श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 2261–2270
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2261–2270
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पुत्र! नरेश्वर! मैं दीर्घकालतक तुम्हारे पास रह चुका और तुमने भी बहुत दिनोंतक मेरी सेवा- शुश्रूषा की । अब मेरी वृद्धावस्था आ गयी । अब तो मुझे वनमें जानेकी अनुमति देनी ही चाहिये ॥ ५७ ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्त्वा धर्मराजानं वेपमानं कृताञ्जलिम् ।
उवाच वचनं राजा धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ॥ ५८ ॥
संजयं च महात्मानं कृपं चापि महारथम् ।
अनुनेतुमिहेच्छामि भवद्भिर्वसुधाधिपम् ॥ ५ ९ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! धृतराष्ट्रकी यह बात सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर काँपने लगे और हाथ जोड़कर चुपचाप बैठे रहे । अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्रने उनसे उपर्युक्त बात कहकर महात्मा संजय और महारथी कृपाचार्यसे कहा — ‘ मैं आपलोगोंके द्वारा राजा युधिष्ठिरको समझाना चाहता हूँ' ॥ ५८–५९ ॥
म्लायते मे मनो हीदं मुखं च परिशुष्यति ।
वयसा च प्रकृष्टेन वाग्व्यायामेन चैव ह ॥ ६० ॥
‘ एक तो मेरी वृद्धावस्था और दूसरे बोलनेका परिश्रम, इन कारणोंसे मेरा जी घबरा रहा है और मुँह सूखा जाता है ' ॥ ६० ॥
इत्युक्त्वा स तु धर्मात्मा वृद्धो राजा कुरूद्वहः ।
गान्धारीं शिश्रिये धीमान् सहसैव गतासुवत् ॥ ६१ ॥
ऐसा कहकर धर्मात्मा बूढ़े राजा कुरुकुलशिरोमणि बुद्धिमान् धृतराष्ट्रने सहसा ही निर्जीवकी भाँति गान्धारीका सहारा ले लिया ॥ ६१ ॥
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तं तु दृष्ट्वा समासीनं विसंज्ञमिव कौरवम् ।
आर्तिं राजागमत् तीव्रां कौन्तेयः परवीरहा ॥ ६२ ॥
कुरुराज धृतराष्ट्रको संज्ञाहीन - सा बैठा देख शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले कुन्तीकुमार राजा युधिष्ठिरको बड़ा दुःख हुआ ॥ ६२ ॥
युधिष्ठिरउवाच
यस्य नागसहस्रेण शतसंख्येन वै बलम् ।
सोऽयं नारीं व्यपाश्रित्य शेते राजा गतासुवत् ॥ ६३ ॥
युधिष्ठिरने कहा— ओह! जिसमें एक लाख हाथियोंके समान बल था, वे ही ये राजा धृतराष्ट्र आज प्राणहीन - से होकर स्त्रीका सहारा लिये सो रहे हैं ॥ ६३ ॥
आयसी प्रतिमा येन भीमसेनस्य सा पुरा ।
चूर्णीकृता बलवता सोऽबलामाश्रितः स्त्रियम् ॥ ६४ ॥
जिन बलवान् नरेशने पहले भीमसेनकी लोहमयी प्रतिमाको चूर्ण कर डाला था, वे आज अबला नारीके सहारे पड़े हैं ॥ ६४ ॥
धिगस्तु मामधर्मज्ञं धिग् बुद्धिं धिक् च मेश्रुतम् यत्कृते पृथिवीपालः शेतेऽयमतथोचितः ॥ ६५ ॥
