श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 821–830

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 821–830

पृष्ठ 821

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 821 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

नारदजीने कहा – जिसने आपके कमलोंका अपहरण किया हो, वह देहरूपी घरको ही आत्मा समझे । मर्यादाका उल्लंघन करके शास्त्र पढ़े । स्वरहीन पदका उच्चारण करे और गुरुजनोंका अपमान करता रहे, अर्थात् उपर्युक्त पापोंका भागी बने ॥ ३० ॥

नाभागउवाच

अनृतं भाषतु सदा सद्भिश्चैव विरुध्यतु ।

शुल्केन तु ददत्कन्यां यस्ते हरति पुष्करम् ॥ ३१ ॥

नाभाग बोले- जिसने आपके कमल चुराये हों, उसे सदा झूठ बोलनेका, संतोंके साथ विरोध करनेका और कीमत लेकर कन्या बेचनेका पाप लगे ॥ ३१ ॥

कविरुवाच

पद्भ्यां स गां ताडयतु सूर्यं च प्रतिमेहतु ।

शरणागतं संत्यजतु यस्ते हरति पुष्करम् ॥ ३२ ॥

कविने कहा – जिसने आपका कमल लिया हो, उसे गौको लात मारनेका, सूर्यकी ओर मुँह करके पेशाब करनेका और शरणागतको त्याग देनेका पाप लगे ॥ ३२ ॥

विश्वामित्र उवाच

करोतु भृतकोऽवर्षां राज्ञश्चास्तु पुरोहितः ।

ऋत्विगस्तु ह्ययाज्यस्य यस्ते हरति पुष्करम् ॥ ३३ ॥

विश्वामित्र बोले- जो आपका कमल चुरा ले गया हो, वह वैश्यका भृत्य होकर उसीके खेतमें वर्षा होनेमें बाधा उपस्थित करे। राजाका पुरोहित हो और यज्ञके अनधिकारीका यज्ञ करानेके लिये ऋत्विक् बने, अर्थात् इन पापोंके फलका भागी हो ॥ ३३ ॥

पर्वत उवाच

ग्रामे चाधिकृतः सोऽस्तु खरयानेन गच्छतु ।

शुनः कर्षतु वृत्त्यर्थे यस्ते हरति पुष्करम् ॥ ३४ ॥

पर्वतने कहा-जो आपका कमल ले गया हो, वह गाँवका मुखिया हो जाय, गधे सवारीपर चले तथा पेट भरनेके लिये कुत्तोंको साथ लेकर शिकार खेले ॥ भरद्वाज उवाच

सर्वपापसमादानं नृशंसे चानृते च यत् ।

तत् तस्यास्तु सदा पापं यस्ते हरति पुष्करम् ॥ ३५ ॥

भरद्वाजने कहा- जिसने आपके कमलोंकी चोरी की हो, उस पापीको निर्दयी और असत्यवादी मनुष्योंमें रहनेवाला सारा का सारा पाप सदा ही प्राप्त होता रहे ॥ ३५ ॥

अष्टक उवाच

पृष्ठ 822

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 822 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

स राजास्त्वकृतप्रज्ञः कामवृत्तश्च पापकृत् ।

अधर्मेणाभिशास्तूर्वी यस्ते हरति पुष्करम् ॥ ३६ ॥

अष्टक बोले — जो आपका कमल ले गया हो, वह राजा मन्दबुद्धि, स्वेच्छाचारी और पापात्मा होकर अधर्मपूर्वक इस पृथ्वीका शासन करे ॥ ३६ ॥

गालव उवाच

पापिष्ठेभ्यो ह्यनर्घार्हः स नरोऽस्तु स्वपापकृत् ।

दत्त्वा दानं कीर्तयतु यस्ते हरति पुष्करम् ॥ ३७ ॥

गालव बोले — जो आपका कमल चुरा ले गया हो, वह महापापियोंसे भी बढ़कर अनादरणीय हो, स्वजनोंका भी अपकार करे तथा दान देकर अपने ही मुखसे उसका बखान करे ॥ ३७ ॥

