श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 2271–2280

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2271–2280

पृष्ठ 2271

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' किंतु नरेश्वर! इस समय आपके चरणोंमें मस्तक झुकाकर मैं यह प्रार्थना करता हूँ कि पहले भोजन कर लीजिये, फिर आश्रमको जाइयेगा ' ॥ २२ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि व्यासानुज्ञायां चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें व्यासकी आज्ञाविषयक चौथा अध्याय पूरा हुआ ॥ ४ ॥

पृष्ठ 2272

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पञ्चमोऽध्यायः धृतराष्ट्रके द्वारा युधिष्ठिरको राजनीतिका उपदेश वैशम्पायन उवाच

ततो राज्ञाभ्यनुज्ञातो धृतराष्ट्रः प्रतापवान् ।

ययौ स्वभवनं राजा गान्धार्यानुगतस्तदा ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - तदनन्तर जनमेजय! राजा युधिष्ठिरकी अनुमति पाकर प्रतापी राजा धृतराष्ट्र गान्धारीके साथ अपने भवनमें गये ॥ १ ॥

मन्दप्राणगतिर्धीमान् कृच्छ्रादिव समुद्वहन् ।

पदातिः स महीपालो जीर्णो गजपतिर्यथा ॥ २ ॥

उस समय उनकी चलने - फिरनेकी शक्ति बहुत कम हो गयी थी । वे बुद्धिमान् भूपाल बूढ़े हाथीकी भाँति पैदल चलते समय बड़ी कठिनाईसे पैर उठाते थे ॥ २ ॥

तमन्वगच्छद् विदुरो विद्वान् सूतश्च संजयः ।

स चापि परमेष्वासः कृपः शारद्वतस्तथा ॥ ३ ॥

उस समय उनके पीछे - पीछे ज्ञानी विदुर, सारथि संजय तथा शरद्वान्‌के पुत्र महाधनुर्धर कृपाचार्य भी गये ॥

स प्रविश्य गृहं राजन् कृतपूर्वाह्निकक्रियः ।

तर्पयित्वा द्विजश्रेष्ठानाहारमकरोत् तदा ॥ ४ ॥

राजन्! घरमें प्रवेश करके उन्होंने पूर्वाह्नकालकी धार्मिक क्रिया पूरी की; फिर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको अन्न - पान आदिसे तृप्त करके स्वयं भी भोजन किया ॥ ४ ॥

गान्धारी चैव धर्मज्ञा कुन्त्या सह मनस्विनी ।

वधूभिरुपचारेण पूजिताभुङ्क्त भारत ॥ ५ ॥

भरतनन्दन! इसी प्रकार धर्मको जाननेवाली मनस्विनी गान्धारी देवीने भी कुन्तीसहित पुत्रवधुओंद्वारा विविध उपचारोंसे पूजित होकर आहार ग्रहण किया ॥ ५ ॥

कृताहारं कृताहाराः सर्वे ते विदुरादयः ।

पाण्डवाश्च कुरुश्रेष्ठमुपातिष्ठन्त तं नृपम् ॥ ६ ॥

कुरुश्रेष्ठ राजा धृतराष्ट्रके भोजन कर लेनेपर पाण्डव तथा विदुर आदि सब लोगोंने भी भोजन किया, फिर सब - के - सब धृतराष्ट्रकी सेवामें उपस्थित हुए ॥

ततोऽब्रवीन्महाराज कुन्तीपुत्रमुपह्वरे ।

निषण्णं पाणिना पृष्ठे संस्पृशन्नम्बिकासुतः ॥ ७ ॥

महाराज! उस समय कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरको एकान्तमें अपने निकट बैठा जान धृतराष्ट्रने उनकी पीठपर हाथ फेरते हुए कहा– ॥ ७ ॥

पृष्ठ 2273

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अप्रमादस्त्वया कार्यः सर्वथा कुरुनन्दन ।

अष्टाङ्गे राजशार्दूल राज्ये धर्मपुरस्कृते ॥ ८ ॥

‘ कुरुनन्दन! राजसिंह! इस आठ अंगोंवाले राज्यमें तुम सदा धर्मको ही आगे रखना और इसके संरक्षण और संचालनमें कभी किसी तरह भी प्रमाद न करना ॥ ८ ॥