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मुझे धर्मका कोई ज्ञान नहीं है । मुझे धिक्कार है । मेरी बुद्धि और विद्याको भी धिक्कार है, जिसके कारण ये महाराज इस समय अपने लिये अयोग्य अवस्थामें पड़े हुए हैं ॥ ६५ ॥
अहमप्युपवत्स्यामि यथैवायं गुरुर्मम ।
यदि राजा न भुङ्क्तेऽयं गान्धारी च यशस्विनी ॥ ६६ ॥
यदि यशस्विनी गान्धारी देवी और राजा धृतराष्ट्र भोजन नहीं करते हैं तो अपने इन गुरुजनोंकी भाँति मैं भी उपवास करूँगा ॥ ६६ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततोऽस्य पाणिना राजन् जलशीतेन पाण्डवः ।
उरो मुखं च शनकैः पर्यमार्जत धर्मवित् ॥ ६७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! यह कहकर धर्मके ज्ञाता पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरने जलसे शीतल किये हुए हाथसे धृतराष्ट्रकी छाती और मुँहको धीरे- धीरे पोंछा ॥ ६७ ॥
तेन रत्नौषधिमता पुण्येन च सुगन्धिना ।
पाणिस्पर्शेन राज्ञः स राजा संज्ञामवाप ह ॥ ६८ ॥
महाराज युधिष्ठिरके रत्नौषधिसम्पन्न उस पवित्र एवं सुगन्धित कर-स्पर्शसे राजा धृतराष्ट्रकी चेतना लौट आयी ॥ ६८ ॥
धृतराष्ट्रउवाच
स्पृश मां पाणिना भूयः परिष्वज च पाण्डव ।
जीवामीवातिसंस्पर्शात् तव राजीवलोचन ॥ ६ ९ ॥
धृतराष्ट्र बोले— कमलनयन पाण्डुनन्दन! तुम फिरसे मेरे शरीरपर अपना हाथ फेरो और मुझे छातीसे लगा लो। तुम्हारे सुखदायक स्पर्शसे मानो मेरे शरीरमें प्राण आ जाते हैं ॥ ६ ९ ॥
मूर्धानं च तवाघ्रातुमिच्छामि मनुजाधिप ।
पाणिभ्यां हि परिस्प्रष्टुं प्रीणनं हि महन्मम ॥ ७० ॥
नरेश्वर! मैं तुम्हारा मस्तक सूँघना चाहता हूँ और अपने दोनों हाथोंसे तुम्हें स्पर्श
करनेकी इच्छा रखता हूँ । इससे मुझे परम तृप्ति मिल रही है ॥ ७० ॥
अष्टमो ह्यद्य कालोऽयमाहारस्य कृतस्य मे ।
नाहं कुरुशार्दूल शक्नोमि न विचेष्टितुम् ॥ ७१ ॥
पिछले दिनों जब मैंने भोजन किया था, तबसे आज यह आठवाँ समय – चौथा दिन पूरा हो गया है । कुरुश्रेष्ठ! इसीसे शिथिल होकर मैं कोई चेष्टा नहीं कर पाता ॥ ७१ ॥
व्यायामश्चायमत्यर्थं कृतस्त्वामभियाचता ।
ततो ग्लानमनास्तात नष्टसंज्ञ इवाभवम् ॥ ७२ ॥
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तात! तुमसे अनुरोध करनेके लिये बोलते समय मुझे बड़ा भारी परिश्रम करना पड़ा है ।
अतः क्षीणशक्ति होकर मैं अचेत - सा हो गया था ॥ ७२ ॥
तवामृतरसप्रख्यं हस्तस्पर्शमिमं प्रभो ।
लब्ध्वा संजीवितोऽस्मीति मन्ये कुरुकुलोद्वह ॥ ७३ ॥
प्रभो! तुम्हारे हाथोंका यह स्पर्श अमृत-रसके समान शीतल एवं सुखद है ।