अरुन्धत्युवाच

श्वश्र्वापवादं मदतु भर्तुर्भवतु दुर्मनाः ।

एका स्वादु समश्नातु या ते हरति पुष्करम् ॥ ३८ ॥

अरुन्धती बोलीं-जिस स्त्रीने आपका कमल लिया हो, वह अपने सासकी निन्दा करे, पतिके लिये अपने मनमें दुर्भावना रखे और अकेली ही स्वादिष्ट भोजन किया करे, अर्थात् इन सब पापोंकी फलभागिनी बने ॥ ३८ ॥

वालखिल्या ऊचुः

एकपादेन वृत्त्यर्थं ग्रामद्वारे स तिष्ठतु ।

धर्मज्ञस्त्यक्तधर्मास्तु यस्ते हरति पुष्करम् ॥ ३ ९ ॥

बालखिल्य बोले — जो आपका कमल ले गया हो, वह अपनी जीविकाके लिये गाँवके दरवाजेपर एक पैरसे खड़ा रहे और धर्मको जानते हुए भी उसका परित्याग करे ॥ ३ ९ ॥ शुनःसखउवाच

अग्निहोत्रमनादृत्य स सुखं स्वपतु द्विजः ।

परिव्राट् कामवृत्तोऽस्तु यस्ते हरति पुष्करम् ॥ ४० ॥

शुनःसख बोले- जो आपका कमल ले गया हो, वह द्विज होकर भी सबेरे और शामको अग्निहोत्रकी अवहेलना करके सुखसे सोये तथा संन्यासी होकर भी मनमाना बर्ताव करे, अर्थात् उपर्युक्त पापोंके फलका भागी हो ॥ ४० ॥

सुरभ्युवाच

बालजेन निदानेन कांस्यं भवतु दोहनम् ।

दुह्येत परवत्सेन या ते हरति पुष्करम् ॥ ४१ ॥

पृष्ठ 823

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 823 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सुरभि बोली- जो गाय आपका कमल ले गयी हो, उसके पैर बालोंकी रस्सीसे बाँधे जायँ, उसके दूधके लिये ताँबे मिले हुए धातुका दोहनपात्र हो और वह दूसरे गायके बछड़ेसे दुही जाय ॥ ४१ ॥

भीष्मउवाच ततस्तु तैः शपथैः शप्यमानै- र्नानाविधैर्बहुभिः कौरवेन्द्र । सहस्राक्षो देवराट् सम्प्रहृष्टः समीक्ष्य तं कोपनं विप्रमुख्यम् ॥ ४२ ॥

भीष्मजी कहते हैं— कौरवेन्द्र! इस प्रकार जब सब लोग नाना प्रकारकी अनेकानेक शपथ कर चुके, तब सहस्र नेत्रधारी देवराज इन्द्र बड़े प्रसन्न हुए और उन विप्रवर अगस्त्यको कुपित हुआ देख उनके सामने प्रकट हो गये ॥ ४२ ॥

अथाब्रवीन्मघवा प्रत्ययं स्वं समाभाष्य तमृषिं जातरोषम् । ब्रह्मर्षिर्देवर्षिनृपर्षिमध्ये यं तं निबोधेह ममाद्य राजन् ॥ ४३ ॥

राजन्! ब्रह्मर्षियों, देवर्षियों तथा राजर्षियोंके बीचमें कुपित हुए महर्षि अगस्त्यको सम्बोधित करके देवराज इन्द्रने जो अपना अभिप्राय व्यक्त किया, उसे आज तुम मेरे मुखसे यहाँ सुनो ॥ ४३ ॥