तत्तु शक्यं महाराज रक्षितुं पाण्डुनन्दन ।

राज्यं धर्मेण कौन्तेय विद्वानसि निबोध तत् ॥ ९ ॥

‘ महाराज पाण्डुनन्दन! कुन्तीकुमार! राज्यकी रक्षा धर्मसे ही हो सकती है । इस बातको तुम स्वयं भी जानते हो तथापि मुझसे भी सुनो ॥ ९ ॥

विद्यावृद्धान् सदैव त्वमुपासीथा युधिष्ठिर ।

शृणुयास्ते च यद् ब्रूयुः कुर्याश्चैवाविचारयन् ॥ १० ॥

‘ युधिष्ठिर! विद्यामें बढ़े - चढ़े विद्वान् पुरुषोंका सदा ही संग किया करो । वे जो कुछ कहें, उसे ध्यानपूर्वक सुनो और उसका बिना विचारे पालन करो ' ॥

प्रातरुत्थाय तान् राजन् पूजयित्वा यथाविधि ।

कृत्यकाले समुत्पन्ने पृच्छेथाः कार्यमात्मनः ॥ ११ ॥

‘ राजन्! प्रातःकाल उठकर उन विद्वानोंका यथायोग्य सत्कार करके कोई कार्य उपस्थित होनेपर उनसे अपना कर्तव्य पूछो ॥ ११ ॥

पृष्ठ 2274

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ते तु सम्मानिता राजंस्त्वया कार्यहितार्थिना ।

प्रवक्ष्यन्ति हितं तात सर्वथा तव भारत ॥ १२ ॥

‘ राजन्! तात! भरतनन्दन! अपना हित करनेकी इच्छासे तुम्हारे द्वारा सम्मानित होनेपर वे सर्वथा तुम्हारे हितकी ही बात बतायेंगे ॥ १२ ॥

इन्द्रियाणि च सर्वाणि वाजिवत् परिपालय ।

हितायैव भविष्यन्ति रक्षितं द्रविणं यथा ॥ १३ ॥

‘ जैसे सारथि घोड़ोंको काबूमें रखता है, उसी प्रकार तुम सम्पूर्ण इन्द्रियोंको अपने अधीन रखकर उनकी रक्षा करो । ऐसा करनेसे वे इन्द्रियाँ सुरक्षित धनकी भाँति भविष्यमें तुम्हारे लिये निश्चय ही हितकर होंगी ॥ १३ ॥

अमात्यानुपधातीतान् पितृपैतामहान् शुचीन् ।

दान्तान् कर्मसु पुण्यांश्च पुण्यान् सर्वेषु योजयेः ॥ १४ ॥

' जो जाँचे - बूझे हुए तथा निष्कपटभावसे काम करनेवाले हों, जो पिता- पितामहोंके समयसे काम देखते आ रहे हों तथा जो बाहर- भीतरसे शुद्ध, संयमी और जन्म एवं कर्मसे भी पवित्र हों, ऐसे मन्त्रियोंको ही सब तरहके उत्तरदायित्वपूर्ण कार्योंमें नियुक्त करना ॥ १४ ॥

चारयेथाश्च सततं चारैरविदितः परैः ।

परीक्षितैर्बहुविधैः स्वराष्ट्रप्रतिवासिभिः ॥ १५ ॥

‘ जिनकी किसी अवसरपर परीक्षा कर ली गयी हो और जो अपने ही राज्यके भीतर निवास करनेवाले हों, ऐसे अनेक जासूसोंको भेजकर उनके द्वारा शत्रुओंका गुप्त भेद लेते रहना और प्रयत्नपूर्वक ऐसी चेष्टा करना, जिससे शत्रु तुम्हारा भेद न जान सकें ' ॥ १५ ॥

पुरं च ते सुगुप्तं स्याद् दृढप्राकारतोरणम् ।

अट्टाट्टालकसम्बाधं षट्पदं सर्वतोदिशम् ॥ १६ ॥

' तुम्हारे नगरकी रक्षाका पूर्ण प्रबन्ध रहना चाहिये । उसके चारों ओरकी दीवारें तथा मुख्य द्वार अत्यन्त सुदृढ़ होने चाहिये । बीचका सारा नगर ऊँची - ऊँची अट्टालिकाओंसे भरा होना चाहिये । सब दिशाओंमें छः चहारदीवारियाँ बननी चाहिये ॥ १६ ॥