कुरुकुलनाथ! इसे पाकर मुझमें नया जीवन आ गया है, मैं ऐसा मानता हूँ ॥ ७३ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तु कौन्तेयः पित्रा ज्येष्ठेन भारत ।
पस्पर्श सर्वगात्रेषु सौहार्दात् तं शनैस्तदा ॥ ७४ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— भारत! अपने ज्येष्ठ पितृव्य धृतराष्ट्रके ऐसा कहनेपर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने बड़े स्नेहके साथ उनके समस्त अंगोंपर धीरे- धीरे हाथ फेरा ॥ ७४ ॥
उपलभ्य ततः प्राणान् धृतराष्ट्रो महीपतिः ।
बाहुभ्यां सम्परिष्वज्य मूर्ध्याजिघ्रत पाण्डवम् ॥ ७५ ॥
उनके स्पर्शसे राजा धृतराष्ट्रके शरीरमें मानो नूतन प्राण आ गये और उन्होंने अपनी दोनों भुजाओंसे युधिष्ठिरको छातीसे लगाकर उनका मस्तक सूँघा ॥ ७५ ॥
विदुरादयश्च ते सर्वे रुरुदुर्दुःखिता भृशम् ।
अतिदुःखात् तु राजानं नोचुः किंचन पाण्डवम् ॥ ७६ ॥
यह करुण दृश्य देखकर विदुर आदि सब लोग अत्यन्त दुःखी हो रोने लगे । अधिक दुःखके कारण वे लोग पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिरसे कुछ न बोले ॥ ७६ ॥
गान्धारी त्वेव धर्मज्ञा मनसोद्वहती भृशम् ।
दुःखान्यधारयद् राजन् मैवमित्येव चाब्रवीत् ॥ ७७ ॥
धर्मको जाननेवाली गान्धारी अपने मनमें दुःखका बड़ा भारी बोझ ढो रही थी । उसने दुःखोंको मनमें ही दबा लिया और रोते हुए लोगोंसे कहा – ' ऐसा न करो ' ॥
इतरास्तु स्त्रियः सर्वाः कुन्त्या सह सुदुःःखिताः ।
नेत्रैरागतविक्लेदैः परिवार्य स्थिताऽभवन् ॥ ७८ ॥
कुन्तीके साथ कुरुकुलकी अन्य स्त्रियाँ भी अत्यन्त दुःखी हो नेत्रोंसे आँसू बहाती हुई उन्हें घेरकर खड़ी हो गयीं ॥ ७८ ॥
अथाब्रवीत् पुनर्वाक्यं धृतराष्ट्रो युधिष्ठिरम् ।
अनुजानीहि मां राजंस्तापस्ये भरतर्षभ ॥ ७९ ॥
तदनन्तर धृतराष्ट्रने पुनः युधिष्ठिरसे कहा – ' राजन्! भरतश्रेष्ठ! मुझे तपस्याके लिये अनुमति दे दो ॥ ७९ ॥
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ग्लायते मे मनस्तात भूयो भूयः प्रजल्पतः ।
न मामतः परं पुत्र परिक्लेष्टुमिहार्हसि ॥ ८० ॥
‘ तात! बार- बार बोलनेसे मेरा जी घबराता है, अतः बेटा! अब मुझे अधिक कष्टमें न डालो ' ॥ ८० ॥
तस्मिंस्तु कौरवेन्द्रे तं तथा ब्रुवति पाण्डवम् ।
सर्वेषामेव योधानामार्तनादो महानभूत् ॥ ८१ ॥
कौरवराज धृतराष्ट्र जब पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरसे ऐसी बात कह रहे थे, उस समय वहाँ उपस्थित हुए समस्त योद्धा महान् आर्तनाद ( हाहाकार) करने लगे ॥ ८१ ॥
दृष्ट्वा कृशं विवर्णं च राजानमतथोचितम् ।
उपवासपरिश्रान्तं त्वगस्थिपरिवारणम् ॥ ८२ ॥
धर्मपुत्रः स्वपितरं परिष्वज्य महाप्रभुम् ।
शोकजं बाष्पमुत्सृज्य पुनर्वचनमब्रवीत् ॥ ८३ ॥