शक्र उवाच अध्वर्यवे दुहितरं ददातु छन्दोगे वा चरितब्रह्मचर्ये । अथर्वणं वेदमधीत्य विप्रः स्नायीत यः पुष्करमाददाति ॥ ४४ ॥

इन्द्र बोले — ब्रह्मन्! जो आपका कमल ले गया हो, वह ब्रह्मचर्य व्रतको पूर्ण करके आये हुए यजुर्वेदी अथवा सामवेदी विद्वान्‌को कन्यादान दे । अथवा वह ब्राह्मण अथर्ववेदका अध्ययन पूरा करके शीघ्र ही स्नातक बन जाय ॥ ४४ ॥

सर्वान् वेदानधीयीत पुण्यशीलोऽस्तु धार्मिकः ।

ब्रह्मणः सदनं यातु यस्ते हरति पुष्करम् ॥ ४५ ॥

जिसने आपके कमलोंका अपहरण किया हो, वह सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन करे ।

पुण्यात्मा और धार्मिक हो, तथा मृत्युके पश्चात् वह ब्रह्माजीके लोकमें जाय ॥

अगस्त्य उवाच

पृष्ठ 824

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 824 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

आशीर्वादस्त्वया प्रोक्तः शपथो बलसूदन ।

दीयतां पुष्करं मह्यमेष धर्मः सनातनः ॥ ४६ ॥

अगस्त्यने कहा — बलसूदन! आपने जो शपथ की है, वह तो आशीर्वादस्वरूप है । अतः आपने ही मेरे कमल लिये हैं, कृपया उन्हें मुझे दे दीजिये । यही सनातन धर्म है ॥ ४६ ॥

इन्द्र उवाच

न मया भगवल्लोँभाद्धृतं पुष्करमद्य वै ।

धर्मांस्तु श्रोतुकामेन हृतं न क्रोद्धुमर्हसि ॥ ४७ ॥

इन्द्र बोले — भगवन्! मैंने लोभवश कमलोंको नहीं लिया था । आपलोगोंके मुखसे धर्मकी बातें सुनना चाहता था, इसीलिये इन कमलोंका अपहरण कर लिया था । अतः मुझपर क्रोध न कीजियेगा ॥ ४७ ॥

धर्मश्रुतिसमुत्कर्षो धर्मसेतुरनामयः ।

आर्षो वै शाश्वतो नित्यमव्ययोऽयं मया श्रुतः ॥ ४८ ॥

पृष्ठ 825

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 825 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

आज मैंने आपलोगोंके मुखसे उस आर्ष सनातन धर्मका श्रवण किया है जो नित्य अविकारी, अनामय और संसार-सागरसे पार उतारनेके लिये पुलके समान है । इससे धार्मिक श्रुतियोंका उत्कर्ष सिद्ध होता है ॥ ४८ ॥

तदिदं गृह्यतां विद्वन् पुष्करं द्विजसत्तम ।

अतिक्रमं मे भगवन् क्षन्तुमर्हस्यनिन्दित । ४ ९ ॥

द्विजश्रेष्ठ! विद्वन्! अब आप अपने ये कमल लीजिये । भगवन्! अनिन्दनीय महर्षे! मेरा अपराध क्षमा कीजिये ॥ ४ ९ ॥

इत्युक्तः स महेन्द्रेण तपस्वी कोपनो भृशम् ।

जग्राह पुष्करं धीमान् प्रसन्नश्चाभवन्मुनिः ॥ ५० ॥

महेन्द्रके ऐसा कहनेपर वे क्रोधी तपस्वी बुद्धिमान् अगस्त्य मुनि बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने इन्द्रके हाथसे अपने कमल ले लिये ॥ ५० ॥

प्रययुस्ते ततो भूयस्तीर्थानि वनगोचराः ।

पुण्येषु तीर्थेषु तथा गात्राण्याप्लावयन्त ते ॥ ५१ ॥

तदनन्तर उन सब लोगोंने वनके मार्गोंसे होते हुए पुनः तीर्थयात्रा आरम्भ की और पुण्यतीर्थोंमें जा - जाकर गोते लगाकर स्नान किया ॥ ५१ ॥