तस्य द्वाराणि सर्वाणि पर्याप्तानि बृहन्ति च ।

सर्वतः सुविभक्तानि यन्त्रैरारक्षितानि च ॥ १७ ॥

‘ नगरके सभी दरवाजे विस्तृत एवं विशाल हों । सब ओर उनकी रक्षाके लिये यन्त्र लगे हों तथा उन द्वारोंका विभाग सुन्दर ढंगसे सम्पन्न हो ॥ १७ ॥

पुरुषैरलमर्थस्ते विदितैः कुलशीलतः ।

आत्मा च रक्ष्यः सततं भोजनादिषु भारत ॥ १८ ॥

‘ भारत! जिन मनुष्योंके कुल और शील अच्छी तरह ज्ञात हों, उन्हींसे तुम्हें काम लेना चाहिये । भोजन आदिके अवसरोंपर सदा तुम्हें आत्मरक्षापर ध्यान देना चाहिये ॥ १८ ॥

पृष्ठ 2275

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विहाराहारकालेषु माल्यशय्यासनेषु च ।

स्त्रियश्च ते सुगुप्ताः स्युर्वृद्धैराप्तैरधिष्ठिताः ॥ १ ९ ॥

शीलवद्भिः कुलीनैश्च विद्वद्भिश्च युधिष्ठिर । ' आहार- विहारके समय तथा माला पहनने, शय्यापर सोने और आसनोंपर बैठनेके समय भी तुम्हें सावधानीके साथ अपनी रक्षा करनी चाहिये । युधिष्ठिर! कुलीन, शीलवान्, विद्वान्, विश्वासपात्र एवं वृद्ध पुरुषोंकी अध्यक्षतामें रखकर तुम्हें अन्तःपुरकी स्त्रियोंकी रक्षाका सुन्दर प्रबन्ध करना चाहिये ॥ १ ९ ३ ॥ मन्त्रिणश्चैव कुर्वीथा द्विजान् विद्याविशारदान् ॥ २० ॥

विनीतांश्च कुलीनांश्च धर्मार्थकुशलानृजून् ।

तैः सार्धं मन्त्रयेथास्त्वं नात्यर्थं बहुभिः सह ॥ २१ ॥

' राजन्! तुम उन्हीं ब्राह्मणोंको अपने मन्त्री बनाओ, जो विद्यामें प्रवीण, विनयशील, कुलीन, धर्म और अर्थमें कुशल तथा सरल स्वभाववाले हों । उन्हींके साथ तुम गूढ़ विषयपर विचार करो; किंतु अधिक लोगोंको साथ लेकर देरतक मन्त्रणा नहीं करनी चाहिये ॥

समस्तैरपि च व्यस्तैर्व्यपदेशेन केनचित् ।

सुसंवृतं मन्त्रगृहं स्थलं चारुह्य मन्त्रयेः ॥ २२ ॥

‘ सम्पूर्ण मन्त्रियोंको अथवा उनमेंसे दो- एकको किसी कामके बहाने चारों ओरसे घिरे हुए बंद कमरेमें या खुले मैदानमें ले जाकर उनके साथ किसी गूढ़ विषयपर विचार करना ॥ २२ ॥

अरण्ये निःशलाके वा न च रात्रौ कथंचन ।

वानराः पक्षिणश्चैव ये मनुष्यानुसारिणः ॥ २३ ॥

सर्वे मन्त्रगृहे वर्ज्या ये चापि जडपङ्गवः । ‘ जहाँ अधिक घास - फूस या झाड़- झंखाड़ न हो, ऐसे जंगलमें भी गुप्त मन्त्रणा की जा सकती है; परंतु रात्रिके समय इन स्थानोंमें किसी तरह गुप्त सलाह नहीं करनी चाहिये । मनुष्योंका अनुसरण करनेवाले जो वानर और पक्षी आदि हैं, उन सबको तथा मूर्ख एवं पंगु मनुष्योंको भी मन्त्रणा- गृहमें नहीं आने देना चाहिये ॥ २३ ॥

