आप धर्मके ज्ञाता गुरु हैं । मैं आपको कैसे आज्ञा दे सकता हूँ ॥ ४ ९ ॥

न मन्युर्हृदि नः कश्चित् सुयोधनकृतेऽनघ ।

पृष्ठ 2260

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भवितव्यं तथा तद्धि वयं चान्ये च मोहिताः ॥ ५० ॥

निष्पाप नरेश! दुर्योधनने जो कुछ किया है, उसके लिये हमारे हृदयमें तनिक भी क्रोध नहीं है । जो कुछ हुआ है, वैसी ही होनहार थी । हम और दूसरे लोग उसीसे मोहित थे ॥ ५० ॥

वयं पुत्रा हि भवतो यथा दुर्योधनादयः ।

गान्धारी चैव कुन्ती च निर्विशेषे मते मम ॥ ५१ ॥

जैसे दुर्योधन आदि आपके पुत्र थे, वैसे ही हम भी हैं । मेरे लिये गान्धारी और कुन्तीमें कोई अन्तर नहीं है ॥ ५१ ॥

स मां त्वं यदि राजेन्द्र परित्यज्य गमिष्यसि ।

पृष्ठतस्त्वनुयास्यामि सत्यमात्मानमालभे ॥ ५२ ॥

राजन्! यदि आप मुझे छोड़कर चले जायँगे तो मैं अपनी सौगन्ध खाकर सत्य कहता हूँ कि मैं भी आपके पीछे - पीछे चल दूँगा ॥ ५२ ॥

इयं हि वसुसम्पूर्णा मही सागरमेखला ।

भवता विप्रहीणस्य न मे प्रीतिकरी भवेत् ॥ ५३ ॥

आपके त्याग देनेपर यह धन- धान्यसे परिपूर्ण समुद्रसे घिरी हुई सारी पृथ्वीका राज्य भी मुझे प्रसन्न नहीं रख सकता ॥ ५३ ॥

भवदीयमिदं सर्वं शिरसा त्वां प्रसादये ।

त्वदधीनाः स्म राजेन्द्र व्येतु ते मानसो ज्वरः ॥ ५४ ॥

राजेन्द्र! यह सब कुछ आपका है । मैं आपके चरणोंपर मस्तक रखकर प्रार्थना करता हूँ कि आप प्रसन्न हो जाइये। हम सब लोग आपके अधीन हैं । आपकी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिये ॥ ५४ ॥

भवितव्यमनुप्राप्तो मन्ये त्वं वसुधाधिप ।

दिष्ट्या शुश्रूषमाणस्त्वां मोक्षिष्ये मनसो ज्वरम् ॥ ५५ ॥

पृथ्वीनाथ! मैं समझता हूँ कि आप भवितव्यताके वशमें पड़ गये थे । यदि सौभाग्यवश मुझे आपकी सेवाका अवसर मिलता रहा तो मेरी मानसिक चिन्ता दूर हो जायगी ॥ ५५ ॥

धृतराष्ट्रउवाच

तापस्ये मे मनस्तात वर्तते कुरुनन्दन ।

उचितं च कुलेऽस्माकमरण्यगमनं प्रभो ॥ ५६ ॥

धृतराष्ट्र बोले- बेटा! कुरुनन्दन! अब मेरा मन तपस्यामें ही लग रहा है । प्रभो! जीवनकी अन्तिम अवस्थामें वनको जाना हमारे कुलके लिये उचित भी है ॥ ५६ ॥

चिरमस्म्युषितः पुत्र चिरं शुश्रूषितस्त्वया ।

वृद्धं मामप्यनुज्ञातुमर्हसि त्वं नराधिप ॥ ५७ ॥