आख्यानं य इदं युक्तः पठेत् पर्वणि पर्वणि ।

न मूर्खं जनयेत् पुत्रं न भवेच्च निराकृतिः ॥ ५२ ॥

जो प्रत्येक पर्वके अवसरपर एकाग्रचित्त हो इस पवित्र आख्यानका पाठ करता है, वह कभी मूर्ख पुत्रको नहीं जन्म देता है, तथा स्वयं भी किसी अंगसे हीन या असफलमनोरथ नहीं होता है ॥ ५२ ॥

न तमापत् स्पृशेत् काचिद् विज्वरो नजरावहः ।

विरजाः श्रेयसा युक्तः प्रेत्य स्वर्गमवाप्नुयात् ॥ ५३ ॥

उसके ऊपर कोई आपत्ति नहीं आती । वह चिन्तारहित होता है । उसके ऊपर जरावस्थाका आक्रमण नहीं होता । वह रागशून्य होकर कल्याणका भागी होता है तथा मृत्युके पश्चात् स्वर्गलोकमें जाता है ॥ ५३ ॥

यश्च शास्त्रमधीयीत ऋषिभिः परिपालितम् ।

स गच्छेद् ब्रह्मणो लोकमव्ययं च नरोत्तम ॥ ५४ ॥

नरश्रेष्ठ! जो ऋषियोंद्वारा सुरक्षित इस शास्त्रका अध्ययन करता है, वह अविनाशी ब्रह्मधामको प्राप्त होता है ॥ ५४ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि शपथविधिर्नाम चतुर्नवतितमोऽध्यायः ॥ ९ ४ ॥

पृष्ठ 826

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 826 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

इसप्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें शपथविधिनामक चौरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९४ ॥

पृष्ठ 827

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 827 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पञ्चनवतितमोऽध्यायः छत्र और उपानहकी उत्पत्ति एवं दानविषयक युधिष्ठिरका प्रश्न तथा सूर्यकी प्रचण्ड धूपसे रेणुकाका मस्तक और पैरोंके संतप्त होनेपर जमदग्निका सूर्यपर कुपित होना और विप्ररूपधारी सूर्यसे वार्तालाप युधिष्ठिर उवाच

यदिदं श्राद्धकृत्येषु दीयते भरतर्षभ ।

छत्रं चोपानहौ चैव केनैतत् सम्प्रवर्तितम् ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा- भरतश्रेष्ठ! श्राद्धकर्मोंमें जिनका दान दिया जाता है, उन छत्र और उपानहोंके दानकी प्रथा किसने चलायी है? ॥ १ ॥

कथं चैतत् समुत्पन्नं किमर्थं चैव दीयते ।

न केवलं श्राद्धकृत्ये पुण्यकेष्वपि दीयते ॥ २ ॥

इनकी उत्पत्ति कैसे हुई और किसलिये इनका दान किया जाता है? केवल श्राद्धकर्ममें ही नहीं, अनेक पुण्यके अवसरोंपर भी इनका दान होता है ॥ २ ॥

बहुष्वपि निमित्तेषु पुण्यमाश्रित्य दीयते ।

एतद् विस्तरशो राजन् श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ ३ ॥

बहुत - से निमित्त उपस्थित होनेपर पुण्यके उद्देश्यसे इन वस्तुओंके दानकी प्रथा देखी जाती है । अतः राजन्! मैं इस विषयको विस्तारके साथ यथावत् रूपसे सुनना चाहता हूँ ॥ ३ ॥