मन्त्रभेदे हि ये दोषा भवन्ति पृथिवीक्षिताम् ॥ २४ ॥

न ते शक्याः समाधातुं कथंचिदिति मे मतिः । ' गुप्त मन्त्रणाके दूसरोंपर प्रकट हो जानेसे राजाओंको जो संकट प्राप्त होते हैं, उनका किसी तरह समाधान नहीं किया जा सकता - ऐसा मेरा विश्वास है ॥ २४ ॥

दोषांश्च मन्त्रभेदस्य ब्रूयास्त्वं मन्त्रिमण्डले ॥ २५ ॥

अभेदे च गुणा राजन् पुनः पुनररिंदम । 'शत्रुदमन नरेश! गुप्त मन्त्रणा फूट जानेपर जो दोष पैदा होते हैं और न फूटनेसे जो लाभ होते हैं, उनको तुम मन्त्रिमण्डलके समक्ष बारंबार बतलाते रहना ॥ २५३ ॥

पृष्ठ 2276

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पौरजानपदानां च शौचाशौचे युधिष्ठिर ॥ २६ ॥

यथा स्याद् विदितं राजंस्तथा कार्यं कुरूद्वह । ‘ राजन्! कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिर! नगर और जनपदके लोगोंका हृदय तुम्हारे प्रति शुद्ध है या अशुद्ध, इस बातका तुम्हें जैसे भी ज्ञान प्राप्त हो सके, वैसा उपाय करना ॥ २६३ ॥

व्यवहारश्च ते राजन् नित्यमाप्तैरधिष्ठितः ॥ २७ ॥

योज्यस्तुष्टैर्हितै राजन् नित्यं चारैरनुष्ठितः । ‘ नरेश्वर! न्याय करनेके कामपर तुम सदा ऐसे ही पुरुषोंको नियुक्त करना, जो विश्वासपात्र, संतोषी और हितैषी हों तथा गुप्तचरोंके द्वारा सदा उनके कार्योंपर दृष्टि रखना ॥ २७ ॥

परिमाणं विदित्वा च दण्डं दण्ड्येषु भारत ॥ २८ ॥

प्रणयेयुर्यथान्यायं पुरुषास्ते युधिष्ठिर । ‘ भरतनन्दन युधिष्ठिर! तुम्हें ऐसा विधान बनाना चाहिये, जिससे तुम्हारे नियुक्त किये हुए न्यायाधिकारी पुरुष अपराधियोंके अपराधकी मात्राको भलीभाँति जानकर जो दण्डनीय हों, उन्हें ही उचित दण्ड दें ॥ आदानरुचयश्चैव परदाराभिमर्शिनः ॥ २ ९ ॥

उग्रदण्डप्रधानाश्च मिथ्या व्याहारिणस्तथा ।

आक्रोष्टारश्च लुब्धाश्च हर्तारः साहसप्रियाः ॥ ३० ॥

सभाविहारभेत्तारो वर्णानां च प्रदूषकाः ।

हिरण्यदण्ड्या वध्याश्च कर्तव्या देशकालतः ॥ ३१ ॥

'जो दूसरोंसे घूस लेनेकी रुचि रखते हों, परायी स्त्रियोंसे जिनका सम्पर्क हो, जो विशेषतः कठोर दण्ड देनेके पक्षपाती हों, झूठा फैसला देते हों, जो कटुवादी, लोभी, दूसरोंका धन हड़पनेवाले, दुस्साहसी, सभाभवन और उद्यान आदिको नष्ट करनेवाले तथा सभी वर्णके लोगोंको कलंकित करनेवाले हों, उन न्यायाधिकारियोंको देश- कालका ध्यान रखते हुए सुवर्णदण्ड अथवा प्राणदण्डके द्वारा दण्डित करना चाहिये ॥ २ ९ –३१ ॥

प्रातरेव हि पश्येथा ये कुर्युर्व्ययकर्म ते ।

अलंकारमथो भोज्यमत ऊर्ध्वं समाचरेः ॥ ३२ ॥

‘ प्रातःकाल उठकर ( नित्य नियमसे निवृत्त होनेके बाद ) पहले तुम्हें उन लोगोंसे मिलना चाहिये, जो तुम्हारे खर्च- बर्चके कामपर नियुक्त हों । उसके बाद आभूषण पहनने या भोजन करनेके कामपर ध्यान देना चाहिये ॥