अपने ताऊ महाप्रभु राजा धृतराष्ट्रको इस प्रकार उपवास करनेके कारण थके हुए, दुर्बल, कान्तिहीन, अस्थिचर्मावशिष्ट और अयोग्य अवस्थामें स्थित देख धर्मपुत्र युधिष्ठिर क्षोभजनित आँसू बहाते हुए उनसे इस प्रकार बोले— ॥ ८२-८३ ॥
न कामये नरश्रेष्ठ जीवितं पृथिवीं तथा ।
यथा तव प्रियं राजंश्चिकीर्षामि परंतप ॥ ८४ ॥
' नरश्रेष्ठ! मैं न तो जीवन चाहता हूँ न पृथ्वीका राज्य । परंतप नरेश! जिस तरह भी आपका प्रिय हो, वही मैं करना चाहता हूँ ॥ ८४ ॥
यदि चाहमनुग्राह्यो भवतो दयितोऽपि वा ।
क्रियतां तावदाहारस्ततो वेत्स्याम्यहं परम् ॥ ८५ ॥
'यदि आप मुझे अपनी कृपाका पात्र समझते हों और यदि मैं आपका प्रिय होऊँ तो
मेरी प्रार्थनासे इस समय भोजन कीजिये । इसके बाद मैं आगेकी बात सोचूँगा ' ॥
ततोऽब्रवीन्महातेजा धृतराष्ट्रो युधिष्ठिरम् ।
अनुज्ञातस्त्वया पुत्र भुञ्जीयामिति कामये ॥ ८६ ॥
तब महातेजस्वी धृतराष्ट्रने युधिष्ठिरसे कहा – ' बेटा! तुम मुझे वनमें जानेकी अनुमति दे दो तो मैं भोजन करूँ; यही मेरी इच्छा है ' ॥ ८६ ॥
इति ब्रुवति राजेन्द्रे धृतराष्ट्रे युधिष्ठिरम् ।
ऋषिः सत्यवतीपुत्रो व्यासोऽभ्येत्य वचोऽब्रवीत् ॥ ८७ ॥
महाराज धृतराष्ट्र युधिष्ठिरसे ये बातें कह ही रहे थे कि सत्यवतीनन्दन महर्षि व्यासजी वहाँ आ पहुँचे और इस प्रकार कहने लगे ॥ ८७ ॥
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इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि धृतराष्ट्रनिर्वेदे तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें धृतराष्ट्रका निर्वेदविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥
Fard
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चतुर्थोऽध्यायः व्यासजीके समझानेसे युधिष्ठिरका धृतराष्ट्रको वनमें जानेके लिये अनुमति देना व्यास उवाच
युधिष्ठिर महाबाहो यथाह कुरुनन्दनः ।
धृतराष्ट्रो महातेजास्तत् कुरुष्वाविचारयन् ॥। १ ॥
व्यासजी बोले – महाबाहु युधिष्ठिर! कुरुकुलको आनन्दित करनेवाले महातेजस्वी धृतराष्ट्र जो कुछ कह रहे हैं, उसे बिना विचारे पूरा करो ॥ १ ॥
अयं हि वृद्धो नृपतिर्हतपुत्रो विशेषतः ।
नेदं कृच्छ्रं चिरतरं सहेदिति मतिर्मम ॥ २ ॥
अब ये राजा बूढ़े हो गये हैं, विशेषतः इनके सभी पुत्र नष्ट हो चुके हैं । मेरा ऐसा विश्वास है कि अब ये इस कष्टको अधिक कालतक नहीं सह सकेंगे ॥ २ ॥
गान्धारी च महाभागा प्राज्ञा करुणवेदिनी ।
पुत्रशोकं महाराज धैर्येणोद्वहते भृशम् ॥ ३ ॥
महाराज! महाभागा गान्धारी परम विदुषी और करुणाका अनुभव करनेवाली हैं; इसीलिये ये महान् पुत्रशोकको धैर्यपूर्वक सहती चली आ रही हैं ॥ ३ ॥