भीष्म उवाच

शृणु राजन्नवहितश्छत्रोपानहविस्तरम् ।

यथैतत् प्रथितं लोके यथा चैतत् प्रवर्तितम् ॥ ४ ॥

भीष्मजीने कहा- राजन्! छाते और जूतेकी उत्पत्तिकी वार्ता मैं विस्तारके साथ बता रहा हूँ, सावधान होकर सुनो । संसारमें किस प्रकार इनके दानका आरम्भ हुआ और कैसे उस दानका प्रचार हुआ, यह सब श्रवण करो ॥ ४ ॥

यथा चाक्षय्यतां प्राप्तं पुण्यतां च यथा गतम् ।

सर्वमेतदशेषेण प्रवक्ष्यामि नराधिप ॥ ५ ॥

नरेश्वर! इन दोनों वस्तुओंका दान किस तरह अक्षय होता है, तथा ये किस प्रकार पुण्यकी प्राप्ति करानेवाली मानी गयी हैं । इन सब बातोंका मैं पूर्णरूपसे वर्णन

पृष्ठ 828

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 828 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

करूँगा ॥ ५ ॥

जमदग्नेश्च संवादं सूर्यस्य च महात्मनः ।

पुरा स भगवान् साक्षाद्धनुषाक्रीडयत् प्रभो ॥ ६ ॥

संधाय संधाय शरांश्चिक्षेप किल भार्गवः ।

तान् क्षिप्तान् रेणुका सर्वांस्तस्येषून्दीप्ततेजसः ॥ ७ ॥

आनीय सा तदा तस्मै प्रादादसकृदच्युत । प्रभो! इस विषयमें महर्षि जमदग्नि और महात्मा भगवान् सूर्यके संवादका वर्णन किया जाता है । पूर्वकालकी बात है, एक दिन भृगुनन्दन भगवान् जमदग्निजी धनुष चलानेकी क्रीड़ा कर रहे थे । धर्मसे च्युत न होनेवाले युधिष्ठिर! वे बारंबार धनुषपर बाण रखकर उन्हें चलाते और उन चलाये हुए सम्पूर्ण तेजस्वी बाणोंको उनकी पत्नी रेणुका ला- लाकर दिया करती थीं ॥ ६-७ ॥ अथ तेन स शब्देन ज्यायाश्चैव शरस्य च ॥ ८ ॥

प्रहृष्टः सम्प्रचिक्षेप सा च प्रत्याजहार तान् । धनुषकी प्रत्यंचाकी टंकारध्वनि और बाणके छूटनेकी सनसनाहटसे जमदग्नि मुनि बहुत प्रसन्न होते थे । अतः वे बार- बार बाण चलाते और रेणुका उन्हें दूरसे उठा- उठाकर लाया करती थीं ॥ ८३ ॥

ततो मध्याह्नमारूढे ज्येष्ठामूले दिवाकरे ॥ ९ ॥

स सायकान् द्विजो मुक्त्वा रेणुकामिदमब्रवीत् ।

गच्छानय विशालाक्षि शरानेतान् धनुश्च्युतान् ॥ १० ॥

यावदेतान् पुनः सुभ्रु क्षिपामीति जनाधिप । जनेश्वर! इस प्रकार बाण चलानेकी क्रीड़ा करते - करते ज्येष्ठ मासके सूर्य दिनके मध्यभागमें आ पहुँचे । विप्रवर जमदग्निने पुनः बाण छोड़कर रेणुकासे कहा — ' सुभ्रु! विशाललोचने! जाओ, मेरे धनुषसे छूटे हुए इन बाणोंको ले आओ, जिससे मैं पुनः इन सबको धनुषपर रखकर छोड़ू' ॥ ९ -१०३ ॥ सा गच्छन्त्यन्तरा छायां वृक्षमाश्रित्य भामिनी ॥ ११ ॥

तस्थौ तस्या हि सन्तप्तं शिरः पादौ तथैव च । मानिनी रेणुका वृक्षोंके बीचसे होकर उनकी छायाका आश्रय ले जाती हुई बीच - बीचमें ठहर जाती थी; क्योंकि उसके सिर और पैर तप गये थे ॥ ११३ ॥