पश्येथाश्च ततो योधान् सदा त्वं प्रतिहर्षयन् ।

दूतानां च चराणां च प्रदोषस्ते सदा भवेत् ॥ ३३ ॥

‘तत्पश्चात् सैनिकोंका हर्ष और उत्साह बढ़ाते हुए उनसे मिलना चाहिये । दूतों और जासूसोंसे मिलनेके लिये तुम्हारे लिये सर्वोत्तम समय संध्याकाल है ॥ ३३ ॥

पृष्ठ 2277

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सदा चापररात्रान्ते भवेत् कार्यार्थनिर्णयः ।

मध्यरात्रे विहारस्ते मध्याह्ने च सदा भवेत् ॥ ३४ ॥

‘ पहरभर रात बाकी रहते ही उठकर अगले दिनके कार्य- क्रमका निश्चय कर लेना चाहिये । आधी रात और दोपहरके समय तुम्हें स्वयं घूम- फिरकर प्रजाकी अवस्थाका निरीक्षण करना उचित है ॥ ३४ ॥

सर्वे त्वौपयिकाः कालाः कार्याणां भरतर्षभ ।

तथैवालंकृतः काले तिष्ठेथा भूरिदक्षिण ॥ ३५ ॥

' प्रचुर दक्षिणा देनेवाले भरतश्रेष्ठ! काम करनेके लिये सभी समय उपयोगी हैं तथा तुम्हें समय - समयपर सुन्दर वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत रहना चाहिये ॥ ३५ ॥

चक्रवत् तात कार्याणां पर्यायो दृश्यते सदा ।

कोशस्य निचये यत्नं कुर्वीथा न्यायतः सदा ॥ ३६ ॥

विविधस्य महाराज विपरीतं विवर्जयेः । ‘ तात! चक्रकी भाँति सदा कार्योंका क्रम चलता रहता है, यह देखनेमें आता है । महाराज! नाना प्रकारके कोषका संग्रह करनेके लिये तुम्हें सदा न्यायानुकूल प्रयत्न करना चाहिये । इसके विपरीत अन्यायपूर्ण प्रयत्नको त्याग देना चाहिये ॥ ३६३ ॥

चारैर्विदित्वा शत्रूंश्च ये राज्ञामन्तरैषिणः ॥ ३७ ॥

तानाप्तैः पुरुषैर्दूराद् घातयेथा नराधिप । ‘ नरेश्वर! जो राजाओंके छिद्र देखा करते हैं, ऐसे राजविद्रोही शत्रुओंका गुप्तचरोंद्वारा पता लगाकर विश्वसनीय पुरुषोंद्वारा उन्हें दूरसे ही मरवा डालना चाहिये ॥ ३७३ ॥

कर्म दृष्ट्वाथ भृत्यांस्त्वं वरयेथाः कुरूद्वह ॥ ३८ ॥

कारयेथाश्च कर्माणि युक्तायुक्तैरधिष्ठितैः । ‘ कुरुश्रेष्ठ! पहले काम देखकर सेवकोंको नियुक्त करना चाहिये और अपने आश्रित मनुष्य योग्य हों या अयोग्य, उनसे काम अवश्य लेना चाहिये ॥ ३८३ ॥

सेनाप्रणेता च भवेत् तव तात दृढव्रतः ॥ ३ ९ ॥ शूरः क्लेशसहश्चैव हितो भक्तश्च पूरुषः । ‘ तात! तुम्हारे सेनापतिको दृढ़प्रतिज्ञ, शूरवीर, क्लेश सह सकनेवाला, हितैषी, पुरुषार्थी और स्वामिभक्त होना चाहिये ॥ ३ ९ ३ ॥ सर्वे जनपदाश्चैव तव कर्माणि पाण्डव ॥ ४० ॥

गोवद्रासभवच्चैव कुर्युर्ये व्यवहारिणः । ‘ पाण्डुनन्दन! तुम्हारे राज्यके अंदर रहनेवाले जो कारीगर और शिल्पी तुम्हारा काम करें, तुम्हें उनके भरण - पोषणका प्रबन्ध अवश्य करना चाहिये; जैसे गधों और बैलोंसे काम लेनेवाले लोग उन्हें खानेको देते हैं ॥ ४० ॥