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अहमप्येतदेव त्वां ब्रवीमि कुरु मे वचः ।
अनुज्ञां लभतां राजा मा वृथेह मरिष्यति ॥ ४ ॥
मैं भी तुमसे यही कहता हूँ, तुम मेरी बात मानो । राजा धृतराष्ट्रको तुम्हारी ओरसे वनमें जानेकी अनुमति मिलनी ही चाहिये, नहीं तो यहाँ रहनेसे इनकी व्यर्थ मृत्यु होगी ॥ ४ ॥
राजर्षीणां पुराणानामनुयातु गतिं नृपः ।
राजर्षीणां हि सर्वेषामन्ते वनमुपाश्रयः ॥ ५ ॥
तुम उन्हें अवसर दो, जिससे ये नरेश प्राचीन राजर्षियोंके पथका अनुसरण कर सकें ।
समस्त राजर्षियोंने जीवनके अन्तिम भागमें वनका ही आश्रय लिया है ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्तः स तदा राजा व्यासेनाद्भुतकर्मणा ।
प्रत्युवाच महातेजा धर्मराजो महामुनिम् ॥ ६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! अद्भुतकर्मा व्यासजीके ऐसा कहनेपर महातेजस्वी धर्मराज युधिष्ठिरने उन महामुनिको इस प्रकार उत्तर दिया- ॥ ६ ॥
भगवानेव नो मान्यो भगवानेव नो गुरुः ।
भगवानस्य राज्यस्य कुलस्य च परायणम् ॥ ७ ॥
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‘ भगवन्! आप ही हमलोगोंके माननीय और आप ही हमारे गुरु हैं । इस राज्य और पुरके परम आधार भी आप ही हैं ॥ ७ ॥
अहं तु पुत्रो भगवन् पिता राजा गुरुश्च मे निदेशवर्ती च पितुः पुत्रो भवति धर्मतः ॥ ८ ॥
‘ भगवन्! राजा धृतराष्ट्र हमारे पिता और गुरु हैं। धर्मतः पुत्र ही पिताकी आज्ञाके अधीन होता है । ( वह पिताको आज्ञा कैसे दे सकता है ) ' ॥ ८ ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्तः स तु तं प्राह व्यासो वेदविदां वरः ।
युधिष्ठिरं महातेजाः पुनरेव महाकविः ॥ ९ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ, महातेजस्वी, महाज्ञानी व्यासजीने युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर उन्हें समझाते हुए पुनः इस प्रकार कहा– ॥
एवमेतन्महाबाहो यथा वदसि भारत ।
राजायं वृद्धतां प्राप्तः प्रमाणे परमे स्थितः ॥ १० ॥
‘ महाबाहु भरतनन्दन! तुम जैसा कहते हो, वैसा ही ठीक है, तथापि राजा धृतराष्ट्र बूढ़े हो गये हैं और अन्तिम अवस्थामें स्थित हैं ॥ १० ॥
सोऽयं मयाभ्यनुज्ञातस्त्वया च पृथिवीपतिः ।
करोतु स्वमभिप्रायं मास्य विघ्नकरो भव ॥ ११ ॥
' अतः अब ये भूपाल मेरी और तुम्हारी अनुमति लेकर तपस्याके द्वारा अपना मनोरथ सिद्ध करें । इनके शुभ कार्यमें विघ्न न डालो ॥ ११ ॥
एष एव परो धर्मो राजर्षीणां युधिष्ठिर ।
समरे वा भवेन्मृत्युर्वने वा विधिपूर्वकम् ॥ १२ ॥
‘ युधिष्ठिर! राजर्षियोंका यही परम धर्म है कि युद्धमें अथवा वनमें उनकी शास्त्रोक्त विधिपूर्वक मृत्यु हो ।