स्थिता सा तु मुहूर्तं वै भर्तुः शापभयाच्छुभा ॥ १२ ॥

ययावानयितुं भूयः सायकानसितेक्षणा । कजरारे नेत्रोंवाली वह कल्याणमयी देवी एक जगह दो ही घड़ी ठहरकर पतिके शापके भयसे पुनः उन बाणोंको लानेके लिये चल दी ॥ १२३ ॥

पृष्ठ 829

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 829 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

प्रत्याजगाम च शरांस्तानादाय यशस्विनी ॥ १३ ॥

सा वै खिन्ना सुचार्वंगी पद्भ्यां दुःखं नियच्छती ।

उपाजगाम भर्तारं भयाद् भर्तुः प्रवेपती ॥ १४ ॥

उन बाणोंको लेकर सुन्दर अंगोंवाली यशस्विनी रेणुका जब लौटी; उस समय वह बहुत खिन्न हो गयी थी । पैरोंके जलनेसे जो दुःख होता था, उसको किसी तरह सहती और पतिके भयसे थर- थर काँपती हुई उनके पास आयी ॥ १३-१४ ॥

स तामृषिस्तदा क्रुद्धो वाक्यमाह शुभाननाम् ।

रेणुके किं चिरेण त्वमागतेति पुनः पुनः ॥ १५ ॥

उस समय महर्षि कुपित होकर सुन्दर मुखवाली अपनी पत्नीसे बारंबार पूछने लगे —'रेणुके! तुम्हारे आनेमें इतनी देर क्यों हुई? ' ॥ १५ ॥

रेणुकोवाच

शिरस्तावत् प्रदीप्तं मे पादौ चैव तपोधन ।

सूर्यतेजोनिरुद्धाहं वृक्षच्छायां समाश्रिता ॥ १६ ॥

रेणुका बोली- तपोधन! मेरा सिर तप गया, दोनों पैर जलने लगे और सूर्यके प्रचण्ड तेजने मुझे आगे बढ़नेसे रोक दिया । इसलिये थोड़ी देरतक वृक्षकी छायामें खड़ी होकर विश्राम लेने लगी थी ॥ १६ ॥

एतस्मात् कारणाद् ब्रह्मंश्चितयैतत् कृतं मया ।

एतच्छ्रुत्वा मम विभो मा क्रुधस्त्वं तपोधन ॥ १७ ॥

ब्रह्मन्! इसी कारणसे मैंने आपका यह कार्य कुछ विलम्बसे पूरा किया है । तपोधन! प्रभो! मेरे इस बातपर ध्यान देकर आप क्रोध न करें ॥ १७ ॥

जमदग्निरुवाच

अद्यैनं दीप्तकिरणं रेणुके तव दुःखदम् ।

शरैर्निपातयिष्यामि सूर्यमस्त्राग्नितेजसा ॥ १८ ॥

जमदग्निने कहा – रेणुके! जिसने तुझे कष्ट पहुँचाया है, उस उद्दीप्त किरणोंवाले सूर्यको आज मैं अपने बाणोंसे, अपनी अस्त्राग्निके तेजसे गिरा दूँगा ॥ १८ ॥

भीष्म उवाच

स विस्फार्य धनुर्दिव्यं गृहीत्वा च शरान् बहून् ।

अतिष्ठत् सूर्यमभितो या तो याति ततो मुखः ॥। १ ९ ॥

भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! ऐसा कहकर महर्षि जमदग्निने अपने दिव्य धनुषकी प्रत्यंचा खींची और बहुत - से बाण हाथमें लेकर सूर्यकी ओर मुँह करके वे खड़े हो गये । जिस दिशाकी ओर सूर्य जा रहे थे, उसी ओर उन्होंने भी अपना मुँह कर लिया था ॥