पृष्ठ 2278

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स्वरन्ध्रं पररन्ध्रं च स्वेषु चैव परेषु च ॥ ४१ ॥

उपलक्षयितव्यं ते नित्यमेव युधिष्ठिर । ' युधिष्ठिर! तुम्हें सदा ही स्वजनों और शत्रुओंके छिद्रोंपर दृष्टि रखनी चाहिये ॥ ४१३ || देशजाश्चैव पुरुषा विक्रान्ताः स्वेषु कर्मसु ॥ ४२ ॥

यात्राभिरनुरूपाभिरनुग्राह्या हितास्त्वया ।

गुणार्थिनां गुणः कार्यो विदुषां वै जनाधिप ।

अविचार्याश्च ते ते स्युरचला इव नित्यशः ॥ ४३ ॥

‘ जनेश्वर! अपने देशमें उत्पन्न होनेवाले पुरुषोंमेंसे जो लोग अपने कार्यमें विशेष कुशल और हितैषी हों, उन्हें उनके योग्य आजीविका देकर अनुग्रहपूर्वक अपनाना चाहिये । विद्वान् राजाको उचित है कि वह गुणार्थी मनुष्यके गुण बढ़ानेका प्रयत्न करता रहे । उनके सम्बन्धमें तुम्हें कोई विचार नहीं करना चाहिये । वे तुम्हारे लिये सदा पर्वतके समान अविचल सहायक सिद्ध होंगे ' ॥ ४२-४३ ॥ इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि आश्रमवासपर्वणि धृतराष्ट्रोपदेशे पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें धृतराष्ट्रका उपदेशविषयक पाँचवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ५ ॥

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पृष्ठ 2279

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षष्ठोऽध्यायः धृतराष्ट्रद्वारा राजनीतिका उपदेश धृतराष्ट्रउवाच

मण्डलानि च बुध्येथाः परेषामात्मनस्तथा ।

उदासीनगणानां च मध्यस्थानां च भारत ॥ १ ॥

धृतराष्ट्रने कहा— भरतनन्दन! तुम्हें शत्रुओंके, अपने, उदासीन राजाओंके तथा मध्यस्थ पुरुषोंके मण्डलोंका ज्ञान रखना चाहिये ॥ १ ॥

चतुर्णां शत्रुजातानां सर्वेषामाततायिनाम् ।

मित्रं चामित्रमित्रं च बोद्धव्यं तेऽरिकर्शन ॥ २ ॥

शत्रुसूदन! तुम्हें चार प्रकारके शत्रुओंके और छः प्रकारके आततायियोंके भेदोंको एवं मित्र और शत्रुके मित्रको भी पहचानना चाहिये ॥ २ ॥

तथामात्या जनपदा दुर्गाणि विविधानि च ।

बलानि च कुरुश्रेष्ठ भवत्येषां यथेच्छकम् ॥ ३ ॥

ते च द्वादश कौन्तेय राज्ञां वै विषयात्मकाः ।

मन्त्रिप्रधानाश्च गुणाः षष्टिर्द्वादश च प्रभो ॥ ४ ॥

एतन्मण्डलमित्याहुराचार्या नीतिकोविदाः । कुरुश्रेष्ठ! अमात्य ( मन्त्री ), जनपद (देश ), नाना प्रकारके दुर्ग और सेना– इनपर शत्रुओंका यथेष्ट लक्ष्य रहता है ( अतः इनकी रक्षाके लिये सदा सावधान रहना चाहिये ) । प्रभो! कुन्तीनन्दन! उपर्युक्त बारह प्रकारके मनुष्य राजाओंके ही मुख्य विषय हैं । मन्त्रीके अधीन रहनेवाले कृषि आदि साठ* गुण और पूर्वोक्त बारह प्रकारके मनुष्य– इन सबको नीतिज्ञ आचार्योंने ‘ मण्डल' नाम दिया है ॥ ३-४ ॥ अत्र षाड्गुण्यमायत्तं युधिष्ठिर निबोध तत् ॥ ५ ॥