पित्रा तु तव राजेन्द्र पाण्डुना पृथिवीक्षिता ।
शिष्यवृत्तेन राजायं गुरुवत् पर्युपासितः ॥ १३ ॥
‘ राजेन्द्र! तुम्हारे पिता राजा पाण्डुने भी धृतराष्ट्रको गुरुके समान मानकर शिष्यभावसे इनकी सेवा की थी ।
क्रतुभिर्दक्षिणावद्भी रत्नपर्वतशोभितैः ।
महद्भिरिष्टं गौर्भुक्ता प्रजाश्च परिपालिताः ॥ १४ ॥
‘ इन्होंने रत्नमय पर्वतोंसे सुशोभित और प्रचुर दक्षिणासे सम्पन्न अनेक बड़े - बड़े यज्ञ किये हैं, पृथ्वीका राज्य भोगा है और प्रजाका भलीभाँति पालन किया है ॥ पुत्रसंस्थं च विपुलं राज्यं विप्रोषिते त्वयि ।
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त्रयोदशसमा भुक्तं दत्तं च विविधं वसु ॥ १५ ॥
'जब तुम वनमें चले गये थे, उन दिनों तेरह वर्षोंतक अपने पुत्रके अधीन रहनेवाले विशाल राज्यका इन्होंने उपभोग किया और नाना प्रकारके धन दिये हैं ॥
त्वया चायं नरव्याघ्र गुरुशुश्रूषयानघ ।
आराधितः सभृत्येन गान्धारी च यशस्विनी ॥ १६ ॥
‘निष्पाप नरव्याघ्र! सेवकोंसहित तुमने भी गुरुसेवाके भावसे इनकी तथा यशस्विनी गान्धारी देवीकी आराधना की है ॥ १६ ॥
अनुजानीहि पितरं समयोऽस्य तपोविधौ ।
न मन्युर्विद्यते चास्य सुसूक्ष्मोऽपि युधिष्ठिर ॥ १७ ॥
‘ अतः तुम अपने पिताको वनमें जानेकी अनुमति दे दो; क्योंकि अब इनके तप करनेका समय आया है । युधिष्ठिर! इनके मनमें तुम्हारे ऊपर अणुमात्र भी रोष नही है ' ॥ १७ ॥
वैशम्पायन उवाच
एतावदुक्त्वा वचनमनुमान्य च पार्थिवम् ।
तथास्त्विति च तेनोक्तः कौन्तेयेन ययौ वनम् ॥ १८ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! यों कहकर महर्षि व्यासने राजा युधिष्ठिरको राजी कर लिया और ' बहुत अच्छा ' कहकर जब युधिष्ठिरने उनकी आज्ञा स्वीकार कर ली, तब वे वनमें अपने आश्रमपर चले गये ॥ १८ ॥
गते भगवति व्यासे राजा पाण्डुसुतस्तदा ।
प्रोवाच पितरं वृद्धं मन्दं मन्दमिवानतः ॥ १ ९ ॥
भगवान् व्यासके चले जानेपर राजा युधिष्ठिरने अपने बूढ़े ताऊ धृतराष्ट्रसे नम्रतापूर्वक
धीरे- धीरे कहा- यदाह भगवान् व्यासो यच्चापि भवतो मतम् ।
यथाऽऽह च महेष्वासः कृपो विदुर एव च ॥ २० ॥
युयुत्सुः संजयश्चैव तत्कर्तास्म्यहमञ्जसा ।
सर्व एव हि मान्या मे कुलस्य हि हितैषिणः ॥ २१ ॥
‘ पिताजी! भगवान् व्यासने जो आज्ञा दी है और आपने जो कुछ करनेका निश्चय किया है तथा महान् धनुर्धर कृपाचार्य, विदुर, युयुत्सु और संजय जैसा कहेंगे, निस्संदेह मैं वैसा ही करूँगा; क्योंकि ये सब लोग इस कुलके हितैषी होनेके कारण मेरे लिये माननीय हैं ॥ २०-२१ ॥
इदं तु याचे नृपते त्वामहं शिरसा नतः ।
क्रियतां तावदाहारस्ततो गच्छाश्रमं प्रति ॥ २२ ॥