पृष्ठ 830

महाभारत — खण्ड ६, पृष्ठ 830 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अथ तं प्रेक्ष्य सन्नद्धं सूर्योऽभ्येत्य तथाब्रवीत् ।

द्विजरूपेण कौन्तेय किं ते सूर्योऽपराध्यते ॥ २० ॥

कुन्तीनन्दन! उन्हें युद्धके लिये तैयार देख सूर्यदेव ब्राह्मणका रूप धारण करके उनके पास आये और बोले — ' ब्रह्मन्! सूर्यने आपका क्या अपराध किया है? ॥

आदत्ते रश्मिभिः सूर्यो दिवि तिष्ठंस्ततस्ततः ।

रसं हृतं वै वर्षासु प्रवर्षति दिवाकरः ॥ २१ ॥

‘ सूर्यदेव तो आकाशमें स्थित होकर अपनी किरणों द्वारा वसुधाका रस खींचते हैं और बरसातमें पुनः उसे बरसा देते हैं ॥ २१ ॥

ततोऽन्नं जायते विप्र मनुष्याणां सुखावहम् ।

अन्नं प्राणा इति यथा वेदेषु परिपठ्यते ॥ २२ ॥

‘ विप्रवर! उसी वर्षासे अन्न उत्पन्न होता है, जो मनुष्योंके लिये सुखदायक है । अन्न ही प्राण है, यह बात वेदमें भी बतायी गयी है ॥ २२ ॥

अथास्रेषु निगूढश्च रश्मिभिः परिवारितः ।

सप्तद्वीपानिमान् ब्रह्मन् वर्षेणाभिप्रवर्षति ॥ २३ ॥

‘ब्रह्मन्! अपने किरणसमूहसे घिरे हुए भगवान् सूर्य बादलोंमें छिपकर सातों द्वीपोंकी पृथ्वीको वर्षाके जलसे आप्लावित करते हैं ॥ २३ ॥

ततस्तदौषधीनां च वीरुधां पुष्पपत्रजम् ।

सर्वं वर्षाभिनिर्वृत्तमन्नं सम्भवति प्रभो ॥ २४ ॥

‘ उसीसे नाना प्रकारकी ओषधियाँ, लताएँ, पत्र - पुष्प, घास -पात आदि उत्पन्न होते हैं । प्रभो! प्रायः सभी प्रकारके अन्न वर्षाके जलसे उत्पन्न होते हैं ॥ २४ ॥

जातकर्माणि सर्वाणि व्रतोपनयनानि च ।

गोदानानि विवाहाश्च तथा यज्ञसमृद्धयः ॥ २५ ॥

शास्त्राणि दानानि तथा संयोगा वित्तसंचयाः ।

अन्नतः सम्प्रवर्तन्ते तथा त्वं वेत्थ भार्गव ॥ २६ ॥

‘ जातकर्म, व्रत, उपनयन, विवाह, गोदान, यज्ञ सम्पत्ति, शास्त्रीय दान, संयोग और धनसंग्रह आदि सारे कार्य अन्नसे ही सम्पादित होते हैं । भृगुनन्दन! इस बातको आप भी अच्छी तरह जानते हैं ॥ २५-२६ ॥

रमणीयानि यावन्ति यावदारम्भकाणि च ।

सर्वमन्नात् प्रभवति विदितं कीर्तयामि ते ॥ २७ ॥

'जितने सुन्दर पदार्थ हैं, अथवा जो भी उत्पादक पदार्थ हैं, वे सब अन्नसे ही प्रकट होते हैं । यह सब मैं ऐसी बात बता रहा हूँ जो आपको पहलेसे ही विदित हैं ॥ २७ ॥

सर्वं हि वेत्थ विप्र त्वं यदेतत् कीर्तितं मया ।

प्रसादये त्वां विप्रर्षे किं ते सूर्यं निपात्य वै ॥ २८ ॥