वृद्धिक्षयौ च विज्ञेयौ स्थानं च कुरुसत्तम । युधिष्ठिर! तुम इस मण्डलको अच्छी तरह जानो; क्योंकि राज्यकी रक्षाके संधि - विग्रह आदि छः उपायोंका उचित उपभोग इन्हींके अधीन है । कुरुश्रेष्ठ! राजाको चाहिये कि वह अपनी वृद्धि, क्षय और स्थितिका सदा ही ज्ञान रखे ॥ ५३ ॥

द्विसप्तत्यां महाबाहो ततः षाड्गुण्यजा गुणाः ॥ ६ ॥

यदा स्वपक्षो बलवान् परपक्षस्तथाबलः ।

विगृह्य शत्रून् कौन्तेय जेयः क्षितिपतिस्तदा ॥ ७ ॥

पृष्ठ 2280

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महाबाहो! पहले राजप्रधान बारह और मन्त्रिप्रधान साठ– इन बहत्तरका ज्ञान प्राप्त -करके संधि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और समाश्रय– इन छः गुणोंका यथावसर उपयोग किया जाता है । कुन्तीनन्दन! जब अपना पक्ष बलवान् तथा शत्रुका पक्ष निर्बल जान पड़े, उस समय शत्रुके साथ युद्ध छेड़कर विपक्षी राजाको जीतनेका प्रयत्न करना चाहिये ॥ ६-७ ॥

यदा परे च बलिनः स्वपक्षश्चैव दुर्बलः ।

सार्धं विद्वांस्तदा क्षीणः परैः संधिं समाश्रयेत् ॥ ८ ॥

परंतु जब शत्रु- पक्ष प्रबल और अपना ही पक्ष दुर्बल हो, उस समय क्षीणशक्ति विद्वान् पुरुष शत्रुओंके साथ संधि कर ले ॥ ८ ॥

द्रव्याणां संचयश्चैव कर्तव्यः सुमहांस्तथा ।

तदा समर्थो यानाय नचिरेणैव भारत ॥ ९ ॥

तदा सर्वं विधेयं स्यात् स्थाने न स विचारयेत् । भारत! राजाको सदैव द्रव्योंका महान् संग्रह करते रहना चाहिये । जब वह शीघ्र ही शत्रुपर आक्रमण करनेमें समर्थ हो, उस समय उसका जो कर्तव्य हो, उसे वह स्थिरतापूर्वक भलीभाँति विचार ले ॥ ९ ३ ॥ भूमिरल्पफला देया विपरीतस्य भारत ॥ १० ॥

हिरण्यं कुप्यभूयिष्ठं मित्रं क्षीणमथो बलम् । भारत! यदि अपनी विपरीत अवस्था हो तो शत्रुको कम उपजाऊ भूमि, थोड़ा - सा सोना और अधिक मात्रामें जस्ता-पीतल आदि धातु तथा दुर्बल मित्र एवं सेना देकर उसके साथ संधि करे ॥ १०३ ॥

विपरीतान्निगृह्णीयात् स्वं हि संधिविशारदः ॥ ११ ॥

संध्यर्थं राजपुत्रं वा लिप्सेथा भरतर्षभ ।

विपरीतं न तच्छ्रेयः पुत्र कस्यांचिदापदि ॥ १२ ॥

तस्याः प्रमोक्षे यत्नं च कुर्याः सोपायमन्त्रवित् । यदि शत्रुकी विपरीत दशा हो और वह संधिके लिये प्रार्थना करे तो संधिविशारद पुरुष उससे उपजाऊ भूमि, सोना- चाँदी आदि धातु तथा बलवान् मित्र एवं सेना लेकर उसके साथ संधि करे अथवा भरतश्रेष्ठ! प्रतिद्वन्द्वी राजाके राजकुमारको ही अपने यहाँ जमानतके तौरपर रखनेकी चेष्टा करनी चाहिये । इसके विपरीत बर्ताव करना अच्छा नहीं है । बेटा! यदि कोई आपत्ति आ जाय तो उचित उपाय और मन्त्रणाके ज्ञाता तुम- जैसे राजाको उससे छूटनेका प्रयत्न करना चाहिये ॥ प्रकृतीनां च राजेन्द्र राजा दीनान् विभावयेत् ॥ १३ ॥

क्रमेण युगपत् सर्वं व्यवसायं महाबलः ।

पीडनं स्तम्भनं चैव कोशभङ्गस्तथैव च ॥ १४ ॥